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गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

भ्रष्टाचार पर मारिए मुक्का .........आज का मुद्दा






आज भ्रष्टाचार अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच चुका है इसलिए जैसा कि कहा गया है कि जब पाप का घडा जब भर जाता है तो उसका चटकना तय हो जाता है । आज हर तरफ़ एक ही मुद्दा बहस का मुद्दा है , सबके सामने एक ही लडाई है । भ्रष्टाचारियों के सामने अपना दामन बचाने की चुनौती है तो दूसरे पाले में खडे लोगों के सामने भ्रष्टाचार की बखिया उधेडने की धुन । आज चाहे इसके लिए तात्कालिक रूप से अन्ना हज़ारे के जनांदोलन ने एक उत्प्रेरक का काम किया है और अब सभी बनने वाले जन लोकपाल विधेयक को भ्रष्टाचार के विरुद्ध इस्तेमाल किए जाने वाले डंडे की तरह देख रहे हैं लेकिन इसके बावजूद भी अगर ये न होता तो कोई और कारण सामने आ जाता । बेशक इसमें कोई शक नहीं कि भारत में भ्रष्टाचार ने उस वटवृक्ष का रूप ले लिया है जिसकी न जड का पता चलता है न ही शाखाओं का , और सब के सब ..हां सब के सब कमोबेश इसमें शामिल हैं या जबरन करवाए जा रहे हैं । लेकिन कुछ लोग अब भी चट्टान की तरह खडे हो जाते हैं इस पूरी व्यवस्था के खिलाफ़ , भ्रष्टाचार के जंगल में मशाल जलाए उसे फ़ूंक डालने के लिए । आम आदमी भी अन्ना के जनादोलन के बाद ये सोचने पर मजबूर हो गया है कि अब वो इस लडाई में कब तक निष्क्रिय की भूमिका में रहेगा । आम लोगों के सामने सबसे बडी दुविधा यही आ रही है कि आखिर वो ऐसा क्या करें कि भ्रष्टाचार उन्मूलन की इस लडाई में उनका योगदान तय हो सके । हालांकि ये लडाई बहुत ही बडी और विस्तृत है लेकिन फ़िर भी छोटे छोटे प्रयासों से इस लडाई की धार को तेज़ किया जा सकता है ।

सूचना के अधिकार के उपयोग को प्रोत्साहन :- वैसे तो इस हथियार का उपयोग करके आजकल एक आम आदमी भी सरकार , प्रशासन , पुलिस के हलक में हाथ डाल के ऐसी ऐसी जानकारियां सामने ला रहा है कि सरकार और उसके भ्रष्ट नुमाईंदों को दस्त और पेचिश लगी हुई है । लेकिन अभी भी न तो इस अधिकार का व्यापक उपयोग किया जा रहा है और दूसरी बात ये है कि अब भी लोग इसका ज्यादा उपयोग निजि हित की सूचनाओं के लिए कर रहे हैं ( वैसे इन सूचनाओं के बहाने भी जानकारियां जो निकल रही हैं उनमें भी कहीं कहीं जनहित जुड ही जाता है ) , लेकिन यदि हर सरकारी कार्यालय , दफ़्तर , संस्थान में सूचना के अधिकार के तरह आवेदनों की बाढ लगा देनी चाहिए । वो एक एक चीज़ बाहर आनी चाहिए जिस पर न तो अब तक किसी की नज़र पडी है और न ही पडने दी गई है ।  उन कुर्सियों के एक एक पाए के खडे होने तक की जानकारी मांग लेनी चाहिए आम जनता को जिस पर बैठ कर और टांगे फ़ैला कर आज कर्मचारी , उद्योगपति , सभी भ्रष्टाचार की गंगा बहा रहे हैं । ये ज्यादा मुश्किल भी नहीं है और बहुत ज्यादा आर्थिक बोझ डालने वाला भी नहीं है । हालांकि इस दिशा में बहुत से स्वयं सेवी संस्थाएं और कार्यकर्ता सक्रिय हैं लेकिन वे नाकाफ़ी हैं । इस प्रवाह को प्रहार का शक्ल दीजीए और कोहराम मचा दीजीए ....। इतना कि सरकारी दफ़्तर में बैठे हर बेइमान नुमाइंदे के सर पे ये एक तलवार की तरह लटके ।


कैमरों /वीडियोग्राफ़ी के चलन को अनिवार्य किया जाए :- अभी कुछ समय पहले जब कुछ समाचार चैनलों ने स्टिंग ऑपरेशन करके बडे बडे सरकारी अधिकारियों , भ्रष्ट कर्मचारियों की काली करतूत को सरेआम लोगों के सामने रखा था तो उस मुहिम ने भी गजब का समा बांधा था । ये अलग बात है कि स्टिंग ऑपरेशन में पकडे और घूस लेते देते दिखाए गए उन तमाम अधिकारियों का क्या हुआ , उन्हें कोई सज़ा भी मिली या नहीं इसकी सुध नहीं ली गई , लेकिन इसके बावजूद ये बात उस प्रक्रिया में सामने तो जरूर आई कि भ्रष्टाचार को अगर नंगा किया जाए तो शायद थोडा सा डर उनमें तो जरूर बैठ जाता है जो नंगे होने से बचे होते हैं । हर दफ़्तर , महकमे , संस्थान में कुछ खास स्थान , कुछ खास सीटें ही वो होती हैं जिनपर घूस लेने देने , सारे अविधिक काम किए कराए जाने की गुंजाईश ज्यादा होती है तो फ़िर उस चप्पे चप्पे को कैमरे की नज़र में ले आना चाहिए और उसका प्रसारण सीधे जनता के हद में होना चाहिए । हालांकि ये बहुत ही खर्चीला उपाय है और जो सरकार संसद तक की कार्यवाही को जस का तस सिर्फ़ इस वजह से नहीं दिखाती क्योंकि उसे डर है कि जनता जब खुद अपने द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों की हरकतें , उनका आचरण , उनका व्यवहार और उनकी भाषा देखेगी तो अगले चुनाव में वे जनता के सामने जाकर उनसे आंख भी नहीं मिला सकेंगे । लेकिन ऐसा प्रयास तो किया ही जा सकता है कि कुछ बहुत ही भ्रष्ट और दलालखोरी का अड्डा बन चुके कार्यालयों , जैसे अदालत , राशन , पासपोर्ट, लाईसेंस आदि के दफ़्तर आदि को पूरी तरह निगेहबानी की जद में लाया जाए ।


विभीषणों को प्रोत्साहन :- कहते हैं कि रावण के वध के लिए विभीषण का राम की सेना के साथ आ मिलना बहुत ही जरूरी था और आज भ्रष्टाचार भी रावण का ही रूप ले चुका है तो इसलिए अगर भीतर ढके छुपे रावण को बाहर लाना है तो हर संस्थान में छुपे विभीषणों को किसी भी तरह से चाहे लालच से , चाहे उकसा कर , डरा कर , या किसी भी तरह से एक बार इस बात के लिए तैयार कर लिया जाए कि वे अंदर चल रहे सारे गोलमाल की खबर बाहर निकालें तो फ़िर जनता का बहुत सारा काम आसान हो जाएगा । ये ठीक उस तरह का उपाय है जैसा कि पुलिस किसी बडे अपराधी को सज़ा दिलवाने के लिए उसी के किसी साथी को सरकारी गवाह के रूप में तोड कर उसी अपराधी के खिलाफ़ इस्तेमाल करती है । इन विभीषणों ने ही आज विकिलीक्ज़ को इतनी ताकत देदी कि वो विश्व के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका तक के लिए चिंता का सबब बन गया । इस काम के लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लडने वाली संस्थाओं , उसके खिलाफ़ सबूत जुटाने वाले पत्रकारों , को उन विभीषणों की तलाश करके उनसे मिली जानकारी का उपयोग बडे घपले घोटालों , बेइमानों के सूत्र को पकडने के करना चाहिए ।

शिकायत /मनाही के आचरण को बढावा देना :- आज भ्रष्टाचार अगर सुरसा की तरह बन बढ गई है तो उसका एक सबसे अहम कारण ये है कि , आम लोग लडने की ,मना करने की , जूझने की आदत को लगभग तिलांजलि दे चुके हैं , सबको बस आसानी से अपना काम करवाना है , वो भी जितनी जल्दी से जल्दी हो जाए । आंकडे बताते हैं कि भारत में लगभग साठ प्रतिशत आम लोग जायज़ काम को करवाने के लिए भी रिश्वत सिर्फ़ इसलिए देते हैं क्योंकि वे इंतज़ार नहीं कर सकते । भारत की जनसंख्या अधिक होने के कारण आज हर जगह आदमी कतार मे नज़र आता है , दुकान से लेकर दफ़्तर तक , बस रेल , सडक , स्कूल , सिनेमा , हर जगह कतारें ही कतारें तो अगर सचमुच ही भ्रष्टाचार को समाप्त करना है तो फ़िर आम आदमी को भी कतार में लगने और अपनी बारी आने की प्रतीक्षा करने की आदत डालनी होगी ।


तकनीक के उपयोग को बढावा :- पश्चिमी देशों ने भ्रष्टाचार से लडने के लिए जिस एक तंत्र को प्रभावी रूप से अपनाया वो था तकनीक का उपयोग । पश्चिमी देशों ने सूचना , संचार ,कंप्यूटर प्रणाली के सहारे एक एक जानकारी , एक एक सुविधाओं , सूचनाओं को तकनीक से जोड कर सब कुछ जनता के सामने पारदर्शी कर दिया । इसका परिणाम ये हुआ कि कोई चाहकर भी न तो उसमें कोई हेरफ़ेर कर सकता था न ही उन्हें कमाई का ज़रिया बना सकता था । भारत में भी इसकी शुरूआत हो तो चुकी है किंतु अपेक्षित रफ़्तार से नहीं है और उससे बडी बात ये कि अधिकांशत: वे सब आऊटडेटेड होने के कारण भ्रष्टाचार की गुंजाईश छोडती सी लगती हैं , उदाहरण के भारतीय रेल का कंप्यूटरीकण होने के बावजूद रेल आरक्षण में होने वाला हेरफ़ेर । जबकि अदालतों , बैंकों , और बहुत से अन्य कार्यालयों में हो रही कंप्यूटरीकरण की प्रकिया ने कुछ क्षेत्रों में भ्रष्टाचार की गुंजाईश को कम करना शुरू कर दिया है । सरकार द्वारा आमंत्रित की जाने वाली निविदाओं (टेंडरों) , प्रति योजना के आय और व्यय का ब्यौरा , सरकार द्वारा खर्च की जा रही राशि का पूरा ब्यौरा यदि सब कुछ यदि इंटरनेट पर डाला जाए और आम जनता की पहुंच में ला दिया जाए तो निश्चित तौर पर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सकता है ।

इसके अलावा आम आदमी , पत्र द्वारा , लेख द्वारा , संगठनों द्वारा और स्वयं सेवी संस्थाओं के सहारे इस लडाई आगे बढा सकते हैं । सबसे जरूरी बात है भ्रष्टाचार को पूरी तरह उखाड फ़ेंकने के लिए माहौल और मानसिकता को बरकरार रखना ।

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

बदलनी होगी राजनीति से परहेज़ की प्रवृत्ति .........आज का मुद्दा






अन्ना हज़ारे के जनाओंदोलन में लोकतंत्र में मतदान के महत्व पर चर्चा चली और लोकतंत्र की मजबूती के लिए आम लोगो के शत प्रतिशत मतदान की बात उछाली गई तो आम लोगों ने एक दिलच्स्प मगर गंभीर प्रश्न उठाया । यदि चुनाव में दर प्रत्याशी खडे हैं और आम आदमी की नज़र में दसों प्रत्याशी संदिग्ध और प्रश्नों के घेरे में हों तो ? क्या उस स्थिति में भी आम आदमी को लोकतंत्र की अनिवार्य परंपरा का निर्वहन करने के लिए मतदान करना चाहिए ? क्या मजबूरी में इस्तेमाल किए जाने से मतदान के मूल उद्देश्य की पूर्ति वाकई हो पाएगी ? सबसे अहम बात ये कि सामने प्रत्याशियों की जमात में एक भी मनोनुकूल उम्मीदवार नहीं पाकर क्या सचमुच ही आम मतदाता खुद को मतदान के लिए प्रेरित कर सकता है । अब सबसे बडी समस्या आम आदमी के सामने यही है कि लोकतंत्र में उसके पास अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए विकल्प ही नहीं है । आज स्थिति इतनी नारकीय हो चुकी है कि ऐसी दुविधा हर स्तर पर होने वाले चुनाव की है ।


अगर इस समस्या के समाधान को तलाशने से पहले इसकी उतपत्ति की पडताल करना समीचीन होगा । स्वतंत्रता पूर्व राजनीतिक दलों , कांग्रेस ही प्रमुख थी मगर अलग -अलग विचारधाराओं के कारण विभिन्न राजनीतिक दलों का उदभव हुआ । भारतीय समाज की संरचनात्मक पृष्ठभूमि में प्राचीनकाल से ही , धर्म जाति भाषा और खॆत्र की महती भूमिका होने के कारण जल्दी ही ये सब कारक भी राजनीतिक दलों के गठन का आधार बनने लगे । इन सब के आधार पर बनने वाला राजनीतिक दलों के गठन का आधार बनने लगे । इन सब के आधार पर बनने वाली राजनीतिक पार्टियों ने अपने उद्देश्यों और एजेंडों के बिल्कुल स्पष्ट न होने के कारण बहुत बार उन उद्देश्यों की पूर्ति के बाद भी इन्हें समाप्त नहीं किया गया । सबसे बादा उदाहरण तो देश की सबसे बडी पार्टी कांग्रेस का ही लिया जा सकता है जिसके लिए यही कहा गया था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के अपने उद्देश्य हासिल हो जाने के बाद इसे भंग कर दिया जाना चाहिए था । लेकिन स्वतंत्रता के उपरांत राजनीतिक महात्वाकांक्षा इतनी ज्यादा बढ गई थी कि सत्ता का मोह त्यागने का साहस कोई नहीं कर सका ॥


भारतीय संविधान के निर्माण के समय भी इस बात का ख्याल नहीं रखा गया कि राजनीतिक दलों के गठन में क्या , धर्म , जाति , भाषा , क्षेत्र आदि को आधार और किस सीमा तक बनाया जा सकता है ? इसका कुपरिणाम ये निकला कि इन सबके नाम पर लगातार राजनीतिक दल बनते रहे । इन तमाम क्षेत्रीय, छोटे और बिखरे हुए राजनीतिक दलों में पहले सत्ता पाने के लिए किए/कराए जाने वाले छोटे तंत्रों के रूप में काम किया उअर बाद में धन के बदले खरीदे जाने वाले उन चिप्पियों के रूप में उभरे जिन्हें चिपका कर बडे दलों ने सरकार बनाने में हो रहे छिद्रों को भरने का काम किया । इस पूरी प्रक्रिया में शुरू से लेकर आखिर तक आम मतदाता बार-बार छला जाता रहा । हालात धीरे-धीरे ऐसे हो गए कि पढा-लिखा ,शिक्षित और जागरूक मतदाता धीरे धीरे खुद को मतदान के प्रति उदासीन और फ़िर बिल्कुल अलग कर बैठा ।


आजादी के बाद बनी तमाम राजनीतिक पार्टियों के गठन को यूं तो आम मतदाता के लिए अनेकों बिकल्प की निरंतर उपलब्धता के रूप में लिया जाना चाहिए था ।किंतु बडे दलों के लगातार होते विघ्हटन , राजनीति में गैर राजनीतिक कारकों का , वर्चस्व , राजनीतिज्ञों में बढती अवसरवादिता , सत्ता और धन का बढता तालमेल जैसे कारणों ने आम मतदाता के सामने एक ऐसा दलदल खडा कर दिया कि उसे हर स्थिति में अपनी हालत उसमें डूबते जाने जैसी लगी । भारतीय संविधान में निहित प्रस्तावना, लोकतांत्रिक परंपराओं का सम्मान , कानूनी प्रक्रियाओं के प्रति निष्ठा और सबसे अहम आम जनता के प्रति जिम्मेदारी और सेवा की भावना की निरंतर होती अवहेलना ने शासन को निरंकुश किया और शासित को बुरी तरह निराश ।


इन तमाम परिस्थितियों के बीच संविधान में नए अनुच्छेदों का निर्माण कदाचार , भ्रष्टाचार ,दल-बदल , आदि से निपटने के लिए बने बनाए गए कानूनों और प्रावधानों का प्रभाव और परिणाम भी जब शून्य जैसा आया तो फ़िर आम जनता से ये अपेक्षा रखना कि वो अपने मताधिकार का प्रयोग करके स्थिति बदले देगी " अतिश्योक्ति "जैसा लगता है । भारतीय चुनाव प्रणाली भी कई नई तकनीक और साधनों से लैस होते रहने के बावजूद आम मतदाता का विश्वास खोती गई । मतदाता पहचान पत्र की अनिवार्यता , इलैक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का प्रयोग , उम्मीदवारों द्वारा अपनी संपत्ति तथा अन्य ब्यौरों का सार्वजनिक करना जैसे तमाम उपाय नाकाफ़ी साबित हुए । आम लोगों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करना होगा कि वे अपने जनप्रतिनिधियों से लगातार सवाल करते रहे , और उन्हें उत्तर देने के लिए विवश करें । सरकार द्वारा उनके जनकल्याण के लिए उन प्रतिनिधियों को या उनके द्वारा दी जा रही राशि की एक एक पाई का हिसाब लेने के लिए तैयार करना होगा ।


आज चुनाव प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन की आवशयकता महसूस की जा रही है । छोटे से छोटे तथा शीर्ष स्तर तक के चुनाव में धन का दुरूपयोग , शराब , हथियारों , पैसों तथा अन्य वस्तुओं के उपयोग से पूरे चुनावी परिदृश्य को बदलने की कोशिशों का कारगर तोड अब तलाशना ही होगा । प्रत्यक्ष या सीधे मतदान के अन्य विकल्पों को ढूंढ कर अपनाना होगा । न सिर्फ़ चुनाव प्रणाली बल्कि सरकार के गटन के लिए अब तक अपनाई जा रही प्रणालियों का भी आकलन विश्लेषण करना होगा ताकि ये मंडी बाजार सजा के प्रतिनिधियों की खरीद फ़रोख्त के खेल पर अंकुश लगाया जा सके । अब समय आ चुका है कि ,सभी को राजनीति की सफ़ाई के लिए अपने भविष्य को बचाने और बनाने के लिए खुद राजनीति में आना होगा । अब इसे अछूतों की तरह , अब इसे एक लाईलाज़ बीमारी मान कर , और एक गैर /गौण विषय मान कर नहीं छोडा जा सकता , कतई नहीं ।

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

आईपीएल : क्रिकेट से परे एक खेल .........आज का मुद्दा






जिस देश में क्रिकेट एक खेल से बढकर जुनून बन गया हो और अगर वो देश अट्ठाईस वर्षों के बाद विश्व विजेता बन जाए तो उस देश में क्रिकेट के खिलाफ़ कोई भी कुछ कहना सुनना कतई नहीं चाहेगा और यकीनन कोई कहता सुनता भी नहीं है । बल्कि सुना तो ये है कि इस खेल के सबसे बडे जादूगर सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने की मांग की जाने लगी और महाराष्ट्र सरकार ने तो शायद इसकी औपचारिक मांग भी की है । इसके अलावा उन लोगों कि भावनाएं भी जोर मारने लगी हैं जो कह रहे हैं कि अब भारत के राष्ट्रीय खेल को हॉकी से बदल कर क्रिकेट कर दिया जाना चाहिए । जाने अगले पचास वर्षों में ऐसा ही कोई चमत्कार फ़ुटबॉल या अन्य किसी खेल में हो जाए और किसी दिन भारत फ़ुटबॉल का विश्व कप जीत जाए तो क्या पता कि क्रिकेट की जगह फ़ुटबॉल को राष्ट्रीय खेल का दर्ज़ा देने की मांग की जाने लगे । वैसे तो किसी खेल , किसी भाषा या किसी को भी राष्ट्रीय दर्ज़ा दे देने भर से कुछ खास हासिल होता है ऐसा नहीं लगता उलटा उसकी हालत पतली सी ही दिखती है । खैर यहां बात क्रिकेट की हो रही थी , लेकिन असल में बात क्रिकेट की भी नहीं उसके बहाने या उसके पीछे चल रहे खेल की हो रही है । 


क्रिकेट भारत में दिनोंदिनो अत्यधिक लोकप्रिय होता चला जा रहा है और  पिछले कई सालों से इसकी लोकप्रियता का ग्राफ़ बढता ही जा रहा है । इसी बात को भलीभांति समझते हुए भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड और उसके अधिकारियों ने विशेषकर ललित मोदी ने भारत के उन करोडों दर्शकों को क्रिकेट के ग्राहकों के रूप में बदल दिया और खेल को भी एक व्यवसाय का रूप दे दिया । जो खेल कभी पांच दिन की अथक शारीरिक मेहनत , कलात्कमता और भद्रता तथा धैर्य का परिचायक था वो पहले पचास ओवर के एकदिनी किक्रेट में और उसके बाद फ़िर मात्र कुछ घंटे और बीस बीस ओवर के उन्माद और जुनून में  बदल गया । ग्राहकों को लुभाने भरमाने और मदमस्त करने के लिए उसमें न सिर्फ़ ग्लैमर , मनोरंजन का तडका लगा दिया बल्कि बाकायदा बोली बिक्री का फ़लसफ़ा जोड के नीलामी का बाजार सज़ा के उसे पूरी तरह से एक कारोबार का रूप दे दिया गया ।


क्रिकेट अब क्रिकेट नहीं रहा , क्रिकेट के मायने बदल गए । भारत की आम जनता का जुनून और क्रिकेट के प्रति उनका लगाव कितना ज्यादा था ये इस बात से ही समझा जा सकता है कि काऊंटी क्रिकेट , एशेज जैसी श्रंखलाओं को कहीं पीछे छोडते हुए आईपीएल संस्करण ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के साथ साथ भारतीय क्रिकेट के शीर्ष खिलाडियों बल्कि कई विदेशी खिलाडियों को इतना आकर्षित कर दिया कि वे अपने देश का प्रतिनिधित्व करने से भी बगावत पर उतर आए । इसका कारण सिर्फ़ एक था पैसा और बेतहाशा पैसा । ये पैसा भारतीय दर्शकों से , विज्ञापन दाता कंपनियों से , और एक सबसे बडे ढके छुपे सूत्र यानि माफ़िया डॉन से ( अब ये बात कोई नई बात नहीं है कि किक्रेट के खेल के साथ सट्टेबाजों की सांठ गांठ का का एक गठजोड भी बहुत मजबूत होता जा रहा है ) उगाहा जा रहा है । 

क्रिकेट का ये पनपता हुआ कारोबार इतना प्रभावी होता जा रहा है और इसका मुनाफ़ा इतना बडा है कि अब इसे रोक टोक पाना उसी तरह असंभव है जैसे कि देश में शराब के बढते फ़लते फ़ूलते कारोबार को रोक पाना । जब भी ऐसी कोशिश की जाती है तो एक दलील दी जाती है कि करों के रूप में इससे भारत सरकार को बहुत बडी आय होती है , इसमें कोई संदेह नहीं कि होती भी होगी । लेकिन दो सवाल नि:संदेह महत्वपूर्ण हो जाते हैं । इन खेलों का समय जानबूझ कर शाम और रात का रखा जाता है । जिस देश में अब भी सिंचाई के लिए किसानों को बिजली मुहैय्या करा पाने में सरकार खुद को असमर्थ बताती है उसमें लगात इतने दिनों तक लाखों वॉट बिजली को इस तमाशे के नाम पर फ़ूंका जाता है । ज्ञात हो कि बिजली बचाने के लिए पहले और हाल ही में , अर्थ आवर और इस जैसे प्रयासों को बढावा दिया जाता रहा है जहां एक घंटे तक बिजली को और बिजली से चलने वाले तमाम उपकरणों को बंद करके बिजली की बचत करने की कोशिश होती रही है ऐसे में इस खेल में बहाई जा रही बिजली का हिसाब किताब कोई न तो लेने वाला है न देने वाला ।


एक दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि पहले इन खेलों के लिए शीत काल का समय निश्चित किया गया था । कम से कम भारतीय महाद्वीपों में तो ऐसा ही था । लेकिन पश्चिमी देशों की शीतल पेय बनाने वाली बडी बडी कंपनियों के दबाव में आईपीएल का आयोजन ग्रीष्म काल में ही रखा जाता है । इस खेल को बडी आसानी से यूं समझा जा सकता है कि इन मैचों के दौरान सबसे ज्यादा विज्ञापन सिर्फ़ शीतल पेयों के ही होते हैं और उनमें भी अधिकांश में क्रिकेट खिलाडी ही चमकते हैं । 

आने वाले समय में आईपीएल का जुनून और भी बढेगा और जैसा कि अभी से प्रचारित किया जा रहा है कि पचास दिनों के लिए या इक्यावन दिनों के लिए पूरा देश बंद रहेगा , तो वाकई देश बंद रहेगा या नहीं ये तो नहीं कहा जा सकता हां ये जरूर है कि क्रिकेट के पीछे और क्रिकेट के नाम पर चल रहा ये खेल अब कभी भी बंद नहीं हो पाएगा , बावजूद इसके कि भारतीय टीम के करिश्माई कप्तान सार्वजनिक रूप से ये कहते हैं कि बहुत अधिक खेल होने के कारण खिलाडी मानसिक और शारीरिक रूप से बहुत थक जाते हैं और अपने स्वाभाविक खेल करियर की उम्र से कहीं पहले ही चुक जाते हैं ।  


शनिवार, 9 अप्रैल 2011

ये हैं जनांदोलन के मुद्दे : चुनिए आप अपने लिए




अब यही मकसद है यही मुकाम है और यही है सबसे बडा मुद्दा भी 





पिछ्ले पांच दिनों में जो कुछ देश की सरकार ने देखा, देश के समाज ने देखा , और पूरे देश ने देखा , या यूं कहें कि अवाम ने जो कुछ दिखाया उसने बहुत सी बातों से को स्पष्ट कर दिया । एक वृद्ध जो न तो कोई राजनेता था न ही धर्मगुरू न तो उसके पास अथाह संपत्ति थी न ही शायद बहुत बडी शारीरिक ताकत के मालिक भी नहीं । अगर उनके पिछले इतिहास को देखा जाए तो ये स्पष्ट हो जाता है कि उन्हें इस बात की भी चाह नहीं कि उन्हें मसीहा या रोल मॉडल की तरह माना समझा जाए । जिस इंसान ने अपनी लडाई अपने छोटे से गाव से शुरू करके आज पूरे देश को अपने साथ जोड लिया तो जरूर ही ये उसका उद्देश्य ही है जिन्हे वो पहले तय करते हैं फ़िर उसे पाने के लिए शांति अहिंसा और अनशन का वो रास्ता अख्तियार करते हैं कि जो पूरे अवाम को इतना आंदोलित कर देता है कि जो आम लोग बिना किसी खास वजह के पडोस तक में झांकने की जहमत नहीं उठाते वे इनके साथ आ जुडते हैं । जो देश शीला और मुन्नी के गानों पर ठुमके लगाने में व्यस्त होता है उसे वे अपने एक नारे से इस स्थिति में ला देते हैं कि वो देश भक्ति के गानों पर बिना कडी धूप की परवाह किए हुए झूमता है गाता है । इस बार जिस उद्देश्य को लेकर ये लडाई शुरू की गई थी उसने फ़िलहाल तो सरकार को इस बात के लिए मजबूर कर दिया कि इतिहास में पहली बार सीधे तौर पर किसी कानून को बनाने से पहले न सिर्फ़ जनता की सारी भावनाओं को स्थान दिया जाएगा बल्कि उस कानून को बनाने में जनता की भागीदारी भी होगी । आज चारों तरफ़ जीत का जश्न मनाया जा रहा है लेकिन अन्ना हज़ारे ने बता दिया है कि अभी इस लडाई को अंत की तरह नहीं एक शुरूआत की तरह लेना है । आम लोग बहुत से प्रश्न उठा रहे हैं , बहुत सी आशंकाएं जता रहे हैं , बहस और विमर्श चल रहा है तर्क वितर्क हो रहा है । कोई घोर आशावादी है तो कोई इसे क्षणिक आवेश मान समझ रहा है । कल क्या होगा कोई नहीं  जानता लेकिन दो बातें लोगों को जरूर ध्यान में रखनी चाहिए कि जो स्थिति बासठ वर्षों में बनी है देश की उसे रातों रात ठीक नहीं किया जा सकता और अगर आज आपने ये लडाई शुरू नहीं की तो कल को जब आपकी संतानें किसी ऐसे ही मोड पर खडी होकर इस लडाई को शुरू करेंगीं तो निंसंदेह उनके मन के कोने में कहीं ये बात जरूर उठेगी कि अब से पहले देश की जनता क्यों और कहा सोई रही । अन्ना हज़ारे , किरन बेदी , अरविंद केजरीवाल जैसे कर्मवीर लगातार अपना काम कर रहे हैं बिना इस बात की परवाह किए कि कौन कौन उनके साथ है कौन नहीं है । बिना इस बात की चिंता किए कि किस लडाई में वे जीतेंगे किसमें नहीं । अब बहुत से लोगों को लग रहा है कि अब जनलोकपाल विधेयक पर तो सरकार मान ही गई अब कौन से मुद्दे बचे हैं ...लेकिन लडाई तो अभी बांकी है मेरे दोस्तों ..मुद्दे तो यहां कतारबद्ध होकर खडे हैं । देखिए कौन से :-


सूचना के अधिकार की लडाई :- यूं कहने को तो इस अधिकार को पाए हुए अब काफ़ी समय बीत चुका है और आम लोगों ने इसका इस्तेमाल करके उन तमाम अधिकारियों , कर्मचारियों , की रातों की नींद हराम करने के लिए कमर भी कस ली है । सूचना के अधिकार को अपनी लडाई का आधार बना और मान कर बहुत से लोगों ने मंत्रियों और सरकार के हलक में हाथ डालकर उनके कारनामों घोटालों को सामने ला रही है और ये काम बदस्तूर जारी है । हालांकि अभी भी इस सूचना के अधिकार का उपयोग उस स्तर पर नहीं किया जा रहा है जितना कि अपेक्षित है लेकिन इसके बावजूद भी सरकार को इससे इतनी परेशानी हो रही है कि अब तक कुल तीन बार प्रधानमंत्री तक के स्तर पर ये कोशिश की गई है कि इस अधिकार के पर कतरे जाएं तो इससे पहले कि सरकार कोई जुगत भिडाए इस सूचना के अधिकार को भी एक आंदोलन बना देना होगा । जो भी जहां भी जो सूचना चाहते हैं , पारदर्शिता के लिए संस्थाओं को मजबूर करना चाहते हैं उन्हें इसे एक मुहिम बना देना चाहिए ताकि सरकार बौखला कर इसके पर कतरने को मजबूर हो और फ़िर जनता उसे आडे हाथों ले सके । 


प्रतिनिधि वापस बुलाओ विधेयक :- एक बार की गलती और फ़िर अगले पांच वर्षों तक की बेबसी , वोट देकर चुना किसी को वो बन गया किसी और का नुमाईंदा , सारे वादे , सारी योजनाएं भुला कर दिल्ली में बैठ कर वातानुकूलित गाडियों और बंगलों दफ़्तरों में बैठ कर आम जनत का दर्द महसूस करने वालों को एक ही झटके से उसी प्रकिया से दोबारा वापस खींच लाने की मुहिम । हालांकि ये कई राज्यों में लागू किया गया है शायद और इसका उपयोग भी किया जा चुका है आम जनता द्वारा लेकिन इसे भी राष्ट्रव्यापी बनाए जाने की जरूरत है । एक बार अगर इन राजनेताओं के मन में ये डर घर कर गया कि वे एक अस्थाई सेवक हैं न कि उनके बाप दादा की गद्दी है कि जिसे वे कब्जाए बैठे हुए हैं तो उसी दिन से सुधार आने लगेगा । इस अधिकारो को पाने और उसके उपयोग के लिए आम लोगों को खुद को तैयार करना होगा । 


जजेस जवाबदेही बिल :- एक समय हुआ करता था जब भारतीय न्यायपालिका पर लोगों का अटूट विश्वास था और लोग समझ रहे थे कि कम से कम एक दरवाज़ा तो ऐसा है कि जहां तक पहुंचने के बाद न्याय मिलना लगभग तय है और अभी भी स्थिति बहुत ज्यादा खराब नहीं हुई है । लेकिन न्यायपालिका जैसी संस्थाओं में किसी भी गडबडी की गुंजाईश को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और पिछले दिनों जिस तरह से एक के बाद एक बडी छोटी घटनाओं में न्यायाधीशों की लिप्तता की जानकारी आम आदमी को मिली है वो न सिर्फ़ चिंताजनक है बल्कि बहुत ही आत्मघाती भी है । भारतीय न्यायपालिका की सफ़ाई के लिए ये बहुत जरूरी है कि न्यायाधीशों की जवाबदेही तय करने के लिए और दोषी पाए जाने पर उन्हें सीधे सजा देने के लिए ये विशेष कानून लाया जाए । इसके लिए देश के तमाम अधिवक्ताओं को कमर कस के आगे आना चाहिए 


अखिल भारतीय न्यायिक सेवा :- न्यायपालिका में मौजूद भ्रष्टाचार का एक बडा कारण बताया जाता है और है भी वो है भाई भतीजावाद की स्थापित हुई परंपरा । सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई सिर्फ़ एक जानकारी ने जो खुलासा किया था और उससे जो बवेला उठ खड हुआ था वो इस बात को प्रमाणित करता है कि कहीं न कहीं कुछ न कुछ गडबड तो है ही । इसलिए बहुत जरूरी है कि संघ लोक सेवा आयोग की तरह अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का गठन किया जाए और न्यायाधीशों की नियुक्ति स्थानांतरण में पूर्ण पारदर्शिता लाई जाए । हाल ही में ये खबर सामने आई है कि सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्तियों की नियुक्ति तक में वरिष्ठता के स्थापित मानदंडों की अनदेखी तक की गई है । इसके गठन से बहुत सी साफ़ सफ़ाई अपने आप हो जाएगी । 


विदेशी बैंक खाता विधेयक :- पिछले दिनों एक मुहिम ने जोर पकडा है कि अब जबकि ये साफ़ और स्पष्ट हो चुका है कि , भारतीयों ने अपना बहुत सा काला धन ( इतना कि भारत की आर्थिक स्थिति बिल्कुल ही उलट जाएगी इससे ) विदेशी बैंकों में जमा कर रखा है । स्विस बैंकों में बंद भारत की आम जनता के खून पसीने की कमाई को वापस अपने हाथों में लाने के लिए इस कानून का लाया जाना बहुत जरूरी है और इस कानून के तहत सभी विदेशी बैंकों में जमा काले धन को देश की राष्ट्रीय संपदा घोषित किया जाए । बिना ये देखे कि किसका धन है , कहां है , कितना है सीधे उसे भारतीय राजकोष में लाकर विकास कार्यों में लगाया जाए । 


पूर्ण पारदर्शिता विधेयक :- हाल ही में हुए राष्ट्रमंडल खेलों उजागर हुए अंतहीन घोटाले ने , टू जी थ्री जी के नाम पर हुए घोटाले ने , इससे पहले आईपीएल जैसे खेलों के आयोजन में चल रहे पैसे के खेल , जैसे तमाम भ्रष्टाचार के अड्डों को पूरी तरह नग्न करने के लिए पूर्ण पारदर्शिता कानून को लाया जाना चाहिए । किस आयोजन के लिए , किस योजना के लिए कहां से कितना पैसा लिया गया , कितना खर्च हुआ कितना बचा और कितना किस मद में गया । सब कुछ , एक एक पैसे का हिसाब , पूरे राजकोष की एक एक पाई का हिसाब सब कुछ जनता के देखने के लिए उसके सामने होना चाहिए । उसे जहां गडबड लगे वो अपने पूरे हक से सरकार और व्यवस्था से इस बाबत सवाल कर सकती है । नेताओं की , सरकारी अधिकारियों की कर्मचारियों का वेतन भत्ता , कार्य दिवस , अवकाश के दिन सब कुछ जनता ही तय करे इसके लिए भी लडाई लडनी होगी । 



ये तो बस चंद वो मुद्दे हैं जो सामने हैं जिसके लिए आम जनता को किसी भी अनशन , किसी जनांदोलन और किसी जंतर मंतर की प्रतीक्षा करने की जरूरत नहीं है । इन मुद्दों पर लगातार काम होना चाहिए और हर स्तर पर होना चाहिए । अब आप खुद तय करिए कि आप इसमें से किसके साथ कैसे कब कहां जुड रहे हैं ...क्योंकि ये तो तय है कि आज अगर आप नहीं जुडे तो मजबूर होकर कल आपकी संतानों को इससे जुडना होगा ....मुझे और पूरे देश को प्रतीक्षा है आपके फ़ैसले की ...आप करेंगे न फ़ैसला ....अपना ..देश के भविष्य का ??


गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

जंतर मंतर से लौट कर - 1 ..क्या है जन लोकपाल बिल ?????



पढिए और जानिए कि आज जंतर मंतर पर जो लडाई लडी जा रही है उससे क्या कैसे हासिल होगा ...मैं पूरा दिन बिताने के बाद अभी लौटा हूं ..बहुत कुछ अपने साथ लेकर ..आज देर रात तक बैठ कर आपको बताऊंगा दिखाऊंगा कि ....क्यों इसे आजादी की दूसरी लडाई कहा जा रहा है ...और आप ..जहां भी हैं इस लडाई को वहीं से शुरू करिए ....क्योंकि ये आपकी लडाई है ...कहिए लडेंगे न आप ...तब तक ..जब तक कि जीत हासिल न हो .........
छवि को क्लिक करके बडा करके आप आराम से इसे पढ सकते हैं ...पढिए कि ...आज इससे जरूरी कोई मुद्दा नहीं है 

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

ताबूत में आखिरी कील ठोंकने का यही सही वक्त है ... आज का मुद्दा








अपने होशोहवास में शायद ये ऐसा पहली बार देख रहा हूं कि आम जनता भ्रष्टाचार को एक नासूर मान कर उसे उखाड फ़ेंकने के लिए तत्पर हो गई है । हालांकि पिछले कुछ समय में जिस तरह से सरकारी कुशासन , घपलों घोटालों में सबकी लिप्तता , प्रधानमंत्री , राष्ट्रपति तक का मजबूर होने का राग , प्रशासन , विधायिका , न्यायपालिका तक तक में भ्रष्टाचार अपने चरम पर पहुंचती दिखाई दी है उसके बाद तो अपेक्षा ये की जानी चाहिए थी कि पूरा देश सडकों पर उतर जाता और खींच खींच के उतार फ़ेंकता इन्हें इनके जड समेत । लेकिन लोकतांत्रिक देश के विशेषकर भारत जैसे देश के नागरिकों को हमेशा से ही किसी उत्प्रेरक की प्रतीक्षा रहती है । और ऐसा न हो पाने की एक दूसरी बडी वजह ये रही है कि कहीं न कहीं इन खास पदों पर बैठे भ्रष्टाचारियों के साथ ही आम आदमी कहीं मजबूरी में , कहीं किसी और बहाने से खुद को भी इसमें लिप्त पाता है और ऐसा दिखाई देता है मानो भ्रष्टाचार वो रक्त है जो पूरे देश की रगों में बह रहा है । लेकिन ऐसा है नहीं , वास्तव में अब भी हर महकमें और संस्थान में कुछ जुनूनी लोग हैं जो जाने किस जिद्द को अपने सिर माथे लगाए हुए पूरी दृढता के साथ न सिर्फ़ अपने आसपास चल रहे घिनौने भ्रष्टाचार से अलग हैं बल्कि अपना पूरा जोर लगा कर उसके खिलाफ़ सीना ताने खडे हैं । बस जरूरत इस बात की है कि उन मजबूत हाथों और कंधों पर विश्वास जताया जाए और कम से कम उन्हें इस डर से मुक्त कर दिया जाए कि इस भ्रष्टाचारी दलदल में इतनी ताकत नहीं है कि वो उन्हें भी खींच सके और अब ये काम शुरू हो चुका है ।





आज आम आदमी ये जानते हुए कि वो खुद कहीं कहीं इस भ्रष्टाचारी तंत्र को मजबूत बनाने में उसे ऐसे ही दिनोंदिन ताकतवर होने देने के लिए जिम्मेदार है , ये भी जानते हुए कि सवा अरब की जनसंख्या वाले देश में खासकर जब वो देश ,धर्म जाति , भाषा ,क्षेत्र और जाने किन किन बहानों से बंटा और बांटा गया हुआ हो और ऊपर से अशिक्षा , भूख , बेरोजगारी , कुपोषण जैसी बुनियादी समस्याओं से ही जूझ रहा हो , वो देश जो हर बार चुनाव से पहले कुछ नया कर पाने की कोशिश करता है और हर बार चुनाव के बाद खुद को ठगा हुआ पाता है वो आम आदमी अब सच में ही अपनी इस विवशता पर झुंझला गया है , एक उकताहट है मन में कि अब बस , बहुत हुआ । आज अन्ना हज़ारे और उनसे जुडी हर आवाज़ ने न सिर्फ़ ऊपर गद्दी पर फ़ैल के बैठे हुए देश के निहायत ही घटिया आचरण वाले राजनेताओं को संदेश दे दिया है बल्कि आम आदमी और पूरे देश को भी ये जता और बता दिया है कि अब सही समय आ गया है कि आम आदमी अपनी ताकत को पहचाने । अपने अंदर , अपने आसपास , पनप रहे हर छोटे बडे भ्रष्टाचार पर अपनी पूरी ताकत से , पूरी योजना से उसकी बखिया उधेड कर रख दे । ऐसा हो सकता है कि , यदि ऐसा करते हुए आपके हाथ खुद भी जलें , हो सकता है कि इसकी जलन आपके उन तक भी पहुंचे जिन्हें आप अपना कहते मानते हैं , और इसके बाद बहुत कुछ ऐसा देखने सुनने को मिले जो अप्रत्याशित हो अंचंभित करने वाला हो । लेकिन एक बात याद रखिएगा कि कल को जब आपकी संतानें भी खुद को इसी भंवर में फ़ंसा हुआ पाएंगी और शायद कोई और अन्ना हज़ारे ऐसी ही किसी स्थान पर किसी लडाई की शुरूआत करेगा तो एक बार ये जरूर सोचेगा कि आखिर वो कौन सी मजबूरी थी हमारी कि हम चुपचाप ये सब होता देखते रहे ।





मुझे और मुझ जैसे हज़ारों लाखों लोगों को ये नहीं पता कि हमारा उपवास , जंतर मंतर पर हमारी मौजूदगी , अन्ना के साथ दिखाया गया हमारा साथ कल कौन सी सूरत बदलेगा और कुछ बदलेगा कि भी नहीं लेकिन अब दो बाते तो जरूर ही तय हो चुकी हैं । पहली ये कि ये संतोष तो जरूर रहेगा कि आखिर किसी न किसी जगह पर हमने वो काम करने की कोशिश तो की जो मन के भीतर बैठा कोई जाने कब से कहने के लिए कह रहा है । दूसरी बात ये कि , अब ये जबकि ये चिंगारी सुलग उठी है तो फ़िर अपने छोटे छोटे प्रयासों से उसे दावानल का रूप देने में कोई कोर कसर नहीं छोडेंगें । मैंने रास्ता भी चुन लिया है ..वो है भ्रष्टाचार के ढके छुपे रूप को सरेआम नग्न करना । अब इसके लिए चाहे मुझे सूचना के अधिकार का उपयोग करना या करवाना पडे , या फ़िर कोई ऐसी तरतीब लडानी पडे कि जिससे भ्रष्ट और भ्रष्टचार नग्न होकर लोगों के सामने अपनी लाज छुपाने को मजबूर हो जाए , तो वो कोशिश मैं करता ही रहूंगा और तब तक करता रहूंगा जब तक कि व्यवस्था मुझसे आज़िज़ आकर खुल कर एक पक्ष ले ..या तो उन भ्रष्टाचारियों के साथ हो या फ़िर उनके साथ जो इसे मिटाना चाहते हैं । मुझे यकीन है कि ऐसी कोशिश ही एक न एक दिन , आपस में जुड कर एक बडे आंदोलन का रूप लेगी और फ़िर जिस दिन लोग ये भूल जाएंगे कि भ्रष्टाचारी सिर्फ़ भ्रष्टाचारी होता है , अपना या दूसरे का अपना नही , उसी दिन से व्यवस्था में सफ़ाई शुरू हो जाएगी । हां इसके लिए कुछ कीमत तो जरूर ही चुकानी होगी लेकिन कल को मेरी संतान को फ़िर से नए सिरे से इसी लडाई को शुरू करना पडे उससे बेहतर यही होगा कि मैं उसे इतना दे दूं कि वो उस लडाई को आगे बढाए । ........क्या आप भी तैयार हैं इस लडाई को लडने के लिए ....???????????????????
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