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सोमवार, 21 नवंबर 2011

मानवीय त्रासदी : एक नियमित नियति












राजधानी दिल्ली के पूर्वी क्षेत्र की कॉलोनी नंद नगरी में किन्नरों के एक सम्मेलन में अचानक्भडकी आग ( जिसे प्रारंभिक जांच में शार्ट सर्किट से अल्गी आग माना जा रहा है ) ने पंद्रह किन्नरों की बलि ले ली । लगभग सौ किन्नर अब भी जले -झुलसे हुए विभिन्न अस्पतालों में अपना ईलाज कर रहे हैं । इस तरह की मानवीय त्रासदी और उसमें आम लोगों की मौत अब एक नियमित नियति सी बन कर रह गई है । अभी चंद दिनों पहले ही हरिद्वार के कुंभ में इसी तरह की एक मानवीय त्रासदी से कई निर्दोष लोगों की जान गई थी । 


कुछ समय के अंतराल पर बार बार होते घटते ये हादसे दो बातें तो बिल्कुल स्पष्ट कर देते हैं । पहली बात ये कि सरकार व प्रशासन की नज़र में आम आदमी के जीवन मौत की कोई कीमत नहीं है और शायद यही वजह है कि इतने हादसों के बावजूद भी आज तक सरकार की आपदा प्रबंध्न नीति लगभग नगण्य है । 


यदि मौजूदा घटना का ही संदर्भ लें तो अधिकतम एक हज़ार व्यक्तियों के लिए बने सामुदायिक भवन में पाम्च हज़ार लोगों का जमावडा हो जाता है । पुलिस कहतीह ै कि ऐसे आयोजनों के लिए अपेक्षित अनुमति व सुर्क्षा उपाय जांच कर लिए गए थे । जबकि अग्निशमन विभाग ठीक उलट दोषारोपण करते हुए कहता है कि न तो अग्निशमन विभाग से वांछित अनुमति ली गई थी और सुरक्षा उपायों की भी गंभीर अनदेखी की गई ।  

सरकार व प्रशासन हमेशा की तरह जांच बिठाने व मुआवजा घोषित करने की औपचारिकता निभा कर पुन: अगली त्रासदी तक चुप बैठ जाएगा । जहां तक आम लोगों की बात है तो सबसे विकट प्रश्न यही है कि जब आम आदमी ही इसका शिकार होता है , और इन तमाम त्रासदियों के बाद रोता बिलखता बचता भी आम आदमी ही है तो क्या इससे बेहतर ये नहीं है कि जहां तक संभव हो वो खुद इसका कारण बनने से बचे । ऐसी घटनाओं में अक्सर ही भगदड में मरने घायल होने वालों में महिलाएं और मासूम बच्चे ही होते हैं । क्या ये जरूरी है कि आयोजन स्थल पर भीड की संभावना अपेक्षित होने के बावजूद बच्चों को वहां ले जाया जाए । आखिर कब तक ऐसे आयोजनों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी होती रहेगी ?आखिर कब तक ऐसी दुर्घटनाओं की जांच रिपोर्ट अगली पचास घटनाओं के होने तक आती और ठंडे बस्ते में जाती रहेगी ? बेशक आम आदमी के पास इस बात का कोई जवाब न हो लेकिन तब तक उसे खुद ही खुद को बचाए रखना तो होगा ही । 

1 टिप्पणी:

  1. दुखद घटना, लेकिन अफ़सोस यही है कि हर बार सवाल घटना होने के बाद उठाये जाते हैं और फिर थोड़े दिनों में सब वैसे ही चलता रहता है।

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मुद्दों पर मैंने अपनी सोच तो सामने रख दी आपने पढ भी ली ....मगर आप जब तक बतायेंगे नहीं ..मैं जानूंगा कैसे कि ...आप क्या सोचते हैं उस बारे में..

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