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शनिवार, 31 मई 2014

नागरिक संस्कारों पर तमाचा






तारीख 29 मई 2014 को दैनिक जागरण समाचार पत्र के संपादकीय पर ये खबर पढने के बाद भी कहीं कोई तीव्र प्रतिक्रिया नहीं आना इस देश में किसी को भी अब हैरत में नहीं डालता है । कुकुरमुत्ते की तरह लगातार उगते चले जा रहे टीवी खबरिया चैनलों में इतनी भीड बढते जाने के बावजूद भी सब एक ही लकीर के फ़कीर बने रहना चाहते हैं । कहीं कोई अलग सोच , अलग आइडिया, अलग स्टोरी नहीं । खैर , बात यहां इस खबर से उपजी दूसरी खबर की हो रही है । तो ये ऊपर की खबर का लब्बोलुआब सिर्फ़ इतना है कि एक विदेशी नागरिक ने अपने किसी देसी आदमी जो दीवार गीली करने  की सतत परंपरा का निर्वाह कर रहा था उसे ऐसा करने से टोका , तो उस भले आदमी ने विदेशी आगंतुक को एक थप्पड रसीद कर दिया । इस बात की शिकायत जब वह पीडित पुलिस के पास पहुंचा तो ..........अब पुलिस का क्या रवैय्या रहा ,इसका अंदाज़ा भी सहज़ ही लगाया जा सकता है ।



इससे कुछ समय पहले ही सार्वजनिक रूप से ऐसी क्रिया करने वालों की आदत से परेशान होकर एक सोसायटी द्वारा थक हारकर इससे निज़ात पाने के लिए दायर एक याचिका का निपटारा करते हुए माननीय न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि ,"कानून लोगों की ज़िप पकड के नहीं बैठ सकता , इसके लिए नागरिकों को स्वयं ही अपने नागरिक संस्कारों को विकसित करना होगा " ।बात तो मार्के की है और इससे पहले भी इस मामले को लेकर बहुत बार टीका टिप्पणी की जाती रही है । 


यहां ये बात उल्लेखनीय होगी कि पश्चिमी देशों में नागरिक संस्कारों को अपनाने की प्रवृत्ति अब एक स्थापित परंपरा सी बन गई है । मुझे दो घटनाओं का ज़िक्र करना जरूरी लग रहा है । फ़्रांस ने अपने नागरिकों को अपने राष्टप्रेम के प्रतीक के रूप में राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करना इतनी अच्छी तरह से समझाया है कि अब किसी भी फ़्रांसीसी नागरिक के अपने निजि सामान, स्थान, कार्यालय , दफ़्तर, यात्रा आदि में न सिर्फ़ राष्ट्र ध्वज की प्रतिकृति रखते हैं बल्कि उसका पूरा आदर और उस पर मान भी रखते हैं । दूसरी घटना कहां की है , नहीं पता किंतु ये है कि , एक शहर में लोगों की ये आदत उनकी सुबह की सैर में शामिल है कि वे अपने साथ एक थैली साथ रखते हैं जिसमें रास्ते में पडने या मिले सभी छोटी बडी कचरा वस्तुओं को उठा कर उसमें रख लेते हैं । इसका परिणाम ये कि शहर की सफ़ाई के लिए प्रशासन के ऊपर निर्भरता को लगभग समाप्त ही कर दिया है । 



ये सच है कि भारत , नागरिक संस्कारों के विकास के दृष्टिकोण से अभी बहुत पीछे है, और तो और ,अभी भी यात्रा में महिलाओं वृद्धों को बैठने का स्थान देना , दुर्घटना में पीडित की सहायता ,सार्वजनिक स्थानों पर मद्यपान व धूम्रपान न करने की आदत , आदि जैसी कितनी ही ऐसी आदतें हैं जो आज से और अभी से यदि आने वाली पीढी को न सिखाई जाए तो विकास की पटरी पर दौडती रेल के आसपास ये कुप्रवृत्तियां पटरी के आसपास अक्सर फ़ैली हुई गंदगी के समान ही लगेंगी । अच्छा होगा कि शैक्षिक संस्कारों के साथ स्कूल व शिक्षक अपने विद्यार्थियों में , समाज अपने सदस्यों में , और अभिभावक अपने बच्चों में नागरिक संस्कारों की छोटी छोटी आदतें मसलन , पंक्ति में धैर्यपूर्वक खडे होना , वृद्धों ,महिलाओं व बच्चों की मदद करना , सतर्क व सावधान रहना , आदि , अभी से ही भावी पीढी में रोपना शुरू कर देना चाहिए ताकि बीस पचास साल बाद देश न सिर्फ़ आर्थिक स्वावलंबन पाकर सुखी हो बल्कि नैतिक रूप से भी स्वस्थ हो । 

रविवार, 19 जनवरी 2014

क्षेत्रीय भाषाई गानों में बढती फ़ूहडता











मुख्यधारा के गीत संगीत से इतर लोकगीतों व क्षेत्रीय गीतों का एक समृद्ध एवं गौरवशाली
इतिहास और परंपरा रही है । वास्तव में कहा तो ये जाता है कि हिंदी गीतों के संसार के बहुत से गानों में सुरों का सौंदर्य और माधुर यानि मिठास लोकगीतों से ही प्रेरित रहा है । यही नहीं इन्हें समृद्ध करने वाले गीतकार ,संगीतकार व गायकों ने मुख्य धारा में जुडने के  बाद भी उस विरासत को जिंदा रखा ।


बदलते समय के साथ हिंदी गीतों व सिनेमाई गीत संगीत में रिमिक्स , रैप और कई अन्य नए चलनों से वहां जिस तरह का हल्कापन और स्तरहीनता बढी है उसी तरह , बल्कि उससे कहीं अधिक फ़ूहडता और भौंडापन , आज लोकगीतों में दिखता है । जितनी फ़ूहडता ऑडियो गानों के बोलों में सुनाई देती है उतनी ही अश्लीलता वीडियो एलबमों के चित्रांकन में भी दिखाई देती है । 

आश्चर्य व दु:ख की बात ये है कि ये प्रवृत्ति भोजपुरी , हरियाणवी , गढवाली , कुमाउंनी , पंजाबी आदि लगभग सभी क्षेत्र के लोकगीतों में भी बढी है । हालांकि ऐसा नहीं है कि क्षेत्रीय भाषाओं व लोकगीतों में सुंदर , व कर्णप्रिय गीत लिखे व गाने नहीं जा रहे किंतु स्तरहीन फ़ूहड एलबमों की अधिकता व रात दिन बसों , ट्रकों ,दुकानों , गांव ,कस्बों में इनकी चिल्ल पौं ने लोकगीतों की विरासत पर गहरा आघात लगाया है । 


इस प्रवृत्ति पर एक प्रसिद्ध लोकगायिका कहती हैं कि थोडे से पैसे लगाकर कुछ भी उल जलूल परोस कर ज्यादा पैसे बनाने का लालच और सस्ते/घटिया गीतों का बढता बाज़ार ही इसकी मुख्य वज़ह है । यदि इस प्रवृत्ति को अभी रोका और हतोत्साहित नहीं किया गया तो भविष्य में आने वाली पीढीयों को लोकगीतों और क्षेत्रीय गानों के नाम पर जो कुछ देखने सुनने को मिलेगा वो संगीत के नाम पर सिर्फ़ एक काला धब्बा होगा । इसलिए ये बहुत जरूरी है कि सुंदर , लोकगीतों को सहेज़ा और परोसा जाए ।

सोमवार, 13 जनवरी 2014

बच्चों के प्रति क्रूर होता एक समाज ......

घर से भागा हुआ बच्चा पवन कुमार



इस बच्चे का नाम है पवन कुमार । ये बच्चा मुझे अपने गृहनगर मधुबनी बिहार से दिल्ली की वापसी रेल यात्रा में , अपने रेल के डब्बे में बैठा मिला । असल में ये बच्चा शायद मुजफ़्फ़रपुर या छपरा स्टेशन में से किसी स्टेशन पर रेल में सवार हो गया था । मेरा ध्यान इस बच्चे पर तब गया जब आसपास बैठे यात्रियों को इस बालक से चुहल करते देखा । कोई इसे जूस के दुकान पर काम करने को तैयार कर रहा था तो कोई इसे जेबकतरा कह के दुत्कार रहा था । आशंका होने पर मैं इसके पास गया और पहले मैंने सहयात्रियों से पूछा कि क्या ये बच्चा किसी के साथ है । इंकार करने पर मैंने इस बच्चे से इसका नाम और पता पूछा ।

बच्चा अचानक ही मुझे यूं पूछते देख झिझक कर डर कर चुप होगा , मगर मेरे बार बार पुचकारने पर बताया कि वो अपनी नानी के घर से भाग कर आया है बच्चे ने ये भी बताया कि वो पहले भी दो बार भाग चुका है । मझे अंदेशा हुआ कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बच्चा अपने हो रहे किसी जुल्म सितम से डर कर भाग खडा हुआ था , मगर प्यार से पूछने पर उसने बताया कि वो नौकरी करने जा रहा है । मुझे उसे बहुत ही सावधानी से समझाना पडा कि अभी वो बहुत छोटा है और उसे कम से कम उस उम्र तक तो इंतज़ार करना ही चाहिए जब तक वो नौकरी के लायक शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व न हो जाए । बच्चा अब घर जाने को तैयार था । मैंने अगले स्टेशन (बलिया) पर उतर कर फ़ौरन ही स्टेशन अधीक्षक के दफ़्तर पहुंच कर सारी बात बताई और इस मासूम को उनके सुपुर्द किया ।

मैं जब ये पोस्ट लिख रहा हूं तो टेलिविजन चैनल पर समाचार आ रहा है कि मुंबई के मीरा रोड पर पुलिस ने एक ११ वर्षीय बच्चे को छुडाया है जिसे जबरन मार पीट और भयंकर शोषित करके घर में बंधक बना कर काम कराया जा रहा था और इस तरह की घटना या खबर अब रोज़मर्रा की बात सी हो गई है । ऐसा लग रहा है मानो इस समाज को बच्चों के प्रति कोई संवेदना , कोई सहानुभूति , कोई चिंता नहीं है । किसी समाजशास्त्री ने ऐसी स्थिति को भांप कर ही कहा था कि जो देश और समाज कल का भविष्य बनने वाले बच्चों के प्रति असहिष्णु और लापरवाह होता है उसे फ़िर बदले में हिंसक और क्रूर नस्लें ही मिलती हैं ।

राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकडों पर नज़र डालें तो स्थिति की भयावहता का अंदाज़ा लग जाता है ।सिर्फ़ पिछले पांच वर्षों में बच्चों के प्रति हिंसा और अपराध की घटनाओं में 21 %  का इज़ाफ़ा हुआ है । इन अपराधों में भी सबसे ज्यादा घटनाएं अपहरण , हत्या और शोषण की हैं । इतना ही नहीं प्रति वर्ष देश भर से गुमशुदा बच्चों की दर में भी लगातार वृद्धि हो रही है और चौंकाने वाली बात ये है कि छोटे शहरों , गांव , कस्बों से बहला फ़ुसला कर , घर से भाग कर , या किसी और कारणों से गायब हुए बच्चों के अलावा महानगरों और बडे शहरों में ये दर कहीं अधिक है । इसका मतलब स्पष्ट है कि पुलिस , प्रशासन व सरकार बच्चों के जीवन व सुरक्षा के प्रति घोर उदासीन व असंवेदनशील रवैया अपनाए हुए है ।

महानगरों में बच्चों को बंधक मजदूरी , भिक्षावृत्ति , तथा अन्य शोषणों से लगातार त्रस्त होना पड रहा है और सरकार तथा कुछ स्व्यं सेवी संस्थाओं के लगातार प्रयासों के बावजूद भी \स्थिति निरंतर बिगडती ही जा रही है । पिछले दिनों तो गरीब बच्चों का अपहरण करके उनकी हत्या के बाद मानव अंगों के व्यापार हेतु उनका प्रयोग किए जाने जैसी अमानवीय और घिनौनी घटनाएं भी सामने आई हैं । आश्चर्य व दुख इस बात का है सरकार ने अब तक इन नौनिहाल मासूमों की सुरक्षा व संरक्षण हेतु कोई ठोस नीति या योजना न तो बनाई है और न ही कोई प्रयास किया है । महज़ आंकडों की बाजीगरी और कागज़ी कोशिशों के सहारे ही प्रशासन अपने प्रयास गिनाने में लगा रहता है ।

यदि यही स्थिति रहती है तो फ़िर निश्चित रूप से समाज को इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि भविष्य में हालात और भी नारकीय हो जाएंगे । सरकार को समाज और स्व्यं सेवी संस्थाओं , समूहों , सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर इस दिशा में एक दूरगामी रोडमैप बना कर आपसी तालमेल के साथ वृहत योजना बनानी चाहिए । संचार क्रांति के इस युग में कम से कम गुमशुदा बच्चों की तलाश तो पूरी संज़ीदगी से की ही जानी चाहिए , ताकि समय रहते ऐसे भूले भटके बच्चों को उनके घर तक पहुंचाया जा सके ।


मंगलवार, 12 नवंबर 2013

मुर्गे ढोते स्कूली वैन .......



ज्यादा फ़र्क नहीं है ,खुद ही देखिए , हालत इस तस्वीर से ज्यादा भयानक है





अभी कुछ वर्षों पूर्व उत्तर पूर्वी दिल्ली में एक हादसे , जिसमें दो स्कूली बस आपस में आगे निकलने की होड में
दुर्घटनाग्रस्त हो गई थीं जिसमें बहुत से मासूम बच्चों को अपनी जान से हाथ धोना पडा था । हालांकि स्कूली वाहनों से जुडा हुआ ये कोई पहला हादसा नहीं था मगर ये इतना बडा हादसा जरूर था ,जिसने सरकार व प्रशासन को इस बात के लिए मजबूर किया कि वे स्कूली वाहनों के लिए जरूरी दिशा निर्देश जारी किए जाएं । प्रशासन ने स्कूली वाहनों के लिए बहुत से नियम कायदे बनाए जिन्हें कुछ दिनों तक लागू होते हुए सबने देखा भी । जैसे सभी स्कूली वाहनों पर पीले रंग की पट्टी और उसमें स्कूल वैन लिखा होना , ऐसे प्रत्येक वैन/बस में स्कूल की तरफ़ से शिक्षक/सहायक की अनिवार्य रूप से उपस्थिति , और सबसे जरूरी ऐसे स्कूली वाहनों में प्रशिक्षित चालकों का होना आदि ।


जैसा कि अक्सर और लगभग हर नागरिक कानून के साथ होता रहा है , कुछ दिनों के बाद इनमें न सिर्फ़ शिथिलता आई बल्कि धीरे धीरे स्थिति ऐसी बन गई कि पहले चोरी छुपे और अब तो खुले आम इन नियम कायदों की धज्जियां उडाई जा रही हैं । इसका दुष्परिणाम इससे अधिक भयंकर और क्या हो सकता है कि लगातार इन स्कूली वाहनों का दुर्घटनाग्रस्त होने के अलावा इन वैन और बस चालकों द्वारा छोटे स्कूली बच्चों का शारीरिक शोषण तक किए जाने की घटनाएं रोज़मर्रा की बात हो गई हैं । ऐसा नहीं है कि सरकार ,प्रशासन व पुलिस की तरफ़ से इससे निपटने के लिए कुछ नहीं किया गया है । बहुत बार पुलिस ने बाकायदा अभियान चलाकर इन तमाम स्कूली वाहनों के खिलाफ़ सख्ती दिखाई है । मगर ऐसा करते ही ये तमाम स्कूली वैन/बस वाले हडताल पर चले जाते हैं और अभिभावक से लेकर स्कूली प्रशासन को मौका मिल जाता है अपनी इन गलतियों को मजबूरी का जामा पहनाने का ।


शहरों में बढती आबादी और उसी अनुपात में बढते स्कूलों के कारण ये स्वाभाविक है कि स्कूली वाहनों की कमी जरूर महसूस की जाती है किंतु आज अभिभावकों से बच्चों के स्कूल आने जाने का भारी भरकम किराया राशि वसूलने वाले स्कूल प्रशासनों का ये रोना कृत्रिम सा लगता है । स्कूली बसों तक तो स्थिति फ़िर भी ठीक ही कही जा सकती है , मगर छोटे छोटे स्कूल वैन/ व स्कूली रिक्शे तक  में बच्चों को जिस तरह से ठूंस ठूस कर ढोया और लादा जा रहा है उसे देखकर हठा्त ही उस छोटे से पिंजरेनुमा रिक्शे की याद आ जाती है जिसमें मुर्गों को किसी मीट की दुकान पर ले जाया जा रहा होता है








अब ये स्थिति अधिक चिंताजनक इसलिए भी होती जा रही है क्योंकि शहरों विशेषकर राजधानी की सडकों पर बेतहाशा बढते वाहनों ने , यातायात के दबाव को और अधिक बढा दिया है । छोटे छोटे बच्चों द्वारा तेज़ रफ़्तार से चलाते स्कूटियों/स्कूटरों/बाइक आदि ने  इसे और भी अधिक नारकीय बना दिया है । ऐसे में बच्चों को स्कूल पहुंचाते व वापस लाते वाहनों के की पूरी कमान भी कमोबेश ऐसे ही लापरवाह कम उम्र और अनुभव वाले , जिनमें से अधिकांश के पास चालक लाइसेंस तक नहीं मौजूद होता है , देश के भविष्य को जानबूझ कर मौत के मुंह में ढकेलने जैसा है ।


ये इतना आसान नहीं होगा और न ही यकायक ठीक होने वाली समस्या है बल्कि इसके लिए योजनाबद्ध तरीके से प्रशासन , पुलिस , अभिभावकों व स्कूल प्रशासन को मिल कर कई मोर्चों पर काम करना होगा । सबसे पहले अभिभावकों को   स्कूल प्रशासन पर इस बात का दबाव बनाना चाहिए कि वे बच्चों के लाने जाने अपने अपने स्कूली वाहनों के चालकों , वाहनों की स्थिति , समय , रास्ते आदि की व्यवस्था को सर्वोच्च वरीयता सूची में रखें । वाहन चालक का लाइसेंस , उसका अनुभव व उसकी पृष्ठभूमि आदि की अच्छी तरह से पडताल किया/कराया जाना अनिवार्य किया जाना चाहिए । पुलिस को इसमें स्कूल प्रशासनों का सहयोग करना चाहिए तथा निर्धारित नियम कानूनों के पालन को सुनिश्चित करना चाहिए ।


इन सबसे अहम बात ये कि एक आम नागरिक के रूप में हमें और आपको जब भी कहीं भी कभी भी कोई स्कूल वैन ऐसी स्थिति में दिखे कि लगे कि इसके बारें में स्कूल प्रशासन और पुलिस को सूचित करना जरूरी है तो बिना देर किए ऐसा किया जाना चाहिए । हमें हर हाल में ये याद रखना चाहिए कि , इन सडकों पर दौडते , इन सैकडों वैन में , हमारे आपके ही घर आंगन में खेलते वो नन्हें भविष्य हैं जिन्हें हर हाल में इस देश के कल के लिए बचाया जाना चाहिए , कम से कम ऐसी लापरवाहियों से उन्हें खोते रहने का गुनाह अब पूरी तरह से बंद किया जाना चाहिए ।


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अगला मुद्दा : टूटती सामाजिक मान्यताएं और किशोर

सोमवार, 16 सितंबर 2013

मृत्युदंड : एक विमर्श







देश के एक प्रतीक्षित फ़ैसले में अदालत का निर्णय , जो कि अधिकतम , यानि मृत्युदंड आने के बाद एक बार पुन: "मृत्युदंड" की सज़ा पर नई बहस उठ खडी हुई है । ज्ञात हो कि ऐतिहासिक रूप से ये पहला मौका है जब किसी एक ही जिला अदालत द्वारा एक माह के भीतर ही नौ अपराधियों को मृत्युदंड की सज़ा सुनाई गई है । अंतरराष्ट्रीय संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी मृत्युदंड की सज़ा के बढते दर को चिंताजनक करार दिया है । अभी कुछ समय पूर्व ही आतंकवाद का आरोप साबित होने पर दो अपराधियों अजमल कसाब और अफ़ज़ल गुरू को फ़ांसी पर लटकाया गया था ।
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मृत्युदंड की सज़ा के इतिहास पर नज़र डाली जाए तो भारत सहित अन्य बहुत से देशों में न सिर्फ़ मौत की सज़ा का प्रावधान प्रचलित था बल्कि लगभग सभी देशों में इसके क्रियान्वयन के अमानवीय और क्रूर तरीके भी प्रचलिए थे । इंगलैंड में १४९१-१५४१ के बीच तो लगभग ७२,००० लोगों को छोटे बडे अपराधों तक के मृत्युदंड दे दिया गया । मृत्युदंड की सज़ा देने के लिए क्रूरतम विधियों का प्रयोग किया जाता था जैसे गैरेट ( धातु की कॉलर से अपराधी का गला , उससे श्वास रूकने तक दबाए रखना ) , गुलोटिन ,(एक विशेष प्रकार की मशीन जिसमें बडे धारदार ब्लेड की सहायता से अपराधी का सिर धड से अलग कर दिया जाता था । इसके अलावा सूली पर टांग कर , कुचलकर , विषैली गैस छोडकर, ज़हर का इंजेक्शन व गोली मारकर भी मृत्युदंड दिया जाता था । अमानवीय तरीकों में जिंदा गाडकर पशुओं के खाने केल इए छोड देना , छोटे बडे घाव देकर रोज कष्ट पहुंचा कर तथा सार्वजनिक स्थानों पर अपराधियों पर पत्थर बरसा अक्र उन्हें मार डालने की प्रथाएं व्याप्त थीं । आधुनिक युग में कुछ अरब देशों को छोडकर मृत्युदंड के अमानवीय तरीकों को हटा दिया गया है ।
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मृत्युदंड की सज़ा के विरोधी इसके पीछे तर्क देते हुए कहते हैं कि इस दंड की अप्रतिसंहरणीयता के कारण इसका प्रयोग खतरे से खाली नहीं है क्योंकि भविष्य में यदि आरोपी निर्दोष साबित हो जाता अहि तो इस दंड का उपशमन नहीं किया जा सकता है ।  किंतु इस तर्क के जवाब में यह कहा जा सकता है कि बहुस्तरीय न्याय प्रक्रिया और जटिलताओं के बाद इस बात की गुंजाईश न के बराबर बचती है कि ऐसी कोई स्थिति सामने आए । इसके विरोध में दूसरा तर्क ये दिया जाता है कि दंड का एक उद्देश्य होता है कि उसके भय से अपरधियों में अपराध के प्रति प्रतिरोध की भावना आए जबकि वास्तव में मृत्युदंड की सज़ा से संबंधित अपराध की दर में कोई प्रभाव पडा हो ऐसा देखने को नहीं मिलता ।


किंतु सिर्फ़ इस कारण से मृत्युदंड की सज़ा को समाप्त किया जाना तर्कसंगत नहीं लगता आज भी विश्व के १४१ देशों ने अपने यहां पर इस दंड व्यवस्था को बहाल रखा हुआ है । । इस विषय में प्रसिद्ध इटेलियन अपराधशास्त्री गेरोफ़ेलो का कथन गौर करने लायक है कि , " मृत्युदंड को समाप्त करने का अर्थ यह होगा मानो हम हत्यारे से कह रहे हैं कि तुम्हारे द्वारा किसी व्यक्ति की जान लेने जोखिम केवल अय्ह होगा कि अब तुम स्वयं के घर के बजाय कारागार में निवास करोगे " । यूं भी अपराध, आतंकवाद का प्रसार और मानवता के प्रति उसके बढते हुए खतरे को देखकर मृत्युदंड को समाप्त करना उचित नहीं जान पडता है । श
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भारत में भी मृत्युदंड को समाप्त करने की कवायद कई बार की गई है । लोकसभा में इस आशय का प्रस्ताव सर्वप्रथम १९४९ में रखा गया था किंतु तत्कालीन गृह मंत्री वल्लभ भाई पटेल ने इसे ठुकरा दिया था । १९८२ में दिल्ली में आयोजित दंड विधि पर अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस में भी मृत्युदंड के औचित्य पर विस्तृत चर्चा हुआ किंतु मृत्युदंड को विधि में यथावत रखने पर ही सहमति बनी । इसी प्रकार १९७१ में विधि आयोग ने भी मृत्युदंड के पक्ष में विचार रखते हुए कहा कि मृत्युदंड का आधार प्रतिशोध की भावना न होकर निष्ठुत अपराधियों के प्रति समाज का रोष दर्शाना है अत: दंड विधि में उसे बनाए रखना सर्वथा उचित है ।
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जहां तक भारतीय विधि में मृत्युदंड की स्थिति है तो कुछ विशेष अपराधों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान रखा गया है । सरकार के विरूद्ध युद्ध छेडना , सैनिक विद्रोह का दुष्प्रेरण , हत्या , आजीवन कारावास मिले अभियुक्त द्वारा हत्या का प्रयास , फ़िरौती के लिए अपहरण व हत्या , हत्या सहित डकैती आदि । यहां यह उल्लेख करना समीचीन होगा कि भारतीय दंड संहिता की धारा ३०३ एकमात्र ऐसी धारा थी जिसमें अपराधी को मृत्युदंड ही दिया जाना अनिवार्य था तथा इसके विकल्प में आजीवन कारावास दिए जाने का प्रावधान नहीं था ,जिसे वर्ष १९८३अ में मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य के वाद में असंवैधानिक ठहरा दिया गया । ज्ञात हो कि वर्ष १९५५ के पूर्व मानव वध के लिए मृत्युदंड दिया जाना सामान्य नियम था एवं आजीवन कारावास दिए जाने पर उसका कारण दर्ज़ करना आवश्यक होता था जबकि १९५५ में किए गए संशोधन के पश्चात स्थिति ठीक विपरीत हो गई तथा मृत्युदंड की सज़ा सुनाते समय इसके कारणों का उल्लेख करना अपरिहार्य बना दिया गया । उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णीत मृत्युदंड से संबंधित प्रकरणों के विश्लेषण से यह पता चलता है कि न्यायालय ने आकस्मिक आवेश, उत्तेजना, विषयसक्ति के कारण उत्पन्न घृणा , पारिवारिक कलह , भूमि संबंधी झगडे , आदि को मृत्युदंड के बजाय आजीवन कारावास का दंड दिए जाने का उचित कारण माना है ।
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मृत्युदंड के संदर्भ में व्याख्यायित सिद्धांत "विरलों में भी विरलतम" को भी अक्सर बहस का विषय बनाया जाता रहा है एवं खुद कई बार ये बात न्यायपालिका तक मान चुकी है कि इसकी व्याख्या करने के न्यायिक मानदंड में भारी असामनाता रही है ।यही कारण है कि वर्ष १९८३ में दीना बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के वाद में इससे पूर्व निर्णीत वाद बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य में व्याखायित सिद्धांत कि मृत्युदंड "विरलों में से भी विरलतम" मामलों में ही दिया जाना चाहिए को और स्पष्ट करते हुए कुछ विशेष बिंदुओं को चिन्हित किया जिन्हें विरलतम माना जाना चाहिए । बर्बरतापूर्वक एवं क्रूरतापूर्ण तरीके से की गई हत्या , हत्या का उद्देश्य घिनौना या दुराचारयुक्त हो , यदि यथा सामाजिक दृष्टि से घृणित या वीभत्स हो , जहां हत्याएं बडे पैमाने पर की गई हों , जैसे सामूहिक हत्या तथा जहां अपराध से पीडित व्यक्ति कोई असहाय बालक ,महिला , वृद्ध व्यक्ति या विख्यात , प्रतिष्ठित व्यक्ति हो या हत्या राजनीतिक स्वरूप की हो ।
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अत: सारांशत: यह कहा जा सकता है कि इसमें संदेह नहीं कि यदि मृत्युदंड का मनामने ढंग से या या भेदभावपूर्ण तरीके या जानबूझकर अनुचित रूप से प्रयोग किया गया तो वह असंवैधानिक होगा परंतु यदि वह विवेकपूर्वक उचित ढंग से निष्पक्ष होकर लागू किया जाए तो यह निश्चित ही लोगों में आपराधिक न्याय प्रशासन की विश्वसनीयता और उसके प्रति आस्था में अभिवृद्धि ही करेगा ।



रविवार, 8 सितंबर 2013

व्यवसाय में बदलती शिक्षा व्यवस्था ( संदर्भ ,विश्व साक्षरता दिवस )




 विश्व साक्षरता दिवस, यानि 8 सितंबर , यदि वास्तव में सोचा जाए तो क्या भारत जैसे देश को सच में ही साक्षरता दिवस मनाने का हक है , आइए कुछ तथ्यों पर नज़र डालते हैं 

* भारत आज भी अपने कुल खर्च का मात्र छ : प्रतिशत ही शिक्षा के मद में  खर्च करता है ।  
* भारत में आज भी लगभग 40 %  लोग निरक्षर हैं ।  
* भारत में कुल बच्चों में से लगभग 29 % आज भी किसी स्कूल में पढने नहीं जा पाते हैं ।  
* भारत ही वो देश है जहां सैकडों बच्चों को मुफ़्त भोजन योजना के कारण अपनी जान तक से हाथ धोना पडा है । 


ये तो हुई ग्रामीण भारत की बात अब ज़रा शहरी क्षेत्र की ओर भी नज़र की जाए । 


* आंकडों के मुताबिक शहरी क्षेत्र में रहने वाले लगभग 34 % अभिभावकों ने माना कि अपने बच्चों की फ़ीस भरने के लिए उन्हें कभी न कभी कर्ज़ या उधार लेने की नौबत आई है ।  
* सरकारी नियमों और न्यायिक आदेशों के बावज़ूद भी लगभग 89 % स्कूल अभिभावकों को स्कूल में बनाई गई दुकानों से ही किताबें , पुस्तिकाएं व वर्दी तक खरीदने को बाध्य करते हैं ।
* सरकारी नियमों के और न्यायिक आदेशों के बावजूद भी लगभग 42% स्कूल ,गरीब बच्चों को अपने यहां दाखिला इसलिए नहीं देते क्योंकि वे उन्हें मुफ़्त शिक्षा देना नहीं चाहते । 
*शहरी क्षेत्र के निजि स्कूलों में वातानुकूलित कक्षाएं और सरकारी स्कूलों के पास भवन तक नहीं है । 

ये वो चंद आंकडे भर हैं जो सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या भारत को वाकई साक्षरता दिवस मनाने का हक है ??????

बुधवार, 4 सितंबर 2013

न शिक्षा आदर्श रही न शिक्षक (संदर्भ ,शिक्षक दिवस )





हर साल की तरह इस साल भी नियत समय पर शिक्षक दिवस आ गया है । शिक्षक दिवस यानि शिक्षकों को समर्पित एक विशेष दिन जो पूरे विश्व भर में अलग अलग तिथियों को , स्वाभाविक रूप से उनके देश के शिक्षक , चिंतक , विचारकों के जन्म आदि पर आधारित , मनाया जाता है । भारत में इसे , 5 सितंबर , देश के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति , पेशे से शिक्षक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस  को मनाया जाता है । इसकी शुरूआत की कहानी भी बेहद दिलचस्प है । डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने जब राष्ट्रपति के रूप में पद संभाला तो उनके प्रशंसकों ने उनके जन्मदिवस को मनाने का आग्रह किया । उन्होंने सुझाव दिया कि फ़िर से राष्ट्रीय शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए । उसी वर्ष यानि 5 सितंबर 1962  से प्रति वर्ष इस दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है । 

बचपन से देखते चले आ रहे हैं कि स्कूलों में इस दिन को पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है । छात्रों में तो अपने शिक्षकों के प्रति स्नेह आदर और सम्मान दिखाने , तथा इस दिन आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रमों को लेकर एक अलग ही जोश दिखाई देता है । बच्चों को जो चीज़ सबसे ज्यादा पसंद आती है वो है एक दिन के लिए खुद शिक्षक बनकर अपनी कक्षा से छोटी कक्षा वाले बच्चों को पढाते हैं और फ़िर उस दिन आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रमों में अपने शिक्षकों के साथ खुल कर हल्का फ़ुल्का समय बिताते हैं । कुल मिलाकर उस दिन बच्चों के लिए पूरे स्कूल का माहौल विनोदपूर्ण और आनंददायक रहता है । किंतु यहां ये भी बहुत गौरतलब है कि जैसाकि इस विशेष दिवस का महत्व बताते हुए एक बार देश के राष्ट्रपति वैज्ञानिक ने कहा था कि देश के भविष्य को संवारने की जितनी जिम्मेदारी शिक्षकों पर होती है उतनी किसी अन्य समुदाय और वर्ग पर नहीं होती ।

यदि स्थिति का आकलन किया जाए तो देश में आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी न तो शिक्षा की स्थिति संतोषजनक नहीं है और न ही शिक्षकों की । देश की सरकार व प्रशासन शिक्षा के प्रति कितने गंभीर हैं इस बात का अंदाज़ा इसी तथ्य से लग जाता है कि आज भी देश के बजट का कुल छ: प्रतिशत शिक्षा के मद में व्यय किया जाता है और इस राशि को भी ईमानदारी से कहां कितना उपयोग किया जाता है वो भी किसी से छुपा नहीं है ।


कहते हैं कि बुनियाद ही कमज़ोर हो तो फ़िर ईमारत की मजबूती हमेशा संदेह में रहती है । देश में आज सबसे बुरी हालत प्राथमिक शिक्षा की है और शिक्षकों की भी । न तो विद्यालयों के पास समुचित भवन हैं , न ही पेय जल , पुस्तकालय , पाठय सामग्री आदि बुनियादी सुविधाएं । ऊपर से शिक्षकों को पढाने के अतिरिक्त एक जिम्मेदारी सरकार ने और सौंप दी है और वो है मध्याह्न भोजन की । शहरों में तो खैर जैसे तैसे भोजन बनाने वाले भी मुहैय्या करा दिए गए हैं किंतु गांवों के स्कूलों में जहां पहले से ही शिक्षकों की भारी कमी है वहां उनमें से भी कुछ तो दोपहर भोजन योजना में ही लगे रहते हैं । किंतु ऐसा नहीं है कि सारा दोष सिर्फ़ सरकार और प्रशासन का ही है , शिक्षा आज एक व्यवसाय का रूप ले चुकी है और स्कूल कालेज मुनाफ़ा कमाने वाले कारोबार बन गए हैं । स्कूलों में किताबों से लेकर वर्दी तक जबरन बेचे जा रहे हैं । हर तरह एक भागमभाग सी मची हुई है । ऐसे में कोई आदर्श शिक्षा और शिक्षक की कल्पना भी कैसे कर सकता है ।

इन्हीं सबका परिणाम ये हुआ है कि आज न तो छात्रों के लिए कोई शिक्षक उनका आर्दश , उनका मार्गदर्शक गुरू और जीवनभर की प्रेरणा बन पाता है और न ही बनने को उत्सुक भी है । एक निर्धारित घिसे पिटे पैटर्न पर चल रही शिक्षा प्रणाली को  उम्र भर खुद ढोता  और छात्रों की पीठ पर लादता हुआ एक शिक्षक अब इस आस में कभी नहीं रहता कि उसका कोई छात्र कल होकर जब देश और समाज के निर्माण में कोई बडी सकारात्कम भूमिका निभाएगा तो खुद उस शिक्षक का दिया हुआ ज्ञान ही उसके मूल में होगा । शिक्षा और शिक्षकों को यदि अपनी गरिमा बनाए बचाए रखनी है तो उन्हें इस समाज में रहकर भी इनकी तमाम कुरीतियों और दुर्गुणों से खुद को बचाए रखकर शिक्षा के ध्येय के लिए साधना रत होना होगा ।

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