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रविवार, 28 नवंबर 2010

धौलाकुंआं रेप कांड पार्ट टू : वाह रे मीडिया यहां भी सीक्वेल का एंगल ढूंढ लिया .....jha ji ...smashed ...


चलिए कुछ दिनों के लिए मीडिया वालों को कुछ तो ऐसा मिला जिसे वे कुछ दिनों तक घसीट सकेंगे ...उसके बाद फ़िर ...अरे भाई जब पहले ही लिख दिया गया है कि धौलाकुंआं रेप कांड पार्ट टू ..तो फ़िर ये तो समझने वाली बात ही है न कि ..अभी तीन चार पांच का स्कोप बांकी है ......और हो भी क्यों न .रावण दहन के दिन कौन सा एक भी जीवित रावण हम फ़ूंक पाते हैं ..| यहां एक बात मेरी समझ में और नहीं आई कि ..ये हमेशा ही इज्जत आम आदमी की ही क्यों लुटती है ..कभी नहीं सुना कि पीएम सीएम के घर की किसी को कोई ले भागा .....तो क्या माना जाए ये कि ..उनकी इज्जत ही नहीं होती ..या कि लुटती ही नहीं ..इज्जत सिर्फ़ आम आदमी आम लडकी की ही होती है जो लुटती है ।


आज दिल्ली जैसे महानगर का कुल मिला कर जो हाल देखता हूं मुझे लगता है कि ...मानो इंतज़ार सिर्फ़ इस बात का होता है ...किसकी बारी आती कब है ...बांकी कुछ भी नया नहीं है । और यदि आप आम आदमी हैं तो आपके लिए इन घटनाओं , ऐसी बातों से रूबरू होने की संभावना ज्यादा बढ जाती है । बडे लोगों के लिए ऐसी घटनाओं में सिर्फ़ एक ही जिम्मेदारी होती है ..बस चिंता व्यक्त करते रहना है ...मंत्री नेता हैं तो फ़िर ये भी कोई जरूरी नहीं ...उलटा पीडिता पर ही आरोप लगाया जा सकता है । और छोटे मध्यम लोगों की नियति देखिए ..पहले स्कूल जाने वाले वैन में बिटिया , बहन सुरक्षित जा रही है यही पता नहीं ..स्कूल में जाने कौन कब किस तरह से अपनी हैवानियत के अधीन होकर शोषण का शिकार हो जाए । चलो स्कूल कॉलेज भी पार कर लिया ..अब नौकरी ...सफ़र ..बस ट्रेन मेट्रो ..कहां कहां तक और किस किस से बचा के रखा जाएगा ..इज्जत को । और फ़िर इस समाज में आज जो सबसे जल्दी चली जाती है वो है ..एक पीडिता की इज्जत ।

जब ऐसी घटनाओं के दोहराव को देखता हूं तो कई सारी बातें दिमाग में कौंधने लगती हैं ...सोचता हूं कि क्या दिल्ली की सी एम उतनी आसानी से वही सब तब बोल सकती थीं जब ऐसे ही किसी धौलेमौले कुंएं में ...किसी मंत्री नेता , अधिकारी किसी बडे उद्योगपति किसी खिलाडी , के घर की कोई बेटी होती ...न शायद तब इतनी बेशर्मी नहीं ला पातीं वें ..ये कहने के लिए कि लडकियां घर से निकलती ही क्यों हैं । एक और ऐसी बात मेरे मन में अक्सर इन घटनाओं को देख सुन कर जो हठात ही आती है वो ये कि ...आपको "जागो " पिक्चर याद है जिसमें पीडिता बालिका के माता पिता खुद ही बलात्कारियों का कत्ल कर देते हैं ...मानता हूं कि रील लाईफ़ और रीयल लाईफ़ में बहुत फ़र्क है ..मगर काश ...काश कि ये खबरें भी समानांतर ही चलती रहती कि ...अपनी आबरू को बचाने के लिए एक युवती ने ..एक गुंडे के सर पर ईंट मारी और वो मर गया ..या सीधे गोली ही मार दी ..और ऐसी ही कुछ खबरें लगातार आ जाएं ...आगे कानून और समाज करे ये कि ..उस युवती /बालिका को खूब सम्मान सहित ..सर आखों पर बिठा ले । यार फ़िर रुकिए रुकिए ..एक खबर और बनती है ..बलात्कारी बेटे को .बलात्कार के दोषी पति को ....मां ने या उसकी पत्नी ने गोली मार दी ..या खाने में जहर दे कर मार डाला ।ओह कब छपेंगीं ऐसी खबरें । मुझे दुख तो तब होता है जब पढता देखता सुनता हूं कि ...विश्व में सबसे अधिक शक्तिशाली कहे जाने वाले अमरीकी सेना की एक महिला सैनिक भी बलात्कार का शिकार हो जाती है ....नक्सलवाद में इंसाफ़ की लडाई के नाम पर साथ लड रही महिलाओं का भी दैहिक शोषण हो जाता है ...हद है ये तो ।

जहां तक इन बलात्कार के मुकदमें की बात है तो दुनिया की कोई अदालत ऐसी नहीं है जिसने बलात्कार पीडिता को इंसाफ़ दिलवाया हो ...हां बेशाक ये माना जा सकता है कि , कुछ दोषियों को सजा सुनाने की औपचारिकता तो जरूर ही निभाती रही हैं । अब भी निभा रही हैं , आज तक किसी भी अदालत ने जाने कोई ऐसा आदेश क्यों नहीं दिया कि उस हैवान बने हुए व्यक्ति को सरे आम उसके सारे अंग काट डाले जाएं ...या फ़िर कि ऐसी ही कोई सजा । स्थिति देखिए कि हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने प्रियदर्शनी मट्टू के बलात्कार एवं हत्या के दोषी को सिर्फ़ इसलिए मौत की सजा से बचा लिया क्योंकि वो शादी कर चुका था ...आखिर जो भी उस बलात्कारी की पत्नी बनने को राजी हुई ..क्या उस महिला का युवती का ये बलात्कार नहीं था ..था ये भी बलात्कार ही था और ऐसे जाने कितने बलात्कार हैं जो कानून की किसी भी परिभाषा और दफ़ाओं से परे हैं अब भी । तो जैसा कि मैं कह रहा था कि कानूनी प्रक्रिया तो ऐसी है कि ..पीडिता के मन में यही बात आती होगी कि ..............फ़ैसले से डर नहीं लगता साहेब ...मुकदमें से लगता है ....क्योंकि जब तक मुकदमा चलता है ...बलात्कार तो चलता ही रहता है ....। और कानून की परिधि के बाहर फ़िर सामाजिक बलात्कार , मानसिक बलात्कार ...ओह ...घिन्न आने लगती है इस समाज की सोच पर ।


एक और बात ग्रामीण परिवेश वाले अब भी एक दूसरे का माथा ..अपने खेत खलिहानों के लिए ही ज्यादा फ़ोडते नज़र आते हैं वे अब भी उतने आधुनिक और शिक्षित नहीं हो पाए हैं कि ...हर नारी देह को ..नोचने वाली वस्तु समझें ...इसलिए अब तक वहां ..ऐसे पार्ट वन पार्ट टू ...वाले हिट सीक्वेल की शुरूआत नहीं हुई है । अब रही बात मीडिया की ..मीडिया की हालत तो ऐसी है कि ...क्या कहा जाए ..जिस मीडिया को ये समझ नहीं कि जहां पर धौलाकुंआं रेप कांड पार्ट टू की बात हो रही है वहां चाहे अनचाहे ...कांड वन की भी बात हो ही जाएगी ...सोचिए जिस लडकी ने कितनी मुश्किलों से वो दौर भुलाने की कोशिश की होगी आज फ़िर वो उसी दोराहे पर होगी कि नहीं ...। वाह रे मीडिया ..। अब तो ऐसा लगता है कि अब हर बाप को सिखाना होगा कि ...जब भी ऐसी नौबत आए ..बिटिया ..गला काट देना ..उसका ..आगे फ़िर देखी जाएगी ...हो सकता तुम न भी बच पाओ ....मगर सोचो कि ...भविष्य में कितनी बच जाएंगी ....और मांओं को सिखाना होगा कि ..जब भी किसी ऐसे हैवान बेटे के बारे में पता चले ..उसे फ़ौरन से पेशतर मार दिया .जाए ..ये समझ कर कि एक जानवर पागल हो गया है ...

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

बेलगाम ,बेशर्म, और बेगैरत होते टीवी शोज़






अभी रिएल्टी शो बिग बॉस की अश्लीलता ,गाली गलौज वाली भाषा की बतकुच्चन , शादी और सुहागरात तक को तमाशे के रूप में प्रस्तुत करके दिखाने सजाने की प्रवृत्ति से भारतीय समाज सुशिक्षित हो ही रहा था कि अचानक एक और खबर ने सबको चौंका दिया । इंसाफ़ की आधुनिक देवी के रूप में टीवी द्वारा स्थापित की जा रही राखी सावंत जी ने कुछ ऐसा इंसाफ़ कर डाला कि इसमें प्रतिभागी के रूप में शामिल हुए लक्ष्मण सिंह ने आत्महत्या कर ली । हालांकि इससे पहले भी कई रिएल्टी और टैलेंट शोज़ में कभी जजों की टिप्पणियों तो कभी किसी और कारण से , इसमें भाग लेने वाले या संबंधित लोग कई तरह की मुसीबतों का सामना कर चुके हैं । किंतु हाल ही में कभी स्वंयवर के नाम पर , तो कभी इमोशनल अत्याचार के नाम पर , कभी इंसाफ़ के नाम पर तो कभी तमाशे के नाम पर भारतीय टेलिविजन पर जो कुछ परोसा जा रहा है वो आज एक आम आदमी को कई बातें सोचने पर मजबूर कर रहा है ।
लक्ष्मण सिंह जिसने इसी एपिसोड के बाद आत्मह्त्या कर ली

इस बहस को उठाते ही इसके विरूद्ध जो एक तर्क अक्सर दिया जाता है वो ये कि , ये जो कुछ भी टीवी में दिखाया जा रहा है , वो सब आज समाज में घट रहा है दूसरा ये कि लोग देख रहे हैं तभी तो दिखाया जा रहा है । फ़िर एक बात ये भी कि आज सिनेमा में भी तो ये सब खूब बढचढ कर दिखाया जा रहा है । ये सारे तर्क , सारी दलीलें सर्वथा खोखली और बकवास लगती हैं । समाज में ये सब हो रहा है ??आखिर किस समाज में ? क्या महानगरीय संस्कृति ही ..सिर्फ़ महानगरीय समाज ही पूरे देश के समाज का प्रतिनिधि समाज है ? तो फ़िर उनका क्या जो आबादी आज भी इन महानगरों से दूर ..कहीं बहुत पीछे छूटी बची हुई है ? और क्या महानगरीय समाज में यही सब कुछ हो रहा है । और क्या ये सब निर्विवाद रूप से स्थापित और मान्य है नगरीय समाज के बीच भी ? अब रही बात कि लोग देखते हैं इसलिए दिखाया जा रहा है । तो फ़िर यदि कल को लोग नग्नता की ओर बढेंगे , उसे देखना चाहेंगे तो क्या वही परोसा जाएगा ? क्या बाजारवाद को इस कदर हावी होने दिया जा सकता है कि उसके आगे सब कुछ गौण हो जाए , सब कुछ बौना साबित हो जाए ?? एक तर्क ये कि सिनेमा में भी तो दिखाया ही जा रहा है । सिनेमा आज भी घर घर में नहीं पहुंचा है ..और जब पहुंचता है तो चाहे अनचाहे उस पर वो कैंची चल ही चुकी होती है जो चल जानी चाहिए ।

सबसे बडा सवाल ये है कि , टीवी शोज़ , धारावाहिक , और चैनलों के लिए निर्धारित मापदंडों को देखने परखने और उन्हें नियंत्रित करने के लिए गठित बोर्डों , संस्थाओं आदि की भूमिका सिर्फ़ एक तमाशबीन की तरह क्यों बनी हुई है । ज्यादा हुआ तो इन कार्यक्रमों की समाप्ति के बाद उन्हें एक नोटिस थमा देना या फ़िर एक औपचारिक सा नोटिस थमा देना ही इतिश्री हो जाती है । आज बिग बॉस के घर में प्रतिभागियों द्वारा खुले आम अश्लीलता का प्रदर्शन , इमोशनल अत्याचार के वो अतरंग प्रसंग (हालांकि इस कार्यक्रम में तो फ़िर भी कई बार काट छांट कर दी जाती है ) किस समाज के लिए और कौन दिखा रहा है ...?? ये बात तय कर ली जानी चाहिए क्योंकि ये वही चैनल है जो अपने विभिन्न धारावाहिकों में समाज में व्याप्त बुराईयों को सामने लाने का दावा करता है । अभी ही ये समय है कि ये भी तय कर दिया जाए कि क्या इनकी कोई सीमा है .....या आने वाले समय में टीवी पर लोगों को आदि मानव ..अपने नग्न रूप में दिखाई देगा ???



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