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मंगलवार, 20 सितंबर 2016

काली स्याही ,सफ़ेद चेहरा ..(स्याही प्रकरण )



स्याही  प्रकरण से  उठते सवाल

आपको रोटी सिनेमा का यह गाना याद है , इसमें  सिनेमा में मक्कार साहूकार का किरदार निभाने वाली जीवंत कलाकार जीवन  की बेटी को सब चरित्रहीन  कहकर उस पर पत्थर बरसाने लगते हैं उसी समय उस सिनेमा के नायक राजेश खन्ना आकर सबको यह कहकर रोक देते हैं की आज हम इस पापिन  को सब मिलकर सजा देंगे लेकिन पहला पत्थर मारने का हक सिर्फ उसको है जो खुद पापी नहीं है || ज्योति किसी पर जूता फेंकने स्याही फेंकने अभी जैसे प्रकरणों को देखता हूं तो सबसे पहला ख्याल यही मन में आता है।। .......देखिये ये  गाना .....





हाल ही में इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति का शिकार हुए दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ||इसमें कोई संदेह नहीं कि वर्तमान सरकार में और खुद आम आदमी पार्टी में यदि अब भी कोई सो प्रतिशत सोने का खरा व्यक्ति है तो वह सिर्फ खुद मनीष सिसोदिया हैं || इसका प्रमाण आज स्वयं उन्होंने एक बार फिर दिया और स्याही मुंह पर गिरने के बावजूद वह शांत और स्थिर बने रहे। सबसे दुखद स्थिति यह है कि यह प्रवृत्ति अब दिनों दिन बढ़ती जा रही है और इस प्रवृत्ति का शिकार देर सवेर हर बड़े दल का नेता हो रहा है कभी किसी प्रेस वार्ता में तो कभी किसी जनसभा में कभी किसी चुनाव प्रचार रैली में इस प्रकार का व्यवहार किया जाना निश्चित रूप से बहुत ही ज्यादा निंदनीय हो खतरनाक है।


यह किसी एक दल किसी एक सरकार या किसी एक विचारधारा के लिए सीमित  प्रश्न नहीं है ,बल्कि यह तो लोकतंत्र के आधार - जन संवाद को ,हतोत्साहित करने का ,एक बहुत ही निंदनीय प्रयास है । इसके पीछे चाहे वजह कोई एक राजनीतिक दल या फिर किसी एक व्यक्ति का ही क्यों ना हो ,इन प्रवृतियों से सख्ती से निपटा जाना चाहिए | किंतु वर्तमान राज्य सरकार व दिल्ली पुलिस के बीच जिस तरह की आपकी तनातनी का माहौल है उसे देखते हुए ऐसा लगता नहीं है कि दिल्ली पुलिस की तरफ से फिलहाल कोई सख्त कदम व नीति अपनाएगी ||

अलबत्ता पिछली कुछ घटनाओं के बाद पुलिस व् संबद्धित संस्थाएं  , सुरक्षा में काफी संजीदा भी दिखाई जरूर देती है  लेकिन निष्कर्ष और कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सार्वजनिक और शीर्ष पदों पर बैठे हुए व्यक्तियों की शारीरिक वह मानसिक भी सुरक्षा की व्यवस्था जरूरी पुख्ता की जानी चाहिए ||और इसके लिए जरूरी नीतियां बनाई जानी चाहिए |और ऐसे लोगों को भड़काए जाने उकसाये जाने के जिम्मेदार लोगों को भी सख्त शारीरिक दंड दिया जाना चाहिए ,जबकि रिकार्ड के अनुसार यहाँ उल्लेखनीय है कि कभी इसी तरह  जूता फेंक  कर  और  थप्पड़ मार कर सुर्ख़ियों में आने वाले जरनैल सिंह बाद में आम आदमी पार्टी की टिकट पर चुनाव लडे व् विधायक भी बने | ..जो भी बेहद अफसोसनाक प्रवृत्ति है  ये  ....................................



                     कल बात करेंगे ......विश्व पर छा रहे तीसरे विश्व युद्ध के संकट की

शनिवार, 17 सितंबर 2016

पथ्य (दवा) से परहेज़ भली




... एक कहावत है बहुत ही पुरानी और दिलचस्प ,बात यह है कि हमारी हर कहावत के पीछे जो सच छुपा होता है वह हमारे पूर्वजों के अनुभव का निचोड़ होता है तो जैसा कि मैं कह रहा था कि एक कहावत है पथ्य (दवा ) से परहेज भली ||अर्थात सच में देखा जाए तो दिल्ली के वर्तमान हालात ,  जिनमें चारों तरफ चीख पुकार मची हुई है | अस्पतालों में बिस्तरों से लेकर के फर्श तक पर मरीज को चीख पुकार रहे हैं | डॉक्टर दवाइयां सभी बेबस से दिख रहे हैं | जहां तक सरकार व प्रशासन की बात है तो वह पिछले कई वर्षों की तरह सिर्फ एक दूसरे पर दोषारोपण करने कि अपनी पुरानी  पति को दोहरा रहे हैं भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की एक सबसे बड़ी भूल है कि वह ना तो भविष्य के लिए तैयार होता है ना इतिहास में की गई से कोई सबक लेता है लेता है |


 आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि हमारी सरकार ,हमारी व्यवस्था , हमारा समाज ,हमारा परिवार ,सभी इस बात पर तो खूब जोर देते हैं व इस बात की सारी फ़िक्र  रखी जाती है ढेरों जतन किए जाते हैं  ||बीमार पड़ते ही उपचार किए जाने के लिए , किंतु जीवन में कोई बीमार ही ना पड़े या फिर कम से कम रोगों से ग्रस्त हो इस तरह की कोई व्यवस्था इस तरह की कोई सूरत दिखाई ही नहीं देती || बच्चों की किताबें ,बच्चों की शारीरिक शिक्षण कहीं पर भी उसमें इस बात का जवाब नहीं दिया जाता  कि कौन कौन सी  आदतें , किस तरह का खानपान , मौसम के अनुरूप परहेज़ व् सावधानी  आदि का ध्यान रखी जानी चाहिए , यह उनके रोजाना पढने वाले भारी भरकम पाठ्यक्रम का हिस्सा क्यों नहीं होता  | जो पढ़ाई होती है वह भी सालों से रटा रटाया है ,जिसे बच्चे सिर्फ और सिर्फ एक प्रश्न और उत्तर की तरह याद करके आगे बढ़ जाते हैं जीवन में उसे नहीं उतारते ||

हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा नहीं है मुझे याद आता है गांव का एक छोटा सा त्यौहार अगर मैं ठीक हूं तो उसे हम लोग जूडशीतल बुलाते हैं जो शीतल यानि नाम के अनुरूप शीतलता से कुछ सम्बंधित |  यह उन दिनों में मनाया जाता है जिन दिनों  पानी की काफी कमी हो जाती है पेड़ पौधे सूखने लगते हैं और मान्यता यह है कि इस दिन सभी व्यक्ति गांव के छोटे बड़े सभी पेड़ पौधे वनस्पति ,उसकी जड़ों में पानी का कुछ न कुछ अंश जरूर डालते हैं  | लोग अपने दूरदराज के बगीचे में जाकर वहां वृक्षों , पौधों वनस्पति में इस प्रकार पानी डालते हैं मानो अपने परिवार के किसी बुजुर्ग की सेवा कर रहे हों | कहने को तो यह एक त्यौहार है किंतु इसके पीछे विज्ञान को तो देखें तो हम पाएंगे कि इंसान और पारिस्थिति पेड़ पौधों का कितना सुंदर संबंध स्थापित किया गया है ||

 इसी तरह का एक दूसरा प्रसंग याद आता है ऐसा कि बरसात के दिनों में ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े बुजुर्ग अक्सर  नीम के पत्तों को पीसकर उसकी छोटी-छोटी गोलियां बनाकर उन्हें सुखा लिया करते थे || जिन्हें बरसात ऋतु के शुरु होने से पहले बड़े बच्चे स्त्री पुरुष सब को खिलाया जाता था  ||इसके पीछे का तर्क यह था कि वह पेट में जाकर के रक्त विकारों को साफ कर देता था यह एक तरह का प्रतिरोधक होता था जो शरीर में जाकर के बरसाती दिनों के फोड़े-फुंसी पित्त कफ्फ आदि उन सब को नियंत्रित करता था| इसके परिणामस्वरूप रोगग्रस्त होने की समस्या बहुत कम हो जाती थी |

स्थानीय सामाजिक संगठनो , सरकारों , प्रशासन और खुद हमें अब आगे बढ़ कर इस दिशा में  पहल करनी होगी इससे पहले कि बहुत देर हो जाए |  और यह करना इतना भी मुश्किल नहीं है कि यदि आज और अभी से शुरु किया जाए तो ज्यादा नहीं सिर्फ पांच से दस वर्षों में ही फर्क स्पष्ट दिखने लगेगा || अपने आसपास सफाई स्वच्छता की आदत ,दैनिक व नियमित दिनचर्या ,संतुलित खानपान ,ज्यादा से ज्यादा शारीरिक श्रम आदि के अतिरिक्त आस-पास उपलब्ध भूमि पर अधिक से अधिक वृक्ष लगाना विशेषकर नीम पीपल आदि जैसे स्वास्थ्यवर्धक वृक्षों की उपस्थिति रोगों के फैलने पनपने को बहुत कम कर देती है।।

देखिए स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है , या तो आप अपना सारा समय श्रम हुआ धन बीमार होने के बाद खुद को निरोग करने के लिए दवाइयों में चिकित्सा में शल्य चिकित्सा में खर्च करें अन्यथा इन सब स्थितियों में पड़ने से पहले ही खुद को स्वस्थ निरोग रखने के प्रति सचेत व सजग होने की आदत डालें यह मैं आज और अभी से करने के लिए इसलिए कह रहा हूं ताकि आने वाली नस्लें स्वाभाविक रूप से इसे एक आदत के रूप में पाएं | इसलिए आज से और अभी से खुद को बीमार ना पडने देने का संकल्प ले और उस अनुरूप व्यवहार करें यही उचित है, यही अनिवार्य है ,और यही आखरी रास्ता है


गुरुवार, 15 सितंबर 2016

अनाथ होती दिल्ली


ये पोस्ट पूरी तरह से मोबाईल से ब्लॉग पोस्ट बना कर प्रकाशित की जा रही है और दूसरी विशेष बात ये कि सारा आलेख (पूरा टैक्स्ट ) मोबाइल के ऑडियो इन पुट से बोल कर टाईप की गयी है , बिलकुल आसानी से





कुछ दिनों पहले दिल्ली में एक चुटकुला काफी प्रसारित हुआ था जिसमें हमारे मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ध्यान मग्न होकर यह कहते हुए दिखाया गया था कि यदि आप से कोई गलती हो जाए तो आप बिल्कुल ना घबराऐं सिर्फ थोड़ी देर तक चुप बैठे और यह सोचो कि यह आरोप आपको किस पर लगाना है।। आज कमोबेश राजधानी दिल्ली की प्रशासकीय और बीमार चिकित्सकीय स्थिति यह इशारा कर रही है कि दिल्ली अनाथ है ।।न कोई मालिक न कोइ  खैर मख्दम......... हैं तो बस चिकनगुनिया , डेंगू , मोहल्ला क्लिनिक की डेढ़ किलोमीटर और अस्पतालों की कई किलोमीटर लम्बी लाईनों में व्यस्त खड़ा तीमारदार और वहीं पस्त पड़ा बीमार ....अनाथ , निर्बल , रोगी और कहीं कहीं मृत भी .....


एक तरफ माननीय न्याय पालिका के फैसलों द्वारा प्रमाणित राज्य प्रमुख माननीय गवर्नर साहब इन चित्रों व समाचारों से गायब नजर आते हैं जिन चित्रों में चीख चीख कर यह बताया व दिखाया जा रहा होता है कि डेंगू मलेरिया व चिकनगुनिया जैसी बीमारियां महामारी का रूप लेती जा रही है और बरसों पहले की तरह लोग मर रहे।। वहीं दूसरी तरफ सरकार के तमाम  मंत्री व अधिकारी  तक किसी ना किसी बहाने ,कोई चुनाव प्रचार के बहाने तो ,कोई प्रशिक्षण के बहाने फील्ड को छोड़कर अन्य स्टेशनों पर व्यस्त हैं और इतना ही नहीं वहां से सेल्फी पोस्ट कर रहे ।

हालात इतने  तक ही बदतर होते तो कोई बात ना थी किंतु इस से भी कहीं अधिक आगे जाकर अधिनस्थ संस्थाएं जैसे कि एंटी करप्शन ब्यूरो व राष्ट्रीय महिला आयोग तक आपसी खींचतान व नोटिस और मुकदमे बाजी में व्यस्त हैं वह तो शुक्र मनाना चाहिए प्रकृति और बरसात का कि पूरे देश भर के हालातों के ठीक उलट राजधानी दिल्ली में अभी भी बहुत अधिक बरसात दर्ज नहीं की गई है अन्यथा पिछले दिनों जरा सी बारिश से उत्पन्न जाम राष्ट्रीय सुर्खी बन गई  थीं ।

 इन परिस्थितियों में भी यदि सभी सार्वजनिक संस्थाएं व सभी सार्वजनिक व्यक्ति  यदि इसी तरह का आचरण करेंगे वह समस्याओं के समाधान से अधिक एक दूसरे पर दोषारोपण वह विफलताओं से सबक सीखने की आदत में लगे रहेंगे तो निसंदेह स्थिति खतरनाक से नारकीय हो जाएगी।

  केंद्र सरकार जो एक तरफ स्वच्छता को एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में लेकर पूरे देश भर में इसे केंद्रित करके अनेकों योजनाएं चला रही है वह भी राजधानी दिल्ली में बढ़ती इस महामारी के प्रति उदासीन वह उपेक्षित व्यवहार कर रही है अफसोस की बात यह है की इन परिस्थितियों का सबसे अधिक शिकार वह इस बदहाली व्यवस्था का नारा सबसे अधिक वही गरीब होता है हो रहा है जो इसने आम आदमी पार्टी पर सबसे ज्यादा विश्वास जताया था अब देखना यह है कि आने वाले समय में कौन लोग यह कौन सी पार्टी कौन से अधिकारी आगे आकर इन स्थितियों से निजात दिला कर दिल्ली वालों को राहत पहुंचा सकेंगे फिलहाल तो दिल्ली वासियों की स्थिति अनाथों जैसी ही है

शनिवार, 31 मई 2014

नागरिक संस्कारों पर तमाचा






तारीख 29 मई 2014 को दैनिक जागरण समाचार पत्र के संपादकीय पर ये खबर पढने के बाद भी कहीं कोई तीव्र प्रतिक्रिया नहीं आना इस देश में किसी को भी अब हैरत में नहीं डालता है । कुकुरमुत्ते की तरह लगातार उगते चले जा रहे टीवी खबरिया चैनलों में इतनी भीड बढते जाने के बावजूद भी सब एक ही लकीर के फ़कीर बने रहना चाहते हैं । कहीं कोई अलग सोच , अलग आइडिया, अलग स्टोरी नहीं । खैर , बात यहां इस खबर से उपजी दूसरी खबर की हो रही है । तो ये ऊपर की खबर का लब्बोलुआब सिर्फ़ इतना है कि एक विदेशी नागरिक ने अपने किसी देसी आदमी जो दीवार गीली करने  की सतत परंपरा का निर्वाह कर रहा था उसे ऐसा करने से टोका , तो उस भले आदमी ने विदेशी आगंतुक को एक थप्पड रसीद कर दिया । इस बात की शिकायत जब वह पीडित पुलिस के पास पहुंचा तो ..........अब पुलिस का क्या रवैय्या रहा ,इसका अंदाज़ा भी सहज़ ही लगाया जा सकता है ।



इससे कुछ समय पहले ही सार्वजनिक रूप से ऐसी क्रिया करने वालों की आदत से परेशान होकर एक सोसायटी द्वारा थक हारकर इससे निज़ात पाने के लिए दायर एक याचिका का निपटारा करते हुए माननीय न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि ,"कानून लोगों की ज़िप पकड के नहीं बैठ सकता , इसके लिए नागरिकों को स्वयं ही अपने नागरिक संस्कारों को विकसित करना होगा " ।बात तो मार्के की है और इससे पहले भी इस मामले को लेकर बहुत बार टीका टिप्पणी की जाती रही है । 


यहां ये बात उल्लेखनीय होगी कि पश्चिमी देशों में नागरिक संस्कारों को अपनाने की प्रवृत्ति अब एक स्थापित परंपरा सी बन गई है । मुझे दो घटनाओं का ज़िक्र करना जरूरी लग रहा है । फ़्रांस ने अपने नागरिकों को अपने राष्टप्रेम के प्रतीक के रूप में राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करना इतनी अच्छी तरह से समझाया है कि अब किसी भी फ़्रांसीसी नागरिक के अपने निजि सामान, स्थान, कार्यालय , दफ़्तर, यात्रा आदि में न सिर्फ़ राष्ट्र ध्वज की प्रतिकृति रखते हैं बल्कि उसका पूरा आदर और उस पर मान भी रखते हैं । दूसरी घटना कहां की है , नहीं पता किंतु ये है कि , एक शहर में लोगों की ये आदत उनकी सुबह की सैर में शामिल है कि वे अपने साथ एक थैली साथ रखते हैं जिसमें रास्ते में पडने या मिले सभी छोटी बडी कचरा वस्तुओं को उठा कर उसमें रख लेते हैं । इसका परिणाम ये कि शहर की सफ़ाई के लिए प्रशासन के ऊपर निर्भरता को लगभग समाप्त ही कर दिया है । 



ये सच है कि भारत , नागरिक संस्कारों के विकास के दृष्टिकोण से अभी बहुत पीछे है, और तो और ,अभी भी यात्रा में महिलाओं वृद्धों को बैठने का स्थान देना , दुर्घटना में पीडित की सहायता ,सार्वजनिक स्थानों पर मद्यपान व धूम्रपान न करने की आदत , आदि जैसी कितनी ही ऐसी आदतें हैं जो आज से और अभी से यदि आने वाली पीढी को न सिखाई जाए तो विकास की पटरी पर दौडती रेल के आसपास ये कुप्रवृत्तियां पटरी के आसपास अक्सर फ़ैली हुई गंदगी के समान ही लगेंगी । अच्छा होगा कि शैक्षिक संस्कारों के साथ स्कूल व शिक्षक अपने विद्यार्थियों में , समाज अपने सदस्यों में , और अभिभावक अपने बच्चों में नागरिक संस्कारों की छोटी छोटी आदतें मसलन , पंक्ति में धैर्यपूर्वक खडे होना , वृद्धों ,महिलाओं व बच्चों की मदद करना , सतर्क व सावधान रहना , आदि , अभी से ही भावी पीढी में रोपना शुरू कर देना चाहिए ताकि बीस पचास साल बाद देश न सिर्फ़ आर्थिक स्वावलंबन पाकर सुखी हो बल्कि नैतिक रूप से भी स्वस्थ हो । 

रविवार, 19 जनवरी 2014

क्षेत्रीय भाषाई गानों में बढती फ़ूहडता











मुख्यधारा के गीत संगीत से इतर लोकगीतों व क्षेत्रीय गीतों का एक समृद्ध एवं गौरवशाली
इतिहास और परंपरा रही है । वास्तव में कहा तो ये जाता है कि हिंदी गीतों के संसार के बहुत से गानों में सुरों का सौंदर्य और माधुर यानि मिठास लोकगीतों से ही प्रेरित रहा है । यही नहीं इन्हें समृद्ध करने वाले गीतकार ,संगीतकार व गायकों ने मुख्य धारा में जुडने के  बाद भी उस विरासत को जिंदा रखा ।


बदलते समय के साथ हिंदी गीतों व सिनेमाई गीत संगीत में रिमिक्स , रैप और कई अन्य नए चलनों से वहां जिस तरह का हल्कापन और स्तरहीनता बढी है उसी तरह , बल्कि उससे कहीं अधिक फ़ूहडता और भौंडापन , आज लोकगीतों में दिखता है । जितनी फ़ूहडता ऑडियो गानों के बोलों में सुनाई देती है उतनी ही अश्लीलता वीडियो एलबमों के चित्रांकन में भी दिखाई देती है । 

आश्चर्य व दु:ख की बात ये है कि ये प्रवृत्ति भोजपुरी , हरियाणवी , गढवाली , कुमाउंनी , पंजाबी आदि लगभग सभी क्षेत्र के लोकगीतों में भी बढी है । हालांकि ऐसा नहीं है कि क्षेत्रीय भाषाओं व लोकगीतों में सुंदर , व कर्णप्रिय गीत लिखे व गाने नहीं जा रहे किंतु स्तरहीन फ़ूहड एलबमों की अधिकता व रात दिन बसों , ट्रकों ,दुकानों , गांव ,कस्बों में इनकी चिल्ल पौं ने लोकगीतों की विरासत पर गहरा आघात लगाया है । 


इस प्रवृत्ति पर एक प्रसिद्ध लोकगायिका कहती हैं कि थोडे से पैसे लगाकर कुछ भी उल जलूल परोस कर ज्यादा पैसे बनाने का लालच और सस्ते/घटिया गीतों का बढता बाज़ार ही इसकी मुख्य वज़ह है । यदि इस प्रवृत्ति को अभी रोका और हतोत्साहित नहीं किया गया तो भविष्य में आने वाली पीढीयों को लोकगीतों और क्षेत्रीय गानों के नाम पर जो कुछ देखने सुनने को मिलेगा वो संगीत के नाम पर सिर्फ़ एक काला धब्बा होगा । इसलिए ये बहुत जरूरी है कि सुंदर , लोकगीतों को सहेज़ा और परोसा जाए ।

सोमवार, 13 जनवरी 2014

बच्चों के प्रति क्रूर होता एक समाज ......

घर से भागा हुआ बच्चा पवन कुमार



इस बच्चे का नाम है पवन कुमार । ये बच्चा मुझे अपने गृहनगर मधुबनी बिहार से दिल्ली की वापसी रेल यात्रा में , अपने रेल के डब्बे में बैठा मिला । असल में ये बच्चा शायद मुजफ़्फ़रपुर या छपरा स्टेशन में से किसी स्टेशन पर रेल में सवार हो गया था । मेरा ध्यान इस बच्चे पर तब गया जब आसपास बैठे यात्रियों को इस बालक से चुहल करते देखा । कोई इसे जूस के दुकान पर काम करने को तैयार कर रहा था तो कोई इसे जेबकतरा कह के दुत्कार रहा था । आशंका होने पर मैं इसके पास गया और पहले मैंने सहयात्रियों से पूछा कि क्या ये बच्चा किसी के साथ है । इंकार करने पर मैंने इस बच्चे से इसका नाम और पता पूछा ।

बच्चा अचानक ही मुझे यूं पूछते देख झिझक कर डर कर चुप होगा , मगर मेरे बार बार पुचकारने पर बताया कि वो अपनी नानी के घर से भाग कर आया है बच्चे ने ये भी बताया कि वो पहले भी दो बार भाग चुका है । मझे अंदेशा हुआ कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बच्चा अपने हो रहे किसी जुल्म सितम से डर कर भाग खडा हुआ था , मगर प्यार से पूछने पर उसने बताया कि वो नौकरी करने जा रहा है । मुझे उसे बहुत ही सावधानी से समझाना पडा कि अभी वो बहुत छोटा है और उसे कम से कम उस उम्र तक तो इंतज़ार करना ही चाहिए जब तक वो नौकरी के लायक शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व न हो जाए । बच्चा अब घर जाने को तैयार था । मैंने अगले स्टेशन (बलिया) पर उतर कर फ़ौरन ही स्टेशन अधीक्षक के दफ़्तर पहुंच कर सारी बात बताई और इस मासूम को उनके सुपुर्द किया ।

मैं जब ये पोस्ट लिख रहा हूं तो टेलिविजन चैनल पर समाचार आ रहा है कि मुंबई के मीरा रोड पर पुलिस ने एक ११ वर्षीय बच्चे को छुडाया है जिसे जबरन मार पीट और भयंकर शोषित करके घर में बंधक बना कर काम कराया जा रहा था और इस तरह की घटना या खबर अब रोज़मर्रा की बात सी हो गई है । ऐसा लग रहा है मानो इस समाज को बच्चों के प्रति कोई संवेदना , कोई सहानुभूति , कोई चिंता नहीं है । किसी समाजशास्त्री ने ऐसी स्थिति को भांप कर ही कहा था कि जो देश और समाज कल का भविष्य बनने वाले बच्चों के प्रति असहिष्णु और लापरवाह होता है उसे फ़िर बदले में हिंसक और क्रूर नस्लें ही मिलती हैं ।

राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकडों पर नज़र डालें तो स्थिति की भयावहता का अंदाज़ा लग जाता है ।सिर्फ़ पिछले पांच वर्षों में बच्चों के प्रति हिंसा और अपराध की घटनाओं में 21 %  का इज़ाफ़ा हुआ है । इन अपराधों में भी सबसे ज्यादा घटनाएं अपहरण , हत्या और शोषण की हैं । इतना ही नहीं प्रति वर्ष देश भर से गुमशुदा बच्चों की दर में भी लगातार वृद्धि हो रही है और चौंकाने वाली बात ये है कि छोटे शहरों , गांव , कस्बों से बहला फ़ुसला कर , घर से भाग कर , या किसी और कारणों से गायब हुए बच्चों के अलावा महानगरों और बडे शहरों में ये दर कहीं अधिक है । इसका मतलब स्पष्ट है कि पुलिस , प्रशासन व सरकार बच्चों के जीवन व सुरक्षा के प्रति घोर उदासीन व असंवेदनशील रवैया अपनाए हुए है ।

महानगरों में बच्चों को बंधक मजदूरी , भिक्षावृत्ति , तथा अन्य शोषणों से लगातार त्रस्त होना पड रहा है और सरकार तथा कुछ स्व्यं सेवी संस्थाओं के लगातार प्रयासों के बावजूद भी \स्थिति निरंतर बिगडती ही जा रही है । पिछले दिनों तो गरीब बच्चों का अपहरण करके उनकी हत्या के बाद मानव अंगों के व्यापार हेतु उनका प्रयोग किए जाने जैसी अमानवीय और घिनौनी घटनाएं भी सामने आई हैं । आश्चर्य व दुख इस बात का है सरकार ने अब तक इन नौनिहाल मासूमों की सुरक्षा व संरक्षण हेतु कोई ठोस नीति या योजना न तो बनाई है और न ही कोई प्रयास किया है । महज़ आंकडों की बाजीगरी और कागज़ी कोशिशों के सहारे ही प्रशासन अपने प्रयास गिनाने में लगा रहता है ।

यदि यही स्थिति रहती है तो फ़िर निश्चित रूप से समाज को इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि भविष्य में हालात और भी नारकीय हो जाएंगे । सरकार को समाज और स्व्यं सेवी संस्थाओं , समूहों , सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर इस दिशा में एक दूरगामी रोडमैप बना कर आपसी तालमेल के साथ वृहत योजना बनानी चाहिए । संचार क्रांति के इस युग में कम से कम गुमशुदा बच्चों की तलाश तो पूरी संज़ीदगी से की ही जानी चाहिए , ताकि समय रहते ऐसे भूले भटके बच्चों को उनके घर तक पहुंचाया जा सके ।


मंगलवार, 12 नवंबर 2013

मुर्गे ढोते स्कूली वैन .......



ज्यादा फ़र्क नहीं है ,खुद ही देखिए , हालत इस तस्वीर से ज्यादा भयानक है





अभी कुछ वर्षों पूर्व उत्तर पूर्वी दिल्ली में एक हादसे , जिसमें दो स्कूली बस आपस में आगे निकलने की होड में
दुर्घटनाग्रस्त हो गई थीं जिसमें बहुत से मासूम बच्चों को अपनी जान से हाथ धोना पडा था । हालांकि स्कूली वाहनों से जुडा हुआ ये कोई पहला हादसा नहीं था मगर ये इतना बडा हादसा जरूर था ,जिसने सरकार व प्रशासन को इस बात के लिए मजबूर किया कि वे स्कूली वाहनों के लिए जरूरी दिशा निर्देश जारी किए जाएं । प्रशासन ने स्कूली वाहनों के लिए बहुत से नियम कायदे बनाए जिन्हें कुछ दिनों तक लागू होते हुए सबने देखा भी । जैसे सभी स्कूली वाहनों पर पीले रंग की पट्टी और उसमें स्कूल वैन लिखा होना , ऐसे प्रत्येक वैन/बस में स्कूल की तरफ़ से शिक्षक/सहायक की अनिवार्य रूप से उपस्थिति , और सबसे जरूरी ऐसे स्कूली वाहनों में प्रशिक्षित चालकों का होना आदि ।


जैसा कि अक्सर और लगभग हर नागरिक कानून के साथ होता रहा है , कुछ दिनों के बाद इनमें न सिर्फ़ शिथिलता आई बल्कि धीरे धीरे स्थिति ऐसी बन गई कि पहले चोरी छुपे और अब तो खुले आम इन नियम कायदों की धज्जियां उडाई जा रही हैं । इसका दुष्परिणाम इससे अधिक भयंकर और क्या हो सकता है कि लगातार इन स्कूली वाहनों का दुर्घटनाग्रस्त होने के अलावा इन वैन और बस चालकों द्वारा छोटे स्कूली बच्चों का शारीरिक शोषण तक किए जाने की घटनाएं रोज़मर्रा की बात हो गई हैं । ऐसा नहीं है कि सरकार ,प्रशासन व पुलिस की तरफ़ से इससे निपटने के लिए कुछ नहीं किया गया है । बहुत बार पुलिस ने बाकायदा अभियान चलाकर इन तमाम स्कूली वाहनों के खिलाफ़ सख्ती दिखाई है । मगर ऐसा करते ही ये तमाम स्कूली वैन/बस वाले हडताल पर चले जाते हैं और अभिभावक से लेकर स्कूली प्रशासन को मौका मिल जाता है अपनी इन गलतियों को मजबूरी का जामा पहनाने का ।


शहरों में बढती आबादी और उसी अनुपात में बढते स्कूलों के कारण ये स्वाभाविक है कि स्कूली वाहनों की कमी जरूर महसूस की जाती है किंतु आज अभिभावकों से बच्चों के स्कूल आने जाने का भारी भरकम किराया राशि वसूलने वाले स्कूल प्रशासनों का ये रोना कृत्रिम सा लगता है । स्कूली बसों तक तो स्थिति फ़िर भी ठीक ही कही जा सकती है , मगर छोटे छोटे स्कूल वैन/ व स्कूली रिक्शे तक  में बच्चों को जिस तरह से ठूंस ठूस कर ढोया और लादा जा रहा है उसे देखकर हठा्त ही उस छोटे से पिंजरेनुमा रिक्शे की याद आ जाती है जिसमें मुर्गों को किसी मीट की दुकान पर ले जाया जा रहा होता है








अब ये स्थिति अधिक चिंताजनक इसलिए भी होती जा रही है क्योंकि शहरों विशेषकर राजधानी की सडकों पर बेतहाशा बढते वाहनों ने , यातायात के दबाव को और अधिक बढा दिया है । छोटे छोटे बच्चों द्वारा तेज़ रफ़्तार से चलाते स्कूटियों/स्कूटरों/बाइक आदि ने  इसे और भी अधिक नारकीय बना दिया है । ऐसे में बच्चों को स्कूल पहुंचाते व वापस लाते वाहनों के की पूरी कमान भी कमोबेश ऐसे ही लापरवाह कम उम्र और अनुभव वाले , जिनमें से अधिकांश के पास चालक लाइसेंस तक नहीं मौजूद होता है , देश के भविष्य को जानबूझ कर मौत के मुंह में ढकेलने जैसा है ।


ये इतना आसान नहीं होगा और न ही यकायक ठीक होने वाली समस्या है बल्कि इसके लिए योजनाबद्ध तरीके से प्रशासन , पुलिस , अभिभावकों व स्कूल प्रशासन को मिल कर कई मोर्चों पर काम करना होगा । सबसे पहले अभिभावकों को   स्कूल प्रशासन पर इस बात का दबाव बनाना चाहिए कि वे बच्चों के लाने जाने अपने अपने स्कूली वाहनों के चालकों , वाहनों की स्थिति , समय , रास्ते आदि की व्यवस्था को सर्वोच्च वरीयता सूची में रखें । वाहन चालक का लाइसेंस , उसका अनुभव व उसकी पृष्ठभूमि आदि की अच्छी तरह से पडताल किया/कराया जाना अनिवार्य किया जाना चाहिए । पुलिस को इसमें स्कूल प्रशासनों का सहयोग करना चाहिए तथा निर्धारित नियम कानूनों के पालन को सुनिश्चित करना चाहिए ।


इन सबसे अहम बात ये कि एक आम नागरिक के रूप में हमें और आपको जब भी कहीं भी कभी भी कोई स्कूल वैन ऐसी स्थिति में दिखे कि लगे कि इसके बारें में स्कूल प्रशासन और पुलिस को सूचित करना जरूरी है तो बिना देर किए ऐसा किया जाना चाहिए । हमें हर हाल में ये याद रखना चाहिए कि , इन सडकों पर दौडते , इन सैकडों वैन में , हमारे आपके ही घर आंगन में खेलते वो नन्हें भविष्य हैं जिन्हें हर हाल में इस देश के कल के लिए बचाया जाना चाहिए , कम से कम ऐसी लापरवाहियों से उन्हें खोते रहने का गुनाह अब पूरी तरह से बंद किया जाना चाहिए ।


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अगला मुद्दा : टूटती सामाजिक मान्यताएं और किशोर
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