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शनिवार, 5 जून 2010

काश कि इस तरह मनाया जा सके पर्यावरण दिवस




हर साल पांच जून को पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जा रहा है । और पिछले एक दशक से जब से इस दिवस को सिर्फ़ मनाया और उससे ज्यादा मनाए जाने को जताया जा रहा है तभी से लगातार पर्यावरण की खुद की सेहत बिगडती जा रही है । इससे बडी विडंबना और क्या हो सकती है कि आज जब ये विश्व पर्यावरण दिवस को मनाए जाने की खानापूर्ति की जा रही है तो प्रकृति भी पिछले कुछ दिनों से धरती के अलग अलग भूभाग पर , कहीं ज्वालामुखी प्रस्फ़ुटन के रूप में , तो कहीं लैला , कहीं सुनामी , कहीं कैटरीना और कहीं ऐसे ही किसी प्रलय के रूप में इस बात का ईशारा भी कर रही है कि अब विश्व समाज को इन पर्यावरण दिवस को मनाए जाने जैसे दिखावों से आगे बढ कर कुछ सार्थक करना होगा । बडे बडे देश और उनका विकसित समाज जहां प्रकृति के हर संताप से दूर इसके प्रति घोर संवेदनहीन होकर मानव जनित वो तमाम सुविधाएं उठाते हुए स्वार्थी और उपभोगी होकर जीवन बिता रहा है जो पर्यावरण के लिए घातक साबित हो रहे हैं । वहीं विकासशील देश भी विकसित बनने की होड में कुछ कुछ उसी रास्ते पर चलते हुए दिख रहे हैं ।

जब भी प्रकृति के नाम पर चिंतित होने की बारी आती है तो कभी पृथ्वी सम्मेलन तो कभी टोक्यो समझौते जैसा कुछ करके उसे भुला दिया जाता है ।
आज यदि धरती के स्वरूप को गौर से देखा जाए तो साफ़ पता चल जाता है कि आज नदियां , पर्वत ,समुद्र , पेड , और भूमि तक लगातार क्षरण की अवस्था में हैं । और ये भी अब सबको स्पष्ट दिख रहा है कि आज कोई भी देश , कोई भी सरकार , कोई भी समाज इनके लिए उतना गंभीर नहीं है जितने की जरूरत है । बेशक लंदन की टेम्स नदी को साफ़ करके उसे पुनर्जीवन प्रदान करने जैसे प्रशंसनीय और अनुकरणीय प्रयास भी हो रहे हैं मगर ये ऊंट के मुंह में ज़ीरे के समान हैं । आज समय आ गया है कि धरती को बचाने की मुहिम को इंसान को बचाने के मिशन के रूप में बदलना होगा ।

बेशक
इंसान बडे बडे पर्वत नहीं खडे कर सकता , बेशक चाह कर भी नए साफ़ समुद्र नहीं बनाए जा सकते और , किंतु ये प्रयास तो किया ही जा सकता है कि इन्हें दोबारा से जीवन प्रदान करने के लिए संजीदगी से प्रयास किया जाए ।
भारत में तो हाल और भी बुरा है । जिस देश को प्रकृति ने अपने हर अनमोल रत्न , पेड, जंगल, धूप , बारिश , नदी , पहाड , उर्वर मिट्टी से नवाज़ा हो , यदि वो भी इसका महत्व न समझते हुए इसके नाश में लीन हो जाए तो इससे अधिक अफ़सोस की बात और क्या हो सकती है ।

इसके लिए सबसे सरल उपाय है कि पूरी धरती को हरा भरा कर दिया जाए । इतनी अधिक मात्रा में धरती पर पेडों को लगाया जाए कि , धरती पर इंसान द्वारा किया जा रहा सारा विष वमन वे वृक्ष अपने भीतर सोख सकें और पर्यावरण को भी सबल बनने के उर्जा प्रदान कर सकें । क्या अच्छा हो यदि कुछ छोटे छोटे कदम उठा कर लोगों को धरती के प्रति , पेड पौधे लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए । बडे बडे सम्मेलनों , आशावादी समझौतों आदि से अच्छा तो ये होगा कि इन उपायों पर काम किया जाए । लोगों को बताया समझाया और महसूस कराया जाए कि पेड बचेंगे ,तो धरती बचेगी ,धरती बचेगी ,तो इंसान बचेगा । सरकार यदि ऐसे कुछ उपाय अपनाए तो परिणाम सुखद आएंगे

१)जन्मदिन , विवाह, और अन्य ऐसे समारोहों पर उपहार स्वरूप पौधों को देने की परंपरा शुरू की जाए । फ़िर चाहे वो पौधा ,तुलसी का हो या गुलाब का , गुलाब का हो या गेंदे का । इससे कम से कम लोगों में पेड पौधों के प्रति एक लगाव की शुरूआत तो होगी ।

) विभिन्न सरकारी समारोहों , सम्मेलनों और पुरस्कार वितरण कार्यक्रमों में शाल, स्मृति चिन्ह के साथ साथ पौधे देने की प्रथा भी शुरू की जाए ।


) सभी विशेष दिवसों , जयंतियों, आदि पर सरकार और गैर सरकारी संगठनों द्वारा वृक्षारोपण अभियान शुरू किया जाए वो भी पूरे वेग से और पूरी गंभीरता से।


४)सभी शिक्षण संस्थानों , स्कूल कालेज आदि में विद्यार्थियों को , उनके प्रोजेक्ट के रूप में विद्यालय प्रांगण में , घर के आसपास , और अन्य परिसरों में पेड पौधों को लगाने का कार्य दिया जाए । यदि इन छोटे छोटे उपायों पर ही संजीदगी से काम किया जाए तो ये कम से कम उन बडे बडे टोक्यो सम्मेलन से ज्यादा ही परिणामदायक होगा नि:संदेह ।

इंसान को अपने जीवन में पेड लगाने का सुख अवश्य ही प्राप्त करना चाहिए । मैं अपने हाथों के कम से कम पांच सौ पेड और पौधे लगा चुका हूं । पिछले ग्राम प्रवास के दौरान जब अपने लगाए आम के इन पेडों को देखा तो ऐसा लगा कि संतान बडी होकर गले से लग रही है और मेरे दिल को बडी ही ठंडक पहुंची । देखिए ये हैं वो आम के , शीशम के और जाने किस किस के पेड .........


6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत पसंद आये पर्यावरण संरक्षण के ये सुझाव भैया..

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  2. बहुत उम्दा सुझाव और सार्थक आलेख.

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  3. Jha Ji bahut achchaa lekh...kash sab ye samajh paayein to hamesh hariyali hee hariyali ho...prakruti mein bhee jeb mein bhee

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  4. पर्यावरण संरक्षण के लिए बहुत महत्‍वपूर्ण सुझाव दिया आपने .. आपने बहुत अच्‍छा आलेख लिखा है .. एक एक पंक्ति से सहमत हूं !!

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  5. पर्यावरण दिवस १९७३ से दुनिया भर में मनाया जाता है

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  6. अरविंद जी ,
    जानकारी देने के लिए शुक्रिया , मगर उपर एक दशक लिखने का तात्पर्य सिर्फ़ इतना है कि इन दिवसों को कर्मकांड की तरह पिछ्ले एक दशक से ही मनाया जाने लगा है , जैसे कि प्रेम दिवस , मातृ दिवस , भातृ दिवस और भी । शुरूआत तो इनकी भी जाने कब हुई होगी । बहरहाल वास्तविक वर्ष की जानकारी देने के लिए पुन: धन्यवाद ।

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मुद्दों पर मैंने अपनी सोच तो सामने रख दी आपने पढ भी ली ....मगर आप जब तक बतायेंगे नहीं ..मैं जानूंगा कैसे कि ...आप क्या सोचते हैं उस बारे में..

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