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सोमवार, 19 अप्रैल 2010

फ़ैशन शोज़ का औचित्य समझ से परे




ये युग फ़ैशन का युग है । आज तो हर बात में , या कहा जाए कि बेबात में भी फ़ैशन का ही बोलबाला है । आज खाना , फ़ास्ट फ़ूड खाना फ़ैशन है , पीना , अब इसके लिए क्या कहा जाए , ये तो फ़ैशन से ज्यादा अब एक आदत है , मोबाईल रखना नहीं नहीं मोबाईल बदलते रहना एक फ़ैशन है , बढिया स्कूल में बच्चों को पढाना एक फ़ैशन है, और पता नहीं क्या क्या फ़ैशन है । मुझे तो लगता है कि ये कहना चाहिए कि ये नहीं पता कि क्या फ़ैशन नहीं है ? मगर फ़िर इन सबके सिर पैर कहीं न कहीं तो लोगों के साथ जुड ही जाते हैं फ़ैशन के नाम पर या जरूरत के नाम पर , मगर जिस चीज़ के बारे में अब तक मन आशंकित और भ्रमित है वो इन दिनों आयोजित किए जाने वाले फ़ैशन शोज़ ।

    अब तो रोजाना ही इस तरह के फ़ैशन शोज़ , कभी शीत वस्त्रों का कलेक्शन , कभी ग्रीष्मकालीन , कभी वसंत का कलेक्शन , कभी फ़लाना जी का तो कभी ढिमकाना जी के वस्त्रों का कलेक्शन , आयोजित किए जा रहे हैं और ये कलेक्शन सालों भर चलते ही रहते हैं  । एक आम आदमी की नज़र से देखा जाए तो उसके लिए तो फ़ैशन की दुनिया अभी भी कोसों दूर है । मगर इन वस्त्रों की समझ ,खासकर जब इन्हें शोज़ में देखा और दिखाया जाता है , तो उसके परिप्रेक्ष्य में तो वो बिल्कुल ही नगण्य है । आम आदमी को तो यही लगता है कि जिन कपडों को पहन के वो मौडल महिला पुरूष , इतराते हुए ऐंठ ऐंठ कर चलते हैं और पूरा हौल बैठ कर जाने कौन सी शिल्पकारी देखता निहारता है , यदि वास्तव में असल जीवन में उन वस्त्रों को बिल्कुल ठीक वैसे ही धारण करके कोई सरे आम निकल आए तो निश्चित ही कुत्ते उसके पीछे पड जाएंगे , फ़िर चाहे वो उनके रंग रूप और उस विशेष साज सज्जा को देख कर खुद ही डर कर छिप जाएं ।

  इन फ़ैशन शोज़ में कभी प्रकृति को , कभी किसी और को थीम की तरह उपयोग किया जाता है या कि ऐसा बताया जाता है , तो असल में तो आम आदमी यही सोचता है कि ये जो जूडे में सैकडों नींबू खोंसे , या फ़िर कि हरी मिर्च की माला लपेटे उस कमसिन काया नारी और सौष्ठव पुरूष ने कभी शायद ही मिर्च नींबू की झाड असलियत में देखी हो । कैसी पर्यावरण थीम जी , सिर्फ़ हरे कपडे लपेट लेने से या सर पर तरबूज कद्दू के टुकडे काट कर लगा लेने से वो पर्यावरण के करीब लगने लगते हैं । इन फ़ैशन शोज़ के आधार पर शुरू किया गया एक टीवी चैनल तो उन वस्त्रों के प्रदर्शन के नाम पर नारियों को अधोवस्त्रों में इस कदर परोसने लगा , जो अश्लीलता की हदें भी पार करने लग गया । समझ ये नहीं आता था कि इनमें वस्त्रों की प्रदर्शनी हो रही है या वस्त्र नहीं पहना जा रहा है उस बात की । जो भी हो ये परिधानों के अजीबोगरीब फ़ैशन का गणित  फ़िलहाल तो आम जन की बुद्धिदानी में आने से रहा ॥

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपने जिस शो या जिस फ़ैशन की बात की है, वह आम नहीं है और आम लोगों के लिए भी नहीं है.. फिर ऐसे में उस पर चर्चा करके हम अपना बहुमूल्य समय एवं ऊर्जा का क्षय ही कर रहे हैं...रही बात उन परिधानों में सड़क पर चलकर जाने की, तो इस विषय पर जसपाल भट्टी जी की एक बात, जो उन्होंने पत्रिकाओं में प्रकाशित विभिन्न पकवानों के लिए कही थी, याद आ जाती है. उनका कहना है कि कुछ पकवान फोटोजेनिक होते हैं, जो पत्रिकाओं की तस्वीरों में ही स्वादिष्ट लगते हैं, खाने में नहीं. ठीक उसी तरह ये परिधान भी (यदि उन्हें परिधान की श्रेणी में रखें तो) एफ.टी.वी. पर ही (अ)सुंदर लगते हैं... यह सोचना भूल है कि कोई उन्हें पहन कर सड़क पर निकलता होगा...

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  2. इनका उद्देश्य आज तक समझ हू नहीं आया..

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  3. वही तो एफ़ टी वी लगा लगा के कई अधेढ़ सोच ते है कुछ बूढे भी
    वैसे इसे चोचले ही कहें तो बेहतर है

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  4. इतनी मोटी बात समझ नहीं आई? यह इन्सानी जरूरत के लिए कुछ करने या न करने का नहीं कुछ भी कर के मुनाफा बनाने का युग है। सब कुछ उसी के कारण चल रहा है।

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  5. जो दिखता है वही बिकता है

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  6. एक जमाने में फैशन शो सिर्फ संपन्न लोगों के लिए हुआ करते थे...साथ ही उन्हे देखने के लिए एक प्रकार का विशेष तपका ही जाया करता था...और तो और देर रात एक निजी चैनल पर आने वाले कार्यक्रम को भी युवा खासतौर पर देखते थे....उसमें चाहे लड़कियो हो या फिर लड़के...लेकिन अब हम आधुनिक हो गए है...इसलिए हमने स्टैज पर होने वाले प्रयोग एवं टीवी पर दिखाए जाने वाले कुप्रयोगों को अपने जीवन में समा लिया है।

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मुद्दों पर मैंने अपनी सोच तो सामने रख दी आपने पढ भी ली ....मगर आप जब तक बतायेंगे नहीं ..मैं जानूंगा कैसे कि ...आप क्या सोचते हैं उस बारे में..

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