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बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

अदालत ने जिस फ़ैसले पर पहुंचने में लिए साठ साल ....उसे समझने में साठ मिनट का भी समय नहीं लिया गया .....अजय कुमार झा




आखिरकार वो घडी भी आ ही गई जिसके लिए ठीक वैसे ही देखा और दिखाया जा रहा था जैसे कि ये भी वो तथाकथित महाप्रलय वाली घडी के समान ही थी कुछ ..और देखिए कि वो बहुत ज्यादा प्रीतीक्षित न भी तो ..बहुत समय से लंबित फ़ैसला तो आ ही गया । ये फ़ैसला कोई आम फ़ैसला नहीं था , असल में तो ये विवाद या मुकदमा ही कोई आम मुकदमा या विवाद नहीं था ..और इससे भी उपयुक्त यदि ये कहा जाए कि ...ये विवाद या मुकदमा नहीं बल्कि ये मुद्दा था ...और जाहिर सी बात है कि आम मुद्दा नहीं था .....होता भी कैसे । आखिर ये देश की आस्था से जुडा हुआ सवाल था ..ये उस समुदाय के अराध्य से जुडा हुआ सवाल था ...जो संख्या के हिसाब से विश्व में गिना जाता है ....और शायद यही वजह रही कि ..इस मुकदमे के फ़ैसले को आते आते इतना बडा वक्त लगा कि आधी शताब्दी भी कम पड गई .... । लेकिन अब सवाल यही उठ रहा है कि ....क्या यही वो सबसे उपयुक्त फ़ैसला है जिसके लिए इतने वर्ष लिए गए ........क्या सचमुच ही इतना समय लेने के बाद अदालत ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया .........और क्या अब इस फ़ैसले से ..सचमुच ही कोई निर्णय ऐसा निकला है जिसे ..सही मायने में कहा जाएगा कि ..सारे विवाद का हल ही निकल आया ....।

इस फ़ैसले के आने के बाद ...एक आम आदमी ..यहां किसी भी धर्म संप्रदाय में बिना बांटे यदि एक आम आदमी की ही बात की जाए तो ....यही सोच रहा है कि ...आखिर न्यायालय ने किसे सही माना या किसे गलत माना ....।आम आदमी के सामने कुछ बातें तो बिल्कुल स्पष्ट हैं ....पहला ये कि अदालत भी आखिरकार वो फ़ैसला नहीं दे सकी जो दुविधा या विवाद को समाप्त कर सके । दूसरी बात ये कि ..इस फ़ैसले पर पहुंचने के लिए अदालत को साठ साल का समय लगा , यदि मोटे मोटे तौर पर देखा जाए तो अदालत ने बस कुछ बातें जरूर ही स्पष्ट कर दीं । पहली ये कि , वो विवादित भूमि नहीं है ......यदि नहीं है तो फ़िर क्या है ...जाहिर है कि ..रामलला की जन्मभूमि है ......। यहां एक बात पर विमर्श करना समीचीन लगता है कि .....आजकल अदालती फ़ैसलों पर तपाक से अपनी राय न सिर्फ़ राय बल्कि ..........सही गलत तक के स्तर तक की ...बहस को जन्म देने का जो एक चलन बनता जा रहा है ...उसने तो न्यायालीय फ़ैसलों को ही प्रश्नचिन्ह के प्रतीक के रूप में स्थापित कर दिया है । अभी भी समाज और साहित्य में अयोध्या विवाद से अधिक अयोध्या के इस फ़ैसले पर ही लिखा पढा जा रहा है ।

भारतीय न्यायपालिका ....बेशक बहुत ही धीमी .....बहुत ही अप्रायोगिक ..और कई बात बहुत ही ...क्रियाशील या अतिसक्रियता की शिकार लगती हो ......ये भी सही है कि पिछले कुछ समय में न्यायपालिका के अपने मापदंडों में ही गिरावट आने के कारण उसने खुद की साख भी खोई है ........मगर इसके बावजूद .........जी हां , इसके बावजूद भारतीय न्यायपालिका अब भी .....आम आदमी के विश्वास ...से पूर्णतया विमुख नहीं हुई है ....। बेशक आज के दौर में ......न्यायिक फ़ैसलों पर बहुत तरह के समीकरण की छाप देखी और दिखाई जाती हो .......बेशाक ये भी माना जा सकता है कि ...बहुत बार आम व्यक्ति को यही लगता है कि ..न्यायपालिका को ..दिखाने सुनाने के लिए अब बहुत अधिक शोर मचाना पडता है और जिसे देश का मीडिया बखूबी करता है .....मगर इन सबके बावजूद ये कतई नहीं माना जा सकता कि ..न्यायाधीश के ओहदे पर बैठा .....व्यक्ति ..आम आदमी की ही सोच और समझने की शक्ति रखता है .....निश्चित रूप से ..उसे मिली विधि की शिक्षा और उसका प्रयोगीकरण की शक्ति ...उसमें एक आम साधारण सोच से ऊपर रखती है । किंतु एक आम आदमी उसी फ़ैसले की चीडफ़ाड करते समय ये भूल जाता है कि ...वो फ़ैसला उसके लिए ....महज एक किस्से का ब्यौरा देने भर जैसा है ..जबकि अधिवक्ताओं और न्यायाधीश की संयुक्त टीम के लिए कानून के हर हर्फ़ को पकड कर.....उसे न्यायतुला पर भलीभांति तौलमाप करके ..एक ऐसा निर्णय लेना होता है ..जो सच में ही फ़ैसले जैसा लगे । .यहां ये नहीं भूलना चाहिए कि ..भारतीय न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण सूत्र है कि , न्याय सिर्फ़ होना नहीं चाहिए ..बल्कि न्याय हुआ है .,.ऐसा महसूस भी होना चाहिए ।

अदालत ने आज के इस दौर में भी जब कि खुद न्यायपालिका ने अपनी रफ़्तार को गति देने के लिए जाने कितनी ही मह्त्वाकांक्षी योजनाएं चला रखी हैं ..एक एक मुकदमे पर ...खासकर ..पुराने मुकदमों पर बारीकी से नज़र रखी जा रही है ..क्योंकि अब उसे मीडिया के साथ साथ आम समाज भी ये एहसास दिला रहा है कि .यदि इतना विलंबित न्याय ही देना है तो फ़िर ...ये भी अन्याय समान ही है....ऐसी स्थिति में भी यदि अदालत को किसी फ़ैसले पर पहुंचने में साठ साल का लंबा समय लग गया तो इतना तो मानना ही पडेगा कि ..कहीं न कहीं कमी या चूक तो हुई है ।

मगर अब जबकि अदालत ने अपना फ़ैसला सुना दिया है तो फ़िर ....कभी राम के नाम पर , तो कभी वाम के नाम पर , और कभी आम (आदमी ) के नाम पर ..इस तरह की चिल्ल पों क्यों मचाई जा रही है । शायद उनके लिए तो ये किसी सदमे से कम नहीं है जो ये सोच के बैठे थे कि फ़ैसले के बाद एक बार फ़िर से कोई अंधी लडाई शुरू हो जाएगी ....और उस आड ने जाने कैसी कैसी राजनीति बनाई और बिगाडने का खेल चल निकलेगा । अदालत ने ठीक उलटा कर दिया सारा का सारा माजरा । होना तो ये चाहिए था कि ..जो लोग शिला पूजन के लिए , उस बाबरी मस्जिद ( मुझे एक आम आदमी के रूप में ये कहने में तनिक भी झिझक नहीं है कि वो बाबरी मस्जिद जो कि यकीनन एक मंदिर को तोड कर बनाई गई थी ) को ढहाने वाले लोगों को बिना विलंब के ही राम मंदिर का निर्माण शुरू कर देना चाहिए । आखिर इस बात की प्रतीक्षा ही क्यों की जाए ..कि ये सारा मामला एक बार फ़िर सर्वोच्च अदालत में फ़ैसले के लिए टुकुर टुकुर ताकने की परिणति तक पहुंचेगा । आखिर अभी तो कोई रोक नहीं है न ..।

इस अदालती फ़ैसले के प्रतिक्रियात्मक लेखों विचारों में एक बात बार बार निकल कर आ रही है कि , अदालत ने निर्णय विवाद से परे जा कर दिया ..और वो नहीं कहा जो उसे कहना चाहिए था ..बल्कि एक अन्य निर्णय ले लिया ..जो कि गलत है । तो क्या करना चाहिए था अदालत को .....?????सिर्फ़ ये भर कह देना कि अदालत को ऐसा नहीं करना चाहिए था ....से इतिश्री नहीं की जा सकती इस मामले की । आखिर इतने बरसों तक कानूनविदों की पूरी जमात जो बात समझने की कोशिश करती रही ..उसे कैसे चुटकियों में ..कुछ प्रतिक्रियात्मक लोगों ने समझ लिया ....मानो बच्चों का खेल था सब कुछ बेकार ही इतना समय लिया गया ..और यदि उन्हें मौका दिया गया होता तो वे कब का दूध का दूध और पानी का पानी कर चुके होते । हालांकि अब भी कौन सा समय निकल गया है ..अब भी अपीलीय अदालत में उन सभी को अपनी ये दलीलें , ये खोखले और भडकीले तर्क रखने का पूरा मौका दिया जाएगा ..मगर उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए कि ..उस अदालत में फ़ैसला सुनाने वाले भी उन्हीं भारतीय कानूनों की व्याख्या करते हैं जो कानून की किताब निचली अदालतों ने देखी पढी होती हैं । ये तो आने वाला समय ही तय करेगा कि अभी इस मुद्दे को कितने और समय के लिए विवाद का अभिशाप झेलना लिखा है । मगर आज यदि इतनी निर्भीकता से और कई बार तो दुस्साहसिक होकर ...कभी भी कहीं भी न सिर्फ़ राम बल्कि हिंदू आस्था को कटघरे में रख कर खडे हो जाते हैं तो वो सिर्फ़ दो कारणों से है ..एक तो भारत सरकार के किन्नरी व्यक्तित्व के कारण ...और दूसरा इतना हो जाने के बावजूद भी हिंदू का कट्टरता को उस चरम को नहीं छू पाना जो अन्य समकालीनों ने अपना रखा है । और उन्हें ये भलीभांति समझ जाना चाहिए कि ..ऐसा सिर्फ़ और सिर्फ़ इस देश में ही संभव है ..........न हो तो अपनी आखें पसार के इसे देख और महसूस कर सकते हैं ..यदि वास्तव में करना चाहें तो ।



3 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसा सिर्फ़ और सिर्फ़ इस देश में ही संभव है ..........न हो तो अपनी आखें पसार के इसे देख और महसूस कर सकते हैं ..यदि वास्तव में करना चाहें तो ।


    -बिल्कुल सही कहा.

    उत्तर देंहटाएं
  2. अदालत ने जिस फ़ैसले पर पहुंचने में लिए साठ साल ....उसे समझने में साठ मिनट का भी समय नहीं लिया गया.....

    आपने बिल्कुल सही कहा
    ऐसा इस देश में ही संभव है

    "मैं जानूंगा कैसे कि ...आप क्या सोचते हैं " तो आप इसे देख सकते हैं ..

    http://vivekmishra001.blogspot.com/2010/10/blog-post_04.html

    http://vivekmishra001.blogspot.com/2010/10/blog-post_9461.html

    उत्तर देंहटाएं

मुद्दों पर मैंने अपनी सोच तो सामने रख दी आपने पढ भी ली ....मगर आप जब तक बतायेंगे नहीं ..मैं जानूंगा कैसे कि ...आप क्या सोचते हैं उस बारे में..

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