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रविवार, 30 मई 2010

भारतीय रेल : सुरक्षा और स्वच्छता से दूर




अभी हाल ही में हुई रेल दुर्घटना , और इससे पहले दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मची भगदड की दुर्घटना ,ने एक बार फ़िर से भारतीय रेलों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार , रेल प्रशासन और संबंधित लोगों की सोच और प्रतिबद्धता को कटघरे में खडा कर दिया है । भारतीय रेलवे न सिर्फ़ रेलों के परिचालन , बल्कि अपनी बहुत बडी नियोजकों की संख्या के कारण न सिर्फ़ एशिया में बल्कि विश्व में भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है ।भारत में अंग्रेजी शासन के देनों में यदि ये कहा जाए कि भारतीय रेल उनके द्वारा दी गई सबसे बहुमूल्य प्रणाली थी तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी शायद ।इस बात का अंदाज़ा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि स्वंत्रता से पहले भारत में अंग्रेजों द्वारा ,बिछाई गई ,रेल पटरियों की कुल लंबाई का सिर्फ़ दो प्रतिशत स्वंत्रता के बाद भारत की सरकारों द्वारा बिछाई गई । न सिर्फ़ सवारी गाडियों बल्कि वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए ढुलाई वाली मालगाडियों के परिचालन का विचार भी उन्हीं की देन थी । रेल परिचालन की ताकत को पहचानते हुए आजादी की लडाई लड रहे रणबांकुरे कहते थे कि जो काम बम और बारूद न कर सके जो काम समाचार और अखबार न कर सके वो काम रेल ने कर दिया



आज भारतीय रेलों के परिचालन को दशकों बीत चुके हैं । भार और व्यवसाय के दृष्टिकोण से आज भारतीय रेल बहुत लंबा सफ़र तय कर चुकी है । ऐसा भी नहीं है कि आधी शताब्दी से ज्यादा उम्र की हो चुकी भारतीय रेलवे , आधुनिक चुनौतियों , नई समस्याओं , और अन्य समकालीन सुविधाओं से लैस होने में बिल्कुल ही कोताही बरत चुकी है । एक साथ बहुत सी परियोजनाओं पर काम चल रहा है । राजधानी , शताब्दी के बाद दुरंतो और भविष्य में बुलेट ट्रेनों के संचालन जैसी महात्वाकांक्षी योजनाओं पर भी काम चल रहा है । भारत में जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि होते जाने के कारण स्वाभाविक रूप से सबसे बडे यातायात साधन के रूप में यात्रियों का भारी दबाव भी कमोबेश भारतीय रेलवे झेलता ही जा रहा है । अब तो कई राज्यों , दुर्गम पहाडियों आदि में भी नई पटरियों को बिछाने का काम जोर शोर से चल रहा है । कुच वर्षों पहले सफ़लता पूर्वक शुरू की गई कोंकण रेलवे परियोजना एक ऐसी ही सफ़लता थी भारतीय रेल के लिए । बरसों पुराने चले रही व्यवस्थाओं , नीरस हो चुके रेल टिकटों , स्टेशनों और प्लेटफ़ार्मों के रंग रूप में समय समय पर बदलाव करने का प्रयास किया जाता रहा है । इसके अलावा पिछले एक दशकों में भारतीय रेलवे ने मुनाफ़े में सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा अर्जित सफ़लता में अपना नाम भी दर्ज़ कराया । लेकिन ऐसा नहीं है कि भारतीय रेलवे का सिर्फ़ यही उजला उजला पक्ष है ।

भारतीय रेल संचालन व्यवस्था को विश्व की कुछ असुरक्षित यातायात व्यवस्थाओं में भी स्थान मिला हुआ है । आंकडे ही बता देते हैं कि छोटी छोटी घटनाओं , लापरवाही से लेकर बहुत ही बडी दुर्घटनाओं से रूबरू होता भारतीय रेलवे इतने समय बाद भी श्रोताओं का विश्वास नहीं जीत सका है । एक सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय रेल में सफ़र करने वाले यात्रियों में से ७९ प्रतिशत ने बेझिझक माना कि उन्हें रेल यात्रा में सफ़र करना कष्टदायी और असुरक्षित लगता है । यदि दुर्घटनाओं का आकलन किया जाए तो एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में पिछले कुछ दशकों में भी रेल दुर्घटनाओं में से ३७ प्रतिशत जहां मानवीय भूलों के कारण हुई है तो १९ प्रतिशत दुर्घटनाएं आतंकी घटनाओं के कारण जबकि २२ प्रतिशत मौसम के कारण और बांकी की अन्य कारण जैसे , रेलवे क्रासिंग पर फ़ाटकों का न होना , रेलों की छतों पर सफ़र करना और ऐसे ही कारणों से होती हैं । वैश्विक आतंकवाद पर अध्ययन और विश्लेषण करने वाली संस्था की मानें तो भारत भी उन देशों में शामिल है जहां के यातायात व्यवस्था , हमेशा ही अलगाववादियों , आतंकवादियों , और आंदोलनकारियों के निशाने पर रहती है । ताजातरीन रेल दुर्घटना भी माओवादियों की करतूत का ही परिणाम मानी जा रही है ।

सबसे अहम बात ये है कि भारतीय रेल प्रशासन कभी भी सुरक्षा और सफ़ाई व्यवस्था के प्रति गंभीर नहीं दिखा । हालात का अंदाज़ा इसी बात से हो जाता है कि पिछले कुछ समय से मुनाफ़े में चल रही भारतीय रेल अभी तक अपनी सभी क्रासिंग्स पर फ़ाटकों की व्यवस्थ नहीं कर पाई है , जो प्रति वर्ष होने वाली रेल दुर्घटनाओं का सबब बनते हैं । आज भी सर्दी और धुंध /कोहरे वाले मौसम में रेलों की परिचालन व्यवस्था बिल्कुल चरमरा सी जाती है और बहुत सी दुर्घटनाओं का कारण बनती हैं । बेशक आज रफ़्तार की बात में भारतीय रेल बहुत सी अन्य समकालीन रेल परिचालनों के समकक्ष बन गई है मगर अब भी सुरक्षा की दृष्टि से उनसे कोसों दूर है । अत्याधुनिक संचार प्रणालियां , सुरक्षा उपकरणों , नए संयंत्रों से अभी भी भारतीय रेलों को लैस नहीं किया जा सका है । और हास्यास्पद रूप से यहां के रेल मंत्री कभी रेलों में कुल्हड योजना चला कर तो कभी गरीब रथ चला कर और कभी दुरंतो रेल चला कर अपनी और भारतीय रेलों की सफ़लता का ढिंढोरा पीटते रहे हैं ।

एक आम आदमी की नज़र से देखा जाए तो टिकट लेने से , रेल गाडी में सवार होने तक , सफ़र की शुरूआत से लेकर सफ़र की समाप्ति तक पूरी रेल यात्रा एक कटु अनुभव ही रहता है उसके लिए । बहुत सारी वैकल्पिक व्यवस्थाओं के होने के बावजूद रेल प्रशासन आज तक ये नहीं सुनिश्चित कर पाया है कि रेल यात्री अपने आपको सुरक्षित महसूस कर सकें । बेशक बढती रेल दुर्घटनाओं और उनमें मरने वालों निर्दोष यात्रियों की बढती संख्या को देखते हुए कुछ वर्षों पहले रेल यात्रियों का बीमा करवाए जाने की योजना शुरू की गई थी , किंतु दुर्घटना के बाद जिस तरह से प्रशासन किसी भी जवाबदेही से पल्ला झाड लेता है उसीसे से उसकी नीयत का पता चल जाता है । हाल ही दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मची भगदड पर बोलते हुए वर्तमान रेल मंत्री के बयान ने भी ऐसी ही बानगी पेश की थी । सुरक्षा के साथ साथ सफ़ाई और खान पान व्यवस्था का भी यही है । हालांकि कई रेल जोनों में सफ़ाई की व्यवस्था को निजि हाथों में सौंपे जाने के बाद स्थिति में कुछ सुधार अवश्य हुआ है मगर कुल मिला कर स्थिति अभी भी नारकीय ही है । ऐसा ही हाल रेलवे की खान पान व्यवस्था का भी है ।

भारतीय रेल मंत्रालय , रेल मंत्री , रेल प्रशासन , बेशक हर साल कोई न कोई लोक लुभावन योजना बना कर , कभी किराए में रियायत देकर , तो कभी कोई विशेष ट्रेन चला कर आम जनमानस को थोडी देर के लिए भटका दे । मगर जब समय समय पर इस तरह के हादसों में आम लोग अपने परिजनों को खोते हैं तो उनके मन में सिर्फ़ एक ही सवाल टीस मारता है ..........आखिर कब तक ??????????

सोमवार, 17 मई 2010

खेल बनाम आम जनता : राष्ट्रमंडल खेलों के बहाने कुछ सवाल


राजधानी दिल्ली में आगामी महीनों में होने जा रहे राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन और व्यवस्था के लिए राज्य सरकार को जब अपेक्षित धनराशि नहीं मुहैय्या कराई जा सकी , ( यहां एक बात गौरतलब है कि ये कि ये राज्य सरकार के लिए एक सुखद संयोग है कि अभी केंद्र में भी उसी दल की सरकार है जिसकी राज्य सरकार में अन्यथा खींचतान ज्यादा भी हो सकती थी ), तभी ऐसा लगने लगा था कि राज्य सरकार इसके लिए विकल्पों की तलाश करेगी । सरकार ने बहुत से प्रत्यक्ष परोक्ष फ़ैसले लिए । इनमें आनन फ़ानन में गैसे पैट्रो पदार्थों के दामों मे वृद्धि के अलावा और भी बहुत कुछ सिर्फ़ इस वजह से किया गया ताकि राष्ट्रमंडल खेलों के लिए धन जुटाया जा सके । अब जबकि सूचना के अधिकार के तहत राज्य सरकार से जुटाई गई जानकारी के आधार पर हुए खुलासे के आधार पर ये रिपोर्ट आने पर कि गरीबों के कल्याण के लिए प्रस्तावित कल्याणकारी योजनाओं के निहित धन को सरकार ने इन खेलों के आयोजन में लगा दिया तो सरकार की मंशा और खेलों के साथ आम जनता के सरोकार पर प्रश्न चिन्ह उठ गए हैं ।


किसी भी देश के लिए , कोई भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के किसी भी आयोजन का मेजबान बनना कई मायनों में महत्वपूर्ण और बहुत हद तक आर्थिक रूप से फ़ायदेमंद भी साबित होता है । न सिर्फ़ देश की प्रशासन व्यवस्था , में देश वासियों में , भारत में 1982 , वो वर्ष था जब एशियाड खेलों के रूप में भारत में पहली बार किसी बडे अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था । इस खेल प्रतियोगिता की सफ़लता ने विश्व परिदृश्य में न सिर्फ़ भारत के बढते आत्मविश्चास और विकास को कायम किया बल्कि ,भारत में रंगीन टेलिविजन , राजधानी में व्यापार संवर्धन पार्कों और अप्पू घर सरीखी स्मृतियों को सहेज लिया । एक और बडी उपलब्धि ये रही कि एक दम अप्रत्याशित रूप से भारत का स्थान उस बार पदक तालिका में दूसरा रहा । इन सबसे कुछ बातें तो स्पष्ट हो जाती हैं ।

कोई भी अंतरराष्ट्रीय आयोजन देश की प्रतिष्ठा में वृद्धि करता है । यदि ये कोई खेल आयोजन होता है तो देश के खेल जगत और खिलाडियों को भी इसका सकारात्मक फ़ायदा मिलता है जो उनके सुधरे हुए प्रदर्शन में साफ़ प्रमाणित हो जाता है । यदि आयोजन सफ़ल रहता है तो ये भविष्य में ऐसे सभी आयोजनों के लिए रास्ते खोल देता है ।

किंतु इसके साथ ही इस मुद्दे पर कुछ अन्य बहुत से महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान देना भी जरूरी हो जाता है । जिस देश में अब भी सरकार , बुनियादी समस्याओं से जूझ रही हो , अपराध , आतंकवाद , भ्रष्टाचार, और अंदरूनी कलह जैसी जाने कितनी ही मुसीबतें सामने मुंह बाए खडी हों , जिस देश को अभी अपने विकास के लिए जाने कितने ही मोर्चों पर संघर्ष करना बांकी हो , जिस देश को आज अपना धन और संसाधन खेल, मनोरंजन जैसे कार्यों से अधिक ज्यादा जरूरी कार्यों पर खर्च करने की जरूरत हो , सबसे बढकर जिस देश को ऐसे खेल आयोजनो की मेजबानी हासिल करने के बाद , उनकी तैयारी के लिए इस तरह के अपराध ( जी हां सरकार के इस कृत्य को निश्चित रूप से एक सामाजिक और आर्थिक अपराध ही माना जाएगा ) करने की मजबूरी सामने आ जाती हो ,क्या उसके लिए जरूरी है कि विश्च में सिर्फ़ अपनी साख बढाने के लिए वो ऐसे आयोजनों की जिम्मेदारी उठाने को उत्कट हो ।

अभी तो सिर्फ़ कुछ सूचनाओं के मिलने भर से इस बात का खुलासा हुआ है , जाने ऐसी कितनी ही तिकडम सरकार और प्रशासन ने अपने बजट को पूरा करने के लिए लगाई होंगी जिनका खुलासा होना बांकी है । अब यदि खेल और खिलाडियों के दृष्टिकोण से भी देखा जाए तो भी ऐसे आयोजन का सीधा सीधा असर किसी खिलाडी के पूरे खेल जीवन पर पडता है । हां इतना जरूर है कि घरेलू मैदान और घरेलू दर्शकों का फ़ायदा मेजबान खिलाडियों को जरूर मिल जाता है । लेकिन इन सबके बावजूद भारत में यदि क्रिकेट के अलावा किसी भी खेल के खिलाडियों से खेल को अपने कैरियर के रूप में चुनने के प्रति और देश में खेलों के प्रति आम लोगों के बदलते हुए नज़रिए की दृष्टिकोण से देखने की बात है तो स्थिति पूर्णतया निराशाजनक है ।

इसके कारण भी वाजिब हैं , आज भी गाहे बेगाहे इस तरह की खबरें सुनने को मिलती रहती हैं कि किसी खेल में देश का प्रतिनिधित्व करने वाले अमुक खिलाडी के साथ बुरा सलूक किया गया या वो प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार होकर किसी तरह कोई छोटा मोटा काम करके जीवन यापन करने पर मजबूर है । अभी कुछ माह पहले देश की उडन परी के खिताब से नवाजी गई धाविका पी टी ऊषा के साथ खेल अधिकारियों द्वारा किया गया बर्ताव सबको भूला नहीं होगा ।
यहां एक अहम मुद्दा ये भी है कि आखिर एक आम आदमी को ऐसे अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों से क्या सरोकार हो सकता है , वो भी ऐसे में जबकि उसे रोज आटे दाल के बढते हुए भावों को सिर्फ़ इसलिए जूझना पड रह है क्योंकि उसकी भरपाई किसी खेल आयोजन के लिए की जा रही है ।


सरकार और उसके कर्ताधर्ता तो इतने कृतघ्न हो चुके हैं कि ऐसे प्रकरणों के खुलने के बावजूद भी सरकार और उसके नुमाईंदों की तरफ़ से कोई स्पष्टीकरण तक नहीं दिया गया है । इसका मतलब साफ़ है कि सरकार भी ये सब सोची समझी साजिश के तहत ही कर रही है । एक और पहलू ये भी है कि एक तरफ़ जब दिल्ली में आतंकी घटनाओं की वारदातें , अपराधियों की बढता मनोबल , जैसी प्रवृत्ति भी सामने है , इनके अलावा जगह जगह पर फ़ैली हुई गंदगी ,ट्रैफ़िक के बिगडते हालात , जैसी बहुत सी बातें हैं जिनपर गौर करने की बहुत ही जरूरत है । अभी इन खेलों के आयोजन में बहुत ज्यादा समय नहीं रह गया है देखना है कि तब तक इन खेलों के पीछे चल रहे और कितने खेलों पर से पर्दा उठता है ॥

रविवार, 16 मई 2010

दिल्ली का प्लेटफ़ार्म ......मरते बिहारी ....और काहिल रेल मंत्री....



( ये चित्र तथा नीचे के दोनों चित्र मेरी पिछली बिहार यात्रा के हैं जो मैंने खुद अपने मोबाईल से खींचे थे और उस दिन भी कुछ वैसा ही हुआ था जैसा कि आज हुआ है )


दिल्ली से बिहार की रेल यात्रा करने का अनुभव , सिर्फ़ वो ही जान सकता है जिसने ये यात्रा की हो । लगभग तीन महीने पहले से ही सभी रेलों में आरक्षित सीटों की अनुपलब्धता , इसके बाद दलालों द्वारा चमत्कारिक रूप से उस अनुप्लबध्ता के बावजूद भारी दाम चुका कर टिकटों को खरीदना , फ़िर जाने क्या क्या सामान भर के यात्रा की शुरूआत की तैयारी करना , फ़िर प्लेटफ़ार्म पर पहुंच कर किसी जंग लडने की लडने जैसे अनुभव से गुजरते हुए रेल में बैठना, इसके बाद तमाम असुविधाओं और मुसीबतों को झेलते हुए गंतव्य तक पहुंचना । हाल ऐसा है कि हर रेल यात्रा अपने आप में एक त्रासदी बज जाती है उस यात्री और उसके परिवार के लिए । और कभी कभी तो ये यात्रा शुरू होने से पहले ही त्रासदी का रूप ले लेती है जैसे कि आज नई दिल्ली स्टेशन पर हुआ । यदि लोगों को याद होगा तो अभी कुछ वर्ष पहले भी ऐसी ही एक दुर्घटना में प्लेटफ़ार्म पर मची भगदड में बहुत से लोगों ने अपनी जान गंवाई थी और बहुत से लोग घायल हुए थे । सबसे बडा दुखद आश्चर्य ये रहा कि , ये घटना भी राजधानी दिल्ली के प्लेटफ़ार्म पर ही घटी थी , और जो ट्रेनें उस समय जाने वाली थीं वो बिहार के लिए चलने वाल्री ट्रेनें थीं और जाहिर है कि उसमें बैठ कर यात्रा करने के लिए पहुंचे यात्री जो इस दुर्घटना का शिकार हुए वे सब के सब बिहार के ही थी । क्या ये महज इत्तेफ़ाक है । इस बात को परखने के लिए कुछ तथ्यों पर गौर करना समीचीन होगा ।



राजधानी
में दूसरे राज्यों से पलायन करके रोजगार शिक्षा की तलाश में पहुंचने वालों में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों की संख्या यदि सबसे ज्यादा नहीं तो उससे थोडा ही कम होगी । आज भी मकर संक्राति, होली , सरस्वती पूजा , दुर्गा पूजा , छठ आदि सालान त्यौहारों के अलावा विवाह , मुंडन , उपनयन , श्राद्ध , बरसी आदि जैसी परंपराओं और संस्कारों के निर्वहन के लिए सभी अपने मूल निवास में ही जाने को वरीयता देते हैं । जाहिर है कि इसका फ़ल ये निकलता है कि सभी साल में एक दो या इससे अधिक बार ग्राम यात्रा जरूर करते हैं । न सिर्फ़ यात्रा करते हैं बल्कि अपने साथ बहुत सारा सामान भी ले कर आते जाते हैं । उदाहरण के लिए यहां से कपडे लत्ते , साबुन तेल , बक्से अटैची , छाते जूते के अलावा पंखे , कुर्सियां , आदि भी लद लदा के ले जाई जाती हैं , जबकि वापसी में धान ,चावल , अब आम के मौसम में आम की बोरियां लाद कर ले आते हैं , वो भी बडे ही आदतन रूप से । भारतीय रेल की बात करें तो ऐसा नहीं है कि भारतीय रेल ने बढती भीड को और यात्रियों की बढती संख्या को देखते हुए कुछ भी नहीं किया । पिछले एक दशक में प्रत्येक वर्ष कुछ नई रेल बिहार के लिए चलाई जाती रही हैं । एक संयोग के अनुसार से पिछले काफ़ी समय में रेल मंत्रालय बिहार के ही किसी सांसद के पास रहने के कारण इसका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ तो इतन हुआ ही है ।


यदि
आज की दुर्घटना की और ऐसी सभी दुर्घटनाओं की बात करें तो कुछ महत्वपूर्ण सवाल एक आम नागरिक के रूप में , दिल्ली में रहने वाले बिहार के उस निवासी के रूप में भी जो हर साल इन परिस्थितियों से गुजरता है । क्या हर साल गर्मियों की छुट्टियों में , और विशेष मौकों पर सिर्फ़ कुछ विशेष रेलगाडियों को चला कर इतिश्री कर लेने भर से रेल प्रशासन की जिम्मेदारियां खत्म हो जाती हैं । आखिरकार अभी तक बिहार उत्तर प्रदेश के लिए अलग से रेल टर्मिनल बनाने की प्रस्तावित योजना को मूर्त रूप नहीं दिया जा सका है । क्या अब समय नहीं आ गया है जब खुद यात्री ये सोचें कि इन जैसे आत्मघाती सफ़र पर निकलने के वैकल्पिक उपाय क्या हैं । क्या जरूरी है कि एक प्लेटफ़ार्म को यात्री से ज्यादा उन्हें रेल में चढाने वालों से भर दिया जाए । क्या जरूरी नहीं है कि अब एक व्यक्ति सिर्फ़ चालीस किलो सामान वाले नियम का सख्ती से पालन किया जाए ? क्या ये सोचने के जरूरत नहीं है कि आखिर हर बार ऐसा बिहार जाने वाली रेलों और उनके यात्रियों के साथ ही क्यों होता है । ऐन मौकों पर रेलों के चलने का प्लेटफ़ार्म संबंधी सूचनाएं देने वाले उन गैरजिम्मेदार रेल अधिकारियों को कभी क्यों दंडित नहीं किया जाता । मगर जब रेल मंत्री खुद ही इस तरह के बयान दें तो फ़िर ऐसी उम्मीद करना भी बेमानी ही होगी ।

भाड
में गया रेल मंत्रालय और भाड में गए उसके मंत्री संतरी , आज जरूरत इस बात को समझने की है कि बिहार जाने वाले वो लाखों यात्री इस बात को समझ लें कि जब तक वे खुद इन हालातों के लिए खुद को नहीं तैयार करेंगे , अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे , खुद में बदलाव नहीं लाएंगे ..ऐसी घटनाएं , दुर्घटनाएं बार बार होती रहेंगी ..और इससे कोई फ़र्क नहीं पडता कि रेल मंत्री .बिहार का है या बंगाल का ...क्योंकि मरने वालों में उनका कोई नहीं होता ।

शुक्रवार, 14 मई 2010

फ़ांसी की सज़ा : कुछ उठते सवाल


पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल कसाब को हाल ही में दी गई फ़ांसी की सजा के बाद स्वाभाविक रूप से फ़ांसी की सज़ा को लेकर एक बार फ़िर से एक बहस उठ खडी हुई है । ये एक संयोग ही है कि अजमल को फ़ांसी की सजा सुनाए जाने के एक सप्ताह के अंदर ही निठारी कांड के आरोपी सुरेंद्र कोली को भी फ़ांसी की सजा सुनाई गई । इससे पहले एक बच्ची का बलात्कार और हत्या कर देने वाले धनंजय चटर्जी को मिली फ़ांसी की सजा के समय भी इस मुद्दे पर एक राष्ट्रव्यापी बहस शुरू हो गई थी । उस समय भी इस सजा को लेकर बहुत सारे बिंदुओं पर बहस तेज़ हुई थी । इनमें पहला तो था "कैपिटल पनिश्मेंट "यानि मौत की सजा के औचित्य पर ही । आज इस बदलते हुए समय में बहुत से देशों ने फ़ांसी की सजा का प्रावधान अपने यहां से हटा दिया है जिसका कारण ये दिया गया है कि अब आज के समय में किसी को किसी इंसान के जीवन को छीनने का अधिकार नहीं है । इस बहस में तत्कालीन राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम ने ये कह कर कि ," या तो फ़ांसी की सजा को पूर्णतया समाप्त कर देना चाहिए नहीं तो फ़िर ये सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इसमें सिर्फ़ गरीबों की गर्दन ही न फ़ंसे ।" कलाम के इस कथन के बाद एक बहुत बडी बहस उठ खडी हुई थी , मगर इन सबके बावजूद धनंजय चटर्जी को फ़ांसी देकर मौत की सजा दी गई ।


एक बार फ़िर से कसाब और कोली को फ़ांसी की सजा सुनाए जाने के बाद से ये मुद्दा फ़िर से गरमा गया है । मगर इस बार इस बहस का मुख्य बिंदु है इस सजा का अमलीकरण । दरअसल पिछले दिनों समाज में ऐसे ऐसे घृणित अपराध किए गए हैं जिसके लिए फ़ांसी से कमतर कोई भी सजा भारतीय कानून में नहीं है तो स्वाभाविक था कि फ़ांसी की सजा में वृद्धि हुई है । एक आंकडे के अनुसार देश में आज लगभग सत्तर अपराधी फ़ांसी की सज़ा पाकर अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं । मगर किसी न किसी वजह से इनके सजा को अमल में लाए जाने में देरी हो रही है । ये बात तब भी उठी थी जब धनंजय चटर्जी को अपने अंज़ाम तक पहुंचने में पूरे चौदह वर्ष लग गए थे । भारतीय कानूनी प्रक्रिया इतनी लंबी है कि ऐसे अपराधों और उनकी अंतिम फ़ैसला आने में आम फ़ैसलों से ज्यादा समय लगना वाजिब ही है । पहले निचली अदालत द्वारा सजा का सुनाया जाना , इसके बाद उस पर उच्च न्यायालय की सहमति का आवश्यक होना , इसके बाद अपील के रूप में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस सजा की पुष्टि करना । यदि न्यायालीय प्रक्रिया के सभी चरणों पर भी मुजरिम की सजा फ़ांसी ही रहती है तो इसके बाद राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर करने का विकल्प । इन सबमें सबसे बडी कमी जो अखरती है वो है कि इन सबके लिए कोई भी समय सीमा तय नहीं है । यही कारण है कि संसद पर आक्रमण का आरोपी ,अफ़जल गुरू सर्वोच्च न्यायालय से फ़ांसी की सजा पाने के बाद राष्ट्रपति के पास दया याचिका लगा कर निश्चिंत बैठा है । उधर बयान ये आ रहा है कि राष्ट्रपति के पास ऐसी कोई याचिका लंबित नहीं है जबकि सरकार कहती है कि अभी राष्ट्रपति की तरफ़ से कोई फ़ैसला नहीं आया है ।


इस बार तो इससे अलग एक और दिलचस्प बात सामने आई है , वो ये कि , यदि आज ही सभी लंबित मामलों का निपटारा हो भी जाए तो भी उन्हें फ़ांसी पर नहीं लटकाया जा सकता है , कारण है कि आज देश में जल्लाद के पद पर कोई भी व्यक्ति उपलब्ध नहीं है । धनंजय चटर्जी को फ़ांसी पर लटकाने वाले जल्लाद जो अब कहीं अनाम जिंदगी जी रहे हैं , उन्होंने इस पेशे को छोडते हुए यही कहा था कि पिछली पैंतालीस फ़ांसियों में उन्होंने आजतक किसी चर्बीदार गर्दन को फ़ांसी पर नहीं लटकाया , और इसका उन्हें अफ़सोस है । उनका ईशारा स्पष्ट था , जो कि राष्ट्रपति कलाम भी व्यक्त कर चुके थे ,पहले ही । हालांकि ये कोई बहुत बडा मुद्दा नहीं है जिसे हल न किया जा सके । सबसे अहम मसला ये है कि आखिर वो क्या वजह है कि सरकार को फ़ांसी की सजा पाए इतने सारे मुजरिमों को इतने दिनों तक संभाले रखना पड रहा है । एक और बहुत बडा मुद्दा ये भी है कि आखिर क्यों कभी भी कोई बडा भ्रष्टाचारी , राजनीतिज्ञ , देशद्रोही, धनवान आज तक फ़ांसी के फ़ंदे तक नहीं पहुंचा । तो क्या इसे इस तरह देखा जाए कि न्याय व्यवस्था में भी कहीं न कहीं कोई चूक तो हो ही जाती है ।



सबसे आखिर में एक ये प्रश्न कि क्या फ़ांसी की सजा उचित है ? क्या किसी को भी इश्वर प्रदत्त जीवन को छीनने का अधिकार है सच में ? आज जबकि बहुत से सभ्य देश इस सजा को अमानवीय कहते हुए इसे अपने यहां प्रतिबंधित कर दिया है तो क्या भारत को भी अपने यहां से इस सजा को हटा देना चाहिए ? वैसे भी जब इस सजा को सुना भर देने का ही प्रचलन सा बना हुआ है तो फ़िर क्यों नहीं उसे सिरे से हटा देना ही श्रेयस्कर है । मगर यदि इस सजा को हटा दिया जाएगा तो फ़िर निठारी के नर पिशाचों को , देश पर आक्रमण करके सैकडों मासूमों का कत्ल कर देने वालों को, मासूम अबोध बच्चियों को अपनी हवस का निशाना बना कर कत्ल कर देने वाले हज़ारों हैवान बन चुके इंसानों के लिए फ़िर आखिर वो कौन सी सजा हो जो उन्हें दी जा सके । जब मौत की सजा का प्रावधान होते हुए भी इन अपराधियों को कानून का लेशमात्र भी भय नहीं रहा है तो फ़िर इसके हट जाने से हालात क्या होंगे । ऐसे ही बहुत से प्रश्न हैं जिनका उत्तर , सरकार, प्रशासन , न्याय व्यवस्था और खुद समाज को भी ढूंढना है ।

बुधवार, 12 मई 2010

असंवेदनशील और गैर जिम्मेदार होते विद्यालय प्रशासन





मसूरी टूर पर गए बालाक शिवम की मौत ने एक बार फ़िर से विद्यालय प्रशासन और व्यवस्था द्वारा बच्चों के प्रति बरती जा रही अंसवेदनशीलता और दिन प्रतिदिन होते गैर जिम्मेदार रवैये को एक बार फ़िर से सामने लाकर खडा कर दिया है । ये कोई पहली घटना नहीं है जब विद्यालय प्रशासन की लापरवाही का शिकार होकर किसी मासूम ने अपनी जान गंवाई है । अभी कुछ समय पहले ही राजधानी के एक प्रतिष्ठित विद्यालय में ,एक बच्ची की ऐसे ही संदेहास्पद स्थिति में मौत हो गई थी जबकि परिजनों का आरोप था कि तबियत बिगडने पर भी स्कूल प्रशासन द्वारा , बच्ची को समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं कराने के कारण हो गई । ऐसे ही कुछ माह पहले एक विद्यालय में अचानक बारिश के दिन फ़ैले करंट लगने से मची भगदड में भी कई बच्चों ने अपनी जान गंवाई थी । इनके अलावा आए दिन बच्चों को स्कूल ले कर आने जाने वाले गाडी का दुर्घटनाग्रस्त होकर बच्चों की जान जोखिम में डालना तो एक आम बात सी हो गई है ।


सरकारी विद्यालयों का प्रशासन तो खैर पहले से ही साधनों, धन , और सुविधा का रोना रोता रहता है ।मगर आश्चर्यजनक रूप से जो निजि विद्यालय जाने कौन कौन से मद में इतनी भारी भरकम राशि वसूलते हैं अभिभावकों से वो भी किसी तरह से इन बच्चों की सुरक्षा के प्रति , जरा से भी गंभीर नहीं दिखते हैं । यहां गौरतलब तथ्य ये है कि समय समय पर न्यायपालिका और संबद्ध नियंत्रणकारी संस्थाओं द्वारा इन स्कूली बच्चों की सुरक्षा को लेकर बहुत से आदेष निर्देश जारी किए जाते रहे हैं । जिनका पालन यूं तो देखने दिखानो को कुछ दिनों के लिए जरूर कर दिया जाता है मगर फ़िर बाद में उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है । उदाहरण के लिए राजधानी दिल्ली में ये आदेश दिया गया था कि वे सभी वाहन जो स्कूली बच्चों को लाने और ले जाने का काम करते हैं उनका रंग पीला होगा ताकि दूर से पता चल सके कि उनमें स्कूली बच्चे हैं , उन सबमें गति नियंत्रक लगे होने चाहिए । मगर आज हजारों की संख्या में सुबह दौडती बसें , वैन , तथा अन्य वाहन मिल जाएंगे जिनमें बच्चों को ले जाया जा रहा है इन आदेशों का उल्लंघन करते हुए ।


सबसे बडे दुख की बात तो यही है कि जब भी कोई हादसा होता है तो एक बार फ़िर से सभी नियमों के पालन की खानापूर्ति की रस्म निभाई जाती है उसके बाद फ़िर वही ढाक के तीन पात । इन सभी हादसों , दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाने वाले बच्चों के दोषियों को कभी सजा भी नहीं मिल पाती है क्योंकि स्कूल प्रशासन मिल कर पुरजोर तरीके से इसकी लीपापोती में लग जाता है ।और आखिर लगे भी क्यों न ,ये तमाम स्कूल और शिक्षण संस्थान , बडे बडे राजनीतिज्ञों, और व्यवसायियों के हैं जो हर तंत्र को आजमा कर ऐसी घटनाओं को दबा देने का प्रयास करते हैं ।


आज सबसे अहम समस्या ये है कि शिक्षा अब व्यवसाय का रूप ले चुकी है । आज जिस तरह से स्कूलों में दाखिले से लेकर , विद्यार्थियों की वर्दी , उनकी पुस्तकें , आवागमन के साधन , और जाने किस किस नाम पर अभिभावकों से पैसे वसूलने का जुगाड बनाया जा रहा है उससे ये स्पष्ट दिखता है कि आज शिक्षा सिर्फ़ पैसा कमाने का एक साधन बन गया है । इस बात का अंदाज़ा इस बात से भी होता है कि अभी हाल ही में जब राजधानी दिल्ली में आयकर विभाग ने सभी विद्यालय प्रशासनों को नोटिस भेज कर अपने खातों को जांच करवाने की बात कही तो उनके हाथ पांव फ़ूल गए । शिक्षण के इस व्यापारिक होते रूप पर चिंता यदि न भी की जाए तो कल को देश का भविष्य बनने वाले बच्चों के प्रति , खासकर उनकी सुरक्षा के प्रति इतना गैर जिम्मेदार रुख कैसे अख्तियार किया जा सकता है ? देखना तो ये है कि इस बार ये घटना इस मुद्दे को कितने दिनों तक जीवित रख पाती है ????

सोमवार, 3 मई 2010

रिएल्टी शोज़ का एक सकारात्मक पहलू


पिछले एक दशक या शायद उससे भी कम समय पहले शुरू हुए रिएल्टी शोज़ आज भारतीय टीवी के कुछ सबसे बेहतरीन और लोकप्रिय कार्यक्रमों में से एक है । गीत संगीत , नृत्य के नाम पर शुरू हुए इन शोज़ में आज बहुत सारी विविधताएं देखने सुनने को मिल रही हैं । बेशक इन रिएल्टी शोज़ में आज बहुत कुछ बनावटी और तमाशा बन कर रह गया है । हर हफ़्ते दिखाए जाने वाले जज़ों के आपसी झगडे , किसी प्रतियोगी के अभिभावक द्वारा आयोजकों पर उंगली उठाना , एस एम एस द्वारा विजेताओं का चुनाव और भी अन्य बहुत सी खामियां गिनाने को हैं सबके पास , मगर इसके बावजूद आज इन रिएल्टी शोज़ की अहमियत बहुत बढती जा रही है । और इससे इतर जो बात सबसे अधिक प्रभावित करती है , वो ये कि इन कार्यक्रमों ने आम लोगों को , साधारण लोगों को , यहां तक कि गरीब से गरीब तक की आखों में एक सपना जगा दिया है ।

पिछले कुछ समय में देखे दिखाए कार्यक्रमों में जब भी ऐसे प्रतियोगी जो बहुत ही गरीब तबके से होते हैं , जो प्रतियोगी शारीरिक रूप से अक्षम होते हैं , जब उन प्रतियोगियों के जज़्बे को पूरा हिंदुस्तान देखता है तो न सिर्फ़ उनकी हिम्मत को सलाम करता है , सराहता है बल्कि ऐसे लाखों करोडों लोगों को प्रेरणा भी देता है जो इन स्थितियों में निराश और हताश बैठे होते हैं ।जब कोई नेत्रहीन या शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति इतने बडे स्टेज पर कदम रखता है और पूरे आत्मविश्वास के साथ अपना हुनर दिखाता है तो उसके आगे तो वो भी फ़ीके पड जाते हैं जो हर रूप में सक्षम होते हैं । ये निश्चित रूप से इन रिएल्टी शोज़ का सकारात्मक पक्ष है जिसकी तारीफ़ की जानी चाहिए । इसके अलावा इन शोज़ में भाग लेने वाले प्रतियोगी, विजेता उपविजेताओं के लिए उन क्षेत्रों में काम का दरवाज़ा तो खोल ही देता है , इसके आगे उनकी काबिलियत और उनकी योग्यता ।


आने वाले समय में इन रिएल्टी शोज़ का आकर्षण और भी बढने वाला है ये तो लग ही रहा है । यदि इन शोज़ से चाहे कुछ ही सही गरीब परिवार के बच्चों के भविष्य सुधारने और संवारने में सहायता मिल सके तो ये सोच कर संतोष किया जा सकता है कि इन शोज़ के सहारे चैनलों द्वारा अरबों खरबों कमाई करने के बहाने कुछ तो अच्छा और भला हो ही जाता है ॥
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