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शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

निशाने पर हैं स्वयंसेवी संस्थाएं

राजधानी दिल्ली में हाल ही में ,बच्चों की खरीद फ़रोख्त की घटना में जिस तरह से एक स्वयंसेवी संस्था की लिप्त्ता जगजाहिर हुई है उसने एक बार फ़िर से देश भर में चल रही तमाम स्व्यंसेवी संस्थाओं को सवाल के घेरे में रख दिया है ॥ ऐसा नहीं है कि ऐसे किसी घृणित काम में किसी स्वयं सेवी संस्था का नाम पहली बार आया है । वर्तमान में जिस तरह के देश के सामाजिक , राजनीतिक , प्रशासनिक हालात हैं उसमें कोई भी तंत्र कोई भी व्यवस्था इस सर्व्यापी और सर्वग्राह्य बन चुके अपराध का हिस्सा न बनने देने से खुद को रोक नहीं पाया है । मगर सबसे अधिक अफ़सोस उन व्यवस्थाओं के लिए होता है जो समाज और उसकी सेवा के नाम पर या उसके इर्द गिर्द है । इनमें से एक बहुत बडी व्यवस्था है चिकित्सा और शिक्षा , बहुत ही दुखदायी बात ये है कि आज दोनों ही व्यवस्थाएं , लालच , और धनोपार्जन का पर्याय मात्र बन कर रह गई हैं ।
ब्लॉग से डोमेन की ओर अग्रसर हूं

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

खिलाडियों की उपेक्षा/अपमान ...देश का खेल चरित्र




यूं तो इस देश में खिलाडियों की उपेक्षा का अपना एक अलग ही खेल के समानांतर ही एक इतिहास है , मगर जब देश के खिलाडी सबको चौंकाते हुए राष्ट्रमंडल खेलों में या किसी बडे अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में पदकों से देश की शान बढाते हैं तो लगता है कि शायद इस बार के बाद से इस देश को , सरकार को और प्रशासन को इतनी तमीज आ जाए कि , संघर्षशील का न सही विजेताओं का ही और सम्मान न कर पाए तो न सही मगर इतना तो तय कर ही सके कि उनका अपमान न हो । ये अपमान हर बार पिछली बार से अधिक ज्यादा असहनीय सा लगता है न सिर्फ़ उन खिलाडियों को बल्कि आम जनता को भी ।

यदि ये कहा जाए कि पूरी दुनिया में हॉकी के जादूगर के नाम से विख्यात भारतीय खिलादी मेजर ध्यानचंद को भी सिर्फ़ खेल दिवस के बहाने घडी दो घडी याद करके बस औपचारिकता निभा ली जाती है तो कोई गलत नहीं होगा । जिस हॉकी टीम को ध्यानचंद और उनके समकालीनों ने अपनी मेहनत और श्रम से सींच कर बुलंदियों पर पहुंचाया था आज वो न सिर्फ़ अंदरुनी बल्कि बाहरी सियासी कूटनितिक लडाई का मैदान बना हुआ है । और अब फ़िर कभी उस समय को भारतीय हॉकी खिलाडी पा सकेंगे ये एक दिवास्वप्न ही लगता है । न सिर्फ़ ध्यान चंद बल्कि अपमानित होने वाली खिलाडियों की सूची में उडन परी पीटी उषा , ओलंपिक पदक विजेता पहलवान सुशील , और अब हाल ही में एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक विजेता धावक सुधा सिंह का नाम भी शामिल हो गया है । इस खिलाडी के साथ तो ये हुआ कि प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में जिसमें खुद सुधा सिंह को ही मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया था , उस प्रदेश के खेल मंत्री अयोध्या प्रसास पाल ने ही नहीं पहचाना .बल्कि प्रदेश स्तर के खेल उच्चाधिकारियों तक ने उनकी उपेक्षा की । इस घटना से वे इतनी व्यथित हुई कि उन्होंने फ़ैसला किया कि अब वे कभी उस प्रदेश से नहीं खेलेंगी , किंतु मंत्री और अधिकारी द्वारा खेद जताने पर वे मान गई हैं ॥इससे भी हालिया मामला ये हुआ है कि सानिया नेहवाल जो अभी विश्व की दो नंबर की बैडमिंटन खिलाडी हैं, आधिकारिक साईट पर उनके विषय में कोई सूचना ही नहीं अद्यतित की गई है । ये भी नहीं कि उन्हें हाल ही में खेल रत्न से नवाज गया है । ये सिलसिला अभी आगे भी बदस्तूर चलने की संभावना है ।

इन खबरों के अलावा खिलाडियों की दुर्दशा की और भी बहुत सारी खबरों में जो अक्सर सुनने को मिलती है वो ये कि खेलों में सक्रियता की कमी होते ही या फ़िर खेल के मैदान से हटते ही उन खिलाडियों और उनके परिवार की हालत भुखमरी से जूझने जैसी हो जाती है । यदि इन खबरों और खिलाडियों की ऐसी हालत के बाद भी देश के किसी कोने में कोई सायना , कोई सुधा , कोई उषा यदि अब भी जाने कितनी ही विपरीत परिस्थितियों में खेल के नाम पर अपना सर्वस्व झोंक रही है तो ये इस देश की खुशकिस्मती है और खिलाडियों की शायद बदकिस्मती ही बन जाएगी कभी न कभी ।

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

सावधान ! न्याय व्यवस्था संक्रमणकाल में है ... अजय कुमार झा






ऐसा कहा जाता है कि , यदि सिर्फ़ एक गांठ को धीरे से खींच दिया जाए तो फ़िर परत दर परत सब उघडने लगता है । आजकल कुछ कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है भारतीय न्यायपालिका में । ऐसा लग रहा है मानो एक होड सी लग गई है , रोज कोई न कोई ऐसी घटना , कोई न कोई ऐसा खुलासा , और कोई न कोई ऐसा वक्तव्य आम जनता के सामने आ रहा है जो आम जनता के इस विश्वास को और भी पुख्ता कर रहा है कि ...नहीं अब न्यायपालिका में भी सब कुछ ठीक नहीं है और वहां भी संक्रमणकाल तो शुरू हो ही चुका है ..शायद बहुत पहले ही शुरू हो चुका था मगर अब घाव रिस रहा है और मवाद बाहर आ रहा है ।

ज्ञात हो कि , अभी तो एक विवाद थमा भी नहीं था , हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने पहले एक अधीनस्थ उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के आचरण और क्रियाकलापों के संदिग्ध दिखने जैसी टिप्पणी की , जिसे वापस लेने के लिए दायर की एक याचिका में तो जैसे न्यायपालिका खुद ही अपने ऊपर उठ रही उंगलियों से आजिज आकर खीज कर ऐसी कडी भाषा में अपने विचार व्यक्त किए कि न सिर्फ़ न्याय क्षेत्र से जुडे कानूनविद ..सरकार , प्रशासन सभी हतप्रभ रह गए । इस मामले की पृष्ठभूमि और दूरगामी परिणामों पर अभी बहस चल ही रही थी कि इसी बीच एक बार फ़िर सबका ध्यान पुन: न्यायपालिका की ओर चला गया । एक निवर्तमान न्यायमूर्ति ने सार्वजनिक रूप से वक्तव्य दिया कि , जिस सूचना की जानकारी न होने का दावा एक पूर्व न्यायाधीश कर रहे हैं उस बारे में उन्हें न सिर्फ़ मौखिक बल्कि लिखित रूप से दी गई थी ।

इस घटना ने एक बार फ़िर कई गंभीर प्रश्न व्यवस्था के सामने रख दिए हैं । पहला तो ये कि , तो आखिर जनता ये मान कर चले अब कि , कोई भी स्तर आज भ्रष्टाचार , कदाचार , घूसखोरी जैसी स्थापित हो चुकी भारतीय कार्यप्रणाली से अछूते नहीं हैं अब । दूसरा और ज्यादा मह्त्वपूर्ण ये कि , आखिए वो कौन सा दबाव , वो कौन सी वजह थी जो न्यायमूर्ति को ये खुलासा तब करने से रोक रही थी जब वो उन्हीं मुख्य न्यायाधीश के सहकर्मी थे । तो क्या आम जनता यही समझे कि , न्यायपालिका तक में वरिष्ठ और शक्तिशाली सहकर्मी के खिलाफ़ बोलने का साहस नहीं होता है और वे भी आम कर्मचारी की तरह डरे और सिकुडे हुए रहते हैं । आज अचानक ही क्यों और कैसे उन्होंने ये सहजता से कह दिया ।

आम आदमी जो पहले ही प्रशासन , राजनीतिज्ञों और अब तो उसमें मीडिया की साठ गांठ से आज तक निराश और क्षुब्ध था अब न्यायपालिका को संक्रमित होता देख कर , वो भी सर्वोच्च स्तर तक , को देख कर आक्रोशित और स्तब्ध है । यदि अब भी जल्दी ही सब कुछ पूरी तरह न सही मगर संतोषजनक स्तर तक ठीक नहीं किया जा सका तो फ़िर आने वाला समय तो आम जनता खुद ही तय करेगी कि उसे करना क्या है , सहना क्या है ? लेकिन सबसे बडा यक्ष प्रश्न यही है कि ये करेगा कौन ????


रविवार, 12 दिसंबर 2010

नो वर्क नो मनी ..बंद कर दिया जाए संसद सत्र को अब





पिछले बीस दिनों से समाचार पत्रों पर जनता एक ही सुर्खियां पढती आ रही है कि गतिरोध जारी ..संसद आज भी नहीं चली । और पूरक खबर के रूप में जो खबर होती है कि आम जनता का फ़लाना ढिमकाना पैसा व्यर्थ चला गया । यहां आम आदमी सोचता है कि आखिर उसका पैसा क्यों व्यर्थ चला गया ..उसका वो पैसा जो सरकार ने ना जाने कौन कौन से करों की आड में , कौन कौन सी सुविधाओं को देने , के एवज में बिल भुगतान के रूप में उससे वसूला है ..और उसने वो उस हिस्से में से दिया है जिसे कमाने के लिए उसे जाने कितनी मेहनत करनी पड रही है । एक नौकरी पेशा फ़िर चाहे वो निजि क्षेत्र का हो या सार्वजनिक क्षेत्र का , वो ये समझने में असमर्थ रहता है कि , जब उसके कार्यकाल में उसके एक दिन के अवकाश के लिए उसे या तो छुट्टी देनी पडती है या फ़िर उसकी तनख्वाह में से उसे उस दिन का पैसा कटवाना होता है तो फ़िर उसी जनता के प्रतिनिधि या उससे भी बढकर जनसेवकों द्वारा लगातार बीस तीस दिनो तक काम नहीं कर पाने के बावजूद आम लोगों का पैसा क्यों व्यर्थ होना चाहिए ।

आज हर तरफ़ भ्रष्टाचार का ही बोलबाला है और इस समय तो जिस तरह से उसकी परतें खुलती दिख रही हैं उससे इसकी व्यापकता भी दिख रही है । आम जनता की नज़र में तो आज प्रशासन , न्यायपालिका , विधायिका और कार्यपालिका सब के सब कटघरे में खडे हैं । अब तो कोई भी स्तर और कोई भी अंग ऐसा नहीं बचा है जहां भ्रष्टाचार की छाया न पडी हो तो फ़िर क्या पक्ष और क्या विपक्ष । इसमें कोई शक नहीं कि आज संसद में एक अच्छे विपक्ष की तरह मौजूदा व विपक्ष भी सरकार के भ्रष्टाचार को बाहर लाने के लिए कमर कसे बैठी है । मगर फ़िर आम जनता ये भी सोच रही है कि आखिर और कितने दिनों तक इस मुद्दे पर आम जनता के लिए भविष्य के लिए तय की जाने वाली नीतियां और कानून बनाने वाले समय को बलि पर चढाया जाता रहेगा ।

इससे अलग एक बात और ये भी है कि , जिस संयुक्त संसदीय जांच समिति के गठन की मांग को लेकर आज विपक्ष अडा हुआ है क्या ये हलफ़नामा दायर कर सकता है ..कोई भी विधायिका , संसद और तमाम संबंधित प्रतिनिधि ...है कोई भी जो ये हलफ़नामा दायर कर सके कि उस जांच की रिपोर्ट में दोषी पाए गए लोगों को सजा दिलवाई जा सकेगी । या फ़िर ये कि इस घोटाले में आम जनता का जो भी पैसा डकार लिया गया है उस पैसे को उस दोषी व्यक्ति से वसूल कर देश को वापस किया जा सकेगा । या फ़िर कि ये बताया जा सकता है कि आज तक ऐसी तमाम संयुक्त संसदीय जांच समितियों की रिपोर्ट के आधार पर अमुक अमुक राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों को सजा का फ़रमान सुनाया जा सका , इसलिए जेपीसी ही आखिरी विकल्प बचता है । इस मुद्दे पर सरकार का चाहे जो भी निर्णय हो , किंतु आए दिन संसद में जिस तरह से बार बार ऐसे ही मुद्दों पर संसद में सडक जाम जैसा नज़ारा पेश करने का जो काम देश के जनप्रतिनिधि कर रहे हैं वो न सिर्फ़ देश की जनता की आंखों में खटकने लगा है बल्कि अब तो विश्व समुदाय भी यही सोचने पर विवश है कि आखिर ये उसी देश की सर्वोच्च संस्था है जो दावा कर रहा है कि उसे संयुक्त राष्ट्र संघ में स्थाई सदस्यता चाहिए । अब वक्त आ गया है कि ...काम नहीं तो पैसा नहीं के तर्ज़ पर इन जैसे तमाम लोगों की तनख्वाह और भत्ते बंद कर देने चाहिए॥

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

न्यायिक प्रक्रिया में परिवर्तन की दरकार



पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से न्यायिक क्षेत्र में पनप रहे कदाचार व अन्य अनियमितताओं की खबरें आती रही हैं उसने एक बार फ़िर से इस चर्चा को गर्म कर दिया है कि क्या अब समय आ गया है जब पूरी न्याय प्रणाली में परिवर्तन किया जाए । कभी कभी तो बहुत सी एक जैसी घटनाओम और अपराधों के मामले में खुद न्यायपालिका अपने आदेशों और फ़ैसलों में इतना भिन्न नज़रिया दिखा दे रही हैं कि आम लोग ये समझ ही नहीं पाते हैं कि आखिर न्याय कौन सी दिशा में हुआ है । इतना ही नहीं बहुत बार तो न्यायिक आदेश की व्याख्या करते करते आम जनता को अपने साथ सरासर अन्याय होता हुआ सा महसूस हो जाता है । भारतीय न्यायिक प्रक्रिया की एक सबसे बडी कमी है उसके फ़ैसलों उसके दृष्टिकोण और उसके क्रियाकलाप पर आम आदमी द्वारा किसी भी तरह की असुरक्षित प्रतिक्रिया देने का नितांत अभाव ।

आज स्थिति इतनी बदतर है कि , आज इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के सामने इस बात की अर्जी लगाई कि , कुछ दिनों पहले सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार में लिप्तता विषयक जो तल्ख टिप्पणी की थी उसे वापस लिया जाए । इस अर्जी पर उच्च न्यायालय की अरजी को खारिज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जो कडी फ़टकार लगाई , उसे लगाते हुए वो जरूर अभी हाल ही में हुई उस घटना को नज़रअंदाज़ कर गई जब एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने बाकायदा गिनती करते हुए बताया था कि उन माननीय पर भी ऐसी ही टिप्पणी लागू की जा सकती थी । इससे इतर केंद्र सरकार की एक स्थाई संसदीय समिति ने भी अब पूरी तरह से इस मामले में अपनी कमर कस ली है । भविष्य में भ्रष्ठ न्यायाधीशों से निपटने के लिए सरकार कडे नियम कानून लाने का विचार कर रही है । उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु बासठ वर्ष से पैंसठ वर्ष किए जाने की सिफ़ारिश भी की गई है ।

पिछले एक दशक से न्यायपालिका की भूमिका में जिस तरह का बदलाव आया और एक स्वनिहित शक्ति का संचार उसमें आया स्वाभाविक रूप से उसमें समाज में व्याप्त वो सभी दुर्गुण आ गए तो अन्य सार्वजनिक संस्थाओं में आ जाती हैं । किंतु इस बात की गंभीरता को भलीभांतिं परखते हुए इसके उपचार में कई प्रयास भी शुरू हो गए थे ।जजेज़ जवाबदेही विधेयक का मसौदा , अखिल भारतीय न्यायिक सेवा आदि का मसौदा इन्हीं प्रयासों का हिस्सा था । ये सरकारों की अकर्मठता है या आलस्य या फ़िर कि कोई छुपी हुई मंशा कि अब तक इस दिशा में कोई भी कार्य नहीं हो पाया है । न्यायिक प्रक्रिया की खामी की जहां तक बात है तो सबसे पहले और सबसे अधिक जो बात उठती है वो न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति की प्रक्रिया जिसमें भाई भतीजावाद का आरोप लगता रहता है । एक ही स्थान पर नियुक्त रहने के कारण इस अंदेशे को बल भी मिल जाता है । इन्हीं सबके कारण न्यायिक क्षेत्र में परिवर्तन वो भी आमूल चूल परिवर्तन किए जाने के स्वर उठने लगे हैं ।

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

भ्रष्टाचार मिटाने के लिए पहले देश को ही मिटाना होगा




एक बार फ़िर सब कुछ लगभग ठीक ठाक सा चलता दिखने के बावजूद अचानक ही घोटालों , घपलों की फ़ेहरिस्त सी खुल रही है । अब तो लोगों को वर्षों पहले की नरसिम्हा सरकार की याद हो आई है ..जिस अकेली सरकार के लगभग सभी मंत्रियों ने अपने खाते में कम से कम एक बडा घोटाला तो डाला ही था । और अब इतने समय के बाद , एक बार फ़िर एक मनमोहिनी सरकार देश को घोटालों और घपलों के स्वर्ण युग में ले आई है । आम जनता प्रतिदिन बडी ही व्यग्रता से प्रतीक्षा करती है कि , देखा जाए कि आज कौन सा नया घोटाला आ रहा है पुराने घोटाले से थोडा सा ध्यान बंटाने के लिए । और भ्रष्टाचार का आलम देखिए कि देश के राजनीतिज्ञों , और प्रशासकों ,का भ्रष्टाचार तो अब ऐसी घटना है जिसका कोई संज्ञान ही नहीं लिया जाता , खुद सर्वोच्च न्यायालय ने अभी हाल ही में अपने अधीनस्थ मगर उच्च स्तर की अदालत के न्यायाधीशों के आचरण और भ्रष्टाचार लिप्तता का आरोपी होने जैसा कुछ कुछ ईशारा ही किया था कि , वहां कार्यरत एक वरिष्ठतम अधिवक्ता ने बाकायदा शपथपत्र देकर कहा कि जब उन्होंने कहा था कि भ्रष्टाचार के छींटे खुद सर्वोच्च स्तर तक भी पहुंच चुकी है । अब बच ही क्या गया है , न्यायपालिका अनेकों बार भ्रष्टाचार के मुकदमों की सुनवाई करते समय ये कह चुकी है अब तो बस एक ही रास्ता बचा है कि भ्रष्टाचारियों को सरे आम फ़ांसी के फ़ंदे पर टांग देना चाहिए , मगर फ़िर भी इसके बावजूद भी आज तक किसी भी भ्रष्टाचारी को फ़ांसी पर चढाना तो दूर , उनका बाल भी बांका नहीं किया जा सका है । उलटे ही अगर वो राजनीतिज्ञ है तो उसका कद और भी बडा हो जाएगा और अगर प्रशासक है तो निकट भविष्य में राजनीतिज्ञ बन जाने की संभावना प्रबल हो जाती है ।


हाल ही के राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन करने मे हुए घोटाले से शुरू हुआ ये सिलसिला अब थमने का नाम ही नहीं ले रहा है , आदर्श घोटाला हो या कि स्पेक्ट्रम घोटाला , सभी एक से बडे एक और निर्लज्जता और लालच की पराकाष्ठा को परिभाषित करते हुए । अब तो जैसे जनता ने भी इन पर प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया है अन्यथा देश को जाने कितने पीछे धकेल देते ये घपले और घोटालों के लिए जिम्मेदार इन तमाम भ्रष्टाचारियों को न सिर्फ़ देश समाज और कानून का गुनाहगार माना जाना चाहिए बल्कि इंसानियत के दुश्मन की तरह का व्यवहार इनसे किया जाना चाहिए । वैसे तो भ्रष्टाचार नाम की ये बीमारी कोई एक देश , एक प्रांत , एक द्वीप या एक क्षेत्र की समस्या नहीं है बल्कि अब तो ये बार बार प्रमाणित हो चुका है कि विश्व का कोई भी देश किसी न किसी स्तर और किसी न किसी हद तक भ्रष्टाचार का दंश झेल चुका है ।हालांकि इस विषय का अध्य्यन करने वाले भ्रष्टाचार कारण एवं उन्मूलन पर अपने निष्कर्षों में कहते हैं कि , बुनियादी फ़र्क सिर्फ़ ये होता है कि किस देश और समाज ने भ्रष्टाचार के डंक को किस रूप में झेला है और उस दिशा में क्या सोचा और किया है । जैसे कई देशों में भ्रष्टाचार का विरोध खुद आम जनता ने इतनी तीव्रता से किया है कि उसने न सिर्फ़ भ्रष्टाचार के आरोपी को जाना पडा बल्कि उससे जुडे लोगों और संस्थाओं तथा सरकार तक का बंटाधार होते देर नहीं लगी है । कुछ देश तो इससे भी आगे जाकर हत्थे चढे भ्रष्टाचारियों को आम जनता की जरूरतों का कातिल करार देकर अपने गवर्नरों तक को फ़ांसी पर टांग चुकी है । विशेषज्ञ कहते हैं कि सबसे कठिन स्थिति उन देशों की है जहां भ्रष्टाचार को आम आदमी द्वारा ग्राह्य मान लिया गया है जैसे कि भारत और उसके आस पास के अन्य देश ।

भ्रष्टाचार से लडने के लिए न तो कोई कानून न ही कोई सरकारी नीति कारगर साबित हो रही है । इसकी सबसे बडी वजह ये है कि आम लोगों ने इसे एक नियमित नियति के रूप में अपना लिया है । कुल मिलाकर ये मान लिया गया है कि भ्रष्टाचार एक जडहीन वृक्ष है , जिसकी शाखें , पत्ते , फ़ल और फ़ूल , जाने किन किन सूत्रों से खुद को सींच कर अपने आपको बढाने में लगी हुई हैं । आम आदमी को न तो उसका आदि दिख रहा है न अंत और अब तो उस भ्रष्टाचार से लडने का माद्दा भी चुकता सा दिख रहा है । हालांकि सूचना का अधिकार जैसे कानूनों ने कुछ हद तक भ्रष्टाचार को नग्न करने का कार्य तो अवश्य किया है किंतु इसके आगे की स्थिति फ़िर वही ढाक के तीन पात जैसी हो जाती है । आखिर सरकार कभी ये आंकडे क्यों नहीं दे पाई कि , अमुक भ्रष्टाचारी के पास से इतना धन जब्त किया गया और उस धन से फ़लाना ढिमकाना परियोजना का कार्य पूरा किया गया । या फ़िर ये कि , आज तक जिस भी स्तर पर किसी ने भी भ्रष्टाचार के विरूध बिगुल फ़ूंकने का काम किया है उन्हें सरकार समाज ने अपना आदर्श और अगुआ मान कर सर आंखों पर बिठा लिया हो या फ़िर कि उसकी और उससे संबंधित लोगों की सुरक्षा और संरक्षा की गारंटी ले ली हो । इसके उलट उस दिन से उसके जीवन की मुश्किलें बढ जाती हैं । भ्रष्टाचार मिटाने के लिए अब नए सिरे से और हर स्तर से हर वो नियम हर उस नीति को बदलना होगा जो भ्रष्टाचार की गुंजाईश को पैदा करते हैं । ऐसा हो पाएगा ये अभी दूर की कौडी लगती है ॥

रविवार, 28 नवंबर 2010

धौलाकुंआं रेप कांड पार्ट टू : वाह रे मीडिया यहां भी सीक्वेल का एंगल ढूंढ लिया .....jha ji ...smashed ...


चलिए कुछ दिनों के लिए मीडिया वालों को कुछ तो ऐसा मिला जिसे वे कुछ दिनों तक घसीट सकेंगे ...उसके बाद फ़िर ...अरे भाई जब पहले ही लिख दिया गया है कि धौलाकुंआं रेप कांड पार्ट टू ..तो फ़िर ये तो समझने वाली बात ही है न कि ..अभी तीन चार पांच का स्कोप बांकी है ......और हो भी क्यों न .रावण दहन के दिन कौन सा एक भी जीवित रावण हम फ़ूंक पाते हैं ..| यहां एक बात मेरी समझ में और नहीं आई कि ..ये हमेशा ही इज्जत आम आदमी की ही क्यों लुटती है ..कभी नहीं सुना कि पीएम सीएम के घर की किसी को कोई ले भागा .....तो क्या माना जाए ये कि ..उनकी इज्जत ही नहीं होती ..या कि लुटती ही नहीं ..इज्जत सिर्फ़ आम आदमी आम लडकी की ही होती है जो लुटती है ।


आज दिल्ली जैसे महानगर का कुल मिला कर जो हाल देखता हूं मुझे लगता है कि ...मानो इंतज़ार सिर्फ़ इस बात का होता है ...किसकी बारी आती कब है ...बांकी कुछ भी नया नहीं है । और यदि आप आम आदमी हैं तो आपके लिए इन घटनाओं , ऐसी बातों से रूबरू होने की संभावना ज्यादा बढ जाती है । बडे लोगों के लिए ऐसी घटनाओं में सिर्फ़ एक ही जिम्मेदारी होती है ..बस चिंता व्यक्त करते रहना है ...मंत्री नेता हैं तो फ़िर ये भी कोई जरूरी नहीं ...उलटा पीडिता पर ही आरोप लगाया जा सकता है । और छोटे मध्यम लोगों की नियति देखिए ..पहले स्कूल जाने वाले वैन में बिटिया , बहन सुरक्षित जा रही है यही पता नहीं ..स्कूल में जाने कौन कब किस तरह से अपनी हैवानियत के अधीन होकर शोषण का शिकार हो जाए । चलो स्कूल कॉलेज भी पार कर लिया ..अब नौकरी ...सफ़र ..बस ट्रेन मेट्रो ..कहां कहां तक और किस किस से बचा के रखा जाएगा ..इज्जत को । और फ़िर इस समाज में आज जो सबसे जल्दी चली जाती है वो है ..एक पीडिता की इज्जत ।

जब ऐसी घटनाओं के दोहराव को देखता हूं तो कई सारी बातें दिमाग में कौंधने लगती हैं ...सोचता हूं कि क्या दिल्ली की सी एम उतनी आसानी से वही सब तब बोल सकती थीं जब ऐसे ही किसी धौलेमौले कुंएं में ...किसी मंत्री नेता , अधिकारी किसी बडे उद्योगपति किसी खिलाडी , के घर की कोई बेटी होती ...न शायद तब इतनी बेशर्मी नहीं ला पातीं वें ..ये कहने के लिए कि लडकियां घर से निकलती ही क्यों हैं । एक और ऐसी बात मेरे मन में अक्सर इन घटनाओं को देख सुन कर जो हठात ही आती है वो ये कि ...आपको "जागो " पिक्चर याद है जिसमें पीडिता बालिका के माता पिता खुद ही बलात्कारियों का कत्ल कर देते हैं ...मानता हूं कि रील लाईफ़ और रीयल लाईफ़ में बहुत फ़र्क है ..मगर काश ...काश कि ये खबरें भी समानांतर ही चलती रहती कि ...अपनी आबरू को बचाने के लिए एक युवती ने ..एक गुंडे के सर पर ईंट मारी और वो मर गया ..या सीधे गोली ही मार दी ..और ऐसी ही कुछ खबरें लगातार आ जाएं ...आगे कानून और समाज करे ये कि ..उस युवती /बालिका को खूब सम्मान सहित ..सर आखों पर बिठा ले । यार फ़िर रुकिए रुकिए ..एक खबर और बनती है ..बलात्कारी बेटे को .बलात्कार के दोषी पति को ....मां ने या उसकी पत्नी ने गोली मार दी ..या खाने में जहर दे कर मार डाला ।ओह कब छपेंगीं ऐसी खबरें । मुझे दुख तो तब होता है जब पढता देखता सुनता हूं कि ...विश्व में सबसे अधिक शक्तिशाली कहे जाने वाले अमरीकी सेना की एक महिला सैनिक भी बलात्कार का शिकार हो जाती है ....नक्सलवाद में इंसाफ़ की लडाई के नाम पर साथ लड रही महिलाओं का भी दैहिक शोषण हो जाता है ...हद है ये तो ।

जहां तक इन बलात्कार के मुकदमें की बात है तो दुनिया की कोई अदालत ऐसी नहीं है जिसने बलात्कार पीडिता को इंसाफ़ दिलवाया हो ...हां बेशाक ये माना जा सकता है कि , कुछ दोषियों को सजा सुनाने की औपचारिकता तो जरूर ही निभाती रही हैं । अब भी निभा रही हैं , आज तक किसी भी अदालत ने जाने कोई ऐसा आदेश क्यों नहीं दिया कि उस हैवान बने हुए व्यक्ति को सरे आम उसके सारे अंग काट डाले जाएं ...या फ़िर कि ऐसी ही कोई सजा । स्थिति देखिए कि हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने प्रियदर्शनी मट्टू के बलात्कार एवं हत्या के दोषी को सिर्फ़ इसलिए मौत की सजा से बचा लिया क्योंकि वो शादी कर चुका था ...आखिर जो भी उस बलात्कारी की पत्नी बनने को राजी हुई ..क्या उस महिला का युवती का ये बलात्कार नहीं था ..था ये भी बलात्कार ही था और ऐसे जाने कितने बलात्कार हैं जो कानून की किसी भी परिभाषा और दफ़ाओं से परे हैं अब भी । तो जैसा कि मैं कह रहा था कि कानूनी प्रक्रिया तो ऐसी है कि ..पीडिता के मन में यही बात आती होगी कि ..............फ़ैसले से डर नहीं लगता साहेब ...मुकदमें से लगता है ....क्योंकि जब तक मुकदमा चलता है ...बलात्कार तो चलता ही रहता है ....। और कानून की परिधि के बाहर फ़िर सामाजिक बलात्कार , मानसिक बलात्कार ...ओह ...घिन्न आने लगती है इस समाज की सोच पर ।


एक और बात ग्रामीण परिवेश वाले अब भी एक दूसरे का माथा ..अपने खेत खलिहानों के लिए ही ज्यादा फ़ोडते नज़र आते हैं वे अब भी उतने आधुनिक और शिक्षित नहीं हो पाए हैं कि ...हर नारी देह को ..नोचने वाली वस्तु समझें ...इसलिए अब तक वहां ..ऐसे पार्ट वन पार्ट टू ...वाले हिट सीक्वेल की शुरूआत नहीं हुई है । अब रही बात मीडिया की ..मीडिया की हालत तो ऐसी है कि ...क्या कहा जाए ..जिस मीडिया को ये समझ नहीं कि जहां पर धौलाकुंआं रेप कांड पार्ट टू की बात हो रही है वहां चाहे अनचाहे ...कांड वन की भी बात हो ही जाएगी ...सोचिए जिस लडकी ने कितनी मुश्किलों से वो दौर भुलाने की कोशिश की होगी आज फ़िर वो उसी दोराहे पर होगी कि नहीं ...। वाह रे मीडिया ..। अब तो ऐसा लगता है कि अब हर बाप को सिखाना होगा कि ...जब भी ऐसी नौबत आए ..बिटिया ..गला काट देना ..उसका ..आगे फ़िर देखी जाएगी ...हो सकता तुम न भी बच पाओ ....मगर सोचो कि ...भविष्य में कितनी बच जाएंगी ....और मांओं को सिखाना होगा कि ..जब भी किसी ऐसे हैवान बेटे के बारे में पता चले ..उसे फ़ौरन से पेशतर मार दिया .जाए ..ये समझ कर कि एक जानवर पागल हो गया है ...

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

बेलगाम ,बेशर्म, और बेगैरत होते टीवी शोज़






अभी रिएल्टी शो बिग बॉस की अश्लीलता ,गाली गलौज वाली भाषा की बतकुच्चन , शादी और सुहागरात तक को तमाशे के रूप में प्रस्तुत करके दिखाने सजाने की प्रवृत्ति से भारतीय समाज सुशिक्षित हो ही रहा था कि अचानक एक और खबर ने सबको चौंका दिया । इंसाफ़ की आधुनिक देवी के रूप में टीवी द्वारा स्थापित की जा रही राखी सावंत जी ने कुछ ऐसा इंसाफ़ कर डाला कि इसमें प्रतिभागी के रूप में शामिल हुए लक्ष्मण सिंह ने आत्महत्या कर ली । हालांकि इससे पहले भी कई रिएल्टी और टैलेंट शोज़ में कभी जजों की टिप्पणियों तो कभी किसी और कारण से , इसमें भाग लेने वाले या संबंधित लोग कई तरह की मुसीबतों का सामना कर चुके हैं । किंतु हाल ही में कभी स्वंयवर के नाम पर , तो कभी इमोशनल अत्याचार के नाम पर , कभी इंसाफ़ के नाम पर तो कभी तमाशे के नाम पर भारतीय टेलिविजन पर जो कुछ परोसा जा रहा है वो आज एक आम आदमी को कई बातें सोचने पर मजबूर कर रहा है ।
लक्ष्मण सिंह जिसने इसी एपिसोड के बाद आत्मह्त्या कर ली

इस बहस को उठाते ही इसके विरूद्ध जो एक तर्क अक्सर दिया जाता है वो ये कि , ये जो कुछ भी टीवी में दिखाया जा रहा है , वो सब आज समाज में घट रहा है दूसरा ये कि लोग देख रहे हैं तभी तो दिखाया जा रहा है । फ़िर एक बात ये भी कि आज सिनेमा में भी तो ये सब खूब बढचढ कर दिखाया जा रहा है । ये सारे तर्क , सारी दलीलें सर्वथा खोखली और बकवास लगती हैं । समाज में ये सब हो रहा है ??आखिर किस समाज में ? क्या महानगरीय संस्कृति ही ..सिर्फ़ महानगरीय समाज ही पूरे देश के समाज का प्रतिनिधि समाज है ? तो फ़िर उनका क्या जो आबादी आज भी इन महानगरों से दूर ..कहीं बहुत पीछे छूटी बची हुई है ? और क्या महानगरीय समाज में यही सब कुछ हो रहा है । और क्या ये सब निर्विवाद रूप से स्थापित और मान्य है नगरीय समाज के बीच भी ? अब रही बात कि लोग देखते हैं इसलिए दिखाया जा रहा है । तो फ़िर यदि कल को लोग नग्नता की ओर बढेंगे , उसे देखना चाहेंगे तो क्या वही परोसा जाएगा ? क्या बाजारवाद को इस कदर हावी होने दिया जा सकता है कि उसके आगे सब कुछ गौण हो जाए , सब कुछ बौना साबित हो जाए ?? एक तर्क ये कि सिनेमा में भी तो दिखाया ही जा रहा है । सिनेमा आज भी घर घर में नहीं पहुंचा है ..और जब पहुंचता है तो चाहे अनचाहे उस पर वो कैंची चल ही चुकी होती है जो चल जानी चाहिए ।

सबसे बडा सवाल ये है कि , टीवी शोज़ , धारावाहिक , और चैनलों के लिए निर्धारित मापदंडों को देखने परखने और उन्हें नियंत्रित करने के लिए गठित बोर्डों , संस्थाओं आदि की भूमिका सिर्फ़ एक तमाशबीन की तरह क्यों बनी हुई है । ज्यादा हुआ तो इन कार्यक्रमों की समाप्ति के बाद उन्हें एक नोटिस थमा देना या फ़िर एक औपचारिक सा नोटिस थमा देना ही इतिश्री हो जाती है । आज बिग बॉस के घर में प्रतिभागियों द्वारा खुले आम अश्लीलता का प्रदर्शन , इमोशनल अत्याचार के वो अतरंग प्रसंग (हालांकि इस कार्यक्रम में तो फ़िर भी कई बार काट छांट कर दी जाती है ) किस समाज के लिए और कौन दिखा रहा है ...?? ये बात तय कर ली जानी चाहिए क्योंकि ये वही चैनल है जो अपने विभिन्न धारावाहिकों में समाज में व्याप्त बुराईयों को सामने लाने का दावा करता है । अभी ही ये समय है कि ये भी तय कर दिया जाए कि क्या इनकी कोई सीमा है .....या आने वाले समय में टीवी पर लोगों को आदि मानव ..अपने नग्न रूप में दिखाई देगा ???



शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

आईये जानें कि अदालत "रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर " मुकदमा किसे और कैसे मानती है .....अजय कुमार झा





(ये आलेख मेरे दूसरे ब्लॉग कोर्ट कचहरी पर भी प्रकाशित किया गया है , मगर आज का मुद्दा के पाठकों के लिए इसे यहां प्रकाशित कर रहा हूं )
अभी हाल ही में दो बडे अदालती फ़ैसलों ने आम लोगों का ध्यान फ़िर से अपनी ओर आकृष्ट किया ...या कहा जाए कि उन्हें इस कदर उद्वेलित किया कि वे खुल कर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं ..। जैसा कि स्वाभाविक है कि दोनों में ही अदालती फ़ैसले को अलग अलग मापदंडों , मानवीय भावनाओं , न्यायालीय संवेदनाओं और जाने कैसी कैसी कसौटी पर कसा जा रहा है । अयोध्या विवाद के फ़ैसले के अपने इतर तर्क हैं और इतर प्रभाव भी ....और सबसे बडी बात तो ये है कि अभी सर्वोच्च अपील का अधिकार भी बचा हुआ है दोनों की पक्षों के पास ...और फ़िर चूंकि मामला धर्म और आस्था से जुडा हुआ है इसलिए उस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया भी उसी अनुरूप आ रही हैं । हां जहां तक दूसर बडे फ़ैसले की बात है तो ...यदि सीधे सीधे सपाट तौर पर देखा जाए तो आम जन को जितना अधिक गुस्सा इस बात पर है कि अदालत ने प्रियदर्शनी मट्टू हत्याकांड के मुजरिम ..संतोष सिंह की ..फ़ांसी देकर मौत देने की सजा को कम करके ..उम्र कैद में बदल दिया ..उससे अधिक गुस्सा इस बात को लेकर है कि आखिर किन वजहों से अदालत ने इस मुकदमे को .."..दुर्लभतम में से दुर्लभ " की श्रेणी में क्यों नहीं रखा ???आम आदमी आज यही सवाल उठा रहा है कि ...जब कुछ वर्ष पहले ..सभवत: २००४ में ऐसे ही एक लिफ़्ट चलाने वाले ..अपराधी को बलात्कार के बाद हत्या के दोष में फ़ांसी की सजा दी गई थी ..तो इस मुकदमें में क्या संतोष सिंह को सिर्फ़ इस वजह से ..लाभ मिला है क्योंकि वो एक रसूखदार व्यक्ति (अब दिवंगत )का पुत्र है ...आखिर वो कौन से मापदंड हैं जिन्हें अपना कर अदालतें ये तय करती हैं कि अमुक मुकदमा ..दुर्लभतम में से दुर्लभ की श्रेणी में आता ..या नहीं आता है ।

कोई भी विमर्श करने से पहले दो बातें स्पष्ट कर देनी चाहिए .....। इस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए ..बहुत से व्यक्तियों ने एक ही बात बार बार उठाई कि ..आजीवन कारावास का मतलब तो ये हुआ कि ..चौदह वर्षों की कारावास ....और उसके बाद ..या ऐसे ही कुछ वर्षों के बाद ..जेल से रिहाई ....तो यहां ये स्पष्ट कर दिया जाए कि ..अभी पिछले ही वर्ष दिए गए अपने एक फ़ैसले में माननीय सर्वोच्च अदालत ने ..एक अपील की सुनवाई करते हुए .पूरी तरह से आजीवन कारावास को परिभाषित किया और बताया कि आजीवन कारावास का मतलब ..आजीवन कारावास ही होता है ....आजीवन यानि जीवन पर्यंत ..यानि कि जब तक मुजरिम जीवित है तब तक ....। दूसरी बात ये कि सर्वोच्च अदालत जब भी मौत की सजा वाली अपील पर सुनवाई करती है तो स्वाभाविक नियमानुसार ..इससे पहले ऐसे मामलों की सुनवाई और उनमें सुनाए गए फ़ैसलों मे स्थापित किए गए आदर्शों और मापदंडों को सामने रख कर जरूर परखती है ...और उसके अनुसार ही ..फ़ांसी की सजा देने के लिए .."दुर्लभतम में से भी दुर्लभ " माने गए मुकदमे को साबित करना होता है । हालांकि इसके लिए भारतीय कानून में कहीं कोई निश्चित नियम या उपबंध नहीं है और अदालत इसे स्वयं बहुत से आधारों पर परखती है ।एक अघोषित नियम ये होता है कि जब अदालत को ये महसूस कि मुजरिम को फ़ांसी या मौत से कम कोई भी सजा सुनाने से नाइंसाफ़ी की झलक दिखाई दे तो और सिर्फ़ तभी मौत की सजा सुनाई जानी चाहिए । आईये देखते हैं कि इस बिंदु पर अदालतें क्या कैसे सोचती हैं ..

अभी हाल ही १६.०९. २०१० को सुंदर सिंह बनाम उत्तरांचल सरकार मुकदमें में ऐसे ही एक फ़ांसी की अपील पर सुनवाई करते हुए न सिर्फ़ अदालत ने बहुत सी बातों पर रोशनी डाली बल्कि इसी के साथ ही मुजरिम की फ़ांसी की सजा को भी बरकरार रखा । अभियोजन पक्ष के अनुसार इस मुकदमे में , सुंदर सिंह नामक व्यक्ति ने पांच लोगों को एक घर में पेट्रोल छिडक कर आग लगा दी और बाहर से घर का दरवाजा बंद करके उन्हें जिंदा भून डाला इतना ही नहीं जब उनमें से एक व्यक्ति ने बाहर निकलने की कोशिश की तो उसने उसे दरवाजे के बाहर आते ही अपनी कुल्हाडी से काट कर मार डाला । अदालत ने इस मुकदमे के फ़ैसले पर पहुंचने से पहले इन बातों को सामने रखा । अदालत ने इसे क्रूरतम हत्या मानते हुए इसे" दुर्लभतम में से भी दुर्लभ " मानते हुए सुंदर सिंह की फ़ांसी की सजा को बहाल रखा ।अदालत ने "दुर्लभतम में से भी दुर्लभ "मुकदमों का उदाहरण देते हुए कहा कि , सर्वप्रथम ये मौत की सजा के लिए किसी मापदंड तय करने की बात ..मच्छी सिंह बनाम पंजाब सरकार , वाले मुकदमें में हुई थी । इस मुकदमे का फ़ैसला करते हुए अदालत ने कुछ बिंदु तय किए थे , जिन्हें अधिकतम सजा (मौत ) दिए जाने से पहले न्यायाधीश को परखना चाहिए । जब हत्या निहायत ही क्रूरतम तरीके से , छिप कर , बदला लेने के लिए ,और सिर्फ़ इस वजह से की गई हो कि समाज में उससे घृणा और द्वेष फ़ैल जाए तो वो अपराधी मौत की सजा का हकदार है । जब कोई हत्या नृशंस तरीके से , नीच और शैतानी उद्देश्य के लिए की गई हो । जब किसी निम्न जाति के किसी व्यक्ति की हत्या आपसी रंजिश के लिए न करके सिर्फ़ इस उद्देश्य से की गई हो कि उससे समाज में अशांति और द्वेष फ़ैल जाए तो ,जब अपराध बहुत ही वृहत हो बहुत ही भयानक हो ।अदालत ने कुछ इसी तरह के मापदंड , सुशील मुर्मू बनाम झारखंड राज्य , मामले में भी तय किए थे ।

इस उपरोक्त मुकदमे का फ़ैसला करते समय अदालत ने , धनंजय चटर्जी बनाम पश्चिम बंगाल सरकार, [1994 (2) SCC 220] और राजीव उर्फ़ रामचंद्र बनाम राजस्थान सरकार [1996 (2) SCC 175] का उदाहरण लेते हुए कहा कि , ये दोनों ही मामले दुर्लभतम में से भी दुर्लभ की श्रेणी में आते हैं । पहले में उस युवक ने , पहले तो १४ वर्ष की बच्ची को मार कर घायल कर दिया और फ़िर जब वो दम तोड रही थी तो उसके साथ बलात्कार किया ।दूसरे में मुजरिम ने , अपने तीन मासूम बच्चों और अपनी पत्नी जो कि कुछ ही समय के बाद मां बनने वाली थी की क्रूर हत्या कर दी थी । एक दिलचस्प मुकदमे का उदाहरण उत्तर प्रदेश सरकार बनाम धर्मेंद्र सिंह . [1999 (8) SCC 325], , जिसमें फ़ैसला दिया गया था कि , मुजरिम को फ़ांसी की सजा मिलने में हुई तीन वर्ष की देरी के कारण उसकी मौत की सजा को कम नहीं किया जा सकता और भविष्य में भी ये सजा कम करने के लिए कोई आधार नहीं हो सकता है , त्रिवेणी बेन बनाम गुजरात सरकार ,[1988 (4) SCC 574], ।

अब पहले बात ये कि आम लोग जैसा कि समझ समझा रहे हैं कि आखिर धनंजय चटर्जी और इस मुकदमें में आखिर वो कौन सा फ़र्क था जो कि अदालत ने संतोष सिंह की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया । अदालत ने अपराध की क्रूरता पर कहीं भी ऊंगली नहीं उठाई है न ही इस बात की तुलना की गई है कहीं भी कि , धनजंय चटर्जी वाले मुकदमे की तुलना में प्रियदर्शनी मट्टू हत्याकांड कम क्रूर था जबकि हकीकत यही है कि वो अधिक क्रूर थी । हां अदालत ने संतोष सिंह की ,सजा को कम करने के पीछे जो तर्क रखे वे कुछ इस तरह से हैं । जब निचली अदालत ने उसे बरी किया था तब वो पच्चीस वर्ष का युबक था , और उसके रिहा होने के बाद , उसने विवाह किया और आज वो एक होने वाले बच्चे का पिता बनने जा रहा है , तब से लेकर अब तक स्थितियां बहुत भिन्न हो चुकी हैं । अदालत ने उदाहरण स्वरूप राजीव गांधी हत्याकांड की मुख्य अभियुक्त और फ़ांसी की सजा मिल चुकी नलिनी की सजा को उम्र कैद में बदले जाने को भी उदाहरण में लेते हुए बताया कि , उस मुकदमे में , भी ये साबित हुआ है कि शिवरासन और ग्रुप ने एक औरत का फ़ायदा उठाते हुए पति द्वारा पत्नी पर बनाए गए दबाव को आधार बना कर नलिनी को इसके लिए फ़ंसा दिया था और अब जबकि उसकी कोख में एक नन्हीं सी जान पल रही है तो ऐसे में उसे मौत की सजा दे देना कहीं से भी ठीक नहीं होगा ।

उपरोक्त बहस का तात्पर्य यदि ये निकाला जाए कि , किसी भी मुकदमे को " दुर्लभतम में भी दुर्लभ " की श्रेणी में देखना और दिखाना ..हर मुकदमे के साथ और अदालत को उसे देखने पर ही निर्भर करता है ,...तो गलत नहीं होगा । किंतु ये भी नहीं भूलना चाहिए कि अदालतें अपने हर मुकदमे को कानून की कसौटी पर ही घिस कर उसके धार को परखती है । अभी भविष्य में ऐसे बहुत से मौके आएंगे जहां न सिर्फ़ अदालतों को फ़ैसले पर पहुंचने के बहुत ही मशक्क्त करनी होगी बल्कि उससे अधिक इस बात का ख्याल भी रखना होगा कि उसके फ़ैसले , उसके तर्क और सबसे बढ कर उसके नज़रिए से ...आम जनता भी इत्तेफ़ाक रखे । हालांकि ..बलात्कार जैसे घृणित अपराध के लिए तो ,...मौत से भी बदतर यदि कोई सजा हो तो वो ही मुकर्रर्र की जानी चाहिए ।


अगली पोस्ट का विषय :- ...क्या देश की राजधानी को दिल्ली से ,कहीं और ले जाने की जरूरत है ??

बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

अदालत ने जिस फ़ैसले पर पहुंचने में लिए साठ साल ....उसे समझने में साठ मिनट का भी समय नहीं लिया गया .....अजय कुमार झा




आखिरकार वो घडी भी आ ही गई जिसके लिए ठीक वैसे ही देखा और दिखाया जा रहा था जैसे कि ये भी वो तथाकथित महाप्रलय वाली घडी के समान ही थी कुछ ..और देखिए कि वो बहुत ज्यादा प्रीतीक्षित न भी तो ..बहुत समय से लंबित फ़ैसला तो आ ही गया । ये फ़ैसला कोई आम फ़ैसला नहीं था , असल में तो ये विवाद या मुकदमा ही कोई आम मुकदमा या विवाद नहीं था ..और इससे भी उपयुक्त यदि ये कहा जाए कि ...ये विवाद या मुकदमा नहीं बल्कि ये मुद्दा था ...और जाहिर सी बात है कि आम मुद्दा नहीं था .....होता भी कैसे । आखिर ये देश की आस्था से जुडा हुआ सवाल था ..ये उस समुदाय के अराध्य से जुडा हुआ सवाल था ...जो संख्या के हिसाब से विश्व में गिना जाता है ....और शायद यही वजह रही कि ..इस मुकदमे के फ़ैसले को आते आते इतना बडा वक्त लगा कि आधी शताब्दी भी कम पड गई .... । लेकिन अब सवाल यही उठ रहा है कि ....क्या यही वो सबसे उपयुक्त फ़ैसला है जिसके लिए इतने वर्ष लिए गए ........क्या सचमुच ही इतना समय लेने के बाद अदालत ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया .........और क्या अब इस फ़ैसले से ..सचमुच ही कोई निर्णय ऐसा निकला है जिसे ..सही मायने में कहा जाएगा कि ..सारे विवाद का हल ही निकल आया ....।

इस फ़ैसले के आने के बाद ...एक आम आदमी ..यहां किसी भी धर्म संप्रदाय में बिना बांटे यदि एक आम आदमी की ही बात की जाए तो ....यही सोच रहा है कि ...आखिर न्यायालय ने किसे सही माना या किसे गलत माना ....।आम आदमी के सामने कुछ बातें तो बिल्कुल स्पष्ट हैं ....पहला ये कि अदालत भी आखिरकार वो फ़ैसला नहीं दे सकी जो दुविधा या विवाद को समाप्त कर सके । दूसरी बात ये कि ..इस फ़ैसले पर पहुंचने के लिए अदालत को साठ साल का समय लगा , यदि मोटे मोटे तौर पर देखा जाए तो अदालत ने बस कुछ बातें जरूर ही स्पष्ट कर दीं । पहली ये कि , वो विवादित भूमि नहीं है ......यदि नहीं है तो फ़िर क्या है ...जाहिर है कि ..रामलला की जन्मभूमि है ......। यहां एक बात पर विमर्श करना समीचीन लगता है कि .....आजकल अदालती फ़ैसलों पर तपाक से अपनी राय न सिर्फ़ राय बल्कि ..........सही गलत तक के स्तर तक की ...बहस को जन्म देने का जो एक चलन बनता जा रहा है ...उसने तो न्यायालीय फ़ैसलों को ही प्रश्नचिन्ह के प्रतीक के रूप में स्थापित कर दिया है । अभी भी समाज और साहित्य में अयोध्या विवाद से अधिक अयोध्या के इस फ़ैसले पर ही लिखा पढा जा रहा है ।

भारतीय न्यायपालिका ....बेशक बहुत ही धीमी .....बहुत ही अप्रायोगिक ..और कई बात बहुत ही ...क्रियाशील या अतिसक्रियता की शिकार लगती हो ......ये भी सही है कि पिछले कुछ समय में न्यायपालिका के अपने मापदंडों में ही गिरावट आने के कारण उसने खुद की साख भी खोई है ........मगर इसके बावजूद .........जी हां , इसके बावजूद भारतीय न्यायपालिका अब भी .....आम आदमी के विश्वास ...से पूर्णतया विमुख नहीं हुई है ....। बेशक आज के दौर में ......न्यायिक फ़ैसलों पर बहुत तरह के समीकरण की छाप देखी और दिखाई जाती हो .......बेशाक ये भी माना जा सकता है कि ...बहुत बार आम व्यक्ति को यही लगता है कि ..न्यायपालिका को ..दिखाने सुनाने के लिए अब बहुत अधिक शोर मचाना पडता है और जिसे देश का मीडिया बखूबी करता है .....मगर इन सबके बावजूद ये कतई नहीं माना जा सकता कि ..न्यायाधीश के ओहदे पर बैठा .....व्यक्ति ..आम आदमी की ही सोच और समझने की शक्ति रखता है .....निश्चित रूप से ..उसे मिली विधि की शिक्षा और उसका प्रयोगीकरण की शक्ति ...उसमें एक आम साधारण सोच से ऊपर रखती है । किंतु एक आम आदमी उसी फ़ैसले की चीडफ़ाड करते समय ये भूल जाता है कि ...वो फ़ैसला उसके लिए ....महज एक किस्से का ब्यौरा देने भर जैसा है ..जबकि अधिवक्ताओं और न्यायाधीश की संयुक्त टीम के लिए कानून के हर हर्फ़ को पकड कर.....उसे न्यायतुला पर भलीभांति तौलमाप करके ..एक ऐसा निर्णय लेना होता है ..जो सच में ही फ़ैसले जैसा लगे । .यहां ये नहीं भूलना चाहिए कि ..भारतीय न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण सूत्र है कि , न्याय सिर्फ़ होना नहीं चाहिए ..बल्कि न्याय हुआ है .,.ऐसा महसूस भी होना चाहिए ।

अदालत ने आज के इस दौर में भी जब कि खुद न्यायपालिका ने अपनी रफ़्तार को गति देने के लिए जाने कितनी ही मह्त्वाकांक्षी योजनाएं चला रखी हैं ..एक एक मुकदमे पर ...खासकर ..पुराने मुकदमों पर बारीकी से नज़र रखी जा रही है ..क्योंकि अब उसे मीडिया के साथ साथ आम समाज भी ये एहसास दिला रहा है कि .यदि इतना विलंबित न्याय ही देना है तो फ़िर ...ये भी अन्याय समान ही है....ऐसी स्थिति में भी यदि अदालत को किसी फ़ैसले पर पहुंचने में साठ साल का लंबा समय लग गया तो इतना तो मानना ही पडेगा कि ..कहीं न कहीं कमी या चूक तो हुई है ।

मगर अब जबकि अदालत ने अपना फ़ैसला सुना दिया है तो फ़िर ....कभी राम के नाम पर , तो कभी वाम के नाम पर , और कभी आम (आदमी ) के नाम पर ..इस तरह की चिल्ल पों क्यों मचाई जा रही है । शायद उनके लिए तो ये किसी सदमे से कम नहीं है जो ये सोच के बैठे थे कि फ़ैसले के बाद एक बार फ़िर से कोई अंधी लडाई शुरू हो जाएगी ....और उस आड ने जाने कैसी कैसी राजनीति बनाई और बिगाडने का खेल चल निकलेगा । अदालत ने ठीक उलटा कर दिया सारा का सारा माजरा । होना तो ये चाहिए था कि ..जो लोग शिला पूजन के लिए , उस बाबरी मस्जिद ( मुझे एक आम आदमी के रूप में ये कहने में तनिक भी झिझक नहीं है कि वो बाबरी मस्जिद जो कि यकीनन एक मंदिर को तोड कर बनाई गई थी ) को ढहाने वाले लोगों को बिना विलंब के ही राम मंदिर का निर्माण शुरू कर देना चाहिए । आखिर इस बात की प्रतीक्षा ही क्यों की जाए ..कि ये सारा मामला एक बार फ़िर सर्वोच्च अदालत में फ़ैसले के लिए टुकुर टुकुर ताकने की परिणति तक पहुंचेगा । आखिर अभी तो कोई रोक नहीं है न ..।

इस अदालती फ़ैसले के प्रतिक्रियात्मक लेखों विचारों में एक बात बार बार निकल कर आ रही है कि , अदालत ने निर्णय विवाद से परे जा कर दिया ..और वो नहीं कहा जो उसे कहना चाहिए था ..बल्कि एक अन्य निर्णय ले लिया ..जो कि गलत है । तो क्या करना चाहिए था अदालत को .....?????सिर्फ़ ये भर कह देना कि अदालत को ऐसा नहीं करना चाहिए था ....से इतिश्री नहीं की जा सकती इस मामले की । आखिर इतने बरसों तक कानूनविदों की पूरी जमात जो बात समझने की कोशिश करती रही ..उसे कैसे चुटकियों में ..कुछ प्रतिक्रियात्मक लोगों ने समझ लिया ....मानो बच्चों का खेल था सब कुछ बेकार ही इतना समय लिया गया ..और यदि उन्हें मौका दिया गया होता तो वे कब का दूध का दूध और पानी का पानी कर चुके होते । हालांकि अब भी कौन सा समय निकल गया है ..अब भी अपीलीय अदालत में उन सभी को अपनी ये दलीलें , ये खोखले और भडकीले तर्क रखने का पूरा मौका दिया जाएगा ..मगर उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए कि ..उस अदालत में फ़ैसला सुनाने वाले भी उन्हीं भारतीय कानूनों की व्याख्या करते हैं जो कानून की किताब निचली अदालतों ने देखी पढी होती हैं । ये तो आने वाला समय ही तय करेगा कि अभी इस मुद्दे को कितने और समय के लिए विवाद का अभिशाप झेलना लिखा है । मगर आज यदि इतनी निर्भीकता से और कई बार तो दुस्साहसिक होकर ...कभी भी कहीं भी न सिर्फ़ राम बल्कि हिंदू आस्था को कटघरे में रख कर खडे हो जाते हैं तो वो सिर्फ़ दो कारणों से है ..एक तो भारत सरकार के किन्नरी व्यक्तित्व के कारण ...और दूसरा इतना हो जाने के बावजूद भी हिंदू का कट्टरता को उस चरम को नहीं छू पाना जो अन्य समकालीनों ने अपना रखा है । और उन्हें ये भलीभांति समझ जाना चाहिए कि ..ऐसा सिर्फ़ और सिर्फ़ इस देश में ही संभव है ..........न हो तो अपनी आखें पसार के इसे देख और महसूस कर सकते हैं ..यदि वास्तव में करना चाहें तो ।



रविवार, 19 सितंबर 2010

देश से बडा एक मुद्दा : अयोध्या ...अपरिचित और अनिश्चित .........





आखिरकार पूरे साठ साल बाद वो दिन आ ही गया .....जब देश की अदालत ....जिसके लिए कहते हैं ...देर भले हो , मगर यकीनन अंधेर नहीं है ..ये तय करेगी कि ...देश के अराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम ....भरत वंशज ....और अयोध्या नाम की प्राचीन नगरी के शासक
श्री रामचंद्र की जनम्भूमि का स्थान वही है ........जो आज विवादित क्षेत्र/स्थान कहला रहा है .......। या फ़िर कि ये ...कि जिस स्थान की निश्चितता को लेकर उठे संशय ....को एक अपमान मान कर देश का आम हिंदू.......ध्यान रहे कि यहां आम हिंदू ही कहा गया है ......कभी अपनी इज्जत , कभी अपनी संपत्ति और कभी अपनी जान को दांव पर लगाता रहा ......वो दरअसल ...वो नहीं थी । इसके अलावा एक बडा प्रश्न ये भी है कि .......फ़िर तो नए सिरे से ......और इस बार इंसान को अपने भगवान के लिए उनका आश्रयस्थल ढूंढना पडेगा ...और जो इंसान अपने जीवन भर अपना ही घर तलाशने से फ़ुर्सत नहीं पाता...वो बेचारा भगवान का घर क्या खाक तलाश पाएगा ????

एक आम आदमी के रूप में यदि सोचा जाए तो फ़िर आज इस मोड पे ...जो कुछ बातें उसके मन में आ रही हैं ..उनमें से कुछ ये बातें हैं.........पहली बात तो ये कि , आखिर सिर्फ़ पिछले साठ सालों पहले ही ये विवाद क्यों उठ खडा हुआ ...उससे पहले के दो सौ साल से अधिक के मुस्लिम शासन में वो कौन सी स्थिति थी ऐसी कि , जिसकी प्रमाणिकता अचानक ही संशय में पड गई .....। चलिए ये भी माना कि शायद ये मामला वाकई ऐसा था कि बिना विधिक स्थिति का पता लगाए निर्णय लेना मुश्किल था ..और इसलिए इसे अदालत तक ले जाना पडा........किंतु तब क्या राज्य की ये जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि जिस एक बात से देश के बडे जनमानस की भावना प्रभावित थी .....उस विवाद को समयबद्ध करके उसके अंतिम फ़ैसले तक पहुंच जाने की सुनिश्चितता तय करे ......। पांच दस . बीस या पचास वर्ष नहीं बल्कि पूरे साठ बरस तक ...ये मामला चलता रहा । यहां एक आम आदमी ये भी सोच रहा है कि ...बात बेबात स्वंय संज्ञान ले लेने वाली अदालत आखिरकार साठ बरस तक इस मुकदमे को क्यों सुलझाती रही ।एक आम आदमी ये भी सोच रहा है ..कि आज आजादी के साठ बरसों के बाद भी देश जहां एक तरफ़ .....गरीबी , अशिक्षा, बेरोजगारी , महंगाई , जैसी शाश्वत समस्याओं से जूझ रहा है ..वहां क्या वाकई ये सच में ही इतना जरूरी मुद्दा है कि जिसके फ़ैसले के बगैरे ...देश का आगे पीछे बढना तय नहीं हो पाएगा ॥

जहां तक आम आदमी के अयोध्या से जुडे होने का प्रश्न है तो ..शायद बहुतों को तो इस मुद्दे का ध्यान ही तभी आया है जब मीडिया में खबर आई है कि ..इस मुकदमे का फ़ैसला अब आने वाला है ....इससे पहले और न ही शायद इसके बाद एक आम आदमी की किसी भी स्थिति पर कोई फ़र्क पडने वाला है । इतना समय बीत जाने के बाद अब कुछ बातें तो स्पष्ट ही तय हैं कि ....इस मुकदमे को जानबूझ कर इतने समय तक काल के गर्त में दफ़न रहने दिया गया । पिछली आधी शताब्दी में आई कोई भी सरकार इतनी हिम्मत नहीं जुटा सकी कि , वो अपनी सत्ता के मोह और वोट बैंक के लालच से बाहर निकल कर इस अयोध्या मसले को निपटा सकी । एक और बडा प्रश्न ये भी है , जो जाने अनजाने सोचा नहीं जा सका है वो ये कि , आखिर क्या वजह रही कि अब जबकि साठ वर्षों तक इस मुकदमे में कोई निर्णय नहीं ले पाने वाली अदालत ये जानते हुए कि इस फ़ैसले के परिणाम कुछ इस तरह से नकारात्मक भी आ सकते हैं कि वो आने वाले राष्ट्रमंडल खेलों को भी प्रभावित कर सकते हैं , तो फ़िर इस फ़ैसले के लिए यही समय क्यों चुना गया । और सबसे बडी बात ये कि , अभी ये फ़ैसला शीर्ष अदालत का नहीं है । यानि अभी तो इस बात की पूरी गुंजाईश है कि अपीलीय अदालत भी इस मुद्दे को अच्छी तरह जांचे परखे ...........तो ऐसे में ये अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि ..अभी इस मुद्दे को भुनाने की कितनी संभावनाएं बची हुई हैं ॥

इस मुकदमे का फ़ैसला चाहे जो भी आए ....इतना तय है कि देश में आज धर्म के नाम इस तरह के प्रपंच और प्रौपगैंडे के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है यदि उसे इसी तरह से चलते रहने दिया जाए तो ..फ़िर आने वाले समय में यदि भारत के बीच भी इस्राइल और फ़िलिस्तीन भी देखने को मिल ही जाएंगे । एक उससे भी अहम बात ये कि ..आखिर कब तक देश का एक बडा वर्ग ..यानि कि हिंदू समुदाय अपने धर्म ..अपने अराध्य , अपने धर्मस्थानों , अपने उत्सवों को ये सोच सोच कर और नाप तौल के मानता/मनाता रहेगा कि कहीं जाने अनजाने वो धर्मनिरपेक्षता के तथाकथित उस दायरे को पार न कर जाए , जिसकी समझ एक आम आदमी को कभी भी नहीं हो पाई है

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

कॉमन...... वेल्थ...... गेम्स .........माने ...पैसों का सामान्य सा खेल



अब जबकि वो महान क्षण बस आने ही वाला है ........जिसके लिए न जाने कब से ....एक भारतीय तरस रहा था ...........जाने कब से सभी भारतीय इसी सुनहरे स्वप्न को देखते हुए बड़े हुए ..........कि एक बार ....बस एक बार ....भारत में भी कॉमन वेल्थ गेम्स हो सके ........... और हो भी क्यों न ......आखिर पूरा देश ...एक से एक बेहतरीन खिलाड़ियों से भरा पड़ा है .......जाने कितने ही खिलाड़ियों को इसी खेल के कारण .....देश में , अच्छी नौकरी , रुतबा .......और मान सम्मान मिला है .......तो उस देश में तो फिर एसे अंतर राष्ट्रीय खेल आयोजन के लिए सब तड़प ही रहे होंगे .........हाँ ये तो स्वाभाविक ही है ..........क्या कहा आपने मैं ...बकवास कर रहा हूँ ......यहाँ आम आदमी तो आम आदमी .....किसी गैरो-ख़ास को भी ऐसी कोई अनुभूति नहीं हुई है आयं.......तो फिर आखिर ऐसा ...बताया , सम्झायाया और दिखाया क्यों जा रहा है कि ..कॉमन वेल्थ गेम्स .......का आयोजन भारत की तकदीर बदलने वाला कोई ऐतिहासिक मुकाम होगा

इन दिनों राजधानी दिल्ली का , बारिश की धुलाई , बाढ़ की रफ़्तार , गन्दगी के ढेर , ट्रैफिक जाम की समस्या और भी बहुत सारी खूबियों ने कुल मिला कर ऐसा हाल कर दिया है जैसे उजड़े चमन में घूमता हुआ मजनू..........इस खेल के आयोजन की आड़ में विकास के नाम पर , इन खेलों से जुडी तैयारियों के नाम पर , और दिल्ली को संवारने के नाम पर जो खेल खेला गया है ...उसे देख कर तो सब इस कॉमन वेल्थ खेलों का सीधा सीधा मतलब यही निकाल रहे हैं ..कि ..ये पैसों का सामान्य सा खेल है ..जिसे खेलना ...यहाँ भारत के राजनीतिज्ञों , अफसरशाही को , भ्रष्ट अधिकारियों और सबसे बढ़ कर कर्मचारियों ..बखूबी आता है वैसे इस लिहाज़ तो तो हमें कॉमन वेल्थ के आयोजन के सर्वाधिक उपयुक्त माना गया तो इसमें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए

अभी पिछले दिनों जब , थ्री इडियट्स ...फेम ...चेतन भगत ने कह दिया था कि , यही मौक़ा है कि आम भारतीयों को इन खेलों का सार्वजनिक बहिष्कार करके ...अपने इन बेईमान नेताओं को सबक सिखाना चाहिए , मगर कुछ लोगों को उनका ये विचार पसन् नहीं आया उन्होंने अपनी अपील आम लोगों से की थी , मगर सवाल ये है कि , आखिर आम आदमी को इन खेलों से सचमुच ही कोई सरोकार है भी चलिए माना कि राजधानी दिल्ली के लोगों को तो चाहते न चाहते हुए भी इन खेलों को अपने जेहन में बसा कर रखना होगा और वे रख भी रहे हैं मगर इस राजधानी के बाहर जो आम भारतीय है , क्या सचमुच उसे है कोई मतलब इन खेलों से , एसे किसी भी अंतर्राष्ट्रीय कहल आयोजन से जब मैं अमिताभ बच्चन जी को इन कॉमन वेल्थ खेलों की बजाय , टी ट्वेंटी का प्रचार करते हुए देखता हूँ ......तो सोचता हूँ कि , लो महानायक तो किसी और ही लीला में लगे हुए हैं , तो फिर ऐसे में , आम नायकों का तो कहना ही क्या ????

अब खिलाड़ियों की बात भी करें , तो पिछले दिनों डोपिंग विवाद में फंस कर , बहुत कुछ सन्देश तो दे ही दिया है उन्होंने रही सही कसर देश के कई बड़े खिलाडियों इन इन खेलों से अपना नाम वापस लेने की घोषणा से पूरा कर दिया है ...........तो हे देश वासियों इन खेलों के लिए आपने हमने सिर्फ ये ही तैयारी करनी है कि ..प्रार्थना करें कि उन दिनों ..कोई अप्रिय घटना न हो ..... जीतने के लिए पदक मिले न मिले ...........चलने के लिए सड़क मिले न मिले .....मगर नेताओं , अधिकारिओं को भरने के लिए गुल्लक जरूर मिल जायेगी .......

शनिवार, 26 जून 2010

औनर किलिंग : एक विश्लेषण





इन दिनों देश के विभिन्न भागों लगातार घटती घटनाओं/हत्यायों के दौर ने एक बार फ़िर से औनर किलिंग को एक मुद्दे के रूप में सामने रख दिया है । इस बार ये घटनाएं इतनी तेजी से एक साथ घटी हैं कि इस बार ये किसी राज्य , क्षेत्र , और जाति के दायरे से बाहर निकल राष्ट्रीय स्तर पर बहस और समस्या के रूप में चिन्हित की जा रही हैं । न्यायपालिका ने भी इन घटनाओं पर स्वत: संज्ञान ले कर कई राज्य सरकारों से इस बाबत रिपोर्ट तलब की है । भारत में अब तक जितने भी मामले औनर किलिंग के नाम पर चर्चित और विवादित हुए हैं , उनमें से अधिकांश प्रेम और वो भी अंतर्जातीय प्रेम विवाह आदि के इर्द गिर्द ही घूमते से हैं । जबकि वैश्विक परिदृश्य में ऐसा नहीं है ।

औनर किलिंग का मतलब सीधे सीधे अर्थों मे ये है कि , वैसे अपराध और विशेषकर हत्या , जो परिवार की इज्जत प्रतिष्ठा को बचाए रखने के नाम पर की जाती है ।किंतु भारत में ये घटनाएं ज्यादातर प्रेम विवाह और वो भी किसी गैर धर्म मजहब में या किसी अन्य जाति में किए जाने के फ़ैसले के विरोध में ही दिखती हैं । विश्व में जहां कहीं भी औनर किलिंग के नाम पर ऐसी घटनाएं देखी जा रही हैं उनमें कहीं भी ये कारण तो कतई नहीं दिखता है । वैश्विक परिदृश्य में औनर किलिंग के सबसे ज्यादा मामले , अवैध यौन संबंधों को छिपाने के लिए , नाज़ायज़ रिश्तों को छुपाने के लिए , समलैंगिक रिश्तों के सच को छुपाने के लिए , और कट्टर मुस्लिम देशों में धार्मिक प्रतिबंधों को न मानने के विरूद्ध देखने सुनने में आते हैं । और पश्चिमी देशों में जहां से ये औनर किलिंग की प्रथा का चलन शुरू हुआ है वहां भी सबसे ज्यादा मामले इन नाज़ायज़ या विवाहेत्तर संबंधों के कारण ही हुए और हो रहे हैं । जबकि भारत में सबसे अधिक मामले प्रेम विवाह के से ही जुडे हुए हैं ।

भारत में औनर किलिंग सबसे ज्यादा चर्चित हुआ आरूषि मर्डर केस में , जिसमें आरूषि नाम की बालिका की हत्या रात के ढाई तीन बजे के बीच हुई और कहा, बताया गया कि बच्ची की हत्या उसके माता पिता ने की है जो अपने किसी ऐसे ही अवैध रिश्ते के राज खुलने के डर से किया गया है । मगर बाद में जाकर इस पूरे मामले में कुछ भी साबित नहीं हुआ ,और देश की सबसे बडी जांच एजेंसी सीबीआई के हाथों में मामला सौंपने के बावजूद आजतक कुछ भी हासिल नहीं हुआ किसी को । किंतु इसके बाद तो जैसे ये मामले बढते ही चले और दिनोंदिन इनकी रफ़्तार बढती ही जा रही है ।खाप पंचायतों द्वारा सुनाए जाने वाले फ़ैसलों में प्रेमी युगलों को मार दिए जाने की घटना , झारखंड का पत्रकार निरूपमा कांड ,और अब सामने आए ये नए मामले । हालांकि ऐसा नहीं है कि इन मामलों में अचानक ही वृद्धि हो गई है , असल में तो भारत की सामाजिक सरंचना में जाति ,धर्म, भाषा आदि जैसे तत्व जबसे हैं तभी से उनके नाम पर सम्मान, प्रतिष्ठा बचाए रखने के लिए जान लेने देने की परंपरा भी रही है । इतिहास भी इस बात का गवाह रहा है ।

अब तो ऐसा लगता है कि जितना ज्यादा इन घटनाओं की चर्चा हो रही है उससे दोगुनी रफ़्तार से ये घटनाएं बढती जा रही हैं । यही कारण है कि इस बार इन घटनाओं ने सरकार और संबंधित संस्थाओं का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है । अब बात की जा रही है कि औनर किलिंग की बढती घटनाओं को रोकने के लिए कठोर कानून बनाए जाएंगे । लेकिन समाजविज्ञानी इसे नाकाफ़ी और सही नहीं मानते । उनका मानना है कि कत्ल जैसे अपराध के लिए तो पहले से ही कठोरतम सजाओं का प्रावधान है । इसलिए आज जरूरत है कि समाज को इसके लिए मानसिक रूप से तैयार किया जाए । हालांकि इसके लिए समाज विज्ञानी भारतीय समाज के विरोधाभासी चरित्र और स्वरूप को बहुत जिम्मेदार मानते हैं । एक तरफ़ तो सरकार जातियों का स्पष्ट विभाजन तय करती है , उन्हें आरक्षण आदि के नाम पर एक दूसरे से काफ़ी दूर करती है , दूसरी तरफ़, प्रेम से आदि से आगे जाकर , लिव इन रिलेशनशिप, और समलैंगिकता तक को मान्यता देने की कोशिश की जा रही है । ऐसे में तो इस तरह के परिणाम आना अपेक्षित ही हैं । समाज में अशिक्षा का प्रतिशत , और कानून का खत्म होता डर भी इन सबको बढाने के लिए जिम्मेदार है । अब देखना तो ये है कि आखिर ये औनर किलिंग की वेदी पर अभी और कितनी बलियां और दी जाएंगी ॥

सोमवार, 21 जून 2010

आम आदमी के पहुंच से दूर होती उच्च शिक्षा


आजकल कालेजों में दाखिले की मारामारी है । शहरों में विशेषकर मेट्रो और राजधानी में तो ये मारामारी अपने चरम पर होती है । कहने को तो परीक्षाओं से पहले बहुत से सलाह केंद्र और सहायता केंद्र पर सलाह देते और ढांढस बंधाते काऊंसलर न सिर्फ़ विद्यार्थियों बल्कि उनके अभिभावकों को भी कम नंबर आने या फ़िर कि शीर्ष वरीयता सूची में नाम न आने आदि को लेकर किसी भी तरह से परेशान न होने की हिदायत देते रहते हैं । किंतु हकीकतन जब परीक्षा परिणामों के बाद दाखिले की दौड शुरू होती है तब एक बार फ़िर से उन्हीं नंबरों की अहमियत , वही कट लिस्ट आदि का झंझट आदि से विधार्थी का सामना होता है । और विभिन्न कालेजों , संस्थानों में दाखिला मिलने /न मिल पाने की ऊहापोह में एक बार फ़िर से अभिभावकों की नाराजगी , उनकी मजबूरी का ताना सुनना पडता है ।

यहां कुछ तथ्य ऐसे हैं जो न सिर्फ़ हैरान कर देते हैं बल्कि अफ़सोस करने लायक लगते हैं । पिछले सिर्फ़ दो दशकों में व्यावसायिक परिसरों , मल्टीप्लेक्सों , शौपिंग मौलों , म्युजिक प्लैनेट , बडे पब तथा रेस्त्रां आदि की संख्या में तकरीबन ७८ प्रतिशत की वृद्धि हुई है । जबकि इसके विपरीत शिक्षण संस्थानों , विशेषकर सरकारी कालेजों की संख्या में सिर्फ़ १९ प्रतिशत की । इसी बात से पता चल जाता है कि सरकार शिक्षा के प्रति कितनी गंभीर है । ऐसी हालत में जहां इन कालेज प्रशासनों द्वारा दाखिले के नाम पर , विभिन्न कोटे की सीटों का आरक्षण , तो और भी कई तरीकों से जम कर भ्रष्टाचार और उगाही की जाती है । वहीं बहुत से इच्छुक विद्यार्थी कालेजों में दाखिला न ले पाने के कारण टूटे हुए मन से कोई और दिशा पकड लेते हैं या बेमन से अन्य कोर्सों में दाखिला लेते हैं ।

इससे जुडी और शायद उससे भी ज्यादा गंभीर समस्या है इस शिक्षा का दिनानुदिन बहुत अधिक मंहगा होते जाना । मोटे तौर पर यदि सिर्फ़ ये कहा जाए कि उच्च शिक्षा में आज कोई भी कोर्स ऐसा नहीं है जहां पर किफ़ायती दरों पर भी अभिभावक अपने बच्चों को पांच दस लाख से कम शिक्षण शुल्क दे कर पढा सकें । अब तो स्थिति ऐसी हो गई है कि इस वास्तविकता को सभी मन ही मन स्वीकार भी चुके हैं , इसलिए बच्चों के हायर सेकेंड्री में पहुंचते ही वे अपनी बचत राशि और जमा पूंजी टटोलने लगते हैं , बैकों के चक्कर काटने लगते हैं जहां से उन्हें शिक्षा लोन मिलने की गुंजाईश हो । सरकार यदि कभी इन सब पर अपना पक्ष रखती है तो स्पष्ट कह देती है कि शुल्क में वृद्धि तो स्वाभाविक है और सरकार यदि संस्थानों की संख्या बढ भी दे तो भी शुल्क में बहुत अधिक अंतर नहीं पडने वाला है ।

अब इसका एक प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष परिणाम ये होता है कि इन सभी बडे बडे संस्थानों में सिर्फ़ आर्थिक रूप से सक्षम माता पिता के बच्चे ही पढ पाते हैं और फ़िर जब ऐसे बच्चे डिग्रियां लेकर उन संस्थानों से बाहर निकलते हैं तो उनका पहला और आखिरी ध्येय सिर्फ़ और सिर्फ़ पैसा, रुतबा , शोहरत बनाना ही होता है । उन्हें क्या मतलब देश से समाज से उसके विकास से । यही वो कारण हैं जो बच्चों को देश से बाहर जाने को प्रेरित करता है ,यही वो कारण है जो बच्चों को रोकता है कि वे अपने देश में रह कर शोध और अविष्कारों में अपना समय बर्बाद करें । ये सब एक ऐसी समस्या बन चुकी है जिसे जानबूझ कर बने रहने दिया जा रहा है , क्योंकि ये उनके लिए एक सुविधा की तरह है जो देश का चमचमाता वर्ग है । लेकिन आने वाले समय में ये वर्ग द्वेष आगे बढ कर यदि गृह युद्ध का रूप ले ले और देश का एक बडा युवा वर्ग सही शिक्षा के अभाव में हतोत्साहित होकर दिशाहीन हो जाए तो इसके लिए समाज और देश को तैयार ही रखना चाहिए खुद को ।

रविवार, 6 जून 2010

मानव व्यवहार में हो रहा परिवर्तन : एक विश्लेषण



अमेरिका के स्कूल में एक विद्यार्थी ने अपने सहपाठियों और शिक्षकों पर गोलिया बरसाईं । दिल्ली में सडक पर एक कारों के आपस में बस छू भर जाने से क्रोधित दो युवकों ने आपसी मारपीट की , और एक ने दूसरे को गंभीर रूप से घायल कर दिया । फ़्रांस में वीडियो गेम्स देखने से मना करने पर बेटे ने मां को ही मार डाला । गाजियाबाद में केले के पैसे मांगने पर झगडा , एक की मौत । अब पूरी दुनिया भर में इस तरह की घटनाएं और खबरें आम सुनने पढने और देखने को मिल रही हैं । समाज विज्ञानियों ने पहले तो इन्हें गंभीरतापूर्वक नहीं लिया किंतु अब जबकि इन घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हो रही है तो इंसान के इस बदलते व्यवहार पर अध्य्यन करने के बाद इसके कारण और परिणामों पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की । इस रिपोर्ट में तफ़सील से बताया गया कि किन वजहों से आज आदमी इस तरह तनाव , व्यग्रता, कम सहनशील ,उग्र होता जा रहा है ।

वर्तमान में जीवनशैली में एक नियमित भागदौड , एक मशीनीपन , प्रतिस्पर्धी वातावरण सा बन चुका है । शहरों में तो ये बात इतनी ज्यादा हो चुकी है कि दिन और रात का फ़र्क ही नहीं पता चलता है अब । ग्रामीण क्षेत्रों में बेशक अभी भी उतनी गलाकाट नहीं मची हुई है , और सारा जीवन एक नियमित सी दिनचर्या पर चल रहा है इसीलिए वहां अब भी रोड रेज , बात बेबात मारपीट , आदि की घटनाएं आम तौर पर होती नहीं दिखती हैं । जहां तक शहरो की बात है तो , यहां तो यदि बचपन से ही आकलन किया जाए तो आज के पांच वर्ष का बच्चा जो मानसिक शारीरिक दबाव तथा आई क्यूं यानि बोध परिपक्वता को महसूस करता है वो दो तीन दशक पहले तक बालिगपन में पहुंचने वाला युवा भी नहीं कर पाता था । घर से भारी बस्तों का बोझ उठाए बालक कब माता पिता की अति महात्वाकांक्षा के दबाव तले आ जाता है उसे पता ही नहीं चलता । अब मां पिता दोनों ही कामकाजी होते जाने के चलन ने जहां उनसे घर में मिलने वाला अभिभावकीय स्नेह , उनका वक्त .छीन लिया वहीं सब कुछ पैकेट बंद खाने पीने पर ही निर्भरता तक सीमित हो कर रह गया है ।

मानव के बदलते हुए व्यवहार पर शोधरत समाज विज्ञानियों और मनोविज्ञानियों ने इसके कुछ विशेष कारणों की पहचान की । इनमें से पहला है बदलता खानपान । रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में लोगों की खान पान की प्रवृत्ति में बहुत भारी बदलाव आया है । पूरे विश्व में जिस तेज़ी से फ़ास्ट फ़ूड या जंक फ़ूड भोज्य पदार्थों के सेवन का चलन बढा है उसने पारंपरिक भोजन को पीछे धकेल दिया है । विकसित देशों में तो ये खैर बहुत पहले से ही चला आ रहा है । मोटापे , रक्तचाप तथा पेट जनित कई बीमारियों के लिए जिम्मेदार ये भोज्य पदार्थ अब पश्चिमी समाज को भी खटकने लगे हैं । इसलिए वहां भी अब इन पदार्थों को स्कूल कालेज परिसरों में प्रतिबंधित करने पर विचार किया जा रहा है । ऐसे भोजन न सिर्फ़ पाचन तंत्र को प्रभावित करते हैं बल्कि शरीर में उच्च रक्तचाप और उत्तेजना के लिए भी जिम्मेदार हैं । इसलिए इनके लगातार सेवन से चिडचिडापन , तनाव का होना स्वाभाविक ही है । आज भारतीय शहरों में भी इनके प्रति बढता रुझान और उसके प्रभाव के परिणाम भी दिखने लगे हैं ।

इसके अलावा दूसरा कारक बताया गया है मनोरंजन , समाचार , सूचना के नाम पर लोगों के बीच फ़ैल रही हिंसात्मक सामग्री का प्रचार और प्रसार । रिपोर्ट बताती है कि बच्चों के खेल हों या बडों की फ़िल्में , समाचार हों या सूचना संसार हर ओर हिंसा , और उत्तेजना को ही आधार बना कर लोगों के सामने परोसा जा रहा है । तो ऐसे में जो भी एक आम व्यक्ति देख समझ रहा है धीरे धीरे उसका प्रभाव न सिर्फ़ उसके मस्तिष्क पर पडता है बल्कि उसका व्यवहार भी इसी तरह परिवर्तित होता जाता है । पश्चिमी देशों में तो इस कई ऐसी घटनाएं और अपराध तक इन्हीं कार्यक्रमो , सिनेमा , धारावाहिकों आदि से प्रेरित होते हैं । मनोविज्ञानी बताते हैं कि जितना प्रभाव सकारात्मक और सीधी साधी प्रस्तुतियां नहीं डालती हैं , उससे कहीं अधिक तीव्रता से मारधाड, हिंसा , अश्लीलता, उत्तेजना आदि की सामग्रियां मस्तिष्क ग्रंथियों को प्रभावित करती हैं ।

आज इंसान के व्यवहार में बढती उग्रता और हिंसा का एक बडा कारण नशे के सेवन को भी माना गया है । समाज विज्ञानी कहते हैं कि समाज में जिस गति से विभिन्न तरह के नशीले पदार्थों का , शराब , आद कि सेवन बढा है वो भी इन सबके लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है । इस बात को साबित करते हुए मनोविज्ञानी कहते हैं कि पुरूषों की तुलना में महिलाएं अब भी नशे के सेवन में बहुत पीछे हैं और यही कारण है कि क्रोध ,द्वेष, हिंसा , आदि में अधिकांश और जल्दी , पुरूष वर्ग ही पाया जाता है । आजकल युवा सबसे अधिक नशे की गिरफ़्त में हैं इसलिए उनके व्यवहार में भी इसका प्रभाव देखने को मिल रहा है ।

समाज विज्ञानियों ने इस तरह के बदलवा और मानव व्यवहार में निरंतर हो रहे परिवर्तनों को बहुत ही गंभीर चिंता का विषय माना है । उनका मानना है कि ये न सिर्फ़ समाज के लिए , लोगों के लिए , बल्कि खुद इंसानियत के लिए भी बहुत ही नुकसानदायक होने वाला है । सबसे दुखद बात तो ये है कि अभी तक इन बातों को गंभीरतापूर्वक लिया ही नहीं गया है ।

शनिवार, 5 जून 2010

काश कि इस तरह मनाया जा सके पर्यावरण दिवस




हर साल पांच जून को पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जा रहा है । और पिछले एक दशक से जब से इस दिवस को सिर्फ़ मनाया और उससे ज्यादा मनाए जाने को जताया जा रहा है तभी से लगातार पर्यावरण की खुद की सेहत बिगडती जा रही है । इससे बडी विडंबना और क्या हो सकती है कि आज जब ये विश्व पर्यावरण दिवस को मनाए जाने की खानापूर्ति की जा रही है तो प्रकृति भी पिछले कुछ दिनों से धरती के अलग अलग भूभाग पर , कहीं ज्वालामुखी प्रस्फ़ुटन के रूप में , तो कहीं लैला , कहीं सुनामी , कहीं कैटरीना और कहीं ऐसे ही किसी प्रलय के रूप में इस बात का ईशारा भी कर रही है कि अब विश्व समाज को इन पर्यावरण दिवस को मनाए जाने जैसे दिखावों से आगे बढ कर कुछ सार्थक करना होगा । बडे बडे देश और उनका विकसित समाज जहां प्रकृति के हर संताप से दूर इसके प्रति घोर संवेदनहीन होकर मानव जनित वो तमाम सुविधाएं उठाते हुए स्वार्थी और उपभोगी होकर जीवन बिता रहा है जो पर्यावरण के लिए घातक साबित हो रहे हैं । वहीं विकासशील देश भी विकसित बनने की होड में कुछ कुछ उसी रास्ते पर चलते हुए दिख रहे हैं ।

जब भी प्रकृति के नाम पर चिंतित होने की बारी आती है तो कभी पृथ्वी सम्मेलन तो कभी टोक्यो समझौते जैसा कुछ करके उसे भुला दिया जाता है ।
आज यदि धरती के स्वरूप को गौर से देखा जाए तो साफ़ पता चल जाता है कि आज नदियां , पर्वत ,समुद्र , पेड , और भूमि तक लगातार क्षरण की अवस्था में हैं । और ये भी अब सबको स्पष्ट दिख रहा है कि आज कोई भी देश , कोई भी सरकार , कोई भी समाज इनके लिए उतना गंभीर नहीं है जितने की जरूरत है । बेशक लंदन की टेम्स नदी को साफ़ करके उसे पुनर्जीवन प्रदान करने जैसे प्रशंसनीय और अनुकरणीय प्रयास भी हो रहे हैं मगर ये ऊंट के मुंह में ज़ीरे के समान हैं । आज समय आ गया है कि धरती को बचाने की मुहिम को इंसान को बचाने के मिशन के रूप में बदलना होगा ।

बेशक
इंसान बडे बडे पर्वत नहीं खडे कर सकता , बेशक चाह कर भी नए साफ़ समुद्र नहीं बनाए जा सकते और , किंतु ये प्रयास तो किया ही जा सकता है कि इन्हें दोबारा से जीवन प्रदान करने के लिए संजीदगी से प्रयास किया जाए ।
भारत में तो हाल और भी बुरा है । जिस देश को प्रकृति ने अपने हर अनमोल रत्न , पेड, जंगल, धूप , बारिश , नदी , पहाड , उर्वर मिट्टी से नवाज़ा हो , यदि वो भी इसका महत्व न समझते हुए इसके नाश में लीन हो जाए तो इससे अधिक अफ़सोस की बात और क्या हो सकती है ।

इसके लिए सबसे सरल उपाय है कि पूरी धरती को हरा भरा कर दिया जाए । इतनी अधिक मात्रा में धरती पर पेडों को लगाया जाए कि , धरती पर इंसान द्वारा किया जा रहा सारा विष वमन वे वृक्ष अपने भीतर सोख सकें और पर्यावरण को भी सबल बनने के उर्जा प्रदान कर सकें । क्या अच्छा हो यदि कुछ छोटे छोटे कदम उठा कर लोगों को धरती के प्रति , पेड पौधे लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए । बडे बडे सम्मेलनों , आशावादी समझौतों आदि से अच्छा तो ये होगा कि इन उपायों पर काम किया जाए । लोगों को बताया समझाया और महसूस कराया जाए कि पेड बचेंगे ,तो धरती बचेगी ,धरती बचेगी ,तो इंसान बचेगा । सरकार यदि ऐसे कुछ उपाय अपनाए तो परिणाम सुखद आएंगे

१)जन्मदिन , विवाह, और अन्य ऐसे समारोहों पर उपहार स्वरूप पौधों को देने की परंपरा शुरू की जाए । फ़िर चाहे वो पौधा ,तुलसी का हो या गुलाब का , गुलाब का हो या गेंदे का । इससे कम से कम लोगों में पेड पौधों के प्रति एक लगाव की शुरूआत तो होगी ।

) विभिन्न सरकारी समारोहों , सम्मेलनों और पुरस्कार वितरण कार्यक्रमों में शाल, स्मृति चिन्ह के साथ साथ पौधे देने की प्रथा भी शुरू की जाए ।


) सभी विशेष दिवसों , जयंतियों, आदि पर सरकार और गैर सरकारी संगठनों द्वारा वृक्षारोपण अभियान शुरू किया जाए वो भी पूरे वेग से और पूरी गंभीरता से।


४)सभी शिक्षण संस्थानों , स्कूल कालेज आदि में विद्यार्थियों को , उनके प्रोजेक्ट के रूप में विद्यालय प्रांगण में , घर के आसपास , और अन्य परिसरों में पेड पौधों को लगाने का कार्य दिया जाए । यदि इन छोटे छोटे उपायों पर ही संजीदगी से काम किया जाए तो ये कम से कम उन बडे बडे टोक्यो सम्मेलन से ज्यादा ही परिणामदायक होगा नि:संदेह ।

इंसान को अपने जीवन में पेड लगाने का सुख अवश्य ही प्राप्त करना चाहिए । मैं अपने हाथों के कम से कम पांच सौ पेड और पौधे लगा चुका हूं । पिछले ग्राम प्रवास के दौरान जब अपने लगाए आम के इन पेडों को देखा तो ऐसा लगा कि संतान बडी होकर गले से लग रही है और मेरे दिल को बडी ही ठंडक पहुंची । देखिए ये हैं वो आम के , शीशम के और जाने किस किस के पेड .........


रविवार, 30 मई 2010

भारतीय रेल : सुरक्षा और स्वच्छता से दूर




अभी हाल ही में हुई रेल दुर्घटना , और इससे पहले दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मची भगदड की दुर्घटना ,ने एक बार फ़िर से भारतीय रेलों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार , रेल प्रशासन और संबंधित लोगों की सोच और प्रतिबद्धता को कटघरे में खडा कर दिया है । भारतीय रेलवे न सिर्फ़ रेलों के परिचालन , बल्कि अपनी बहुत बडी नियोजकों की संख्या के कारण न सिर्फ़ एशिया में बल्कि विश्व में भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है ।भारत में अंग्रेजी शासन के देनों में यदि ये कहा जाए कि भारतीय रेल उनके द्वारा दी गई सबसे बहुमूल्य प्रणाली थी तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी शायद ।इस बात का अंदाज़ा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि स्वंत्रता से पहले भारत में अंग्रेजों द्वारा ,बिछाई गई ,रेल पटरियों की कुल लंबाई का सिर्फ़ दो प्रतिशत स्वंत्रता के बाद भारत की सरकारों द्वारा बिछाई गई । न सिर्फ़ सवारी गाडियों बल्कि वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए ढुलाई वाली मालगाडियों के परिचालन का विचार भी उन्हीं की देन थी । रेल परिचालन की ताकत को पहचानते हुए आजादी की लडाई लड रहे रणबांकुरे कहते थे कि जो काम बम और बारूद न कर सके जो काम समाचार और अखबार न कर सके वो काम रेल ने कर दिया



आज भारतीय रेलों के परिचालन को दशकों बीत चुके हैं । भार और व्यवसाय के दृष्टिकोण से आज भारतीय रेल बहुत लंबा सफ़र तय कर चुकी है । ऐसा भी नहीं है कि आधी शताब्दी से ज्यादा उम्र की हो चुकी भारतीय रेलवे , आधुनिक चुनौतियों , नई समस्याओं , और अन्य समकालीन सुविधाओं से लैस होने में बिल्कुल ही कोताही बरत चुकी है । एक साथ बहुत सी परियोजनाओं पर काम चल रहा है । राजधानी , शताब्दी के बाद दुरंतो और भविष्य में बुलेट ट्रेनों के संचालन जैसी महात्वाकांक्षी योजनाओं पर भी काम चल रहा है । भारत में जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि होते जाने के कारण स्वाभाविक रूप से सबसे बडे यातायात साधन के रूप में यात्रियों का भारी दबाव भी कमोबेश भारतीय रेलवे झेलता ही जा रहा है । अब तो कई राज्यों , दुर्गम पहाडियों आदि में भी नई पटरियों को बिछाने का काम जोर शोर से चल रहा है । कुच वर्षों पहले सफ़लता पूर्वक शुरू की गई कोंकण रेलवे परियोजना एक ऐसी ही सफ़लता थी भारतीय रेल के लिए । बरसों पुराने चले रही व्यवस्थाओं , नीरस हो चुके रेल टिकटों , स्टेशनों और प्लेटफ़ार्मों के रंग रूप में समय समय पर बदलाव करने का प्रयास किया जाता रहा है । इसके अलावा पिछले एक दशकों में भारतीय रेलवे ने मुनाफ़े में सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा अर्जित सफ़लता में अपना नाम भी दर्ज़ कराया । लेकिन ऐसा नहीं है कि भारतीय रेलवे का सिर्फ़ यही उजला उजला पक्ष है ।

भारतीय रेल संचालन व्यवस्था को विश्व की कुछ असुरक्षित यातायात व्यवस्थाओं में भी स्थान मिला हुआ है । आंकडे ही बता देते हैं कि छोटी छोटी घटनाओं , लापरवाही से लेकर बहुत ही बडी दुर्घटनाओं से रूबरू होता भारतीय रेलवे इतने समय बाद भी श्रोताओं का विश्वास नहीं जीत सका है । एक सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय रेल में सफ़र करने वाले यात्रियों में से ७९ प्रतिशत ने बेझिझक माना कि उन्हें रेल यात्रा में सफ़र करना कष्टदायी और असुरक्षित लगता है । यदि दुर्घटनाओं का आकलन किया जाए तो एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में पिछले कुछ दशकों में भी रेल दुर्घटनाओं में से ३७ प्रतिशत जहां मानवीय भूलों के कारण हुई है तो १९ प्रतिशत दुर्घटनाएं आतंकी घटनाओं के कारण जबकि २२ प्रतिशत मौसम के कारण और बांकी की अन्य कारण जैसे , रेलवे क्रासिंग पर फ़ाटकों का न होना , रेलों की छतों पर सफ़र करना और ऐसे ही कारणों से होती हैं । वैश्विक आतंकवाद पर अध्ययन और विश्लेषण करने वाली संस्था की मानें तो भारत भी उन देशों में शामिल है जहां के यातायात व्यवस्था , हमेशा ही अलगाववादियों , आतंकवादियों , और आंदोलनकारियों के निशाने पर रहती है । ताजातरीन रेल दुर्घटना भी माओवादियों की करतूत का ही परिणाम मानी जा रही है ।

सबसे अहम बात ये है कि भारतीय रेल प्रशासन कभी भी सुरक्षा और सफ़ाई व्यवस्था के प्रति गंभीर नहीं दिखा । हालात का अंदाज़ा इसी बात से हो जाता है कि पिछले कुछ समय से मुनाफ़े में चल रही भारतीय रेल अभी तक अपनी सभी क्रासिंग्स पर फ़ाटकों की व्यवस्थ नहीं कर पाई है , जो प्रति वर्ष होने वाली रेल दुर्घटनाओं का सबब बनते हैं । आज भी सर्दी और धुंध /कोहरे वाले मौसम में रेलों की परिचालन व्यवस्था बिल्कुल चरमरा सी जाती है और बहुत सी दुर्घटनाओं का कारण बनती हैं । बेशक आज रफ़्तार की बात में भारतीय रेल बहुत सी अन्य समकालीन रेल परिचालनों के समकक्ष बन गई है मगर अब भी सुरक्षा की दृष्टि से उनसे कोसों दूर है । अत्याधुनिक संचार प्रणालियां , सुरक्षा उपकरणों , नए संयंत्रों से अभी भी भारतीय रेलों को लैस नहीं किया जा सका है । और हास्यास्पद रूप से यहां के रेल मंत्री कभी रेलों में कुल्हड योजना चला कर तो कभी गरीब रथ चला कर और कभी दुरंतो रेल चला कर अपनी और भारतीय रेलों की सफ़लता का ढिंढोरा पीटते रहे हैं ।

एक आम आदमी की नज़र से देखा जाए तो टिकट लेने से , रेल गाडी में सवार होने तक , सफ़र की शुरूआत से लेकर सफ़र की समाप्ति तक पूरी रेल यात्रा एक कटु अनुभव ही रहता है उसके लिए । बहुत सारी वैकल्पिक व्यवस्थाओं के होने के बावजूद रेल प्रशासन आज तक ये नहीं सुनिश्चित कर पाया है कि रेल यात्री अपने आपको सुरक्षित महसूस कर सकें । बेशक बढती रेल दुर्घटनाओं और उनमें मरने वालों निर्दोष यात्रियों की बढती संख्या को देखते हुए कुछ वर्षों पहले रेल यात्रियों का बीमा करवाए जाने की योजना शुरू की गई थी , किंतु दुर्घटना के बाद जिस तरह से प्रशासन किसी भी जवाबदेही से पल्ला झाड लेता है उसीसे से उसकी नीयत का पता चल जाता है । हाल ही दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मची भगदड पर बोलते हुए वर्तमान रेल मंत्री के बयान ने भी ऐसी ही बानगी पेश की थी । सुरक्षा के साथ साथ सफ़ाई और खान पान व्यवस्था का भी यही है । हालांकि कई रेल जोनों में सफ़ाई की व्यवस्था को निजि हाथों में सौंपे जाने के बाद स्थिति में कुछ सुधार अवश्य हुआ है मगर कुल मिला कर स्थिति अभी भी नारकीय ही है । ऐसा ही हाल रेलवे की खान पान व्यवस्था का भी है ।

भारतीय रेल मंत्रालय , रेल मंत्री , रेल प्रशासन , बेशक हर साल कोई न कोई लोक लुभावन योजना बना कर , कभी किराए में रियायत देकर , तो कभी कोई विशेष ट्रेन चला कर आम जनमानस को थोडी देर के लिए भटका दे । मगर जब समय समय पर इस तरह के हादसों में आम लोग अपने परिजनों को खोते हैं तो उनके मन में सिर्फ़ एक ही सवाल टीस मारता है ..........आखिर कब तक ??????????

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