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सोमवार, 16 सितंबर 2013

मृत्युदंड : एक विमर्श







देश के एक प्रतीक्षित फ़ैसले में अदालत का निर्णय , जो कि अधिकतम , यानि मृत्युदंड आने के बाद एक बार पुन: "मृत्युदंड" की सज़ा पर नई बहस उठ खडी हुई है । ज्ञात हो कि ऐतिहासिक रूप से ये पहला मौका है जब किसी एक ही जिला अदालत द्वारा एक माह के भीतर ही नौ अपराधियों को मृत्युदंड की सज़ा सुनाई गई है । अंतरराष्ट्रीय संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी मृत्युदंड की सज़ा के बढते दर को चिंताजनक करार दिया है । अभी कुछ समय पूर्व ही आतंकवाद का आरोप साबित होने पर दो अपराधियों अजमल कसाब और अफ़ज़ल गुरू को फ़ांसी पर लटकाया गया था ।
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मृत्युदंड की सज़ा के इतिहास पर नज़र डाली जाए तो भारत सहित अन्य बहुत से देशों में न सिर्फ़ मौत की सज़ा का प्रावधान प्रचलित था बल्कि लगभग सभी देशों में इसके क्रियान्वयन के अमानवीय और क्रूर तरीके भी प्रचलिए थे । इंगलैंड में १४९१-१५४१ के बीच तो लगभग ७२,००० लोगों को छोटे बडे अपराधों तक के मृत्युदंड दे दिया गया । मृत्युदंड की सज़ा देने के लिए क्रूरतम विधियों का प्रयोग किया जाता था जैसे गैरेट ( धातु की कॉलर से अपराधी का गला , उससे श्वास रूकने तक दबाए रखना ) , गुलोटिन ,(एक विशेष प्रकार की मशीन जिसमें बडे धारदार ब्लेड की सहायता से अपराधी का सिर धड से अलग कर दिया जाता था । इसके अलावा सूली पर टांग कर , कुचलकर , विषैली गैस छोडकर, ज़हर का इंजेक्शन व गोली मारकर भी मृत्युदंड दिया जाता था । अमानवीय तरीकों में जिंदा गाडकर पशुओं के खाने केल इए छोड देना , छोटे बडे घाव देकर रोज कष्ट पहुंचा कर तथा सार्वजनिक स्थानों पर अपराधियों पर पत्थर बरसा अक्र उन्हें मार डालने की प्रथाएं व्याप्त थीं । आधुनिक युग में कुछ अरब देशों को छोडकर मृत्युदंड के अमानवीय तरीकों को हटा दिया गया है ।
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मृत्युदंड की सज़ा के विरोधी इसके पीछे तर्क देते हुए कहते हैं कि इस दंड की अप्रतिसंहरणीयता के कारण इसका प्रयोग खतरे से खाली नहीं है क्योंकि भविष्य में यदि आरोपी निर्दोष साबित हो जाता अहि तो इस दंड का उपशमन नहीं किया जा सकता है ।  किंतु इस तर्क के जवाब में यह कहा जा सकता है कि बहुस्तरीय न्याय प्रक्रिया और जटिलताओं के बाद इस बात की गुंजाईश न के बराबर बचती है कि ऐसी कोई स्थिति सामने आए । इसके विरोध में दूसरा तर्क ये दिया जाता है कि दंड का एक उद्देश्य होता है कि उसके भय से अपरधियों में अपराध के प्रति प्रतिरोध की भावना आए जबकि वास्तव में मृत्युदंड की सज़ा से संबंधित अपराध की दर में कोई प्रभाव पडा हो ऐसा देखने को नहीं मिलता ।


किंतु सिर्फ़ इस कारण से मृत्युदंड की सज़ा को समाप्त किया जाना तर्कसंगत नहीं लगता आज भी विश्व के १४१ देशों ने अपने यहां पर इस दंड व्यवस्था को बहाल रखा हुआ है । । इस विषय में प्रसिद्ध इटेलियन अपराधशास्त्री गेरोफ़ेलो का कथन गौर करने लायक है कि , " मृत्युदंड को समाप्त करने का अर्थ यह होगा मानो हम हत्यारे से कह रहे हैं कि तुम्हारे द्वारा किसी व्यक्ति की जान लेने जोखिम केवल अय्ह होगा कि अब तुम स्वयं के घर के बजाय कारागार में निवास करोगे " । यूं भी अपराध, आतंकवाद का प्रसार और मानवता के प्रति उसके बढते हुए खतरे को देखकर मृत्युदंड को समाप्त करना उचित नहीं जान पडता है । श
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भारत में भी मृत्युदंड को समाप्त करने की कवायद कई बार की गई है । लोकसभा में इस आशय का प्रस्ताव सर्वप्रथम १९४९ में रखा गया था किंतु तत्कालीन गृह मंत्री वल्लभ भाई पटेल ने इसे ठुकरा दिया था । १९८२ में दिल्ली में आयोजित दंड विधि पर अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस में भी मृत्युदंड के औचित्य पर विस्तृत चर्चा हुआ किंतु मृत्युदंड को विधि में यथावत रखने पर ही सहमति बनी । इसी प्रकार १९७१ में विधि आयोग ने भी मृत्युदंड के पक्ष में विचार रखते हुए कहा कि मृत्युदंड का आधार प्रतिशोध की भावना न होकर निष्ठुत अपराधियों के प्रति समाज का रोष दर्शाना है अत: दंड विधि में उसे बनाए रखना सर्वथा उचित है ।
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जहां तक भारतीय विधि में मृत्युदंड की स्थिति है तो कुछ विशेष अपराधों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान रखा गया है । सरकार के विरूद्ध युद्ध छेडना , सैनिक विद्रोह का दुष्प्रेरण , हत्या , आजीवन कारावास मिले अभियुक्त द्वारा हत्या का प्रयास , फ़िरौती के लिए अपहरण व हत्या , हत्या सहित डकैती आदि । यहां यह उल्लेख करना समीचीन होगा कि भारतीय दंड संहिता की धारा ३०३ एकमात्र ऐसी धारा थी जिसमें अपराधी को मृत्युदंड ही दिया जाना अनिवार्य था तथा इसके विकल्प में आजीवन कारावास दिए जाने का प्रावधान नहीं था ,जिसे वर्ष १९८३अ में मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य के वाद में असंवैधानिक ठहरा दिया गया । ज्ञात हो कि वर्ष १९५५ के पूर्व मानव वध के लिए मृत्युदंड दिया जाना सामान्य नियम था एवं आजीवन कारावास दिए जाने पर उसका कारण दर्ज़ करना आवश्यक होता था जबकि १९५५ में किए गए संशोधन के पश्चात स्थिति ठीक विपरीत हो गई तथा मृत्युदंड की सज़ा सुनाते समय इसके कारणों का उल्लेख करना अपरिहार्य बना दिया गया । उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णीत मृत्युदंड से संबंधित प्रकरणों के विश्लेषण से यह पता चलता है कि न्यायालय ने आकस्मिक आवेश, उत्तेजना, विषयसक्ति के कारण उत्पन्न घृणा , पारिवारिक कलह , भूमि संबंधी झगडे , आदि को मृत्युदंड के बजाय आजीवन कारावास का दंड दिए जाने का उचित कारण माना है ।
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मृत्युदंड के संदर्भ में व्याख्यायित सिद्धांत "विरलों में भी विरलतम" को भी अक्सर बहस का विषय बनाया जाता रहा है एवं खुद कई बार ये बात न्यायपालिका तक मान चुकी है कि इसकी व्याख्या करने के न्यायिक मानदंड में भारी असामनाता रही है ।यही कारण है कि वर्ष १९८३ में दीना बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के वाद में इससे पूर्व निर्णीत वाद बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य में व्याखायित सिद्धांत कि मृत्युदंड "विरलों में से भी विरलतम" मामलों में ही दिया जाना चाहिए को और स्पष्ट करते हुए कुछ विशेष बिंदुओं को चिन्हित किया जिन्हें विरलतम माना जाना चाहिए । बर्बरतापूर्वक एवं क्रूरतापूर्ण तरीके से की गई हत्या , हत्या का उद्देश्य घिनौना या दुराचारयुक्त हो , यदि यथा सामाजिक दृष्टि से घृणित या वीभत्स हो , जहां हत्याएं बडे पैमाने पर की गई हों , जैसे सामूहिक हत्या तथा जहां अपराध से पीडित व्यक्ति कोई असहाय बालक ,महिला , वृद्ध व्यक्ति या विख्यात , प्रतिष्ठित व्यक्ति हो या हत्या राजनीतिक स्वरूप की हो ।
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अत: सारांशत: यह कहा जा सकता है कि इसमें संदेह नहीं कि यदि मृत्युदंड का मनामने ढंग से या या भेदभावपूर्ण तरीके या जानबूझकर अनुचित रूप से प्रयोग किया गया तो वह असंवैधानिक होगा परंतु यदि वह विवेकपूर्वक उचित ढंग से निष्पक्ष होकर लागू किया जाए तो यह निश्चित ही लोगों में आपराधिक न्याय प्रशासन की विश्वसनीयता और उसके प्रति आस्था में अभिवृद्धि ही करेगा ।



शुक्रवार, 29 मार्च 2013

कानून, सज़ा , माफ़ी और मीडिया ....आज का मुद्दा

चित्र गूगल से साभार



यदि गौर से देखें तो पाएंगे कि पिछले दो तीन वर्षों में सबसे ज्यादा चर्चा कानून के इर्द गिर्द ही घूमती रही है । चाहे वो कानून व्यवस्था की गिरती स्थिति के कारण हो या फ़िर किसी प्रस्तावित कानून पर छिडी बहस और जनांदोलन , मुद्दा हाल ही में देश को सिहरा देने वाले अपराध के एक आरोपी की कम उम्र और उसके समकक्ष नाबालिगों द्वारा किए जा रहे अपराधों को लेकर कानून में मौजूद उम्र सीमा को बढाया जाना हो या फ़िर ताज़ा ताज़ा मामला जिसमें सरकार ने सहमति से यौन संबंधों के लिए न्यूनतम उम्र सीमा को घटाए जाने का प्रस्ताव रखा और आम जनों की प्रतिक्रिया के बाद उसे दोबारा अठारह वर्ष कर दिया ,इसके साथ ही बिल्कुल समांनांतर चर्चा में रही -सज़ा, कभी आतंकियों को फ़ांसी पर लटकाने का मामला तो अब सिने अभिनेता संजय दत्त को सुनाई गई सज़ा और इनके ठीक बराबर चलता हुआ मीडिया , कुल मिला कर यही देखा जा रहा है कि फ़िलहाल देश में चर्चा , बहस मुद्दा इन्हीं विषयों के आसपास घूम रहा है।


इस देश का इतिहास गवाह रहा है कि , पश्विमी देशों की तरह यहां कानून बनाने , सुधारने और लागू करने से पहले शायद ही कभी आम लोगों को इसका भागीदार बनाया गया हो , और भागीदारी तो दूर कभी ठीक से उन्हें कानून की जानकारी तक नहीं दी जाती है , और इसकी जरूरत भी महसूस नहीं की जाती , वजहें चाहे जो भी रहती हों । शायद बहुत समय बाद किसी प्रस्तावित कानून के विरोध में न सिर्फ़ तीव्र प्रतिक्रिया हुई बल्कि जनांदोलन तक उठ गया , मगर हमेशा की तरह सत्ता और सियासत ने फ़िर से अपनी बाजीगरी दिखाते हुए जनभावनाओं को सिरे से नकार कर उस बहस की गुंजाईश ही खत्म कर दी ।

इसी बीच राजधानी में हुए एक जघन्य बलात्कार कांड ने फ़िर से अवाम को आंदोलित कर दिया और वो फ़िर से सडकों पर उतर आई , इस बार इस मांग के साथ कि इस अपराध के लिए बरसों से चले आ रही दंड व्यवस्था में फ़ेरबदल किया जाए और न सिर्फ़ बलात्कार बल्कि महिलाओं/युवतियों संग छेडछाड और उन पर तेज़ाब तक फ़ेंकने जैसे जघन्य अपराधों के लिए कानून बदलने और सज़ा को सख्त किया जाए । ये कानून अब सरकार द्वारा लागू कर दिया गया है , इसके परिणाम और प्रभावों का आकलन करना अभी जल्दबाज़ी होगी । हां इस बीच एक और कानून जुवेनाइल जस्टिस एक्ट जो नाबालिग अपराधियों व उनकी सज़ा के निर्धारण के लिए बना था उसमें नाबालिग अपराधी की उम्र जो कि वर्तमान में अठारह वर्ष से कम मानी जाती है उस पर भी बहस उठ खडी हुई । कारण ये रहा कि इसी बलात्कार कांड में सबसे हिंसक व क्रूर कृत्य करने वाले अपराधी ने खुद को नाबालिग माने जाने की अर्ज़ी लगा दी । महिला सुरक्षा को लेकर गठित जस्टिस वर्मा आयोग ने भी सभी प्रदेश के पुलिस अधिकारियों द्वारा अनुशंसित उम्र सोलह वर्ष को दरकिनार करते हुए इसे अठारह वर्ष रखने पर ही अपनी मुहर लगा दी । अधीनस्थ न्यायालय ने मौजूदा साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को नाबालिग ही माना और अब मामला ऊंची अदालत के विचाराधीन है ।

इधर कानून और सज़ा पर बहस चल रही थी ,जिसे और हवा दे दे एक के बाद एक लगातार दो आतंकियों को अचानक ही और अप्रत्याशित रूप से फ़ांसी की सज़ा दे देना । राष्ट्रपति तक इस पूरे प्रकरण से इतने परेशान हो उठे कि उन्होंने अचानक ही उनके पास भेजी गई अन्य दया याचिकाओं पर फ़िलहाल विचार करने में असहमति जता दी । सूचना के अधिकार का उपयोग कर किसी ने ये जानकारी ले कर सामने ला दी कि पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के कार्यकाल के दौरान किन्हें माफ़ी दी गई । इधर ये माफ़ा माफ़ी के सिलसिले में अब ये एक नया मसला भी जुड गया जब आजकल अपने तीक्ष्ण बयानों के लिए चर्चित पूर्व न्यायमूर्ति काटजू ने मुंबई हमले में सर्वोच्च न्यायालय से सज़ा सुनाए गए अभिनेता संजय दत्त एवं एक सह आरोपी महिला जेबुन्निसा के लिए माफ़ी का पत्र लिखने की वकालत की ।
मीडिया , विशेषकर भारतीय मीडिया बेहद प्रतिक्रियात्मक व्यवहार करता है , बिना आगा पीछा सोचे , किसी भी घटना , दुर्घटना , अपराध , सज़ा , फ़ैसले और बयान पर रोज़ चौबीसों घंटे प्रसारित होते रहने की मजबूरी वाले समाचार चैनल , जाने किस किस तरह के कार्यक्रम /रिपोर्टें/विश्लेषण और बहस आदि जनता के सामने लाते रहे और ये सब अब भी बदस्तूर जारी है । वास्तव में देखा जाए तो सबको आरोप के कटघरे में खडे करने की आदत से लाचार समाचार तंत्र इतनी भी संवेदनशीलता नहीं दिखा पाते हैं कि कभी ठहर कर ये सोचें कि उनके द्वारा प्रस्तुत और जैसा वे उसे प्रस्तुत करते हैं उसका क्या कैसा प्रभाव जनमानस पर पडेगा या पडा ।

देश में अपराध बढ रहे हैं , कानून भी खूब बन रहे हैं , सज़ा और माफ़ी की बहस के बीच जितनी जगह है उसमें मीडिया के लिए इतना स्थान तो आराम से निकल जाता है कि वे मज़े में बैठ कर कभी एक पक्ष से कभी विरोध पक्ष से और कभी दोनों ही ओर से लगातार अपना बाज़ार बडा करते रहें , खबरों का बाज़ार ।




रविवार, 25 दिसंबर 2011

सज़ा ए मौत : न सज़ा , न मौत




अभी हाल ही में आए कुछ अहम फ़ैसलों में अपराधियों को मौत की सज़ा सुनाई गई । इससे पहले  भी मौत की सज़ा मिले आरोपियों , जिनमें अजमल और अफ़ज़ल जैसे आतंकवादी भी हैं को फ़ांसी दिए जाने में हो रही देर ने फ़ांसी की सज़ा अर पुन: बहस छेड दी । इस बीच सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति का विचार इस सज़ा को मानवीयता के विरूद्ध मानने जैसा आया जिसने इस बहस को एक न्यायमूर्ति का विचार इस सज़ा को मानवीयता के विरूद्ध मानने जैसा आया जिसने इस बहस को एक नई दिशा दे दी ।

ऐसा नहीं है कि फ़ांसी की सज़ा पर पहले बहस-विमर्श नहीं हुआ है । अभी कुछ वर्षों पहले जब धनंज़य चटर्ज़ी नामक एक अपराधी , जिसने एक नाबालिग बच्ची का बलात्कार करने के बाद उसकी हत्या कर दी थी की सज़ा पर बोलते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम ने अपना विचार देते हुए कहा था कि फ़ांसी की सज़ा सिर्फ़ गरीबों को ही न मिले क्योंकि बडे और रसूखदार अपराधी कानून के शिकंज़े से बच निकलते हैं । उनके इस वक्त्यव्य के बाद एक्नई बहस की शुरूआत हो गई थी कि क्य अगरीब और अमीर के लिए कानून की परिभाषा अलग अलग है ।

इससे अलग अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायमूर्ति महोदय ने कैपिटल पनिश्मेंट यानि मौत की सज़ा अक पहुंचने से पहले के विधिक मानक यानि " रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर की परिभाषा को सर्वथा अस्पष्ट करार देते हुए इसे दुरूस्त करने की वकालत की । उन्होनें एक विधि विशेषज्ञ के रूप में  अपनी बात रखते हुए कहा किमौजूदा कानून में दुर्लभतम में से दुर्लभ " अपराध मानए व समझने के लिए कोई स्पष्ट दिशा निर्देश नहीं है इसलिए ये पूर्णतया उस न्यायाधीश के विवेक पर निरभर करता है । यही वजह है किकभी कभी निचली अदालतों द्वारा दी गई अधिकतम सज़ा को ऊपरी अदालतों ने बिल्कुल उलट दिया है ।

विश्व के अन्य प्रमुख देशों में भी मौत की सज़ा को लेकर सवर्था भिन्न भिन्न मत हैं । मानवाधिकारों कीवकालत और मानव जीवन की संरक्षा करने वाले देशों ने मौत की सज़ा को न सिर्फ़ अमानवीय करार दिया हुआ है बल्कि इसे पूरे अंतरराष्ट्रीय कानूनों से हटाने केल इए भी बाकायदा मुहिम छेड रखी है । यदि इतिहास को खंगाला जाए तो अब से लगभग ढाई हज़ार वर्ष पहले फ़ांसी की सज़ा को ईरान में अपनाए जाने के साक्ष्य मिलते हैं वो भी पुरूष अपराधियों के लिए । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक जब तक कि मौत की सज़ा के लिए ज़हर का इंजेक्शन या ऐसी ही किसी अन्य वैकल्पिक प्रणाली प्रचलन में  नहीं आई थी , फ़ांसी की सज़ा ही मुख्य तरीके के रूप में अपनाई जाती रही । आज भी मिस्र , भारत ,पाकिस्तान , मलेशिया , सिंगापुर तथा अमरीका के कुछ राज्यों में यह प्रचलित है ।

संसद पर हमले की दसवीं बरसी पर अफ़ज़ल गुरू की फ़ांसी की सज़ा के क्रियान्वयन में हो रही देरी ने पुन: इस्मुद्दे की ओर ध्यान खींचा है कि किसी अपराधी को मौइत की सज़ा सुनाए जाने और उसे इस सज़ा को दिए जाने के लिए क्या कोई समय सीमा तय होनी चाहिए । धनंजय चटर्ज़ी को सज़ा सुनाए जाने के लगभग डेढ दशक बाद उसे फ़ांसी पर लटकाए जाने के समय भी यही बात प्रमुखता से उछली थी । भारत की बहुस्तरीय न्यायिक व्यवस्था में अंतिम फ़ैसला आने में पहले ही बहुत अधिक विलंब होता है जबकि मौत की सज़ा पाए अपराधियों की अपील का निपटारा वरीयता के आधार पर पहले किया जाता है । अंतिम अदालती फ़ैसले केपश्चात भी मुजरिम के पास राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दाखिल करने का अधिकार होता है और यहीं से विधिक प्रक्रिया सियासी दांव पेंच में उलझ कर रह जाती है । न तो इन दया याचिकाओं के निपटारे की कोई समय सीमा निर्धारित होती है और न ही इन्हें लेकर कोई मापदंड या दिशानिर्देश तय है ।

इसका परिणाम ये होता है कि जेलों में उच्च सुविधा पाए ये अपराधी गुनाहगार होते हुए भी राजकीय मेहमानों सी सुख सुविधा का लाभ उठाते रहते हैं । सालों साल लटकता इनके सज़ा का क्रियान्वयन जहां एक तरफ़ सरकार व शासन पर भारी आर्थिक बोझ डालता है वहीं दूसरी तरफ़ सेनाव अन्य सुरक्षा बलों के मनोबल को भी बुरी तरह गिरा देता है । अफ़ज़ल गुरू व अज़मल कसाब जैसे दुर्दांत आतंकियों के मामलों में तो ये संभावना भी काफ़ी प्रवल रहती है कि इन्हें जेलों से छुडाने के लिए या बदलालेने के लिए इनके साथी इससे ज्यादा बडी आतंकी घटनाओं को अंज़ाम दें ।


वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सरकार व प्रशासन को इस मुद्दे पर दो बातों के लिए अपना रूख बिल्कुल स्पष्ट कर देना चाहिए । पहली बात ये किक्या मौजूदा कानूनी व्यवस्था में मौत की सज़ा देने न देने पर किसी तरह की बहस विमर्श की गुंजाईश है । यदि नहीं तो किस कारण से राज्य की विधानसभाएं अदालतों द्वारा दोषी करार दिए जाने और फ़ांसी की सज़ा सुनाए जाने के बाद उन अपराधियों को माफ़ किए जाने की मांग उठाती हैं । यदि उन मुज़रिमों कोमाफ़ी दिए जाने या न दिए जाने का अधिकार किसी को है तो वो हैं पीडित और उनका परिवार ।

दूसर अहम मुदा है फ़ांसी की सज़ा सुनाने से लेकर फ़ांसी की सज़ा दिए जाने के बीच के समय कोतय किया जाना । आज लगभग सौ अपराधी देश की भिन्न भिन्न अदालतों में मौत की सज़ा सुनाए जाने के बाद मौत की सज़ा कोपाने की प्रतीक्षा में हैं । सरकार प्रशासन व नीति निउअम तय करने वाली संस्थाओं को अविलंब ही इस दिशा में ठोस निर्णय लेना होगा अन्यथा पहले ही सज़ा का खौफ़ खत्म हो चुके अपराधियों के लिए ये बडी सहज़ सी स्थिति होगी और कानून ,न्यायपालिका ,सेना , पुलिस व सुरक्षा बलों के लिए विकट । फ़िलहाल तो पूरा देश अफ़ज़ल व अज़मल कोदेश के प्रति किए गए आपराधिक दु: साहस का दंड दिए जाने के लिए सरकार की ओर देख रहा है ।

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