रविवार, 28 नवंबर 2010

धौलाकुंआं रेप कांड पार्ट टू : वाह रे मीडिया यहां भी सीक्वेल का एंगल ढूंढ लिया .....jha ji ...smashed ...


चलिए कुछ दिनों के लिए मीडिया वालों को कुछ तो ऐसा मिला जिसे वे कुछ दिनों तक घसीट सकेंगे ...उसके बाद फ़िर ...अरे भाई जब पहले ही लिख दिया गया है कि धौलाकुंआं रेप कांड पार्ट टू ..तो फ़िर ये तो समझने वाली बात ही है न कि ..अभी तीन चार पांच का स्कोप बांकी है ......और हो भी क्यों न .रावण दहन के दिन कौन सा एक भी जीवित रावण हम फ़ूंक पाते हैं ..| यहां एक बात मेरी समझ में और नहीं आई कि ..ये हमेशा ही इज्जत आम आदमी की ही क्यों लुटती है ..कभी नहीं सुना कि पीएम सीएम के घर की किसी को कोई ले भागा .....तो क्या माना जाए ये कि ..उनकी इज्जत ही नहीं होती ..या कि लुटती ही नहीं ..इज्जत सिर्फ़ आम आदमी आम लडकी की ही होती है जो लुटती है ।


आज दिल्ली जैसे महानगर का कुल मिला कर जो हाल देखता हूं मुझे लगता है कि ...मानो इंतज़ार सिर्फ़ इस बात का होता है ...किसकी बारी आती कब है ...बांकी कुछ भी नया नहीं है । और यदि आप आम आदमी हैं तो आपके लिए इन घटनाओं , ऐसी बातों से रूबरू होने की संभावना ज्यादा बढ जाती है । बडे लोगों के लिए ऐसी घटनाओं में सिर्फ़ एक ही जिम्मेदारी होती है ..बस चिंता व्यक्त करते रहना है ...मंत्री नेता हैं तो फ़िर ये भी कोई जरूरी नहीं ...उलटा पीडिता पर ही आरोप लगाया जा सकता है । और छोटे मध्यम लोगों की नियति देखिए ..पहले स्कूल जाने वाले वैन में बिटिया , बहन सुरक्षित जा रही है यही पता नहीं ..स्कूल में जाने कौन कब किस तरह से अपनी हैवानियत के अधीन होकर शोषण का शिकार हो जाए । चलो स्कूल कॉलेज भी पार कर लिया ..अब नौकरी ...सफ़र ..बस ट्रेन मेट्रो ..कहां कहां तक और किस किस से बचा के रखा जाएगा ..इज्जत को । और फ़िर इस समाज में आज जो सबसे जल्दी चली जाती है वो है ..एक पीडिता की इज्जत ।

जब ऐसी घटनाओं के दोहराव को देखता हूं तो कई सारी बातें दिमाग में कौंधने लगती हैं ...सोचता हूं कि क्या दिल्ली की सी एम उतनी आसानी से वही सब तब बोल सकती थीं जब ऐसे ही किसी धौलेमौले कुंएं में ...किसी मंत्री नेता , अधिकारी किसी बडे उद्योगपति किसी खिलाडी , के घर की कोई बेटी होती ...न शायद तब इतनी बेशर्मी नहीं ला पातीं वें ..ये कहने के लिए कि लडकियां घर से निकलती ही क्यों हैं । एक और ऐसी बात मेरे मन में अक्सर इन घटनाओं को देख सुन कर जो हठात ही आती है वो ये कि ...आपको "जागो " पिक्चर याद है जिसमें पीडिता बालिका के माता पिता खुद ही बलात्कारियों का कत्ल कर देते हैं ...मानता हूं कि रील लाईफ़ और रीयल लाईफ़ में बहुत फ़र्क है ..मगर काश ...काश कि ये खबरें भी समानांतर ही चलती रहती कि ...अपनी आबरू को बचाने के लिए एक युवती ने ..एक गुंडे के सर पर ईंट मारी और वो मर गया ..या सीधे गोली ही मार दी ..और ऐसी ही कुछ खबरें लगातार आ जाएं ...आगे कानून और समाज करे ये कि ..उस युवती /बालिका को खूब सम्मान सहित ..सर आखों पर बिठा ले । यार फ़िर रुकिए रुकिए ..एक खबर और बनती है ..बलात्कारी बेटे को .बलात्कार के दोषी पति को ....मां ने या उसकी पत्नी ने गोली मार दी ..या खाने में जहर दे कर मार डाला ।ओह कब छपेंगीं ऐसी खबरें । मुझे दुख तो तब होता है जब पढता देखता सुनता हूं कि ...विश्व में सबसे अधिक शक्तिशाली कहे जाने वाले अमरीकी सेना की एक महिला सैनिक भी बलात्कार का शिकार हो जाती है ....नक्सलवाद में इंसाफ़ की लडाई के नाम पर साथ लड रही महिलाओं का भी दैहिक शोषण हो जाता है ...हद है ये तो ।

जहां तक इन बलात्कार के मुकदमें की बात है तो दुनिया की कोई अदालत ऐसी नहीं है जिसने बलात्कार पीडिता को इंसाफ़ दिलवाया हो ...हां बेशाक ये माना जा सकता है कि , कुछ दोषियों को सजा सुनाने की औपचारिकता तो जरूर ही निभाती रही हैं । अब भी निभा रही हैं , आज तक किसी भी अदालत ने जाने कोई ऐसा आदेश क्यों नहीं दिया कि उस हैवान बने हुए व्यक्ति को सरे आम उसके सारे अंग काट डाले जाएं ...या फ़िर कि ऐसी ही कोई सजा । स्थिति देखिए कि हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने प्रियदर्शनी मट्टू के बलात्कार एवं हत्या के दोषी को सिर्फ़ इसलिए मौत की सजा से बचा लिया क्योंकि वो शादी कर चुका था ...आखिर जो भी उस बलात्कारी की पत्नी बनने को राजी हुई ..क्या उस महिला का युवती का ये बलात्कार नहीं था ..था ये भी बलात्कार ही था और ऐसे जाने कितने बलात्कार हैं जो कानून की किसी भी परिभाषा और दफ़ाओं से परे हैं अब भी । तो जैसा कि मैं कह रहा था कि कानूनी प्रक्रिया तो ऐसी है कि ..पीडिता के मन में यही बात आती होगी कि ..............फ़ैसले से डर नहीं लगता साहेब ...मुकदमें से लगता है ....क्योंकि जब तक मुकदमा चलता है ...बलात्कार तो चलता ही रहता है ....। और कानून की परिधि के बाहर फ़िर सामाजिक बलात्कार , मानसिक बलात्कार ...ओह ...घिन्न आने लगती है इस समाज की सोच पर ।


एक और बात ग्रामीण परिवेश वाले अब भी एक दूसरे का माथा ..अपने खेत खलिहानों के लिए ही ज्यादा फ़ोडते नज़र आते हैं वे अब भी उतने आधुनिक और शिक्षित नहीं हो पाए हैं कि ...हर नारी देह को ..नोचने वाली वस्तु समझें ...इसलिए अब तक वहां ..ऐसे पार्ट वन पार्ट टू ...वाले हिट सीक्वेल की शुरूआत नहीं हुई है । अब रही बात मीडिया की ..मीडिया की हालत तो ऐसी है कि ...क्या कहा जाए ..जिस मीडिया को ये समझ नहीं कि जहां पर धौलाकुंआं रेप कांड पार्ट टू की बात हो रही है वहां चाहे अनचाहे ...कांड वन की भी बात हो ही जाएगी ...सोचिए जिस लडकी ने कितनी मुश्किलों से वो दौर भुलाने की कोशिश की होगी आज फ़िर वो उसी दोराहे पर होगी कि नहीं ...। वाह रे मीडिया ..। अब तो ऐसा लगता है कि अब हर बाप को सिखाना होगा कि ...जब भी ऐसी नौबत आए ..बिटिया ..गला काट देना ..उसका ..आगे फ़िर देखी जाएगी ...हो सकता तुम न भी बच पाओ ....मगर सोचो कि ...भविष्य में कितनी बच जाएंगी ....और मांओं को सिखाना होगा कि ..जब भी किसी ऐसे हैवान बेटे के बारे में पता चले ..उसे फ़ौरन से पेशतर मार दिया .जाए ..ये समझ कर कि एक जानवर पागल हो गया है ...

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

बेलगाम ,बेशर्म, और बेगैरत होते टीवी शोज़






अभी रिएल्टी शो बिग बॉस की अश्लीलता ,गाली गलौज वाली भाषा की बतकुच्चन , शादी और सुहागरात तक को तमाशे के रूप में प्रस्तुत करके दिखाने सजाने की प्रवृत्ति से भारतीय समाज सुशिक्षित हो ही रहा था कि अचानक एक और खबर ने सबको चौंका दिया । इंसाफ़ की आधुनिक देवी के रूप में टीवी द्वारा स्थापित की जा रही राखी सावंत जी ने कुछ ऐसा इंसाफ़ कर डाला कि इसमें प्रतिभागी के रूप में शामिल हुए लक्ष्मण सिंह ने आत्महत्या कर ली । हालांकि इससे पहले भी कई रिएल्टी और टैलेंट शोज़ में कभी जजों की टिप्पणियों तो कभी किसी और कारण से , इसमें भाग लेने वाले या संबंधित लोग कई तरह की मुसीबतों का सामना कर चुके हैं । किंतु हाल ही में कभी स्वंयवर के नाम पर , तो कभी इमोशनल अत्याचार के नाम पर , कभी इंसाफ़ के नाम पर तो कभी तमाशे के नाम पर भारतीय टेलिविजन पर जो कुछ परोसा जा रहा है वो आज एक आम आदमी को कई बातें सोचने पर मजबूर कर रहा है ।
लक्ष्मण सिंह जिसने इसी एपिसोड के बाद आत्मह्त्या कर ली

इस बहस को उठाते ही इसके विरूद्ध जो एक तर्क अक्सर दिया जाता है वो ये कि , ये जो कुछ भी टीवी में दिखाया जा रहा है , वो सब आज समाज में घट रहा है दूसरा ये कि लोग देख रहे हैं तभी तो दिखाया जा रहा है । फ़िर एक बात ये भी कि आज सिनेमा में भी तो ये सब खूब बढचढ कर दिखाया जा रहा है । ये सारे तर्क , सारी दलीलें सर्वथा खोखली और बकवास लगती हैं । समाज में ये सब हो रहा है ??आखिर किस समाज में ? क्या महानगरीय संस्कृति ही ..सिर्फ़ महानगरीय समाज ही पूरे देश के समाज का प्रतिनिधि समाज है ? तो फ़िर उनका क्या जो आबादी आज भी इन महानगरों से दूर ..कहीं बहुत पीछे छूटी बची हुई है ? और क्या महानगरीय समाज में यही सब कुछ हो रहा है । और क्या ये सब निर्विवाद रूप से स्थापित और मान्य है नगरीय समाज के बीच भी ? अब रही बात कि लोग देखते हैं इसलिए दिखाया जा रहा है । तो फ़िर यदि कल को लोग नग्नता की ओर बढेंगे , उसे देखना चाहेंगे तो क्या वही परोसा जाएगा ? क्या बाजारवाद को इस कदर हावी होने दिया जा सकता है कि उसके आगे सब कुछ गौण हो जाए , सब कुछ बौना साबित हो जाए ?? एक तर्क ये कि सिनेमा में भी तो दिखाया ही जा रहा है । सिनेमा आज भी घर घर में नहीं पहुंचा है ..और जब पहुंचता है तो चाहे अनचाहे उस पर वो कैंची चल ही चुकी होती है जो चल जानी चाहिए ।

सबसे बडा सवाल ये है कि , टीवी शोज़ , धारावाहिक , और चैनलों के लिए निर्धारित मापदंडों को देखने परखने और उन्हें नियंत्रित करने के लिए गठित बोर्डों , संस्थाओं आदि की भूमिका सिर्फ़ एक तमाशबीन की तरह क्यों बनी हुई है । ज्यादा हुआ तो इन कार्यक्रमों की समाप्ति के बाद उन्हें एक नोटिस थमा देना या फ़िर एक औपचारिक सा नोटिस थमा देना ही इतिश्री हो जाती है । आज बिग बॉस के घर में प्रतिभागियों द्वारा खुले आम अश्लीलता का प्रदर्शन , इमोशनल अत्याचार के वो अतरंग प्रसंग (हालांकि इस कार्यक्रम में तो फ़िर भी कई बार काट छांट कर दी जाती है ) किस समाज के लिए और कौन दिखा रहा है ...?? ये बात तय कर ली जानी चाहिए क्योंकि ये वही चैनल है जो अपने विभिन्न धारावाहिकों में समाज में व्याप्त बुराईयों को सामने लाने का दावा करता है । अभी ही ये समय है कि ये भी तय कर दिया जाए कि क्या इनकी कोई सीमा है .....या आने वाले समय में टीवी पर लोगों को आदि मानव ..अपने नग्न रूप में दिखाई देगा ???



शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

आईये जानें कि अदालत "रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर " मुकदमा किसे और कैसे मानती है .....अजय कुमार झा





(ये आलेख मेरे दूसरे ब्लॉग कोर्ट कचहरी पर भी प्रकाशित किया गया है , मगर आज का मुद्दा के पाठकों के लिए इसे यहां प्रकाशित कर रहा हूं )
अभी हाल ही में दो बडे अदालती फ़ैसलों ने आम लोगों का ध्यान फ़िर से अपनी ओर आकृष्ट किया ...या कहा जाए कि उन्हें इस कदर उद्वेलित किया कि वे खुल कर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं ..। जैसा कि स्वाभाविक है कि दोनों में ही अदालती फ़ैसले को अलग अलग मापदंडों , मानवीय भावनाओं , न्यायालीय संवेदनाओं और जाने कैसी कैसी कसौटी पर कसा जा रहा है । अयोध्या विवाद के फ़ैसले के अपने इतर तर्क हैं और इतर प्रभाव भी ....और सबसे बडी बात तो ये है कि अभी सर्वोच्च अपील का अधिकार भी बचा हुआ है दोनों की पक्षों के पास ...और फ़िर चूंकि मामला धर्म और आस्था से जुडा हुआ है इसलिए उस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया भी उसी अनुरूप आ रही हैं । हां जहां तक दूसर बडे फ़ैसले की बात है तो ...यदि सीधे सीधे सपाट तौर पर देखा जाए तो आम जन को जितना अधिक गुस्सा इस बात पर है कि अदालत ने प्रियदर्शनी मट्टू हत्याकांड के मुजरिम ..संतोष सिंह की ..फ़ांसी देकर मौत देने की सजा को कम करके ..उम्र कैद में बदल दिया ..उससे अधिक गुस्सा इस बात को लेकर है कि आखिर किन वजहों से अदालत ने इस मुकदमे को .."..दुर्लभतम में से दुर्लभ " की श्रेणी में क्यों नहीं रखा ???आम आदमी आज यही सवाल उठा रहा है कि ...जब कुछ वर्ष पहले ..सभवत: २००४ में ऐसे ही एक लिफ़्ट चलाने वाले ..अपराधी को बलात्कार के बाद हत्या के दोष में फ़ांसी की सजा दी गई थी ..तो इस मुकदमें में क्या संतोष सिंह को सिर्फ़ इस वजह से ..लाभ मिला है क्योंकि वो एक रसूखदार व्यक्ति (अब दिवंगत )का पुत्र है ...आखिर वो कौन से मापदंड हैं जिन्हें अपना कर अदालतें ये तय करती हैं कि अमुक मुकदमा ..दुर्लभतम में से दुर्लभ की श्रेणी में आता ..या नहीं आता है ।

कोई भी विमर्श करने से पहले दो बातें स्पष्ट कर देनी चाहिए .....। इस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए ..बहुत से व्यक्तियों ने एक ही बात बार बार उठाई कि ..आजीवन कारावास का मतलब तो ये हुआ कि ..चौदह वर्षों की कारावास ....और उसके बाद ..या ऐसे ही कुछ वर्षों के बाद ..जेल से रिहाई ....तो यहां ये स्पष्ट कर दिया जाए कि ..अभी पिछले ही वर्ष दिए गए अपने एक फ़ैसले में माननीय सर्वोच्च अदालत ने ..एक अपील की सुनवाई करते हुए .पूरी तरह से आजीवन कारावास को परिभाषित किया और बताया कि आजीवन कारावास का मतलब ..आजीवन कारावास ही होता है ....आजीवन यानि जीवन पर्यंत ..यानि कि जब तक मुजरिम जीवित है तब तक ....। दूसरी बात ये कि सर्वोच्च अदालत जब भी मौत की सजा वाली अपील पर सुनवाई करती है तो स्वाभाविक नियमानुसार ..इससे पहले ऐसे मामलों की सुनवाई और उनमें सुनाए गए फ़ैसलों मे स्थापित किए गए आदर्शों और मापदंडों को सामने रख कर जरूर परखती है ...और उसके अनुसार ही ..फ़ांसी की सजा देने के लिए .."दुर्लभतम में से भी दुर्लभ " माने गए मुकदमे को साबित करना होता है । हालांकि इसके लिए भारतीय कानून में कहीं कोई निश्चित नियम या उपबंध नहीं है और अदालत इसे स्वयं बहुत से आधारों पर परखती है ।एक अघोषित नियम ये होता है कि जब अदालत को ये महसूस कि मुजरिम को फ़ांसी या मौत से कम कोई भी सजा सुनाने से नाइंसाफ़ी की झलक दिखाई दे तो और सिर्फ़ तभी मौत की सजा सुनाई जानी चाहिए । आईये देखते हैं कि इस बिंदु पर अदालतें क्या कैसे सोचती हैं ..

अभी हाल ही १६.०९. २०१० को सुंदर सिंह बनाम उत्तरांचल सरकार मुकदमें में ऐसे ही एक फ़ांसी की अपील पर सुनवाई करते हुए न सिर्फ़ अदालत ने बहुत सी बातों पर रोशनी डाली बल्कि इसी के साथ ही मुजरिम की फ़ांसी की सजा को भी बरकरार रखा । अभियोजन पक्ष के अनुसार इस मुकदमे में , सुंदर सिंह नामक व्यक्ति ने पांच लोगों को एक घर में पेट्रोल छिडक कर आग लगा दी और बाहर से घर का दरवाजा बंद करके उन्हें जिंदा भून डाला इतना ही नहीं जब उनमें से एक व्यक्ति ने बाहर निकलने की कोशिश की तो उसने उसे दरवाजे के बाहर आते ही अपनी कुल्हाडी से काट कर मार डाला । अदालत ने इस मुकदमे के फ़ैसले पर पहुंचने से पहले इन बातों को सामने रखा । अदालत ने इसे क्रूरतम हत्या मानते हुए इसे" दुर्लभतम में से भी दुर्लभ " मानते हुए सुंदर सिंह की फ़ांसी की सजा को बहाल रखा ।अदालत ने "दुर्लभतम में से भी दुर्लभ "मुकदमों का उदाहरण देते हुए कहा कि , सर्वप्रथम ये मौत की सजा के लिए किसी मापदंड तय करने की बात ..मच्छी सिंह बनाम पंजाब सरकार , वाले मुकदमें में हुई थी । इस मुकदमे का फ़ैसला करते हुए अदालत ने कुछ बिंदु तय किए थे , जिन्हें अधिकतम सजा (मौत ) दिए जाने से पहले न्यायाधीश को परखना चाहिए । जब हत्या निहायत ही क्रूरतम तरीके से , छिप कर , बदला लेने के लिए ,और सिर्फ़ इस वजह से की गई हो कि समाज में उससे घृणा और द्वेष फ़ैल जाए तो वो अपराधी मौत की सजा का हकदार है । जब कोई हत्या नृशंस तरीके से , नीच और शैतानी उद्देश्य के लिए की गई हो । जब किसी निम्न जाति के किसी व्यक्ति की हत्या आपसी रंजिश के लिए न करके सिर्फ़ इस उद्देश्य से की गई हो कि उससे समाज में अशांति और द्वेष फ़ैल जाए तो ,जब अपराध बहुत ही वृहत हो बहुत ही भयानक हो ।अदालत ने कुछ इसी तरह के मापदंड , सुशील मुर्मू बनाम झारखंड राज्य , मामले में भी तय किए थे ।

इस उपरोक्त मुकदमे का फ़ैसला करते समय अदालत ने , धनंजय चटर्जी बनाम पश्चिम बंगाल सरकार, [1994 (2) SCC 220] और राजीव उर्फ़ रामचंद्र बनाम राजस्थान सरकार [1996 (2) SCC 175] का उदाहरण लेते हुए कहा कि , ये दोनों ही मामले दुर्लभतम में से भी दुर्लभ की श्रेणी में आते हैं । पहले में उस युवक ने , पहले तो १४ वर्ष की बच्ची को मार कर घायल कर दिया और फ़िर जब वो दम तोड रही थी तो उसके साथ बलात्कार किया ।दूसरे में मुजरिम ने , अपने तीन मासूम बच्चों और अपनी पत्नी जो कि कुछ ही समय के बाद मां बनने वाली थी की क्रूर हत्या कर दी थी । एक दिलचस्प मुकदमे का उदाहरण उत्तर प्रदेश सरकार बनाम धर्मेंद्र सिंह . [1999 (8) SCC 325], , जिसमें फ़ैसला दिया गया था कि , मुजरिम को फ़ांसी की सजा मिलने में हुई तीन वर्ष की देरी के कारण उसकी मौत की सजा को कम नहीं किया जा सकता और भविष्य में भी ये सजा कम करने के लिए कोई आधार नहीं हो सकता है , त्रिवेणी बेन बनाम गुजरात सरकार ,[1988 (4) SCC 574], ।

अब पहले बात ये कि आम लोग जैसा कि समझ समझा रहे हैं कि आखिर धनंजय चटर्जी और इस मुकदमें में आखिर वो कौन सा फ़र्क था जो कि अदालत ने संतोष सिंह की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया । अदालत ने अपराध की क्रूरता पर कहीं भी ऊंगली नहीं उठाई है न ही इस बात की तुलना की गई है कहीं भी कि , धनजंय चटर्जी वाले मुकदमे की तुलना में प्रियदर्शनी मट्टू हत्याकांड कम क्रूर था जबकि हकीकत यही है कि वो अधिक क्रूर थी । हां अदालत ने संतोष सिंह की ,सजा को कम करने के पीछे जो तर्क रखे वे कुछ इस तरह से हैं । जब निचली अदालत ने उसे बरी किया था तब वो पच्चीस वर्ष का युबक था , और उसके रिहा होने के बाद , उसने विवाह किया और आज वो एक होने वाले बच्चे का पिता बनने जा रहा है , तब से लेकर अब तक स्थितियां बहुत भिन्न हो चुकी हैं । अदालत ने उदाहरण स्वरूप राजीव गांधी हत्याकांड की मुख्य अभियुक्त और फ़ांसी की सजा मिल चुकी नलिनी की सजा को उम्र कैद में बदले जाने को भी उदाहरण में लेते हुए बताया कि , उस मुकदमे में , भी ये साबित हुआ है कि शिवरासन और ग्रुप ने एक औरत का फ़ायदा उठाते हुए पति द्वारा पत्नी पर बनाए गए दबाव को आधार बना कर नलिनी को इसके लिए फ़ंसा दिया था और अब जबकि उसकी कोख में एक नन्हीं सी जान पल रही है तो ऐसे में उसे मौत की सजा दे देना कहीं से भी ठीक नहीं होगा ।

उपरोक्त बहस का तात्पर्य यदि ये निकाला जाए कि , किसी भी मुकदमे को " दुर्लभतम में भी दुर्लभ " की श्रेणी में देखना और दिखाना ..हर मुकदमे के साथ और अदालत को उसे देखने पर ही निर्भर करता है ,...तो गलत नहीं होगा । किंतु ये भी नहीं भूलना चाहिए कि अदालतें अपने हर मुकदमे को कानून की कसौटी पर ही घिस कर उसके धार को परखती है । अभी भविष्य में ऐसे बहुत से मौके आएंगे जहां न सिर्फ़ अदालतों को फ़ैसले पर पहुंचने के बहुत ही मशक्क्त करनी होगी बल्कि उससे अधिक इस बात का ख्याल भी रखना होगा कि उसके फ़ैसले , उसके तर्क और सबसे बढ कर उसके नज़रिए से ...आम जनता भी इत्तेफ़ाक रखे । हालांकि ..बलात्कार जैसे घृणित अपराध के लिए तो ,...मौत से भी बदतर यदि कोई सजा हो तो वो ही मुकर्रर्र की जानी चाहिए ।


अगली पोस्ट का विषय :- ...क्या देश की राजधानी को दिल्ली से ,कहीं और ले जाने की जरूरत है ??

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

अदालत ने जिस फ़ैसले पर पहुंचने में लिए साठ साल ....उसे समझने में साठ मिनट का भी समय नहीं लिया गया .....अजय कुमार झा




आखिरकार वो घडी भी आ ही गई जिसके लिए ठीक वैसे ही देखा और दिखाया जा रहा था जैसे कि ये भी वो तथाकथित महाप्रलय वाली घडी के समान ही थी कुछ ..और देखिए कि वो बहुत ज्यादा प्रीतीक्षित न भी तो ..बहुत समय से लंबित फ़ैसला तो आ ही गया । ये फ़ैसला कोई आम फ़ैसला नहीं था , असल में तो ये विवाद या मुकदमा ही कोई आम मुकदमा या विवाद नहीं था ..और इससे भी उपयुक्त यदि ये कहा जाए कि ...ये विवाद या मुकदमा नहीं बल्कि ये मुद्दा था ...और जाहिर सी बात है कि आम मुद्दा नहीं था .....होता भी कैसे । आखिर ये देश की आस्था से जुडा हुआ सवाल था ..ये उस समुदाय के अराध्य से जुडा हुआ सवाल था ...जो संख्या के हिसाब से विश्व में गिना जाता है ....और शायद यही वजह रही कि ..इस मुकदमे के फ़ैसले को आते आते इतना बडा वक्त लगा कि आधी शताब्दी भी कम पड गई .... । लेकिन अब सवाल यही उठ रहा है कि ....क्या यही वो सबसे उपयुक्त फ़ैसला है जिसके लिए इतने वर्ष लिए गए ........क्या सचमुच ही इतना समय लेने के बाद अदालत ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया .........और क्या अब इस फ़ैसले से ..सचमुच ही कोई निर्णय ऐसा निकला है जिसे ..सही मायने में कहा जाएगा कि ..सारे विवाद का हल ही निकल आया ....।

इस फ़ैसले के आने के बाद ...एक आम आदमी ..यहां किसी भी धर्म संप्रदाय में बिना बांटे यदि एक आम आदमी की ही बात की जाए तो ....यही सोच रहा है कि ...आखिर न्यायालय ने किसे सही माना या किसे गलत माना ....।आम आदमी के सामने कुछ बातें तो बिल्कुल स्पष्ट हैं ....पहला ये कि अदालत भी आखिरकार वो फ़ैसला नहीं दे सकी जो दुविधा या विवाद को समाप्त कर सके । दूसरी बात ये कि ..इस फ़ैसले पर पहुंचने के लिए अदालत को साठ साल का समय लगा , यदि मोटे मोटे तौर पर देखा जाए तो अदालत ने बस कुछ बातें जरूर ही स्पष्ट कर दीं । पहली ये कि , वो विवादित भूमि नहीं है ......यदि नहीं है तो फ़िर क्या है ...जाहिर है कि ..रामलला की जन्मभूमि है ......। यहां एक बात पर विमर्श करना समीचीन लगता है कि .....आजकल अदालती फ़ैसलों पर तपाक से अपनी राय न सिर्फ़ राय बल्कि ..........सही गलत तक के स्तर तक की ...बहस को जन्म देने का जो एक चलन बनता जा रहा है ...उसने तो न्यायालीय फ़ैसलों को ही प्रश्नचिन्ह के प्रतीक के रूप में स्थापित कर दिया है । अभी भी समाज और साहित्य में अयोध्या विवाद से अधिक अयोध्या के इस फ़ैसले पर ही लिखा पढा जा रहा है ।

भारतीय न्यायपालिका ....बेशक बहुत ही धीमी .....बहुत ही अप्रायोगिक ..और कई बात बहुत ही ...क्रियाशील या अतिसक्रियता की शिकार लगती हो ......ये भी सही है कि पिछले कुछ समय में न्यायपालिका के अपने मापदंडों में ही गिरावट आने के कारण उसने खुद की साख भी खोई है ........मगर इसके बावजूद .........जी हां , इसके बावजूद भारतीय न्यायपालिका अब भी .....आम आदमी के विश्वास ...से पूर्णतया विमुख नहीं हुई है ....। बेशक आज के दौर में ......न्यायिक फ़ैसलों पर बहुत तरह के समीकरण की छाप देखी और दिखाई जाती हो .......बेशाक ये भी माना जा सकता है कि ...बहुत बार आम व्यक्ति को यही लगता है कि ..न्यायपालिका को ..दिखाने सुनाने के लिए अब बहुत अधिक शोर मचाना पडता है और जिसे देश का मीडिया बखूबी करता है .....मगर इन सबके बावजूद ये कतई नहीं माना जा सकता कि ..न्यायाधीश के ओहदे पर बैठा .....व्यक्ति ..आम आदमी की ही सोच और समझने की शक्ति रखता है .....निश्चित रूप से ..उसे मिली विधि की शिक्षा और उसका प्रयोगीकरण की शक्ति ...उसमें एक आम साधारण सोच से ऊपर रखती है । किंतु एक आम आदमी उसी फ़ैसले की चीडफ़ाड करते समय ये भूल जाता है कि ...वो फ़ैसला उसके लिए ....महज एक किस्से का ब्यौरा देने भर जैसा है ..जबकि अधिवक्ताओं और न्यायाधीश की संयुक्त टीम के लिए कानून के हर हर्फ़ को पकड कर.....उसे न्यायतुला पर भलीभांति तौलमाप करके ..एक ऐसा निर्णय लेना होता है ..जो सच में ही फ़ैसले जैसा लगे । .यहां ये नहीं भूलना चाहिए कि ..भारतीय न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण सूत्र है कि , न्याय सिर्फ़ होना नहीं चाहिए ..बल्कि न्याय हुआ है .,.ऐसा महसूस भी होना चाहिए ।

अदालत ने आज के इस दौर में भी जब कि खुद न्यायपालिका ने अपनी रफ़्तार को गति देने के लिए जाने कितनी ही मह्त्वाकांक्षी योजनाएं चला रखी हैं ..एक एक मुकदमे पर ...खासकर ..पुराने मुकदमों पर बारीकी से नज़र रखी जा रही है ..क्योंकि अब उसे मीडिया के साथ साथ आम समाज भी ये एहसास दिला रहा है कि .यदि इतना विलंबित न्याय ही देना है तो फ़िर ...ये भी अन्याय समान ही है....ऐसी स्थिति में भी यदि अदालत को किसी फ़ैसले पर पहुंचने में साठ साल का लंबा समय लग गया तो इतना तो मानना ही पडेगा कि ..कहीं न कहीं कमी या चूक तो हुई है ।

मगर अब जबकि अदालत ने अपना फ़ैसला सुना दिया है तो फ़िर ....कभी राम के नाम पर , तो कभी वाम के नाम पर , और कभी आम (आदमी ) के नाम पर ..इस तरह की चिल्ल पों क्यों मचाई जा रही है । शायद उनके लिए तो ये किसी सदमे से कम नहीं है जो ये सोच के बैठे थे कि फ़ैसले के बाद एक बार फ़िर से कोई अंधी लडाई शुरू हो जाएगी ....और उस आड ने जाने कैसी कैसी राजनीति बनाई और बिगाडने का खेल चल निकलेगा । अदालत ने ठीक उलटा कर दिया सारा का सारा माजरा । होना तो ये चाहिए था कि ..जो लोग शिला पूजन के लिए , उस बाबरी मस्जिद ( मुझे एक आम आदमी के रूप में ये कहने में तनिक भी झिझक नहीं है कि वो बाबरी मस्जिद जो कि यकीनन एक मंदिर को तोड कर बनाई गई थी ) को ढहाने वाले लोगों को बिना विलंब के ही राम मंदिर का निर्माण शुरू कर देना चाहिए । आखिर इस बात की प्रतीक्षा ही क्यों की जाए ..कि ये सारा मामला एक बार फ़िर सर्वोच्च अदालत में फ़ैसले के लिए टुकुर टुकुर ताकने की परिणति तक पहुंचेगा । आखिर अभी तो कोई रोक नहीं है न ..।

इस अदालती फ़ैसले के प्रतिक्रियात्मक लेखों विचारों में एक बात बार बार निकल कर आ रही है कि , अदालत ने निर्णय विवाद से परे जा कर दिया ..और वो नहीं कहा जो उसे कहना चाहिए था ..बल्कि एक अन्य निर्णय ले लिया ..जो कि गलत है । तो क्या करना चाहिए था अदालत को .....?????सिर्फ़ ये भर कह देना कि अदालत को ऐसा नहीं करना चाहिए था ....से इतिश्री नहीं की जा सकती इस मामले की । आखिर इतने बरसों तक कानूनविदों की पूरी जमात जो बात समझने की कोशिश करती रही ..उसे कैसे चुटकियों में ..कुछ प्रतिक्रियात्मक लोगों ने समझ लिया ....मानो बच्चों का खेल था सब कुछ बेकार ही इतना समय लिया गया ..और यदि उन्हें मौका दिया गया होता तो वे कब का दूध का दूध और पानी का पानी कर चुके होते । हालांकि अब भी कौन सा समय निकल गया है ..अब भी अपीलीय अदालत में उन सभी को अपनी ये दलीलें , ये खोखले और भडकीले तर्क रखने का पूरा मौका दिया जाएगा ..मगर उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए कि ..उस अदालत में फ़ैसला सुनाने वाले भी उन्हीं भारतीय कानूनों की व्याख्या करते हैं जो कानून की किताब निचली अदालतों ने देखी पढी होती हैं । ये तो आने वाला समय ही तय करेगा कि अभी इस मुद्दे को कितने और समय के लिए विवाद का अभिशाप झेलना लिखा है । मगर आज यदि इतनी निर्भीकता से और कई बार तो दुस्साहसिक होकर ...कभी भी कहीं भी न सिर्फ़ राम बल्कि हिंदू आस्था को कटघरे में रख कर खडे हो जाते हैं तो वो सिर्फ़ दो कारणों से है ..एक तो भारत सरकार के किन्नरी व्यक्तित्व के कारण ...और दूसरा इतना हो जाने के बावजूद भी हिंदू का कट्टरता को उस चरम को नहीं छू पाना जो अन्य समकालीनों ने अपना रखा है । और उन्हें ये भलीभांति समझ जाना चाहिए कि ..ऐसा सिर्फ़ और सिर्फ़ इस देश में ही संभव है ..........न हो तो अपनी आखें पसार के इसे देख और महसूस कर सकते हैं ..यदि वास्तव में करना चाहें तो ।



रविवार, 19 सितंबर 2010

देश से बडा एक मुद्दा : अयोध्या ...अपरिचित और अनिश्चित .........





आखिरकार पूरे साठ साल बाद वो दिन आ ही गया .....जब देश की अदालत ....जिसके लिए कहते हैं ...देर भले हो , मगर यकीनन अंधेर नहीं है ..ये तय करेगी कि ...देश के अराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम ....भरत वंशज ....और अयोध्या नाम की प्राचीन नगरी के शासक
श्री रामचंद्र की जनम्भूमि का स्थान वही है ........जो आज विवादित क्षेत्र/स्थान कहला रहा है .......। या फ़िर कि ये ...कि जिस स्थान की निश्चितता को लेकर उठे संशय ....को एक अपमान मान कर देश का आम हिंदू.......ध्यान रहे कि यहां आम हिंदू ही कहा गया है ......कभी अपनी इज्जत , कभी अपनी संपत्ति और कभी अपनी जान को दांव पर लगाता रहा ......वो दरअसल ...वो नहीं थी । इसके अलावा एक बडा प्रश्न ये भी है कि .......फ़िर तो नए सिरे से ......और इस बार इंसान को अपने भगवान के लिए उनका आश्रयस्थल ढूंढना पडेगा ...और जो इंसान अपने जीवन भर अपना ही घर तलाशने से फ़ुर्सत नहीं पाता...वो बेचारा भगवान का घर क्या खाक तलाश पाएगा ????

एक आम आदमी के रूप में यदि सोचा जाए तो फ़िर आज इस मोड पे ...जो कुछ बातें उसके मन में आ रही हैं ..उनमें से कुछ ये बातें हैं.........पहली बात तो ये कि , आखिर सिर्फ़ पिछले साठ सालों पहले ही ये विवाद क्यों उठ खडा हुआ ...उससे पहले के दो सौ साल से अधिक के मुस्लिम शासन में वो कौन सी स्थिति थी ऐसी कि , जिसकी प्रमाणिकता अचानक ही संशय में पड गई .....। चलिए ये भी माना कि शायद ये मामला वाकई ऐसा था कि बिना विधिक स्थिति का पता लगाए निर्णय लेना मुश्किल था ..और इसलिए इसे अदालत तक ले जाना पडा........किंतु तब क्या राज्य की ये जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि जिस एक बात से देश के बडे जनमानस की भावना प्रभावित थी .....उस विवाद को समयबद्ध करके उसके अंतिम फ़ैसले तक पहुंच जाने की सुनिश्चितता तय करे ......। पांच दस . बीस या पचास वर्ष नहीं बल्कि पूरे साठ बरस तक ...ये मामला चलता रहा । यहां एक आम आदमी ये भी सोच रहा है कि ...बात बेबात स्वंय संज्ञान ले लेने वाली अदालत आखिरकार साठ बरस तक इस मुकदमे को क्यों सुलझाती रही ।एक आम आदमी ये भी सोच रहा है ..कि आज आजादी के साठ बरसों के बाद भी देश जहां एक तरफ़ .....गरीबी , अशिक्षा, बेरोजगारी , महंगाई , जैसी शाश्वत समस्याओं से जूझ रहा है ..वहां क्या वाकई ये सच में ही इतना जरूरी मुद्दा है कि जिसके फ़ैसले के बगैरे ...देश का आगे पीछे बढना तय नहीं हो पाएगा ॥

जहां तक आम आदमी के अयोध्या से जुडे होने का प्रश्न है तो ..शायद बहुतों को तो इस मुद्दे का ध्यान ही तभी आया है जब मीडिया में खबर आई है कि ..इस मुकदमे का फ़ैसला अब आने वाला है ....इससे पहले और न ही शायद इसके बाद एक आम आदमी की किसी भी स्थिति पर कोई फ़र्क पडने वाला है । इतना समय बीत जाने के बाद अब कुछ बातें तो स्पष्ट ही तय हैं कि ....इस मुकदमे को जानबूझ कर इतने समय तक काल के गर्त में दफ़न रहने दिया गया । पिछली आधी शताब्दी में आई कोई भी सरकार इतनी हिम्मत नहीं जुटा सकी कि , वो अपनी सत्ता के मोह और वोट बैंक के लालच से बाहर निकल कर इस अयोध्या मसले को निपटा सकी । एक और बडा प्रश्न ये भी है , जो जाने अनजाने सोचा नहीं जा सका है वो ये कि , आखिर क्या वजह रही कि अब जबकि साठ वर्षों तक इस मुकदमे में कोई निर्णय नहीं ले पाने वाली अदालत ये जानते हुए कि इस फ़ैसले के परिणाम कुछ इस तरह से नकारात्मक भी आ सकते हैं कि वो आने वाले राष्ट्रमंडल खेलों को भी प्रभावित कर सकते हैं , तो फ़िर इस फ़ैसले के लिए यही समय क्यों चुना गया । और सबसे बडी बात ये कि , अभी ये फ़ैसला शीर्ष अदालत का नहीं है । यानि अभी तो इस बात की पूरी गुंजाईश है कि अपीलीय अदालत भी इस मुद्दे को अच्छी तरह जांचे परखे ...........तो ऐसे में ये अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि ..अभी इस मुद्दे को भुनाने की कितनी संभावनाएं बची हुई हैं ॥

इस मुकदमे का फ़ैसला चाहे जो भी आए ....इतना तय है कि देश में आज धर्म के नाम इस तरह के प्रपंच और प्रौपगैंडे के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है यदि उसे इसी तरह से चलते रहने दिया जाए तो ..फ़िर आने वाले समय में यदि भारत के बीच भी इस्राइल और फ़िलिस्तीन भी देखने को मिल ही जाएंगे । एक उससे भी अहम बात ये कि ..आखिर कब तक देश का एक बडा वर्ग ..यानि कि हिंदू समुदाय अपने धर्म ..अपने अराध्य , अपने धर्मस्थानों , अपने उत्सवों को ये सोच सोच कर और नाप तौल के मानता/मनाता रहेगा कि कहीं जाने अनजाने वो धर्मनिरपेक्षता के तथाकथित उस दायरे को पार न कर जाए , जिसकी समझ एक आम आदमी को कभी भी नहीं हो पाई है

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

कॉमन...... वेल्थ...... गेम्स .........माने ...पैसों का सामान्य सा खेल



अब जबकि वो महान क्षण बस आने ही वाला है ........जिसके लिए न जाने कब से ....एक भारतीय तरस रहा था ...........जाने कब से सभी भारतीय इसी सुनहरे स्वप्न को देखते हुए बड़े हुए ..........कि एक बार ....बस एक बार ....भारत में भी कॉमन वेल्थ गेम्स हो सके ........... और हो भी क्यों न ......आखिर पूरा देश ...एक से एक बेहतरीन खिलाड़ियों से भरा पड़ा है .......जाने कितने ही खिलाड़ियों को इसी खेल के कारण .....देश में , अच्छी नौकरी , रुतबा .......और मान सम्मान मिला है .......तो उस देश में तो फिर एसे अंतर राष्ट्रीय खेल आयोजन के लिए सब तड़प ही रहे होंगे .........हाँ ये तो स्वाभाविक ही है ..........क्या कहा आपने मैं ...बकवास कर रहा हूँ ......यहाँ आम आदमी तो आम आदमी .....किसी गैरो-ख़ास को भी ऐसी कोई अनुभूति नहीं हुई है आयं.......तो फिर आखिर ऐसा ...बताया , सम्झायाया और दिखाया क्यों जा रहा है कि ..कॉमन वेल्थ गेम्स .......का आयोजन भारत की तकदीर बदलने वाला कोई ऐतिहासिक मुकाम होगा

इन दिनों राजधानी दिल्ली का , बारिश की धुलाई , बाढ़ की रफ़्तार , गन्दगी के ढेर , ट्रैफिक जाम की समस्या और भी बहुत सारी खूबियों ने कुल मिला कर ऐसा हाल कर दिया है जैसे उजड़े चमन में घूमता हुआ मजनू..........इस खेल के आयोजन की आड़ में विकास के नाम पर , इन खेलों से जुडी तैयारियों के नाम पर , और दिल्ली को संवारने के नाम पर जो खेल खेला गया है ...उसे देख कर तो सब इस कॉमन वेल्थ खेलों का सीधा सीधा मतलब यही निकाल रहे हैं ..कि ..ये पैसों का सामान्य सा खेल है ..जिसे खेलना ...यहाँ भारत के राजनीतिज्ञों , अफसरशाही को , भ्रष्ट अधिकारियों और सबसे बढ़ कर कर्मचारियों ..बखूबी आता है वैसे इस लिहाज़ तो तो हमें कॉमन वेल्थ के आयोजन के सर्वाधिक उपयुक्त माना गया तो इसमें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए

अभी पिछले दिनों जब , थ्री इडियट्स ...फेम ...चेतन भगत ने कह दिया था कि , यही मौक़ा है कि आम भारतीयों को इन खेलों का सार्वजनिक बहिष्कार करके ...अपने इन बेईमान नेताओं को सबक सिखाना चाहिए , मगर कुछ लोगों को उनका ये विचार पसन् नहीं आया उन्होंने अपनी अपील आम लोगों से की थी , मगर सवाल ये है कि , आखिर आम आदमी को इन खेलों से सचमुच ही कोई सरोकार है भी चलिए माना कि राजधानी दिल्ली के लोगों को तो चाहते न चाहते हुए भी इन खेलों को अपने जेहन में बसा कर रखना होगा और वे रख भी रहे हैं मगर इस राजधानी के बाहर जो आम भारतीय है , क्या सचमुच उसे है कोई मतलब इन खेलों से , एसे किसी भी अंतर्राष्ट्रीय कहल आयोजन से जब मैं अमिताभ बच्चन जी को इन कॉमन वेल्थ खेलों की बजाय , टी ट्वेंटी का प्रचार करते हुए देखता हूँ ......तो सोचता हूँ कि , लो महानायक तो किसी और ही लीला में लगे हुए हैं , तो फिर ऐसे में , आम नायकों का तो कहना ही क्या ????

अब खिलाड़ियों की बात भी करें , तो पिछले दिनों डोपिंग विवाद में फंस कर , बहुत कुछ सन्देश तो दे ही दिया है उन्होंने रही सही कसर देश के कई बड़े खिलाडियों इन इन खेलों से अपना नाम वापस लेने की घोषणा से पूरा कर दिया है ...........तो हे देश वासियों इन खेलों के लिए आपने हमने सिर्फ ये ही तैयारी करनी है कि ..प्रार्थना करें कि उन दिनों ..कोई अप्रिय घटना न हो ..... जीतने के लिए पदक मिले न मिले ...........चलने के लिए सड़क मिले न मिले .....मगर नेताओं , अधिकारिओं को भरने के लिए गुल्लक जरूर मिल जायेगी .......

शनिवार, 26 जून 2010

औनर किलिंग : एक विश्लेषण





इन दिनों देश के विभिन्न भागों लगातार घटती घटनाओं/हत्यायों के दौर ने एक बार फ़िर से औनर किलिंग को एक मुद्दे के रूप में सामने रख दिया है । इस बार ये घटनाएं इतनी तेजी से एक साथ घटी हैं कि इस बार ये किसी राज्य , क्षेत्र , और जाति के दायरे से बाहर निकल राष्ट्रीय स्तर पर बहस और समस्या के रूप में चिन्हित की जा रही हैं । न्यायपालिका ने भी इन घटनाओं पर स्वत: संज्ञान ले कर कई राज्य सरकारों से इस बाबत रिपोर्ट तलब की है । भारत में अब तक जितने भी मामले औनर किलिंग के नाम पर चर्चित और विवादित हुए हैं , उनमें से अधिकांश प्रेम और वो भी अंतर्जातीय प्रेम विवाह आदि के इर्द गिर्द ही घूमते से हैं । जबकि वैश्विक परिदृश्य में ऐसा नहीं है ।

औनर किलिंग का मतलब सीधे सीधे अर्थों मे ये है कि , वैसे अपराध और विशेषकर हत्या , जो परिवार की इज्जत प्रतिष्ठा को बचाए रखने के नाम पर की जाती है ।किंतु भारत में ये घटनाएं ज्यादातर प्रेम विवाह और वो भी किसी गैर धर्म मजहब में या किसी अन्य जाति में किए जाने के फ़ैसले के विरोध में ही दिखती हैं । विश्व में जहां कहीं भी औनर किलिंग के नाम पर ऐसी घटनाएं देखी जा रही हैं उनमें कहीं भी ये कारण तो कतई नहीं दिखता है । वैश्विक परिदृश्य में औनर किलिंग के सबसे ज्यादा मामले , अवैध यौन संबंधों को छिपाने के लिए , नाज़ायज़ रिश्तों को छुपाने के लिए , समलैंगिक रिश्तों के सच को छुपाने के लिए , और कट्टर मुस्लिम देशों में धार्मिक प्रतिबंधों को न मानने के विरूद्ध देखने सुनने में आते हैं । और पश्चिमी देशों में जहां से ये औनर किलिंग की प्रथा का चलन शुरू हुआ है वहां भी सबसे ज्यादा मामले इन नाज़ायज़ या विवाहेत्तर संबंधों के कारण ही हुए और हो रहे हैं । जबकि भारत में सबसे अधिक मामले प्रेम विवाह के से ही जुडे हुए हैं ।

भारत में औनर किलिंग सबसे ज्यादा चर्चित हुआ आरूषि मर्डर केस में , जिसमें आरूषि नाम की बालिका की हत्या रात के ढाई तीन बजे के बीच हुई और कहा, बताया गया कि बच्ची की हत्या उसके माता पिता ने की है जो अपने किसी ऐसे ही अवैध रिश्ते के राज खुलने के डर से किया गया है । मगर बाद में जाकर इस पूरे मामले में कुछ भी साबित नहीं हुआ ,और देश की सबसे बडी जांच एजेंसी सीबीआई के हाथों में मामला सौंपने के बावजूद आजतक कुछ भी हासिल नहीं हुआ किसी को । किंतु इसके बाद तो जैसे ये मामले बढते ही चले और दिनोंदिन इनकी रफ़्तार बढती ही जा रही है ।खाप पंचायतों द्वारा सुनाए जाने वाले फ़ैसलों में प्रेमी युगलों को मार दिए जाने की घटना , झारखंड का पत्रकार निरूपमा कांड ,और अब सामने आए ये नए मामले । हालांकि ऐसा नहीं है कि इन मामलों में अचानक ही वृद्धि हो गई है , असल में तो भारत की सामाजिक सरंचना में जाति ,धर्म, भाषा आदि जैसे तत्व जबसे हैं तभी से उनके नाम पर सम्मान, प्रतिष्ठा बचाए रखने के लिए जान लेने देने की परंपरा भी रही है । इतिहास भी इस बात का गवाह रहा है ।

अब तो ऐसा लगता है कि जितना ज्यादा इन घटनाओं की चर्चा हो रही है उससे दोगुनी रफ़्तार से ये घटनाएं बढती जा रही हैं । यही कारण है कि इस बार इन घटनाओं ने सरकार और संबंधित संस्थाओं का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है । अब बात की जा रही है कि औनर किलिंग की बढती घटनाओं को रोकने के लिए कठोर कानून बनाए जाएंगे । लेकिन समाजविज्ञानी इसे नाकाफ़ी और सही नहीं मानते । उनका मानना है कि कत्ल जैसे अपराध के लिए तो पहले से ही कठोरतम सजाओं का प्रावधान है । इसलिए आज जरूरत है कि समाज को इसके लिए मानसिक रूप से तैयार किया जाए । हालांकि इसके लिए समाज विज्ञानी भारतीय समाज के विरोधाभासी चरित्र और स्वरूप को बहुत जिम्मेदार मानते हैं । एक तरफ़ तो सरकार जातियों का स्पष्ट विभाजन तय करती है , उन्हें आरक्षण आदि के नाम पर एक दूसरे से काफ़ी दूर करती है , दूसरी तरफ़, प्रेम से आदि से आगे जाकर , लिव इन रिलेशनशिप, और समलैंगिकता तक को मान्यता देने की कोशिश की जा रही है । ऐसे में तो इस तरह के परिणाम आना अपेक्षित ही हैं । समाज में अशिक्षा का प्रतिशत , और कानून का खत्म होता डर भी इन सबको बढाने के लिए जिम्मेदार है । अब देखना तो ये है कि आखिर ये औनर किलिंग की वेदी पर अभी और कितनी बलियां और दी जाएंगी ॥
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