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शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2016

बदलती सामरिक स्थिति ...





नरेंद्र मोदी की पूर्ण बहुतमत की सरकार का गठन करके ,भारतीय जनमानस ने यह स्पष्ट सन्देश दे दिया था कि ,भारतीय राजनैतिक परिदृश्य और राष्ट्रीय विचारधारा में निश्चित रूप से , पूर्व से इतर कुछ ,ठोस परिवर्तन होने जा  रहे  हैं | इनमें पहला था पड़ोसियों के साथ  बेहतर व् स्पष्ट  रिश्तों  की शुरुआत | पिछले दो वर्ष की बहुत सी तारीखें इस   बात की गवाह रही हैं ,कि भारत की नई सरकार ने शपथ ग्रहण के समय से ही पूरे विश्व के साथ नए व् बेहतर सम्बन्ध की शुरुआत करके वैश्विक ग्राम और वसुधैव कुटुम्बकम की परिकल्पना को साकार करने में मन व् प्रत्यक्षतः खुद को लगातार साबित करने का प्रयास किया |

हालांकि पिछले कुछ दशकों में मुस्लिम चरमपंथ , पेट्रो रिजर्व क्षेत्रों पर नियंत्रण व् आर्थिक मंदी  के कारण विश्व के बहुत से भागों में अलगाववादियों व् आतंकियों ने अपने अस्तित्व  को शेष दुनिया को समाप्त करने से जोड़ कर उन्मादी , हिंसक व् अंतहीन संघर्ष "जेहाद" के नाम पर छेड़ दिया | विकास व् सृजन की दौड़ में खुद को पीछे रखने वाली ये कबायली सभ्य्तायें  जब पश्चिमी देशों की घोर एशो आराम और उपभोगी संस्कृति के संपर्क मे आए तो स्वाभाविक रूप से संघर्ष शुरू हो आया |

भारत प्रारम्भ से ही सनातन संस्कृति का वाहक होने कारण सर्वग्राह्य व् सर्व धर्म समभाव की परिपाटी पर ही चलता रहा | आधुनिक राजीनति में धर्म , जाति , आदि के समावेश और उससे अधिक दुरुपयोग ने कालान्तर में विदेशी प्रशासकों को यह अवसर दे दिया कि उन्होंने भू क्षेत्र का विभाजन करके एक शास्वत समस्या और संघर्ष का बीजारोपण कर दिया | पाकिस्तान , बांग्लादेश और चीन जैसे अमित्र पड़ोसियों की उपस्थिति से उत्पन्न अवश्यम्भावी घटनाओं, व्  आक्रमणों  से आक्रान्त , भारत , नई सरकार बनने के बाद नई नीतियों व निर्णयों के अधीन अग्रसर हो चुका था |

पिछले दो वर्षों में उत्पन्न अनेकों अवसर पर एक प्रशासक व् निजी मित्र के रूप में भी पाकिस्तान , उनके हुक्मरान , पाकिस्तानी अवाम सहित पूरे विश्व को अपने प्रयत्न , मतवी व् संबोधन से स्पष्तः अवगत करा दिया था कि आतंकवाद के रास्ते को छोड़ विकास व् सहभागिता के रास्ते पर चलना होगा | किन्तु  आचरण व् चरित्र के अनुरूप वही गलतियां दोहराता पाकिस्तान आज जबरन दोनों देशो को युद्ध के मुहाने तक खींच लाया है | वर्तमान में नियंत्रण रेखा पर जो स्थिति है वह पिछले बीस वर्षों में अब तक की सबसे तनावपूर्ण स्थिति है | रही सैन्य तैयारियों की बात तो हालिय६आ वैश्विक हालातों तथा आतंकवादियों की बढ़ती गतिविधियों व् खतरे के मद्देनज़र लगभग हर देश की सेना सतर्क व् सचेत मोड पर ही है | भारत सेना सतर्क व् सचेत मोड पर ही है | भारत के लिए सुरक्षा एजेंसियों की तरफ से जारी हाई अलर्ट के कारण अव नियंत्रण रेखा पर सर्दियों में घुसपैठ की आशंका के कारण सेना पहले ही सतर्क व् लैस थीं हालांकि विशेषज्ञों की माने तो भार्ते४एय सैन्य बल को पूरी तरह से तैयार होने के लिए कुछ चुनौतियों से जूझना होगा |

पूर्व सेना उपप्रमुख ले.जे. फिलिप काम्प्स ने पठानकोट हमले के बाद सैन्य तैयारियों का पुनर्सर्वेक्षण कर रिपोर्ट पेश करते हुए अनुशंसा की , कि भारतीय सेना में उपयोग किए जाने वाले लगभग  , 1000 पुराने T-72 टैंकों को तुरंत ही अत्याधुनिकीकरण की जरूरत है | वर्तमान में विशेष कमांडो द्वारा  उपयोग में लाए जाने वाले इंसास (इन्डियन स्माल आर्म्स सिस्टम) राइफलों का नारंगी रंग रात्रि युद्ध के लिए सर्वथा अनुपयुक्त बताया गया है , जिसमें सुधार के लिए प्रयास किये जा रहे हैं |
वर्ष 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार सेना में 9100 अधिकारियों की कमी बताई गई जिन्हें जल्द से जल्द भरा जाना चाहिए | देश में निर्मित टैंक अर्जुन एम् के II में इस्राईली राकेटों के लिए फिटिंग की समस्या पर भी काम किया जा रहा है | सेना को अपने जवानों के लिए 3 ,50, 000 बुलेट प्रूफ जैकेटों की जरूरत है , जिसमें से 50,000 की खरीद प्रक्रिया को आगे बढाया जा चुका है |भारतीय सेना की भविष्य की चुनौतियों के मद्देनज़र सेना के लिए राफेल विमान , हवित्ज़र तोपें जैसे आधुन्बिक रसखा आयुधों का आयात व् रक्षा एवं अनुसंधान संस्थान द्वारा निर्माण और आधुनिकीकरण की दीर्घकालीन योजना पर काम किया जा रहा है |हाल ही में हुए एक उच्च स्तरीय बैठक में , 7 .62 मि .मि की अधिक घातक 65 ,000/- राइफलों की खरीद व 20 ,000/- राइफलों के देश में निर्माण को हरी झंडी दी है | इनके अलावा 46, 000/- करोड़ मूल्य की 145 अति हल्की होवित्ज़र M 777 , १६,९००/- करोड़ मूल्य  के 420 एयर  डिफेन्स गन , 15,750/- करोड़ रुपये मूल्य  के 814 आर्टिलरी गन एवं 6,600/- करोड़ मूल्य के अर्जुन M K -II टैंकों की खरीद व् निर्माण को भी अंतिम रूप दिया जा रहा  है  | 



किसी भी शांतिप्रिय व् विकासशील देश के लिए अब यह बहुत जरूरी हो जाता है कि विश्व में पैर पसारते आतंकवाद के डांस से खुद को बचाए रखने के लिए भी उसे अपनी सीमाओं , अपने भूक्षेत्रों व् नागरिकों की सुरक्षा व् संरक्षण के लिए पुख्ता इंतजाम करके रखना  होगा | इसके साठ ही देशवासियों को भी आगामी उत्सवी महीनों व् समय होने के कारण अधिक सजग व् सचेत रहकर सरकार व् प्रशासन के प्रयासों को सफल बनाना होगा | जो भी हो , आने वाले समय में सैनिक प्रतिद्वंदिता में वृद्धि की संभावना के मद्देनज़र पूरा विश्व एक उहापोह और तनावपूर्ण माहौल में परिवर्तित होगा , ये तय है |  

रविवार, 2 अक्तूबर 2016

मुद्दा ये नहीं कि , सलमान ने क्या कहा ....






अब इस देश में सबसे  ज्यादा  बड़ी  और  सबसे ज्यादा दिखने और बिकने वाली बात या खबर , सिर्फ ये हो गई है कि अमुक व्यक्ति ने ये कहा , या ये कहना चाहिए कि मीडिया ने मुंह में माईक घुसेड घुसेड के जबरन कुछ न कुछ कहलवाया , और उससे भी अधिक , जो कहा गया या , न भी कहा गया  , उसे पूरी तरह मसालेदार बना कर , काट छांट कर , या अर्थ का अनर्थ करके आम जनता के पास इस तरह से पेश किया जाए कि आम जनमानस किसी नतीजे या निष्कर्ष पर पहुँचने के बजाय , इतने ज्यादा आशंकाओं और अनुमानों में उलझ कर रह जाए कि मुद्दा क्या था यही पार्श्व में चला जाता है |

 सबसे बड़ी विडंबना यही है कि , ये सारा खेल मीडिया हमारे सामने , कभी सबसे ज्यादा सच तो कभी सबसे ज्यादा तेज़ के नाम पर दिन रात परोसता रहता है | किन्तु यहाँ बात मीडिया नहीं बल्कि नेताओं और अभिनातेओं के सार्वजनिक बयानों , उनके मायने और उनके प्रभाव पर बात कर रहे हैं हम |




सलमान खान ने किसी और विषय पर आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में एक पत्रकार के किसी सवाल (ज्ञात हो कि , कोइ भी समाचार चैनल ये बातें नहीं दिखा बता रहा है ) के उत्तर में बोलते हुए कहा कि , आतंकवादी और कलाकार दोनों भिन्न लोग होते हैं , और कलाकार यहाँ वर्क परमिट , वीजा आदि के प्रावधानों के अनुरूप आते हैं जो खुद उन्हें सरकार मुहैया कराती है , इसलिए उनका विरोध नहीं किया जाना चाहिए | 


इस पोस्ट के लिखने तक इस मामले में आगे और वृद्धि ये हुई है कि पाकिस्तान सरकार ने न सिर्फ भारतीय चैनलों के प्रसारण पर पूरी तरह से पाबंदी लगाने की घोषणा कर दी बल्कि अपने तमाम सिनेमाघरों से भारतीय पिक्चरों के पोस्टरों तक को उतार फेंका गया गया  | कहने की जरूरत नहीं कि पूर्व में भी ऐसे तमाम समय पर , जो संवेदनशीलता , जो भावुकता , जो स्नेह भारतीय कलाकार उदार होकर व्यक्त करते हैं वो सिर्फ एक तरफ़ा है | इसका ताजातरीन उदाहरण है अभी हाल ही में बहुत सी भारतीय पिक्चरों में अभिनय करके खासा धन अर्जित कर अभी अभी पाक्सितान लौटे अभिनेता फवाद खान का जिन्होंने वापस जाते ही भारतीयों को छोटे दिल वाला करार दे दिया |



इस परिप्रेक्ष्य में दो बातें मुझे याद आ रही हैं जिनका उल्लेख करना यहाँ ठीक होगा , पहली ये कि , इन दिनों सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर एक कथ्य बहुत तेज़ी से पढ़ा देखा जा रहा है |

क्रिकेट को राजनीति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए और खेलों को इन दो देशीय रिश्तों के तनावों से दूर रखना चाहिए |
फिल्म और कलाकारों को भी ................

साहित्य व् साहित्यकारों को भी  ................



और इसमें और भी जो जो ,जिनका जिनका ध्यान आता हो आपको आप जोड लें ..

.तो फिर भाई लोगों सारी दुश्मनी का ठेका क्या हमारी फ़ौज और हमारी पुलिस ने ही लिया हुआ है या उनका दिमाग खराब है कि वे खामख्वा  में गोलियां बम का शिकार होकर अपनी जान गँवा रहे हैं , वो भी उन्हीं के हाथों जिनसे इन उपरोक्त वर्ग की गहरी सहानुभूति दिखाई देती है | 

और दूसरी  ये  कि , इसी बात पर एक मित्र ने बहुत सटीक टिपण्णी करते हुए कहा था कि , जब हम पाकिस्तान तो अलग थलग करने की बात करते हैं तो फिर वो अलगाव सिर्फ राजनीतिक या सामाजिक और भौगोलिक भर नहीं रह जाना चाहिए बल्कि , साहित्यिक ,सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से भी ऐसे देशों का पूर्ण बहिष्कार करना चाहिए |


यहाँ गौर करने लायक बात यह भी है कि ,कुछ पाकिस्तानी कलाकार भारत में काम करने के कारण वहां भी निशाने पर लिए जाते रहने के बावजूद भी कभी भारत पर होने वाले आतंकी हमलों में मरने वाले निर्दोष लोगों या पीड़ितों के प्रति सहानुभूति तो नहीं ही जताते हैं , मगर जो एक काम वे कर सकते हैं और उन्हें कभी न कभी करने के लिए बाध्य होना ही पडेगा , वो भी या अपनी खुद की जान के डर या ऐसी ही किन्ही वजहों के कारण नहीं कर पाते हैं , खुल कर इस बात की मुखालफत ....

पाकिस्तानी कलाकारों को खुद भी ये समझना होगा और अपनी सरकार सियासत को भी ये समझाना होगा कि जिस भारत के टुकड़े टुकड़े करने के मंसूबे वे पाल रहे हैं , वर्षों से आतंक और हिंसा के सहारे उसे अंजाम तक पंहुचाने में लगे हैं उस देश (भारत ) का विकास उस देश की शान्ति , कहीं न कहीं, देर सवेर एक पड़ोसी होने के नाते खुद उन्हें और पाकिस्तान को भी इसका लाभ ही पहुंचाता  , खैर जैसा कि पाकिस्तान के मशहूर लेखक तारिक फ़तेह ने कहा कि ..........अफ़सोस ..अफ़सोस ..पड़ोसी अब  गटर बन चुका है |



मंगलवार, 20 सितंबर 2016

काली स्याही ,सफ़ेद चेहरा ..(स्याही प्रकरण )



स्याही  प्रकरण से  उठते सवाल

आपको रोटी सिनेमा का यह गाना याद है , इसमें  सिनेमा में मक्कार साहूकार का किरदार निभाने वाली जीवंत कलाकार जीवन  की बेटी को सब चरित्रहीन  कहकर उस पर पत्थर बरसाने लगते हैं उसी समय उस सिनेमा के नायक राजेश खन्ना आकर सबको यह कहकर रोक देते हैं की आज हम इस पापिन  को सब मिलकर सजा देंगे लेकिन पहला पत्थर मारने का हक सिर्फ उसको है जो खुद पापी नहीं है || ज्योति किसी पर जूता फेंकने स्याही फेंकने अभी जैसे प्रकरणों को देखता हूं तो सबसे पहला ख्याल यही मन में आता है।। .......देखिये ये  गाना .....





हाल ही में इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति का शिकार हुए दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ||इसमें कोई संदेह नहीं कि वर्तमान सरकार में और खुद आम आदमी पार्टी में यदि अब भी कोई सो प्रतिशत सोने का खरा व्यक्ति है तो वह सिर्फ खुद मनीष सिसोदिया हैं || इसका प्रमाण आज स्वयं उन्होंने एक बार फिर दिया और स्याही मुंह पर गिरने के बावजूद वह शांत और स्थिर बने रहे। सबसे दुखद स्थिति यह है कि यह प्रवृत्ति अब दिनों दिन बढ़ती जा रही है और इस प्रवृत्ति का शिकार देर सवेर हर बड़े दल का नेता हो रहा है कभी किसी प्रेस वार्ता में तो कभी किसी जनसभा में कभी किसी चुनाव प्रचार रैली में इस प्रकार का व्यवहार किया जाना निश्चित रूप से बहुत ही ज्यादा निंदनीय हो खतरनाक है।


यह किसी एक दल किसी एक सरकार या किसी एक विचारधारा के लिए सीमित  प्रश्न नहीं है ,बल्कि यह तो लोकतंत्र के आधार - जन संवाद को ,हतोत्साहित करने का ,एक बहुत ही निंदनीय प्रयास है । इसके पीछे चाहे वजह कोई एक राजनीतिक दल या फिर किसी एक व्यक्ति का ही क्यों ना हो ,इन प्रवृतियों से सख्ती से निपटा जाना चाहिए | किंतु वर्तमान राज्य सरकार व दिल्ली पुलिस के बीच जिस तरह की आपकी तनातनी का माहौल है उसे देखते हुए ऐसा लगता नहीं है कि दिल्ली पुलिस की तरफ से फिलहाल कोई सख्त कदम व नीति अपनाएगी ||

अलबत्ता पिछली कुछ घटनाओं के बाद पुलिस व् संबद्धित संस्थाएं  , सुरक्षा में काफी संजीदा भी दिखाई जरूर देती है  लेकिन निष्कर्ष और कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सार्वजनिक और शीर्ष पदों पर बैठे हुए व्यक्तियों की शारीरिक वह मानसिक भी सुरक्षा की व्यवस्था जरूरी पुख्ता की जानी चाहिए ||और इसके लिए जरूरी नीतियां बनाई जानी चाहिए |और ऐसे लोगों को भड़काए जाने उकसाये जाने के जिम्मेदार लोगों को भी सख्त शारीरिक दंड दिया जाना चाहिए ,जबकि रिकार्ड के अनुसार यहाँ उल्लेखनीय है कि कभी इसी तरह  जूता फेंक  कर  और  थप्पड़ मार कर सुर्ख़ियों में आने वाले जरनैल सिंह बाद में आम आदमी पार्टी की टिकट पर चुनाव लडे व् विधायक भी बने | ..जो भी बेहद अफसोसनाक प्रवृत्ति है  ये  ....................................



                     कल बात करेंगे ......विश्व पर छा रहे तीसरे विश्व युद्ध के संकट की

शनिवार, 17 सितंबर 2016

पथ्य (दवा) से परहेज़ भली




... एक कहावत है बहुत ही पुरानी और दिलचस्प ,बात यह है कि हमारी हर कहावत के पीछे जो सच छुपा होता है वह हमारे पूर्वजों के अनुभव का निचोड़ होता है तो जैसा कि मैं कह रहा था कि एक कहावत है पथ्य (दवा ) से परहेज भली ||अर्थात सच में देखा जाए तो दिल्ली के वर्तमान हालात ,  जिनमें चारों तरफ चीख पुकार मची हुई है | अस्पतालों में बिस्तरों से लेकर के फर्श तक पर मरीज को चीख पुकार रहे हैं | डॉक्टर दवाइयां सभी बेबस से दिख रहे हैं | जहां तक सरकार व प्रशासन की बात है तो वह पिछले कई वर्षों की तरह सिर्फ एक दूसरे पर दोषारोपण करने कि अपनी पुरानी  पति को दोहरा रहे हैं भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की एक सबसे बड़ी भूल है कि वह ना तो भविष्य के लिए तैयार होता है ना इतिहास में की गई से कोई सबक लेता है लेता है |


 आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि हमारी सरकार ,हमारी व्यवस्था , हमारा समाज ,हमारा परिवार ,सभी इस बात पर तो खूब जोर देते हैं व इस बात की सारी फ़िक्र  रखी जाती है ढेरों जतन किए जाते हैं  ||बीमार पड़ते ही उपचार किए जाने के लिए , किंतु जीवन में कोई बीमार ही ना पड़े या फिर कम से कम रोगों से ग्रस्त हो इस तरह की कोई व्यवस्था इस तरह की कोई सूरत दिखाई ही नहीं देती || बच्चों की किताबें ,बच्चों की शारीरिक शिक्षण कहीं पर भी उसमें इस बात का जवाब नहीं दिया जाता  कि कौन कौन सी  आदतें , किस तरह का खानपान , मौसम के अनुरूप परहेज़ व् सावधानी  आदि का ध्यान रखी जानी चाहिए , यह उनके रोजाना पढने वाले भारी भरकम पाठ्यक्रम का हिस्सा क्यों नहीं होता  | जो पढ़ाई होती है वह भी सालों से रटा रटाया है ,जिसे बच्चे सिर्फ और सिर्फ एक प्रश्न और उत्तर की तरह याद करके आगे बढ़ जाते हैं जीवन में उसे नहीं उतारते ||

हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा नहीं है मुझे याद आता है गांव का एक छोटा सा त्यौहार अगर मैं ठीक हूं तो उसे हम लोग जूडशीतल बुलाते हैं जो शीतल यानि नाम के अनुरूप शीतलता से कुछ सम्बंधित |  यह उन दिनों में मनाया जाता है जिन दिनों  पानी की काफी कमी हो जाती है पेड़ पौधे सूखने लगते हैं और मान्यता यह है कि इस दिन सभी व्यक्ति गांव के छोटे बड़े सभी पेड़ पौधे वनस्पति ,उसकी जड़ों में पानी का कुछ न कुछ अंश जरूर डालते हैं  | लोग अपने दूरदराज के बगीचे में जाकर वहां वृक्षों , पौधों वनस्पति में इस प्रकार पानी डालते हैं मानो अपने परिवार के किसी बुजुर्ग की सेवा कर रहे हों | कहने को तो यह एक त्यौहार है किंतु इसके पीछे विज्ञान को तो देखें तो हम पाएंगे कि इंसान और पारिस्थिति पेड़ पौधों का कितना सुंदर संबंध स्थापित किया गया है ||

 इसी तरह का एक दूसरा प्रसंग याद आता है ऐसा कि बरसात के दिनों में ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े बुजुर्ग अक्सर  नीम के पत्तों को पीसकर उसकी छोटी-छोटी गोलियां बनाकर उन्हें सुखा लिया करते थे || जिन्हें बरसात ऋतु के शुरु होने से पहले बड़े बच्चे स्त्री पुरुष सब को खिलाया जाता था  ||इसके पीछे का तर्क यह था कि वह पेट में जाकर के रक्त विकारों को साफ कर देता था यह एक तरह का प्रतिरोधक होता था जो शरीर में जाकर के बरसाती दिनों के फोड़े-फुंसी पित्त कफ्फ आदि उन सब को नियंत्रित करता था| इसके परिणामस्वरूप रोगग्रस्त होने की समस्या बहुत कम हो जाती थी |

स्थानीय सामाजिक संगठनो , सरकारों , प्रशासन और खुद हमें अब आगे बढ़ कर इस दिशा में  पहल करनी होगी इससे पहले कि बहुत देर हो जाए |  और यह करना इतना भी मुश्किल नहीं है कि यदि आज और अभी से शुरु किया जाए तो ज्यादा नहीं सिर्फ पांच से दस वर्षों में ही फर्क स्पष्ट दिखने लगेगा || अपने आसपास सफाई स्वच्छता की आदत ,दैनिक व नियमित दिनचर्या ,संतुलित खानपान ,ज्यादा से ज्यादा शारीरिक श्रम आदि के अतिरिक्त आस-पास उपलब्ध भूमि पर अधिक से अधिक वृक्ष लगाना विशेषकर नीम पीपल आदि जैसे स्वास्थ्यवर्धक वृक्षों की उपस्थिति रोगों के फैलने पनपने को बहुत कम कर देती है।।

देखिए स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है , या तो आप अपना सारा समय श्रम हुआ धन बीमार होने के बाद खुद को निरोग करने के लिए दवाइयों में चिकित्सा में शल्य चिकित्सा में खर्च करें अन्यथा इन सब स्थितियों में पड़ने से पहले ही खुद को स्वस्थ निरोग रखने के प्रति सचेत व सजग होने की आदत डालें यह मैं आज और अभी से करने के लिए इसलिए कह रहा हूं ताकि आने वाली नस्लें स्वाभाविक रूप से इसे एक आदत के रूप में पाएं | इसलिए आज से और अभी से खुद को बीमार ना पडने देने का संकल्प ले और उस अनुरूप व्यवहार करें यही उचित है, यही अनिवार्य है ,और यही आखरी रास्ता है


गुरुवार, 15 सितंबर 2016

अनाथ होती दिल्ली


ये पोस्ट पूरी तरह से मोबाईल से ब्लॉग पोस्ट बना कर प्रकाशित की जा रही है और दूसरी विशेष बात ये कि सारा आलेख (पूरा टैक्स्ट ) मोबाइल के ऑडियो इन पुट से बोल कर टाईप की गयी है , बिलकुल आसानी से





कुछ दिनों पहले दिल्ली में एक चुटकुला काफी प्रसारित हुआ था जिसमें हमारे मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ध्यान मग्न होकर यह कहते हुए दिखाया गया था कि यदि आप से कोई गलती हो जाए तो आप बिल्कुल ना घबराऐं सिर्फ थोड़ी देर तक चुप बैठे और यह सोचो कि यह आरोप आपको किस पर लगाना है।। आज कमोबेश राजधानी दिल्ली की प्रशासकीय और बीमार चिकित्सकीय स्थिति यह इशारा कर रही है कि दिल्ली अनाथ है ।।न कोई मालिक न कोइ  खैर मख्दम......... हैं तो बस चिकनगुनिया , डेंगू , मोहल्ला क्लिनिक की डेढ़ किलोमीटर और अस्पतालों की कई किलोमीटर लम्बी लाईनों में व्यस्त खड़ा तीमारदार और वहीं पस्त पड़ा बीमार ....अनाथ , निर्बल , रोगी और कहीं कहीं मृत भी .....


एक तरफ माननीय न्याय पालिका के फैसलों द्वारा प्रमाणित राज्य प्रमुख माननीय गवर्नर साहब इन चित्रों व समाचारों से गायब नजर आते हैं जिन चित्रों में चीख चीख कर यह बताया व दिखाया जा रहा होता है कि डेंगू मलेरिया व चिकनगुनिया जैसी बीमारियां महामारी का रूप लेती जा रही है और बरसों पहले की तरह लोग मर रहे।। वहीं दूसरी तरफ सरकार के तमाम  मंत्री व अधिकारी  तक किसी ना किसी बहाने ,कोई चुनाव प्रचार के बहाने तो ,कोई प्रशिक्षण के बहाने फील्ड को छोड़कर अन्य स्टेशनों पर व्यस्त हैं और इतना ही नहीं वहां से सेल्फी पोस्ट कर रहे ।

हालात इतने  तक ही बदतर होते तो कोई बात ना थी किंतु इस से भी कहीं अधिक आगे जाकर अधिनस्थ संस्थाएं जैसे कि एंटी करप्शन ब्यूरो व राष्ट्रीय महिला आयोग तक आपसी खींचतान व नोटिस और मुकदमे बाजी में व्यस्त हैं वह तो शुक्र मनाना चाहिए प्रकृति और बरसात का कि पूरे देश भर के हालातों के ठीक उलट राजधानी दिल्ली में अभी भी बहुत अधिक बरसात दर्ज नहीं की गई है अन्यथा पिछले दिनों जरा सी बारिश से उत्पन्न जाम राष्ट्रीय सुर्खी बन गई  थीं ।

 इन परिस्थितियों में भी यदि सभी सार्वजनिक संस्थाएं व सभी सार्वजनिक व्यक्ति  यदि इसी तरह का आचरण करेंगे वह समस्याओं के समाधान से अधिक एक दूसरे पर दोषारोपण वह विफलताओं से सबक सीखने की आदत में लगे रहेंगे तो निसंदेह स्थिति खतरनाक से नारकीय हो जाएगी।

  केंद्र सरकार जो एक तरफ स्वच्छता को एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में लेकर पूरे देश भर में इसे केंद्रित करके अनेकों योजनाएं चला रही है वह भी राजधानी दिल्ली में बढ़ती इस महामारी के प्रति उदासीन वह उपेक्षित व्यवहार कर रही है अफसोस की बात यह है की इन परिस्थितियों का सबसे अधिक शिकार वह इस बदहाली व्यवस्था का नारा सबसे अधिक वही गरीब होता है हो रहा है जो इसने आम आदमी पार्टी पर सबसे ज्यादा विश्वास जताया था अब देखना यह है कि आने वाले समय में कौन लोग यह कौन सी पार्टी कौन से अधिकारी आगे आकर इन स्थितियों से निजात दिला कर दिल्ली वालों को राहत पहुंचा सकेंगे फिलहाल तो दिल्ली वासियों की स्थिति अनाथों जैसी ही है

शनिवार, 31 मई 2014

नागरिक संस्कारों पर तमाचा






तारीख 29 मई 2014 को दैनिक जागरण समाचार पत्र के संपादकीय पर ये खबर पढने के बाद भी कहीं कोई तीव्र प्रतिक्रिया नहीं आना इस देश में किसी को भी अब हैरत में नहीं डालता है । कुकुरमुत्ते की तरह लगातार उगते चले जा रहे टीवी खबरिया चैनलों में इतनी भीड बढते जाने के बावजूद भी सब एक ही लकीर के फ़कीर बने रहना चाहते हैं । कहीं कोई अलग सोच , अलग आइडिया, अलग स्टोरी नहीं । खैर , बात यहां इस खबर से उपजी दूसरी खबर की हो रही है । तो ये ऊपर की खबर का लब्बोलुआब सिर्फ़ इतना है कि एक विदेशी नागरिक ने अपने किसी देसी आदमी जो दीवार गीली करने  की सतत परंपरा का निर्वाह कर रहा था उसे ऐसा करने से टोका , तो उस भले आदमी ने विदेशी आगंतुक को एक थप्पड रसीद कर दिया । इस बात की शिकायत जब वह पीडित पुलिस के पास पहुंचा तो ..........अब पुलिस का क्या रवैय्या रहा ,इसका अंदाज़ा भी सहज़ ही लगाया जा सकता है ।



इससे कुछ समय पहले ही सार्वजनिक रूप से ऐसी क्रिया करने वालों की आदत से परेशान होकर एक सोसायटी द्वारा थक हारकर इससे निज़ात पाने के लिए दायर एक याचिका का निपटारा करते हुए माननीय न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि ,"कानून लोगों की ज़िप पकड के नहीं बैठ सकता , इसके लिए नागरिकों को स्वयं ही अपने नागरिक संस्कारों को विकसित करना होगा " ।बात तो मार्के की है और इससे पहले भी इस मामले को लेकर बहुत बार टीका टिप्पणी की जाती रही है । 


यहां ये बात उल्लेखनीय होगी कि पश्चिमी देशों में नागरिक संस्कारों को अपनाने की प्रवृत्ति अब एक स्थापित परंपरा सी बन गई है । मुझे दो घटनाओं का ज़िक्र करना जरूरी लग रहा है । फ़्रांस ने अपने नागरिकों को अपने राष्टप्रेम के प्रतीक के रूप में राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करना इतनी अच्छी तरह से समझाया है कि अब किसी भी फ़्रांसीसी नागरिक के अपने निजि सामान, स्थान, कार्यालय , दफ़्तर, यात्रा आदि में न सिर्फ़ राष्ट्र ध्वज की प्रतिकृति रखते हैं बल्कि उसका पूरा आदर और उस पर मान भी रखते हैं । दूसरी घटना कहां की है , नहीं पता किंतु ये है कि , एक शहर में लोगों की ये आदत उनकी सुबह की सैर में शामिल है कि वे अपने साथ एक थैली साथ रखते हैं जिसमें रास्ते में पडने या मिले सभी छोटी बडी कचरा वस्तुओं को उठा कर उसमें रख लेते हैं । इसका परिणाम ये कि शहर की सफ़ाई के लिए प्रशासन के ऊपर निर्भरता को लगभग समाप्त ही कर दिया है । 



ये सच है कि भारत , नागरिक संस्कारों के विकास के दृष्टिकोण से अभी बहुत पीछे है, और तो और ,अभी भी यात्रा में महिलाओं वृद्धों को बैठने का स्थान देना , दुर्घटना में पीडित की सहायता ,सार्वजनिक स्थानों पर मद्यपान व धूम्रपान न करने की आदत , आदि जैसी कितनी ही ऐसी आदतें हैं जो आज से और अभी से यदि आने वाली पीढी को न सिखाई जाए तो विकास की पटरी पर दौडती रेल के आसपास ये कुप्रवृत्तियां पटरी के आसपास अक्सर फ़ैली हुई गंदगी के समान ही लगेंगी । अच्छा होगा कि शैक्षिक संस्कारों के साथ स्कूल व शिक्षक अपने विद्यार्थियों में , समाज अपने सदस्यों में , और अभिभावक अपने बच्चों में नागरिक संस्कारों की छोटी छोटी आदतें मसलन , पंक्ति में धैर्यपूर्वक खडे होना , वृद्धों ,महिलाओं व बच्चों की मदद करना , सतर्क व सावधान रहना , आदि , अभी से ही भावी पीढी में रोपना शुरू कर देना चाहिए ताकि बीस पचास साल बाद देश न सिर्फ़ आर्थिक स्वावलंबन पाकर सुखी हो बल्कि नैतिक रूप से भी स्वस्थ हो । 

रविवार, 19 जनवरी 2014

क्षेत्रीय भाषाई गानों में बढती फ़ूहडता











मुख्यधारा के गीत संगीत से इतर लोकगीतों व क्षेत्रीय गीतों का एक समृद्ध एवं गौरवशाली
इतिहास और परंपरा रही है । वास्तव में कहा तो ये जाता है कि हिंदी गीतों के संसार के बहुत से गानों में सुरों का सौंदर्य और माधुर यानि मिठास लोकगीतों से ही प्रेरित रहा है । यही नहीं इन्हें समृद्ध करने वाले गीतकार ,संगीतकार व गायकों ने मुख्य धारा में जुडने के  बाद भी उस विरासत को जिंदा रखा ।


बदलते समय के साथ हिंदी गीतों व सिनेमाई गीत संगीत में रिमिक्स , रैप और कई अन्य नए चलनों से वहां जिस तरह का हल्कापन और स्तरहीनता बढी है उसी तरह , बल्कि उससे कहीं अधिक फ़ूहडता और भौंडापन , आज लोकगीतों में दिखता है । जितनी फ़ूहडता ऑडियो गानों के बोलों में सुनाई देती है उतनी ही अश्लीलता वीडियो एलबमों के चित्रांकन में भी दिखाई देती है । 

आश्चर्य व दु:ख की बात ये है कि ये प्रवृत्ति भोजपुरी , हरियाणवी , गढवाली , कुमाउंनी , पंजाबी आदि लगभग सभी क्षेत्र के लोकगीतों में भी बढी है । हालांकि ऐसा नहीं है कि क्षेत्रीय भाषाओं व लोकगीतों में सुंदर , व कर्णप्रिय गीत लिखे व गाने नहीं जा रहे किंतु स्तरहीन फ़ूहड एलबमों की अधिकता व रात दिन बसों , ट्रकों ,दुकानों , गांव ,कस्बों में इनकी चिल्ल पौं ने लोकगीतों की विरासत पर गहरा आघात लगाया है । 


इस प्रवृत्ति पर एक प्रसिद्ध लोकगायिका कहती हैं कि थोडे से पैसे लगाकर कुछ भी उल जलूल परोस कर ज्यादा पैसे बनाने का लालच और सस्ते/घटिया गीतों का बढता बाज़ार ही इसकी मुख्य वज़ह है । यदि इस प्रवृत्ति को अभी रोका और हतोत्साहित नहीं किया गया तो भविष्य में आने वाली पीढीयों को लोकगीतों और क्षेत्रीय गानों के नाम पर जो कुछ देखने सुनने को मिलेगा वो संगीत के नाम पर सिर्फ़ एक काला धब्बा होगा । इसलिए ये बहुत जरूरी है कि सुंदर , लोकगीतों को सहेज़ा और परोसा जाए ।
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