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शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

करवट बदलती सोच ....






आखिरकार वही सब हो रहा है और ठीक वैसा ही हो रहा है जैसा कि आशंका तब बार बार जताई जा रही थी जब अचानक ही लगने लगा था कि इस तरह के जनांदोलन को कुचलने के लिए सरकार और सत्ता से जोंक की तरह चिपके हुए लोग ,कुछ भी कर सकते हैं किसी भी हद तक जा सकते हैं । उन्हें बहुत ही अच्छी तरह भारतीय जनमानस की संवेदनशीलता का अंदाज़ा है , वे जानते हैं इस देश ने पिछले साठ वर्षों में , एक उपनाम के सहारे , धर्म ,धर्मस्थल , जाति , आरक्षण जैसी बातों और मुद्दों पर ही सरकार बनती गिरती देखी है । आज तक भ्रष्टाचार , महंगाई , भूख , गरीबी ,बेरोजगारी ,चिकित्सा सुविधा , अशिक्षा जैसे मुज्द्दों को सबसे अहम मुद्दा बना कर न तो किसी राजनीतिक दल का गठन ही किया गया है और न ही कभी चुनाव लडा गया है ।


साठ वर्षों के लोकतांत्रिक इतिहास में विश्व के सबसे ज्यादा कानूनों व शायद सबसे धीमी न्यायिक प्रक्रिया का सहारा लेकर जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि किसी दैवीय या राजकीय पद पर बैठे रहने सा अनुभव करने लगे । चुनाव से पहले जनता के बीच दिखने करने वाले और उनके सेवक की तरह व्यवहार करने वाले व्यक्ति चुनाव के पश्चात और पद व शक्ति प्राप्त होते ही जनता की हद से ही बाहर हो जाते हैं । भारत प्राचीन काल से ही वैश्विक समाजों के लिए एक कौतूहल का विषय रहा है । जाने कितनी ही सभ्यताओं को पनपते मिटते देखता रहा है । सिर्फ़ धरातलीय संसाधनों की बात करें तो पश्चिमी जगत के लोलुप शासकों द्बारा अनगिनत बार लूटे जाने के बावजूद भी उतना ही प्रचुर है । हां , उसका दोहन और शोषण करने वाला हाथ अब विदेशी नहीं है ।


भारत की शासन प्रणाली व नौकरशाही को हमेशा से सरकार के प्रति निष्टावान व लगभग अधीन व चाटुकार बने रहने की प्रवृत्ति से युक्त किया गया । यानि कुछ लोगों द्वारा , ज्ञात रहे कि भारत में मतदान की औसत दर साठ प्रतिशत से भी कम है ,निर्वाचित व्यक्तियों , जो अब नि: संदेह बेदाग तो नहीं मिल पाते हैं , के द्वारा बनाए व लागू किए जाने वाले कानूनों के निर्माण , उसकी समीक्षा व आलोचना किए जाने की किसी भी प्रक्रिया के दायरे से बाहर थे । वैश्वीकरण के वर्तमान दौर ने और कुछ नफ़ा नुकसान किया या नहीं , किंतु इतना तो ही ही गया कि वैश्विक आवागमन व संचार में भयंकर तीव्रता आ गई । कभी बैलगाडी , ऊंट गाडी से पहचान कराने वाले देश में आज जेट इंजन कारें फ़ार्मूला वन दौड लगा रही है तो ये वैश्वीकरण का ही परिणाम है । वैश्विक समाज , पश्चिमी परंपराओं , रीति रिवाज़ों , अधिकार व सामाजिक व्यवहार के प्रति सजगता ने सबको प्रभावित किया । विश्व राजनीति एक बार फ़िर से परिवर्तन के दौर में , अरब देशों , मध्य एशियाई देशों के चोटे बडे गणराज्य बरसों पुराने रवैयै को बदलने के लिए तत्पर हो रहे हैं । न सिर्फ़ ये देश बल्कि अमेरिका और यूरोप की सजग जनता ने भी अपना अंसतोष और गलत नीतियों के खिलाफ़ आवाज़ उठानी शुरू कर दी है ।


भारत भी इससे अछूता नहीं रहा । छोटो छोटे स्तर से लेकर , और कहीं पानी तो कहीं सडक के लिए शुरू की जाने वाली लडाई जनांदोलनों की शक्ल देने लगी । कुछ ऐसी समस्याएं जिन्होंने सभी भौगोलीय सीमाओं में एक सा ही त्रस्त कर रखा था आम आदमी को , उसके खिलाफ़ जब आवाज़ उठी तो उसे सबने स्वर दिया । अन्ना बाबूराव हज़ारे , जो आपने सात दशकों के जीवन में समाज के लिए लडी जाने वाली हर लडाई में गांधी जी के जीवन सूत्र को पकड कर चलते रहे उन्हें समाज के कुछ लोगों ने एक राष्ट्रीय मुद्दा थमा दिया । उसके बाद से अब तक इससे जुडी जो भी खबरें , घटनाएं , प्रतिक्रियाएं , कथन , बहस चली और चल रही है , उसका आकलन तो आने वाला समय करेगा , किंतु आज जो लोग , और विश्व की सबसे शक्तिशाली व्यक्तित्व लोगों की सूची में उंचा स्थान पाने वाली और वर्तमान यूपीए अध्यक्ष भी आरोपित करते हुए कहते हैं कि देश में भ्रष्टाचार जैसी समस्या का समाधान सिर्फ़ भाषणबाजी से और आमरण अनशन से नहीं हो सकता । यकीनन नहीं हो सकता , लेकिन आम जनता के रूप में जनता कम से कम आवाज़ तो उठा रही है , समस्या का समाधान सुझा तो रही है । और ये कतई नहीं भूला जाना चाहिए कि ऐसा सिर्फ़ इसलिए हो रहा है क्योंकि सरकार ,प्रशासन , विधायिका , न्यायपालिका सभी अपनी जिम्मेदारियों से बच रहे हैं ।

अन्ना हज़ारे की टीम के एक एक सदस्य को जिस तरह से अलग अलग मोर्चों पर , और अलग अलग तरीकों से सरकार के और देश में खुद को शक्तिशाली बना चुके लोगों के खिलाफ़ जाने के बदले घेरा , पीटा जा रहा है ,और उनसे जुडी मिल रही खबरों में जिस तरह की मानसिकता निकल कर सामने आ रही है वो ये बताने के लिए काफ़ी है कि स्थिति किस कदर निम्नस्तर पर है । इस मुद्दे के विरोध में जितना लिखा गया , यदि उसका आकलन किया तो तो साफ़ दिखता है कि , विरोधियों ने , मुद्दे पर कम और मुद्दे उठाने वालों पर ज्यादा ध्यान दिया । फ़िर सबसे बडी बात ये भी कि यदि वाकई उस कानून को बनाने वाले खुद भी दागदार हैं तो खुद वे भी उस कानून की ज़द में आने से खुद को कहां बचा पाएंगे , तो जब वे नहीं डर रहे हैं तो फ़िर आज अचानक एक कानून के मसौदे पर इतनी ज़िद , इतना हठ , क्यों और कैसे । यदि मंशा अच्छी है तो फ़िर ऐसे बयान क्यों आ रहे हैं जिसमें न्यायपालिका तक को ये ताकीद दी जा रही है कि ,मालदार असामियों को जेल की रोटी खिलाना देश की सेहत के लिए ठीक नहीं ।  यदि वाकई भारत की अवाम चाहती है कि भारत जैसे किसी देश का अस्तित्व और प्रभाव वैश्विक समाज में रहे और आने वाले अगले कुछ साल पुन: गुलामी में काटने जैसी किसी संभावना से बचा जाए तो फ़िर , प्रजातांत्रिक मार्ग से ही सही , लेकिन चीज़ें दुरूस्त तो करनी ही होंगी ।

3 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक सटीक विवेचना है..
    भाषण बाजी यदि कोरी हो तो कुछ नहीं हो सकता,लेकिन भाषण /संभाषण के बिना भी कुछ नहीं हो सकता..
    एक सकारात्मक स्वर अनेक हृदयों का प्रतिनिधित्व करता है और उस एक स्वर को यदि शासन पढ़ समझ नहीं पाया,तो समय के तमाचे से कभी बच नहीं सकता ..

    यूँ आपने बहुत सही कहा कि विचार से अधिक महत्त्व व्यक्ति को देने की अपने देश में यह जो प्रवृत्ति रही है, हमेशा ही इसके घातक परिणाम आते हैं..

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  2. सार्थक व यथार्थ विवेचना|

    जिस तरह सरकार अन्ना टीम के सदस्यों का चरित्र हनन करने में लगी है ये अच्छे संकेत नहीं|

    Gyan Darpan
    .

    उत्तर देंहटाएं
  3. एक सकारात्मक स्वर...

    जिस तरह सरकार अन्ना टीम के सदस्यों का चरित्र हनन करने में लगी है ये अच्छे संकेत नहीं|

    उत्तर देंहटाएं

मुद्दों पर मैंने अपनी सोच तो सामने रख दी आपने पढ भी ली ....मगर आप जब तक बतायेंगे नहीं ..मैं जानूंगा कैसे कि ...आप क्या सोचते हैं उस बारे में..

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