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शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

आरक्षण : बैसाखियों पर बढता विकास

इसी विषय पर हाल ही में बने एक पिक्चर का पोस्टर चित्र , गूगल से साभार







बहुत पहले ही भारतीय राजनीतिक के चरित्र को भली भांति परखते हुए किसी ने ठीक कहा था कि भारतीय राजनीति में धर्म ,जाति ,भाषा ,के आधार पर रखे गए विशेष प्रावधानों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल होने के कारण यही आशंका बनी रहेगी कि इसका उपयोग समय समय पर सत्ता के हितों के लिए किया जाता रहेगा । न्यायपालिका ने सरकार और राजनीतिज्ञों के इसी मंसूबे को भांप कर अपने एक महत्वपूर्न निर्णय में ये व्यवस्था दी कि किसी भी सूरत में आरक्षण की सीमा पचास प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए ।

यहां ये देखना बहुत महत्वपूर्ण है कि बीते दो वर्ष में न सिर्फ़ आरक्षण बल्कि एक विशेष वर्ग में आरक्ष्ण को लेकर कई बार पूरे उत्तर भारत की यातायात व्यवस्था को ठ्प्प किया गया । सरकार और प्रशासन की तटस्थता व अक्रियशील रहने का खामियाज़ा न सिर्फ़ यातायात व्यवस्था के चरमराने तक ही भुगतना पडा बल्कि बहुत भारी आर्थिक नुकसान का दंश भी झेलना पडा । यहां तक कि ,बाध्य होकर न्यायपालिका को ही सरकार को झिंझोड कर उठाना पडा ।

 इस बार इस मामले का ज्यादा तूल पकडना स्वभाविक है क्योंकि इस बार आधार जाति से अलग धर्म की ओर मुड गया है । देश के राजनीतिज्ञों के द्वारा अतिधर्मनिरपेक्षतावाद की नीति के तहत बेशक भारत की छवि को मांजने की जबरन कोशिश हो रही है किंतु धर्म , धार्मिक मुद्दों , चिन्हों , धर्म स्थलों को लेकर समाज कितना संवेदनशील है यह किसी से छुपा नहीं है । अल्पसंख्यकों को प्रस्तावित इस आरक्षण का आधार सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों की स्थिति पर रिपोर्ट हेतु गठित सच्चर आयोग की रिपोर्ट ही बनी है । इसमें कोई संदेह नहीं कि आज विश्व के अन्य मुस्लिम बाहुल्य देशों के मुस्लिम समाज की स्थित से बहुत बेहतर होने के बावजूद आज भी पिछडेपन और अलगाव का दंश झेल रहा है । शिक्षा, रोजगार, सामाजिक हिस्सेदारी व प्रभाव आदि हर क्षेत्र में अल्प संख्यकों की स्थिति संतोषजनक से नीचे है । बेशक इसकी एक बहुत बडी वजह भी कहीं न कहीं वे खुद ही है ।

अल्पसंख्यकों को आरक्षण , यानि धार्मिक अल्पसंख्यकों को , उनके पिछडेपन से विकास की ओर लाने के लिए एक पूरक प्रयास, थोडी देर केलिए इसे दरकिनार करके सिर्फ़ आरक्षण व्यवस्था पर बात की जाए तो पता चलता है कि संविधान में तात्कालिक उपचार के रूप में अपनाई गए इस व्यवस्था को इतनी बार बुरी तरह से तोडा मरोडा गया कि ये पिछडों के विकास और स्तर के मूल उद्देश्य से ही भटक कर रह गई । सबसे अधिक चिंताजनक बात ये है कि देश के सभी योग्यता सिद्ध करने वाली चुनौतियों को सहज़ बना लेने के बावजूद भी कभी भी ये महसूस नहीं हो सका कि आरक्षण व्यवस्था ने सामाजिक संतुलन में महती भूमिका निभाई । इसके विपरीत इसने जातियों को उपजातियों तक से अलगाव को प्रोत्साहित किया । दूसरी तरफ़ इस व्यवस्था का लाभ पाने वालों को सामान्य गैर आरक्षित वर्ग से एक अघोषित ताना मिलता रहा ।

आज आरक्षण की व्यवस्था ने युवाओं में दो बातें तो पूरी तरह स्थापित कर ही रखी हैं । नौकरियों , दाखिलों , अन्य चुनौतियों में आरक्षण की व्यवस्था यानि अवसरों का बिल्कुल आधा हो जाना , जिसका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रभाव बाद में उस संस्थान की उत्पादकता पर भी पडता है । दूसरी ये कि जो इस व्यवस्था के लाभ पक्ष की ओर हैं क्या उनकी स्थिति और स्तर ने उनके वर्ग की स्थिति को मजबूत बनाकर उभारा है । कोई भी तात्कालिक उपाय इतनी देर तक लादे नहीं चलना चाहिए कि ऐसा लगने लगे कि यही स्थाई व्यवस्था होकर रह गई है ।

समाजशास्त्री अपने अध्य्यन और निष्कर्ष के आधार पर किसी भी देश में सामाजिक संरक्षण के रूप में आरक्षण की व्यवस्था के लिए धर्म , जाति व भाषा से इतर क्षेत्र को वरीयता दिए जाने की बात करते हैं । सबसे पहला आधार आर्थिक पिछडापन और पीडित गरीब परिवार के जीवन स्तर को एक मानक स्तर पर पहुंचते ही उसके लिए ये व्यवस्था समाप्त हो जानी चाहिए । हालांकि पिछले दिनों योजना आयोग के "गरीब " की परिभाषा ने समाजशास्त्रियों को पुन: सोचने पर विवश किया होगा । इसके अलावा शारीरिक मानसिक विकलांगता , विशिष्ट क्षेत्र , खेल ,कला आदि में प्रदर्शन करने वालों , समाज के लिए कुछ अनुकरणीय करने वालों के लिए इस व्यवस्था को अपनाया जाना चाहिए । लिंग भेद व कन्या भ्रूण हत्या के मद्देनज़र वे महिलाओं को न सिर्फ़ विशेष संरक्षण बल्कि ज्यादा प्रभावी अधिकार देने की बात कहते हैं । भारत का सामाजिक तानाबाना प्राचीनकाल से ही बहु-धर्मीय, बहुजातीय व बहुक्षेत्रीय रहा है , इसलिए अब ये बहुत जरूरी हो जाता है कि नीतियां और व्यवस्थाएं समाज को जोडने वाली बनें ,न कि तोडने वाली । बहरहाल , इस नए अल्पसंख्यक आरक्षण के सियासी और सामाजिक परिणामों की प्रतीक्षा पूरे देश को रहेगी ।

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

महंगी होती शिक्षा : दाखिले की मारामारी




चित्र गूगल खोज़ से , साभार



वर्षांत के दिन बेशक ही साल भर खोए पाए के आकलन और विश्लेषण के दिन होते हैं । किंतु इसके साथ ही राजधानी दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों में ये उन अभिभावकों की भाग दौड के दिन होते हैं । राजधानी दिल्ली के स्कूलो में तो नर्सरी के दाखिले की रेलमपेल कॉलेजों में व नामी संस्थानों में प्रवेश सरीखा ही कठिन जान पडता है । राष्ट्रीय
राजधानी क्षेत्र की जनसंख्या में बहुत तीव्र गति से वृद्धि हो रही है । हालांकि पिछले दो दशकों में विद्यालयीय शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक निजि विद्यालयों व संस्थानों के स्थापित होने की दर भी काफ़ी तीव्र रही है । बेशक सरकार व प्रशासन नए स्कूल कॉलेज खोलने , विशेषकर बढ रही जनसंख्या के अनुपात में , सर्वथा विफ़ल रहे । या फ़िर शायद जानबूझ कर ऐसी स्थिति उत्पन्न की गई वर्ना इसकी कोई ठोस वजह नहीं दिखाई देती कि सरकार निजि शिक्षण संस्थानों सब्सिडी दर पर भारी रियायत देकर जमीनों का आवंटन तो कर देती है मगर खुद वहां नए शिक्षण संस्थानों का निर्माण नहीं करती ।

ऐसा भी नहीं है कि देश में स्कूली शिक्षा के लिए कभी कुछ किया सोचा नहीं गया । शिक्षा वो भी नि:शुल्क शिक्षा को अधिकार के रूप में पाने के लिए बने कानूनों के अलावा नवोदय, सर्वोदय, केंद्रीय विद्यालय जैसी राष्ट्रीय योजनाओं पर भी काफ़ी काम किया गया । इसमें कोई संदेह नहीं कि शहरी आबादी के बाहर इन विद्यालयों की सफ़लता बेहद महत्वपूर्ण साबित हुईं । लेकिन इन सबके बावजूद ग्रामीण भारत में प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा ही बडे लक्ष्य बन कर रह गई है । उच्च शिक्षा की तो कल्पना ही बेमानी सी लगती है ।

इस तुलना में नगरीय क्षेत्र की गरीब व पिछडी आबादी के बच्चों की साक्षरता दर ज्यादा बेहतर है । हालांकि शायद ये तथ्य ही वास्तविकता को बताने के लिए पर्याप्त है कि राजधानी दिल्ली के सरकारी प्राथमैक -माध्यमिक विद्यालयों में से १८ प्रतिशत में पेयजल और शौच की तथा २७ प्रतिशत में बच्चों के लिए बैठने पढने की समुचित व्यवस्था नहीं है । इन सरकारी विद्यालयों की इस बदहाल स्थित के कारण ही आज इनमें सिर्फ़ अति निर्धन वर्ग के बच्चे पढने जाते हैं । इससे बडी विडंबना और क्या हो सकती है कि सरकारी विद्यालय होने के बावजूद सरकारी कर्मचारी तो दूर खुद इन विद्यालयों में पढाने वाले शिक्षक तक अपने बच्चों को इनमें नहीं पढाते हैं ।

राजधानी दिल्ली समेत अन्य स्थापित हो रहे महानगरों में आसपास के क्षेत्रों के लोगों के पलायन से शहरी आबादी का दबाव बढता ही गया । पिछले दो दशकों में शिक्षा क्षेत्र में निजि संस्थानों की भूमिका व विस्तार में गजब का विकास हुआ । वैश्विक जगत में हो रही शैक्षणिक क्रांतियों और ई युग के सूत्रपात ने भारतीय युवाओं को विश्व भर में खुद को स्थापित करने का मौका दिया । बच्चों ने वक्त के साथ अपने हाथ मिलाते हुए नए व्यावसायिक , गैर पारंपरिक और भविष्य की चुनौतियों से लडने वाले पाठ्यक्रमों को न सिर्फ़ अपनाया बल्कि बहुत जल्दी ही इसमें अपनी काबलियत भी साबित कर दी । किंतु ये भी तय है कि आज शहरों में शिक्षा की शैली , और उसका घओर व्यावसायिक रूख बच्चों को पढा बढा तो रहा है किंतु शिक्षित कर पा रहा है , इसके लिए सोचना होगा ।

राजधानी दिल्ली में फ़ैले और अब भी स्थापित हो रहे स्कूलों में नर्सरी दाखिले की प्रकिया शुरू हो चुकी है । रोज़ इस तरह की खबरें सामने आ रही हैं कि शिक्षा विभाग और अदालती निर्देशों व सख्त हिदायतों के बावजूद सभी विद्यालय , नई नई तरकीबों से न सिर्फ़ अभिभावकों को परेशान कर रहे हैं। ऐसा हर बार सिर्फ़ इसलिए किया जाता है ताकि अभिभावकों से एक मोटी धनराशि वसूली जा सके । स्कूल अपने यहां वातानुकूलित और गैरवातानुकूलित सुविधा का ढिंढोरा जिस तरह से पीटते हैं वही उनकी मंशा को स्पष्ट करने के लिए काफ़ी है । हालात सिर्फ़ इतने ही तक खराब नहीं हैं, रियायती दरों पर आवंटित ज़मीनों पर खुलने वाले स्कूलों में अनिवार्य रूप से बीस प्रतिशत गरीब बच्चों के दाखिले की शर्त को शायद ही कोई विद्यालय पूरा करता हो । दिल्ली में पैकेजनुमा होता , स्कूली दाखिला आने वाले समय में शहर की गरीब आबादी के लिए एक दु:स्वप्न बन कर रहे जाए तो कोई आश्वर्य नहीं ।



मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

राष्ट्रीय संघर्ष का वर्ष ......आज का मुद्दा








भारतीय इतिहास में यदि वर्ष २०११ को सिर्फ़ किसी खास वजह के लिए याद रखा जाएगा तो वो होगा अचानक उठे देशव्यापी जनांदोलन से बने राष्ट्रीय संघर्ष के जन्म वर्ष के रूप में । देश में आज़ादी के बाद लोकतंत्र में आम आदमी को अपने अधिकार और उससे लगातार वंचित किए जाने का एहसास तब हुआ जब अबसे कुछ साल [प्प्र्व आम जनता को सूचना का अधिकार हासिल हुआ । संयोग से ये वैश्विक राजनीति में चल रहे परिवर्तन के दौर का सहभागी बनते हुए देश के युवा,कुछ ईमानदार प्रशासक तथा व्यवस्था के सड गल चुकने के कारण क्षुब्ध हुए विशिष्ट विद्वानों ने समाज के लिए बनाए जा रहे कानूनों की पडताल कर दी ।

ये भारत के राजनीतिक इतिहास में पहली बार हो रहा था कि आम लोग किसी प्रस्तावित कानून , जो कि भ्रष्टाचार के विरूध लाया जा रहा था , के बारे में न सिर्फ़ पूछ और बता रहे थे बल्कि उसकी कमियां बता कर बेहतर विकल्प सामने लेकर खडे थे । देश की राजनीति जो पिछले एक दशक से लगभग दिशाहीन चल रही थी , जनता द्वारा सीधे-सीधे अपना अधिकार मांगने की नई प्रवृत्ति से बौखला कर दोषों को दूर करके जनता का विश्वास पाने के बदले बेशर्म , बेखौफ़ व बेलगाम सा व्यवहार करने लगीं ।

भारतीय मीडिया ने पिछले एक दशक का सफ़र बेहद तीव्र गति से तय किया । बेशक पेशेवराना अंदाज़ व स्वाभाविक जिम्मेदारी के अपेक्षित स्तर से पीछे रहने के बावजूद आज विश्व की आधुनिकतम सूचना तंत्र प्रणाली से कदम से कदम मिला कर चलता मीडिया अब काफ़ी प्रभावी बन चुका है । भारतीय जनमानस के बदलते तेवर और भीतर भरे आक्रोश को चेहरा देकर मीडिया  ने इसे विश्व सुर्खियों में ला दिया । यहां भारतीय लोकतंत्र बहुत से मायनों में खुशकिस्मत साबित हुआ । इसे प्रजातांत्रिक शासन की सफ़लता के लिए सबसे आवश्यक "न्याय की स्थापना " हेतु निष्पक्ष , निडर व काबिल न्यायपालिका का सरंक्षण मिला । भारत के आसपास पाकिस्तान , बांग्लादेश ,श्रीलंका
आदि देशों में राजनीतिक अस्थिरता ने फ़ौरन ही तानाशाही वर्दी शासन को न्यौता दे दिया ऐसे में बडे से बडे राजनीतिक संकट के समय भी भारतीय सैन्य बलों का तटस्थ व अनुशासित रह जाना एक बडी उपलब्धि से कम नहीं हैं ।

देश का हर वर्ग , हर विधा ,हर क्षेत्र ,शिक्षा , स्वास्थ्य , मनोरंजन आदि सब कुछ तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रहे है । आम आदमी अब पहले से ज्यादा जागरूक हो गया है । इसलिए अब राज्य को ये बात भली भांति समझनी चाहिए कि लोकतंत्र में सबसे अहम बात होती है लोकइच्छा । भारतीय राजनीति , राजनीतिज्ञों के भ्रष्ट आचरण व बेईमान नीयत के कारण अब तक के सबसे निम्न स्तर पर है । आए दिन राजनेताओं के साथ किया जाने वाला व्यवहार , अभिव्यक्ति देने वाले मंचों पर निकल रही भडास आदि को देखने के बाद आम जनता की मनोस्थिति का अंदाज़ा सहज़ हो जाता है ।

आज विदेशों में भारतीयों द्वारा छिपाकर रखे गए काले धन की वापसी का मुद्दा हो ,या भ्रष्टाचार से निपटने के लिए बनाए जा रहे किसी कानून को दुरूस्त करने का मुद्दा । महत्वपूर्ण पदों पर अयोग्य व भ्रष्ट व्यक्ति की नियुक्ति का मुद्दा हो या फ़िर तेज़ी से बढे घोटालों में खुद सरकार के मंत्रियों की भूमिका और ऐसे तमाम मुद्दों पर सरकार ने न सिर्फ़ गैर जिम्मेदाराना व्यवहार किया बल्कि कई बार वह अपना बचाव करते हुए तानाशाही स्वरूप अपनाती लगी । आज देश के चुने हुए जनप्रतिनिधि जो विचार , जो बहस जो तर्क संसद के भीतर उस कानून को कमज़ोर करने के लिए दे रहे हैं , जिसे भ्रष्टाचार को हटाने में सहायक माना जा रहा है , क्या वही तर्क देश की आम अवाम का भी है । यदि ऐसा है तो फ़िर पिछले तीन सौ पैंसठ दिनों में जाने कितनी ही बार उस कानून को बनाने की मांग को उठा कर सडकों पे आते रहे हैं ।


सत्ता और सरकार बेशक अपने अधिकारों के उपयोग -दुरूपयोग से जनता के प्रश्नों और उनकी मांगों को उलझाने के प्रयास में लगी रही हो । किंतु इतना तो तय है कि अब ये सवा अरब की जनसंख्या वाले समूह को हठात ही मूर्ख नहीं बनाया जा सकता । ऐसा नहीं है कि इस परिवर्तन के सब कुछ अनुकूल चल रहा है , बल्कि सच कहा जाए तो ये सब तक उस मिथक को तोडने में भी सफ़ल नहीं हो पाया है कि भारत में ये मानसिकता सिद्ध है कि देश से भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा सकता । लोकपाल-जनलोकपाल बिल का मुद्दा, कानून में बदलेगा या सत्ता और अवाम के बीच संघर्ष बिंदु बनेगा ये तो वक्त ही बताएगा । हां आज जिस तरह से भ्रष्टाचार के विरूद्ध आम लोगों ने अपनी क्षुब्धता ज़ाहिर की है उससे ये अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि आने वाले कानूनों को बनने-बनाने से पहले जनता अपनी कसौटी पर उसे परखेगी ।

देश के लिए ये बहुत संवेदनशील समय है । विश्व आर्थिक मंदी के चपेट में है । प्राकृति अस्थिरता और पर्यावरणीय असंतुलन के साथ आतंकवाद के सबसे खतरनाक स्तर तक पहुंचने की संभावना के बीच चुपचाप विकास की ओर बढते रहना , वैश्विक समुदाय की ईर्ष्या का कारण बनने के लिए पर्याप्त है । विपरीत परिस्थितियों व बुनियादी समस्याओं से दो चार होते रहने के बावजूद देश की जनता ने लोकतंत्र में विश्वास बनाए रखा है । पिछले दिनों महंगाई की बढती दर ने आम आदमी के आक्रोश को मुखर होने के लिए उकसा दिया । आम जनता के सामने आज सबसे बडी चुनौती यही है कि देश को चलाने के लिए और जनप्रतिनिधि कहां से , किसे लाए । भविष्य में देश की जनता को इसी तरह से हर कानून, हर अधिकार और हर नियम के लिए सरकार से भागीदारी करनी होगी , और गलतियों को सुधारना होगा ।

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

फ़िज़ूलखर्ची का बीमा







अभी हाल ही में बीमा निवेश वाली दो प्रमुख कंपनियों आईसीआईसीआई लोम्बार्ड तथा बज़ाज़ एलाएन्ज़ ने एक नए तरह के बीमे की शुरूआत की है । इसके तहत शादी-विवाह के आयोजनों के बीमे का प्रावधान किया गया है , जिनमें किसी भी तरह का व्यवधान , किंतु कारण मानवीय न हो ,पडने से शादी हो नहीं पाती है । आज महानगरीय जीवन की आपाधापी में शादी विवाह के आयोजन जैसे समारोह अपना रसूख व शानो शौकत दिखाने का एक बहाना सा बन गए हैं ।

आज सामाजिक परिवेश में आ रहे परिवर्तन न सिर्फ़ रहन-सहन , आचार व्यवहार को बदल रहे हैं बल्कि नई प्रवृत्तियां और प्रचलन गढ रहे हैं । भारत में यूं भी काफ़ी प्राचीन समय से जीचन के प्रमुख पडावों , संस्कारों , रीति रिवाज़ों आदि अवसर्पर जी भरके फ़िज़ूलखर्ची के अवसरों की गुंजाईश रहती आई है । ये दूसरे देशों के लिए शायद विस्मय की बात हो सकती है ,कि आज भी देश के बहुत बडे हिस्से में किसी व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत किए जाने वाले कर्मकांड उसके जीवन के किसी अवसर से भी ज्यादा महंगी होती है । ग्राम्य जीवन में तो मानव जीवन्के इस अंतिम संस्कार की परंपरा का निर्वाह उनके आर्थिक पिछडेपन और कर्ज़खोरी का एक अहम कारण था ।

शहरी समाज में बेशक वैवाहिक परंपराओं के साथ -साथ विवाह नामक संस्था के चिर मान्यताकरण में कमी आई हो किंतु इसके आयोजन की आडंबरता विशाल होकर इवेंट मैनेजमेंट सरीखे व्यवसाय का रूप ले चुकी है । भारतीय शहरों में शादी-विवाह के आयोजनों का खर्च अब हज़ारों लाखों से आगेबढकर करोडों अरबो में पहुंच गया है । आज ये तमाम परंपराएं फ़िज़ूलखर्ची और तडक भडक वाले आडंबरों का प्रदर्शन मात्र है । बैचलर पार्टी ,मेंहदी , सेहराबंदी , रिसेप्शन तहा विवाह से जुडी हर परंपरा अब एक इवेंट का रूप ले चुकी है । ज़ाहिर है कि इतने महंगे आयोजन को किसी आशंका से ध्वस्त होने के जोखिम से बचने के लिए ये बीमा सही साबित होगी ।

इस मुद्दे के साथ एक बार फ़िर से इस विषय पर ध्यान अटकता है कि क्या इस देश को फ़िज़ूलखर्च करने की छूट दी जानी चाहिए । जिस देश में दो वक्त का भोजन सुनिश्चित करने के लिए कानून लाने की बाध्यता हो क्या उस देश में वाकई एक रात में धूम धडाके , बेहिसाब भोज्य सामग्री , नाच गान ,मनोरंजन के लिए बहा देना कोई अनुचित प्रवृत्ति नहीं है । शहरों में पिछले एक दशक में फ़ार्म हाऊस संस्कृति ने जलसे दावत की एक ऐसी परंपरा शुरू की जो आज भी विकसित कहे जाने वाले समाज के लिए एक नियमित अपव्यय सा बन कर रह गई है ।

ऐसा नहीं है कि फ़िज़ूलखर्ची को समस्या के रूप में नहीं देखा जा रहा है । अभी कुछ माह पूर्व राजस्थान में मृत्यु भोज को अनावश्यक व अवैधानिक घोषित करके एक बडी शुरूआत की गई । यह दलील दी गई कि जिस देश में प्रतिदिन सैकडों लोग अब भी भूख से मर रहे हों वहां जबरन इतने अन्न का अपव्यय क्या उचित बात है । देश आज एक बहुत बडा वैश्विक बाज़ार बन कर उभरा है । किसी भी नई चीज़ के लिए तो ग्राहकों की एक बडी फ़ौज़ सतत प्रतीक्षारत रहती है । किंतु महानगरीय से नगरीय और कस्बाई परिवेश से होकर ग्राम्य समाज तक विकास और जीवन स्तर में एक अनिवार्य साधन के रूप में अपनाए जाने वाले टीवी मोबाइल , कार, कपडे अब धीरे धीरे अपव्यय का परिचायक बन चुके हैं ।

भारतीय समाज की फ़िज़ूलखर्ची प्रवृत्ति में उसका पूरा साथ निभाया है देश की उत्सवी संस्कृति ने । इस देश के सभी प्रांतों के पास अपने अपने उत्सवों के लिए ढेरों दिन व तौर तरीके उपलब्ध रहे हैं । हां यहां ये तत्य जरूर गौरतलब रहा है कि भारतीय ग्रामीण समाज के उत्सव व परंपराएं त्यौहार आदि न सिर्फ़ कृषि अर्थव्यवस्था के अनुरूप थीं बल्कि उनका मानव जीवन के सदविकास में भी खासा महत्व था ।

भारत में वैश्विक उदारीकरण के दौर के शुरू होते ही पश्चिमी देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपने यहां की संस्कृति के अनुरूप और अतंत: उनके बाज़ारों के लिए एक नए विकल्प के रूप में मदर्स डे , फ़ादर्स डे , वेलेंटाईन डे आदि नए उत्सवों को आधुनिक नगरों में प्रवेश कराया । आज मकर संक्रांति व वसंत पंचमी के स्थान पर वेलेन्टाईन डे की प्रमुखता हावी हो गई है जिसने भारतीय बाज़ारों पर विदेश प्रभावों को चिन्हित सा कर दिया है ।


आज विश्व अर्थव्यवस्था उस दौर में प्रवेश कर चुकी है जब सभी देश व क्षेत्र अपने आर्थिक सामाजिक हितों को सर्वोपरि वरीयता दे रहे हैं । भारत अब तक अपनी बहुत सी विशिष्टताओं के कारण अब तक न सिर्फ़ खुद को मंदी की चपेट को बचाए रख सका है बल्कि विकास की संभावनाओं को भी बरकरार रखा है । इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि समाज अपनी इस ताकत को समझे और फ़िज़ूलखर्ची को हतोत्साहित करके देश की आर्थिक संबलता में सहयोग दे । फ़िज़ूलखर्ची के बीमे से अच्छा है बचत से विकास का रास्ता ।

रविवार, 25 दिसंबर 2011

सज़ा ए मौत : न सज़ा , न मौत




अभी हाल ही में आए कुछ अहम फ़ैसलों में अपराधियों को मौत की सज़ा सुनाई गई । इससे पहले  भी मौत की सज़ा मिले आरोपियों , जिनमें अजमल और अफ़ज़ल जैसे आतंकवादी भी हैं को फ़ांसी दिए जाने में हो रही देर ने फ़ांसी की सज़ा अर पुन: बहस छेड दी । इस बीच सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति का विचार इस सज़ा को मानवीयता के विरूद्ध मानने जैसा आया जिसने इस बहस को एक न्यायमूर्ति का विचार इस सज़ा को मानवीयता के विरूद्ध मानने जैसा आया जिसने इस बहस को एक नई दिशा दे दी ।

ऐसा नहीं है कि फ़ांसी की सज़ा पर पहले बहस-विमर्श नहीं हुआ है । अभी कुछ वर्षों पहले जब धनंज़य चटर्ज़ी नामक एक अपराधी , जिसने एक नाबालिग बच्ची का बलात्कार करने के बाद उसकी हत्या कर दी थी की सज़ा पर बोलते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम ने अपना विचार देते हुए कहा था कि फ़ांसी की सज़ा सिर्फ़ गरीबों को ही न मिले क्योंकि बडे और रसूखदार अपराधी कानून के शिकंज़े से बच निकलते हैं । उनके इस वक्त्यव्य के बाद एक्नई बहस की शुरूआत हो गई थी कि क्य अगरीब और अमीर के लिए कानून की परिभाषा अलग अलग है ।

इससे अलग अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति महोदय ने कैपिटल पनिश्मेंट यानि मौत की सज़ा अक पहुंचने से पहले के विधिक मानक यानि " रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर की परिभाषा को सर्वथा अस्पष्ट करार देते हुए इसे दुरूस्त करने की वकालत की । उन्होनें एक विधि विशेषज्ञ के रूप में  अपनी बात रखते हुए कहा किमौजूदा कानून में दुर्लभतम में से दुर्लभ " अपराध मानए व समझने के लिए कोई स्पष्ट दिशा निर्देश नहीं है इसलिए ये पूर्णतया उस न्यायाधीश के विवेक पर निरभर करता है । यही वजह है किकभी कभी निचली अदालतों द्वारा दी गई अधिकतम सज़ा को ऊपरी अदालतों ने बिल्कुल उलट दिया है ।

विश्व के अन्य प्रमुख देशों में भी मौत की सज़ा को लेकर सवर्था भिन्न भिन्न मत हैं । मानवाधिकारों कीवकालत और मानव जीवन की संरक्षा करने वाले देशों ने मौत की सज़ा को न सिर्फ़ अमानवीय करार दिया हुआ है बल्कि इसे पूरे अंतरराष्ट्रीय कानूनों से हटाने केल इए भी बाकायदा मुहिम छेड रखी है । यदि इतिहास को खंगाला जाए तो अब से लगभग ढाई हज़ार वर्ष पहले फ़ांसी की सज़ा को ईरान में अपनाए जाने के साक्ष्य मिलते हैं वो भी पुरूष अपराधियों के लिए । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक जब तक कि मौत की सज़ा के लिए ज़हर का इंजेक्शन या ऐसी ही किसी अन्य वैकल्पिक प्रणाली प्रचलन में  नहीं आई थी , फ़ांसी की सज़ा ही मुख्य तरीके के रूप में अपनाई जाती रही । आज भी मिस्र , भारत ,पाकिस्तान , मलेशिया , सिंगापुर तथा अमरीका के कुछ राज्यों में यह प्रचलित है ।

संसद पर हमले की दसवीं बरसी पर अफ़ज़ल गुरू की फ़ांसी की सज़ा के क्रियान्वयन में हो रही देरी ने पुन: इस्मुद्दे की ओर ध्यान खींचा है कि किसी अपराधी को मौइत की सज़ा सुनाए जाने और उसे इस सज़ा को दिए जाने के लिए क्या कोई समय सीमा तय होनी चाहिए । धनंजय चटर्ज़ी को सज़ा सुनाए जाने के लगभग डेढ दशक बाद उसे फ़ांसी पर लटकाए जाने के समय भी यही बात प्रमुखता से उछली थी । भारत की बहुस्तरीय न्यायिक व्यवस्था में अंतिम फ़ैसला आने में पहले ही बहुत अधिक विलंब होता है जबकि मौत की सज़ा पाए अपराधियों की अपील का निपटारा वरीयता के आधार पर पहले किया जाता है । अंतिम अदालती फ़ैसले केपश्चात भी मुजरिम के पास राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दाखिल करने का अधिकार होता है और यहीं से विधिक प्रक्रिया सियासी दांव पेंच में उलझ कर रह जाती है । न तो इन दया याचिकाओं के निपटारे की कोई समय सीमा निर्धारित होती है और न ही इन्हें लेकर कोई मापदंड या दिशानिर्देश तय है ।

इसका परिणाम ये होता है कि जेलों में उच्च सुविधा पाए ये अपराधी गुनाहगार होते हुए भी राजकीय मेहमानों सी सुख सुविधा का लाभ उठाते रहते हैं । सालों साल लटकता इनके सज़ा का क्रियान्वयन जहां एक तरफ़ सरकार व शासन पर भारी आर्थिक बोझ डालता है वहीं दूसरी तरफ़ सेनाव अन्य सुरक्षा बलों के मनोबल को भी बुरी तरह गिरा देता है । अफ़ज़ल गुरू व अज़मल कसाब जैसे दुर्दांत आतंकियों के मामलों में तो ये संभावना भी काफ़ी प्रवल रहती है कि इन्हें जेलों से छुडाने के लिए या बदलालेने के लिए इनके साथी इससे ज्यादा बडी आतंकी घटनाओं को अंज़ाम दें ।


वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सरकार व प्रशासन को इस मुद्दे पर दो बातों के लिए अपना रूख बिल्कुल स्पष्ट कर देना चाहिए । पहली बात ये किक्या मौजूदा कानूनी व्यवस्था में मौत की सज़ा देने न देने पर किसी तरह की बहस विमर्श की गुंजाईश है । यदि नहीं तो किस कारण से राज्य की विधानसभाएं अदालतों द्वारा दोषी करार दिए जाने और फ़ांसी की सज़ा सुनाए जाने के बाद उन अपराधियों को माफ़ किए जाने की मांग उठाती हैं । यदि उन मुज़रिमों कोमाफ़ी दिए जाने या न दिए जाने का अधिकार किसी को है तो वो हैं पीडित और उनका परिवार ।

दूसर अहम मुदा है फ़ांसी की सज़ा सुनाने से लेकर फ़ांसी की सज़ा दिए जाने के बीच के समय कोतय किया जाना । आज लगभग सौ अपराधी देश की भिन्न भिन्न अदालतों में मौत की सज़ा सुनाए जाने के बाद मौत की सज़ा कोपाने की प्रतीक्षा में हैं । सरकार प्रशासन व नीति निउअम तय करने वाली संस्थाओं को अविलंब ही इस दिशा में ठोस निर्णय लेना होगा अन्यथा पहले ही सज़ा का खौफ़ खत्म हो चुके अपराधियों के लिए ये बडी सहज़ सी स्थिति होगी और कानून ,न्यायपालिका ,सेना , पुलिस व सुरक्षा बलों के लिए विकट । फ़िलहाल तो पूरा देश अफ़ज़ल व अज़मल कोदेश के प्रति किए गए आपराधिक दु: साहस का दंड दिए जाने के लिए सरकार की ओर देख रहा है ।

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