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शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

आईये जानें कि अदालत "रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर " मुकदमा किसे और कैसे मानती है .....अजय कुमार झा





(ये आलेख मेरे दूसरे ब्लॉग कोर्ट कचहरी पर भी प्रकाशित किया गया है , मगर आज का मुद्दा के पाठकों के लिए इसे यहां प्रकाशित कर रहा हूं )
अभी हाल ही में दो बडे अदालती फ़ैसलों ने आम लोगों का ध्यान फ़िर से अपनी ओर आकृष्ट किया ...या कहा जाए कि उन्हें इस कदर उद्वेलित किया कि वे खुल कर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं ..। जैसा कि स्वाभाविक है कि दोनों में ही अदालती फ़ैसले को अलग अलग मापदंडों , मानवीय भावनाओं , न्यायालीय संवेदनाओं और जाने कैसी कैसी कसौटी पर कसा जा रहा है । अयोध्या विवाद के फ़ैसले के अपने इतर तर्क हैं और इतर प्रभाव भी ....और सबसे बडी बात तो ये है कि अभी सर्वोच्च अपील का अधिकार भी बचा हुआ है दोनों की पक्षों के पास ...और फ़िर चूंकि मामला धर्म और आस्था से जुडा हुआ है इसलिए उस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया भी उसी अनुरूप आ रही हैं । हां जहां तक दूसर बडे फ़ैसले की बात है तो ...यदि सीधे सीधे सपाट तौर पर देखा जाए तो आम जन को जितना अधिक गुस्सा इस बात पर है कि अदालत ने प्रियदर्शनी मट्टू हत्याकांड के मुजरिम ..संतोष सिंह की ..फ़ांसी देकर मौत देने की सजा को कम करके ..उम्र कैद में बदल दिया ..उससे अधिक गुस्सा इस बात को लेकर है कि आखिर किन वजहों से अदालत ने इस मुकदमे को .."..दुर्लभतम में से दुर्लभ " की श्रेणी में क्यों नहीं रखा ???आम आदमी आज यही सवाल उठा रहा है कि ...जब कुछ वर्ष पहले ..सभवत: २००४ में ऐसे ही एक लिफ़्ट चलाने वाले ..अपराधी को बलात्कार के बाद हत्या के दोष में फ़ांसी की सजा दी गई थी ..तो इस मुकदमें में क्या संतोष सिंह को सिर्फ़ इस वजह से ..लाभ मिला है क्योंकि वो एक रसूखदार व्यक्ति (अब दिवंगत )का पुत्र है ...आखिर वो कौन से मापदंड हैं जिन्हें अपना कर अदालतें ये तय करती हैं कि अमुक मुकदमा ..दुर्लभतम में से दुर्लभ की श्रेणी में आता ..या नहीं आता है ।

कोई भी विमर्श करने से पहले दो बातें स्पष्ट कर देनी चाहिए .....। इस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए ..बहुत से व्यक्तियों ने एक ही बात बार बार उठाई कि ..आजीवन कारावास का मतलब तो ये हुआ कि ..चौदह वर्षों की कारावास ....और उसके बाद ..या ऐसे ही कुछ वर्षों के बाद ..जेल से रिहाई ....तो यहां ये स्पष्ट कर दिया जाए कि ..अभी पिछले ही वर्ष दिए गए अपने एक फ़ैसले में माननीय सर्वोच्च अदालत ने ..एक अपील की सुनवाई करते हुए .पूरी तरह से आजीवन कारावास को परिभाषित किया और बताया कि आजीवन कारावास का मतलब ..आजीवन कारावास ही होता है ....आजीवन यानि जीवन पर्यंत ..यानि कि जब तक मुजरिम जीवित है तब तक ....। दूसरी बात ये कि सर्वोच्च अदालत जब भी मौत की सजा वाली अपील पर सुनवाई करती है तो स्वाभाविक नियमानुसार ..इससे पहले ऐसे मामलों की सुनवाई और उनमें सुनाए गए फ़ैसलों मे स्थापित किए गए आदर्शों और मापदंडों को सामने रख कर जरूर परखती है ...और उसके अनुसार ही ..फ़ांसी की सजा देने के लिए .."दुर्लभतम में से भी दुर्लभ " माने गए मुकदमे को साबित करना होता है । हालांकि इसके लिए भारतीय कानून में कहीं कोई निश्चित नियम या उपबंध नहीं है और अदालत इसे स्वयं बहुत से आधारों पर परखती है ।एक अघोषित नियम ये होता है कि जब अदालत को ये महसूस कि मुजरिम को फ़ांसी या मौत से कम कोई भी सजा सुनाने से नाइंसाफ़ी की झलक दिखाई दे तो और सिर्फ़ तभी मौत की सजा सुनाई जानी चाहिए । आईये देखते हैं कि इस बिंदु पर अदालतें क्या कैसे सोचती हैं ..

अभी हाल ही १६.०९. २०१० को सुंदर सिंह बनाम उत्तरांचल सरकार मुकदमें में ऐसे ही एक फ़ांसी की अपील पर सुनवाई करते हुए न सिर्फ़ अदालत ने बहुत सी बातों पर रोशनी डाली बल्कि इसी के साथ ही मुजरिम की फ़ांसी की सजा को भी बरकरार रखा । अभियोजन पक्ष के अनुसार इस मुकदमे में , सुंदर सिंह नामक व्यक्ति ने पांच लोगों को एक घर में पेट्रोल छिडक कर आग लगा दी और बाहर से घर का दरवाजा बंद करके उन्हें जिंदा भून डाला इतना ही नहीं जब उनमें से एक व्यक्ति ने बाहर निकलने की कोशिश की तो उसने उसे दरवाजे के बाहर आते ही अपनी कुल्हाडी से काट कर मार डाला । अदालत ने इस मुकदमे के फ़ैसले पर पहुंचने से पहले इन बातों को सामने रखा । अदालत ने इसे क्रूरतम हत्या मानते हुए इसे" दुर्लभतम में से भी दुर्लभ " मानते हुए सुंदर सिंह की फ़ांसी की सजा को बहाल रखा ।अदालत ने "दुर्लभतम में से भी दुर्लभ "मुकदमों का उदाहरण देते हुए कहा कि , सर्वप्रथम ये मौत की सजा के लिए किसी मापदंड तय करने की बात ..मच्छी सिंह बनाम पंजाब सरकार , वाले मुकदमें में हुई थी । इस मुकदमे का फ़ैसला करते हुए अदालत ने कुछ बिंदु तय किए थे , जिन्हें अधिकतम सजा (मौत ) दिए जाने से पहले न्यायाधीश को परखना चाहिए । जब हत्या निहायत ही क्रूरतम तरीके से , छिप कर , बदला लेने के लिए ,और सिर्फ़ इस वजह से की गई हो कि समाज में उससे घृणा और द्वेष फ़ैल जाए तो वो अपराधी मौत की सजा का हकदार है । जब कोई हत्या नृशंस तरीके से , नीच और शैतानी उद्देश्य के लिए की गई हो । जब किसी निम्न जाति के किसी व्यक्ति की हत्या आपसी रंजिश के लिए न करके सिर्फ़ इस उद्देश्य से की गई हो कि उससे समाज में अशांति और द्वेष फ़ैल जाए तो ,जब अपराध बहुत ही वृहत हो बहुत ही भयानक हो ।अदालत ने कुछ इसी तरह के मापदंड , सुशील मुर्मू बनाम झारखंड राज्य , मामले में भी तय किए थे ।

इस उपरोक्त मुकदमे का फ़ैसला करते समय अदालत ने , धनंजय चटर्जी बनाम पश्चिम बंगाल सरकार, [1994 (2) SCC 220] और राजीव उर्फ़ रामचंद्र बनाम राजस्थान सरकार [1996 (2) SCC 175] का उदाहरण लेते हुए कहा कि , ये दोनों ही मामले दुर्लभतम में से भी दुर्लभ की श्रेणी में आते हैं । पहले में उस युवक ने , पहले तो १४ वर्ष की बच्ची को मार कर घायल कर दिया और फ़िर जब वो दम तोड रही थी तो उसके साथ बलात्कार किया ।दूसरे में मुजरिम ने , अपने तीन मासूम बच्चों और अपनी पत्नी जो कि कुछ ही समय के बाद मां बनने वाली थी की क्रूर हत्या कर दी थी । एक दिलचस्प मुकदमे का उदाहरण उत्तर प्रदेश सरकार बनाम धर्मेंद्र सिंह . [1999 (8) SCC 325], , जिसमें फ़ैसला दिया गया था कि , मुजरिम को फ़ांसी की सजा मिलने में हुई तीन वर्ष की देरी के कारण उसकी मौत की सजा को कम नहीं किया जा सकता और भविष्य में भी ये सजा कम करने के लिए कोई आधार नहीं हो सकता है , त्रिवेणी बेन बनाम गुजरात सरकार ,[1988 (4) SCC 574], ।

अब पहले बात ये कि आम लोग जैसा कि समझ समझा रहे हैं कि आखिर धनंजय चटर्जी और इस मुकदमें में आखिर वो कौन सा फ़र्क था जो कि अदालत ने संतोष सिंह की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया । अदालत ने अपराध की क्रूरता पर कहीं भी ऊंगली नहीं उठाई है न ही इस बात की तुलना की गई है कहीं भी कि , धनजंय चटर्जी वाले मुकदमे की तुलना में प्रियदर्शनी मट्टू हत्याकांड कम क्रूर था जबकि हकीकत यही है कि वो अधिक क्रूर थी । हां अदालत ने संतोष सिंह की ,सजा को कम करने के पीछे जो तर्क रखे वे कुछ इस तरह से हैं । जब निचली अदालत ने उसे बरी किया था तब वो पच्चीस वर्ष का युबक था , और उसके रिहा होने के बाद , उसने विवाह किया और आज वो एक होने वाले बच्चे का पिता बनने जा रहा है , तब से लेकर अब तक स्थितियां बहुत भिन्न हो चुकी हैं । अदालत ने उदाहरण स्वरूप राजीव गांधी हत्याकांड की मुख्य अभियुक्त और फ़ांसी की सजा मिल चुकी नलिनी की सजा को उम्र कैद में बदले जाने को भी उदाहरण में लेते हुए बताया कि , उस मुकदमे में , भी ये साबित हुआ है कि शिवरासन और ग्रुप ने एक औरत का फ़ायदा उठाते हुए पति द्वारा पत्नी पर बनाए गए दबाव को आधार बना कर नलिनी को इसके लिए फ़ंसा दिया था और अब जबकि उसकी कोख में एक नन्हीं सी जान पल रही है तो ऐसे में उसे मौत की सजा दे देना कहीं से भी ठीक नहीं होगा ।

उपरोक्त बहस का तात्पर्य यदि ये निकाला जाए कि , किसी भी मुकदमे को " दुर्लभतम में भी दुर्लभ " की श्रेणी में देखना और दिखाना ..हर मुकदमे के साथ और अदालत को उसे देखने पर ही निर्भर करता है ,...तो गलत नहीं होगा । किंतु ये भी नहीं भूलना चाहिए कि अदालतें अपने हर मुकदमे को कानून की कसौटी पर ही घिस कर उसके धार को परखती है । अभी भविष्य में ऐसे बहुत से मौके आएंगे जहां न सिर्फ़ अदालतों को फ़ैसले पर पहुंचने के बहुत ही मशक्क्त करनी होगी बल्कि उससे अधिक इस बात का ख्याल भी रखना होगा कि उसके फ़ैसले , उसके तर्क और सबसे बढ कर उसके नज़रिए से ...आम जनता भी इत्तेफ़ाक रखे । हालांकि ..बलात्कार जैसे घृणित अपराध के लिए तो ,...मौत से भी बदतर यदि कोई सजा हो तो वो ही मुकर्रर्र की जानी चाहिए ।


अगली पोस्ट का विषय :- ...क्या देश की राजधानी को दिल्ली से ,कहीं और ले जाने की जरूरत है ??

बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

अदालत ने जिस फ़ैसले पर पहुंचने में लिए साठ साल ....उसे समझने में साठ मिनट का भी समय नहीं लिया गया .....अजय कुमार झा




आखिरकार वो घडी भी आ ही गई जिसके लिए ठीक वैसे ही देखा और दिखाया जा रहा था जैसे कि ये भी वो तथाकथित महाप्रलय वाली घडी के समान ही थी कुछ ..और देखिए कि वो बहुत ज्यादा प्रीतीक्षित न भी तो ..बहुत समय से लंबित फ़ैसला तो आ ही गया । ये फ़ैसला कोई आम फ़ैसला नहीं था , असल में तो ये विवाद या मुकदमा ही कोई आम मुकदमा या विवाद नहीं था ..और इससे भी उपयुक्त यदि ये कहा जाए कि ...ये विवाद या मुकदमा नहीं बल्कि ये मुद्दा था ...और जाहिर सी बात है कि आम मुद्दा नहीं था .....होता भी कैसे । आखिर ये देश की आस्था से जुडा हुआ सवाल था ..ये उस समुदाय के अराध्य से जुडा हुआ सवाल था ...जो संख्या के हिसाब से विश्व में गिना जाता है ....और शायद यही वजह रही कि ..इस मुकदमे के फ़ैसले को आते आते इतना बडा वक्त लगा कि आधी शताब्दी भी कम पड गई .... । लेकिन अब सवाल यही उठ रहा है कि ....क्या यही वो सबसे उपयुक्त फ़ैसला है जिसके लिए इतने वर्ष लिए गए ........क्या सचमुच ही इतना समय लेने के बाद अदालत ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया .........और क्या अब इस फ़ैसले से ..सचमुच ही कोई निर्णय ऐसा निकला है जिसे ..सही मायने में कहा जाएगा कि ..सारे विवाद का हल ही निकल आया ....।

इस फ़ैसले के आने के बाद ...एक आम आदमी ..यहां किसी भी धर्म संप्रदाय में बिना बांटे यदि एक आम आदमी की ही बात की जाए तो ....यही सोच रहा है कि ...आखिर न्यायालय ने किसे सही माना या किसे गलत माना ....।आम आदमी के सामने कुछ बातें तो बिल्कुल स्पष्ट हैं ....पहला ये कि अदालत भी आखिरकार वो फ़ैसला नहीं दे सकी जो दुविधा या विवाद को समाप्त कर सके । दूसरी बात ये कि ..इस फ़ैसले पर पहुंचने के लिए अदालत को साठ साल का समय लगा , यदि मोटे मोटे तौर पर देखा जाए तो अदालत ने बस कुछ बातें जरूर ही स्पष्ट कर दीं । पहली ये कि , वो विवादित भूमि नहीं है ......यदि नहीं है तो फ़िर क्या है ...जाहिर है कि ..रामलला की जन्मभूमि है ......। यहां एक बात पर विमर्श करना समीचीन लगता है कि .....आजकल अदालती फ़ैसलों पर तपाक से अपनी राय न सिर्फ़ राय बल्कि ..........सही गलत तक के स्तर तक की ...बहस को जन्म देने का जो एक चलन बनता जा रहा है ...उसने तो न्यायालीय फ़ैसलों को ही प्रश्नचिन्ह के प्रतीक के रूप में स्थापित कर दिया है । अभी भी समाज और साहित्य में अयोध्या विवाद से अधिक अयोध्या के इस फ़ैसले पर ही लिखा पढा जा रहा है ।

भारतीय न्यायपालिका ....बेशक बहुत ही धीमी .....बहुत ही अप्रायोगिक ..और कई बात बहुत ही ...क्रियाशील या अतिसक्रियता की शिकार लगती हो ......ये भी सही है कि पिछले कुछ समय में न्यायपालिका के अपने मापदंडों में ही गिरावट आने के कारण उसने खुद की साख भी खोई है ........मगर इसके बावजूद .........जी हां , इसके बावजूद भारतीय न्यायपालिका अब भी .....आम आदमी के विश्वास ...से पूर्णतया विमुख नहीं हुई है ....। बेशक आज के दौर में ......न्यायिक फ़ैसलों पर बहुत तरह के समीकरण की छाप देखी और दिखाई जाती हो .......बेशाक ये भी माना जा सकता है कि ...बहुत बार आम व्यक्ति को यही लगता है कि ..न्यायपालिका को ..दिखाने सुनाने के लिए अब बहुत अधिक शोर मचाना पडता है और जिसे देश का मीडिया बखूबी करता है .....मगर इन सबके बावजूद ये कतई नहीं माना जा सकता कि ..न्यायाधीश के ओहदे पर बैठा .....व्यक्ति ..आम आदमी की ही सोच और समझने की शक्ति रखता है .....निश्चित रूप से ..उसे मिली विधि की शिक्षा और उसका प्रयोगीकरण की शक्ति ...उसमें एक आम साधारण सोच से ऊपर रखती है । किंतु एक आम आदमी उसी फ़ैसले की चीडफ़ाड करते समय ये भूल जाता है कि ...वो फ़ैसला उसके लिए ....महज एक किस्से का ब्यौरा देने भर जैसा है ..जबकि अधिवक्ताओं और न्यायाधीश की संयुक्त टीम के लिए कानून के हर हर्फ़ को पकड कर.....उसे न्यायतुला पर भलीभांति तौलमाप करके ..एक ऐसा निर्णय लेना होता है ..जो सच में ही फ़ैसले जैसा लगे । .यहां ये नहीं भूलना चाहिए कि ..भारतीय न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण सूत्र है कि , न्याय सिर्फ़ होना नहीं चाहिए ..बल्कि न्याय हुआ है .,.ऐसा महसूस भी होना चाहिए ।

अदालत ने आज के इस दौर में भी जब कि खुद न्यायपालिका ने अपनी रफ़्तार को गति देने के लिए जाने कितनी ही मह्त्वाकांक्षी योजनाएं चला रखी हैं ..एक एक मुकदमे पर ...खासकर ..पुराने मुकदमों पर बारीकी से नज़र रखी जा रही है ..क्योंकि अब उसे मीडिया के साथ साथ आम समाज भी ये एहसास दिला रहा है कि .यदि इतना विलंबित न्याय ही देना है तो फ़िर ...ये भी अन्याय समान ही है....ऐसी स्थिति में भी यदि अदालत को किसी फ़ैसले पर पहुंचने में साठ साल का लंबा समय लग गया तो इतना तो मानना ही पडेगा कि ..कहीं न कहीं कमी या चूक तो हुई है ।

मगर अब जबकि अदालत ने अपना फ़ैसला सुना दिया है तो फ़िर ....कभी राम के नाम पर , तो कभी वाम के नाम पर , और कभी आम (आदमी ) के नाम पर ..इस तरह की चिल्ल पों क्यों मचाई जा रही है । शायद उनके लिए तो ये किसी सदमे से कम नहीं है जो ये सोच के बैठे थे कि फ़ैसले के बाद एक बार फ़िर से कोई अंधी लडाई शुरू हो जाएगी ....और उस आड ने जाने कैसी कैसी राजनीति बनाई और बिगाडने का खेल चल निकलेगा । अदालत ने ठीक उलटा कर दिया सारा का सारा माजरा । होना तो ये चाहिए था कि ..जो लोग शिला पूजन के लिए , उस बाबरी मस्जिद ( मुझे एक आम आदमी के रूप में ये कहने में तनिक भी झिझक नहीं है कि वो बाबरी मस्जिद जो कि यकीनन एक मंदिर को तोड कर बनाई गई थी ) को ढहाने वाले लोगों को बिना विलंब के ही राम मंदिर का निर्माण शुरू कर देना चाहिए । आखिर इस बात की प्रतीक्षा ही क्यों की जाए ..कि ये सारा मामला एक बार फ़िर सर्वोच्च अदालत में फ़ैसले के लिए टुकुर टुकुर ताकने की परिणति तक पहुंचेगा । आखिर अभी तो कोई रोक नहीं है न ..।

इस अदालती फ़ैसले के प्रतिक्रियात्मक लेखों विचारों में एक बात बार बार निकल कर आ रही है कि , अदालत ने निर्णय विवाद से परे जा कर दिया ..और वो नहीं कहा जो उसे कहना चाहिए था ..बल्कि एक अन्य निर्णय ले लिया ..जो कि गलत है । तो क्या करना चाहिए था अदालत को .....?????सिर्फ़ ये भर कह देना कि अदालत को ऐसा नहीं करना चाहिए था ....से इतिश्री नहीं की जा सकती इस मामले की । आखिर इतने बरसों तक कानूनविदों की पूरी जमात जो बात समझने की कोशिश करती रही ..उसे कैसे चुटकियों में ..कुछ प्रतिक्रियात्मक लोगों ने समझ लिया ....मानो बच्चों का खेल था सब कुछ बेकार ही इतना समय लिया गया ..और यदि उन्हें मौका दिया गया होता तो वे कब का दूध का दूध और पानी का पानी कर चुके होते । हालांकि अब भी कौन सा समय निकल गया है ..अब भी अपीलीय अदालत में उन सभी को अपनी ये दलीलें , ये खोखले और भडकीले तर्क रखने का पूरा मौका दिया जाएगा ..मगर उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए कि ..उस अदालत में फ़ैसला सुनाने वाले भी उन्हीं भारतीय कानूनों की व्याख्या करते हैं जो कानून की किताब निचली अदालतों ने देखी पढी होती हैं । ये तो आने वाला समय ही तय करेगा कि अभी इस मुद्दे को कितने और समय के लिए विवाद का अभिशाप झेलना लिखा है । मगर आज यदि इतनी निर्भीकता से और कई बार तो दुस्साहसिक होकर ...कभी भी कहीं भी न सिर्फ़ राम बल्कि हिंदू आस्था को कटघरे में रख कर खडे हो जाते हैं तो वो सिर्फ़ दो कारणों से है ..एक तो भारत सरकार के किन्नरी व्यक्तित्व के कारण ...और दूसरा इतना हो जाने के बावजूद भी हिंदू का कट्टरता को उस चरम को नहीं छू पाना जो अन्य समकालीनों ने अपना रखा है । और उन्हें ये भलीभांति समझ जाना चाहिए कि ..ऐसा सिर्फ़ और सिर्फ़ इस देश में ही संभव है ..........न हो तो अपनी आखें पसार के इसे देख और महसूस कर सकते हैं ..यदि वास्तव में करना चाहें तो ।



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