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रविवार, 6 जून 2010

मानव व्यवहार में हो रहा परिवर्तन : एक विश्लेषण



अमेरिका के स्कूल में एक विद्यार्थी ने अपने सहपाठियों और शिक्षकों पर गोलिया बरसाईं । दिल्ली में सडक पर एक कारों के आपस में बस छू भर जाने से क्रोधित दो युवकों ने आपसी मारपीट की , और एक ने दूसरे को गंभीर रूप से घायल कर दिया । फ़्रांस में वीडियो गेम्स देखने से मना करने पर बेटे ने मां को ही मार डाला । गाजियाबाद में केले के पैसे मांगने पर झगडा , एक की मौत । अब पूरी दुनिया भर में इस तरह की घटनाएं और खबरें आम सुनने पढने और देखने को मिल रही हैं । समाज विज्ञानियों ने पहले तो इन्हें गंभीरतापूर्वक नहीं लिया किंतु अब जबकि इन घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हो रही है तो इंसान के इस बदलते व्यवहार पर अध्य्यन करने के बाद इसके कारण और परिणामों पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की । इस रिपोर्ट में तफ़सील से बताया गया कि किन वजहों से आज आदमी इस तरह तनाव , व्यग्रता, कम सहनशील ,उग्र होता जा रहा है ।

वर्तमान में जीवनशैली में एक नियमित भागदौड , एक मशीनीपन , प्रतिस्पर्धी वातावरण सा बन चुका है । शहरों में तो ये बात इतनी ज्यादा हो चुकी है कि दिन और रात का फ़र्क ही नहीं पता चलता है अब । ग्रामीण क्षेत्रों में बेशक अभी भी उतनी गलाकाट नहीं मची हुई है , और सारा जीवन एक नियमित सी दिनचर्या पर चल रहा है इसीलिए वहां अब भी रोड रेज , बात बेबात मारपीट , आदि की घटनाएं आम तौर पर होती नहीं दिखती हैं । जहां तक शहरो की बात है तो , यहां तो यदि बचपन से ही आकलन किया जाए तो आज के पांच वर्ष का बच्चा जो मानसिक शारीरिक दबाव तथा आई क्यूं यानि बोध परिपक्वता को महसूस करता है वो दो तीन दशक पहले तक बालिगपन में पहुंचने वाला युवा भी नहीं कर पाता था । घर से भारी बस्तों का बोझ उठाए बालक कब माता पिता की अति महात्वाकांक्षा के दबाव तले आ जाता है उसे पता ही नहीं चलता । अब मां पिता दोनों ही कामकाजी होते जाने के चलन ने जहां उनसे घर में मिलने वाला अभिभावकीय स्नेह , उनका वक्त .छीन लिया वहीं सब कुछ पैकेट बंद खाने पीने पर ही निर्भरता तक सीमित हो कर रह गया है ।

मानव के बदलते हुए व्यवहार पर शोधरत समाज विज्ञानियों और मनोविज्ञानियों ने इसके कुछ विशेष कारणों की पहचान की । इनमें से पहला है बदलता खानपान । रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में लोगों की खान पान की प्रवृत्ति में बहुत भारी बदलाव आया है । पूरे विश्व में जिस तेज़ी से फ़ास्ट फ़ूड या जंक फ़ूड भोज्य पदार्थों के सेवन का चलन बढा है उसने पारंपरिक भोजन को पीछे धकेल दिया है । विकसित देशों में तो ये खैर बहुत पहले से ही चला आ रहा है । मोटापे , रक्तचाप तथा पेट जनित कई बीमारियों के लिए जिम्मेदार ये भोज्य पदार्थ अब पश्चिमी समाज को भी खटकने लगे हैं । इसलिए वहां भी अब इन पदार्थों को स्कूल कालेज परिसरों में प्रतिबंधित करने पर विचार किया जा रहा है । ऐसे भोजन न सिर्फ़ पाचन तंत्र को प्रभावित करते हैं बल्कि शरीर में उच्च रक्तचाप और उत्तेजना के लिए भी जिम्मेदार हैं । इसलिए इनके लगातार सेवन से चिडचिडापन , तनाव का होना स्वाभाविक ही है । आज भारतीय शहरों में भी इनके प्रति बढता रुझान और उसके प्रभाव के परिणाम भी दिखने लगे हैं ।

इसके अलावा दूसरा कारक बताया गया है मनोरंजन , समाचार , सूचना के नाम पर लोगों के बीच फ़ैल रही हिंसात्मक सामग्री का प्रचार और प्रसार । रिपोर्ट बताती है कि बच्चों के खेल हों या बडों की फ़िल्में , समाचार हों या सूचना संसार हर ओर हिंसा , और उत्तेजना को ही आधार बना कर लोगों के सामने परोसा जा रहा है । तो ऐसे में जो भी एक आम व्यक्ति देख समझ रहा है धीरे धीरे उसका प्रभाव न सिर्फ़ उसके मस्तिष्क पर पडता है बल्कि उसका व्यवहार भी इसी तरह परिवर्तित होता जाता है । पश्चिमी देशों में तो इस कई ऐसी घटनाएं और अपराध तक इन्हीं कार्यक्रमो , सिनेमा , धारावाहिकों आदि से प्रेरित होते हैं । मनोविज्ञानी बताते हैं कि जितना प्रभाव सकारात्मक और सीधी साधी प्रस्तुतियां नहीं डालती हैं , उससे कहीं अधिक तीव्रता से मारधाड, हिंसा , अश्लीलता, उत्तेजना आदि की सामग्रियां मस्तिष्क ग्रंथियों को प्रभावित करती हैं ।

आज इंसान के व्यवहार में बढती उग्रता और हिंसा का एक बडा कारण नशे के सेवन को भी माना गया है । समाज विज्ञानी कहते हैं कि समाज में जिस गति से विभिन्न तरह के नशीले पदार्थों का , शराब , आद कि सेवन बढा है वो भी इन सबके लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है । इस बात को साबित करते हुए मनोविज्ञानी कहते हैं कि पुरूषों की तुलना में महिलाएं अब भी नशे के सेवन में बहुत पीछे हैं और यही कारण है कि क्रोध ,द्वेष, हिंसा , आदि में अधिकांश और जल्दी , पुरूष वर्ग ही पाया जाता है । आजकल युवा सबसे अधिक नशे की गिरफ़्त में हैं इसलिए उनके व्यवहार में भी इसका प्रभाव देखने को मिल रहा है ।

समाज विज्ञानियों ने इस तरह के बदलवा और मानव व्यवहार में निरंतर हो रहे परिवर्तनों को बहुत ही गंभीर चिंता का विषय माना है । उनका मानना है कि ये न सिर्फ़ समाज के लिए , लोगों के लिए , बल्कि खुद इंसानियत के लिए भी बहुत ही नुकसानदायक होने वाला है । सबसे दुखद बात तो ये है कि अभी तक इन बातों को गंभीरतापूर्वक लिया ही नहीं गया है ।

13 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक चिंतन ।
    आधुनिक जीवन में फैले तनाव और भाग दोड़ की जिंदगी में रिलेक्स करने का समय ही नहीं मिलता । नतीजा चिडचिडाहट , गुस्सा और तनाव। यही जिम्मेदार हो जाता है एग्रेशन के लिए ।
    बाकि बदलाव भी अपना रोल प्ले करता ही है ।

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  2. सादर वन्दे !
    आपने अच्छी जानकारी दी | वैसे आम तौर पर इसे समझा भी जा रहा है लेकिन आपसी पहल की कमी के कारण कुछ भी बदलाव देखने को नहीं मिल रहे हैं |
    रत्नेश त्रिपाठी

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  3. जिस प्रकार की घटनाएं सामने आ रही है उनके पीछे एक और कारण है वो है हर अच्छी बुरी बात की सहज स्वीकार्यता, और समय से पहले उचित अनुचित सारी बातों तक सहज जानकारी

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  4. बहुत विचारणीय एवं सार्थक आलेख.

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  5. बहुत अच्छी पोस्ट। आहार का विचार पर प्रभाव तो पड़ता ही है।

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  10. कई कारण हैं मानवीय व्यवहार के अमानवीय होने के. अच्छी पोस्ट है... मंहगाई, भ्रष्टाचार, अन्याय, संवेदनहीनता न जाने कितने ही कारक..

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मुद्दों पर मैंने अपनी सोच तो सामने रख दी आपने पढ भी ली ....मगर आप जब तक बतायेंगे नहीं ..मैं जानूंगा कैसे कि ...आप क्या सोचते हैं उस बारे में..

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