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सोमवार, 26 अगस्त 2024

आरक्षण की बैसाखी : न टूटे , न छूटे

 



पूरी दुनिया आज विश्व के सामने आ रही चुनौतियों , समस्याओं के लिए अपने अपने स्तर पर शोध , खोज , विमर्श कर रहे हैं , इससे इतर कुछ मज़हबी कट्टरता से दबे देशों का समहू लगा हुआ है अपने विध्वसंकारी मंसूबों की पूरा करने में।  इन सबसे अलग भारत जो अब विश्व के प्रभावशाली देशों में शामिल है वाहन की राष्ट्रीय राजनीति के बहस ,  मंथन का विषय है -आरक्षण व्यवस्था।  दुखद आश्चर्य है कि देश की स्वतंत्रता के सत्तर वर्ष के पश्चात भी आज भारतीय समाज , राजनीति , सब कुछ जातियों का निर्धारण , पुनर्निधारण , वर्गीकरण और अंततः आरक्षण  व्यवस्था के इर्द गिर्द ही घूम रही है।  

सर्वोच्च प्रशासनिक सेवाओं में योग्य व्यक्तियों की नियुक्ति का फैसला और फिर उसे आरक्षण व्यवस्था के अनुरूप न पाए जाने को लेकर हाल ही में रद्द की गई लेटरल भर्ती योजना की बात हो या फिर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में निर्णीत एक वाद के आदेश की मुखालफत का जिसमें माननीय अदालत ने वर्षों से चली आ रही आरक्षण व्यवस्था के अभी तक के परिणामों प्रभावों का आकलन विश्लेषण करके आइना दिखा दिया था।  और इस आदेश की प्रतिक्रिया का हाल ये रहा कि केंद्र सरकार और स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा ारसखान व्यवस्था को किसी भी प्रकार से कमोज़र न किए जाने की बात कहने के बावजूद भी देश भर में हड़ताल बंद और प्रदर्शन किया गया।  

देश का सबसे पुराना राजनैतिक दल और अब विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के सर्वोसर्वा राहुल गांधी अपनी अतार्किक बातों बयानों में जिस तरह से सरकार से एक एक व्यक्ति की जाती पूछने बताने के बालहठ पर अड़े हैं उसकी गंभीरता इसी बात से समझी जा सकती है की वे भारतीय सुंदरियों की विजेताओं की सूची में जाती तलाश रहे थे और  कोई भी आरक्षित जातियों में से क्यों नहीं है , ये सवाल उठा रहे थे।  

कुछ वर्षों पूर्व बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी क्रिकेट तथा अन्य खेलों में आरक्षण व्यवस्था को लागू करने की बात कही थी।  ये बातें , बयान , और सोच बताते हैं कि दलितों , वंचितों शोषितों के सामाजिक उत्थान तथा अवसरों में समानता संतुलन के लिए बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने जिस आरक्षण व्यवस्था की कल्पना की थी , ये उससे कहीं दूर और अलग है।  

देश में पचास वर्षों से अधिक सत्ता और शासन में बैठी कांग्रेस  और इसके नेता वर्तमान में सबसे बड़ी वैचारिक दरिदता से गुजर रहे हैं इसलिए लगातार तीन चुनावों में बुरी तरह हारने के बावजूद भी देश को जबरन जातीय जनगणना करके दिखाने का दवा कर रहे हैं।  कांग्रेस की दिक्कत ये भी है की विपक्ष में उसके साथ बैठे अन्य दुसरे दल , इस मुद्दे पर कांग्रेस के साथ उतनी प्रतिबद्धता से नहीं दिखाई दे रहे हैं।  कोई भी कांग्रेस की आरक्षित जातियों की इस स्व घोषित ठेकेदार बनने से खुश नहीं दिख रहे।  

विश्व में भारत , नेपाल , बांग्लादेश जैसे गिनती के दो तीन देशों को छोड़कर आज कोई भी देश समाज सरकार आरक्षण या ऐसी किसी भी व्यवस्था अपने यहाँ अपनाए हुए हैं जिसमें सिर्फ जाती को मेधा और योग्यता के ऊपर वरीयता दी जाती हो।  यहाँ तो जातियों को उपजातियों में बांटने की योजनाएं चल रही हैं।  सबसे बड़ी विडंबना यह है की दशकों से चली आ रही इस विवशता के आकलन विश्लेषण , परिणाम और परिवर्तन को लेकर न्यायपालिका के मंतव्य को समझने के बावजूद आरक्षण व्यवस्था वो घंटी बन गई है जिसे बजाना हर कोई चाहता है , बाँधना कोई नहीं।  

किसी भी देश समाज में सामाजिक समरसता और संतुलन के लिए देश समाज द्वारा प्रयास किया जाना कोई अनुचित प्रयोग नहीं है किन्तु भारतीय समाज को कभी न कभी तो जबरन थामी इस बैसाखी का सहारा छोड़ योग्यता के आधार पर जीना बढ़ना होगा क्यूंकि दुनिया यही कर रही है और यही सबसे उपयुक्त है।  

रविवार, 5 जुलाई 2020

महामारी के बाद




इस शताब्दी के शुरुआत में ही विश्व सभ्यता किसी अपेक्षित प्राकृतिक आपदा का शिकार न होकर विरंतर निर्बाध अनुसंधान की सनक के दुष्परिणाम से निकले महाविनाश की चपेट में आ गया |  किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि कभी इंसान की करतूत उसके लिए ऐसे हालात पैदा कर देंगे जब कुदरत के माथे ,इंसान के विनाश का दोष नहीं आकर खुद उसके हिस्से में ये अपराध आएगा | 

अभी तो इस महारामारी की सुनामी से उबरने निकलने की ही कोई सूरत निकट भविष्यमे निकलती नहीं दिखाई दे रही है किन्तु समाज का हर वर्ग, विश्व का हर देश , प्रशासन , अर्थशास्त्री अभी से ये आकलन करने में लग गए हैं की महामारी के वैश्विक परिदृश्य के क्या हालात होंगे ? वैश्विक समाज और विश्व अर्थव्यवस्था किस ओर मुड़ेगी | विश्व महाशक्तियों के आप सी संबंधों का समीकरण क्या और  कितना बदल जाएगा ? सामरिक समृद्धता  के लिए मदांध देश क्या इस महामारी के बाद भी शास्त्र-भंडारण की ओर ही आगे बढ़ेंगे या फिर चिकित्स्कीय संबलता की ओर रुख करेंगे ये देखने वाली बात होगी | 

चिकित्स्कीय अनुसंधान के विश्व भर के तमाम पुरोधाओं को अभी तक कोरोना को पूरी तरह समझ उसका कारगर और सटीक तोड़ निकालने में सफलता हासिल हो सकने की फिलहाल कोई पुख्ता जानकारी नहीं है | तो अब जबकि पूरे विश्व को इसकी चपेट में आए छ महीने से भी अधिक हो चुके हैं और इसका प्रवाह और प्रभाव दोनों ही रोके से रुक नहीं पा रहे हैं | ऐसे में समाज शास्त्री अपने अध्ययन की दिशा उसी और मोड़ चुके हैं जब कोरोना के बाद महसूस की जाने वाली चुनौतियों से समाज को जूझना पडेगा , उन्हीं बातों का आकलन विश्लेषण किया जा रहा है | 


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है | समाजशास्त्र का यह सिध्दांत सूत्र भी  सर्वथा प्रतिकूल होकर रह गया  है | मनुष्य आज अपने सही गलत अन्वेषणों ,प्रयोगों का दुष्परिणाम यह उठा रहा है कि अपने ही समाज में रहते हुए अपने ही समाज से निषिद्ध होने को विवश हो गया है | समाज शास्त्र का दूसरा सूत्र कि ताकतवर या मजबूत के ही बचे रहने या  उसके अपने अस्तित्व को बचाने के संघर्ष चक्र में ,उसके परिस्थितियों से लड़ कर पार पा जाने की सम्भावनाएँ ही अधिक प्रबल होती हैं | इस मिथक को भी इस महामारी ने इस अर्थ में तोड़ा कि विश्व के तमाम शक्तिशाली देश इस महामारी की चपेट में आकर त्रस्त पस्त हो चुके हैं और अब भी इन पर कोरोना का कहर बरप रहा है | 

आज विश्व समुदाय ने इस अलप समय में ही देख लिया कि एक सिर्फ इंसान को थोड़े दिनों तक प्रकृति से मनमानी करने से अवरुद्ध किए जाने भर से प्रकृति ने इतने ही दिनों में खुद कि स्थति कितनी दुरुस्त कर ली | तो इस महामारी ने यह भी बता दिया कि इंसानी सभ्यता को हर हाल में प्राकृतिक तारतम्यता व् सामंजस्य का सिद्धांत ही अपनाना होगा | 

इंसान घरेलू प्राणी है ,यह एक बार फिर प्रमाणित हुआ | जिस तरह से आपदा की आहट  सुनते ही विश्व से लेकर देश के अंदर भी एक प्रांत से दूसरे प्रांत में लोगों ने अपने घर , अपनों के पास जाने का जो ये प्रवाद दौर वर्तमान में हुआ है वो इतिहास में हुए बहुत से असाधारण विस्थापनों में से एक है | अपने रोजगार और भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए गाँव की बहुत बड़ी ,आबादी  पलायन/विस्थापन का शिकार दशकों पहले शुरू हुई थी | गाँव ,कस्बों से शहर ,नगर और महानगर बसते  बढ़ते रहे और गाँव खाली होते चले गए | शहरों में  आ कर सालों तक सिर्फ जीने के अस्तित्व संघर्ष में उलझा ये ग्राम्य समाज क्या अपने गाँव घरों में अपने जीवन यापन के विकल्प तलाशेगा ? 

बिहार ,उत्तर प्रदेश ,बंगाल ,उड़ीसा का मान संसाधन विकास सूचकांक प्रदर्शन दशकों से ही बहुत पिछड़ा रहा है | ऐसी आपदाओं के समय इन राज्यों का प्रशासन और प्रबंधन क्या ,किता विकास कर सका , क्या कितना सीख पाया ये हालत भी इन्हें परिलक्षित करते हैं | महामारी के रूप में सामने आए इस अपर्याताशित आपदा और ऐसी दूसरी आपत्तियों के समय ही व्यवस्थाओं की असली परख होती है और अभी यही परख हो रही है | 

ये महामारी काल कितना लंबा खिंचेगा अभी तो यही तय नहीं है किन्तु इसके बाद वाले समय में विश्व का सामाजिक ,आर्थिक और भौगोलिक समीकरण भी परिवर्तित होकर नए  मापदंड  स्थापित करेगा ये तय है | 
वैश्विक महाशक्तियों यथा अमेरिका ,चीन ,फ्रांस ,रूस ,इटली  जैसे देश अलग अलग स्थितियों परिस्थितयों में खुद को विश्व फलक पर पुनर्स्थापित करने की जद्दोज़हद के बीच अविकसित और विकाशील देश भी इस महामारी के प्रभाव से उबरकर खुद को बचा पाने के लिए नए सिरे से संघर्षशील होंगे | 

भारत इस महामारी के विरुद्ध  विश्व के अन्य देशों की तुलना में अब तक इस लड़ाई में सम्मानपूर्वक अपने लोगों को यथासंभव बचा सकने के कारण वर्तमान में पहले ही अगली पंक्ति में आ चूका है | विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी बोर्ड के अध्यक्ष पद पर किसी भारतीय का चयन , संयुक्त राष्ट्र परिषद् के अस्थाई सदस्य  के रूप सर्वाधिक मतों से चयन , ने इस ओर स्पष्ट ईशारा कर भी दिया है | इस बीच चीन को मिल रही वैश्विक नकारात्मक प्रतिक्रया के कारण वहां से पलयान को उद्धत उद्योग परियोजनाएं आदि की पहली प्राथमिकता भारत ही होगा | इसकी शुरुआत भी करीब करीब हो चुकी है | 

सोमवार, 13 जनवरी 2014

बच्चों के प्रति क्रूर होता एक समाज ......

घर से भागा हुआ बच्चा पवन कुमार



इस बच्चे का नाम है पवन कुमार । ये बच्चा मुझे अपने गृहनगर मधुबनी बिहार से दिल्ली की वापसी रेल यात्रा में , अपने रेल के डब्बे में बैठा मिला । असल में ये बच्चा शायद मुजफ़्फ़रपुर या छपरा स्टेशन में से किसी स्टेशन पर रेल में सवार हो गया था । मेरा ध्यान इस बच्चे पर तब गया जब आसपास बैठे यात्रियों को इस बालक से चुहल करते देखा । कोई इसे जूस के दुकान पर काम करने को तैयार कर रहा था तो कोई इसे जेबकतरा कह के दुत्कार रहा था । आशंका होने पर मैं इसके पास गया और पहले मैंने सहयात्रियों से पूछा कि क्या ये बच्चा किसी के साथ है । इंकार करने पर मैंने इस बच्चे से इसका नाम और पता पूछा ।

बच्चा अचानक ही मुझे यूं पूछते देख झिझक कर डर कर चुप होगा , मगर मेरे बार बार पुचकारने पर बताया कि वो अपनी नानी के घर से भाग कर आया है बच्चे ने ये भी बताया कि वो पहले भी दो बार भाग चुका है । मझे अंदेशा हुआ कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बच्चा अपने हो रहे किसी जुल्म सितम से डर कर भाग खडा हुआ था , मगर प्यार से पूछने पर उसने बताया कि वो नौकरी करने जा रहा है । मुझे उसे बहुत ही सावधानी से समझाना पडा कि अभी वो बहुत छोटा है और उसे कम से कम उस उम्र तक तो इंतज़ार करना ही चाहिए जब तक वो नौकरी के लायक शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व न हो जाए । बच्चा अब घर जाने को तैयार था । मैंने अगले स्टेशन (बलिया) पर उतर कर फ़ौरन ही स्टेशन अधीक्षक के दफ़्तर पहुंच कर सारी बात बताई और इस मासूम को उनके सुपुर्द किया ।

मैं जब ये पोस्ट लिख रहा हूं तो टेलिविजन चैनल पर समाचार आ रहा है कि मुंबई के मीरा रोड पर पुलिस ने एक ११ वर्षीय बच्चे को छुडाया है जिसे जबरन मार पीट और भयंकर शोषित करके घर में बंधक बना कर काम कराया जा रहा था और इस तरह की घटना या खबर अब रोज़मर्रा की बात सी हो गई है । ऐसा लग रहा है मानो इस समाज को बच्चों के प्रति कोई संवेदना , कोई सहानुभूति , कोई चिंता नहीं है । किसी समाजशास्त्री ने ऐसी स्थिति को भांप कर ही कहा था कि जो देश और समाज कल का भविष्य बनने वाले बच्चों के प्रति असहिष्णु और लापरवाह होता है उसे फ़िर बदले में हिंसक और क्रूर नस्लें ही मिलती हैं ।

राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकडों पर नज़र डालें तो स्थिति की भयावहता का अंदाज़ा लग जाता है ।सिर्फ़ पिछले पांच वर्षों में बच्चों के प्रति हिंसा और अपराध की घटनाओं में 21 %  का इज़ाफ़ा हुआ है । इन अपराधों में भी सबसे ज्यादा घटनाएं अपहरण , हत्या और शोषण की हैं । इतना ही नहीं प्रति वर्ष देश भर से गुमशुदा बच्चों की दर में भी लगातार वृद्धि हो रही है और चौंकाने वाली बात ये है कि छोटे शहरों , गांव , कस्बों से बहला फ़ुसला कर , घर से भाग कर , या किसी और कारणों से गायब हुए बच्चों के अलावा महानगरों और बडे शहरों में ये दर कहीं अधिक है । इसका मतलब स्पष्ट है कि पुलिस , प्रशासन व सरकार बच्चों के जीवन व सुरक्षा के प्रति घोर उदासीन व असंवेदनशील रवैया अपनाए हुए है ।

महानगरों में बच्चों को बंधक मजदूरी , भिक्षावृत्ति , तथा अन्य शोषणों से लगातार त्रस्त होना पड रहा है और सरकार तथा कुछ स्व्यं सेवी संस्थाओं के लगातार प्रयासों के बावजूद भी \स्थिति निरंतर बिगडती ही जा रही है । पिछले दिनों तो गरीब बच्चों का अपहरण करके उनकी हत्या के बाद मानव अंगों के व्यापार हेतु उनका प्रयोग किए जाने जैसी अमानवीय और घिनौनी घटनाएं भी सामने आई हैं । आश्चर्य व दुख इस बात का है सरकार ने अब तक इन नौनिहाल मासूमों की सुरक्षा व संरक्षण हेतु कोई ठोस नीति या योजना न तो बनाई है और न ही कोई प्रयास किया है । महज़ आंकडों की बाजीगरी और कागज़ी कोशिशों के सहारे ही प्रशासन अपने प्रयास गिनाने में लगा रहता है ।

यदि यही स्थिति रहती है तो फ़िर निश्चित रूप से समाज को इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि भविष्य में हालात और भी नारकीय हो जाएंगे । सरकार को समाज और स्व्यं सेवी संस्थाओं , समूहों , सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर इस दिशा में एक दूरगामी रोडमैप बना कर आपसी तालमेल के साथ वृहत योजना बनानी चाहिए । संचार क्रांति के इस युग में कम से कम गुमशुदा बच्चों की तलाश तो पूरी संज़ीदगी से की ही जानी चाहिए , ताकि समय रहते ऐसे भूले भटके बच्चों को उनके घर तक पहुंचाया जा सके ।


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