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मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

राष्ट्रीय संघर्ष का वर्ष ......आज का मुद्दा








भारतीय इतिहास में यदि वर्ष २०११ को सिर्फ़ किसी खास वजह के लिए याद रखा जाएगा तो वो होगा अचानक उठे देशव्यापी जनांदोलन से बने राष्ट्रीय संघर्ष के जन्म वर्ष के रूप में । देश में आज़ादी के बाद लोकतंत्र में आम आदमी को अपने अधिकार और उससे लगातार वंचित किए जाने का एहसास तब हुआ जब अबसे कुछ साल [प्प्र्व आम जनता को सूचना का अधिकार हासिल हुआ । संयोग से ये वैश्विक राजनीति में चल रहे परिवर्तन के दौर का सहभागी बनते हुए देश के युवा,कुछ ईमानदार प्रशासक तथा व्यवस्था के सड गल चुकने के कारण क्षुब्ध हुए विशिष्ट विद्वानों ने समाज के लिए बनाए जा रहे कानूनों की पडताल कर दी ।

ये भारत के राजनीतिक इतिहास में पहली बार हो रहा था कि आम लोग किसी प्रस्तावित कानून , जो कि भ्रष्टाचार के विरूध लाया जा रहा था , के बारे में न सिर्फ़ पूछ और बता रहे थे बल्कि उसकी कमियां बता कर बेहतर विकल्प सामने लेकर खडे थे । देश की राजनीति जो पिछले एक दशक से लगभग दिशाहीन चल रही थी , जनता द्वारा सीधे-सीधे अपना अधिकार मांगने की नई प्रवृत्ति से बौखला कर दोषों को दूर करके जनता का विश्वास पाने के बदले बेशर्म , बेखौफ़ व बेलगाम सा व्यवहार करने लगीं ।

भारतीय मीडिया ने पिछले एक दशक का सफ़र बेहद तीव्र गति से तय किया । बेशक पेशेवराना अंदाज़ व स्वाभाविक जिम्मेदारी के अपेक्षित स्तर से पीछे रहने के बावजूद आज विश्व की आधुनिकतम सूचना तंत्र प्रणाली से कदम से कदम मिला कर चलता मीडिया अब काफ़ी प्रभावी बन चुका है । भारतीय जनमानस के बदलते तेवर और भीतर भरे आक्रोश को चेहरा देकर मीडिया  ने इसे विश्व सुर्खियों में ला दिया । यहां भारतीय लोकतंत्र बहुत से मायनों में खुशकिस्मत साबित हुआ । इसे प्रजातांत्रिक शासन की सफ़लता के लिए सबसे आवश्यक "न्याय की स्थापना " हेतु निष्पक्ष , निडर व काबिल न्यायपालिका का सरंक्षण मिला । भारत के आसपास पाकिस्तान , बांग्लादेश ,श्रीलंका
आदि देशों में राजनीतिक अस्थिरता ने फ़ौरन ही तानाशाही वर्दी शासन को न्यौता दे दिया ऐसे में बडे से बडे राजनीतिक संकट के समय भी भारतीय सैन्य बलों का तटस्थ व अनुशासित रह जाना एक बडी उपलब्धि से कम नहीं हैं ।

देश का हर वर्ग , हर विधा ,हर क्षेत्र ,शिक्षा , स्वास्थ्य , मनोरंजन आदि सब कुछ तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रहे है । आम आदमी अब पहले से ज्यादा जागरूक हो गया है । इसलिए अब राज्य को ये बात भली भांति समझनी चाहिए कि लोकतंत्र में सबसे अहम बात होती है लोकइच्छा । भारतीय राजनीति , राजनीतिज्ञों के भ्रष्ट आचरण व बेईमान नीयत के कारण अब तक के सबसे निम्न स्तर पर है । आए दिन राजनेताओं के साथ किया जाने वाला व्यवहार , अभिव्यक्ति देने वाले मंचों पर निकल रही भडास आदि को देखने के बाद आम जनता की मनोस्थिति का अंदाज़ा सहज़ हो जाता है ।

आज विदेशों में भारतीयों द्वारा छिपाकर रखे गए काले धन की वापसी का मुद्दा हो ,या भ्रष्टाचार से निपटने के लिए बनाए जा रहे किसी कानून को दुरूस्त करने का मुद्दा । महत्वपूर्ण पदों पर अयोग्य व भ्रष्ट व्यक्ति की नियुक्ति का मुद्दा हो या फ़िर तेज़ी से बढे घोटालों में खुद सरकार के मंत्रियों की भूमिका और ऐसे तमाम मुद्दों पर सरकार ने न सिर्फ़ गैर जिम्मेदाराना व्यवहार किया बल्कि कई बार वह अपना बचाव करते हुए तानाशाही स्वरूप अपनाती लगी । आज देश के चुने हुए जनप्रतिनिधि जो विचार , जो बहस जो तर्क संसद के भीतर उस कानून को कमज़ोर करने के लिए दे रहे हैं , जिसे भ्रष्टाचार को हटाने में सहायक माना जा रहा है , क्या वही तर्क देश की आम अवाम का भी है । यदि ऐसा है तो फ़िर पिछले तीन सौ पैंसठ दिनों में जाने कितनी ही बार उस कानून को बनाने की मांग को उठा कर सडकों पे आते रहे हैं ।


सत्ता और सरकार बेशक अपने अधिकारों के उपयोग -दुरूपयोग से जनता के प्रश्नों और उनकी मांगों को उलझाने के प्रयास में लगी रही हो । किंतु इतना तो तय है कि अब ये सवा अरब की जनसंख्या वाले समूह को हठात ही मूर्ख नहीं बनाया जा सकता । ऐसा नहीं है कि इस परिवर्तन के सब कुछ अनुकूल चल रहा है , बल्कि सच कहा जाए तो ये सब तक उस मिथक को तोडने में भी सफ़ल नहीं हो पाया है कि भारत में ये मानसिकता सिद्ध है कि देश से भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा सकता । लोकपाल-जनलोकपाल बिल का मुद्दा, कानून में बदलेगा या सत्ता और अवाम के बीच संघर्ष बिंदु बनेगा ये तो वक्त ही बताएगा । हां आज जिस तरह से भ्रष्टाचार के विरूद्ध आम लोगों ने अपनी क्षुब्धता ज़ाहिर की है उससे ये अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि आने वाले कानूनों को बनने-बनाने से पहले जनता अपनी कसौटी पर उसे परखेगी ।

देश के लिए ये बहुत संवेदनशील समय है । विश्व आर्थिक मंदी के चपेट में है । प्राकृति अस्थिरता और पर्यावरणीय असंतुलन के साथ आतंकवाद के सबसे खतरनाक स्तर तक पहुंचने की संभावना के बीच चुपचाप विकास की ओर बढते रहना , वैश्विक समुदाय की ईर्ष्या का कारण बनने के लिए पर्याप्त है । विपरीत परिस्थितियों व बुनियादी समस्याओं से दो चार होते रहने के बावजूद देश की जनता ने लोकतंत्र में विश्वास बनाए रखा है । पिछले दिनों महंगाई की बढती दर ने आम आदमी के आक्रोश को मुखर होने के लिए उकसा दिया । आम जनता के सामने आज सबसे बडी चुनौती यही है कि देश को चलाने के लिए और जनप्रतिनिधि कहां से , किसे लाए । भविष्य में देश की जनता को इसी तरह से हर कानून, हर अधिकार और हर नियम के लिए सरकार से भागीदारी करनी होगी , और गलतियों को सुधारना होगा ।

1 टिप्पणी:

  1. परिवर्तन हो न हो,इतना तो हमारा सौभाग्य रहा ही कि हम इस लहर के साक्षी बन रहे हैं।

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मुद्दों पर मैंने अपनी सोच तो सामने रख दी आपने पढ भी ली ....मगर आप जब तक बतायेंगे नहीं ..मैं जानूंगा कैसे कि ...आप क्या सोचते हैं उस बारे में..

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