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बुधवार, 15 दिसंबर 2010

सावधान ! न्याय व्यवस्था संक्रमणकाल में है ... अजय कुमार झा






ऐसा कहा जाता है कि , यदि सिर्फ़ एक गांठ को धीरे से खींच दिया जाए तो फ़िर परत दर परत सब उघडने लगता है । आजकल कुछ कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है भारतीय न्यायपालिका में । ऐसा लग रहा है मानो एक होड सी लग गई है , रोज कोई न कोई ऐसी घटना , कोई न कोई ऐसा खुलासा , और कोई न कोई ऐसा वक्तव्य आम जनता के सामने आ रहा है जो आम जनता के इस विश्वास को और भी पुख्ता कर रहा है कि ...नहीं अब न्यायपालिका में भी सब कुछ ठीक नहीं है और वहां भी संक्रमणकाल तो शुरू हो ही चुका है ..शायद बहुत पहले ही शुरू हो चुका था मगर अब घाव रिस रहा है और मवाद बाहर आ रहा है ।

ज्ञात हो कि , अभी तो एक विवाद थमा भी नहीं था , हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने पहले एक अधीनस्थ उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के आचरण और क्रियाकलापों के संदिग्ध दिखने जैसी टिप्पणी की , जिसे वापस लेने के लिए दायर की एक याचिका में तो जैसे न्यायपालिका खुद ही अपने ऊपर उठ रही उंगलियों से आजिज आकर खीज कर ऐसी कडी भाषा में अपने विचार व्यक्त किए कि न सिर्फ़ न्याय क्षेत्र से जुडे कानूनविद ..सरकार , प्रशासन सभी हतप्रभ रह गए । इस मामले की पृष्ठभूमि और दूरगामी परिणामों पर अभी बहस चल ही रही थी कि इसी बीच एक बार फ़िर सबका ध्यान पुन: न्यायपालिका की ओर चला गया । एक निवर्तमान न्यायमूर्ति ने सार्वजनिक रूप से वक्तव्य दिया कि , जिस सूचना की जानकारी न होने का दावा एक पूर्व न्यायाधीश कर रहे हैं उस बारे में उन्हें न सिर्फ़ मौखिक बल्कि लिखित रूप से दी गई थी ।

इस घटना ने एक बार फ़िर कई गंभीर प्रश्न व्यवस्था के सामने रख दिए हैं । पहला तो ये कि , तो आखिर जनता ये मान कर चले अब कि , कोई भी स्तर आज भ्रष्टाचार , कदाचार , घूसखोरी जैसी स्थापित हो चुकी भारतीय कार्यप्रणाली से अछूते नहीं हैं अब । दूसरा और ज्यादा मह्त्वपूर्ण ये कि , आखिए वो कौन सा दबाव , वो कौन सी वजह थी जो न्यायमूर्ति को ये खुलासा तब करने से रोक रही थी जब वो उन्हीं मुख्य न्यायाधीश के सहकर्मी थे । तो क्या आम जनता यही समझे कि , न्यायपालिका तक में वरिष्ठ और शक्तिशाली सहकर्मी के खिलाफ़ बोलने का साहस नहीं होता है और वे भी आम कर्मचारी की तरह डरे और सिकुडे हुए रहते हैं । आज अचानक ही क्यों और कैसे उन्होंने ये सहजता से कह दिया ।

आम आदमी जो पहले ही प्रशासन , राजनीतिज्ञों और अब तो उसमें मीडिया की साठ गांठ से आज तक निराश और क्षुब्ध था अब न्यायपालिका को संक्रमित होता देख कर , वो भी सर्वोच्च स्तर तक , को देख कर आक्रोशित और स्तब्ध है । यदि अब भी जल्दी ही सब कुछ पूरी तरह न सही मगर संतोषजनक स्तर तक ठीक नहीं किया जा सका तो फ़िर आने वाला समय तो आम जनता खुद ही तय करेगी कि उसे करना क्या है , सहना क्या है ? लेकिन सबसे बडा यक्ष प्रश्न यही है कि ये करेगा कौन ????


3 टिप्‍पणियां:

  1. न्यायपालिका भी राज्य का महत्वपूर्ण अंग है। लेकिन मुख्य तो संसद और सरकार ही हैं। उन्हों ने बरसों से न्यायपालिका का दाना-पानी सीमित कर उस की जो हालत बनाई है उसी के परिणाम देखने को मिल रहे हैं।
    न्यायपालिका तभी बची रह सकती है जब सब से पहले उसे कुपोषण से बाहर निकाला जाए।

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  2. saamajik vyavstha ke har ang ki sadaandh baahar aa rahi hai ... abhi media kaa toofaan thama nahi thaa ab nyaypalikaa ke sadaandh saamne aa gai

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  3. दाल मे काला ही काला है सब। कोई ऐसी जगह नज़र नही आती जहाँ भ्रष्टाचार न हो। बेचारे ब्लागभी शायद बचे हैं शोर मचाने के लिये बाकी तो चुप चाप खा रहे हैं। शुभकामना।

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मुद्दों पर मैंने अपनी सोच तो सामने रख दी आपने पढ भी ली ....मगर आप जब तक बतायेंगे नहीं ..मैं जानूंगा कैसे कि ...आप क्या सोचते हैं उस बारे में..

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