शनिवार, 24 अगस्त 2019

आखिर कब रुकेंगी सड़क दुर्घटनाएँ



सड़क दुर्घटनाओं की खबरें अब नियमित  रूप से समाचारों में देखने पढ़ने व सुनने को मिल जाती हैं | अफ़सोस और उससे अधिक चिंता की बात ये है की इन घटनाओं में लगातार इज़ाफ़ा ही हो रहा है | दो पहिआ वाहन से लेकर चार पहिया वाहन और भारी वाहन तक कोई भी इससे अछूता नहीं है | इत्तेफाक से जहाना केंद्र सरकार मोटर वाहन अधिनियम में महत्वपूर्ण संशोधन कर चुकी है वहीं राजधानी की प्रदेश सरकार ने भी अभी कुछ समय  पूर्व ही सड़क दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या के कारणों का अध्ययन  करके  इसे दूर करने के लिए जरूरी उपाय समेत परिवहन परिचालन व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए कई उपचारात्मक कदम उठाए  हैं | 

इस विषय पर आगे विमर्श से पहले कुछ तथ्यों कथ्यों पर नज़र डालते हैं | परिवहन व्यवस्था में सुधार के लिए दिशा निर्देश जारी करने के उद्देश्य से दायर याचिका की सुनवाई करते हुए माननीय न्यायमूर्ति ने टिप्पणी करते हुए  कहा था की इस देश में अपराध और आतंकी घटनाओं में उतने लोग नहीं मरते जितने कि सड़क दुर्घटनाओं में रोज़ मर रहे हैं | सड़क दुर्घटनाओं   के कारण होने वाली मौतों के पीछे वजह का अध्ययन करने वाली संस्था "रोड एक्सीडेंट सेफ्टी मूवमेंट " के सर्वेक्षण में यह बात सामने निकल कर आई है की भारत में ४७ प्रतिशत  पीड़ितों की मृत्यु सिर्फ इसलिए हो जाती है क्योंकि समय पर उन्हें प्राथमिक उपचार नहीं मिल पाता | 

पिछले दो दशकों में सड़क दुर्घटनाओं में लगातार वृद्धि होने के कुछ  प्रमुख कारणों को रेखांकित किया जाए तो वे कुछ इस तरह सामने आते हैं | इन कारणों में सबसे पहला और सबसे मुख्य कारण खुद सड़कें हैं | भारतीय रोड रिसर्च संस्थान की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि  मानक नियमों की अनदेखी रख रखाव व पुनर्निर्माण में लापरवाही तथा दिल्ली जैसे महानगरों में सडकों पर भागते वाहनों का दस गुना अधिक दबाव स्थिति को बेहद नारकीय बना रहा है | भारत जैसे देशों जहां परिवहन नियमों की अनदेखी के कारण एक्सप्रेस वे तथा विशेष कॉरीडोर में भी सड़क दुर्घटनाओं में काफी इज़ाफ़ा होता रहा है |  दिली से सटे आगरा एक्सप्रेस वे तो इन सड़क दुर्घटनाओं के कारण कुख्यात सा हो गया है | 

अगली बड़ी वजह है भारत में चलाए जा रहे व निर्मित वाहनों में अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा मानकों की भारती अनदेखी | दुर्घटना के पश्चात पड़ने वाले प्रभाव  व यात्रियों को उससे होने वाले नकसान के लिए किये गए एक परीक्षण में १० में से सिर्फ ३ ही वो भी आंशिक रूप से सफल रहीं | अन्य सात में चालाक व यात्रियों के बचने की संभावना बहुत कम रही | विडम्बना देखिये कि एक तरफ जहां नई स्कूटी मोटरसाइकिल में २४ घंटे अनवरत जलने वाली हेडलाईट का प्रयोग किया जा रहा है जबकि सर्दियों में धुंध  बीच ड्राइविंग करने के लिए प्रयोग की जानी वाली विशेष पीली रौशनी हेड लाइट का प्रयोग न के बराबर होता है  सर्दियों में धुंध व कोहरा सड़क दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण है | 

भारत विश्व का अकेला ऐसा देश है जहां  वाहन चलाने के लिए दिए जाने वाले लाइसेंस की परिक्षा में १० प्रतिशत से भी कम लोग फेल होते हैं | अप्रशिक्षित चालकों को लाइसेंस मिल जाना व नकली लाइसेंस प्राप्त कर/बना कर वाहन चलाना जितना भारत में आसान है वो पड़ोस के छोटे देशों में भी नहीं है | इसका दुष्परिणाम ये हुआ  आंकड़ों के अनुसार चालकों व बिना लाइसेंस या नकली लाइसेसं धारक चालाक व बिना लाइसेंस या नकली लाइसेंस धारक चालाक ही दोषी होते हैं | बस ट्रक टेम्पो  आदि में तो कई बार बड़ी दुर्घटनाओं को अंजाम देने वाचालाक वास्तव में कंडक्टर व क्लीनर तक निकले हैं |  महानगरों में बहुत काम उम्र में बहुत तेज़ गति से कार काऊंटी चलाते बच्चों ने तो मानो कहर बरपाया हुआ है | विदेश निर्मित वाहनों में असीमिति रफ़्तार की व्यवस्था वाली कारों आदि को  भारत जैसे अधिक ट्रैफिक जनसंख्या वाले देश में दौड़ाना किसी बम से कम नहीं है |  

दुर्घटना के लिए जिम्मेदार कारकों में एक और मुख्य कारण है शराब पीकर गाड़ी चलाना | "शराब पीकर गाड़ी न चलाएं " यह वाक्य लगभग हर सड़क और राजमार्गों पर लिखा होता है ,सिर्फ एक इस नियम के पालन से देश में दुर्घटनाओं की संख्या में ५० प्रतिशत तक की कमी लाई जा सकती है | एक बात और उल्लेखनीय है कि ऐसे मामलों में चालक और पीड़ित के मौत की संभावना ७८ प्रतिशत तक अधिक हो जाती है 7  शराब पीकर वाहन चलाने वाले किसी आत्मघाती आतंकी की तरह होते हैं |  

हालांकि ऐसा नहीं है की सरकार प्रशासन व पुलिस इससे चिंतित नहीं है या इनकी रोकथाम के लिए कोई उपाय नहीं कर रही है |  मई २०१८ में दिल्ली की प्रदेश सरकार ने "दिल्ली सड़क सुरक्षा नीति " को प्रस्तुत करते हुए जानकारी दी कि राजधानी दिल्ली में इस वक्त लगभग ११ करोड़ पंजीकृत वाहन हैं व प्रतिवर्ष ७ लाख नए वाहनों का पंजीकरण होता है | इसके बावजूद वर्ष २०११ से अब तक सड़क दुर्घटनाओं की संख्या में मामूली ही सही मगर कमी तो आई है | इस नीति में २०१८ -२०२० तक इन दुर्घटनाओं में मौतों की संख्या में ३० प्रतिशत तक और २०२५ तक ८० प्रतिशत की कमी उद्देश्य रखा गया है |  इसके लिए सरकार ने विस्तृत कार्ययोजना बनाई है व समय समय पर इनकी समीक्षा व कार्यवाही रिपोर्ट भी ली जाएगी |  

दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने अभी हाल ही में मोटर वाहन दुर्घटनाओं के लिए चालकों को अधिक सजग व सचेत  करने के उद्देश्य से मोटर वाहन दुर्घटना अधिनियम में भारी संशोधन कर नियमों की अवहलेना करने के दोषियों पर अधिक जुर्माने व दंड का प्रावधान कर अपनी मंशा जाता दी है | किन्तु ये सभी उपाय, नियम तभी प्रभावी व सार्थक होंगे जब व्यक्ति खुद संवेदनशील  व जिम्मेदार होगा | फिलहाल तो ये सड़कें मौत की मंज़िल बनी हुई हैं | 

मंगलवार, 21 अगस्त 2018

मुख्यमंत्री जी को कोई करने नहीं देता , मुझे कोई रोकता नहीं



पहले दिन गुजरते हुए 



अगले दिन गुजरते हुए

आइए आपको दिखाते हैं कि हम क्या करते हैं और और हम सब क्या कर सकते हैं । इन दोनों तस्वीरों को बड़ा करके देखिए , फर्क तो आपको आसानी से दिख जाएगा ।


बिटिया बुलबुल को उसकी नृत्य कक्षा में छोड़ कर वापस घर जा रहा होता हूँ । अचानक पूर्वी  के इस निकाय पर नज़र पड़ती है । आदतन मैं मोबाईल निकाल लेता हूँ । क्लिक क्लिक क्लिक । तभी वहीं पास खड़ा व्यक्ति मुझे इस नज़र से देखता है , मानो मैं कोई अपराध कर रहा हूँ ।

"फ़ोटो क्यों खींच रहा है" 

मैं मुस्कुरा कर उसे जला कर भस्म कर देने वाले अंदाज़ में उससे कहता हूँ । कल मेरी शादी है यहाँ , कहते कहते अपना आई कार्ड नुमाया कर देता हूँ । वो खिसक लेता है ।


अगले दिन दफ्तर पहुंच कर सबसे पहला काम । तगड़ी फटकार नगर निगम के दफ्तर से फोन उठाने वाले महारथी ।
आप कौन हो , कैसे बोल रहे हो , फिर से वही बात । और मेरा स्वर तल्ख हो जाता है । उसी शाम ,स्वच्छ भारत । 

कहाँ हो भजप्पा के पप्पा , और पप्पू के चप्पू , बिचारे धारीवाल जी को क्या कहें , वो निरीहप्राणी तो पहले ही कहता है मुझे कुछ करने नहीं देते ।


मुझे कोई रोक नहीं पाता करने से , मैं रोके रुकता भी नहीं हूँ । तो आप क्यूँ रुके हैं

बुधवार, 1 नवंबर 2017

पाखडं का साम्राज्य




महंत सुन्दर दास ...धर्म और आस्था के नाम पर आडम्बर और धूर्तता से अकूत धन संपत्ति का मालिक बना एक और पाखंडी , इन दिनों चर्चा में है .....कारण भी कोई नया नहीं ...स्त्री का शोषण | समझ में नहीं आता कि इन हैवानों पर क्रोध किया जाए या उन मूर्ख महिलाओं , स्त्रियों , युवतियों के ऊपर क्षुब्ध हुआ जाए जो आसानी से इनके चंगुल में फंस जाती हैं |


इनसे भी अधिक गुस्सा , सरकार , प्रशासन , पुलिस और ये सबसे पहले सबसे तेज़ , चीखते चिल्लाते मीडिया पर आता है ...जो बरसों तक ये सब जानते बूझते हुए भी चुपचाप सब कुछ देखते रहते हैं | इस पाखंडी पर वर्ष 2000 से उच्च न्यायालय में मुकदमा चल रहा है | स्थानीय थाने में सालों से सात आठ प्राथमिकी दर्ज़ हैं इस धूर्त महंत के खिलाफ , जिसमें से एक ,महंत के आश्रम की शिष्या को ज़िंदा जला कर मार देने जैसे घृणित अपराध की भी है |


कहाँ हैं वे न्यायालय जो सड़क , नाले , हवा , आदि स्वतः संज्ञान लेने को आतुर रहते हैं ??


कहाँ है वो पुलिस , सीआईडी , सीबीआई जो समाज में घटते ऐसे अपराधों के अड्डे और इसके करता धर्ता की बू नहीं सूंघ पाई ??


कहाँ है सुशासन का दावा करने वाली प्रदेश सरकार और उसके नुमाईंदे ??


सब यहीं हैं ...सालों से ,बरसों से ...और वो पाखंडी धूर्त महंत भी ..इतने ही सालों से ..ये सब करता चला आ रहा है | देश के भीतर पनप रहे ऐसे घुन सरीखे अपराधियों के पहचान करके उन्हें पूरी तरह समाप्त करना , देश के लिए किसी भी जरूरी काम से ज्यादा जरूरी है |


ये भी एक संयोग मात्र ही है कि सालों तक कांग्रेसी राज़ में पनपे ये पाप के घड़े ठीक उसी सरकार में फूट रहे हैं जिस पर हिन्दुवादी होने का आरोप लगातार लग रहा है |

शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2016

बदलती सामरिक स्थिति ...





नरेंद्र मोदी की पूर्ण बहुतमत की सरकार का गठन करके ,भारतीय जनमानस ने यह स्पष्ट सन्देश दे दिया था कि ,भारतीय राजनैतिक परिदृश्य और राष्ट्रीय विचारधारा में निश्चित रूप से , पूर्व से इतर कुछ ,ठोस परिवर्तन होने जा  रहे  हैं | इनमें पहला था पड़ोसियों के साथ  बेहतर व् स्पष्ट  रिश्तों  की शुरुआत | पिछले दो वर्ष की बहुत सी तारीखें इस   बात की गवाह रही हैं ,कि भारत की नई सरकार ने शपथ ग्रहण के समय से ही पूरे विश्व के साथ नए व् बेहतर सम्बन्ध की शुरुआत करके वैश्विक ग्राम और वसुधैव कुटुम्बकम की परिकल्पना को साकार करने में मन व् प्रत्यक्षतः खुद को लगातार साबित करने का प्रयास किया |

हालांकि पिछले कुछ दशकों में मुस्लिम चरमपंथ , पेट्रो रिजर्व क्षेत्रों पर नियंत्रण व् आर्थिक मंदी  के कारण विश्व के बहुत से भागों में अलगाववादियों व् आतंकियों ने अपने अस्तित्व  को शेष दुनिया को समाप्त करने से जोड़ कर उन्मादी , हिंसक व् अंतहीन संघर्ष "जेहाद" के नाम पर छेड़ दिया | विकास व् सृजन की दौड़ में खुद को पीछे रखने वाली ये कबायली सभ्य्तायें  जब पश्चिमी देशों की घोर एशो आराम और उपभोगी संस्कृति के संपर्क मे आए तो स्वाभाविक रूप से संघर्ष शुरू हो आया |

भारत प्रारम्भ से ही सनातन संस्कृति का वाहक होने कारण सर्वग्राह्य व् सर्व धर्म समभाव की परिपाटी पर ही चलता रहा | आधुनिक राजीनति में धर्म , जाति , आदि के समावेश और उससे अधिक दुरुपयोग ने कालान्तर में विदेशी प्रशासकों को यह अवसर दे दिया कि उन्होंने भू क्षेत्र का विभाजन करके एक शास्वत समस्या और संघर्ष का बीजारोपण कर दिया | पाकिस्तान , बांग्लादेश और चीन जैसे अमित्र पड़ोसियों की उपस्थिति से उत्पन्न अवश्यम्भावी घटनाओं, व्  आक्रमणों  से आक्रान्त , भारत , नई सरकार बनने के बाद नई नीतियों व निर्णयों के अधीन अग्रसर हो चुका था |

पिछले दो वर्षों में उत्पन्न अनेकों अवसर पर एक प्रशासक व् निजी मित्र के रूप में भी पाकिस्तान , उनके हुक्मरान , पाकिस्तानी अवाम सहित पूरे विश्व को अपने प्रयत्न , मतवी व् संबोधन से स्पष्तः अवगत करा दिया था कि आतंकवाद के रास्ते को छोड़ विकास व् सहभागिता के रास्ते पर चलना होगा | किन्तु  आचरण व् चरित्र के अनुरूप वही गलतियां दोहराता पाकिस्तान आज जबरन दोनों देशो को युद्ध के मुहाने तक खींच लाया है | वर्तमान में नियंत्रण रेखा पर जो स्थिति है वह पिछले बीस वर्षों में अब तक की सबसे तनावपूर्ण स्थिति है | रही सैन्य तैयारियों की बात तो हालिय६आ वैश्विक हालातों तथा आतंकवादियों की बढ़ती गतिविधियों व् खतरे के मद्देनज़र लगभग हर देश की सेना सतर्क व् सचेत मोड पर ही है | भारत सेना सतर्क व् सचेत मोड पर ही है | भारत के लिए सुरक्षा एजेंसियों की तरफ से जारी हाई अलर्ट के कारण अव नियंत्रण रेखा पर सर्दियों में घुसपैठ की आशंका के कारण सेना पहले ही सतर्क व् लैस थीं हालांकि विशेषज्ञों की माने तो भार्ते४एय सैन्य बल को पूरी तरह से तैयार होने के लिए कुछ चुनौतियों से जूझना होगा |

पूर्व सेना उपप्रमुख ले.जे. फिलिप काम्प्स ने पठानकोट हमले के बाद सैन्य तैयारियों का पुनर्सर्वेक्षण कर रिपोर्ट पेश करते हुए अनुशंसा की , कि भारतीय सेना में उपयोग किए जाने वाले लगभग  , 1000 पुराने T-72 टैंकों को तुरंत ही अत्याधुनिकीकरण की जरूरत है | वर्तमान में विशेष कमांडो द्वारा  उपयोग में लाए जाने वाले इंसास (इन्डियन स्माल आर्म्स सिस्टम) राइफलों का नारंगी रंग रात्रि युद्ध के लिए सर्वथा अनुपयुक्त बताया गया है , जिसमें सुधार के लिए प्रयास किये जा रहे हैं |
वर्ष 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार सेना में 9100 अधिकारियों की कमी बताई गई जिन्हें जल्द से जल्द भरा जाना चाहिए | देश में निर्मित टैंक अर्जुन एम् के II में इस्राईली राकेटों के लिए फिटिंग की समस्या पर भी काम किया जा रहा है | सेना को अपने जवानों के लिए 3 ,50, 000 बुलेट प्रूफ जैकेटों की जरूरत है , जिसमें से 50,000 की खरीद प्रक्रिया को आगे बढाया जा चुका है |भारतीय सेना की भविष्य की चुनौतियों के मद्देनज़र सेना के लिए राफेल विमान , हवित्ज़र तोपें जैसे आधुन्बिक रसखा आयुधों का आयात व् रक्षा एवं अनुसंधान संस्थान द्वारा निर्माण और आधुनिकीकरण की दीर्घकालीन योजना पर काम किया जा रहा है |हाल ही में हुए एक उच्च स्तरीय बैठक में , 7 .62 मि .मि की अधिक घातक 65 ,000/- राइफलों की खरीद व 20 ,000/- राइफलों के देश में निर्माण को हरी झंडी दी है | इनके अलावा 46, 000/- करोड़ मूल्य की 145 अति हल्की होवित्ज़र M 777 , १६,९००/- करोड़ मूल्य  के 420 एयर  डिफेन्स गन , 15,750/- करोड़ रुपये मूल्य  के 814 आर्टिलरी गन एवं 6,600/- करोड़ मूल्य के अर्जुन M K -II टैंकों की खरीद व् निर्माण को भी अंतिम रूप दिया जा रहा  है  | 



किसी भी शांतिप्रिय व् विकासशील देश के लिए अब यह बहुत जरूरी हो जाता है कि विश्व में पैर पसारते आतंकवाद के डांस से खुद को बचाए रखने के लिए भी उसे अपनी सीमाओं , अपने भूक्षेत्रों व् नागरिकों की सुरक्षा व् संरक्षण के लिए पुख्ता इंतजाम करके रखना  होगा | इसके साठ ही देशवासियों को भी आगामी उत्सवी महीनों व् समय होने के कारण अधिक सजग व् सचेत रहकर सरकार व् प्रशासन के प्रयासों को सफल बनाना होगा | जो भी हो , आने वाले समय में सैनिक प्रतिद्वंदिता में वृद्धि की संभावना के मद्देनज़र पूरा विश्व एक उहापोह और तनावपूर्ण माहौल में परिवर्तित होगा , ये तय है |  

रविवार, 2 अक्तूबर 2016

मुद्दा ये नहीं कि , सलमान ने क्या कहा ....






अब इस देश में सबसे  ज्यादा  बड़ी  और  सबसे ज्यादा दिखने और बिकने वाली बात या खबर , सिर्फ ये हो गई है कि अमुक व्यक्ति ने ये कहा , या ये कहना चाहिए कि मीडिया ने मुंह में माईक घुसेड घुसेड के जबरन कुछ न कुछ कहलवाया , और उससे भी अधिक , जो कहा गया या , न भी कहा गया  , उसे पूरी तरह मसालेदार बना कर , काट छांट कर , या अर्थ का अनर्थ करके आम जनता के पास इस तरह से पेश किया जाए कि आम जनमानस किसी नतीजे या निष्कर्ष पर पहुँचने के बजाय , इतने ज्यादा आशंकाओं और अनुमानों में उलझ कर रह जाए कि मुद्दा क्या था यही पार्श्व में चला जाता है |

 सबसे बड़ी विडंबना यही है कि , ये सारा खेल मीडिया हमारे सामने , कभी सबसे ज्यादा सच तो कभी सबसे ज्यादा तेज़ के नाम पर दिन रात परोसता रहता है | किन्तु यहाँ बात मीडिया नहीं बल्कि नेताओं और अभिनातेओं के सार्वजनिक बयानों , उनके मायने और उनके प्रभाव पर बात कर रहे हैं हम |




सलमान खान ने किसी और विषय पर आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में एक पत्रकार के किसी सवाल (ज्ञात हो कि , कोइ भी समाचार चैनल ये बातें नहीं दिखा बता रहा है ) के उत्तर में बोलते हुए कहा कि , आतंकवादी और कलाकार दोनों भिन्न लोग होते हैं , और कलाकार यहाँ वर्क परमिट , वीजा आदि के प्रावधानों के अनुरूप आते हैं जो खुद उन्हें सरकार मुहैया कराती है , इसलिए उनका विरोध नहीं किया जाना चाहिए | 


इस पोस्ट के लिखने तक इस मामले में आगे और वृद्धि ये हुई है कि पाकिस्तान सरकार ने न सिर्फ भारतीय चैनलों के प्रसारण पर पूरी तरह से पाबंदी लगाने की घोषणा कर दी बल्कि अपने तमाम सिनेमाघरों से भारतीय पिक्चरों के पोस्टरों तक को उतार फेंका गया गया  | कहने की जरूरत नहीं कि पूर्व में भी ऐसे तमाम समय पर , जो संवेदनशीलता , जो भावुकता , जो स्नेह भारतीय कलाकार उदार होकर व्यक्त करते हैं वो सिर्फ एक तरफ़ा है | इसका ताजातरीन उदाहरण है अभी हाल ही में बहुत सी भारतीय पिक्चरों में अभिनय करके खासा धन अर्जित कर अभी अभी पाक्सितान लौटे अभिनेता फवाद खान का जिन्होंने वापस जाते ही भारतीयों को छोटे दिल वाला करार दे दिया |



इस परिप्रेक्ष्य में दो बातें मुझे याद आ रही हैं जिनका उल्लेख करना यहाँ ठीक होगा , पहली ये कि , इन दिनों सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर एक कथ्य बहुत तेज़ी से पढ़ा देखा जा रहा है |

क्रिकेट को राजनीति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए और खेलों को इन दो देशीय रिश्तों के तनावों से दूर रखना चाहिए |
फिल्म और कलाकारों को भी ................

साहित्य व् साहित्यकारों को भी  ................



और इसमें और भी जो जो ,जिनका जिनका ध्यान आता हो आपको आप जोड लें ..

.तो फिर भाई लोगों सारी दुश्मनी का ठेका क्या हमारी फ़ौज और हमारी पुलिस ने ही लिया हुआ है या उनका दिमाग खराब है कि वे खामख्वा  में गोलियां बम का शिकार होकर अपनी जान गँवा रहे हैं , वो भी उन्हीं के हाथों जिनसे इन उपरोक्त वर्ग की गहरी सहानुभूति दिखाई देती है | 

और दूसरी  ये  कि , इसी बात पर एक मित्र ने बहुत सटीक टिपण्णी करते हुए कहा था कि , जब हम पाकिस्तान तो अलग थलग करने की बात करते हैं तो फिर वो अलगाव सिर्फ राजनीतिक या सामाजिक और भौगोलिक भर नहीं रह जाना चाहिए बल्कि , साहित्यिक ,सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से भी ऐसे देशों का पूर्ण बहिष्कार करना चाहिए |


यहाँ गौर करने लायक बात यह भी है कि ,कुछ पाकिस्तानी कलाकार भारत में काम करने के कारण वहां भी निशाने पर लिए जाते रहने के बावजूद भी कभी भारत पर होने वाले आतंकी हमलों में मरने वाले निर्दोष लोगों या पीड़ितों के प्रति सहानुभूति तो नहीं ही जताते हैं , मगर जो एक काम वे कर सकते हैं और उन्हें कभी न कभी करने के लिए बाध्य होना ही पडेगा , वो भी या अपनी खुद की जान के डर या ऐसी ही किन्ही वजहों के कारण नहीं कर पाते हैं , खुल कर इस बात की मुखालफत ....

पाकिस्तानी कलाकारों को खुद भी ये समझना होगा और अपनी सरकार सियासत को भी ये समझाना होगा कि जिस भारत के टुकड़े टुकड़े करने के मंसूबे वे पाल रहे हैं , वर्षों से आतंक और हिंसा के सहारे उसे अंजाम तक पंहुचाने में लगे हैं उस देश (भारत ) का विकास उस देश की शान्ति , कहीं न कहीं, देर सवेर एक पड़ोसी होने के नाते खुद उन्हें और पाकिस्तान को भी इसका लाभ ही पहुंचाता  , खैर जैसा कि पाकिस्तान के मशहूर लेखक तारिक फ़तेह ने कहा कि ..........अफ़सोस ..अफ़सोस ..पड़ोसी अब  गटर बन चुका है |



मंगलवार, 20 सितंबर 2016

काली स्याही ,सफ़ेद चेहरा ..(स्याही प्रकरण )



स्याही  प्रकरण से  उठते सवाल

आपको रोटी सिनेमा का यह गाना याद है , इसमें  सिनेमा में मक्कार साहूकार का किरदार निभाने वाली जीवंत कलाकार जीवन  की बेटी को सब चरित्रहीन  कहकर उस पर पत्थर बरसाने लगते हैं उसी समय उस सिनेमा के नायक राजेश खन्ना आकर सबको यह कहकर रोक देते हैं की आज हम इस पापिन  को सब मिलकर सजा देंगे लेकिन पहला पत्थर मारने का हक सिर्फ उसको है जो खुद पापी नहीं है || ज्योति किसी पर जूता फेंकने स्याही फेंकने अभी जैसे प्रकरणों को देखता हूं तो सबसे पहला ख्याल यही मन में आता है।। .......देखिये ये  गाना .....





हाल ही में इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति का शिकार हुए दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ||इसमें कोई संदेह नहीं कि वर्तमान सरकार में और खुद आम आदमी पार्टी में यदि अब भी कोई सो प्रतिशत सोने का खरा व्यक्ति है तो वह सिर्फ खुद मनीष सिसोदिया हैं || इसका प्रमाण आज स्वयं उन्होंने एक बार फिर दिया और स्याही मुंह पर गिरने के बावजूद वह शांत और स्थिर बने रहे। सबसे दुखद स्थिति यह है कि यह प्रवृत्ति अब दिनों दिन बढ़ती जा रही है और इस प्रवृत्ति का शिकार देर सवेर हर बड़े दल का नेता हो रहा है कभी किसी प्रेस वार्ता में तो कभी किसी जनसभा में कभी किसी चुनाव प्रचार रैली में इस प्रकार का व्यवहार किया जाना निश्चित रूप से बहुत ही ज्यादा निंदनीय हो खतरनाक है।


यह किसी एक दल किसी एक सरकार या किसी एक विचारधारा के लिए सीमित  प्रश्न नहीं है ,बल्कि यह तो लोकतंत्र के आधार - जन संवाद को ,हतोत्साहित करने का ,एक बहुत ही निंदनीय प्रयास है । इसके पीछे चाहे वजह कोई एक राजनीतिक दल या फिर किसी एक व्यक्ति का ही क्यों ना हो ,इन प्रवृतियों से सख्ती से निपटा जाना चाहिए | किंतु वर्तमान राज्य सरकार व दिल्ली पुलिस के बीच जिस तरह की आपकी तनातनी का माहौल है उसे देखते हुए ऐसा लगता नहीं है कि दिल्ली पुलिस की तरफ से फिलहाल कोई सख्त कदम व नीति अपनाएगी ||

अलबत्ता पिछली कुछ घटनाओं के बाद पुलिस व् संबद्धित संस्थाएं  , सुरक्षा में काफी संजीदा भी दिखाई जरूर देती है  लेकिन निष्कर्ष और कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सार्वजनिक और शीर्ष पदों पर बैठे हुए व्यक्तियों की शारीरिक वह मानसिक भी सुरक्षा की व्यवस्था जरूरी पुख्ता की जानी चाहिए ||और इसके लिए जरूरी नीतियां बनाई जानी चाहिए |और ऐसे लोगों को भड़काए जाने उकसाये जाने के जिम्मेदार लोगों को भी सख्त शारीरिक दंड दिया जाना चाहिए ,जबकि रिकार्ड के अनुसार यहाँ उल्लेखनीय है कि कभी इसी तरह  जूता फेंक  कर  और  थप्पड़ मार कर सुर्ख़ियों में आने वाले जरनैल सिंह बाद में आम आदमी पार्टी की टिकट पर चुनाव लडे व् विधायक भी बने | ..जो भी बेहद अफसोसनाक प्रवृत्ति है  ये  ....................................



                     कल बात करेंगे ......विश्व पर छा रहे तीसरे विश्व युद्ध के संकट की

शनिवार, 17 सितंबर 2016

पथ्य (दवा) से परहेज़ भली




... एक कहावत है बहुत ही पुरानी और दिलचस्प ,बात यह है कि हमारी हर कहावत के पीछे जो सच छुपा होता है वह हमारे पूर्वजों के अनुभव का निचोड़ होता है तो जैसा कि मैं कह रहा था कि एक कहावत है पथ्य (दवा ) से परहेज भली ||अर्थात सच में देखा जाए तो दिल्ली के वर्तमान हालात ,  जिनमें चारों तरफ चीख पुकार मची हुई है | अस्पतालों में बिस्तरों से लेकर के फर्श तक पर मरीज को चीख पुकार रहे हैं | डॉक्टर दवाइयां सभी बेबस से दिख रहे हैं | जहां तक सरकार व प्रशासन की बात है तो वह पिछले कई वर्षों की तरह सिर्फ एक दूसरे पर दोषारोपण करने कि अपनी पुरानी  पति को दोहरा रहे हैं भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की एक सबसे बड़ी भूल है कि वह ना तो भविष्य के लिए तैयार होता है ना इतिहास में की गई से कोई सबक लेता है लेता है |


 आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि हमारी सरकार ,हमारी व्यवस्था , हमारा समाज ,हमारा परिवार ,सभी इस बात पर तो खूब जोर देते हैं व इस बात की सारी फ़िक्र  रखी जाती है ढेरों जतन किए जाते हैं  ||बीमार पड़ते ही उपचार किए जाने के लिए , किंतु जीवन में कोई बीमार ही ना पड़े या फिर कम से कम रोगों से ग्रस्त हो इस तरह की कोई व्यवस्था इस तरह की कोई सूरत दिखाई ही नहीं देती || बच्चों की किताबें ,बच्चों की शारीरिक शिक्षण कहीं पर भी उसमें इस बात का जवाब नहीं दिया जाता  कि कौन कौन सी  आदतें , किस तरह का खानपान , मौसम के अनुरूप परहेज़ व् सावधानी  आदि का ध्यान रखी जानी चाहिए , यह उनके रोजाना पढने वाले भारी भरकम पाठ्यक्रम का हिस्सा क्यों नहीं होता  | जो पढ़ाई होती है वह भी सालों से रटा रटाया है ,जिसे बच्चे सिर्फ और सिर्फ एक प्रश्न और उत्तर की तरह याद करके आगे बढ़ जाते हैं जीवन में उसे नहीं उतारते ||

हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा नहीं है मुझे याद आता है गांव का एक छोटा सा त्यौहार अगर मैं ठीक हूं तो उसे हम लोग जूडशीतल बुलाते हैं जो शीतल यानि नाम के अनुरूप शीतलता से कुछ सम्बंधित |  यह उन दिनों में मनाया जाता है जिन दिनों  पानी की काफी कमी हो जाती है पेड़ पौधे सूखने लगते हैं और मान्यता यह है कि इस दिन सभी व्यक्ति गांव के छोटे बड़े सभी पेड़ पौधे वनस्पति ,उसकी जड़ों में पानी का कुछ न कुछ अंश जरूर डालते हैं  | लोग अपने दूरदराज के बगीचे में जाकर वहां वृक्षों , पौधों वनस्पति में इस प्रकार पानी डालते हैं मानो अपने परिवार के किसी बुजुर्ग की सेवा कर रहे हों | कहने को तो यह एक त्यौहार है किंतु इसके पीछे विज्ञान को तो देखें तो हम पाएंगे कि इंसान और पारिस्थिति पेड़ पौधों का कितना सुंदर संबंध स्थापित किया गया है ||

 इसी तरह का एक दूसरा प्रसंग याद आता है ऐसा कि बरसात के दिनों में ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े बुजुर्ग अक्सर  नीम के पत्तों को पीसकर उसकी छोटी-छोटी गोलियां बनाकर उन्हें सुखा लिया करते थे || जिन्हें बरसात ऋतु के शुरु होने से पहले बड़े बच्चे स्त्री पुरुष सब को खिलाया जाता था  ||इसके पीछे का तर्क यह था कि वह पेट में जाकर के रक्त विकारों को साफ कर देता था यह एक तरह का प्रतिरोधक होता था जो शरीर में जाकर के बरसाती दिनों के फोड़े-फुंसी पित्त कफ्फ आदि उन सब को नियंत्रित करता था| इसके परिणामस्वरूप रोगग्रस्त होने की समस्या बहुत कम हो जाती थी |

स्थानीय सामाजिक संगठनो , सरकारों , प्रशासन और खुद हमें अब आगे बढ़ कर इस दिशा में  पहल करनी होगी इससे पहले कि बहुत देर हो जाए |  और यह करना इतना भी मुश्किल नहीं है कि यदि आज और अभी से शुरु किया जाए तो ज्यादा नहीं सिर्फ पांच से दस वर्षों में ही फर्क स्पष्ट दिखने लगेगा || अपने आसपास सफाई स्वच्छता की आदत ,दैनिक व नियमित दिनचर्या ,संतुलित खानपान ,ज्यादा से ज्यादा शारीरिक श्रम आदि के अतिरिक्त आस-पास उपलब्ध भूमि पर अधिक से अधिक वृक्ष लगाना विशेषकर नीम पीपल आदि जैसे स्वास्थ्यवर्धक वृक्षों की उपस्थिति रोगों के फैलने पनपने को बहुत कम कर देती है।।

देखिए स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है , या तो आप अपना सारा समय श्रम हुआ धन बीमार होने के बाद खुद को निरोग करने के लिए दवाइयों में चिकित्सा में शल्य चिकित्सा में खर्च करें अन्यथा इन सब स्थितियों में पड़ने से पहले ही खुद को स्वस्थ निरोग रखने के प्रति सचेत व सजग होने की आदत डालें यह मैं आज और अभी से करने के लिए इसलिए कह रहा हूं ताकि आने वाली नस्लें स्वाभाविक रूप से इसे एक आदत के रूप में पाएं | इसलिए आज से और अभी से खुद को बीमार ना पडने देने का संकल्प ले और उस अनुरूप व्यवहार करें यही उचित है, यही अनिवार्य है ,और यही आखरी रास्ता है


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