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मंगलवार, 19 जून 2012

आस्था का बाज़ार






इस देश में धर्म का अस्तित्व तब से है जब से देश की सभ्यता और समाज का अस्तित्व है । इससे भी अधिक ये तथ्य गौरतलब है कि विश्व का सबसे पुराना धर्म और विश्व के सबसे ज्यादा धर्मावलंबियों को पोषित करने का श्रेय भी भारत को ही जाता है । शायद यही कारण था कि स्वतंत्रता के बाद संविधान निर्माताओं ने देश के चरित्र को धर्मनिरपेक्ष रखने का हर संभव प्रयास किया । हालांकि यही धर्मनिरपेक्ष चरित्र कालांतर में राजनेताओं द्वारा धर्म के राजनीतिकरण और धार्मिक भावनाओं का वोट बैंक के रूप में उपयोग का बायस बना ।  इनसे अलग देश में धर्म , आस्था को बाज़ार और व्यापार की तरह परिवर्तित करने में भी कोई कोर कसर नहीं छोडी गई ।


 इस स्थिति की गंभीरता को समझने के लिए सिर्फ़ दो तथ्यों पर गौर करना बहुत जरूरी है । देश में आज धर्मस्थलों की संख्या , शिक्षण संस्थानों व चिकित्सा संस्थानों की संख्या से कई गुना ज्यादा है । न सिर्फ़ इतना ही नहीं , देश की अर्थव्यवस्था का एक बडा भाग कहीं न कहीं इस आस्था के बाज़ार से जुडा हुआ है या कहें कि इसके पीछे ही छुपा/दबा हुआ है । परंपरावादी धार्मिक मान्यताओं , धार्मिक उत्सवों , धर्म स्थलों आदि को दरकिनार करते हुए पिछले कुछ वर्षोम में नए -नए धर्म गुरूओं , महंतों , बाबाओं , साधु साध्वियों ने ईश्वरीय सत्ता के समानांतर या ईश प्राप्ति के स्वघोषित मार्ग बन कर इस आस्था के बाज़ार को अधोगति की पराकाष्ठा पर पहुंचा दिया ।

ये सर्वविदित है कि इस देस के आम लोग धर्म के मामले में न सिर्फ़ अति संवेदनशील हैं बल्कि लगभग धर्मांध की तरह व्यवहार करते हैं । यही वजह है कि कभी ईश प्रतिमाओं द्वारा दूध पीने की तो कभी दीवार ,पेड , और धुएं तक में किसी देवी-देवता की आकृति देखे जाने के अफ़वाहनुमे दावे के पीछे एक जुनून सा देखने को मिलता रहा है । आम लोगों की इसी सहिष्णुता व मासूमियत का फ़ायदा उठाते हुए इन तथाकथित धर्मगुरूओं ने अपने अपने तरीकों व हथकंडों से न सिर्फ़ आम जनमानस की धार्मिक भावनाओं से खेला बल्कि उनसे दान , सहयोग राशि  और कई अन्य बहानों से उनके खून पसीने की कमाई का एक हिस्सा भी हडप जाते हैं ।


इस समस्या का अध्ययन करने वालों ने एक दिलचस्प कारण भी ढूंढा । आधुनिक युग में आम आदमी का जीवन और दिशा आवश्यकता की पूर्ति से विलासिता एवं सुख सुविधा की ओर मुड गया । उच्च जीवन स्तर की प्राप्ति और सब कुछ जल्दी से जल्दी पा लेने की प्रवृत्ति ने सामाजिक जीवन को घोर प्रतिस्पर्धी बना दिया । लोगों के लिए नैतिकता श्रम , आदि के मायने पूरी तरह से बदलने लगे । किंतु इसके साथ-साथ एक आत्मग्लानि और पापबोध की भावना से भी ग्रस्त जनमानस ने इसकी भरपाई या प्रायश्चित स्वरूप धर्म , धार्मिक क्रियाकलापों की ओर रुख किया ।


इसी दुविधापूर्न स्थिति का पूरा फ़ायदा उठाते हुए आस्था के कारोबारियों ने किसी को जीवन की दौड में शार्टकट सफ़लता दिलाने के नाम अप्र तो किसी सफ़ल को उसके पापबोध का एहसास करवा कर दान, सहयोग, आदि के बहाने अपनी दुकान चमकाए रखी । इसका परिणाम ये हुआ कि देश में आज पारंपरिक धर्मों से परे लगभग उतने ही पाखंड और प्रपंचनुमा धार्मिक आडंबरों की एक बडी दुनिया रच डाली गई है ।


एक तथाकथित कृपानिधान बने बाबा जो खुद में किसी तीसरे नेत्र जैसी चमत्कारिक शक्ति आने का दावा करके लोगों पर कृपा बरसाने का ऐसा कार्यक्रम पिछले कुछ समय से करते चले आ रहे थे जिसके बदले में कृपा पाने के इच्छुक आम लोगों से अच्छी खासी धनराशि वसूल की जा रही थी । हाल ही में जब इनके खिलाफ़ लोगों को गुमराह करने व अंधविश्वास फ़ैलाए जाने का आरोप लगा कर मुकदमा दर्ज़ किया गया तो ये कृपा बरसनी बंद हो गई ‘। इनके साथ ही एक महिला जो खुद को देवी रूप में स्थापित करने करवाने के प्रयास में चर्चित हुईं ने उसी प्रवृत्ति को पुख्ता करने की कोशिश की है जिसमें आजकल बहुत कम उम्र अनुभव वाले भी खुद को दैवीय कृपा प्राप्त बताने मानने में लगे हुए । प[रवचन , सत्संग ,समागम , मिलन आदि का आयोजन इस तरह से किया कराया जा रहा है मानो बाज़ार /हाट लगाकर ईश्वरीय कृपा को बेचा जा रहा हो ।


इस संदर्भ में एक तथ्य यह भी है गौरतलब है कि धर्म और आस्था के इन तथाकथित व्यावसायियों ने अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा भी दबा रखा है । हैरानी की बात ये है कि ये सब कुछ खुलेआम चल रहा है और जब तक कोई शिकायत न की जाए कोई कार्यवाही नहीं होती । अब समय आ गया है कि विज्ञान और तकनीक के इस युग में आस्था ,धर्म , धार्मिक मान्यताओं को ढोंग और आडंबर से जरूर ही अलग कर दिया जाए । न सिर्फ़ ये बल्कि तेज़ी से बढते धर्मस्थलों पर अंकुश लगा कर उनकी जगह पर अस्पताल , सकूल एवं अन्य आवश्यक संस्थानों का निर्माण किया जाना चाहिए ।


आज विश्व की नज़र भारत पर है । कोई इसे भविष्य की महाशक्ति के रूप में  देख रहा है तो कोई इसे सबसे बडी अर्थव्यवस्था के रूप में  ऐसे में ये बहुत जरूरी हो जाता है कि कम से कम ये सुनिश्चित किया जाए कि ऐसे धर्म/आस्था के कारोबारियों से पूरी सख्ती से निबटते हुए इन्हें बिल्कुल खत्म कर दिया जाए ।

7 टिप्‍पणियां:

  1. आज का मुद्दा अच्छा लगा।
    इंदु आहूजा, लाल किताब वाले गुरूदेव और अन्य बहुत सारे ज्योतिष बताने और यंत्र बेचने वाले टीवी चैनलों के जरिये धर्मांध जनता को शोषित कर रहे हैं। कई बार तो लगता है कि हिन्दु ही इतने अंधे हैं। लगभग सभी के सभी हिन्दुओं से जुडी धार्मिक भावनाओं और मान्यताओं के आधार पर दोहन करते हैं। जैसे धन बढाने के लिये लक्ष्मी यंत्र आदि। दूसरे चैनलों के साथ-साथ न्यूज चैनल भी विज्ञापनों के नाम पर धन कमाने के लिये इन अंधविश्वासों को बढावा दे रहे हैं। सभी गुरू और यंत्र बेचने वाले मानव प्रजाति को हर दुख-क्लेश से छुटकारा दिलाने और ग्रहदशा के प्रभाव को बदलने का प्रयास करते और आसान उपाय बताते हैं।
    क्या विज्ञापनों के नाम पर दिखाये जाने वाले, अंधविश्वास फैलाने वाले और केवल एक फोन कॉल पर (इनकी फोन कॉल 12 रुपये प्रति मिनट होती है)हर दुख दूर करने का दावा करने वाले इन कार्यक्रमों पर रोक नहीं लग सकती है।

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    1. हां अंतर सोहिल जी आपने इनका भी खूब ध्यान दिलाया । शुक्रिया । लग सकती है बिल्कुल लग सकती है किंतु प्रशासन और नियामक संस्थाएं इस बात की प्रतीक्षा करती रहती हैं कि कोई शिकायत करे तब उस पर कार्रवाई करें जो कि बेहद अफ़सोसनाक है

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  2. अच्छा लेख हैं.
    परंतु अजय जी क्या इन ज्योतिषियों तांत्रिकों आदि को उपभोक्ता कानूनों के दायरे में नहीं लाया जा सकता?

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    1. जी सिर्फ़ उपभोक्ता कानूनों के दायरे में ही नहीं बल्कि भारतीय दंड संहिता के कानून के तहत भी इन पर कार्रवाई की जा सकती है लेकिन अमूमन तौर पर शिकायत नहीं की जाती और इनका धंधा चलता रहता है

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  3. aaj ka aapla yh aalekh vakin kabile taarif hai aur vicharniy bhi...jaane kab khulengi hamaare yahan ke andhe bhakton ki aankhen aur dekh sakengi ki yh sab kuch jo unhe sachaa lagataa hai wo vastav men ek dhong hai andhvishvaas hai...sahamat hoon aapki likhi baaton se saarthak evam saargarbhit aalekh...

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  4. आपने बिल्कुल ठीक कहा पल्लवी जी और सच में ही जितने ये ढोंगी बाबा बाबी लोग दोषी हैं उतने ही ये अंधभक्त भी हैं

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  5. आज पैसा कमाना है तो कोचिंग क्लास खोल लो या बन जाओ बाबा | इस दुःख भरे संसार में सुख कि तलाश में भटकता इंसान इन बाबाओं के चक्कर में कुछ भले कि उम्मीद में पड़ जाता है | हिंदुस्तान में सब चलता है यदि आप के पास पैसा हों तो |

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मुद्दों पर मैंने अपनी सोच तो सामने रख दी आपने पढ भी ली ....मगर आप जब तक बतायेंगे नहीं ..मैं जानूंगा कैसे कि ...आप क्या सोचते हैं उस बारे में..

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