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मंगलवार, 26 जनवरी 2010

कैसे कहें कि गणतंत्र दिवस मुबारक हो !



आज भारतीय गणतंत्र अपने साठवें वर्ष में पहुंच चुका है और चारों तरफ़ हम अपनी चिर परंपरा को निभाते हुए सबसे यही कहते जा रहे हैं कि गणतंत्र दिवस मुबारक हो । और हो भी क्यों न आखिर एक देश जो जाने कितने दशकों , शताब्दियों या कहें कि युगों तक अलग अलग गुलामियों का दौर देख चुका था वो आजाद होने के बाद इतने शानदार सफ़र पर निकला हुआ है कि दुनिया रश्क कर रही है । आज विश्व के कोने कोने में भारत के विकास , उसकी सफ़लता , और उसके भविष्य की बातें ही हो रही है । आज विश्व का कोई देश , कोई समूह ऐसा नहीं है जो किसी भी लिहाज़ से भारत की उपेक्षा कर सके । मगर क्या इतना बहुत है एक देश के लिए खुद पर फ़ख्र करने के लिए , इतराने के लिए , घमंड करने के लिए और सबसे बढके अब आगे भटकने के लिए । यदि हां तो फ़िर चिंता की कोई बात नहीं , फ़िर तो देश सही दिशा में जा रहा है यानि आज बिल्कुल सच में ही भटकाव की ओर बढ रहा है । और बहुत मायनों में तो पीछे की ओर चल रहा है । अब देखिए न जिस धर्म/जाति/भाषा/प्रांत के झगडे को हम वर्षों पहले पीछे छोडने की राह पर थे अब एक बार फ़िर हमारे राजनीतिज्ञ पूरे देश को, समाज को ,उन्हीं रास्तों पर धकेल रहे हैं । तो फ़िर आखिर क्या माना जाए कि साठ बरस का एक देश ,परिपक्वता की जगह सठियाता जा रहा है ।

मेरी समझ में ये नहीं आता कि जब देश की प्रथम नागरिक होने और राष्ट्रपति होने के नाते श्रीमती प्रतिभा पाटिल पूरे देश की बालिकाओं/महिलाओं को ये संदेश देती हैं कि उन्हें आगे बढना है , महिला सशक्तिकरण की बात करती हैं तब वे इस बात की सफ़ाई भी दे पातीं कि ठीक उनकी नाक के नीचे , सोनिया गांधी , शीला दीक्षित जैसी महिलाओं के साथ के बावजूद .....देश की सबसे शूरवीर और साहसिक बेटी ...किरण बेदी को जबरन ही सिर्फ़ इस वजह से नौकरी से स्थाई अवकाश कैसे दिलवा दिया गया वो भी इस वजह से यदि वे जारी रहती तो उन्हें दिल्ली का पुलिस कमिश्नर बनाना पडता जो बहुतों को भारी पड जाता ।

मेरी समझ में ये भी नहीं आता जब पूरे देश को बडे ही ओजपूर्ण स्वर में कहा जाता है कि अब हम किसी भी आतंकी गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं करेंगे और ऐसे करने वालों के सारे मंसूबों को नेस्तनाबूत कर दिया जाएगा तो फ़िर उन्हें ये क्यों नहीं समझाया जाता है कि पिछले कुछ सालों से अफ़जल कसाब और इसके भाई बंदों को आखिर किस वजह से पाला पोसा जा रहा है ?

मेरी समझ में ये नहीं आता कि सरकार मे कोई व्यक्ति वित्त मंत्री के रूप में लगातार तीन तीन बार विश्व के सबसे अच्छे प्रधानमंत्री होने का पुरस्कार पाता है तो फ़िर वही व्यक्ति जब प्रधानमंत्री के पद पर , यानि सरकार का अगुवा बनता है तो फ़िर आखिरकार किन कारणों से इस कदर बेबस हो जाता है कि उसकी सारी अर्थनीति बेकार हो जाती है और जनता त्राहि त्राहि करती रहती है और सरकार का कहना होता है कि दाम कब कैसे कम होंगे ये तो ज्योतिषि ही बता सकते हैं ?

और भी कई सारे प्रश्न दिमाग में इस तरह घुमडते हैं कि समझ ही नहीं आता कि कैसे कहूं गणतंत्र दिवस मुबारक हो

शनिवार, 9 जनवरी 2010

मीडिया और न्यायपालिका



राठौर प्रकरण में जिस तरह से मीडिया ने एक बार फ़िर से जेसिका लाल हत्या कांड वाला रुख अपनाया और लगभग उसी के अनुरूप इस घटना में त्वरित कार्यवाही वाला सब कुछ चल रहा है , उसने एक बार फ़िर से न्यायपालिका और मीडिया के बीच बढते रिश्ते के बहस को एक नई हवा दे दी है ॥ पिछले कुछ वर्षों में जब से मीडिया की अधिकता हुई है लगभग तभी से मीडिया खबरों के लिए और उससे इतर भी बराबर न्यायपालिका, उसकी कार्यवाही, और अब उसके फ़ैसलों पर बहुत करीबी नज़र रखता है । हालांकि कई बार अति उत्साह और खबरों को एक्सक्लुसिव बनाने के चक्कर में मीडिया न्यायपालिका के उस क्षेत्र में अतिक्रमण कर जाती है जिस क्षेत्र में नहीं करना चाहिए । और इसका खामियाजा भी भुगतती है , हाल ही में माननीय न्यायपालिका ने इस तथाकथित मीडिया ट्रायल पर नकेल कसने के लिए कुछ सख्त हिदायतें और निर्देश सरकार को दिए थे ॥

लेकिन पिछले कुछ समय से जिस तरह न्यायिक फ़ैसलों, पुलिसिया कार्यवाहियों, और कुछ वैसे मुकदमे जो किसी न किसी बडी हस्ती से जुडे होते हैं , उनकी कवरेज में मीडिया जैसी दिलचस्पी दिखा रहा है , उसने कभी कभार नुकसान पहुंचाने के बावजूद अधिकांश में कानून व्यवस्था, न्यायिक व्यवस्था ,और समाज को आत्ममंथन करने पर मजबूर जरूर किया है । क्या ऐसा संभव था कि जिस मुकदमे को हाल फ़िलहाल की न्यायिक सक्रियता के बावजूद फ़ैसले पर पहुंचने में , वो भी अदालत की पहली पायदान पर ही, उन्नीस बीस बरस लग जाते हैं उस मुकदमे उसमें इतनी तेजी से इतना सब हो जाएगा । अब तो ऐसा लग रहा है कि पूरी जन्मपत्री ही खुल या खोली जा रही है राठौर साहब की । बेशक ये लडाई अब भी उतनी आसान न हो , ये भी हो सकता है कि इसे अब भी नियति तक नहीं पहुंचाया जा सके । लेकिन इन सबने दो बातें तो जरूर ही प्रमाणित कर दी हैं । पहली ये कि अब भी मीडिया अपनी खबरों से और सबसे बडी बात की खबरों की दिशा से जनमानस को तैयार कर लेता है । और दूसरा ये कि जब एक बार कोई खबर बन जाती है तो फ़िर बांकी का काम बहुत कठिन नहीं रहता है ।

इसलिए यदि हम मीडिया की असंवेदनशीलता, नकलचीपन, और उनके चुके हुए थिंक टैंक के लिए उन्हें कोसते हैं तो फ़िर इस तरह के प्रयासों के लिए उनका धन्यवाद तो देना ही चाहिए । मगर .........हां ...मगर मुझे लगता है कि मीडिया अब भी दायरों में सिमटी हुई है , मेरे कहने का तात्पर्य ये है कि अब भी जैसे ही कोई एक घटना, दुर्घटना , इस तरह का फ़ैसला , या ऐसा ही कुछ और बाहर आता है फ़िर सभी उसी ढर्रे पर चलने लगते हैं । तो क्या ये माना जाए कि मीडिया अभी भी उसी लीक पर चल रहा है । तो क्या हम मीडिया से ये अपेक्षा करें कि वो अभी भी उन लाखों-करोडों रुचिकाओं ,जेसिका लाल और न जाने किन नामों , और उनके परिवार वाले और सबसे ज्यादा आम आदमी के न्याय की लडाई को देश की, समाज की , लडाई बनाएंगे ..???????
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