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शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

दुश्मनों आप सिर्फ़ हथियार दो , गद्दार तो मिल ही जाएंगे ...


किसी ने बहुत पहले कहा था कि भारत के दुश्मन बहुत ही किस्मत वाले हैं इन्हें सिर्फ़ हथियार ही देना होता है , गद्दार नहीं ढूंढने पडते , जिनके हाथों  में हथियार देकर देश को तोडने की साजिश रची जाती है । अभी हाल ही में फ़िर से एक बार माधुरी गुप्ता की गद्दारी के खुलासे ने यही बात सिद्ध कर दी । माधुरी जो भारतीय सुरक्षा से जुडी सर्वोच्च संस्था के साथ न सिर्फ़ जुडी हुई थीं बल्कि बहुत ही जिम्मेदार पद पर नियुक्त थीं । उन्होंने भारत की सुरक्षा व्यवस्था से जुडे बहुत से राज़ दुश्मन देश को बेच डाले । इसके बदले में उन्हें क्या कब कब मिलता रहा ये तो आने वाले समय में ही पता चल पाएगा । मगर एक बार फ़िर से इस घटना ने आम जनता के मन में बहुत से सवाल खडे कर दिए हैं ।


         आज भारत की जनता से करों के नाम पर उनकी मेहनत की कमाई का मोटा हिस्सा सरकार ले कर जिन अधिकारियों , कर्मचारियों की तनख्वाह पर खर्च करती है वो क्या सचमुच ही इसके हकदार हैं ? क्या जिनके हाथों में देश की सुरक्षा नीतियों के निर्माण के जिम्मेदारी सौंपी गई है वे इस लायक हैं कि पूरा देश उन पर भरोसा कर सके । रोज सीमा पर खडे हमारे जवान जो अपनी जान हथेली पर लिए दुश्मनों से जूझते हैं उनकी जान की कीमत ये गद्दार पहले ही नहीं लगाए बैठे हुए हैं , इस बात की गारंटी कौन देगा । आखिर किस कारण से इन्हें अफ़जल गुरू और अजमल कसाब जैसा और शायद उससे भी बडा दुशमन क्यों नहीं नहीं माना जाए । वे तो ऐसे दुशमन हैं जो खुले आम अपनी दुशमनी दिखा और निकाल रहे हैं , मगर ये जो इस देश की मिट्टी में पले बढे और इसी देश की सुरक्षा , उसका मान सम्मान और हजारों सुरक्षा कर्मियों का सौदा छुप छुप कर रहे हैं आखिर उनके साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए । कानून कहता है कि गद्दारी की सज़ा मौत हो सकती है । सही मायने में तो मौत से भी कुछ बदतर हो तो वो होनी चाहिए ।

अब समय आ गया है कि , आम जनता सब कुछ सरकार और प्रशासन , कानून व्यवस्था के भरोसे ही डाल कर चुप न बैठे । अब आम जनता को आगे आकर अपनी ताकत का एहसास कराना चाहिए । हर सही का पुरजोर समर्थन और हर गलत का भारी विरोध करना चाहिए । इसके लिए कोई जरूरी नहीं है कि जनता नेताओं द्वारा आयोजित , प्रायोजित रैलियों में जाए, हडताल और बंद का हिस्सा बने । नहीं इसकी कोई जरूरत भी नहीं है , आज बहुत से ऐसे माध्यम है जहां से आम आदमी की आवाज उनका मत हर उस व्यक्ति और व्यवस्था तक पहुंचाया जा सकता है जो अंधा और बहरा बना बैठा हुआ है । इसके साथ ही ऐसे सभी व्यक्तियों का उन प्रतिनिधियों का , उन संस्थाओं का भी सामाजिक बहिष्कार किया जाना चाहिए । ऐसे सभी व्यक्तियों के घर परिवार , सगे संबंधियों से सारे रिश्ते नाते तोड लिए जाने चाहिए ,यहां तक की उनके यहां सेवा देने वाले सभी सामाजिक सहयोगियों , नाई, माली धोबी, आदि को भी उनका बहिष्कार कर देना चाहिए । यकीनन ये सब बहुत ही मुश्किल है और शायद बहुत हद तक अप्रायोगिक भी , मगर यदि सिर्फ़ ये सोच कर अब भी चुप बैठे तमाशा देखते रहे कि सब कुछ सरकार और कानून व्यवस्था का ही काम है तो फ़िर थोडे थोडे अंतराल पर ऐसी माधुरियों की मधुर कथाओं को पढने देखने सुनने के लिए तैयार रहना होगा।

रविवार, 25 अप्रैल 2010

राजधानी में फ़िर गायब हो रहे हैं मासूम बच्चे







एक खबर के अनुसार राजधानी दिल्ली में प्रतिदिन औसतन १७ बच्चे गायब हो रहे हैं । मीडिया में आई एक रिपोर्ट में ये दावा किया गया है कि एक जून २००८ से लेकर १२ जनवरी तक राजधानी दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों से २२१० बच्चे लापता हो गए हैं , जिनका अभी तक कोई पता नहीं चल पाया है । इस मामले का खुलासा तब हुआ जब एक विचाराधीन मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली पुलिस को आदेश दे कर हलफ़नामा दायर करने को कहा कि जब राजधानी में इतनी बडी संख्या में प्रतिदिन बच्चों के गायब किए जाने की खबरें आ रही हैं तो ऐसे में दिल्ली पुलिस इस दिशा में क्या कर रही है ।


अब ये अंदाज़ा सहज़ ही लगाया जा सकता है कि , जब राजधानी दिल्ली का ये हाल है तो पूरे देश में स्थिति क्या होगी । ज्ञात हो कि ऐसा ही कुछ , पिछले कुछ वर्षों में भी हुआ था जब राजधानी से सटे गांव निठारी में भी एक के बाद एक कई बच्चों के गायब होने की खबरें सामने आईं और उसकी तह में जाने पर जो कुछ भी सामने निकला उसने न सिर्फ़ अपराध जगत को चौंका दिया बल्कि इंसानियत को भी शर्मसार कर दिया ॥जाने कितने ही मासूमों को अपनी जान से हाथ धोना पडा । ऐसे ही कुछ समय पहले राजधानी में एक गिरोह का पर्दाफ़ाश किया गया था जो मासूम बच्चों, गरीब मजदूरों और भिखारियों तक को अगवा करके ले जाता था , बाद में उनकी आंखें , किडनी और अन्य अंगों को निकाल कर उन्हें ऊंचे दामों पर बेच दिया जाता था । अब इन सारे तथ्यों के मद्देनज़र ये सहज़ ही अंदाज़ा हो जाता है कि बच्चों की इतनी बडी संख्या में गुमशुदगी किसी बहुत बडी साजिश के तहत ही हो रहा है ।




  इन आंकडों में तो सिर्फ़ वो संख्या शामिल है जो राजधानी में दर्ज़ की जा रही है , इसके अलावा सैकडों वो मासूम जो रोज अपने गांव घरों से भाग कर दिल्ली के अलग अलग बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर लावारिस की तरह आते हैं और अगले ही दिन जाने कहां गुम हो जाते हैं । दिल्ली पुलिस , प्रशासन , इस दिशा में कतई गंभीर नहीं दिखतीं और तो और दिल्ली में कार्यरत हजारों स्वयं सेवी संस्थाएं भी इस दिशा में कुछ करती नहीं दिखती हैं । इसमें एक बहुत बडा दोष अभिभावकों का भी है जो ये जानते बूझते कि आज के हालातों में बच्चों को ज्यादा सुरक्षा और सरंक्षण की जरूरत है , उन्हें अकेला छोडने की भूल करते हैं । यदि जल्दी ही स्थिति पर नियंत्रण नहीं किया गया तो हालात विस्फ़ोटक हो सकते हैं । किसी घर के चिराग का यूं असमय ही लुप्त हो जाना उस परिवार पर किसी कहर से कम नहीं होता और ये बात तो सिर्फ़ भुक्तभोगी परिवार ही बेहतर समझ सकते हैं । भविष्य में अदालत के दबाव में ही सही यदि दिल्ली पुलिस इस दिशा में कुछ करती है तो ये शायद कुछ राहतकारी हो । मीडिया को भी ऐसी घटनाओं को अपनी प्राथमिकता सूची में रखना चाहिए ॥

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

खेल के बहाने खेला जा रहा है बहुत बडा खेल




आईपीएल खेलों में जिस तरह के घपले घोटाले की आशंका और अनुमान ज़ाहिर किए जा रहे हैं , उससे इतना तो तय है कि बहुत कम समय में ही इतनी बडी लोकप्रियता पाने और खेल को दीवानेपन की हद तक पहुंचाने के पीछे जो लक्ष्य था वो कम से कम खेल भावना तो कतई नहीं थी । अब जबकि पहले शशि थरूर की महिला मित्र सुनंदा , के बाद ललित मोदी के खाते और खुद आईपीएल के बही खातों की जांच हो रही है तो ऐसा लग रहा है जैसे गांठ एक एक करके खुल रही है । इसी वर्ष देश में राष्ट्रमंडल खेल आयोजित किए जाने हैं । ये  ओलंपिक, एशियाड जैसा ही एक बडा खेल आयोजन है , जिसका आयोजक बनना किसी भी देश के लिए फ़ख्र की बात है । मगर जिस तरह से उसके आयोजन के लिए , सरकार देश की आम जनता पर तरह तरह के कर थोप रही है , आम रोज़ मर्रा की ज़रूरत की चीज़ों का दाम बढा कर उस मुनाफ़े से खेल आयोजन की राशि का जुगाड कर रही है उसने आम जनता के मन में ये प्रश्न उठा दिया है कि क्या अब खेल सचमुच सिर्फ़ खेल ही रह गए हैं । खेल का उद्देश्य क्या था , और क्या आज भी उसी उद्देश्य को लेकर , उसी खेल भावना को लेकर , सरकार ,समाज ,देश, और खिलाडी भी खेल को सिर्फ़ खेल समझ कर खेल रहे हैं । शायद नहीं ।

 पिछले कुछ समय में खेलों का चेहरा , उनका रुतबा  बहुत बढा है । आज खेल और उनके खिलाडी किसी सेलेब्रिटी से कम नहीं हैं । न सिर्फ़ प्रसिद्धि बल्कि , पैसा , ग्लैमर , और भी सब कुछ उनको उपलब्ध कराया जा रहा है । यदि एक मायने में देखें तो ये बहुत ही सकारात्मक पहलू है कि कम से कम इसी बहाने अब खेलों को व्यावसायिक रूप में बदला तो गया है । कम से कम इसी बहाने अब खेल में भी कैरियर बनाने को लेकर युवा गंभीर तो हुए ही हैं । मगर ये सिर्फ़ एक ही पक्ष है । अब जरा दूसरा पक्ष देखते हैं । सिर्फ़ क्रिकेट को छोड दिया जाए तो अन्य सभी खेलों में आज भी खिलाडी अपने अस्तित्व के लिए जूझते हुए ही दिखते हैं । और कई खेलों में तो खिलाडियों की हालत इतनी बदतर और दयनीय हो जाती है कि अक्सर वो अखबारों की सुर्खियां बनती है । और किसी दूसरे खेल का क्या कहें जब राष्ट्रीय खेल हाकी की ही हालत पतली है । जहां तक क्रिकेट की बात है तो बेशक भारत और एशियाई महाद्वीप में इसकी लोकप्रियता का डंका बज रहा हो मगर बदलते समय के साथ धीरे धीरे ये खेल भी अपने जेंटलमैन छवि से बाहर निकल कर कई बुराईयों का जनक तो , तो कईयों का वाहक बन गया । मैच फ़िक्सिंग , खेल में गाली गलौज की भाषा , खिलाडियों के चयन में जाने कैसी कैसी बातें , और अब टूर्नामेंट आयोजनों से करोडों अरबों की काली कमाई।

    सुना है कि खेलों की खोज का उद्देश्य था , खेल खेल में शारीरिक सौष्ठव , स्फ़ूर्ति , मनोरंजन, सहभागिता की भावना , प्रतिस्पर्धा को इंसान के अंदर विकसित करना । और यही कारण था कि कुशती, दंगल, कबड्डी, खोखो जैसे खेल हुआ करते थे । मगर कालांतर में आदमी ने अपने अन्वेषी चरित्र के अनुरूप न सिर्फ़ खेलों को खेलने बल्कि शायद मूल खेल भावना को ही बदल दिया । आज सबको खिलाडी इसलिए नहीं बनना है कि उसे अपने देश का प्रतिनिधित्व करना है या कि उस खेल  के प्रति उसका जुनून ऐसा करने को कह रहा है , हो सकता है कि इस बात का अपवाद भी हो , मगर आज सबको खेल में मिलने वाला पैसा, प्रसिद्धि और ग्लैमर ही चाहिए । इससे इतर सरकार खेलों को प्रोत्साहित करने और उससे भी ज्यादा इन खेल आयोजनों के नाम पर गरीब जनता से जो उगाही कर रही है वो बहुत ही शर्मनाक है । आखिर क्या वजह है कि क्रिकेट से आ रहा अथाह पैसा दूसरे खेलों के लिए नहीं उपयोग किया जा सकता ??

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

फ़ैशन शोज़ का औचित्य समझ से परे




ये युग फ़ैशन का युग है । आज तो हर बात में , या कहा जाए कि बेबात में भी फ़ैशन का ही बोलबाला है । आज खाना , फ़ास्ट फ़ूड खाना फ़ैशन है , पीना , अब इसके लिए क्या कहा जाए , ये तो फ़ैशन से ज्यादा अब एक आदत है , मोबाईल रखना नहीं नहीं मोबाईल बदलते रहना एक फ़ैशन है , बढिया स्कूल में बच्चों को पढाना एक फ़ैशन है, और पता नहीं क्या क्या फ़ैशन है । मुझे तो लगता है कि ये कहना चाहिए कि ये नहीं पता कि क्या फ़ैशन नहीं है ? मगर फ़िर इन सबके सिर पैर कहीं न कहीं तो लोगों के साथ जुड ही जाते हैं फ़ैशन के नाम पर या जरूरत के नाम पर , मगर जिस चीज़ के बारे में अब तक मन आशंकित और भ्रमित है वो इन दिनों आयोजित किए जाने वाले फ़ैशन शोज़ ।

    अब तो रोजाना ही इस तरह के फ़ैशन शोज़ , कभी शीत वस्त्रों का कलेक्शन , कभी ग्रीष्मकालीन , कभी वसंत का कलेक्शन , कभी फ़लाना जी का तो कभी ढिमकाना जी के वस्त्रों का कलेक्शन , आयोजित किए जा रहे हैं और ये कलेक्शन सालों भर चलते ही रहते हैं  । एक आम आदमी की नज़र से देखा जाए तो उसके लिए तो फ़ैशन की दुनिया अभी भी कोसों दूर है । मगर इन वस्त्रों की समझ ,खासकर जब इन्हें शोज़ में देखा और दिखाया जाता है , तो उसके परिप्रेक्ष्य में तो वो बिल्कुल ही नगण्य है । आम आदमी को तो यही लगता है कि जिन कपडों को पहन के वो मौडल महिला पुरूष , इतराते हुए ऐंठ ऐंठ कर चलते हैं और पूरा हौल बैठ कर जाने कौन सी शिल्पकारी देखता निहारता है , यदि वास्तव में असल जीवन में उन वस्त्रों को बिल्कुल ठीक वैसे ही धारण करके कोई सरे आम निकल आए तो निश्चित ही कुत्ते उसके पीछे पड जाएंगे , फ़िर चाहे वो उनके रंग रूप और उस विशेष साज सज्जा को देख कर खुद ही डर कर छिप जाएं ।

  इन फ़ैशन शोज़ में कभी प्रकृति को , कभी किसी और को थीम की तरह उपयोग किया जाता है या कि ऐसा बताया जाता है , तो असल में तो आम आदमी यही सोचता है कि ये जो जूडे में सैकडों नींबू खोंसे , या फ़िर कि हरी मिर्च की माला लपेटे उस कमसिन काया नारी और सौष्ठव पुरूष ने कभी शायद ही मिर्च नींबू की झाड असलियत में देखी हो । कैसी पर्यावरण थीम जी , सिर्फ़ हरे कपडे लपेट लेने से या सर पर तरबूज कद्दू के टुकडे काट कर लगा लेने से वो पर्यावरण के करीब लगने लगते हैं । इन फ़ैशन शोज़ के आधार पर शुरू किया गया एक टीवी चैनल तो उन वस्त्रों के प्रदर्शन के नाम पर नारियों को अधोवस्त्रों में इस कदर परोसने लगा , जो अश्लीलता की हदें भी पार करने लग गया । समझ ये नहीं आता था कि इनमें वस्त्रों की प्रदर्शनी हो रही है या वस्त्र नहीं पहना जा रहा है उस बात की । जो भी हो ये परिधानों के अजीबोगरीब फ़ैशन का गणित  फ़िलहाल तो आम जन की बुद्धिदानी में आने से रहा ॥

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

अपराध के बढते जाने का कारण है कानून के भय का खत्म होना ..



आज ही समाचार पत्रों में खबर पढने को मिली कि दिल्ली में बम विस्फ़ोट के आरोपियों के मुकदमे में बहुत जल्द ही फ़ैसला आने वाला है । इस खबर के संदर्भ में सबसे चौंकाने वाली बात सिर्फ़ ये लगी कि आरोपी के नाते रिश्तेदार पूरी तरह आश्वस्त दिख रहे थे और उनका कहना था कि आरोपियों को कुछ नहीं होगा । जी हां जिन बम धमाकों में सैकडों मासूमों की जान चली गई , जाने कितनी ही और जान माल की क्षति हुई , उसके आरोपियों को भी कुछ नहीं होगा । और उसे ही क्या , देश की सीने , मुंबई में सबके सामने दु:साहसिक हमला करने वाले अजमल कसाब , संसद तक घुस जा पहुंचे आतंकवादियों में से अफ़जल कुरैशी जैसे दुर्दांत आतंकवादियों , बडे बडे घोटाले घपले करने वाले लालू और मधु कोडा जैसे भ्रष्ट राजनीतिज्ञों , निठारी जैसा वीभत्स कांड करने वालों , उन जैसे अनगिनत अपराध करने वाले हजारों अपराधियों के मन में भी यही विश्वास है कि कुछ नहीं होगा । सच तो है आज उनका ये विश्वास ही ये बता रहा है कि उनके मन में भारतीय कानून और उससे मिलने वाली सज़ा के प्रति कितना भय है ।

         एक तो भारतीय कानून प्रक्रिया , यानि अदालती कार्यवाही इतनी जटिल सुस्त और लंबी है कि पहले तो निचले और प्राथमिक स्तर पर ही उन्हें अंजाम तक पहुंचाने में सालों लग जाते हैं । हद तो इसके बाद होती है जब अपीलों में निचली अदालत में लगे समय से भी दुगुना या तिगुना समय लगता है । और आम आदमी को तब सबसे ज्यादा कोफ़्त होता है जब सबकुछ होने के बावजूद जाने किन किन उपबंधों , उपायों और अन्य नियमों का बहाना बना कर अपराधियों को कठोर दंड नहीं दिया जाता है । इससे एक तरफ़ तो दिनों दिन अपराधियों का साहस बढता जा रहा है । दूसरी तरफ़ इन सबके पीडित लोगों , सैनिकों , ईमानदार सुरक्षाकर्मियों आदि के मनोबल पर सबसे प्रतिकूल प्रभाव पडता है । इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय जगत में भी भारत की छवि एक ऐसे दब्बू देश की बनती है जो सिर्फ़ गिदडभभकियां ही देता रहता है , असलियत में कुछ नहीं करता ।

थोडी देर के लिए ये माना जा सकता है कि आतंकवादियों के साथ निपटने में बहुत सी कूटनीतिक दिक्कतें पेश आती होंगी । मगर एक ऐसा व्यक्ति जो सबके सामने खुले आम लोगों पर गोलियां बरसा रहा है , एक व्यक्ति जो किसी चार पांच साल की बच्ची का बलात्कार करता है , एक व्यक्ति जो पूरी बेशर्मी से लाखों , गरीब आदिवासियों ,किसानों , मजदूरों का हक खा जाता है , उसे अपने अंजाम तक पहुंचाने में भी यदि सरकार और प्रशासन इतने ही विवश हैं तो फ़िर ये किस आधार पर दावा किया जा रहा है कि आज जो समस्या नक्सलवाद के रूप में उभर कर सामने आई है कल को वो किसी और रूप में देश के हर उस घर में जन्म लेगी जो इसका भुक्तभोगी होगा । अभी जो स्थिति है उसमें यही पता लगाना मुश्किल है कि शोषक अधिक हैं समाज में या वो अधिक हैं जिनका शोषण हो रहा है , मगर यकीनन देखने से तो यही लगता है कि मजलूमों की संख्या ही अधिक है । जिस दिन भी आम आदमी को ये लग गया कि अब समय आ गया कि कानून के भरोसे चुप नहीं बैठा जा सकता और वो जंगल के कानून को मानने लगे उस दिन स्थिति यकीनन विस्फ़ोटक होगी मगर अपराध में जरूर कमी आएगी । इसलिए सरकार को चाहिए कि न्याय व्यवस्था और कानूनी प्रक्रिया में जल्द से जल्द बदलाव लाएं ताकि कम से कम अपराधियों को महसूस तो हो कि कानून नाम की भी कोई चीज़  होती है ..वर्ना अभी तो सब यही कहते फ़िरते हैं ..कानून ....ये किस चिडिया का नाम है ॥

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

नक्सलवादियों ....मारो ....जरूर मारो .....



अभी हाल ही में दंतेवाडा में जो कुछ भी नक्सलवादियों ने हैवानियत का नंगा नाच करते हुए उससे कोई आश्चर्य नहीं हुआ । न ही सैनिकों के शहीद हो जाने का गम , सैनिक जीवन का अंत शहादत के चुंबन से हो तो उसकी मौत भी सार्थक हो जाती है । किंतु जब उन शहीदों की आत्मा बन के सोचा तो देखा कि वे जैसे कह रही थीं , चलो मौत मिली ये तो ठीक हुआ , लेकिन  इस वर्दी को पहनते समय तो यही सोचा था न कि जब भी ये वर्दी तन से लिपटी हुई और खून से नहाई हुई जमीन पर गिरेगी तो , दुशमन की गोली छाती को आर पार करेगी , मगर ये कहां गुमान था कि यूं अपने ही देश में कुछ लोग हथियार उठा कर हम पर ही इस तरह से घात लगा कर हमें मार डालेंगे । अब इस बात की लाख सफ़ाई दी जाए कि नक्सलवाद कोई एक दिन में नहीं पैदा हो गया या फ़िर ये कि उन्होंने भी मजबूर होकर ये कदम उठाया है आदि आदि जैसे सडे गले हुए तर्क अब गले से नहीं उतरते ।

मैं उन नक्सलवादियों से सिर्फ़ चंद सवालों के उत्तर चाहता हूं । जिन जवानों को आपने जाने किन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हैवानों की तरह मार दिया क्या वही लोग आपकी हालत के लिए जिम्मेदार थे ?? आज उन शहीदों के परिवारों में विधवा , अनाथों और बेसहारों को आप कौन सी दलील देकर ये समझा सकेंगे कि ये सब आपने अपनी कोई लडाई लडने के लिए की थी । उन बहादुर जवानों से देश के लिए लडते हुए दुश्मनों की गोली खाकर शहीद होने का गर्व भरी मौत को गले लगाने का हक आपने अपनी निहायत ही घटिया और कायर हरकत से छीन कर क्या हासिल कर लिया ?? यदि आप अपनी ताकत का ही एहसास कराना चाहते थे तो आमने सामने आकर लडते , फ़िर देखते , और दुनिया भी देखती कि कौन कितना वीर था । चलिए मान लिया कि आपको शायद यही एक रास्ता अब दिखाई सुनाई देता है तो फ़िर लीजीए न ये रास्ता तो और भी अच्छा है और आपके मनोनुकूल भी है ।

मारिए ..जरूर मारिए ..मगर हिम्मत है तो फ़िर उन्हें मारिए जो आपकी इस हालत के लिए जिम्मेदार हैं । उन नेताओं को मार डालो जिन्होंने तुम्हारे सपने बेच कर अपने लिए सुख सुविधा खरीदी है । जाओ मारो उन अधिकारियों को जो तुम्हारा हक खा गए । जाओ मारो उन्हें जो तुम्हारा निवाला छीन कर बैठे हैं ।क्यों हिम्मत नहीं है ...ये संभव नहीं लगता । क्यों भाई ..आखिर क्यों ..जब दूसरे देश से चंद लोग आकर मुंबई महानगर में आकर मौत का तांडव कर सकते हैं तो फ़िर तुम क्यों नहीं । जब कुछ आतंकवादी देश की संसद तक पहुंच जाते हैं तो तुम्हारी बंदूंकों की हद में ये नेता , भ्रष्ट अधिकारी , और वो तमाम लोग क्यों नहीं आते जो इसके लिए जिम्मेदार हैं । मगर नहीं शायद तुममें इसकी हिम्मत नहीं है ..या फ़िर जरूर ही वो बात वो मकसद नहीं है तुम्हारा जो दिखता है । देश के सैनिकों को अपने घर में कायरों की तरह छुप कर मारने से कुछ भी कभी भी हासिल होने वाला नहीं है । कभी अपने बिल से बाहर निकल के देखो फ़िर माने कि ...। चलो छोडो , अब समय आ गया है कि तुम्हारे साथ भी वही सलूक किया जाए जो समाज की गंदगी साफ़ करने के लिए अक्सर किया जाता है । और पूरी तरह से तुम्हें नेस्तनाबूत कर दिया जाए ॥

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

विश्व स्वास्थ्य दिवस और और एक बीमार देश

  

आज विश्व स्वास्थ्य दिवस है । पूरे विश्व में आज चिकित्सा जगत अपनी अब तक की उपलब्धियों और भविष्य में एड्स , हेपाटाईटिस , और इन जैसे रोगों के लिए किए जा रहे शोधों , इनके लिए औषधियों के निर्माण आदि पर विचार विमर्श कर रहा होगा । और इन सबसे दूर बैठा भारत अब भी पोलियो के लिए पल्स पोलियो ड्रौप्स पिलाने के लिए बार बार प्रचार के सहारे लोगों की मान मनौव्वल में लगा हुआ जूझ रहा है । और वो भी उस स्थिति में जब आए दिन कोई न कोई इस बात की घोषणा कर जाता है कि बहुत जल्द भारत देश के कुछ अग्रणी देशों में शामिल हो जाएगा । 

    यदि भारत में चिकित्सा क्षेत्र में सफ़लताओं की बात करें तो जो देश आज हौस्पिटल टूरिज़्म की बातें कहता और समझता हो , जाहिर सी बात है कि उसका स्तर , कितना आगे पहुंच चुका है । आज दुनिया का शायद ही कोई ऐसा देश हो जहां भारतीय चिकित्सक अपनी काबलियत का लोहा न मनवा रहे हों । भारत भी अब चेचक, हैजा, एक हद तक पोलियो भी जैसी पुरानी बीमारियों से लगभग निजात पा ही चुका है । गली गली में बडे बडे नर्सिंग होम और अस्पताल खुले हुए है जो अत्याधुनिक चिकित्सा उपकरणों और काबिल डाक्टरों से लैस हैं । आज कोई भी ऐसी चिकित्सा पद्धति और औषधि नहीं है जो भारत में न उपलब्ध हो । औषधि निर्माण के लिए भी निरंतर शोध कार्य चलते रहते हैं । किसी भी विकासशील देश के लिए ये गर्व का विषय हो सकता है । किंतु ये मुद्दे का सिर्फ़ एक ही पहलू है । 

  आज भी बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं से देश का लगभग सारा क्षेत्र ही अछूता है । अच्छे अस्पताल और चिकित्सा व्यवस्था तो दूर अब भी ग्रामीण क्षेत्रों में डाक्टरों की बहुत कमी है । हालात इतने बदतर हैं कि कई बार सरकार ने ये योजना तक बनाई है कि सभी डाक्टर्स को कुछ समय तक अनिवार्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देनी होगी । गांव तो गांव शहरों में भी जो अच्छी चिकित्सा सुविधा है वो आज इतनी महंगी हो चुकी है कि एक आम आदमी के लिए उसका वहन उठाना मुमकिन नहीं है । और ऐसा इसलिए है क्योंकि कभी समाजसेवा का सच्चा स्वरूप मानी जाने वाली चिकित्सा व्यवस्था आज विशुद्ध व्यवसाय बन चुकी है । सिर्फ़ और  सिर्फ़ पैसा कमाने के जुगत में लगे हुए हैं सब । इसीका परिणाम है कि आज देश में डाक्टरों की संख्या से तीन गुना ज्यादा संख्या में झोला छाप डाक्टरों के भरोसे ही गरीबों का ईलाज हो पा रहा है । इस स्थिति को और भी बदतर बनाने में भरपूर सहयोग दे रही हैं नकली दवाईयां । आंकडों की मानें तो आज बाजार में उपलब्ध दवाईयों में से लगभग २७ प्रतिशत दवाईयां नकली हैं । आज सवा अरब की जनसंख्या पार कर चुके देश में पचास साठ बरस के बाद यदि सरकार को याद आता है कि अखिल भारतीय चिकित्सा संस्थान और अस्पतला ,एम्स , जैसी संस्था और भी होनी चाहिए और वो घोषणा भी करती है ( हालांकि लगता तो ये है कि वो घोषणा भी महज कोरी घोषणा ही बन कर रह गई ) कि देश भर में उस तरह की और भी संस्थाएं खोली जाएंगी , तो वो भी कितनी महज़ छ: । 

 अभी देश की चिकित्सा व्यवस्था खुद ही इतनी बीमार है कि उसे आमूल चूल परिवर्तन की जरूरत है , अन्यथा विश्व स्वास्थ्य दिवस जैसे दिवसों को मनाने का कोई औचित्य नहीं है ॥

रविवार, 4 अप्रैल 2010

बदलाव आते नहीं है , लाए जाते हैं ........





आज जो भी परिस्थियां हैं , जैसा भी सडा गला माहौल बन चुका है , जो भी अनैतिक, अवैध, हो रहा है , जिस भी तरह के अपराध किए जा रहे हैं , और जिस तरह की घटनाएं घट रही हैं उससे सब कह रहे हैं कि , बस अब तो ये सूरत बदलनी ही चाहिए , बहुत हुआ अब सहा नहीं जाता ।इस बारे में जब सोचता हूं तो दो बातें एकदम स्पष्त समझ में आती हैं । पहली ये कि ये सब हम सबका ही किया धरा है । हममें से कोई भी इससे अछूता नहीं है , मेरे कहने का मतलब ये है कि आज यदि हम पुलिस पर उंगली उठाते हैं ,शिक्षकों पर प्रश्न उठाते हैं , कहते हैं कि डाक्टर ,इंजिनीयर ,कोई भी ठीक से अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहे हैं । जबकि हमें ये बहुत अच्छी तरह से पता है कि ये पुलिस , अधिकारी , कर्मचारी, डाक्टर , शिक्षक भी तो हमारे आपके बीच रह रहे परिवारों के ही हैं इसी समाज से ही तो हैं ,कहीं किसी दूसरे ग्रह से आए हुए प्राणी थोडी हैं । दूसरी अहम बात ये कि ये बात हम सब जानते समझते हैं कि स्थिति बदतर होती जा रही है ...जी हां सब ..........फ़िर भी हालात बदलने का नाम नहीं ले रहे । कारण स्पष्ट है बिल्कुल ...बदलाव कभी भी आते नहीं ..उन्हें जबरन लाया जाता है । 


   आखिर क्यों हम सब इस सडी गली भ्रष्ट हो चुकी व्यवस्था की धज्जियां उडाने के लिए तत्पर नहीं हो रहे हैं ।क्या अब वो समय नहीं आ गया है जब झूठे मक्कर नेता , आपके पास वोट मांगने पहुंचे और गरीब लोग उसे घसीट कर लिटा लिटा कर लात जूतों से उसकी सेवा करें । क्या अब वो समय नहीं आ गया है जब किसी सरकारी कार्यालय में , टेलीफ़ोन , बिजली के दफ़्तर में , सरकारी अस्पतालों में , बैंकों में ..और बांकी सब जगहों पर भी ..कोई हाथ बढा के कहे कि फ़ाईलों में पहिए तो लगाईये..... और एक तेज़ आवाज़ आए चटाक ....उसकी गूंज से सिर्फ़ उसके कानों में सांय सांय होने के साथ ही बांकियों के कान भी लाल हो उठें । क्या आपको नहीं लगता कि अब समय आ गया है कि बलात्कार जैसे घृणित अपराध करने वाले हैवानों को सरे आम कुत्ते की तरह पीट पीट कर मार डाला जाए । मैं जानता हूं कि बहुत से लोग शायद इसे ठीक न समझें , मगर मैं बता दूं कि ऐसा हो रहा है और इसकी शुरूआत तो हो चुकी है , हां अभी ये आंच जरा धीमी है । शायद आपको मालूम होगा कि अभी कुछ वर्षों पहले ही कुछ महिलाओं ने एक बलात्कारी को झाडू से पीट पीट कर मार डाला था वो भी अदालत परिसर में ही । बात फ़िर उठेगी कि ये तो शायद कानून को हाथ में लेने जैसी बात हो गई जो ठीक नहीं है । अजी कौन सा कानून , कैसा कानून ..जाईये तो सही एक आम आदमी बन कर कोई छोटी सी रिपोर्ट लिखाने थाने , थोडी देर बाद ही वही मन करेगा जो मैंने कहा है । अरे थाने छोडिए अस्पताल, लाईसेंस अथौरिटी , स्कूल ..कहीं भी जाईये ..बस शर्त ये कि एक आम आदमी की तरह ..यकीनन वही सब होगा कि उसके बाद मन में सिर्फ़ यही एक बात उठेगी ..कि अब बस ॥


    मगर इस मुद्दे के साथ जुडी मेरे एक अलग और सबसे महत्वपूर्ण चिंता ये है कि , आखिर ये करेगा   कौन ?उस गाने के बोल याद हैं आपको .........


 आज इस पापी को देंगे सजा मिल कर हम सब सारे ,
 लेकिन जो खुद पापी न हो वो पहला पत्थर मारे ॥


अब उस पहले पत्थर उठाने वाले को कहां से लाया जाए । मगर नहीं आप और हम मिल कर ढूढेंगे तो वो भी आपके हमारे बीच मिल ही जाएंगे । मगर यहां ये ध्यान रहे कि , उस पत्थर उठाने वालों कि गिनती , उस पत्थर खाने वालों की गिनती से बहुत कम होगी इसलिए जरूरी है कि उनका हौसला न टूटे ।एक बात और यदि पत्थर उठाने वाले हाथ शक्तिशाली पदों पर हों तो फ़िर उसकी चोट बहुत जल्द ही असरकारक साबित होगी । मगर सवाल ये भी तो बहुत बडा है न कि क्या उस पत्थर को खाने के लिए समाज तैयार है ? हम आप तैयार हैं ? यदि नहीं तो फ़िर इस स्थिति से उकता कर बदलाव की बात करना बेमानी है । मगर मुझे यकीन है कि कभी न कभी ये समय तो आएगा ही ...या शायद आ ही चुका है ।..
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