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मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

विश्व स्वास्थ्य दिवस और और एक बीमार देश

  

आज विश्व स्वास्थ्य दिवस है । पूरे विश्व में आज चिकित्सा जगत अपनी अब तक की उपलब्धियों और भविष्य में एड्स , हेपाटाईटिस , और इन जैसे रोगों के लिए किए जा रहे शोधों , इनके लिए औषधियों के निर्माण आदि पर विचार विमर्श कर रहा होगा । और इन सबसे दूर बैठा भारत अब भी पोलियो के लिए पल्स पोलियो ड्रौप्स पिलाने के लिए बार बार प्रचार के सहारे लोगों की मान मनौव्वल में लगा हुआ जूझ रहा है । और वो भी उस स्थिति में जब आए दिन कोई न कोई इस बात की घोषणा कर जाता है कि बहुत जल्द भारत देश के कुछ अग्रणी देशों में शामिल हो जाएगा । 

    यदि भारत में चिकित्सा क्षेत्र में सफ़लताओं की बात करें तो जो देश आज हौस्पिटल टूरिज़्म की बातें कहता और समझता हो , जाहिर सी बात है कि उसका स्तर , कितना आगे पहुंच चुका है । आज दुनिया का शायद ही कोई ऐसा देश हो जहां भारतीय चिकित्सक अपनी काबलियत का लोहा न मनवा रहे हों । भारत भी अब चेचक, हैजा, एक हद तक पोलियो भी जैसी पुरानी बीमारियों से लगभग निजात पा ही चुका है । गली गली में बडे बडे नर्सिंग होम और अस्पताल खुले हुए है जो अत्याधुनिक चिकित्सा उपकरणों और काबिल डाक्टरों से लैस हैं । आज कोई भी ऐसी चिकित्सा पद्धति और औषधि नहीं है जो भारत में न उपलब्ध हो । औषधि निर्माण के लिए भी निरंतर शोध कार्य चलते रहते हैं । किसी भी विकासशील देश के लिए ये गर्व का विषय हो सकता है । किंतु ये मुद्दे का सिर्फ़ एक ही पहलू है । 

  आज भी बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं से देश का लगभग सारा क्षेत्र ही अछूता है । अच्छे अस्पताल और चिकित्सा व्यवस्था तो दूर अब भी ग्रामीण क्षेत्रों में डाक्टरों की बहुत कमी है । हालात इतने बदतर हैं कि कई बार सरकार ने ये योजना तक बनाई है कि सभी डाक्टर्स को कुछ समय तक अनिवार्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देनी होगी । गांव तो गांव शहरों में भी जो अच्छी चिकित्सा सुविधा है वो आज इतनी महंगी हो चुकी है कि एक आम आदमी के लिए उसका वहन उठाना मुमकिन नहीं है । और ऐसा इसलिए है क्योंकि कभी समाजसेवा का सच्चा स्वरूप मानी जाने वाली चिकित्सा व्यवस्था आज विशुद्ध व्यवसाय बन चुकी है । सिर्फ़ और  सिर्फ़ पैसा कमाने के जुगत में लगे हुए हैं सब । इसीका परिणाम है कि आज देश में डाक्टरों की संख्या से तीन गुना ज्यादा संख्या में झोला छाप डाक्टरों के भरोसे ही गरीबों का ईलाज हो पा रहा है । इस स्थिति को और भी बदतर बनाने में भरपूर सहयोग दे रही हैं नकली दवाईयां । आंकडों की मानें तो आज बाजार में उपलब्ध दवाईयों में से लगभग २७ प्रतिशत दवाईयां नकली हैं । आज सवा अरब की जनसंख्या पार कर चुके देश में पचास साठ बरस के बाद यदि सरकार को याद आता है कि अखिल भारतीय चिकित्सा संस्थान और अस्पतला ,एम्स , जैसी संस्था और भी होनी चाहिए और वो घोषणा भी करती है ( हालांकि लगता तो ये है कि वो घोषणा भी महज कोरी घोषणा ही बन कर रह गई ) कि देश भर में उस तरह की और भी संस्थाएं खोली जाएंगी , तो वो भी कितनी महज़ छ: । 

 अभी देश की चिकित्सा व्यवस्था खुद ही इतनी बीमार है कि उसे आमूल चूल परिवर्तन की जरूरत है , अन्यथा विश्व स्वास्थ्य दिवस जैसे दिवसों को मनाने का कोई औचित्य नहीं है ॥

2 टिप्‍पणियां:

  1. योजनाये ,घोषणाये अनावरण और शिलान्यास ...यही तक सिमित है सभी व्यवस्थाये....अगर कागजो में देखे तो भारत कबका विकसित देश बन चुका ....

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  2. जंहा सरकारी अस्पताल खुद बीमार हों,वंहा काहे का स्वास्थ्य दिवस।

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मुद्दों पर मैंने अपनी सोच तो सामने रख दी आपने पढ भी ली ....मगर आप जब तक बतायेंगे नहीं ..मैं जानूंगा कैसे कि ...आप क्या सोचते हैं उस बारे में..

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