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शनिवार, 9 जनवरी 2010

मीडिया और न्यायपालिका



राठौर प्रकरण में जिस तरह से मीडिया ने एक बार फ़िर से जेसिका लाल हत्या कांड वाला रुख अपनाया और लगभग उसी के अनुरूप इस घटना में त्वरित कार्यवाही वाला सब कुछ चल रहा है , उसने एक बार फ़िर से न्यायपालिका और मीडिया के बीच बढते रिश्ते के बहस को एक नई हवा दे दी है ॥ पिछले कुछ वर्षों में जब से मीडिया की अधिकता हुई है लगभग तभी से मीडिया खबरों के लिए और उससे इतर भी बराबर न्यायपालिका, उसकी कार्यवाही, और अब उसके फ़ैसलों पर बहुत करीबी नज़र रखता है । हालांकि कई बार अति उत्साह और खबरों को एक्सक्लुसिव बनाने के चक्कर में मीडिया न्यायपालिका के उस क्षेत्र में अतिक्रमण कर जाती है जिस क्षेत्र में नहीं करना चाहिए । और इसका खामियाजा भी भुगतती है , हाल ही में माननीय न्यायपालिका ने इस तथाकथित मीडिया ट्रायल पर नकेल कसने के लिए कुछ सख्त हिदायतें और निर्देश सरकार को दिए थे ॥

लेकिन पिछले कुछ समय से जिस तरह न्यायिक फ़ैसलों, पुलिसिया कार्यवाहियों, और कुछ वैसे मुकदमे जो किसी न किसी बडी हस्ती से जुडे होते हैं , उनकी कवरेज में मीडिया जैसी दिलचस्पी दिखा रहा है , उसने कभी कभार नुकसान पहुंचाने के बावजूद अधिकांश में कानून व्यवस्था, न्यायिक व्यवस्था ,और समाज को आत्ममंथन करने पर मजबूर जरूर किया है । क्या ऐसा संभव था कि जिस मुकदमे को हाल फ़िलहाल की न्यायिक सक्रियता के बावजूद फ़ैसले पर पहुंचने में , वो भी अदालत की पहली पायदान पर ही, उन्नीस बीस बरस लग जाते हैं उस मुकदमे उसमें इतनी तेजी से इतना सब हो जाएगा । अब तो ऐसा लग रहा है कि पूरी जन्मपत्री ही खुल या खोली जा रही है राठौर साहब की । बेशक ये लडाई अब भी उतनी आसान न हो , ये भी हो सकता है कि इसे अब भी नियति तक नहीं पहुंचाया जा सके । लेकिन इन सबने दो बातें तो जरूर ही प्रमाणित कर दी हैं । पहली ये कि अब भी मीडिया अपनी खबरों से और सबसे बडी बात की खबरों की दिशा से जनमानस को तैयार कर लेता है । और दूसरा ये कि जब एक बार कोई खबर बन जाती है तो फ़िर बांकी का काम बहुत कठिन नहीं रहता है ।

इसलिए यदि हम मीडिया की असंवेदनशीलता, नकलचीपन, और उनके चुके हुए थिंक टैंक के लिए उन्हें कोसते हैं तो फ़िर इस तरह के प्रयासों के लिए उनका धन्यवाद तो देना ही चाहिए । मगर .........हां ...मगर मुझे लगता है कि मीडिया अब भी दायरों में सिमटी हुई है , मेरे कहने का तात्पर्य ये है कि अब भी जैसे ही कोई एक घटना, दुर्घटना , इस तरह का फ़ैसला , या ऐसा ही कुछ और बाहर आता है फ़िर सभी उसी ढर्रे पर चलने लगते हैं । तो क्या ये माना जाए कि मीडिया अभी भी उसी लीक पर चल रहा है । तो क्या हम मीडिया से ये अपेक्षा करें कि वो अभी भी उन लाखों-करोडों रुचिकाओं ,जेसिका लाल और न जाने किन नामों , और उनके परिवार वाले और सबसे ज्यादा आम आदमी के न्याय की लडाई को देश की, समाज की , लडाई बनाएंगे ..???????

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपसे सहमत हूं। इस बार मीडिया के रोल ने त्वरित कार्यवाही करने पर विवश किया।

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  2. मीडिया का यह काम वाकई सराहनीय है। लेकिन मीडिया बहुत से फालतू कामों में बहुत समय व्यर्थ करता है। उस समय को इस तरह के कामों में लगाना चाहिए। मीडिया को इस तरह के कामों का विस्तार करना चाहिए।

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  3. मैं आपके लेख से सहमत हूँ, लेकिन फिर भी मेरा मानना है कि मीडिया एक खबर को लेकर बैठ जाता है, मीडिया रुचिका जैसी अन्य पीड़िताओं पर नजर क्यों नहीं डाल रहा ताकि उनका भी भला हो जाए। सारी एनर्जी यहीं खत्म कर देगा, और अन्य रुचिकाओं का क्या होगा? पुलिस एक चोर को पकड़ने के बाद सीना ठोकने लगती है, जबकि सीना तब ठोकना चाहिए जब पूरा खेल खत्म हो जाए।

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  4. मीडिया के क्षेत्र मे काफी कुछ अच्छा घटित हो रहा है लेकिन और भी अच्छा होने की गुंजाइश अभी बाकी है

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  5. media ke is kaam ko jaroor salaam karunga... uttam evam saraahniya... achha post laga...

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मुद्दों पर मैंने अपनी सोच तो सामने रख दी आपने पढ भी ली ....मगर आप जब तक बतायेंगे नहीं ..मैं जानूंगा कैसे कि ...आप क्या सोचते हैं उस बारे में..

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