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शनिवार, 26 मार्च 2011

आंदोलन और परिवहन व्यवस्थाएं ....आज का मुद्दा



देखिए और बताईये कि इनमें से किसे आरक्षण का लाभ मिलेगा




पिछले लगभग एक पखवाडे से जाटों ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग को लेकर एक बार फ़िर से छेडे गए आंदोलोन में रेल परिवहन व्यवस्था को अपना निशाना बनाया हुआ है । उत्तर भारत की रेल परिचालन व्यवस्था को पिछले पंद्रह दिनों में जितना अव्यवस्थित इस आंदोलन ने किया है उतना तो किसी आपदा या दुर्घटना ने भी नहीं किया होगा । हर बार की तरह थक हारकर जब न्यायपालिका ने सख्त रुख अपनाया और सरकार को इसे दुरूस्त करने के लिए बुरी तरह लताड लगाई है तो स्थिति में कुछ सुधार दिखाई दिया है । लेकिन जिस तरह से उन्होंने आगे सडकों पर आने की और इसके बाद पानी रोक देने की धमकी दी है उससे तो ऐसा लग रहा है जैसे युद्ध के दिनों में दुश्मन मुल्क कोई चाल चलता है । वैसे इससे पहले जब जाटों ने आरक्षण आंदोलन किया था तब उसने दिल्ली , पंजाब , राजस्थान आदि की परिवहन व्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित किया था ।  और ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ़ जाट आंदोलन में इस तरह रेल बस को निशाना बनाया गया है । अब तो रैली से लेकर किसी बंद , हडताल और आंदोलन तक में सबका निशाना यातायात के साधन और परिवहन व्यवस्थाएं ही बनती हैं । इससे अलग जब भीड हिंसक रूप ले लेती है तब करोडों रुपए कि सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान होता है सो अलग ।

सबसे बडा सवाल ये है कि आखिर हर बार इन्हें ही क्यों निशाना बनाया जाता है ? क्या यही एकमात्र विकल्प बचा हुआ है आज जनआंदोलनों के पास जिसे अपनाकर वे समाज और सरकार का ध्यान अपनी ओर खींच पाते हैं ? या फ़िर धीरे धीरे बढती ये खतरनाक प्रवृत्ति अब एक ऐसे चलन को जन्म दे चुकी है कि आम लोगों को अपनी शिकायत सार्वजनिक रूप से उठाने के लिए , अपनी समस्या को सरकार और प्रशासन को दिखाने सुनाने के लिए भी सबसे आसान और कारगर उपाय सडकों पर उतरना ही लगता है । इसके अलावा  राजनीतिक दलों द्वारा भी सडक , और रेल यातायात माध्यमों को जिस तरह अपनी शक्ति , विरोध और समर्थन के प्रदर्शनों , रैलियों , जाम , बंदी आदि के लिए जिस तरह से निशाना बनाया जा रहा है वो किसी भी सूरत में एक लोकतांत्रिक राज्य के लिए अच्छी बात नहीं है । सबसे ज्यादा हैरानी की बात ये है कि इन तथाकथित आंदोलनो में शिरकत करने वाला जनसमूह जहां बहुत बार उन मुद्दों और समस्याओं से भी अनजान रहता है वहीं दूसरी तरफ़ इस बात के प्रति भी संवेदनहीन होता है कि उनके इन आंदोलनों से बहुत से यात्रियों को कई बार अपनी या किसी अपने की जान गंवा कर इसकी कीमत चुकानी पड जाती है । बहुत बार इन जाम और बंद हडताल के चक्कर में फ़ंस कर किसी बीमार के दम तोड देने या ज्यादा गंभीर हो जाने की खबर सुनने देखने को मिल जाती है ।


जनसमूह की ऐसी प्रतिक्रियाओं के समय सरकार और प्रशासन जो किंकर्तव्यविमूढ और उदासीन भूमिका निभाते हैं वो आम जनमानस को और अधिक चुभता है । इन दिनों रोजाना लगभग डेढ से दो सौ ट्रेनों के परिचालन पर बुरा असर पडा है और बहुत सी ट्रेनों को प्रतिदिन रद्द किया जा रहा है । आखिर प्रशासन पिछले पंद्रह दिनों से और ऐसे आंदोलनों के बढने से पहले ही समय पर क्यों नहीं चेतती और स्थिति पर नियंत्रण करने का प्रयास क्यों नहीं करती ।इसकी भी एक पुख्ता सी वजह ये लगती है कि रास्ते पर खडे और और चलने चलाने वाले इन आंदोलनों के शिकार बनने वाले लोग आम जनता में से ही एक होते हैं । ऊपर का तबका तो हवाई यात्राओं और इससे अलग विकल्पों का सहारा लेकर साफ़ बच निकलता है । जहां तक इन आंदोलनों मे उठाए गए मुद्दों की बात है तो सबसे ज्यादा दुख की बात ये है कि कभी अशिक्षा , कुपोषण , रोजगार , भ्रष्टाचार , अपराध जैसे शाश्वत मुद्दों के विरोध में कभी ऐसे जनआंदोलनों को बढते नहीं देखा गया है । भारतीय जनमानस को अब ये देखना और महसूस करना होगा कि सडक पर जनता के उतर जाने की ताकत यदि मिस्र की जनता की तरह ब्रह्मास्त्र के रूप में और देश का भविष्य तय करने के लिए ही उपयोग में लाई जाए तो सार्थक साबित होगी । अब जनादोंलनों को ये भी सोचना होगा कि आज जब दुनिया विचारों की लडाई से ही सरकारों को नीतियां बनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं तो फ़िर ऐसे में यूं सडकों पटरियों पर लेट कर बैठ कर देश ,विश्व को कौन सा संदेश देना चाह रहा है और कैसा संदेश जा रहा है ? यही सोचने का समय है
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