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शुक्रवार, 14 मई 2010

फ़ांसी की सज़ा : कुछ उठते सवाल


पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल कसाब को हाल ही में दी गई फ़ांसी की सजा के बाद स्वाभाविक रूप से फ़ांसी की सज़ा को लेकर एक बार फ़िर से एक बहस उठ खडी हुई है । ये एक संयोग ही है कि अजमल को फ़ांसी की सजा सुनाए जाने के एक सप्ताह के अंदर ही निठारी कांड के आरोपी सुरेंद्र कोली को भी फ़ांसी की सजा सुनाई गई । इससे पहले एक बच्ची का बलात्कार और हत्या कर देने वाले धनंजय चटर्जी को मिली फ़ांसी की सजा के समय भी इस मुद्दे पर एक राष्ट्रव्यापी बहस शुरू हो गई थी । उस समय भी इस सजा को लेकर बहुत सारे बिंदुओं पर बहस तेज़ हुई थी । इनमें पहला तो था "कैपिटल पनिश्मेंट "यानि मौत की सजा के औचित्य पर ही । आज इस बदलते हुए समय में बहुत से देशों ने फ़ांसी की सजा का प्रावधान अपने यहां से हटा दिया है जिसका कारण ये दिया गया है कि अब आज के समय में किसी को किसी इंसान के जीवन को छीनने का अधिकार नहीं है । इस बहस में तत्कालीन राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम ने ये कह कर कि ," या तो फ़ांसी की सजा को पूर्णतया समाप्त कर देना चाहिए नहीं तो फ़िर ये सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इसमें सिर्फ़ गरीबों की गर्दन ही न फ़ंसे ।" कलाम के इस कथन के बाद एक बहुत बडी बहस उठ खडी हुई थी , मगर इन सबके बावजूद धनंजय चटर्जी को फ़ांसी देकर मौत की सजा दी गई ।


एक बार फ़िर से कसाब और कोली को फ़ांसी की सजा सुनाए जाने के बाद से ये मुद्दा फ़िर से गरमा गया है । मगर इस बार इस बहस का मुख्य बिंदु है इस सजा का अमलीकरण । दरअसल पिछले दिनों समाज में ऐसे ऐसे घृणित अपराध किए गए हैं जिसके लिए फ़ांसी से कमतर कोई भी सजा भारतीय कानून में नहीं है तो स्वाभाविक था कि फ़ांसी की सजा में वृद्धि हुई है । एक आंकडे के अनुसार देश में आज लगभग सत्तर अपराधी फ़ांसी की सज़ा पाकर अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं । मगर किसी न किसी वजह से इनके सजा को अमल में लाए जाने में देरी हो रही है । ये बात तब भी उठी थी जब धनंजय चटर्जी को अपने अंज़ाम तक पहुंचने में पूरे चौदह वर्ष लग गए थे । भारतीय कानूनी प्रक्रिया इतनी लंबी है कि ऐसे अपराधों और उनकी अंतिम फ़ैसला आने में आम फ़ैसलों से ज्यादा समय लगना वाजिब ही है । पहले निचली अदालत द्वारा सजा का सुनाया जाना , इसके बाद उस पर उच्च न्यायालय की सहमति का आवश्यक होना , इसके बाद अपील के रूप में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस सजा की पुष्टि करना । यदि न्यायालीय प्रक्रिया के सभी चरणों पर भी मुजरिम की सजा फ़ांसी ही रहती है तो इसके बाद राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर करने का विकल्प । इन सबमें सबसे बडी कमी जो अखरती है वो है कि इन सबके लिए कोई भी समय सीमा तय नहीं है । यही कारण है कि संसद पर आक्रमण का आरोपी ,अफ़जल गुरू सर्वोच्च न्यायालय से फ़ांसी की सजा पाने के बाद राष्ट्रपति के पास दया याचिका लगा कर निश्चिंत बैठा है । उधर बयान ये आ रहा है कि राष्ट्रपति के पास ऐसी कोई याचिका लंबित नहीं है जबकि सरकार कहती है कि अभी राष्ट्रपति की तरफ़ से कोई फ़ैसला नहीं आया है ।


इस बार तो इससे अलग एक और दिलचस्प बात सामने आई है , वो ये कि , यदि आज ही सभी लंबित मामलों का निपटारा हो भी जाए तो भी उन्हें फ़ांसी पर नहीं लटकाया जा सकता है , कारण है कि आज देश में जल्लाद के पद पर कोई भी व्यक्ति उपलब्ध नहीं है । धनंजय चटर्जी को फ़ांसी पर लटकाने वाले जल्लाद जो अब कहीं अनाम जिंदगी जी रहे हैं , उन्होंने इस पेशे को छोडते हुए यही कहा था कि पिछली पैंतालीस फ़ांसियों में उन्होंने आजतक किसी चर्बीदार गर्दन को फ़ांसी पर नहीं लटकाया , और इसका उन्हें अफ़सोस है । उनका ईशारा स्पष्ट था , जो कि राष्ट्रपति कलाम भी व्यक्त कर चुके थे ,पहले ही । हालांकि ये कोई बहुत बडा मुद्दा नहीं है जिसे हल न किया जा सके । सबसे अहम मसला ये है कि आखिर वो क्या वजह है कि सरकार को फ़ांसी की सजा पाए इतने सारे मुजरिमों को इतने दिनों तक संभाले रखना पड रहा है । एक और बहुत बडा मुद्दा ये भी है कि आखिर क्यों कभी भी कोई बडा भ्रष्टाचारी , राजनीतिज्ञ , देशद्रोही, धनवान आज तक फ़ांसी के फ़ंदे तक नहीं पहुंचा । तो क्या इसे इस तरह देखा जाए कि न्याय व्यवस्था में भी कहीं न कहीं कोई चूक तो हो ही जाती है ।



सबसे आखिर में एक ये प्रश्न कि क्या फ़ांसी की सजा उचित है ? क्या किसी को भी इश्वर प्रदत्त जीवन को छीनने का अधिकार है सच में ? आज जबकि बहुत से सभ्य देश इस सजा को अमानवीय कहते हुए इसे अपने यहां प्रतिबंधित कर दिया है तो क्या भारत को भी अपने यहां से इस सजा को हटा देना चाहिए ? वैसे भी जब इस सजा को सुना भर देने का ही प्रचलन सा बना हुआ है तो फ़िर क्यों नहीं उसे सिरे से हटा देना ही श्रेयस्कर है । मगर यदि इस सजा को हटा दिया जाएगा तो फ़िर निठारी के नर पिशाचों को , देश पर आक्रमण करके सैकडों मासूमों का कत्ल कर देने वालों को, मासूम अबोध बच्चियों को अपनी हवस का निशाना बना कर कत्ल कर देने वाले हज़ारों हैवान बन चुके इंसानों के लिए फ़िर आखिर वो कौन सी सजा हो जो उन्हें दी जा सके । जब मौत की सजा का प्रावधान होते हुए भी इन अपराधियों को कानून का लेशमात्र भी भय नहीं रहा है तो फ़िर इसके हट जाने से हालात क्या होंगे । ऐसे ही बहुत से प्रश्न हैं जिनका उत्तर , सरकार, प्रशासन , न्याय व्यवस्था और खुद समाज को भी ढूंढना है ।

6 टिप्‍पणियां:

  1. भैया मुझे तो नहीं लगता कि जैसे हालात हैं उनमे ये सजा प्रतिबंधित होनी चाहिए.. वर्ना कसाब ओर कोली जैसे लोग फिर सिर के ऊपर चढ़ कर नांचेंगे.. वैसे भी अभी कौन सा कम नाच रहे हैं..

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  2. प्रश्न बहुत से उठाये हैं....पर ऐसे कार्यों के लिए आखिर फिर क्या सजा होनी चाहिए? फांसी भी कम है...

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  3. हलांकि मैं भी मानता हूँ की फांसी अमानवीय सजा है ,लेकिन मेरे ख्याल से जिसने पूरी मानवता को ही शर्मसार किया हो ,जैसे भ्रष्ट मंत्री ,सांसद,विधायक,न्यायिक अधिकारी और प्रशासनिक अधिकारी पर यह विशेष रूप से जरूर लागु होना चाहिए /

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  4. अनेक प्रश्न है...बहुत विचारणीय और सोचने को मजबूर करती पोस्ट झा जी.

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  5. यह तो वाकई बड़ी सोचने वाली बात है...
    ______________
    पाखी की दुनिया में- 'जब अख़बार में हुई पाखी की चर्चा'

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  6. We have learned to drink anger, अगर आपके खून में उबाल हो तो उसे कोई नहीं पी सकता मगर ठंडा खून सब पियेंगे

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मुद्दों पर मैंने अपनी सोच तो सामने रख दी आपने पढ भी ली ....मगर आप जब तक बतायेंगे नहीं ..मैं जानूंगा कैसे कि ...आप क्या सोचते हैं उस बारे में..

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