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मंगलवार, 12 नवंबर 2013

मुर्गे ढोते स्कूली वैन .......



ज्यादा फ़र्क नहीं है ,खुद ही देखिए , हालत इस तस्वीर से ज्यादा भयानक है





अभी कुछ वर्षों पूर्व उत्तर पूर्वी दिल्ली में एक हादसे , जिसमें दो स्कूली बस आपस में आगे निकलने की होड में
दुर्घटनाग्रस्त हो गई थीं जिसमें बहुत से मासूम बच्चों को अपनी जान से हाथ धोना पडा था । हालांकि स्कूली वाहनों से जुडा हुआ ये कोई पहला हादसा नहीं था मगर ये इतना बडा हादसा जरूर था ,जिसने सरकार व प्रशासन को इस बात के लिए मजबूर किया कि वे स्कूली वाहनों के लिए जरूरी दिशा निर्देश जारी किए जाएं । प्रशासन ने स्कूली वाहनों के लिए बहुत से नियम कायदे बनाए जिन्हें कुछ दिनों तक लागू होते हुए सबने देखा भी । जैसे सभी स्कूली वाहनों पर पीले रंग की पट्टी और उसमें स्कूल वैन लिखा होना , ऐसे प्रत्येक वैन/बस में स्कूल की तरफ़ से शिक्षक/सहायक की अनिवार्य रूप से उपस्थिति , और सबसे जरूरी ऐसे स्कूली वाहनों में प्रशिक्षित चालकों का होना आदि ।


जैसा कि अक्सर और लगभग हर नागरिक कानून के साथ होता रहा है , कुछ दिनों के बाद इनमें न सिर्फ़ शिथिलता आई बल्कि धीरे धीरे स्थिति ऐसी बन गई कि पहले चोरी छुपे और अब तो खुले आम इन नियम कायदों की धज्जियां उडाई जा रही हैं । इसका दुष्परिणाम इससे अधिक भयंकर और क्या हो सकता है कि लगातार इन स्कूली वाहनों का दुर्घटनाग्रस्त होने के अलावा इन वैन और बस चालकों द्वारा छोटे स्कूली बच्चों का शारीरिक शोषण तक किए जाने की घटनाएं रोज़मर्रा की बात हो गई हैं । ऐसा नहीं है कि सरकार ,प्रशासन व पुलिस की तरफ़ से इससे निपटने के लिए कुछ नहीं किया गया है । बहुत बार पुलिस ने बाकायदा अभियान चलाकर इन तमाम स्कूली वाहनों के खिलाफ़ सख्ती दिखाई है । मगर ऐसा करते ही ये तमाम स्कूली वैन/बस वाले हडताल पर चले जाते हैं और अभिभावक से लेकर स्कूली प्रशासन को मौका मिल जाता है अपनी इन गलतियों को मजबूरी का जामा पहनाने का ।


शहरों में बढती आबादी और उसी अनुपात में बढते स्कूलों के कारण ये स्वाभाविक है कि स्कूली वाहनों की कमी जरूर महसूस की जाती है किंतु आज अभिभावकों से बच्चों के स्कूल आने जाने का भारी भरकम किराया राशि वसूलने वाले स्कूल प्रशासनों का ये रोना कृत्रिम सा लगता है । स्कूली बसों तक तो स्थिति फ़िर भी ठीक ही कही जा सकती है , मगर छोटे छोटे स्कूल वैन/ व स्कूली रिक्शे तक  में बच्चों को जिस तरह से ठूंस ठूस कर ढोया और लादा जा रहा है उसे देखकर हठा्त ही उस छोटे से पिंजरेनुमा रिक्शे की याद आ जाती है जिसमें मुर्गों को किसी मीट की दुकान पर ले जाया जा रहा होता है








अब ये स्थिति अधिक चिंताजनक इसलिए भी होती जा रही है क्योंकि शहरों विशेषकर राजधानी की सडकों पर बेतहाशा बढते वाहनों ने , यातायात के दबाव को और अधिक बढा दिया है । छोटे छोटे बच्चों द्वारा तेज़ रफ़्तार से चलाते स्कूटियों/स्कूटरों/बाइक आदि ने  इसे और भी अधिक नारकीय बना दिया है । ऐसे में बच्चों को स्कूल पहुंचाते व वापस लाते वाहनों के की पूरी कमान भी कमोबेश ऐसे ही लापरवाह कम उम्र और अनुभव वाले , जिनमें से अधिकांश के पास चालक लाइसेंस तक नहीं मौजूद होता है , देश के भविष्य को जानबूझ कर मौत के मुंह में ढकेलने जैसा है ।


ये इतना आसान नहीं होगा और न ही यकायक ठीक होने वाली समस्या है बल्कि इसके लिए योजनाबद्ध तरीके से प्रशासन , पुलिस , अभिभावकों व स्कूल प्रशासन को मिल कर कई मोर्चों पर काम करना होगा । सबसे पहले अभिभावकों को   स्कूल प्रशासन पर इस बात का दबाव बनाना चाहिए कि वे बच्चों के लाने जाने अपने अपने स्कूली वाहनों के चालकों , वाहनों की स्थिति , समय , रास्ते आदि की व्यवस्था को सर्वोच्च वरीयता सूची में रखें । वाहन चालक का लाइसेंस , उसका अनुभव व उसकी पृष्ठभूमि आदि की अच्छी तरह से पडताल किया/कराया जाना अनिवार्य किया जाना चाहिए । पुलिस को इसमें स्कूल प्रशासनों का सहयोग करना चाहिए तथा निर्धारित नियम कानूनों के पालन को सुनिश्चित करना चाहिए ।


इन सबसे अहम बात ये कि एक आम नागरिक के रूप में हमें और आपको जब भी कहीं भी कभी भी कोई स्कूल वैन ऐसी स्थिति में दिखे कि लगे कि इसके बारें में स्कूल प्रशासन और पुलिस को सूचित करना जरूरी है तो बिना देर किए ऐसा किया जाना चाहिए । हमें हर हाल में ये याद रखना चाहिए कि , इन सडकों पर दौडते , इन सैकडों वैन में , हमारे आपके ही घर आंगन में खेलते वो नन्हें भविष्य हैं जिन्हें हर हाल में इस देश के कल के लिए बचाया जाना चाहिए , कम से कम ऐसी लापरवाहियों से उन्हें खोते रहने का गुनाह अब पूरी तरह से बंद किया जाना चाहिए ।


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सोमवार, 16 सितंबर 2013

मृत्युदंड : एक विमर्श







देश के एक प्रतीक्षित फ़ैसले में अदालत का निर्णय , जो कि अधिकतम , यानि मृत्युदंड आने के बाद एक बार पुन: "मृत्युदंड" की सज़ा पर नई बहस उठ खडी हुई है । ज्ञात हो कि ऐतिहासिक रूप से ये पहला मौका है जब किसी एक ही जिला अदालत द्वारा एक माह के भीतर ही नौ अपराधियों को मृत्युदंड की सज़ा सुनाई गई है । अंतरराष्ट्रीय संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी मृत्युदंड की सज़ा के बढते दर को चिंताजनक करार दिया है । अभी कुछ समय पूर्व ही आतंकवाद का आरोप साबित होने पर दो अपराधियों अजमल कसाब और अफ़ज़ल गुरू को फ़ांसी पर लटकाया गया था ।
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मृत्युदंड की सज़ा के इतिहास पर नज़र डाली जाए तो भारत सहित अन्य बहुत से देशों में न सिर्फ़ मौत की सज़ा का प्रावधान प्रचलित था बल्कि लगभग सभी देशों में इसके क्रियान्वयन के अमानवीय और क्रूर तरीके भी प्रचलिए थे । इंगलैंड में १४९१-१५४१ के बीच तो लगभग ७२,००० लोगों को छोटे बडे अपराधों तक के मृत्युदंड दे दिया गया । मृत्युदंड की सज़ा देने के लिए क्रूरतम विधियों का प्रयोग किया जाता था जैसे गैरेट ( धातु की कॉलर से अपराधी का गला , उससे श्वास रूकने तक दबाए रखना ) , गुलोटिन ,(एक विशेष प्रकार की मशीन जिसमें बडे धारदार ब्लेड की सहायता से अपराधी का सिर धड से अलग कर दिया जाता था । इसके अलावा सूली पर टांग कर , कुचलकर , विषैली गैस छोडकर, ज़हर का इंजेक्शन व गोली मारकर भी मृत्युदंड दिया जाता था । अमानवीय तरीकों में जिंदा गाडकर पशुओं के खाने केल इए छोड देना , छोटे बडे घाव देकर रोज कष्ट पहुंचा कर तथा सार्वजनिक स्थानों पर अपराधियों पर पत्थर बरसा अक्र उन्हें मार डालने की प्रथाएं व्याप्त थीं । आधुनिक युग में कुछ अरब देशों को छोडकर मृत्युदंड के अमानवीय तरीकों को हटा दिया गया है ।
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मृत्युदंड की सज़ा के विरोधी इसके पीछे तर्क देते हुए कहते हैं कि इस दंड की अप्रतिसंहरणीयता के कारण इसका प्रयोग खतरे से खाली नहीं है क्योंकि भविष्य में यदि आरोपी निर्दोष साबित हो जाता अहि तो इस दंड का उपशमन नहीं किया जा सकता है ।  किंतु इस तर्क के जवाब में यह कहा जा सकता है कि बहुस्तरीय न्याय प्रक्रिया और जटिलताओं के बाद इस बात की गुंजाईश न के बराबर बचती है कि ऐसी कोई स्थिति सामने आए । इसके विरोध में दूसरा तर्क ये दिया जाता है कि दंड का एक उद्देश्य होता है कि उसके भय से अपरधियों में अपराध के प्रति प्रतिरोध की भावना आए जबकि वास्तव में मृत्युदंड की सज़ा से संबंधित अपराध की दर में कोई प्रभाव पडा हो ऐसा देखने को नहीं मिलता ।


किंतु सिर्फ़ इस कारण से मृत्युदंड की सज़ा को समाप्त किया जाना तर्कसंगत नहीं लगता आज भी विश्व के १४१ देशों ने अपने यहां पर इस दंड व्यवस्था को बहाल रखा हुआ है । । इस विषय में प्रसिद्ध इटेलियन अपराधशास्त्री गेरोफ़ेलो का कथन गौर करने लायक है कि , " मृत्युदंड को समाप्त करने का अर्थ यह होगा मानो हम हत्यारे से कह रहे हैं कि तुम्हारे द्वारा किसी व्यक्ति की जान लेने जोखिम केवल अय्ह होगा कि अब तुम स्वयं के घर के बजाय कारागार में निवास करोगे " । यूं भी अपराध, आतंकवाद का प्रसार और मानवता के प्रति उसके बढते हुए खतरे को देखकर मृत्युदंड को समाप्त करना उचित नहीं जान पडता है । श
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भारत में भी मृत्युदंड को समाप्त करने की कवायद कई बार की गई है । लोकसभा में इस आशय का प्रस्ताव सर्वप्रथम १९४९ में रखा गया था किंतु तत्कालीन गृह मंत्री वल्लभ भाई पटेल ने इसे ठुकरा दिया था । १९८२ में दिल्ली में आयोजित दंड विधि पर अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस में भी मृत्युदंड के औचित्य पर विस्तृत चर्चा हुआ किंतु मृत्युदंड को विधि में यथावत रखने पर ही सहमति बनी । इसी प्रकार १९७१ में विधि आयोग ने भी मृत्युदंड के पक्ष में विचार रखते हुए कहा कि मृत्युदंड का आधार प्रतिशोध की भावना न होकर निष्ठुत अपराधियों के प्रति समाज का रोष दर्शाना है अत: दंड विधि में उसे बनाए रखना सर्वथा उचित है ।
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जहां तक भारतीय विधि में मृत्युदंड की स्थिति है तो कुछ विशेष अपराधों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान रखा गया है । सरकार के विरूद्ध युद्ध छेडना , सैनिक विद्रोह का दुष्प्रेरण , हत्या , आजीवन कारावास मिले अभियुक्त द्वारा हत्या का प्रयास , फ़िरौती के लिए अपहरण व हत्या , हत्या सहित डकैती आदि । यहां यह उल्लेख करना समीचीन होगा कि भारतीय दंड संहिता की धारा ३०३ एकमात्र ऐसी धारा थी जिसमें अपराधी को मृत्युदंड ही दिया जाना अनिवार्य था तथा इसके विकल्प में आजीवन कारावास दिए जाने का प्रावधान नहीं था ,जिसे वर्ष १९८३अ में मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य के वाद में असंवैधानिक ठहरा दिया गया । ज्ञात हो कि वर्ष १९५५ के पूर्व मानव वध के लिए मृत्युदंड दिया जाना सामान्य नियम था एवं आजीवन कारावास दिए जाने पर उसका कारण दर्ज़ करना आवश्यक होता था जबकि १९५५ में किए गए संशोधन के पश्चात स्थिति ठीक विपरीत हो गई तथा मृत्युदंड की सज़ा सुनाते समय इसके कारणों का उल्लेख करना अपरिहार्य बना दिया गया । उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णीत मृत्युदंड से संबंधित प्रकरणों के विश्लेषण से यह पता चलता है कि न्यायालय ने आकस्मिक आवेश, उत्तेजना, विषयसक्ति के कारण उत्पन्न घृणा , पारिवारिक कलह , भूमि संबंधी झगडे , आदि को मृत्युदंड के बजाय आजीवन कारावास का दंड दिए जाने का उचित कारण माना है ।
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मृत्युदंड के संदर्भ में व्याख्यायित सिद्धांत "विरलों में भी विरलतम" को भी अक्सर बहस का विषय बनाया जाता रहा है एवं खुद कई बार ये बात न्यायपालिका तक मान चुकी है कि इसकी व्याख्या करने के न्यायिक मानदंड में भारी असामनाता रही है ।यही कारण है कि वर्ष १९८३ में दीना बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के वाद में इससे पूर्व निर्णीत वाद बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य में व्याखायित सिद्धांत कि मृत्युदंड "विरलों में से भी विरलतम" मामलों में ही दिया जाना चाहिए को और स्पष्ट करते हुए कुछ विशेष बिंदुओं को चिन्हित किया जिन्हें विरलतम माना जाना चाहिए । बर्बरतापूर्वक एवं क्रूरतापूर्ण तरीके से की गई हत्या , हत्या का उद्देश्य घिनौना या दुराचारयुक्त हो , यदि यथा सामाजिक दृष्टि से घृणित या वीभत्स हो , जहां हत्याएं बडे पैमाने पर की गई हों , जैसे सामूहिक हत्या तथा जहां अपराध से पीडित व्यक्ति कोई असहाय बालक ,महिला , वृद्ध व्यक्ति या विख्यात , प्रतिष्ठित व्यक्ति हो या हत्या राजनीतिक स्वरूप की हो ।
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अत: सारांशत: यह कहा जा सकता है कि इसमें संदेह नहीं कि यदि मृत्युदंड का मनामने ढंग से या या भेदभावपूर्ण तरीके या जानबूझकर अनुचित रूप से प्रयोग किया गया तो वह असंवैधानिक होगा परंतु यदि वह विवेकपूर्वक उचित ढंग से निष्पक्ष होकर लागू किया जाए तो यह निश्चित ही लोगों में आपराधिक न्याय प्रशासन की विश्वसनीयता और उसके प्रति आस्था में अभिवृद्धि ही करेगा ।



रविवार, 8 सितंबर 2013

व्यवसाय में बदलती शिक्षा व्यवस्था ( संदर्भ ,विश्व साक्षरता दिवस )




 विश्व साक्षरता दिवस, यानि 8 सितंबर , यदि वास्तव में सोचा जाए तो क्या भारत जैसे देश को सच में ही साक्षरता दिवस मनाने का हक है , आइए कुछ तथ्यों पर नज़र डालते हैं 

* भारत आज भी अपने कुल खर्च का मात्र छ : प्रतिशत ही शिक्षा के मद में  खर्च करता है ।  
* भारत में आज भी लगभग 40 %  लोग निरक्षर हैं ।  
* भारत में कुल बच्चों में से लगभग 29 % आज भी किसी स्कूल में पढने नहीं जा पाते हैं ।  
* भारत ही वो देश है जहां सैकडों बच्चों को मुफ़्त भोजन योजना के कारण अपनी जान तक से हाथ धोना पडा है । 


ये तो हुई ग्रामीण भारत की बात अब ज़रा शहरी क्षेत्र की ओर भी नज़र की जाए । 


* आंकडों के मुताबिक शहरी क्षेत्र में रहने वाले लगभग 34 % अभिभावकों ने माना कि अपने बच्चों की फ़ीस भरने के लिए उन्हें कभी न कभी कर्ज़ या उधार लेने की नौबत आई है ।  
* सरकारी नियमों और न्यायिक आदेशों के बावज़ूद भी लगभग 89 % स्कूल अभिभावकों को स्कूल में बनाई गई दुकानों से ही किताबें , पुस्तिकाएं व वर्दी तक खरीदने को बाध्य करते हैं ।
* सरकारी नियमों के और न्यायिक आदेशों के बावजूद भी लगभग 42% स्कूल ,गरीब बच्चों को अपने यहां दाखिला इसलिए नहीं देते क्योंकि वे उन्हें मुफ़्त शिक्षा देना नहीं चाहते । 
*शहरी क्षेत्र के निजि स्कूलों में वातानुकूलित कक्षाएं और सरकारी स्कूलों के पास भवन तक नहीं है । 

ये वो चंद आंकडे भर हैं जो सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या भारत को वाकई साक्षरता दिवस मनाने का हक है ??????

बुधवार, 4 सितंबर 2013

न शिक्षा आदर्श रही न शिक्षक (संदर्भ ,शिक्षक दिवस )





हर साल की तरह इस साल भी नियत समय पर शिक्षक दिवस आ गया है । शिक्षक दिवस यानि शिक्षकों को समर्पित एक विशेष दिन जो पूरे विश्व भर में अलग अलग तिथियों को , स्वाभाविक रूप से उनके देश के शिक्षक , चिंतक , विचारकों के जन्म आदि पर आधारित , मनाया जाता है । भारत में इसे , 5 सितंबर , देश के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति , पेशे से शिक्षक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस  को मनाया जाता है । इसकी शुरूआत की कहानी भी बेहद दिलचस्प है । डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने जब राष्ट्रपति के रूप में पद संभाला तो उनके प्रशंसकों ने उनके जन्मदिवस को मनाने का आग्रह किया । उन्होंने सुझाव दिया कि फ़िर से राष्ट्रीय शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए । उसी वर्ष यानि 5 सितंबर 1962  से प्रति वर्ष इस दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है । 

बचपन से देखते चले आ रहे हैं कि स्कूलों में इस दिन को पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है । छात्रों में तो अपने शिक्षकों के प्रति स्नेह आदर और सम्मान दिखाने , तथा इस दिन आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रमों को लेकर एक अलग ही जोश दिखाई देता है । बच्चों को जो चीज़ सबसे ज्यादा पसंद आती है वो है एक दिन के लिए खुद शिक्षक बनकर अपनी कक्षा से छोटी कक्षा वाले बच्चों को पढाते हैं और फ़िर उस दिन आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रमों में अपने शिक्षकों के साथ खुल कर हल्का फ़ुल्का समय बिताते हैं । कुल मिलाकर उस दिन बच्चों के लिए पूरे स्कूल का माहौल विनोदपूर्ण और आनंददायक रहता है । किंतु यहां ये भी बहुत गौरतलब है कि जैसाकि इस विशेष दिवस का महत्व बताते हुए एक बार देश के राष्ट्रपति वैज्ञानिक ने कहा था कि देश के भविष्य को संवारने की जितनी जिम्मेदारी शिक्षकों पर होती है उतनी किसी अन्य समुदाय और वर्ग पर नहीं होती ।

यदि स्थिति का आकलन किया जाए तो देश में आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी न तो शिक्षा की स्थिति संतोषजनक नहीं है और न ही शिक्षकों की । देश की सरकार व प्रशासन शिक्षा के प्रति कितने गंभीर हैं इस बात का अंदाज़ा इसी तथ्य से लग जाता है कि आज भी देश के बजट का कुल छ: प्रतिशत शिक्षा के मद में व्यय किया जाता है और इस राशि को भी ईमानदारी से कहां कितना उपयोग किया जाता है वो भी किसी से छुपा नहीं है ।


कहते हैं कि बुनियाद ही कमज़ोर हो तो फ़िर ईमारत की मजबूती हमेशा संदेह में रहती है । देश में आज सबसे बुरी हालत प्राथमिक शिक्षा की है और शिक्षकों की भी । न तो विद्यालयों के पास समुचित भवन हैं , न ही पेय जल , पुस्तकालय , पाठय सामग्री आदि बुनियादी सुविधाएं । ऊपर से शिक्षकों को पढाने के अतिरिक्त एक जिम्मेदारी सरकार ने और सौंप दी है और वो है मध्याह्न भोजन की । शहरों में तो खैर जैसे तैसे भोजन बनाने वाले भी मुहैय्या करा दिए गए हैं किंतु गांवों के स्कूलों में जहां पहले से ही शिक्षकों की भारी कमी है वहां उनमें से भी कुछ तो दोपहर भोजन योजना में ही लगे रहते हैं । किंतु ऐसा नहीं है कि सारा दोष सिर्फ़ सरकार और प्रशासन का ही है , शिक्षा आज एक व्यवसाय का रूप ले चुकी है और स्कूल कालेज मुनाफ़ा कमाने वाले कारोबार बन गए हैं । स्कूलों में किताबों से लेकर वर्दी तक जबरन बेचे जा रहे हैं । हर तरह एक भागमभाग सी मची हुई है । ऐसे में कोई आदर्श शिक्षा और शिक्षक की कल्पना भी कैसे कर सकता है ।

इन्हीं सबका परिणाम ये हुआ है कि आज न तो छात्रों के लिए कोई शिक्षक उनका आर्दश , उनका मार्गदर्शक गुरू और जीवनभर की प्रेरणा बन पाता है और न ही बनने को उत्सुक भी है । एक निर्धारित घिसे पिटे पैटर्न पर चल रही शिक्षा प्रणाली को  उम्र भर खुद ढोता  और छात्रों की पीठ पर लादता हुआ एक शिक्षक अब इस आस में कभी नहीं रहता कि उसका कोई छात्र कल होकर जब देश और समाज के निर्माण में कोई बडी सकारात्कम भूमिका निभाएगा तो खुद उस शिक्षक का दिया हुआ ज्ञान ही उसके मूल में होगा । शिक्षा और शिक्षकों को यदि अपनी गरिमा बनाए बचाए रखनी है तो उन्हें इस समाज में रहकर भी इनकी तमाम कुरीतियों और दुर्गुणों से खुद को बचाए रखकर शिक्षा के ध्येय के लिए साधना रत होना होगा ।

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

बदलता खेल परिदृश्य ---- (खेल दिवस पर विशेष)





क्या आपने गौर किया है कि पिछले कुछ समय में खेल जगत के कोनों में न सिर्फ़ खेल और खिलाडियों के चेहरे बदले हैं बल्कि उनके मिज़ाज़ , तेवर , आक्रामकता , व्यावसायिकता और तदनुसार उपलब्धियों में भी जबरदस्त बदलाव आया है । । एक समय था जब राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय क्रीडा जगत में पहले हॉकी और उसके बाद क्रिकेट ने अपना जलवा और आधिपत्य बनाए रखा । हॉकी में जहां हॉकी के जादूगर ध्यानचंद , जिनकी स्मृति में ही , आज यानि 29अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में याद किया और मनाया जाता है , ने जहां वैश्विक प्रतियोगिताओं में रिकॉर्ड 400 से अधिक गोल दाग कर ओलंपिक खेलों सहित पूरे विश्व में भारतीय हॉकी का परचम लहरा दिया वहीं कपिल देव की अजेय क्रिकेट टीम ने 1983 में क्रिकेट विश्व कप जीत कर देश को क्रिकेट से जोड कर देशवासियों को एक नए जुनून की ओर मोड दिया बाद में इस विरासत को सचिन तेंदुलकर सरीखे युगों में पैदा होने वाले खिलाडी की अदभुत उपलब्धियों ने बुलंदियों पर पहुंचा दिया और भारतीय टीम दूसरी बार भी विश्व कप जीतने में सफ़ल रही । क्रिकेट के प्रति इस देश की दीवानगी तो जग-जाहिर रही है । स्थिति तो ऐसी बन गई कि क्रिकेट पर ये आरोप लगने लगे कि उसने अन्य खेलों के विकास/ प्रसार में बहुत बाधा डाली । 

अब स्थिति बहुत बदल रही है । आज देश में फ़ार्मूला वन रेस आयोजित किया जा रहा है तो दूसरी तरफ़ इंडियन बैडमिंटन लीग में भी लोगों ने खासी दिलचस्पी ली है । अपनी एकल उपलब्धियों के दम पर देश भर के खेल प्रेमियों का न सिर्फ़ अपनी तरफ़ बल्कि अलग अलग खेलों की तरफ़ भी ध्यान खींचने में भी पिछले कुछ वर्षों में देश के मेधावी खिलाडी सफ़ल रहे । अभिनव बिंद्रा , राज्यवर्धन सिंह राठौड , सुशील कुमार , विजेंद्र सिंह , डिंको सिंह , मैरी कॉम ,सानिया मिर्ज़ा ,सायना नेहवाल , पी वी सिंधु , सरीखे अनेक नामों ने इस बीच न सिर्फ़ राष्ट्रीय बल्कि वैश्विक खेल जगत में भी भारतीय धमक को गुंजायमान किया । 


इतना ही नहीं , टीम प्रतियोगिताओं में न सिर्फ़ पुरूषों की टीम बल्कि महिलाओं की टीमों ने भी जिस तरह से अपना खेल और प्रतिभा दिखाते हुए खेल समीक्षकों को आश्वर्यचकित करते हुए पूरे देश को गौरवान्वित किया है वो देश के खेल इतिहास में एक नया अध्याय जोडने की तैयारी जैसा है । एक के बाद एक मिल रही सफ़लताएं ये जता और बता रही हैं कि अब भारतीय खेल और खिलाडी भी उसी पेशेवराना रुख को अख्तियार करके मैदान में उतरने लगे हैं जिसका अभाव सालों से महसूस किया जा रहा था । 

हालांकि इस नए बदलाव की एक सुखद वजह ये भी रही है कि कभी खेल में कैरियर और जिंदगी देकर जीवन बर्बार करने जैसे नज़रिए को बदलने के लिए अब न सिर्फ़ सरकारें और संस्थाएं बल्कि औद्यौगिक घराने भी अपना धन और मन दे रहे हैं जिसका परिणाम नि:संदेह खेलों व खिलाडियों का बढता हौसला और उनका उठता जीवन स्तर है । आज खिलाडियों की हैसियत सही मायने में किसी स्टार की तरह है , उनके लाखों करोडों प्रशंसक हैं जो रात दिन उनकी हौसलाअफ़ज़ाई करते हैं , इसका प्रमाण है प्रशंसकों का वो हुज़ूम जो समय असमय भी अपने खिलाडियों के स्वागत में घंटों फ़ूल मालाएं लेकर हवाईअड्डों पर पलकें बिछाए उनका इंतज़ार करता है । 

आज राष्ट्रीय खेल दिवस पर ये महसूस होना सच में ही बहुत अच्छा लगता है कि अब देश में खेलों और खिलाडियों का भविष्य न सिर्फ़ बहुत उज्जवल बल्कि सुनहरा होगा ।

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

सच को दबाने और सूचना को छिपाने की नीयत




अभी कुछ समय पूर्व ही शिवसेना के संस्थापक राजनेता बाला साहब ठाकरे के निधन के बाद मुंबई में दो युवतियों को फ़ेसबुक पर टिप्पणी करने व उसे पसंद करने या प्रतिक्रिया देने की शिकायत होने पर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया । मामले के तूल पकडने व न्यायालय द्वारा उन्हें जमानत देते समय अदालत ने यह टिप्पणी की थी कि इस तरह के मामलों में गिरफ़्तारी से पहले अदालत से आदेश लिया जाना चाहिए । अभी कुछ दिनों पूर्व पुन: इस घटना की पुनरावृत्ति हुई जब उत्तर प्रदेश में एसडीएम दुर्गा शाक्ति नागपाल के निलंबन पर राज्य सरकार के विरूध आलोचनात्मक टिप्पणी करने के लिए पुलिस में दी गई एक तहरीर के आधार पर दलित चिंतक विचारक कंवल भारती को गिरफ़्तार करके बाद में जमानत पर छोड दिया गया ।

संयोगवश जब प्रदेश की राज्य सरकारें अभिव्यक्ति का दमन करने के लिए आतुर व अंसवेदनशील दिखाई दे रही हैं ठीक इसी समय केंद्र सरकार व पक्ष-विपक्ष में बैठी तमाम राजनीतिक पार्टियां कभी बडे जोशो-खरोश से जनता को दिए जाने वाले सूचना के अधिकार के दायरे से खुद को बाहर रखने के लिए संविधान में संशोधन की तैयारी में हैं । यदि दोनों घटनाओं को एक परिप्रेक्ष्य में एक पल के लिए देखा जाए तो ये स्पष्ट दिखता है कि शासक वर्ग न तो किसी सच को सामने आने देना चाहता है और न ही उस कुरूप व कडवे सच पर आम आदमी द्वारा अभिव्यक्त किसी आलोचना या प्रतिक्रिया को सहन करने को तैयार है ।

जहां तक आम आदमी द्वारा अभिव्यक्ति की स्वंतंत्रता के उपयोग में मर्यादा व सामाजिक कानून के उल्लंघन का सवाल है तो इसमें कोई संदेह नहीं कि मौजूदा समय में अंतर्जाल व सोशल नेटवर्किंग साइट्स की व्यापकता व निर्बाधता के कारण इसके दुरूपयोग की गुंजाइश बहुत बढ गई है और यदा कदा इसके उदाहरण सामने आते भी रहे हैं । यह भी एक सच है कि इन माध्यमों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के नाम पर , अपना विचार साझा करने के नाम पर और जाने किन किन अन्य बहानों से बाकायदा समूह बनाके कहीं द्वेष फ़ैलाने का काम किया जा रहा है तो कहीं किसी को अपमानित करने का , कहीं अफ़वाह फ़ैलाई जा रही है तो कहीं घृणा को बढावा दिया जा रहा है । इतना ही नहीं , देश के विख्यात राजनेताओं , अभिनेताओं ,खिलाडियों आदि द्वारा इन मंचों माध्यमों पर व्यक्त विचारों, प्रतिक्रियाओं को समाचार माध्यमों में सुर्खियों के रूप में देखा और दिखाया जा रहा है ।

सारांश ये कि इसका उजला और काला पक्ष दोनों ही समाज व सरकार के सामने है और शायद इसीलिए सरकार ने इसकी ताकत व प्रभाव का अंदाज़ा लगाते हुए इस दिशा में कानून का  निर्माण भी किया । किंतु आंकडे बताते हैं कि अन्य समकक्ष कानूनों की तरह इसके दुरूपयोग , खासकर शासक वर्ग शासित वर्ग के खिलाफ़ किए जाने की गुंजाईश बराबर बनी हुई है ।

आम आदमी , व्यवस्था के प्रति अपना क्रोध अपना गुस्सा अपनी प्रतिक्रिया अक्सर तब प्रतिकूल होकर देता है और जब वह पाता देखता है कि उसके सामने आया सच , उस सच से बिल्कुल अलग है जो प्रशासन और सरकार द्वारा उसके सामने परोसा जाता रहा है । और दोनों सच का असली सच यदि आज आम आदमी की पहुंच में आ सकता है तो वो संभव हो पाया है जन सूचना अधिकार २००५ के कारण ।

देश में उपलब्ध आंकडे बताते हैं कि आम आदमी ने इस अधिकार का उपयोग करते हुए सरकारी दफ़्तरों संस्थानों से अपने हित में छोटी छोटी सूचनाएं निकलवाकर अपने काम करवाए, जिन कार्यों के लिए उसे बहुत सारा पैसा व श्रम खर्च करने के बावजूद भी कुछ हासिल नहीं हो पाता था, वो काम करवाए बल्कि प्रधानमंत्री , व राष्ट्रपति तक से और उनके कार्यकाल उनकी नीतियों , फ़ैसलों और उनके पीछे की कार्यवाहियों , पत्र व्यवहार , प्रशासन की नोटिंग आदि तक की सूचनाएं भी बाहर निकाल कर जनता के सामने रख दीं । देश को साठ वर्षों के बाद एक स्कूली बालिका के सूचना मांगने पर पता चला कि सालों से पाठ्यक्रम तक में बच्चे जिन महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता के रूप में पढती जानती आई है और असल में भारत सरकार ने उन्हें राष्ट्रपिता का दर्ज़ा कभी आधिकारिक रूप से दिया ही नहीं । सरकार , प्रशासन व व्यवस्था द्वारा जितना छुपाया गया सच था इस कानून के माध्यम से उसकी परत दर परत उधेडने की मानो एक होड सी लग गई । सच को कुरेदने की ये मुहिम इतनी असरकारक साबित हुई कि बहुत बार इस ज़ोखिम में सूचना मांगने वाले को अपनी जान तक गंवानी पडी ।

आंकडों के अनुसार पिछले एक वर्ष में १६०९ व्यक्तियों पर सूचना के अधिकार के कारण हमला किया गया एवं ७८ व्यक्तियों को अपनी जान से हाथ धोना पडा । किंतु सरकार व राजनैतिक दलों को दिक्कत तब हुई जब मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने एक आदेश में कहा कि राजनैतिक दल सरकारी सहायता और टैक्स में छूट लेने के कारण जनप्राधिकारा हैं इसलिए वे अपने चंदे , चुनाव तथा नीतियों की जानकारी सार्वजनिक करें । जबकि इसके विरूध राजनीतिक दलों की दलील है कि निर्वाचन आयोग दलों को जनप्रनिधित्व एक्ट १९५१ के तहत पंजीकृत करता है और चुनाव के योग्य बनाता है महज़ इस लिहाज़ से दल जनप्राधिकार नहीं कहे जा सकते हैं ।

जो भी हो फ़िलहाल तो देश के सभी राजनीतिक दल सच को दबाने व सूचना को छिपाने की नीति पर एकमत होकर काम कर रहे हैं और जैसाकि संभावित है वे इस कानून की धार को कमज़ोर करने हेतु आवश्यक संशोधन भी कर लेंगे जो अंतत: लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए गलत साबित होगा ।

बुधवार, 7 अगस्त 2013

आज का मुद्दा .........



अभिव्यक्ति का दमन

अभी कुछ समय पूर्व बाला साहब ठाकरे के निधन के समय मुंबई में दो युवतियों को मुंबई पुलिस ने महज़ इसलिए गिरफ़्तार कर लिया था क्योंकि उन्होंने फ़ेसबुक में कोई प्रतिकूल टिप्पणी की थी । बाद में उन्हें अदालत द्वारा न सिर्फ़ छोड दिया गया बल्कि अदालत ने निर्देश भी दिए कि ऐसे मामलों में बिना अदालती आदेश के किसी की गिरफ़्तारी न की जाए । अब हाल ही में उ.प्रदेश के एक दलित चिंतक साहित्यकार को उत्तर प्रदेश पुलिस ने एक राजनेता द्वार दी गई तहरीर के आधार पर दर्ज़ प्राथमिकी में गिरफ़्तार करके पुन: उसकी पुनरावृत्ति की है । दोनों ही घटनाओं में दो अहम बातें सामने आ रही हैं । पहली ये कि लोकतंत्र की आत्मा अभिव्यक्ति है फ़िर चाहे वो सहमति हो या असहमति शायद इसी के मद्देनज़र ही संविधान में इसे एक मूल अधिकार के रूप में शामिल किया गया । दूसरी बात ये कि आज की सरकार , राजनेता व प्रशासन इतने ज्यादा संवेदनहीन हो चुके हैं कि जरा सी आलोचना ( ध्यान रहे अपमान नहीं ) भी उन्हें नागवार गुजरता है और वे दमन का सहारा ले रहे हैं ।


उत्तर प्रदेश के दलित चिंतक द्वारा दुर्गा शक्ति नागपाल निलंबन के मुद्दे पर अपनी असहमति जताते हुए आलोचनात्मक टिप्पणी भर कर देना क्या इतना बडा जुर्म हो गया सरकार व पुलिस की नज़र में कि उन्हें आनन फ़ानन में गिरफ़्तार कर लिया गया । सरकार और प्रशासन शायद ये भूल रही हैं कि यदि आम आदमी जो पहले ही सरकार की जनविरोधी नीतियों और भ्रष्ट आचरण से बुरी तरह क्षुब्द और आहत है यदि उसे अपनी नाराज़गी , अपना क्रोध , शब्दों और वाक्यों में भी कहने लिखने की आज़ादी नहीं होगी तो फ़िर वो समय दूर नहीं जब विश्व के अन्य देशों की तरह यहां भी लोग सडकों पर उतर अन्य हिंसक और वैकल्पिक तरीके तलाशेंगे । ये ठीक है कि संचार माध्यमों के विस्तार और अनियंत्रित स्वरूप के कारण बहुत कुछ ऐसा सामने लाया जा रहा है जो किसी भी स्वस्थ समाज के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता किंतु वैचारिक भिन्नता और असहमति को दबाने के लिए इस तरह झूठे  और आपराधिक मुकदमों के दम पर दमन का सहारा लेना खुद सियासत के  लिए आत्मघाती कदम साबित होगा ।




खाद्य सुरक्षा योजना

जैसी कि सरकार ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि मौजूदा मानसून सत्र में वो खाद्य सुरक्षा विधेयक लाएगी जो ये सुनिश्चित करेगा कि देश में किसी गरीब को  भूखा न रहना पडे । सुनने में तो ये योजना बेहद कल्याणकारी और बहुत ही जरूरी जान पडती है , मगर आम जन की निगाह में इस पर अभी से संदेह ज़ताने के कम से कम दो पुख्ता कारण तो जरूर मौजूद हैं । पहला तो ये कि ऐसी ही एक मह्त्वाकांक्षी योजना "स्कूलों में मिड डे मील" दिए जाने वाली योजना का संचालन किस गैर जिम्मेदाराना तरीके से किया जा रहा है ये बात अब किसी से छुपी नहीं है । हालात ऐसे बन गए हैं कि अब गरीब से गरीब अभिभावक भी अपने बच्चों को स्कूलों में खाना खाने से मना कर रहा है क्योंकि उसे उस खाने को खाने के बाद किसी अनिष्ठ की आशंका रहती है । दूसरी बात ये कि सरकार द्वारा समय समय गरीबों के लिए बनाई और लागू की जा रही ऐसी सैकडों योजनाओं के नाम पर करोडों अरबों रुपए के घपले घोटाले और हेराफ़ेरा किए जाने का संदेह , भी आम लोगों को इस योजना के प्रति उदासीन बना रहा है ।

इन सबसे अलग सरकार ने आगामी आम चुनावों से ठीक पहले का समय इसे लागू करने के लिए चुनकर रही सही कसर भी पूरी कर दी है । बेशक उद्देश्य में बहुत ही अच्छी लग रही और भविष्य में बेशक बहुत ही लाभदायक भी सिद्ध होने की संभावना के बावजूद भी फ़िलहाल ये सरकार का राजनीति से प्रेरित कदम माना जा रहा है मुख्य विपक्षी दलों समेत अन्य बहुत सारे राजनीतिक दलों द्वारा भी इसमें बहुत सारी बुनियादी कमियां बताई गई हैं जिसमें से एक सबसे अहम तो ये है कि इतनी बडी दीर्घकालीन योजना के लिए धन कहां से जुटाया जाएगा इस बात का कोई खुलासा भी नहीं किया गया है । जो भी हो , यदि सरकार न सिर्फ़ इस योजना बल्कि इस सहित पहले की तमाम ऐसी जन कल्याणकारी योजनाओं का समय समय खुद ही मूल्यांकन करे और उसकी सफ़लता और असफ़लता को देख कर भविष्य की योजनाओं की रूपरेखा बनाए तो स्थिति नि:संदेह कुछ और होगी ।

मंगलवार, 6 अगस्त 2013

बाहरी सतर्कता और अंदरूनी व्यर्थता


सतर्क रहने का समय
जैसी कि आशंका व्यक्त की जा रही थी कि वर्तमान मेम देश के राजनीतिक परिदृश्य के उथल पुथ को देखते हुए भारत के सभी पडोसी देश अपनी फ़ितरत के अनुसार देश की सीमा पर अपनी नापाक गतिवधियां बढाएंगे । पिछले कुछ महीनों से अति महात्वाकांक्षी और चिर धूर्त राष्ट्र चीन ने सीमा पर जैसी घुसपैठ व दु:साहस शुरू किया है उससे आश्चर्य हो न हो किंतु इतना तो जरूर है कि ये सरकार , सेना व सुरक्षा एजेंसियों के लिए सतर्क हो जाने का समय है ।भारत के दूसरे पडोसी देश पाकिस्तान ,जहां चुनाव के बाद नवाज शरीफ़ और ममनून हसन जैसे कम आक्रामक छवि वाले राजनीतिज्ञों द्वारा बागडोर संभालने से ये उम्मीद की जा रही थी कि शायद  स्थिति में कुछ बदलाव हो मगर घुसपैठ और फ़ायरिंग से हमारे पांच सैनिकों को गोली मारने जैसा कृत्य बता रहा है कि कहीं कुछ भी नहीं बदला है । गौर तलब है कि अगले महीने ही दोनों देशों के बीच शांति वार्ता भी प्रस्तावित है । भविष्य में देश में होने जा रहे आम चुनावों के मद्देनज़र अलगाववादी व आतंकी संगठन भी अपनी हरकतों को अंज़ाम देने की पुरज़ोर कोशिश करेंगे । ऐसे में ये बहुत जरूरी हो जाता है कि भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन सबका न सिर्फ़ दृढता से जवाब दे बल्कि सेना व सुरक्षा एजेंसियों को हाई अलर्ट पर रख दिया जाए । 


निर्रथक संसद सत्र 

संसद का मानसून सत्र शुरू हो चुका है और सरकार तथा विपक्षी दलों द्वारा बार-बार संसद को गंभीरतापूर्वक चलाए जाने की प्रतिबद्धता ज़ाहिर करने के बावजूद इस बार भी स्थिति बहुत बेहतर नहीं दिखाई दे रही है । ज्ञात हो कि सरकार ने पहले ही कहा था कि इस बार उसके आस अध्यादेश तथा चवालीस विधेयक विचार/बहस के लिए प्रस्तावित हैं किंतु तेलंगाना के मुद्दे पर जिस तरह से पहले ही दिन खुद कांग्रेसी सांसदों ने हंगामा करके संसद ठप्प कर दी वह बेहद अफ़सोसनाक बात है । हालांकि इस बार संसद के मानसून सत्र को तीन दिन अधिक चलाए जाने  की बात की जा रही है किंतु संसद की वर्तमान कार्यवाही और जनप्रतिनिधि , सांसादों के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार को देखते हुए आम जनता को यही लग रहा है कि निर्धारित दिनों के अलावा विस्तारित तीन दिन भी व्यर्थ ही जाएंगे। पिछले कुछ वर्षों में ये जानते हुए भी कि संसद सत्र के दौरान लाखों रुपए का व्यय अवाम की गाढी कमाई से जुटाए गए राजकोष से ही किया जाता है , जनप्रतिनिधियों का ऐसा रवैया न सिर्फ़ लोकतंत्र का अपमान है बल्कि राजकोष के धन के दुरूपयोग का नैतिक अपराध भी है । ये संचार का युग है और पूरा विश्व समूह आज भारत की ओर नज़र गडाए बैठा है ऐसे में इस तरह का आचरण देश व राष्ट्रीय\अंतराष्ट्रीय राजनीति के लिए आत्मघाती ही साबित होगा । 

शुक्रवार, 29 मार्च 2013

कानून, सज़ा , माफ़ी और मीडिया ....आज का मुद्दा

चित्र गूगल से साभार



यदि गौर से देखें तो पाएंगे कि पिछले दो तीन वर्षों में सबसे ज्यादा चर्चा कानून के इर्द गिर्द ही घूमती रही है । चाहे वो कानून व्यवस्था की गिरती स्थिति के कारण हो या फ़िर किसी प्रस्तावित कानून पर छिडी बहस और जनांदोलन , मुद्दा हाल ही में देश को सिहरा देने वाले अपराध के एक आरोपी की कम उम्र और उसके समकक्ष नाबालिगों द्वारा किए जा रहे अपराधों को लेकर कानून में मौजूद उम्र सीमा को बढाया जाना हो या फ़िर ताज़ा ताज़ा मामला जिसमें सरकार ने सहमति से यौन संबंधों के लिए न्यूनतम उम्र सीमा को घटाए जाने का प्रस्ताव रखा और आम जनों की प्रतिक्रिया के बाद उसे दोबारा अठारह वर्ष कर दिया ,इसके साथ ही बिल्कुल समांनांतर चर्चा में रही -सज़ा, कभी आतंकियों को फ़ांसी पर लटकाने का मामला तो अब सिने अभिनेता संजय दत्त को सुनाई गई सज़ा और इनके ठीक बराबर चलता हुआ मीडिया , कुल मिला कर यही देखा जा रहा है कि फ़िलहाल देश में चर्चा , बहस मुद्दा इन्हीं विषयों के आसपास घूम रहा है।


इस देश का इतिहास गवाह रहा है कि , पश्विमी देशों की तरह यहां कानून बनाने , सुधारने और लागू करने से पहले शायद ही कभी आम लोगों को इसका भागीदार बनाया गया हो , और भागीदारी तो दूर कभी ठीक से उन्हें कानून की जानकारी तक नहीं दी जाती है , और इसकी जरूरत भी महसूस नहीं की जाती , वजहें चाहे जो भी रहती हों । शायद बहुत समय बाद किसी प्रस्तावित कानून के विरोध में न सिर्फ़ तीव्र प्रतिक्रिया हुई बल्कि जनांदोलन तक उठ गया , मगर हमेशा की तरह सत्ता और सियासत ने फ़िर से अपनी बाजीगरी दिखाते हुए जनभावनाओं को सिरे से नकार कर उस बहस की गुंजाईश ही खत्म कर दी ।

इसी बीच राजधानी में हुए एक जघन्य बलात्कार कांड ने फ़िर से अवाम को आंदोलित कर दिया और वो फ़िर से सडकों पर उतर आई , इस बार इस मांग के साथ कि इस अपराध के लिए बरसों से चले आ रही दंड व्यवस्था में फ़ेरबदल किया जाए और न सिर्फ़ बलात्कार बल्कि महिलाओं/युवतियों संग छेडछाड और उन पर तेज़ाब तक फ़ेंकने जैसे जघन्य अपराधों के लिए कानून बदलने और सज़ा को सख्त किया जाए । ये कानून अब सरकार द्वारा लागू कर दिया गया है , इसके परिणाम और प्रभावों का आकलन करना अभी जल्दबाज़ी होगी । हां इस बीच एक और कानून जुवेनाइल जस्टिस एक्ट जो नाबालिग अपराधियों व उनकी सज़ा के निर्धारण के लिए बना था उसमें नाबालिग अपराधी की उम्र जो कि वर्तमान में अठारह वर्ष से कम मानी जाती है उस पर भी बहस उठ खडी हुई । कारण ये रहा कि इसी बलात्कार कांड में सबसे हिंसक व क्रूर कृत्य करने वाले अपराधी ने खुद को नाबालिग माने जाने की अर्ज़ी लगा दी । महिला सुरक्षा को लेकर गठित जस्टिस वर्मा आयोग ने भी सभी प्रदेश के पुलिस अधिकारियों द्वारा अनुशंसित उम्र सोलह वर्ष को दरकिनार करते हुए इसे अठारह वर्ष रखने पर ही अपनी मुहर लगा दी । अधीनस्थ न्यायालय ने मौजूदा साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को नाबालिग ही माना और अब मामला ऊंची अदालत के विचाराधीन है ।

इधर कानून और सज़ा पर बहस चल रही थी ,जिसे और हवा दे दे एक के बाद एक लगातार दो आतंकियों को अचानक ही और अप्रत्याशित रूप से फ़ांसी की सज़ा दे देना । राष्ट्रपति तक इस पूरे प्रकरण से इतने परेशान हो उठे कि उन्होंने अचानक ही उनके पास भेजी गई अन्य दया याचिकाओं पर फ़िलहाल विचार करने में असहमति जता दी । सूचना के अधिकार का उपयोग कर किसी ने ये जानकारी ले कर सामने ला दी कि पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के कार्यकाल के दौरान किन्हें माफ़ी दी गई । इधर ये माफ़ा माफ़ी के सिलसिले में अब ये एक नया मसला भी जुड गया जब आजकल अपने तीक्ष्ण बयानों के लिए चर्चित पूर्व न्यायमूर्ति काटजू ने मुंबई हमले में सर्वोच्च न्यायालय से सज़ा सुनाए गए अभिनेता संजय दत्त एवं एक सह आरोपी महिला जेबुन्निसा के लिए माफ़ी का पत्र लिखने की वकालत की ।
मीडिया , विशेषकर भारतीय मीडिया बेहद प्रतिक्रियात्मक व्यवहार करता है , बिना आगा पीछा सोचे , किसी भी घटना , दुर्घटना , अपराध , सज़ा , फ़ैसले और बयान पर रोज़ चौबीसों घंटे प्रसारित होते रहने की मजबूरी वाले समाचार चैनल , जाने किस किस तरह के कार्यक्रम /रिपोर्टें/विश्लेषण और बहस आदि जनता के सामने लाते रहे और ये सब अब भी बदस्तूर जारी है । वास्तव में देखा जाए तो सबको आरोप के कटघरे में खडे करने की आदत से लाचार समाचार तंत्र इतनी भी संवेदनशीलता नहीं दिखा पाते हैं कि कभी ठहर कर ये सोचें कि उनके द्वारा प्रस्तुत और जैसा वे उसे प्रस्तुत करते हैं उसका क्या कैसा प्रभाव जनमानस पर पडेगा या पडा ।

देश में अपराध बढ रहे हैं , कानून भी खूब बन रहे हैं , सज़ा और माफ़ी की बहस के बीच जितनी जगह है उसमें मीडिया के लिए इतना स्थान तो आराम से निकल जाता है कि वे मज़े में बैठ कर कभी एक पक्ष से कभी विरोध पक्ष से और कभी दोनों ही ओर से लगातार अपना बाज़ार बडा करते रहें , खबरों का बाज़ार ।




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