
अभी रिएल्टी शो बिग बॉस की अश्लीलता ,गाली गलौज वाली भाषा की बतकुच्चन , शादी और सुहागरात तक को तमाशे के रूप में प्रस्तुत करके दिखाने सजाने की प्रवृत्ति से भारतीय समाज सुशिक्षित हो ही रहा था कि अचानक एक और खबर ने सबको चौंका दिया । इंसाफ़ की आधुनिक देवी के रूप में टीवी द्वारा स्थापित की जा रही राखी सावंत जी ने कुछ ऐसा इंसाफ़ कर डाला कि इसमें प्रतिभागी के रूप में शामिल हुए लक्ष्मण सिंह ने आत्महत्या कर ली । हालांकि इससे पहले भी कई रिएल्टी और टैलेंट शोज़ में कभी जजों की टिप्पणियों तो कभी किसी और कारण से , इसमें भाग लेने वाले या संबंधित लोग कई तरह की मुसीबतों का सामना कर चुके हैं । किंतु हाल ही में कभी स्वंयवर के नाम पर , तो कभी इमोशनल अत्याचार के नाम पर , कभी इंसाफ़ के नाम पर तो कभी तमाशे के नाम पर भारतीय टेलिविजन पर जो कुछ परोसा जा रहा है वो आज एक आम आदमी को कई बातें सोचने पर मजबूर कर रहा है ।

लक्ष्मण सिंह जिसने इसी एपिसोड के बाद आत्मह्त्या कर ली
इस बहस को उठाते ही इसके विरूद्ध जो एक तर्क अक्सर दिया जाता है वो ये कि , ये जो कुछ भी टीवी में दिखाया जा रहा है , वो सब आज समाज में घट रहा है दूसरा ये कि लोग देख रहे हैं तभी तो दिखाया जा रहा है । फ़िर एक बात ये भी कि आज सिनेमा में भी तो ये सब खूब बढचढ कर दिखाया जा रहा है । ये सारे तर्क , सारी दलीलें सर्वथा खोखली और बकवास लगती हैं । समाज में ये सब हो रहा है ??आखिर किस समाज में ? क्या महानगरीय संस्कृति ही ..सिर्फ़ महानगरीय समाज ही पूरे देश के समाज का प्रतिनिधि समाज है ? तो फ़िर उनका क्या जो आबादी आज भी इन महानगरों से दूर ..कहीं बहुत पीछे छूटी बची हुई है ? और क्या महानगरीय समाज में यही सब कुछ हो रहा है । और क्या ये सब निर्विवाद रूप से स्थापित और मान्य है नगरीय समाज के बीच भी ? अब रही बात कि लोग देखते हैं इसलिए दिखाया जा रहा है । तो फ़िर यदि कल को लोग नग्नता की ओर बढेंगे , उसे देखना चाहेंगे तो क्या वही परोसा जाएगा ? क्या बाजारवाद को इस कदर हावी होने दिया जा सकता है कि उसके आगे सब कुछ गौण हो जाए , सब कुछ बौना साबित हो जाए ?? एक तर्क ये कि सिनेमा में भी तो दिखाया ही जा रहा है । सिनेमा आज भी घर घर में नहीं पहुंचा है ..और जब पहुंचता है तो चाहे अनचाहे उस पर वो कैंची चल ही चुकी होती है जो चल जानी चाहिए ।
सबसे बडा सवाल ये है कि , टीवी शोज़ , धारावाहिक , और चैनलों के लिए निर्धारित मापदंडों को देखने परखने और उन्हें नियंत्रित करने के लिए गठित बोर्डों , संस्थाओं आदि की भूमिका सिर्फ़ एक तमाशबीन की तरह क्यों बनी हुई है । ज्यादा हुआ तो इन कार्यक्रमों की समाप्ति के बाद उन्हें एक नोटिस थमा देना या फ़िर एक औपचारिक सा नोटिस थमा देना ही इतिश्री हो जाती है । आज बिग बॉस के घर में प्रतिभागियों द्वारा खुले आम अश्लीलता का प्रदर्शन , इमोशनल अत्याचार के वो अतरंग प्रसंग (हालांकि इस कार्यक्रम में तो फ़िर भी कई बार काट छांट कर दी जाती है ) किस समाज के लिए और कौन दिखा रहा है ...?? ये बात तय कर ली जानी चाहिए क्योंकि ये वही चैनल है जो अपने विभिन्न धारावाहिकों में समाज में व्याप्त बुराईयों को सामने लाने का दावा करता है । अभी ही ये समय है कि ये भी तय कर दिया जाए कि क्या इनकी कोई सीमा है .....या आने वाले समय में टीवी पर लोगों को आदि मानव ..अपने नग्न रूप में दिखाई देगा ???