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गुरुवार, 22 अगस्त 2013

सच को दबाने और सूचना को छिपाने की नीयत




अभी कुछ समय पूर्व ही शिवसेना के संस्थापक राजनेता बाला साहब ठाकरे के निधन के बाद मुंबई में दो युवतियों को फ़ेसबुक पर टिप्पणी करने व उसे पसंद करने या प्रतिक्रिया देने की शिकायत होने पर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया । मामले के तूल पकडने व न्यायालय द्वारा उन्हें जमानत देते समय अदालत ने यह टिप्पणी की थी कि इस तरह के मामलों में गिरफ़्तारी से पहले अदालत से आदेश लिया जाना चाहिए । अभी कुछ दिनों पूर्व पुन: इस घटना की पुनरावृत्ति हुई जब उत्तर प्रदेश में एसडीएम दुर्गा शाक्ति नागपाल के निलंबन पर राज्य सरकार के विरूध आलोचनात्मक टिप्पणी करने के लिए पुलिस में दी गई एक तहरीर के आधार पर दलित चिंतक विचारक कंवल भारती को गिरफ़्तार करके बाद में जमानत पर छोड दिया गया ।

संयोगवश जब प्रदेश की राज्य सरकारें अभिव्यक्ति का दमन करने के लिए आतुर व अंसवेदनशील दिखाई दे रही हैं ठीक इसी समय केंद्र सरकार व पक्ष-विपक्ष में बैठी तमाम राजनीतिक पार्टियां कभी बडे जोशो-खरोश से जनता को दिए जाने वाले सूचना के अधिकार के दायरे से खुद को बाहर रखने के लिए संविधान में संशोधन की तैयारी में हैं । यदि दोनों घटनाओं को एक परिप्रेक्ष्य में एक पल के लिए देखा जाए तो ये स्पष्ट दिखता है कि शासक वर्ग न तो किसी सच को सामने आने देना चाहता है और न ही उस कुरूप व कडवे सच पर आम आदमी द्वारा अभिव्यक्त किसी आलोचना या प्रतिक्रिया को सहन करने को तैयार है ।

जहां तक आम आदमी द्वारा अभिव्यक्ति की स्वंतंत्रता के उपयोग में मर्यादा व सामाजिक कानून के उल्लंघन का सवाल है तो इसमें कोई संदेह नहीं कि मौजूदा समय में अंतर्जाल व सोशल नेटवर्किंग साइट्स की व्यापकता व निर्बाधता के कारण इसके दुरूपयोग की गुंजाइश बहुत बढ गई है और यदा कदा इसके उदाहरण सामने आते भी रहे हैं । यह भी एक सच है कि इन माध्यमों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के नाम पर , अपना विचार साझा करने के नाम पर और जाने किन किन अन्य बहानों से बाकायदा समूह बनाके कहीं द्वेष फ़ैलाने का काम किया जा रहा है तो कहीं किसी को अपमानित करने का , कहीं अफ़वाह फ़ैलाई जा रही है तो कहीं घृणा को बढावा दिया जा रहा है । इतना ही नहीं , देश के विख्यात राजनेताओं , अभिनेताओं ,खिलाडियों आदि द्वारा इन मंचों माध्यमों पर व्यक्त विचारों, प्रतिक्रियाओं को समाचार माध्यमों में सुर्खियों के रूप में देखा और दिखाया जा रहा है ।

सारांश ये कि इसका उजला और काला पक्ष दोनों ही समाज व सरकार के सामने है और शायद इसीलिए सरकार ने इसकी ताकत व प्रभाव का अंदाज़ा लगाते हुए इस दिशा में कानून का  निर्माण भी किया । किंतु आंकडे बताते हैं कि अन्य समकक्ष कानूनों की तरह इसके दुरूपयोग , खासकर शासक वर्ग शासित वर्ग के खिलाफ़ किए जाने की गुंजाईश बराबर बनी हुई है ।

आम आदमी , व्यवस्था के प्रति अपना क्रोध अपना गुस्सा अपनी प्रतिक्रिया अक्सर तब प्रतिकूल होकर देता है और जब वह पाता देखता है कि उसके सामने आया सच , उस सच से बिल्कुल अलग है जो प्रशासन और सरकार द्वारा उसके सामने परोसा जाता रहा है । और दोनों सच का असली सच यदि आज आम आदमी की पहुंच में आ सकता है तो वो संभव हो पाया है जन सूचना अधिकार २००५ के कारण ।

देश में उपलब्ध आंकडे बताते हैं कि आम आदमी ने इस अधिकार का उपयोग करते हुए सरकारी दफ़्तरों संस्थानों से अपने हित में छोटी छोटी सूचनाएं निकलवाकर अपने काम करवाए, जिन कार्यों के लिए उसे बहुत सारा पैसा व श्रम खर्च करने के बावजूद भी कुछ हासिल नहीं हो पाता था, वो काम करवाए बल्कि प्रधानमंत्री , व राष्ट्रपति तक से और उनके कार्यकाल उनकी नीतियों , फ़ैसलों और उनके पीछे की कार्यवाहियों , पत्र व्यवहार , प्रशासन की नोटिंग आदि तक की सूचनाएं भी बाहर निकाल कर जनता के सामने रख दीं । देश को साठ वर्षों के बाद एक स्कूली बालिका के सूचना मांगने पर पता चला कि सालों से पाठ्यक्रम तक में बच्चे जिन महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता के रूप में पढती जानती आई है और असल में भारत सरकार ने उन्हें राष्ट्रपिता का दर्ज़ा कभी आधिकारिक रूप से दिया ही नहीं । सरकार , प्रशासन व व्यवस्था द्वारा जितना छुपाया गया सच था इस कानून के माध्यम से उसकी परत दर परत उधेडने की मानो एक होड सी लग गई । सच को कुरेदने की ये मुहिम इतनी असरकारक साबित हुई कि बहुत बार इस ज़ोखिम में सूचना मांगने वाले को अपनी जान तक गंवानी पडी ।

आंकडों के अनुसार पिछले एक वर्ष में १६०९ व्यक्तियों पर सूचना के अधिकार के कारण हमला किया गया एवं ७८ व्यक्तियों को अपनी जान से हाथ धोना पडा । किंतु सरकार व राजनैतिक दलों को दिक्कत तब हुई जब मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने एक आदेश में कहा कि राजनैतिक दल सरकारी सहायता और टैक्स में छूट लेने के कारण जनप्राधिकारा हैं इसलिए वे अपने चंदे , चुनाव तथा नीतियों की जानकारी सार्वजनिक करें । जबकि इसके विरूध राजनीतिक दलों की दलील है कि निर्वाचन आयोग दलों को जनप्रनिधित्व एक्ट १९५१ के तहत पंजीकृत करता है और चुनाव के योग्य बनाता है महज़ इस लिहाज़ से दल जनप्राधिकार नहीं कहे जा सकते हैं ।

जो भी हो फ़िलहाल तो देश के सभी राजनीतिक दल सच को दबाने व सूचना को छिपाने की नीति पर एकमत होकर काम कर रहे हैं और जैसाकि संभावित है वे इस कानून की धार को कमज़ोर करने हेतु आवश्यक संशोधन भी कर लेंगे जो अंतत: लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए गलत साबित होगा ।

1 टिप्पणी:

  1. संशोधन कर भी लिया है अजय सर। सटीक लेखन आपका आभार।

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मुद्दों पर मैंने अपनी सोच तो सामने रख दी आपने पढ भी ली ....मगर आप जब तक बतायेंगे नहीं ..मैं जानूंगा कैसे कि ...आप क्या सोचते हैं उस बारे में..

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