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सोमवार, 21 जून 2010

आम आदमी के पहुंच से दूर होती उच्च शिक्षा


आजकल कालेजों में दाखिले की मारामारी है । शहरों में विशेषकर मेट्रो और राजधानी में तो ये मारामारी अपने चरम पर होती है । कहने को तो परीक्षाओं से पहले बहुत से सलाह केंद्र और सहायता केंद्र पर सलाह देते और ढांढस बंधाते काऊंसलर न सिर्फ़ विद्यार्थियों बल्कि उनके अभिभावकों को भी कम नंबर आने या फ़िर कि शीर्ष वरीयता सूची में नाम न आने आदि को लेकर किसी भी तरह से परेशान न होने की हिदायत देते रहते हैं । किंतु हकीकतन जब परीक्षा परिणामों के बाद दाखिले की दौड शुरू होती है तब एक बार फ़िर से उन्हीं नंबरों की अहमियत , वही कट लिस्ट आदि का झंझट आदि से विधार्थी का सामना होता है । और विभिन्न कालेजों , संस्थानों में दाखिला मिलने /न मिल पाने की ऊहापोह में एक बार फ़िर से अभिभावकों की नाराजगी , उनकी मजबूरी का ताना सुनना पडता है ।

यहां कुछ तथ्य ऐसे हैं जो न सिर्फ़ हैरान कर देते हैं बल्कि अफ़सोस करने लायक लगते हैं । पिछले सिर्फ़ दो दशकों में व्यावसायिक परिसरों , मल्टीप्लेक्सों , शौपिंग मौलों , म्युजिक प्लैनेट , बडे पब तथा रेस्त्रां आदि की संख्या में तकरीबन ७८ प्रतिशत की वृद्धि हुई है । जबकि इसके विपरीत शिक्षण संस्थानों , विशेषकर सरकारी कालेजों की संख्या में सिर्फ़ १९ प्रतिशत की । इसी बात से पता चल जाता है कि सरकार शिक्षा के प्रति कितनी गंभीर है । ऐसी हालत में जहां इन कालेज प्रशासनों द्वारा दाखिले के नाम पर , विभिन्न कोटे की सीटों का आरक्षण , तो और भी कई तरीकों से जम कर भ्रष्टाचार और उगाही की जाती है । वहीं बहुत से इच्छुक विद्यार्थी कालेजों में दाखिला न ले पाने के कारण टूटे हुए मन से कोई और दिशा पकड लेते हैं या बेमन से अन्य कोर्सों में दाखिला लेते हैं ।

इससे जुडी और शायद उससे भी ज्यादा गंभीर समस्या है इस शिक्षा का दिनानुदिन बहुत अधिक मंहगा होते जाना । मोटे तौर पर यदि सिर्फ़ ये कहा जाए कि उच्च शिक्षा में आज कोई भी कोर्स ऐसा नहीं है जहां पर किफ़ायती दरों पर भी अभिभावक अपने बच्चों को पांच दस लाख से कम शिक्षण शुल्क दे कर पढा सकें । अब तो स्थिति ऐसी हो गई है कि इस वास्तविकता को सभी मन ही मन स्वीकार भी चुके हैं , इसलिए बच्चों के हायर सेकेंड्री में पहुंचते ही वे अपनी बचत राशि और जमा पूंजी टटोलने लगते हैं , बैकों के चक्कर काटने लगते हैं जहां से उन्हें शिक्षा लोन मिलने की गुंजाईश हो । सरकार यदि कभी इन सब पर अपना पक्ष रखती है तो स्पष्ट कह देती है कि शुल्क में वृद्धि तो स्वाभाविक है और सरकार यदि संस्थानों की संख्या बढ भी दे तो भी शुल्क में बहुत अधिक अंतर नहीं पडने वाला है ।

अब इसका एक प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष परिणाम ये होता है कि इन सभी बडे बडे संस्थानों में सिर्फ़ आर्थिक रूप से सक्षम माता पिता के बच्चे ही पढ पाते हैं और फ़िर जब ऐसे बच्चे डिग्रियां लेकर उन संस्थानों से बाहर निकलते हैं तो उनका पहला और आखिरी ध्येय सिर्फ़ और सिर्फ़ पैसा, रुतबा , शोहरत बनाना ही होता है । उन्हें क्या मतलब देश से समाज से उसके विकास से । यही वो कारण हैं जो बच्चों को देश से बाहर जाने को प्रेरित करता है ,यही वो कारण है जो बच्चों को रोकता है कि वे अपने देश में रह कर शोध और अविष्कारों में अपना समय बर्बाद करें । ये सब एक ऐसी समस्या बन चुकी है जिसे जानबूझ कर बने रहने दिया जा रहा है , क्योंकि ये उनके लिए एक सुविधा की तरह है जो देश का चमचमाता वर्ग है । लेकिन आने वाले समय में ये वर्ग द्वेष आगे बढ कर यदि गृह युद्ध का रूप ले ले और देश का एक बडा युवा वर्ग सही शिक्षा के अभाव में हतोत्साहित होकर दिशाहीन हो जाए तो इसके लिए समाज और देश को तैयार ही रखना चाहिए खुद को ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. तो आप वापिस लौट आये एक जवलंत मुद्दे को ले कर सही बात है आपकी मगर मूकदर्शक बन कर देखने के सिवा कोई चारा नही। आभार।

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मुद्दों पर मैंने अपनी सोच तो सामने रख दी आपने पढ भी ली ....मगर आप जब तक बतायेंगे नहीं ..मैं जानूंगा कैसे कि ...आप क्या सोचते हैं उस बारे में..

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