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शुक्रवार, 29 मार्च 2013

कानून, सज़ा , माफ़ी और मीडिया ....आज का मुद्दा

चित्र गूगल से साभार



यदि गौर से देखें तो पाएंगे कि पिछले दो तीन वर्षों में सबसे ज्यादा चर्चा कानून के इर्द गिर्द ही घूमती रही है । चाहे वो कानून व्यवस्था की गिरती स्थिति के कारण हो या फ़िर किसी प्रस्तावित कानून पर छिडी बहस और जनांदोलन , मुद्दा हाल ही में देश को सिहरा देने वाले अपराध के एक आरोपी की कम उम्र और उसके समकक्ष नाबालिगों द्वारा किए जा रहे अपराधों को लेकर कानून में मौजूद उम्र सीमा को बढाया जाना हो या फ़िर ताज़ा ताज़ा मामला जिसमें सरकार ने सहमति से यौन संबंधों के लिए न्यूनतम उम्र सीमा को घटाए जाने का प्रस्ताव रखा और आम जनों की प्रतिक्रिया के बाद उसे दोबारा अठारह वर्ष कर दिया ,इसके साथ ही बिल्कुल समांनांतर चर्चा में रही -सज़ा, कभी आतंकियों को फ़ांसी पर लटकाने का मामला तो अब सिने अभिनेता संजय दत्त को सुनाई गई सज़ा और इनके ठीक बराबर चलता हुआ मीडिया , कुल मिला कर यही देखा जा रहा है कि फ़िलहाल देश में चर्चा , बहस मुद्दा इन्हीं विषयों के आसपास घूम रहा है।


इस देश का इतिहास गवाह रहा है कि , पश्विमी देशों की तरह यहां कानून बनाने , सुधारने और लागू करने से पहले शायद ही कभी आम लोगों को इसका भागीदार बनाया गया हो , और भागीदारी तो दूर कभी ठीक से उन्हें कानून की जानकारी तक नहीं दी जाती है , और इसकी जरूरत भी महसूस नहीं की जाती , वजहें चाहे जो भी रहती हों । शायद बहुत समय बाद किसी प्रस्तावित कानून के विरोध में न सिर्फ़ तीव्र प्रतिक्रिया हुई बल्कि जनांदोलन तक उठ गया , मगर हमेशा की तरह सत्ता और सियासत ने फ़िर से अपनी बाजीगरी दिखाते हुए जनभावनाओं को सिरे से नकार कर उस बहस की गुंजाईश ही खत्म कर दी ।

इसी बीच राजधानी में हुए एक जघन्य बलात्कार कांड ने फ़िर से अवाम को आंदोलित कर दिया और वो फ़िर से सडकों पर उतर आई , इस बार इस मांग के साथ कि इस अपराध के लिए बरसों से चले आ रही दंड व्यवस्था में फ़ेरबदल किया जाए और न सिर्फ़ बलात्कार बल्कि महिलाओं/युवतियों संग छेडछाड और उन पर तेज़ाब तक फ़ेंकने जैसे जघन्य अपराधों के लिए कानून बदलने और सज़ा को सख्त किया जाए । ये कानून अब सरकार द्वारा लागू कर दिया गया है , इसके परिणाम और प्रभावों का आकलन करना अभी जल्दबाज़ी होगी । हां इस बीच एक और कानून जुवेनाइल जस्टिस एक्ट जो नाबालिग अपराधियों व उनकी सज़ा के निर्धारण के लिए बना था उसमें नाबालिग अपराधी की उम्र जो कि वर्तमान में अठारह वर्ष से कम मानी जाती है उस पर भी बहस उठ खडी हुई । कारण ये रहा कि इसी बलात्कार कांड में सबसे हिंसक व क्रूर कृत्य करने वाले अपराधी ने खुद को नाबालिग माने जाने की अर्ज़ी लगा दी । महिला सुरक्षा को लेकर गठित जस्टिस वर्मा आयोग ने भी सभी प्रदेश के पुलिस अधिकारियों द्वारा अनुशंसित उम्र सोलह वर्ष को दरकिनार करते हुए इसे अठारह वर्ष रखने पर ही अपनी मुहर लगा दी । अधीनस्थ न्यायालय ने मौजूदा साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को नाबालिग ही माना और अब मामला ऊंची अदालत के विचाराधीन है ।

इधर कानून और सज़ा पर बहस चल रही थी ,जिसे और हवा दे दे एक के बाद एक लगातार दो आतंकियों को अचानक ही और अप्रत्याशित रूप से फ़ांसी की सज़ा दे देना । राष्ट्रपति तक इस पूरे प्रकरण से इतने परेशान हो उठे कि उन्होंने अचानक ही उनके पास भेजी गई अन्य दया याचिकाओं पर फ़िलहाल विचार करने में असहमति जता दी । सूचना के अधिकार का उपयोग कर किसी ने ये जानकारी ले कर सामने ला दी कि पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के कार्यकाल के दौरान किन्हें माफ़ी दी गई । इधर ये माफ़ा माफ़ी के सिलसिले में अब ये एक नया मसला भी जुड गया जब आजकल अपने तीक्ष्ण बयानों के लिए चर्चित पूर्व न्यायमूर्ति काटजू ने मुंबई हमले में सर्वोच्च न्यायालय से सज़ा सुनाए गए अभिनेता संजय दत्त एवं एक सह आरोपी महिला जेबुन्निसा के लिए माफ़ी का पत्र लिखने की वकालत की ।
मीडिया , विशेषकर भारतीय मीडिया बेहद प्रतिक्रियात्मक व्यवहार करता है , बिना आगा पीछा सोचे , किसी भी घटना , दुर्घटना , अपराध , सज़ा , फ़ैसले और बयान पर रोज़ चौबीसों घंटे प्रसारित होते रहने की मजबूरी वाले समाचार चैनल , जाने किस किस तरह के कार्यक्रम /रिपोर्टें/विश्लेषण और बहस आदि जनता के सामने लाते रहे और ये सब अब भी बदस्तूर जारी है । वास्तव में देखा जाए तो सबको आरोप के कटघरे में खडे करने की आदत से लाचार समाचार तंत्र इतनी भी संवेदनशीलता नहीं दिखा पाते हैं कि कभी ठहर कर ये सोचें कि उनके द्वारा प्रस्तुत और जैसा वे उसे प्रस्तुत करते हैं उसका क्या कैसा प्रभाव जनमानस पर पडेगा या पडा ।

देश में अपराध बढ रहे हैं , कानून भी खूब बन रहे हैं , सज़ा और माफ़ी की बहस के बीच जितनी जगह है उसमें मीडिया के लिए इतना स्थान तो आराम से निकल जाता है कि वे मज़े में बैठ कर कभी एक पक्ष से कभी विरोध पक्ष से और कभी दोनों ही ओर से लगातार अपना बाज़ार बडा करते रहें , खबरों का बाज़ार ।




सोमवार, 13 अगस्त 2012

बलात्कार .......








अभी हाल ही में दिल्ली की राज्य सरकार ने घोषणा की है कि राजधानी की सभी जिला अदालतों में बलात्कार के लिए मुकदमों की सुनवाई के लिए विशेष त्वरित अदालतों (फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स ) का गठन किया जाएगा । नि: संदेह सरकार की ये पहल बहुत आवश्यक और स्वागतयोग्य है , किंतु वहीं ये पहल यह भी ईशारा कर रही है कि समाज में विशेषकर महानगरों और शहरों में बलात्कार यौन हिंसा जैसे अपराध किस खतरनाक स्तर की तीव्रता से बढ रहे हैं ।

पिछले कुछ समय में ये देखा पाया गया है कि समाज में बढते अपराधों में "बलात्कार" सबसे ज्यादा किए जा रहे अपराधों में से एक है । शहरों , कस्बों से लगभग रोज़ ही न सिर्फ़ छेडछाड , यौन हिंसा , बलात्कार और सामूहिक बलात्कार तक की खबरें देखने सुनने व पढने को मिल रही हैं । और चिंताजनक बात ये है कि ये हालात तब हैं जबकि अब भी बहुत सारे मामले दर्ज़ नहीं हो पाते हैं ।


समाज में बढते बलात्कार के मामलों पर बेशक समाजविज्ञानी, अपराधशास्त्री , विधिवेत्ताओं और प्रशासन के अपने तर्क , कारण और राय है । समाजशास्त्री सीधे सीधे पश्चिमी देशों से आयातित हो रही यौन उनमुक्तता की बढती प्रवृत्ति को इन सबके लिए विशेषकर शहरी समाज में , एक बडा कारण मानते हैं । अपराध और उसकी प्रवृत्ति पर अध्ययन करने वाले कहते हैं कि समाज में बढती हिंसा व नशे का चलन इस अपराध में इज़ाफ़े का एक बडा कारण है ।


बढते हुए बलात्कार की घटनाओं के मद्देनज़र ही कभी घृणित अपराध के लिए अधिकतम यानि, मौत की सज़ा की मांग उठ रही थीं तो कभी " बलात्कार" को नए और वृहत संदर्भों में देखने की । इस बीच घटी कुछ अपराध घटनाओं ने न सिर्फ़ पूरे देश को झकझोर दिया बल्कि इस बहस को और हवा दे दी ।


.इन्हीं सब परिस्थितियों में पिछले दिनों विधायिका , कार्यपालिका और न्यायपालिका तक के क्षेत्र में बहुत सारे नए नियमों , कानूनों व प्रावधानों के बनने बनाने का प्रयास चलता रहा । इनमें सबसे पहला व उल्लेखनीय है "बलात्कार" की परिभाषा को नए सिरे से विस्तारित व व्याख्यायित करने की कवायद । हालांकि सिर्फ़ बलात्कार ही नहीं , बल्कि महिलाओं के प्रति हिंसा , कार्यस्थलों पर मानसिक , शारीरिक प्रताडना , एवं चेहरे पर तेज़ाब फ़ेंकने जैसे सभी अपराधों के लिए निर्धारित दंडों को और कठोर किया गया है ।


इतना ही नहीं कार्यस्थलों पर महिलाओं के साथ लैंगिक भेदभाव , शारीरिक मानसिक शोषण व प्रताडना को रोकने के लिए विशेष समितियों को बनाने का निर्देश दिया गया । जब पुलिस ने देखा और पाया कि शहरों में देर रात कार्यस्थलों से वापस लौटने वाली युवतियों/महिलाओं को हिंसा व यौन शोषण का शिकार बनाया जा रहा है तो अदालत ने अपने आदेशों द्वारा इनके लिए सरकार व प्रशासन को नए सुरक्षा उपायों/मानकों को बनाए अपनाए जाने का निर्देश दिया । काले शीशे चढे वाहनों में आपराधिक वारदातों विशेषकर बलात्कार की घटनाओं पर सख्त रूख अपनाते हुए पूरे देश भर की पुलिस को निर्देश दिया गया कि सभी वाहनों से काले शीशों को फ़ौरन हटा दिया जाए ।


यूं तो न्यायपालिका मुकदमे दर मुकदमे अपने फ़ैसलों से प्रशासन व विधायिका तक को परोक्ष -प्रत्यक्ष निर्देश देती रहती है , किंतु पिछले दिनों राजधानी की जिला अदालतों ने अपने कुछ फ़ैसलों से एक नई बहस को जन्म दे दिया । पहला उल्लेखनीय फ़ैसला वो रहा जिसमें अदालत ने बलात्कार के मुजरिम को कठोर कारावास की सज़ा सुनाने के साथ ही  ये कहा कि भारतीय दंड विधान के निर्धारित सज़ाओं के बावजूद और न ही अपराधियों में अब इस सज़ा का कोई भय रहा है । इसलिए अब समय आया गया है कि पारंपरिक सज़ाओं के अलावा वैकल्पिक सज़ाओं , मसलन रासायनिक व चिकित्सकीय पद्धति से मुजरिमों को नपुंसक बना देना , जैसी सज़ाओं पर भी विचार किया जाना चाहिए ।


ऐसे ही एक मुकदमें मुजरिम की अपील पर सुनवाई करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने मुलजिम को इस शर्त पर जमानत देने की बात कही कि वो पहले पीडिता को आर्थिक मुआवजा दे । इस नई पहल से उठी बहस के बाद अदालती निर्देशों के अनुरूप दिल्ली सरकार ने बलात्कार पीडिताओं को मुआवजा दिलाने के लिए एक विस्तृत योजना की शुरूआत की । इसमें पीडिताओं के लिए कई तरह की विधिक सहायताओं के अलावा उन्हें अंतरिम राहत राशि और मुआवजे की व्यवस्था का प्रावधान भी किया गया ।


बलात्कार को रोकने व नियंत्रित करने के लिए सामाजिक प्रशासन से जुडे सभी अंगों , विधायिका , न्यायपालिका और अन्य सब अपने अपने स्तर पर अनेक प्रयास कर रहे हैं , किंतु अफ़सोसजन और चिंताजनक बात ये है कि इन सबके बावजूद बलात्कार जैसा घृणित अपराध समाज में बढता ही जा रहा है । अपराध मनोविज्ञान का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञ इसकी बढती दर के लिए सीधे सीधे समाज में बढती नशाखोरी की प्रवृत्ति , पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण व यौन स्वच्छंदता का बढता चलन व युवतियों \महिलाओं में आत्मरक्षा प्रशिक्षण का भाव , जटैल कानूनी प्रक्रियाएं एवं अधिकांश अपराधियों का सज़ा से बच निकलने के अलावा सबसे अहम है बलात्कार पीडिताओं के साथ समाज द्वारा अपराधियों सरीखा व्यवहार । इन तमाम चल रहे प्रयासों से यदि बलात्कार की बढती घटनाओं पर जरा सा भी फ़र्क पडता है तो ये नि:संदेह एक अच्छी शुरूआत होगी ।

बृहस्पतिवार, 2 अगस्त 2012

त्यौहार पर हावी हुआ बाज़ार






भारत में जब से उदारीकरण और बाज़ारवाद ने देश की आम जनता को उपभोक्तावाद और दिखावटी जीवन की ओर धकेला तभी से भारतीय समाज के तौर तरीके , परंपराएं , खान-पान , ज्ञान मनोरंजन और पर्व त्यौहारों तक को बाज़ारों और उत्पादों के अनुकूल परिवर्तित करने की एक योजनाबद्ध प्रक्रिया शुरू हुई । अब इस सारी कवायद का परिणाम दिखने लगा है । आज किसी भी पर्व त्यौहार से पहले ही नियोजित तरीके से बाज़ार को सज़ाया और बनाया जाने लगा है । सबसे पहले तो गौर करने वाली बात ये है कि पिछले एक दशक में देश में जिस तरह से मदर्स डे , फ़ादर्स डे , फ़्रेंडशिप डे , वेलैंटाइन डे , रोज़ डे , थैंक्स गिविंग डे और जाने कौन कौन से डे और नाइट को जबरन ही पहले शहरी समाज और फ़िर पूरे देश भर में ठूंसा गया । इस बहाने से संदेश , बधाई पत्रों , उपहारों और जाने किन किन उत्पादों के बाज़ार को खडा किया गया ।
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अभी हाल ही में खबर आई कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ क्षेत्रों के बाज़ारों में पडोसी चीन से थोक के भाव रखियों की आई खपत ने पूरे बाज़ार पर कब्जा जमा लिया है ।इसका खामियाज़ा क्षेत्र के छोटे दुकानदारों के साथ ही उन हजारों शिल्पकारों , दस्तकारों और मज़दूरों के काम और कमाई पर पडा है जो राखी , जन्माष्टमी पर और अन्य त्यौहारों पर देवी देवाताओं की पोशाकें बनाने का , दस्तकारी , चिप्पीकारी आदि का काम करके अपना पेट पाल रहे हैं । सरकार और प्रशासन तो पहले ही इन लघु उद्योगों के प्रति बेहद उदासीन और उपेक्षित रहे हैं किंतु अब बाज़ारों में विदेशों से आयातित उत्पादों ने तो जैसे इनकी कमर ही तोड कर रख दी है । मशीनों से निर्मित और आजकल के बच्चों की रुचियों के अनुरूप उन्हें आकर्षित करती हुई उनके कार्टून कैरेक्टरों एवं खिलौनेनुमा आदि जैसी राखियों के बाज़ार ने देशी उत्पादों को बुरी तरह प्रभावित किया है ।

ये स्थिति सिर्फ़ यहीं तक सीमित नहीं है । पश्चिमी देशों और समाज की तर्ज़ पर अब यहां भी , कम से कम शहरों में तो जरूर ही , घर के बने पकवान और मिठाइयों से ज्यादा उपहारों , शीतल पेयों , चॉकलेटों और अन्य खाद्य वस्तुओं के आदान प्रदान का चलन बढ गया है । हालांकि मिठाइयों के प्रति लोगों के रुझान कम होने का एक बडा कारण पिछले वर्षों में मिठाइयों में नकली एवं जहरीले घटिया पदार्थों की मिलावट की बढती प्रवृत्ति । प्रति वर्ष , बल्कि हर त्यौहार के आगे पीछे इस तरह की खबरें समाचारों में पढने देखने व सुनने को मिल जाती हैं कि अमुक स्थान पर इतना नकली खोया , मावा ,और मिलावटी मिठाई आदि पकडी गई किंतु प्रशासन की लचरता और इन मिलावटखोरों का सज़ा से बच निकलना इस प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगा पा रहा है ।

यदि बरसों से चली आ रही परंपराओं , उत्सवों और त्यौहारों पर इस तरह से ही बाज़ारीकरण हावी होता रहेगा तो वह दिन दूर नहीं जब एक दिन ये सभी या तो अपनी प्रासंगिकता खो देंगे या शायद अपने मूल वास्तविक चरित्र से सर्वथा अलग हो जाएं ।

रविवार, 24 जून 2012

माही की मौत से उठे सवाल










चार दिन की अथक परिश्रम और जीतोड कोशिश के बावजूद , पूरे देश की दुआओं और किसी चमत्कार की आशा के विपरीत आखिरकार जब नन्हीं माही को गहरे बोरवेल से बाहर निकाला गया तो उसकी मौत हो चुकी थी । बुधवार को  अपने जन्मदिन के बाद घर से बाहर निकली चार वर्षीय माही अचानक ही एक खुले हुए बोरवेल के गहरे गड्ढे में जा गिरी जो उसके लिए मौत का मुंह साबित हो गया ।

बोरवेल के गहरे गड्ढे में किसी बच्चे के गिरने की पहली घटना जिसने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा या कहें कि मीडिया कवरेज के कारण सबका ध्यान उस ओर चला गया वो था प्रिंस नामक एक बच्चे का गिरना । उस समय से लेकर हालिया दुर्घटना तक जाने कितनी बार कितने बच्चे बडे ऐसी दुर्घटनाओं के शिकार होते रहे हैं , और शायद आगे भी ये सिलसिला चलता रहेगा ।

भारत में अभी तक  दुर्घटनाओं से सबक सीखने और भविष्य में उनसे बचाव की कोई परंपरा नहीं बनी है । और तो और ऐसी लापरवाहियों को सरकार , प्रशासन व पुलिस तक गंभीर अपराध तो दूर , मामूली अपराध तक के नज़रिए से नहीं देखती है । हर बार की तरह इस बार भी कुछ दिनों तक खूब शोर शराबा होगा । मुआवजा , दिए जाने की घोषणा, प्रशासन की लापरवाही की बातें , दोषियों के खिलाफ़ कार्यवाही का आश्वासन और फ़िर भविष्य में ऐसा न होने देने की कोरी बयानबाजी करके मामले की इतिश्री कर ली जाएगी । इसके बाद फ़िर किसी प्रिंस किसी माही के बोरवेल में गिरने तक कहीं कुछ भी होता दिखता नहीं मिलेगा , ये अब इस देश की नियति बन चुकी है ।

माही की मौत ने इस बार कई सवाल छोड दिए हैं अपने पीछे जिनका उत्तर तलाशा जाना और प्रशासन के सामने उन्हें रखा जाना बेहद जरूरी है ।

१.  किसी पॉश इलाके/वीआईपी/वीवीआईपी क्षेत्र में इस तरह की लापरवाही भरी घटना क्यों नहीं देखने सुनने को मिलती । आखिर वहां के सारे सुरक्षा इंतज़ाम क्यों और कैसे पुख्ता होते हैं । ऐसी लापरवाही /ऐसी भूलें और ऐसी दुर्घटनाएं सिर्फ़ सामान्य क्षेत्रों में ही क्यों घटित होती हैं ? कहीं इसलिए तो नहीं कि प्रशासन सरकार के लिए उनकी कोई वरीयरता नहीं ?

२. अब तक कितने व्यक्तियों को बोरवेल , सडकों पर गड्ढे , मेनहोल के ढक्कन आदि खुले रखने के लिए दोषी ठहरा के कठोर सज़ा दी गई है ? सज़ा क्या कितनों के खिलाफ़ प्राथमिकी दर्ज़ करके उन पर मुकदमा चलाया गया है ? इन दुर्घटनाओं वाले मामलों से इतर इस तरह की कितनी शिकायतों पर सरकार , प्रशासन और पुलिस ने कार्यवाहियां की हैं और क्या की हैं ?

३. माही, प्रिंस जैसे बच्चे या अन्य पीडित यदि बडे रसूखदार मंत्रियों , उद्योगपतियों , अभिनेताओं , खिलाडियों के घर के होते , तब भी क्या प्रशासन मदद करने में इतनी कोताही , इतना ही विलंब करता या तब ये काम युद्ध स्तर पर होता शायद , यानि आम आदमी का जीवन सरकार , प्रशासन के लिए कोई मोल नहीं रखता । वो तो धन्य है हमारी सेना और उनका ज़ज़्बा जो हर बार मौत के मुंह में जाकर पीडितों को बचाने के लिए अपनी जान की बाज़ी लगा देते हैं ।

४. सबसे जरूरी और ध्यान देने योग्य बात ये कि क्या भारत के अलावा अन्य देशों में भी ऐसी दुर्घटनाओं में पीडितों को बचाने के लिए यही विलंबकारी उपाय अपनाए जाते हैं । यदि नहीं तो आखिर क्या वजह है कि भारत आज तक ऐसी दुर्घटनाओं . आपदा के लिए आधुनिक तकनीक व उन्नत मशीनों , नए उपकरणों से लैस नहीं हो सका है ? इस देश में जब करोडों अरबों रुपए घपले घोटाले के लिए उपलब्ध है तो फ़िर जीवन रक्षक मशीनों उपकरणों के लिए क्यों नहीं ?

५. एक गौरतलब बात ये कि हालिया घटना में बच्ची को बचाने के लिए खोदे गए गहरे गड्ढों और सुरंगों का असर उस रिहायशी क्षेत्र और वहां निर्मित भवनों , मकानों पर क्या पडेगा , क्या इस ओर किसी का ध्यान गया , क्या इस दिशा में कुछ किया गया ?

और भी ऐसे जाने कितने ही प्रश्न छोड गया है उस चार वर्षीय बच्ची की मौत जो सरकार प्रशासन और खुद को भविष्य का महाशक्तिशाली , सुपर पावर बनने का दंभ भरने वाले देश के सामने । अब बात आम जनता की । देखा गया है कि ऐसे तमाम दुर्घटनाओं जिनमें पीडित बच्चे होते हैं अक्सर उनमें एक बडा कारण होता है माता पिता और अभिभावकों की लापरवाही , समस्या को नज़रअंदाज़ करने की प्रवृत्ति । सरकार , प्रशासन , पुलिस का रवैय्या आम लोगों के प्रति कैसा और क्या है अब ये बात किसी से छुपी नहीं है इसलिए अब आम आदमी के लिए ये बहुत जरूरी हो जाता है कि वो चुप न बैठे ।



असल में होने ये चाहिए कि अपने बच्चों और खुद के प्रति लापरवाही की हर संभावना को खत्म करने का प्रयास करना चाहिए । इसके अलावा इससे भी जरूरी बात ये है कि देश के हर नागरिक को समस्याओं के प्रति , विशेषकर ऐसी अपेक्षित दुर्घटनाओं के प्रति बेहद सजग और सचेत होना चाहिए । इसके लिए सबसे पहला कार्य होना चाहिए इन तमाम गड्ढों , खुले बोरवेलों , मेनहोलों की शिकायत और बाकायदा पुलिस से शिकायत की जानी चाहिए , जरूरत पडे तो सीधा प्राथमिकी दर्ज़ करवाना चाहिए । मीडिया और संचार माध्यमों को भी इसमें आम लोगों का साथ देना चाहिए । प्रशासन को इस बात के लिए मजबूर किया जाना चाहिए कि वो न सिर्फ़ उन समस्याओं पर ध्यान देकर जरूरी कार्यवाही करे बल्कि दोषियों पर भी सख्ती से कारवाई की जाए । ये ध्यान रखा जाना बहुत जरूरी है कि आम आदमी खुद पहले अपनी मदद करे तो ही बात बन सकती है और शायद ऐसी दुर्घटनाओं में अपने बच्चों को लील जाने से बचाया जा सकता है ।


मंगलवार, 19 जून 2012

आस्था का बाज़ार






इस देश में धर्म का अस्तित्व तब से है जब से देश की सभ्यता और समाज का अस्तित्व है । इससे भी अधिक ये तथ्य गौरतलब है कि विश्व का सबसे पुराना धर्म और विश्व के सबसे ज्यादा धर्मावलंबियों को पोषित करने का श्रेय भी भारत को ही जाता है । शायद यही कारण था कि स्वतंत्रता के बाद संविधान निर्माताओं ने देश के चरित्र को धर्मनिरपेक्ष रखने का हर संभव प्रयास किया । हालांकि यही धर्मनिरपेक्ष चरित्र कालांतर में राजनेताओं द्वारा धर्म के राजनीतिकरण और धार्मिक भावनाओं का वोट बैंक के रूप में उपयोग का बायस बना ।  इनसे अलग देश में धर्म , आस्था को बाज़ार और व्यापार की तरह परिवर्तित करने में भी कोई कोर कसर नहीं छोडी गई ।


 इस स्थिति की गंभीरता को समझने के लिए सिर्फ़ दो तथ्यों पर गौर करना बहुत जरूरी है । देश में आज धर्मस्थलों की संख्या , शिक्षण संस्थानों व चिकित्सा संस्थानों की संख्या से कई गुना ज्यादा है । न सिर्फ़ इतना ही नहीं , देश की अर्थव्यवस्था का एक बडा भाग कहीं न कहीं इस आस्था के बाज़ार से जुडा हुआ है या कहें कि इसके पीछे ही छुपा/दबा हुआ है । परंपरावादी धार्मिक मान्यताओं , धार्मिक उत्सवों , धर्म स्थलों आदि को दरकिनार करते हुए पिछले कुछ वर्षोम में नए -नए धर्म गुरूओं , महंतों , बाबाओं , साधु साध्वियों ने ईश्वरीय सत्ता के समानांतर या ईश प्राप्ति के स्वघोषित मार्ग बन कर इस आस्था के बाज़ार को अधोगति की पराकाष्ठा पर पहुंचा दिया ।

ये सर्वविदित है कि इस देस के आम लोग धर्म के मामले में न सिर्फ़ अति संवेदनशील हैं बल्कि लगभग धर्मांध की तरह व्यवहार करते हैं । यही वजह है कि कभी ईश प्रतिमाओं द्वारा दूध पीने की तो कभी दीवार ,पेड , और धुएं तक में किसी देवी-देवता की आकृति देखे जाने के अफ़वाहनुमे दावे के पीछे एक जुनून सा देखने को मिलता रहा है । आम लोगों की इसी सहिष्णुता व मासूमियत का फ़ायदा उठाते हुए इन तथाकथित धर्मगुरूओं ने अपने अपने तरीकों व हथकंडों से न सिर्फ़ आम जनमानस की धार्मिक भावनाओं से खेला बल्कि उनसे दान , सहयोग राशि  और कई अन्य बहानों से उनके खून पसीने की कमाई का एक हिस्सा भी हडप जाते हैं ।


इस समस्या का अध्ययन करने वालों ने एक दिलचस्प कारण भी ढूंढा । आधुनिक युग में आम आदमी का जीवन और दिशा आवश्यकता की पूर्ति से विलासिता एवं सुख सुविधा की ओर मुड गया । उच्च जीवन स्तर की प्राप्ति और सब कुछ जल्दी से जल्दी पा लेने की प्रवृत्ति ने सामाजिक जीवन को घोर प्रतिस्पर्धी बना दिया । लोगों के लिए नैतिकता श्रम , आदि के मायने पूरी तरह से बदलने लगे । किंतु इसके साथ-साथ एक आत्मग्लानि और पापबोध की भावना से भी ग्रस्त जनमानस ने इसकी भरपाई या प्रायश्चित स्वरूप धर्म , धार्मिक क्रियाकलापों की ओर रुख किया ।


इसी दुविधापूर्न स्थिति का पूरा फ़ायदा उठाते हुए आस्था के कारोबारियों ने किसी को जीवन की दौड में शार्टकट सफ़लता दिलाने के नाम अप्र तो किसी सफ़ल को उसके पापबोध का एहसास करवा कर दान, सहयोग, आदि के बहाने अपनी दुकान चमकाए रखी । इसका परिणाम ये हुआ कि देश में आज पारंपरिक धर्मों से परे लगभग उतने ही पाखंड और प्रपंचनुमा धार्मिक आडंबरों की एक बडी दुनिया रच डाली गई है ।


एक तथाकथित कृपानिधान बने बाबा जो खुद में किसी तीसरे नेत्र जैसी चमत्कारिक शक्ति आने का दावा करके लोगों पर कृपा बरसाने का ऐसा कार्यक्रम पिछले कुछ समय से करते चले आ रहे थे जिसके बदले में कृपा पाने के इच्छुक आम लोगों से अच्छी खासी धनराशि वसूल की जा रही थी । हाल ही में जब इनके खिलाफ़ लोगों को गुमराह करने व अंधविश्वास फ़ैलाए जाने का आरोप लगा कर मुकदमा दर्ज़ किया गया तो ये कृपा बरसनी बंद हो गई ‘। इनके साथ ही एक महिला जो खुद को देवी रूप में स्थापित करने करवाने के प्रयास में चर्चित हुईं ने उसी प्रवृत्ति को पुख्ता करने की कोशिश की है जिसमें आजकल बहुत कम उम्र अनुभव वाले भी खुद को दैवीय कृपा प्राप्त बताने मानने में लगे हुए । प[रवचन , सत्संग ,समागम , मिलन आदि का आयोजन इस तरह से किया कराया जा रहा है मानो बाज़ार /हाट लगाकर ईश्वरीय कृपा को बेचा जा रहा हो ।


इस संदर्भ में एक तथ्य यह भी है गौरतलब है कि धर्म और आस्था के इन तथाकथित व्यावसायियों ने अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा भी दबा रखा है । हैरानी की बात ये है कि ये सब कुछ खुलेआम चल रहा है और जब तक कोई शिकायत न की जाए कोई कार्यवाही नहीं होती । अब समय आ गया है कि विज्ञान और तकनीक के इस युग में आस्था ,धर्म , धार्मिक मान्यताओं को ढोंग और आडंबर से जरूर ही अलग कर दिया जाए । न सिर्फ़ ये बल्कि तेज़ी से बढते धर्मस्थलों पर अंकुश लगा कर उनकी जगह पर अस्पताल , सकूल एवं अन्य आवश्यक संस्थानों का निर्माण किया जाना चाहिए ।


आज विश्व की नज़र भारत पर है । कोई इसे भविष्य की महाशक्ति के रूप में  देख रहा है तो कोई इसे सबसे बडी अर्थव्यवस्था के रूप में  ऐसे में ये बहुत जरूरी हो जाता है कि कम से कम ये सुनिश्चित किया जाए कि ऐसे धर्म/आस्था के कारोबारियों से पूरी सख्ती से निबटते हुए इन्हें बिल्कुल खत्म कर दिया जाए ।

रविवार, 6 मई 2012

सत्यमेव जयते - बात मुद्दे की








पिछले कुछ दिनों से समाचार माध्यमों में , विशेषकर मनोरंजन जगत में जो सबसे बडी खबर दस्तक दे रही थी तो थी सिने जगत में अपने प्रयोगों , कल्पना और कमाल की क्रियेटिविटी से ऑस्कर तक धमक पहुंचाने वाले आमिर खान का शो -सत्यमेव जयते । एक आम दर्शक के रूप में लोगों को जब ये पता चला कि लगभग दस चैनलों के अलावा ये एकमात्र राष्ट्रीय चैनल जिसे शायद शहरों में भुला भी दिया गया है , उस डीडी वन यानि दूरदर्शन पर भी प्रसारित होगा , तो वो समझ गए कि आमिर सिने व्यवसाय में भी पारंगत यूं ही नहीं कहलाते ।

बेशक एक दशक पहले महाभारत और रामायण सरीखे धारावाहिकों ने उन घंटों में लोगों को टीवी तक समेट दिया था किंतु उसके बाद कौन बनेगा करोडपति ही वो कार्यक्रम रहा जिसे अपने घर में म्यूट करके भी देखा जा सकता था क्योंकि साथ वाले घर से भी उसी कार्यक्रम की आवाज़ आ रही होती थी । बहुत अर्से बाद कोई ऐसा कार्यक्रम लोगों के सामने आ रहा था जिसके लिए लोगों में पहले से उत्सुकता थी ।

आखिरकार उसका पहला भाग प्रसारित हुआ । आमिर ने शुरूआत की तो लगा कि नहीं ये वैसा नहीं है कि जिसके लिए कहा जा सके कि पहले कभी देखा सुना नहीं ऐसा कार्यक्रम । वे दो आज की संघर्षशील मांओं से मिलवाते हैं जो इस बात की जीती जागती मिसाल हैं कि बेशक देश की आईएएस टॉपर युवतियां , महिलाएं ही क्यों न होती रहें , समाज की सोच और रवैया अब भी वही है । लेकिन ये तो सिर्फ़ शुरूअत भर थी , प्रस्तावना जैसी । इसके बाद आमिर मुद्दे पर आते हैं यानि - कन्या भ्रूण हत्या ।




 बाज़ार के सभी फ़ंडों-हथकंडों से परे महत्वपूर्ण बात ये रही कि यदि आज कार्यक्रम मुद्दों पर और सामाजिक सरोकारों व समस्याओं पर आधारित होने के बावजूद भी इतना रिस्पॉस पा जाए तो यकीनन ये अलग और बडी बात तो है ही । समस्या , पीडितों , आरोपियों , खबरनवीसों से सीधा सीधा रूबरू करवाते हुए कन्या भ्रूण हत्या से जुडे हर मुद्दे को टटोला और खंगाला गया । कई लोगों के लिए बहुत सी नई बातें भी थीं , मसलन जाने अनजाने आज अपराध बन चुके इस कृत्य के लिए सरकार की भी कोई न कोई नीति जिम्मेदार थी । कार्यक्रम ने ये भी बखूबी  दिखा दिया कि स्टिंग ऑपरेशन करके अपराधों का पर्दाफ़ाश होने के बाद भी स्थितियां क्यों नहीं बदलती ।


ऐसी लडाई का तरीका और उससे बदला हुआ परिणाम दिखाकर ये भी भलीभांति जता बता दिया गया कि सिर्फ़ समस्या समाधान पर बहस विमर्श करके छोडा नहीं गया है बल्कि ये कारगर है , ऐसा प्रमाणित हुआ है । आमिर ने  दोषी आरोपियों के अपराध और सज़ा के निर्धारण का फ़ैसला न्यायपालिका पर छोडते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री को एक प्रशासनिक उपाय , कन्या भ्रूण हत्या अपराध के तमाम मुकदमों के त्वरित निस्तारण के लिए एक नए फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की गुजारिश करने के लिए एक पत्र लिखने की पहल करने की बात कही ।


ये तो अब तय है कि चाहे अलग अलग कारणों से ही सही देश का समाज अभी सक्रियता और सजगता के लिहाज़ से स्विच ऑन मोड पर है । विज्ञापन , साहित्य-सिनेमा , राजनीति और समाज तक में इन मुद्दों का दखल बढा है । ऐसे में यदि आमिर ने पूरी तैयारी और अनुभव के साथ आम जन का मुद्दा समझा समझाया और सबके सामने रखा और आम जनता पर इसका ज़रा सा भी प्रभाव पडता है तो ये यकीनन ही एक बडी सफ़लता कही जाएगी ।

इस कार्यक्रम का प्रस्तुतिकरण व रफ़्तार बिल्कुल अनुकूल रहे और अगले अंक से पहले ये तय हो जाएगा कि "सत्यमेव जयते " का प्रभाव कितना पडेगा और किन पर पडेगा । राजस्थान के आरोपी चिकित्सकों के लिए तो ये परेशानी का सबब बन ही चुका होगा । मेज़बान के रूप में जब आमिर आम दर्शकों से इस मुद्दे से जुडने का आग्रह करते हैं तो उन्हें पते व प्रतिक्रिया देने के अन्य विकल्पों को थोडा ज्यादा समय देकर दर्शकों को बताना चाहिए ।




बृहस्पतिवार, 26 जनवरी 2012

विकास के लिए तत्पर होता बिहार





देश के सबसे बीमार , पिछडे , अविकसित राज्य की फ़ेहरिस्त में सबसे पहला नाम बिहार का ही आता है । यही नहीं देश के सुदूर उत्तर पूर्वी राज्यों से लेकर राजधानी दिल्ली , मुंबई ,पंजाब और गुजरात के अलावा बंग्लौर जैसे आईटी हब बने शहरों में बिहार से पलायन करके पहुंचे लोगों की संख्या इतनी अधिक है कि अब उन्हें स्थानीय राजनीति का विरोध और हिंसा तक का सामना करना पड रहा है । पिछले डेढ दशकों में , यानि कि वर्तमान सरकार से पहले की सरकारों ने अधोगति की ओर अग्रसर बिहार को पत्तन के गर्त में पहुंचा दिया । इस दौरान न सिर्फ़ शिक्षा ,रोज़गार ,परिवहन और उद्दोग सहित राज्य की सभी मूलभूत व्यवस्थाएं न सिर्फ़ चरमराई व राजकोष की स्थिति ऐसी कर दी सरकारी कर्मचारियों व राज्य के शिक्षकों को वेतन देने में भी सरकार को कठिनाई होने लगी । अपराध व भ्रष्टाचार का ऐसी जोड बन गया जिसने राज्य के आर्थिक ढांचे को बिल्कुल ढहा दिया ।

वर्तमान मुख्यमंत्री ने जब राज्य का जिम्मा संभाला तब सबने परिवर्तन की उम्मीद करने के बावजूद किसी बडे बदलाव की उम्मीद नहीं की थी । नई सरकार ने राज्य के विकास को दोबारा पटरी पर लाने के लिए पूरी प्रतिबद्धता से कार्य शुरू किया । सबसे पहले सडक परिवहन को दुरूस्त करने के लिए राष्ट्रीय राजमार्गों व राजकीय मार्गों के निर्माण , विस्तार एवं मरम्मत का काम  पूरे जोर शोर से शुरू किया गया । बहुत जल्दी ही इसका परिणाम भी स्पष्ट दिखने लगा । लगातार आ रहे बाढ ने सडकों की हालत बिल्कुल खस्ता व जर्जर कर दी थी , जिनका जीर्णोधार करके राज्य के सभी छोटे बडे शहरों को मिलाने का काम किया गया । इन सडकों के निर्माण में तमाम तरह के भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए न सिर्फ़ उनकी निगरानी की गई बल्कि अभी हाल ही में राज्य सरकार ने उन तमाम ठेकेदारों की पहचान की है जिन्होंने जानबूझ कर सडक निर्माण के कार्य में देरी की है , प्रशासन उनके खिलाफ़ प्राथमिकी दर्ज़ कराने की तैयारी में है ।

राज्य के विकास में अपराध व परिवहन व्यवस्था के बाद सबसे बडी बाधा थी प्रशासकीय भ्रष्टाचार । इससे निपटने के लिए सरकार ने कई अभूतपूर्व कार्य किए । राज्य में पहली बार एक निश्चित समय में किसी भी कार्य को करने कराने के लिए राईट टू सर्विस बिल को लागू कर दिया ।  भ्रष्टाचार पर अध्य्यन करने वाली एजेंसियों ने बताया कि आम आदमी को अपने छोटे-छोटे काम समय पर करवाने के लिए रिश्वत देनी पडती है । सरकारी दफ़्तर व कर्मचारियों का टालू रवैय्या आम आदमी को जरूरत के समय काम न करने होने के कारण रिश्वत व भ्रष्टाचार की गुंजाईश को बनाए रखता है । आम आदमी का काम , कम से कम और एक नियत समय तक हो जाने को सुनिश्चित कराने वाले इस कानून को लागू करने से प्रशासनिक भ्रष्टाचार की एक गुंजाईश को रोक दिया गया ।

देश में भ्रष्टाचार उन्मूलन के संदर्भ में एक चौंकाने वाला तथ्य ये है कि बडे बडे आर्थिक घपलों घोटालों के उजागर होने और आरोपियों/दोषियों की पहचान हो जाने के बावजूद सरकार , प्रशासन व कानून तक उनसे गबन के पैसे की उगागी नहीं कर पाते । ऐसे में अभी हाल ही में सरकार ने एक भ्रष्ट अधिकारी के महंगे आलीशान आवास को कब्जे में लेकर उसमें स्कूल खोल कर एक नई नज़ीर पेश कर दी ।  यदि सूत्रों की मानें तो सरकार ने बहुत सारे ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों की पहचान कर ली है जिनकी नामी/बेनामी संपत्तियों को ज़ब्त करने की योजना है ।

हालांकि बहुत से मोर्चों पर सरकार सही दिशा में चलते हुए आशातीत सफ़लता हासिल कर रही है । लोगों का विश्वास भी बढा है , किंतु कुछ बहुत अहम मुद्दों पर बेहद गंभीरता से अभी बहुत कुछ किया जाना बांकी है । इनमें शिक्षा, ग्रामोद्योग , औद्यौगीकरण एवं चिकित्सा आदि क्षेत्रों में स्थिति न सिर्फ़ चिंताजनक बल्कि भयावह है । राज्य के प्राथमिक , माध्यमिक व उच्च उद्यालयों के साथ ही महाविद्यालय व विश्वविद्यालय तक धन व श्रम की कमी , संसाधनों का अभाव झेलने को अभिशप्त हैं । हालात का अंदाज़ा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों शिक्षकों के बकाए वेतन के बदले सरकारी गोदामों में पडे अनाज को देने की पेशकश की गई थी । और तो और लगभग ४७ प्रतिशत शिक्षा संस्थानों में पेयजल व शौचालय की व्यवस्था दुरूस्त नहीं पाई गई। उच्च एवं उच्चतर शिक्षा , व्यावसायिक शिक्षा आदि के लिए तो गिनती के लिए भी शिक्षण संस्थान उपलब्ध नहीं हैं यही कारण है कि प्रतिवर्ष लाखों मेधावी छात्र शिक्षा और कैरियर के कारण राज्य से पलायन कर जाते हैं ।

कभी खादी ग्रामोद्योग , मखाना उद्योग , जूट उद्दोग सहित तमाम लघु व कुटीर उद्योगों की स्थिति मरणासन्न अवस्था को प्राप्त हो चुकी हैं । प्रशासन की उदासीनता और बाज़ार की कमी ने मानो इन्हें हाशिए पर धकेल कर विस्मृत कर दिया । कभी चीनी उद्योग, कागज़ उद्योग, जूट उद्योग सूत व धागा उद्योग आदि में अग्रणी  स्थान पाने वाले राज्य की आज एक एक औद्योगिक ईकाई बंद पडी अपने जीर्णोद्धार का बाट जोह रही हैं । इन औद्योगिक संस्थानों में लगी लाखों करोडों की मशीनें भी अब पूरी तरह से खराब हो चुकी हैं । हालांकि राज्य सरकार इस दिशा में देश के बडे औद्योगिक घरानों व अन्य व्यावसायिओं को राज्य में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु कई प्रयास कर रही है , किंतु उसका सार्थक परिनाम अब तक निकल कर सामने नहीं आया है । इस बीच सुधा डेयरी व दुग्ध उत्पाद उद्दोग एवं मैथिली-भोजपुरी फ़िल्मोद्योग ने पिछले दिनों खुद को नए सिर से स्थापित करके एक आस जरूर जगाई है ।

चिकित्सा और कृषि व्यवस्था की स्थिति भी बेहद खराब है । झारखंड के अलग होने के नुकसान के अलावा पिछले सालों से बिहार में लगातार आ रही बाढ और किसानों पर बढते कर्ज़ आदि ने कृषकों को हतोत्साहित कर कृषि मजदूरों में बदल कर रख दिया है । यहां एक सकारात्मक तथ्य ये सामने आया है कि मुजफ़्फ़रपुर स्थित कृषि अनुसंधान की पहल पर पारंपरिक खेती से अलग जाकर कृषकों ने कई वनस्पतियों , सब्जियों और औषधियों की खेती शुरू कर दी है । आम , लीची , केले जैसे फ़लों के बगीचों को व्यावसायिक उद्देश्य से तैयार किया जा रहा है ।


बिहार में जितनी बुरी हालत शिक्षा व्यवस्था की है उससे भी ज्यादा खराब स्थिति राज्य की चिकित्सा व्यवस्था की है । पूरे राज्य में कोई भी सरकारी या निजि अस्पताल ऐसा नहीं है जो राज्य के बीमारों को उच्चतम चिकित्सा सुविधा मुहैय्या करा सके । कुछ वर्ष पहले केंद्र सरकार ने एम्स के स्तर के छ चिकित्सा संस्थानों एवं अस्पताल को खोलने की योजना बनाई थी जिसमें से एक बिहार के पटना में संभावित था । ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पतालों , डिस्पेंसरियों के साथ साथ चिकित्सकों की भी घोर कमी है । ऊपर से नीम हकीमों का प्रभाव और नकली दवाइयों का फ़ैलता कारोबार स्थिति को और भी अधिक नारकीय बना रहा है ।


जो भी हो इतना तो तय है कि आज बिहार बदल रहा है , बिहार विकास की ओर अग्रसर है । सबसे जरूरी बात ये है कि अब भविष्य में चाहे कोई भी शासक या सरकार आए , इस विकास को और धीरे-धीरे बहुत मुश्किल बने इस सकारात्मक माहौल को बनाए रखा जाए । उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में बिहार अपनी गरिमा और विकास को थाम ही लेगा ।