गुरुवार, 10 जुलाई 2025

बिहार चुनाव : मतदाता सूची सुधार विवाद

 

दिनांक 10 जुलाई 2025 
दैनिक जागरण 


खबर ये है कि बिहार की एक मतदाता जो कि महिला हैं उनके मतदाता पहचान पत्र पर मतदाता के रूप में जो तस्वीर है वो इसी प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री की है।  है न कितने कमाल की बात और ये भी समझिये कि ये एक बानगी भर है।  आइये समझते हैं कि आखिर मतदाता सूची को अद्यतित करके उसमें सुधार किये जाने की इस कवायद का इतना पुरज़ोर विरोध क्यों हो रहा है।  



आज बिहार की शायद ही कोई पंचायत ऐसी बची हो जहाँ पर मतदाता सूची में दर्ज , दर्जनों और सैकड़ों नाम के ग्रामीण पांच दस बीस और पच्चीस साल पहले ही अपने पेशे और नौकरी को लेकर पूरे देश भर में पलायन करके वहीँ बस गए हैं , लेकिन लेकिन , 

लेकिन आज भी अभी भी बहुत से ऐसे तमाम लोगों का नाम दोनों स्थानों की मतदाता सूची में शामिल है और कमला की बात ये है कि बहुत सारे मतदाता आज भी भी दोनों राज्यों , एक जहां वे वर्षों से रह रहे हैं और दूसरा वो जिसे छोड़े हुए वर्षों बीत चुके हैं।  इसके साथ ही ये बात इतनी सरलता से समझी जा सकती है कि यदि वास्तव में ही घर घर जाकर वास्तविक मतदाताओं की पहचान की जाए तो जैसा की अधिकांशतः दिखता है आज बिहार के लगभग सारे गाँव घर खाली होते जा रहे हैं। 

 मतदाताओं की सूची में दर्ज़ नाम , और इस के साथ ही राशन कार्ड या सरकार द्वारा जारी पेंशन , कई योजनाओं और सहायता राशियों के लाभार्थियों  और वास्तविक प्राप्तकर्ताआं के बीच का ये अंतर इतना अधिक है कि केंद्र से मिला ढेर सारा पैसा लील जाता है।  और ये सब बिहार में दशकों से होता चला आए रहा है।  

यहाँ एक सबसे विकट समस्या ये है कि इतने काम समय में चुनाव आयोग द्वारा दशकों से जान बूझ कर की जा रही और इसकी बराबर अनदेखी को किस तरह से दोष रहित कर सकेगा।  इससे अलग जिस तरह से बिहार के सभी विपक्षी दलों ने कई सारे तर्कों और प्रश्नों से इस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं और उसका तीव्र विरोध कर रहे हैं उसमें ये देखना जरूरी होगा कि अभी आगे ये सुधार और कार्रवाई किस दिशा में आगे बढ़ते हैं ?? 


रविवार, 8 सितंबर 2024

निजता ख़त्म करता मोबाइल और इंटरनेट

 



आज के समय में मोबाइल और इंटरनेट ने मनुष्य के जीवन को बहुत अधिक प्रभावित किया है। यहाँ कुछ तरीके हैं जिनसे मोबाइल और इंटरनेट ने हमारे जीवन को प्रभावित किया है: संचार: मोबाइल और इंटरनेट ने संचार को बहुत आसान बना दिया है। अब हम दुनिया के किसी भी कोने में किसी से भी संपर्क में रह सकते हैं।जानकारी: इंटरनेट ने जानकारी को हमारे हाथों में रख दिया है। अब हम किसी भी विषय पर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। शिक्षा: मोबाइल और इंटरनेट ने शिक्षा को भी बदल दिया है। अब हम ऑनलाइन कक्षाओं में भाग ले सकते हैं और ऑनलाइन पाठ्यक्रम पूरे कर सकते हैं।व्यवसाय: मोबाइल और इंटरनेट ने व्यवसाय को भी बदल दिया है। अब हम ऑनलाइन व्यवसाय कर सकते हैं और दुनिया भर में अपने उत्पादों को बेच सकते हैं।. मनोरंजन: मोबाइल और इंटरनेट ने मनोरंजन के नए तरीके प्रदान किए हैं। अब हम ऑनलाइन फिल्में देख सकते हैं, गेम खेल सकते हैं और संगीत सुन सकते हैं।. स्वास्थ्य: मोबाइल और इंटरनेट ने स्वास्थ्य सेवाओं को भी बदल दिया है। अब हम ऑनलाइन डॉक्टरों से परामर्श ले सकते हैं और ऑनलाइन दवाएं खरीद सकते हैं।. बैंकिंग: मोबाइल और इंटरनेट ने बैंकिंग को भी बदल दिया है। अब हम ऑनलाइन बैंकिंग कर सकते हैं और ऑनलाइन लेन-देन कर सकते हैं।. यात्रा: मोबाइल और इंटरनेट ने यात्रा को भी बदल दिया है। अब हम ऑनलाइन टिकट बुक कर सकते हैं और ऑनलाइन होटल बुक कर सकते हैं।इन तरीकों से, मोबाइल और इंटरनेट ने हमारे जीवन को बहुत अधिक प्रभावित किया है और हमारे जीवन को आसान बना दिया है।

लेकिन सिर्फ ऐसा नहीं है कि मोबाइल के उपयोग के सिर्फ लाभ ही लाभ हैं नहीं बल्कि  मोबाइल और इंटरनेट के दखल से निजता का संकट आ गया है, यह बात सच है। मोबाइल और इंटरनेट के उपयोग से हमारी निजता पर कई तरह के खतरे हैं:डेटा चोरी: मोबाइल और इंटरनेट के उपयोग से हमारा व्यक्तिगत डेटा चोरी हो सकता है, जैसे कि हमारा नाम, पता, फोन नंबर, ईमेल पता आदि।सोशल मीडिया पर निगरानी: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म हमारी गतिविधियों पर निगरानी रखते हैं और हमारे व्यक्तिगत डेटा का उपयोग विज्ञापन और अन्य उद्देश्यों के लिए करते हैं। हैकिंग: मोबाइल और इंटरनेट के उपयोग से हमारे खातों को हैक किया जा सकता है, जिससे हमारी व्यक्तिगत जानकारी और डेटा चोरी हो सकता है।स्थान ट्रैकिंग: मोबाइल फोन हमारे स्थान को ट्रैक कर सकते हैं, जिससे हमारी गतिविधियों पर निगरानी रखी जा सकती है।  व्यक्तिगत जानकारी का दुरुपयोग: मोबाइल और इंटरनेट के उपयोग से हमारी व्यक्तिगत जानकारी का दुरुपयोग किया जा सकता है, जैसे कि हमारी जानकारी का उपयोग विज्ञापन और अन्य उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।इन खतरों से बचने के लिए, हमें मोबाइल और इंटरनेट का उपयोग सावधानी से करना चाहिए और अपनी निजता की सुरक्षा के लिए कदम उठाने चाहिए।

इसके साथ ही आजकल मोबाइल और इंटरनेट के अधिक उपयोग से कई खतरे भी आज हम सबके सामने हैं जैसे निजता की कमी: मोबाइल और इंटरनेट के उपयोग से हमारी निजता पर खतरा हो सकता है, जैसे कि हमारी व्यक्तिगत जानकारी का दुरुपयोग।साइबर हमले: मोबाइल और इंटरनेट के उपयोग से हमारे खातों को हैक किया जा सकता है, जिससे हमारी व्यक्तिगत जानकारी और डेटा चोरी हो सकता है।3. स्वास्थ्य समस्याएं: मोबाइल और इंटरनेट के अधिक उपयोग से स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं, जैसे कि आंखों की समस्याएं, पीठ दर्द, और मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं।4. सामाजिक अलगाव: मोबाइल और इंटरनेट के अधिक उपयोग से सामाजिक अलगाव हो सकता है, जिससे हमारे सामाजिक संबंधों पर खतरा हो सकता है।5. निर्भरता: मोबाइल और इंटरनेट के अधिक उपयोग से हमारी निर्भरता बढ़ सकती है, जिससे हमारे दैनिक जीवन पर खतरा हो सकता है।6. वित्तीय नुकसान: मोबाइल और इंटरनेट के उपयोग से हमारे वित्तीय जानकारी का दुरुपयोग किया जा सकता है, जिससे हमारे वित्तीय नुकसान हो सकता है।7. मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं: मोबाइल और इंटरनेट के अधिक उपयोग से मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं, जैसे कि चिंता, डिप्रेशन, और तनाव।इन खतरों से बचने के लिए, हमें मोबाइल और इंटरनेट का उपयोग सावधानी से करना चाहिए और अपनी निजता और सुरक्षा के लिए कदम उठाने चाहिए।

मोबाइल और इंटरनेट का उपयोग कोरोना काल के बाद से बच्चों में और अधिक बढ़ गया है लेकिन बच्चों और युवाओं पर मोबाइल इंटरनेट की बढ़ती लत के बहुत सारे दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं।  मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं: मोबाइल इंटरनेट की लत से चिंता, डिप्रेशन, और तनाव जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। शारीरिक स्वास्थ्य समस्याएं: मोबाइल इंटरनेट की लत से शारीरिक स्वास्थ्य समस्याएं जैसे कि आंखों की समस्याएं, पीठ दर्द, और नींद की समस्याएं हो सकती हैं।सामाजिक अलगाव: मोबाइल इंटरनेट की लत से सामाजिक अलगाव हो सकता है, जिससे बच्चों और युवाओं के सामाजिक संबंधों पर खतरा हो सकता है। शैक्षिक प्रदर्शन पर प्रभाव: मोबाइल इंटरनेट की लत से बच्चों और युवाओं के शैक्षिक प्रदर्शन पर प्रभाव पड़ सकता है, जिससे उनके भविष्य पर खतरा हो सकता है।निर्भरता: मोबाइल इंटरनेट की लत से बच्चों और युवाओं की निर्भरता बढ़ सकती है, जिससे वे अपने दैनिक जीवन में मोबाइल पर निर्भर हो जाते हैं।साइबरबुलिंग और ऑनलाइन खतरे: मोबाइल इंटरनेट की लत से बच्चों और युवाओं को साइबरबुलिंग और ऑनलाइन खतरों का सामना करना पड़ सकता है।परिवारिक संबंधों पर प्रभाव: मोबाइल इंटरनेट की लत से परिवारिक संबंधों पर प्रभाव पड़ सकता है, जिससे परिवार के सदस्यों के बीच दूरियां बढ़ सकती हैं।इन दुष्प्रभावों से बचने के लिए, माता-पिता और अभिभावकों को बच्चों और युवाओं के मोबाइल इंटरनेट के उपयोग पर निगरानी रखनी चाहिए और उन्हें स्वस्थ उपयोग के बारे में शिक्षित करना चाहिए।

मोबाइल।  कंप्यूटर , इंटरनेट और टीवी तक आज हमारी निजता का उल्लंघन कर सीधे हमारे घरों तक पहुँच कर हमारी सारी बातें देख सुन रहे हैं।  मोबाइल, टीवी, और अन्य उपकरणों के माध्यम से उपभोक्ता की बातें सुनकर उसे उसी अनुरूप विज्ञापन दिखाया जाता है। यह प्रक्रिया "वॉइस ट्रैकिंग" या "ऑडियो ट्रैकिंग" कहलाती है, जिसमें उपकरणों में लगे माइक्रोफोन के माध्यम से उपभोक्ता की बातें रिकॉर्ड की जाती हैं और फिर उसे विश्लेषण किया जाता है ताकि उपभोक्ता की रुचियों और पसंदों के अनुसार विज्ञापन दिखाया जा सके।यह प्रक्रिया कई तरीकों से की जाती है, जैसे कि:

वॉइस असिस्टेंट: वॉइस असिस्टेंट जैसे कि गूगल असिस्टेंट, सिरी, और एलेक्सा उपभोक्ता की बातें सुनते हैं और फिर उसे विश्लेषण किया जाता है ताकि उपभोक्ता की रुचियों और पसंदों के अनुसार विज्ञापन दिखाया जा सके।मोबाइल ऐप्स: कई मोबाइल ऐप्स उपभोक्ता की बातें सुनते हैं और फिर उसे विश्लेषण किया जाता है ताकि उपभोक्ता की रुचियों और पसंदों के अनुसार विज्ञापन दिखाया जा सके।स्मार्ट टीवी: स्मार्ट टीवी भी उपभोक्ता की बातें सुनते हैं और फिर उसे विश्लेषण किया जाता है ताकि उपभोक्ता की रुचियों और पसंदों के अनुसार विज्ञापन दिखाया जा सके।यह प्रक्रिया उपभोक्ता की निजता के लिए खतरा हो सकती है, इसलिए उपभोक्ताओं को अपने उपकरणों की सेटिंग्स को सावधानी से चुनना चाहिए और अपनी निजता की सुरक्षा के लिए कदम उठाने चाहिए।

आजकल समाज में बढ़ते अपराध में भी मोबाइल और  इंटरनेट की भूमिका कई तरह से देखने सुनने को मिल रही है , साइबर अपराध: मोबाइल इंटरनेट के माध्यम से साइबर अपराध जैसे कि हैकिंग, फिशिंग, और ऑनलाइन धोखाधड़ी बढ़ रहे हैं।सोशल मीडिया अपराध: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपराध जैसे कि साइबरबुलिंग, ऑनलाइन उत्पीड़न, और फर्जी खबरें फैलाना बढ़ रहे हैं।चोरी और लूट: मोबाइल इंटरनेट के माध्यम से चोरी और लूट की घटनाएं बढ़ रही हैं, जैसे कि ऑनलाइन शॉपिंग के माध्यम से चोरी और लूट।नशीली दवाओं का कारोबार: मोबाइल इंटरनेट के माध्यम से नशीली दवाओं का कारोबार बढ़ रहा है, जो समाज के लिए खतरनाक है।अतिवाद और हिंसा: मोबाइल इंटरनेट के माध्यम से अतिवाद और हिंसा को बढ़ावा मिल रहा है, जो समाज के लिए खतरनाक है। जालसाजी और धोखाधड़ी: मोबाइल इंटरनेट के माध्यम से जालसाजी और धोखाधड़ी की घटनाएं बढ़ रही हैं, जैसे कि ऑनलाइन जालसाजी और धोखाधड़ी।इन अपराधों को रोकने के लिए, हमें मोबाइल इंटरनेट के उपयोग को सावधानी से करना चाहिए और साइबर सुरक्षा के उपायों को अपनाना चाहिए।

सरकार और प्रशासन ने लोगों की निजता की सुरक्षा के लिए कई तरह के नियम क़ानून कायदे भी बनाए हैं जैसे डेटा प्रोटेक्शन एक्ट: सरकार ने डेटा प्रोटेक्शन एक्ट बनाया है, जो व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के लिए नियम और दिशानिर्देश प्रदान करता है।साइबर सुरक्षा नीति: सरकार ने साइबर सुरक्षा नीति बनाई है, जो साइबर अपराधों से निपटने और साइबर सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए नियम और दिशानिर्देश प्रदान करती है। डिजिटल सुरक्षा एजेंसी: सरकार ने डिजिटल सुरक्षा एजेंसी स्थापित की है, जो डिजिटल सुरक्षा के मुद्दों पर निगरानी रखती है और साइबर सुरक्षा को बढ़ावा देती है। निजता संरक्षण आयोग: सरकार ने निजता संरक्षण आयोग स्थापित किया है, जो निजता के मुद्दों पर निगरानी रखता है और निजता की सुरक्षा के लिए नियम और दिशानिर्देश प्रदान करता है।सार्वजनिक शिक्षा अभियान: सरकार ने सार्वजनिक शिक्षा अभियान चलाया है, जो लोगों को निजता की सुरक्षा के बारे में जागरूक करता है और उन्हें साइबर सुरक्षा के उपायों के बारे में शिक्षित करता है।इन उपायों के माध्यम से, सरकार निजता की सुरक्षा को बढ़ावा देने और साइबर अपराधों से निपटने के लिए काम कर रही है।

भविष्य में मोबाइल और इंटरनेट के बढ़ते उपयोग से समाज में कई तरह के खतरे और चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है समाज शास्त्रियों के मानें तो वे खतरे हैं निजता की कमी: इंटरनेट और मोबाइल के बढ़ते उपयोग से निजता की कमी हो सकती है, जिससे व्यक्तिगत जानकारी का दुरुपयोग हो सकता है।साइबर अपराधों का बढ़ना: इंटरनेट और मोबाइल के बढ़ते उपयोग से साइबर अपराधों का बढ़ना संभव है, जैसे कि हैकिंग, फिशिंग, और ऑनलाइन धोखाधड़ी।मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं: इंटरनेट और मोबाइल के बढ़ते उपयोग से मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं, जैसे कि चिंता, डिप्रेशन, और तनाव।शारीरिक स्वास्थ्य समस्याएं: इंटरनेट और मोबाइल के बढ़ते उपयोग से शारीरिक स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं, जैसे कि आंखों की समस्याएं, पीठ दर्द, और नींद की समस्याएं।सामाजिक अलगाव: इंटरनेट और मोबाइल के बढ़ते उपयोग से सामाजिक अलगाव हो सकता है, जिससे व्यक्तिगत संबंधों पर खतरा हो सकता है।आर्थिक नुकसान: इंटरनेट और मोबाइल के बढ़ते उपयोग से आर्थिक नुकसान हो सकता है, जैसे कि ऑनलाइन धोखाधड़ी और साइबर अपराधों के कारण आर्थिक नुकसान। शैक्षिक प्रदर्शन पर प्रभाव: इंटरनेट और मोबाइल के बढ़ते उपयोग से शैक्षिक प्रदर्शन पर प्रभाव पड़ सकता है, जिससे छात्रों के शैक्षिक प्रदर्शन पर खतरा हो सकता है।इन कठिनाइयों से निपटने के लिए, हमें इंटरनेट और मोबाइल के उपयोग को सावधानी से करना चाहिए और साइबर सुरक्षा के उपायों को अपनाना चाहिए।

बुधवार, 28 अगस्त 2024

फिल्म उद्योग में महिलाओं का शोषण

 

दक्षिण भारतीय सिनमा जगत का एक बड़ा नाम , मलयालम फिल्म उद्योग इन दिनों अपने उस काले अध्याय का सामना कर रहा है या कह सकते हैं कि उसका काला सच सामने आ गया है।  ऐसा हुआ है जस्टिस हेमा समिति की वो रिपोर्ट को सरकार को पांच वर्ष पहले सौंपी गई थी जिसे 19 अगस्त को सार्वजनिक किया गया।  


जस्टिस हेमा समिति की रिपोर्ट में मलयालम सिनेमा में महिलाओं के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न और लैंगिक असमानता के मुद्दों की जांच की गई है। इस समिति का गठन केरल सरकार द्वारा किया गया था, जिसकी अध्यक्षता सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस के हेमा ने की थी। रिपोर्ट में मलयालम फिल्म उद्योग में एक शक्तिशाली पुरुष समूह के अस्तित्व का खुलासा हुआ है, जिसमें 15 प्रमुख लोग शामिल हैं, जिनमें निर्देशक, निर्माता और अभिनेता शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यह शक्तिशाली पुरुष समूह यह तय करता है कि कौन उद्योग में रहेगा और किसे फिल्मों में कास्ट किया जाएगा ¹।

मलयालम फिल्म उद्योग में जस्टिस हेमा कमिटी की रिपोर्ट के बाद कई अभिनेताओं पर आरोप लगे हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख नाम हैं:दिलीप: अभिनेता दिलीप पर भावना मेनन के मामले में साजिश रचने का आरोप है।एम मुकेश: अभिनेता और सीपीआई (एम) विधायक एम मुकेश पर टेस जोसेफ और मीनू मुनीर द्वारा यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए गए हैं।जयसूर्या: अभिनेता जयसूर्या पर मीनू मुनीर द्वारा यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए गए हैंमणियानपिल्ला राजू: अभिनेता मणियानपिल्ला राजू पर मीनू मुनीर द्वारा यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए गए हैं।इदावेला बाबू: अभिनेता इदावेला बाबू पर मीनू मुनीर द्वारा यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए गए हैं ¹।

 मी टू प्रकरण एक वैश्विक आंदोलन है जो यौन उत्पीड़न और यौन दुर्व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाता है। यह आंदोलन 2017 में शुरू हुआ था, जब हॉलीवुड की अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने ट्विटर पर #MeToo हैशटैग का इस्तेमाल करते हुए अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के अनुभव साझा किए थे।इसके बाद, दुनिया भर की कई महिलाओं ने अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के अनुभव साझा किए, जिनमें कई प्रसिद्ध हस्तियाँ भी शामिल थीं। इस आंदोलन ने यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए एक मंच प्रदान किया और समाज में इस मुद्दे पर चर्चा शुरू की।


भारत में भी मी टू आंदोलन ने कई लोगों को अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के अनुभव साझा करने के लिए प्रेरित किया, जिनमें कई प्रसिद्ध हस्तियाँ भी शामिल थीं। इस आंदोलन ने भारत में यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

 बॉलीवुड में महिलाओं के शोषण के कई मामले सामने आए हैं, जिनमें यौन उत्पीड़न, दुर्व्यवहार और लैंगिक असमानता शामिल हैं। कुछ प्रमुख मामले हैं:तनुश्री दत्ता और नाना पाटेकर का मामला: तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था, जिसने मी टू आंदोलन को भारत में शुरू किया था।विकास बहल और फैंटम फिल्म्स का मामला: विकास बहल पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए गए थे, जिसके बाद फैंटम फिल्म्स को बंद कर दिया गया था। अनु मलिक और सोना महापात्रा का मामला: सोना महापात्रा ने अनु मलिक पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे, जिसके बाद अनु मलिक को इंडियन आइडल से निकाल दिया गया था।आलोक नाथ और विनता नंदा का मामला: विनता नंदा ने आलोक नाथ पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे, जिसके बाद आलोक नाथ को कई परियोजनाओं से निकाल दिया गया था।इन मामलों ने बॉलीवुड में महिलाओं के शोषण के मुद्दे को उजागर किया और इस मुद्दे पर चर्चा शुरू की 

 समाज शास्त्रियों की माने तो सिनेमा जगत में महिलाओं के शोषण को रोकने के लिए कई उपाय किए जा सकते हैं:जैसे शिकायत निवारण तंत्र: सिनेमा जगत में एक प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना चाहिए जो महिलाओं को अपनी शिकायतें दर्ज कराने के लिए सुरक्षित और समर्थन प्रदान करे। लैंगिक समानता प्रशिक्षण: सिनेमा जगत में काम करने वाले सभी लोगों को लैंगिक समानता और यौन उत्पीड़न के बारे में प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। महिला सुरक्षा अधिकारी: सिनेमा जगत में महिला सुरक्षा अधिकारी नियुक्त किए जाने चाहिए जो महिलाओं की सुरक्षा और कल्याण के लिए जिम्मेदार हों। शोषण विरोधी नीतियां: सिनेमा जगत में शोषण विरोधी नीतियां बनाई जानी चाहिए जो स्पष्ट रूप से यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार को परिभाषित करें और दंडित करें।महिला संगठनों को बढ़ावा: सिनेमा जगत में महिला संगठनों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए जो महिलाओं के अधिकार के लिए निडर होकर खड़ा हो सके।  


 सिनेमा जगत में महिलाओं के शोषण में फिल्मों की भूमिका जटिल और बहुस्तरीय है। फिल्में हानिकारक स्टीरियोटाइप्स को बढ़ावा दे सकती हैं और महिलाओं को वस्तु बना सकती हैं, जिससे शोषण की संस्कृति बनती है। यहाँ कुछ तरीके हैं जिनसे फिल्में शोषण में भूमिका निभा सकती हैं:

वस्तुकरण: फिल्में अक्सर महिलाओं को वस्तु बना देती हैं, उन्हें केवल उनके शारीरिक रूप और यौन आकर्षण तक सीमित कर देती हैं।स्टीरियोटाइप्स: फिल्में महिलाओं के बारे में हानिकारक स्टीरियोटाइप्स को बढ़ावा देती हैं, उन्हें कमजोर, आज्ञाकारी और पुरुषों पर निर्भर दिखाती हैं।हिंसा का सामान्यीकरण: फिल्में महिलाओं के प्रति हिंसा को सामान्य बना सकती हैं, इसे स्वीकार्य या यहां तक ​​कि ग्लैमरस बना सकती हैं।पितृसत्तात्मक मूल्यों को मजबूत करना: फिल्में पितृसत्तात्मक मूल्यों और मान्यताओं को मजबूत कर सकती हैं, यह विचार बढ़ावा देती हैं कि पुरुष महिलाओं से श्रेष्ठ हैं।प्रतिनिधित्व की कमी: फिल्में अक्सर महिलाओं के विविध प्रतिनिधित्व की कमी होती है, उन्हें हाशिए पर डाल देती हैं और यह विचार बढ़ावा देती हैं कि वे कथा के केंद्र में नहीं हैं।लिंगवादी संवाद और हास्य: फिल्में अक्सर लिंगवादी संवाद और हास्य का उपयोग करती हैं, जो महिलाओं के प्रति हानिकारक दृष्टिकोण को बढ़ावा देती हैं। शोषण का ग्लैमराइजेशन: फिल्में शोषण को ग्लैमराइज कर सकती हैं, इसे वांछनीय या स्वीकार्य बना सकती हैं।

हालांकि, फिल्में इन मुद्दों को चुनौती देने और परिवर्तन को बढ़ावा देने में भी भूमिका निभा सकती हैं। मजबूत, जटिल महिला पात्रों को चित्रित करके और शोषण और हिंसा जैसे मुद्दों को संबोधित करके, फिल्में सांस्कृतिक दृष्टिकोण को बदलने और अधिक समान उद्योग को बढ़ावा देने में मदद कर सकती हैं।न्यायमूर्ति हेमा समिति ने मलयालम फिल्म उद्योग पर एक महत्वपूर्ण प्रभाव डाला है, जिसमें सभी पेशेवरों के लिए, विशेष रूप से महिलाओं के लिए, एक सुरक्षित और अधिक सम्मानजनक कार्य वातावरण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है। यह एक अधिक समावेशी और न्यायसंगत उद्योग बनाने की दिशा में एक कदम है।

मंगलवार, 27 अगस्त 2024

बांग्लादेशी हिन्दुओं की सुरक्षा सुनिश्चि हो : भारत

 



भारत का एक और पडोसी देश बांग्लादेश भी अपने पूर्ववर्ती और मूल देश पाकिस्तान की तरह ही अब फिर से वही पुराना पूर्व पकिस्तान बनने की राह पर है किन्तु बांग्लादेश का हाल और हालात आज पाकिस्तान से भी कहीं अधिक बुरे हो चुके हैं।  राजनैतिक अस्थिरता के भंवर में पहले ही फंसे बांग्लादेश में हाल ही में आई प्राकृतिक आपदा बाढ़ की विभीषिका ने  बांग्लादेश की हालत और खराब कर दी है।  

बांग्लादेश की सबसे प्रमुख विपक्षी दल  ने वहा के सबसे बड़े और चरमपंथ के कट्टर हिमायती हिफाजत ए इस्लाम के दबाव और प्रभाव में बांग्लादेश के छात्रों युवाओं को अदालत के एक आदेश की मुखालफत के बहाने लोकतंत्र से सत्ता में आई पार्टी और उसके नेता को दरबदर करके , सत्ता पक्ष और उसके तमाम सहयोगियों ,संस्थानों , सेना पुलिस , न्यायपालिका सबको बेदखल कर दिया और अपने राजनैतिक विरोधियों को ख़त्म भी कर दिया।  

छात्रों की अगुआई वाले इस तख्ता पलट ने कुछ ही समय बाद बांग्लादेश के अर्थशास्त्री मुहम्मद यूनुस के नेतृत्त्व में एक आतंरिक सरकार का गठन भी कर लिया और सेना , पुलिस सहित सभी स्थानों संस्थाओं पर अपने मन मुताबिक़ नियुक्ति भी कर दी गई।  छात्र नेता खुद भी कई जिम्मेदारियों की कमान संभाल के बैठ गए।  

इस बीच दो राजनैतिक दलों , दोनों ही मुस्लिम बाहुल्य एक तीसरे चरमपंथी कट्टर समूह के प्रभाव में एक दूसरे से सत्ता और शक्ति के लिए लड़ते हैं लेकिन इसकी आड़ में फिर अपने ही देश के अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर , उनके घर ,दफ्तर ,मंदिर , दूकान सब पर हमले करके लूटपाट और उपद्रव करके उन पर भयंकर अत्याचार करते हैं। 

पूरे देश के एक हीसे जहां अल्पसंख्यक आबादी रहती थी वाहन से पुलिस थाना क़ानून सबको बंद करके पूरे देश के कट्टर चरमपंथियों को अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करने की खुली छूट दे दी जाती है क्यों ?? क्यूंकि उनका मानना था की सत्ता से बेदखल हुई शेख हसीना और उनकी पार्टी को अल्पसंख्यक हिन्दुओं का भी समर्थन प्राप्त था और इस कुतर्क से उनके अनुसार उन्हें अपने ही देश के नागरिकों को लूटने मारने काटने और खत्म कर देने का अधिकार मिल गया।  एक अमेरिकी अखबार ने भी बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हमले को बदले में की गई कार्यवाई बताया।  

अब हालत ऐसे है की छात्रों द्वारा बनाए गए देश के मुखिया यूनुस से ही छात्रों का सामंजस्य टूट गया है और बांग्लादेश की राजधानी ढाका समेत पुरे देश में फिर से अराजकता के अगले दौर की और बढ़ गया है।  इन सबके बीच बांगलेश के मजहबी आकाओं ने अवसर पाते है अपने तालिबानी फरमानों और शरिया के पाबंदियों को लागू करने का फरमान और फतवा जारी कर दिया है।  हर उस चीज़ और कार्य के विरुद्ध फतवा जारी कर दिया गया है जो मुस्लिम क़ानून में प्रतिबंधित है।  गैर मुस्लिमों को भी हिजाब पहनने का हुक्म जारी हुआ है।  

बांग्लादेश की सरकारी सेवाओं संस्थानों में दशकों से कार्य कर रहे हिन्दुओं को द्वारा कर मार पीट कर उन्हें जबरन नौकरी घर दूकान छोड़ने पर विवश किया जा रहा है।  सबसे दुखद बात ये है कि ये सब खुलेआम हो रहा है और इसके सारे ऑडियो वीडियो प्रमाण समाचार तंत्र और इंटरनेट पर मौजूद हैं इसके बावजूद भी हिन्दुओं के इस नरसंहार पर पूरी दुनिया की चुप्पी शर्मनाक है।  

बांग्लादेश के अंतरिम प्रमुख मुहम्मद यूनुस का भारतीय प्रधानम्नत्री मोदी को " हिन्दुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की बात कहने के बावजूद भी स्थति में सुधार नहीं आता देख प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रीपति सहित विश्व के बहुत से देशों से बात कर बांग्लादेश में हिन्दुओं पर होते अत्याचार की पर ध्यान दिलाया।  आने वाले समय में भी  हिन्दुओं और दुसरे अल्पसंख्यकों के लिए बांग्लादेश में हालात चिंताजनक ही बने रहने की संभावना है खासकर जब बांदलादेश अब पूरी तरह से मज़हबी कट्टरता में फंसता और बुरी तरह धँसता राष्ट्र बन चुका है।  

सोमवार, 26 अगस्त 2024

आरक्षण की बैसाखी : न टूटे , न छूटे

 



पूरी दुनिया आज विश्व के सामने आ रही चुनौतियों , समस्याओं के लिए अपने अपने स्तर पर शोध , खोज , विमर्श कर रहे हैं , इससे इतर कुछ मज़हबी कट्टरता से दबे देशों का समहू लगा हुआ है अपने विध्वसंकारी मंसूबों की पूरा करने में।  इन सबसे अलग भारत जो अब विश्व के प्रभावशाली देशों में शामिल है वाहन की राष्ट्रीय राजनीति के बहस ,  मंथन का विषय है -आरक्षण व्यवस्था।  दुखद आश्चर्य है कि देश की स्वतंत्रता के सत्तर वर्ष के पश्चात भी आज भारतीय समाज , राजनीति , सब कुछ जातियों का निर्धारण , पुनर्निधारण , वर्गीकरण और अंततः आरक्षण  व्यवस्था के इर्द गिर्द ही घूम रही है।  

सर्वोच्च प्रशासनिक सेवाओं में योग्य व्यक्तियों की नियुक्ति का फैसला और फिर उसे आरक्षण व्यवस्था के अनुरूप न पाए जाने को लेकर हाल ही में रद्द की गई लेटरल भर्ती योजना की बात हो या फिर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में निर्णीत एक वाद के आदेश की मुखालफत का जिसमें माननीय अदालत ने वर्षों से चली आ रही आरक्षण व्यवस्था के अभी तक के परिणामों प्रभावों का आकलन विश्लेषण करके आइना दिखा दिया था।  और इस आदेश की प्रतिक्रिया का हाल ये रहा कि केंद्र सरकार और स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा ारसखान व्यवस्था को किसी भी प्रकार से कमोज़र न किए जाने की बात कहने के बावजूद भी देश भर में हड़ताल बंद और प्रदर्शन किया गया।  

देश का सबसे पुराना राजनैतिक दल और अब विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के सर्वोसर्वा राहुल गांधी अपनी अतार्किक बातों बयानों में जिस तरह से सरकार से एक एक व्यक्ति की जाती पूछने बताने के बालहठ पर अड़े हैं उसकी गंभीरता इसी बात से समझी जा सकती है की वे भारतीय सुंदरियों की विजेताओं की सूची में जाती तलाश रहे थे और  कोई भी आरक्षित जातियों में से क्यों नहीं है , ये सवाल उठा रहे थे।  

कुछ वर्षों पूर्व बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी क्रिकेट तथा अन्य खेलों में आरक्षण व्यवस्था को लागू करने की बात कही थी।  ये बातें , बयान , और सोच बताते हैं कि दलितों , वंचितों शोषितों के सामाजिक उत्थान तथा अवसरों में समानता संतुलन के लिए बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने जिस आरक्षण व्यवस्था की कल्पना की थी , ये उससे कहीं दूर और अलग है।  

देश में पचास वर्षों से अधिक सत्ता और शासन में बैठी कांग्रेस  और इसके नेता वर्तमान में सबसे बड़ी वैचारिक दरिदता से गुजर रहे हैं इसलिए लगातार तीन चुनावों में बुरी तरह हारने के बावजूद भी देश को जबरन जातीय जनगणना करके दिखाने का दवा कर रहे हैं।  कांग्रेस की दिक्कत ये भी है की विपक्ष में उसके साथ बैठे अन्य दुसरे दल , इस मुद्दे पर कांग्रेस के साथ उतनी प्रतिबद्धता से नहीं दिखाई दे रहे हैं।  कोई भी कांग्रेस की आरक्षित जातियों की इस स्व घोषित ठेकेदार बनने से खुश नहीं दिख रहे।  

विश्व में भारत , नेपाल , बांग्लादेश जैसे गिनती के दो तीन देशों को छोड़कर आज कोई भी देश समाज सरकार आरक्षण या ऐसी किसी भी व्यवस्था अपने यहाँ अपनाए हुए हैं जिसमें सिर्फ जाती को मेधा और योग्यता के ऊपर वरीयता दी जाती हो।  यहाँ तो जातियों को उपजातियों में बांटने की योजनाएं चल रही हैं।  सबसे बड़ी विडंबना यह है की दशकों से चली आ रही इस विवशता के आकलन विश्लेषण , परिणाम और परिवर्तन को लेकर न्यायपालिका के मंतव्य को समझने के बावजूद आरक्षण व्यवस्था वो घंटी बन गई है जिसे बजाना हर कोई चाहता है , बाँधना कोई नहीं।  

किसी भी देश समाज में सामाजिक समरसता और संतुलन के लिए देश समाज द्वारा प्रयास किया जाना कोई अनुचित प्रयोग नहीं है किन्तु भारतीय समाज को कभी न कभी तो जबरन थामी इस बैसाखी का सहारा छोड़ योग्यता के आधार पर जीना बढ़ना होगा क्यूंकि दुनिया यही कर रही है और यही सबसे उपयुक्त है।  

रविवार, 25 अगस्त 2024

बलात्कार : स्त्री के प्रति एक जघन्य अपराध

 




अब से कुछ वर्षों पहले जब देश की राजधानी दिल्ली में सर्दियों की एक रात में , वहशी दरिंदे अपराधियों ने एक चलती हुई बस में एक बच्ची का सामूहिक बलात्कार करके अमानवीय और नृशंस तरीके से उसकी ह्त्या करके सड़क पर फेंक दिया।  अपराध इतना वीभत्स और भयानक था कि इसने पूरे देश को बेटियों की सुरक्षा के प्रति उद्वेलित किया।  सरकार , समाज की प्रतिक्रया देख कर लगा था कि शायद अब महिलाओं के विरुद्ध अत्याचार और शोषण की घटनाओं पर अंकुश लग सकेगा।  

आज एक दशक के बाद जब अभी दस दिन पूर्व एक महिला प्रशिक्षु चिकित्सक के साथ वही बर्बबरता , वही शोषण करके क्रूर तरीके से उसकी ह्त्या कर दी गई है और एक बार फिर देश खूबड़ और आक्रोशित है।  सच तो ये है कि दिल्ली के उस और कोलकाता के इन दो अपराधों के बीच बीते समय में भी देश भर में बच्चियों , युवतियोन और महिलाओं पर अत्याचार शोषण की हज़ारों लाखों घटनाएं हर साल , हर महीने , हर दिन घटती रही हैं और ये अब भी बदस्तूर जारी है।  

किसी भी देश या समाज की सभ्यता , संस्कृति और संस्कार इस बात पर निर्भर करते हैं कि वो अमुक समाज , देश अपनी स्त्रियों , बच्चों वृद्धों  और बेजुबान पशु पक्षियों से कैसा व्यवहार करता है , उनके प्रति कितनी आत्मीयता दया भाव रखता है और किस तरह से इनकी सुरक्षा , संरक्षण और सहायता के लिए खुद को प्रतिबद्ध करता है।  किन्तु ये उतनी ही अफ़सोस की बात है कि भारतीय समाज अपने वृद्धों , बच्चों , महिलाओं के प्रति कहीं से भी संवेदनशील और सहृदय नहीं है तो बेजुबानों की तो क्या ही कहा जाए।  


राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर नज़र डालें तो स्थति की भयवहता का अनुमान हो जाता है।  दिसंबर 2023 को जारी रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार भारत में महिलाओं के प्रति किए जा रहे अपराधों में पिछले वर्ष की तुलना में ये 4 % और अधिक बढ़ गया।  रिपोर्ट में खुलासा किया गया है की वर्ष 2020 में कुल 3 ,  71 ,  503  घटनांए तो वर्ष 2021 में ये बढ़कर4 ,  28 ,  278 हो गेन और वर्ष 2022 में यह संख्या और अधिक बढ़कर 4 , 45, 256 घटनाओं की हो गई और ये सब वो मामले हैं जो दर्ज़ किए जा सके हैं।  रिपोर्ट बताती है कि 31 प्रतिशत मामलों में तो घर वाले ही कहीं कहीं संबधित पाए गए हैं और 20 प्रतिशत मामले में उनका अपहरण और शोषण किया गया।  महिलाओं के प्रति अपराध में उत्तर प्रदेश , राजस्थान , पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की स्थति ज्यादा सोचनीय है।  

ऐसा नहीं है कि सरकार , प्रशासन और विधायिका बलात्कार जैसे घृणित अपराध को रोकने के लिए सोच या कर नहीं रहीं हैं , दिल्ली निर्भया मामले के बाद महिलाओं के प्रति अपराध विषयक कानूनों में और अभी हाल ही में लाए संशोधन में दंड को अधिक कठोर किए जाने के बावजूद कानूनों में परिवर्तन मात्र से या दंड को अधिक कठोर भर कर देने से इस अपराध और अपराधियों के मनोभाव पर कोई फर्क पड़ता नहीं दिख रहा खासकर उन परिस्थितयों में जब अपराधी कई खामियों की वजह से साफ़ बच निकलते हैं या छूट जाते है और सालों साल चलने वाले न्यायिक अभियोग के बाद मिले दंड को भुगतने से बचने के लिए भी कानूनी विकल्पों का का सहारा लेते हैं।  हाल ही में राम रहीम को बार बार मिल रहे फर्लो का उदाहरण देख सकते हैं।  

इस घृणित अपराध के अपराधियों में कानून व्यवस्था या अपने अपराध के लिए भुगते जाने वाले दंड का रत्ती भर भी भय नहीं होने की सबसे बड़ी वजह है न्याय मिलने में समयातीत देरी।  विडम्बना या त्रासदी इससे बड़ी और क्या हो सकती है कि संयोगवश अभी हाल ही में , अजमेर में 32 वर्ष पूर्व 100 कालेज जाने वाली बच्चियों का शोषण किया गया , आधे दर्जन पीड़िताओं ने आत्महत्या तक कर ली थी और पूरे 32 वर्ष के बाद सत्र न्यायालय द्वारा दोषियों को उम्र कैद की सजा सुनाई गई है।  गौरतलब है की अभी उच्च न्यायालय और सर्वोच्चय न्यायालय में अपील दलील का विकल्प उपलब्ध है।  

महिलाओं युवतियों यहाँ तक कि बच्चियों पर भी हुए अत्याचारों , अपराधों , को लेकर भी देश की पुलिस अफसोसजनक रूप से बेहद असंवेदनशील और गैर जिम्मेदार रवैया दिखाती है।  हाल ही में महाराष्ट्र के बदलापुर में मात्र चार वर्ष की अबोध बच्चियों के साथ शोषण की शिकायत ,पुलिस अधिकारी तीन दिनों तक अनसुनी करती रही जबकि जांच अधिकारी एक महिला पुलिसकर्मी थीं।  शोषण , छेड़छाड़ आदि के अपराध में पीड़ितों की यही शिकायत रहती है की समय रहते ही पुलिस नहीं सुनती , कार्यवाही नहीं करती और वारदात के बाद भी लीपापोती करती है।  

अपनी है आधी आबादी , अपनी ही माँ , बेटी , बहन की सुरक्षा , मान , मर्यादा सुनिश्चित नहीं कर पाने वाला समाज ,देश खुद को विश्व में कितना ही शक्तिशाली और प्रभावशाली बना ले , घोषित कर ले किन्तु ये शक्ति ये प्रभाव किसी भी परिस्थति में आधा ही रहेगा।  सबसे बड़ी बात ये है कि जिस तरह से असम में और इससे पहले बंगलौर में भी ऐसे अपराधों को अगले २४ घंटे में मौत की नींद सुला देने वाले तमाम कारण फिर आम जनमानस को इतनी बड़ी और भारी भरकम न्याय व्यवस्था से कहीं अधिक जरूरी और सही लगने लगे तो ये और भी सचेत हो जाने वाली बात है।  समय रहते ही सब कुछ ठीक करने की दिशा में यदि सच में ही कुछ किया नहीं गया तो समाज के लिए विषम परिस्थितियाँ बनेंगी और समाज से कोई भी अछूता नहीं बचता कोई भी नहीं।   



मंगलवार, 6 अगस्त 2024

दुर्घटनाओं के लिए क्यों नहीं तय हो पाती किसी की जिम्मेदारी ??

 





दुर्घटनाओं के लिए क्यों नहीं तय हो पाती किसी की जिम्मेदारी ??


इस देश में कुछ बातें असाधारण और बेहद चिंताजनक होते हुए भी , इतनी बार दोहराई जा चुकी हैं कि वो अब साधारण बातें और रोज़ाना की दिनचर्या में से एक जैसी ही बन गई हैं या शायद बना दी गई हैं।  हमारे आसपास लापरवाही के कारण होने वाली  सैकड़ों दुर्घटनाएं , फिर चाहे वो कोई रेल दुर्घटना हो , किसी समारोह आयोजन में अचानक मची भगदड़ हो या फिर हाल ही में दिल्ली जैसे महानगर के बीचोंबीच बारिश के पानी में डूब कर तीन युवा बच्चों की मौत , या दिल्ली में ही  खुले नाले में गिर कर एक महिला और उसकी बच्ची की मौत ।  ये तमाम घटनाएं , दुर्घटनाएं , बार बार घटती हैं , हर साल घटती हैं , बस समय और स्थान बदल जाता है। 

इन दुर्घटनाओं के तुरंत बाद दो काम करके आगे बढ़ जाने का जो चलन चला आ रहा है वो जैसे अब एक नियति ही बन चुका है।  दुर्घटना के पीड़ितों को आर्थिक सहायता के नाम पर कुछ अनुदान राशि देने की घोषणा और उसके साथ ही दुर्घटना की जांच करने के लिए किसी जांच दल , आयोग का गठन करके रिपोर्ट आने पर दोषियों को बख्शे नहीं जाने का दावा।  जबकि असलियत में इन तमाम दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार संस्था , अधिकारी या विभाग तक की पहचान करके उसे क़ानून की चौखट तक ले जाना ही सबसे असंभव कार्य हो जाता है।  

दिल्ली के कोचिंग सेंटर दुर्घटना मामले को देख कर इसे आसानी से समझा जा सकता है , जहां पुलिस ने जांच के नाम पर कोचिंग संस्थान के गेट को उखड़वा कर उसकी मजबूती जांच परख कर रही है वहीँ दोषी के रूप में पकड़ लिया एक वाहन चालाक को ,बकौल पुलिस जिसकी तेज़ रफ़्तार के कारण ही जलभराव का पानी बेसमेंट में भर गया और छात्र डूब कर मर गए।  जांच में कोचिंग संस्थान के मालिक , उस केंद्र के संचालक , मैनेजर , व्यवस्थापक , भवन में अवैध रूप से पुस्तकालय बनाने , इसकी अनुमति देने वाले और ऐसा होते देने रहने वाले तमाम , इन दर्जन भर लोगों को छोड़कर दोषी हुई वो कार जिसके हिचकोले से कोचिंग संस्थान का गेट टूट गया।  अदालत ने भी ये सब देखकर पुलिस और जांच एजेंसियों को कड़ी फटकार लगाई।  

ऐसी ही एक दूसरी दुर्घटना , जिसमें दिल्ली नगर निगम ने एक बड़े नाले की मरम्मत करते हुए उसे खुला छोड़ दिया जहां बारिश के जलभराव में एक महिला और उसकी बच्ची की गिर कर मृत्यु हो गई और अभी तक दिल्ली विकास प्राधिकरण और दिल्ली नगर निगम के बीच एक दुसरे को दोषी ठहराने की कवायद जारी है।  

जिस तरह से भीड़ का अपराध या भीड़ में किसने कौन का अपराध किया ये तय कर पाना हमेशा ही दुरूह कार्य होता है ठीक ऐसा ही होता किसी भी दुर्घटना के लिए जिम्मेदार आरोपियों को और यदि ये सरकारी महकमा हुआ तो ये और भी अधिक कठिन बल्कि बेहद दुष्कर हो जाता है।  एक विभाग का नाम आते ही उसके सहयोगी अन्य किसी न किसी विभाग पर भी ऊँगली उठती है।  जितने विभाग उनके उतने कर्मचारी अधिकारी जो , सभी सम्बंधित हैं या फाइल कागजातों में सबके नाम आ जाते हैं ऐसे में फिर सब एक दूसरे क बचाने में लग जाते हैं।  

नाले में गिर कर मृत्यु वाले  हादसे मामले में मुकदमे की सुनवाई करते हुए आखिरकार न्यायालय को सख्त रुख अपनाना पड़ा है और उसने सीधे सीधे जांच एजेंसी और दोषी संस्थाओं से आरोपियों की पहचान कर उन पर कार्रवाई करने अन्यथा अदालत द्वारा स्वय आदेश देकर ऐसा किए जाने की सख्त चेतावनी दी गई  है।  

जब दुर्घटनाओं के लिए किसी की जिम्मेदारी तय करने में हम उलझे रह जाते हैं तो फिर दुर्घटना के कारणों , और उस दुर्घटना से सीख लेकर भविष्य में ऐसी दुर्घटनए न हों इसके लिए विचार और उपाय आदि पर काम करना तो बहुत दूर की कौड़ी होती है।  असल में हालात तो ये है कि कोई भी दुर्घटना का समाचार और लोगों का उससे सरोकार भी सिर्फ और सिर्फ तभी तक रहता है जब तक कोई और नई दुर्घटना हमारे सामने नहीं आ जाती।  ये देश ऐसे ही चलता है , ऐसे ही चलता रहा है।  


बुधवार, 10 अप्रैल 2024

भ्रष्टाचार के दलदल में फंसी : केजरीवाल एन्ड पार्टी

 







जी हाँ अब तो लोगबाग भी , कभी लोगों के बीच से ही अचानक किसी सिनेमाई अंदाज़ में सीधे दिल्ली की बागडोर थाम कर सत्ता में आई आम आदमी पार्टी , को इसी नाम से बुलाने लगे हैं , केजरीवाल एन्ड पार्टी।  और ऐसा इसलिए है क्यूंकि जनलोकपाल लाकर राजनैतिक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की मांग और उद्देश्य से गढ़ी गई पार्टी ,के शुरूआती जुझारू लोग जो समय रहते ही सब कुछ भांप समझ कर अलग हो गए थे उसके बाद बचे तमाम बड़े राजनेता , और किसी आरोप में नहीं बल्कि भ्रषटाचार से अवैध धन कमाने और उसके दुरुपयोग में एक एक करके जेल जा रहे हैं और लाख दलीलों और तर्कों के बावजूद भी अदालत को अपनी बेगुनाही के इरादे से भी संतुष्ट नहीं कर पा रहे हैं।  

आज आम आदमी पार्टी और इसके मुख्य बचे हुए संयोजक , बचे हुए इसलिए क्यूंकि कभी , इसी भ्रष्टाचार के विरूद्ध शुरू किये गए तथाकथित संघर्ष के प्रणेता अन्ना हज़ारे और सभी बेहतरीन साथी , पूर्व प्रशानिक अधिकारी किरण बेदी , पूर्व न्यायमूर्ति संतोष हेगड़े , साहित्यकार कवि कुमार विश्वास , सामाजिक आंदोलनकारी योगेंद्र यादव , राजनैतिक साथी कपिल मिश्रा और तमाम वो लोग जिन्हें कहीं न कहीं और कभी न कभी ये एहसास हो गया था कि सब कुछ वैसा नहीं है जैसा लोगों को दिखाया और बताया जा रहा है , वे सब धीरे धीरे अरविन्द केजरीवाल का साथ छोड़ते गए और इस जगह को भरने के लिए आए कौन , संजय सिंह और भगवंत मान जैसे राजनेता , इसका दुष्परिणाम सामने ही है।  




अरविन्द केजरीवाल की गिरफ्तारी की खबर पर अपनी गैर जरूरी प्रतिक्रिया देने वाले और बाद में बुरी तरह से फटकार खाने वाले पश्चिमी देशों के साथ साथ देश और दिल्ली को भी ये जानना बहुत जरूरी हो जाता है कि एक तरह जो राजनैतिक दल , बाकायदा अपने चेहरे और अपनी बात कहने के लिए लाखों रुपये प्रचार प्रसार पर खर्च कर रहा था और बार बार ये जता और बता रहा था कि , राजधानी दिल्ली की शिक्षा और चिकित्सा व्यवस्था में , पार्टी और उसकी नीतियों या परिवर्तनों के कारण क्रांतिकारी बदलाव आए और लाए गए , और फिर रात के अँधेरे में यही अच्छे लोग , अच्छी सोच और नीयत वाले लोग , अचानक से शराब बेच कर और बेच कर नहीं बल्कि शराब बेचने खरीदने और पीने की होड़ लगाकर पैसा जुटाने की जुगत में लग गया।  

फिलहाल जो स्थिति आम आदमी पार्टी के तमाम उन राजनेताओं की , जिनका या जिन जिन का इस शराब बेचने के नियम कायदे को बदल कर पैसा बनाने के शर्मनाक अपराध से थोड़ा सा भी तालमेल निकल सकता है , उन सबको अपने ऊपर कानून की तलवार लटकती दिख रही है और जो इस अपराध को रचने और करने के प्रथम दृष्टया दोषी पाए गए हैं वे सब निरंतर अपने ऊल जलूल तर्कों और बहुत सी गैर जरूरी याचिकाएँ लगा लगा कर निरंतर इस दलदल में नीचे को ओर धँसते जा रहे हैं।  आश्चर्य इस बात पर भी होता है कि आम आदमी पार्टी के तमाम राजनेताओं की पैरवी कर रहे हैं अधिवक्ता अभिषेक मनु शिंगवी ,जो कांग्रेस के जाने माने नेता हैं , वही कांग्रेस जिसे आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में सिरे से ठिकाने लगाया था , गांधार नरेश शकुनि ने कुरु साम्राज्य से बदला लेने के लिए ही महाभारत करवाया था कहते हैं , बाकी तो सब वही जाने।  


सोमवार, 1 जनवरी 2024

कई सुधारों की दरकार में : कारागार प्रशासन व्यवस्था

 





अभी हाल ही में सुर्खियों में आया समाचार जिसमें एक फोन निर्माता कंपनी के मालिक जो एक आर्थिक अपराध में तिहाड़ केन्द्रीय कारागार में निरुद्ध है , आरोपी हरिओम राय से जेल में सुविधा दिए जाने के नाम पर जेल कर्मियों ने डरा धमका कर  पांच करोड़ रुपये वसूल लिए।  चिंताजनक  बात यह नहीं है कि देश की राजधानी दिल्ली और कभी आदर्श कारागार के रूप में माना जाने वाला तिहाड़ प्रशासन पर इस तरह से से आरोप लगा है।  

गंभीर बात तो ये है कि एक के बाद एक राजनेता सत्येंद्र जैन से लेकर ठगी के आरोपी सुकेश चंद्रशेखर जैसे कारागार में पहले से निरुद्ध आरोपियों ने जेलकर्मियों द्वारा इसी तरह के और इससे भी कई तरह के गम्भ्भीर अनुचित क्रियाकलापों की शिकायत की है।  ध्यान देने की बात ये भी है की है प्रोफ़ाइल विचाराधीन  बंदियों/आरोपियों से जेल कर्मियों द्वारा उगाही की ये कुछ वो घटनाएं हैं जो जाने अनजाने समाचार माध्यमों में आ गईं।  दूसरी ये कि जब आर्थिक कदाचार/भ्रष्टाचार आदि मामलों के ऐसे हाई प्रोफ़ाइल बंदियों के साथ यह सब घटित हो रहा है तो ऐसे में साधारण कैदियों की दशा का अनुमान लगाना सहज है।  

कारागारों की छवि किसी भी काल में समाज में अच्छी नहीं रही है किन्त ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में कारागार -यातना, सामूहिक दंड और मृत्यु दंड देने की कोठरी बन कर रह गई थी।  जेलों की अमानवीय हालातों को राजनैतिक बंदियों द्वारा  महसूस और अनुभव करने के बाद जेलों में दंड , प्रायश्चित और सुधार के लिए लाए गए बंदियों के लिए ,उन्हें रखे जाने से लेकर , उनसे श्रम और सेवा लिए जाने वाले , सुधारने के साथ साथ शिक्षा स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतें सुनिश्चित करने के लिए बाकायदा कारागार नीति नियमों को संहिताबद्ध कर दिया गया।  

कभी इसी तिहाड़ कारागार में बंदियों के सुधार और उन्हें मुख्य धारा में लाने के लिए विख्यात पुलिस प्रशासक किरण बेदी ने बहुत से नए प्रयोग और प्रयास किए थे।  आज वही केंद्रीय कारागार , थोड़े थोड़े समय बाद अपने व्यवस्थाओं की अनियमततताओं और कदाचार के लिए समाचार में आए तो ये दुःख और चिंता की बात है।  

कारागार तिहाड़ देश की राजधानी दिल्ली का केंद्रीय कारागार होने के साथ साथ देश के सबसे विशाल कारागार में से है।  कैदियों के वर्गीकरण के आधार पर तिहाड़ एक दर्जन से अधिक कारगार में बंदियों को निरुद्ध रखा जाता है।  इसमें गंभीर अपराधों में लिप्त आरोपियों , बंदियों, महिला बंदियों तथा राजनैतिक बंदियों के लिए अलग अलग कारागारों की व्यवस्था है।  

कारागार प्रशासन की विफलता से जुडी घटनाये प्रदेश के कारागार प्रशासनों के विषय में सामने आती रही हैं।  
ऐसी ही एक बड़ी घटना को पिछले दिनों पजाब राज्य के एक कारागार में अंजाम दिया गया था। बिहार का कारगर प्रशासन तो लालू यादव मामले में बाकायदा फटकार तक खा चुका है।  महाराष्ट्र , बंगाल , सहित और बहुत  से राज्यों की कारागारों से अनेक तरह की अनियमितताओं ,भ्रष्टाचार के समाचार सामने आते रहे हैं।  

चाहे छापे के दौरान बंदियों से मोबाइल मिलने की बात हो या फिर जेल के अंदर से ही बड़े गंभीर अपराधों की साजिश षड्यंत्र बनाने वाली बंदियों की गैंग की खबरें , जेल के अंदर चल रही पूर्व मंत्री की सेवा मालिश हो या अब वीवो के मालिक हरिओम राय से सुविधा शुल्क के रूप में लिया जाने वाला पांच करोड़ , हर घटना इस बात का इशारा कर करती है की केंद्रीय कारागार तिहाड़ प्रशासन में अब कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है।  

कारागार राज्य का विषय होता है इसलिए इसका दायित्व प्रदेश सरकार पर होता है।  राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और देश की सबसे संवेदनशील जेल होने के कारण भी ये बहुत जरूरी है कि केंद्रीय कारागार की सारी  व्यवस्थाओं को अधिक दुरुस्त व पुख्ता किए जाने विषयक सभी अनुशंसित उपायों पर त्वरित अमल किया जाए।  



लेखक स्वतन्त्र टिप्पणीकार हैं।  

बुधवार, 22 नवंबर 2023

गाँधी परिवार से वसूली शुरू : प्रवर्तन निदेशालय ने ज़ब्त किए 752 करोड़ मूल्य की संपत्ति

 


मोदी सरकार जिन दो बातों के लिए पहले ही दिन से नो टोलेरेंस की नीति अपनाए हुए थी वो थी आतंकवाद के विरुद्ध खड़े होना और दूसरी भ्रष्टाचार के खात्मे का संकल्प।  प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा था कि " देश और लोगों की संपत्ति में न तो खुद खाऊँगा और न ही किसी को खाने दूँगा।  उस वक्त शायद उन्होंने ये नहीं कहा था कि , अब तक जो खाया और अघाया घूम रहा हैं वो भी सारा निकाल लूंगा।  

मोदी सरकार के आते ही और सबसे बढ़कर शासन की नीति और प्रशासन का रुख देख कर सालों से घोटाले कर रहे , फर्जी धन्ना सेठ लोग अपने ऊपर क़ानून का शिकंजा कसता देख कर निकल भागे और ऐसा भागे कि आज तक विदेश में भागे भागे छिपे छिपे फिर रहे हैं और सरकार ने उन देशों से भी मित्र नीति के तहत वहां उनका जीना मुहाल किया हुआ है।  

इससे इतर राजनीति का चोला पहन कर , गरीबों के कल्याण और गरीबी हटाओ के नारों से दशकों तक देश  शासन करने वाले लोगों के घोटालों की जब फेहरिश्त खुली तो आज हालात ये हो गए कि , सब के सब , भ्रष्टाचार के हमाम में बिलकुल नंगे निकले।  आज सब के सब अदालतों से विभिन्न तरीकों और आधार पर जमानत लेकर अपनी खाल बचाने की जुगत में लगे हैं।  

देश की राजनीति में कभी एक रसूख रखने वाला गाँधी परिवार भी , आर्थिक अनियमितताओं और उससे भी अधिक इरादतन किए गए आर्थिक अपराधों में संलिप्तता के आरोप से खुद को नहीं बचा सका।  बार बार लोगों द्वारा उठाया गया प्रश्न कि बिना किसी , कारोबार व्यापार के आखिर गांधी परिवार की आय और संपत्ति में इतने दिनों तक इतना बड़ा इज़ाफ़ा कैसे होता रहा के उत्तर में लोगों को गांधी परिवार द्वारा किए ,कराए जा रहे घोटालों के सच के रूप  में सामने आया , 

ऐसा ही एक घोटाला है नेशनल हेराल्ड घोटला। नेशनल हेराल्ड की स्थापना और संपादन जवाहरलाल नेहरू ने भारत के पहले प्रधान मंत्री बनने से पहले किया था। अखबार ने 2008 में अपना परिचालन निलंबित कर दिया था क्योंकि उस पर ₹90 करोड़ से अधिक का कर्ज था, जिसे कथित तौर पर चुकाया नहीं गया था। वर्ष 2015 में श्री सुभ्रमण्यम स्वामी द्वारा दायर एक शिकायती वाद में ये आरोप लगाया गया कि गाँधी परिवार ने गैर कानूनी तरीके से करोड़ों रुपये का लाभ कमाया।  

अदालत द्वारा मामले का संज्ञान लेकर मुकदमा चलाए जाने के विरुद्ध गांधी परिवार निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायलय तक पहुंचा लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए और गांधी परिवार को प्रथम दृष्टया दोषी मानते हुए गांधी परिवार की दलील खारिज कर मुकदमा जारी रखने का आदेश दिया।  यही कारण रहा कि राहुल सोनिया को जमानत याचिका दायर कर जमानत भी लेनी पड़ी तथा दोनों आरोपी अभी जमानत पर ही हैं।  

उधर प्रवर्तन निदेशालय ने लगातार  पूछताछ और जाँच के बाद कल गांधी परिवार की 752 करोड़ रूपए के मूल्य की संपत्ति ज़बात कर ली।  इस कार्रवाई को चुनाव से पहले सरकार द्वारा विपक्षी दलों पर दबाव बनाने जैसा ही घिसा पिटा राग बेशक कांग्रेस गा रही लेकिन लेकिन देश की जागरूक अवाम अब ये सारे खेल और दांव पेंच पहले ही देख चुकी है।  

समय आ गया है कि देर सवेर , ऐसे तमाम राजनैतिक अपराधी जिन्होंने देश और सरकारी कोष की संपत्ति अपने और अपनी परवारों के नाम कर ली उन्हें न सिर्फ उनके अपराध के लिए दंड मिले बल्कि ऐसी तमाम संपत्ति जब्त कर दोबारा राजकोष में जमा कर दिया जाए , 

गुरुवार, 9 नवंबर 2023

कोरोना से लेकर प्रदूषण तक : बेबस और बेकाम दिल्ली सरकार

 

कुछ वर्षों पूर्व जब पूरी दुनिया चीन द्वारा फैलाई गई महामारी कोरोना की चपेट में आकर पूरी दुनिया में हाहाकार मचा हुआ था।  उन दिनों भी दुनिया और देश भर में कुछ लोग व् सरकारें ऐसी भी थीं जिनके गैर जिम्मेदाराना व्यवहार , व्यवस्था और नीतियों के कारण दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में चिकित्सीय व्यवस्था की स्थिति और अधिक नारकीय व दयनीय होकर रह गई थी।

इन्ही में से एक रही दिल्ली सरकार और उनके नुमाइंदे।  कोरोना तो चलिए खैर बीती बात हो गई अभी दो माह पूर्व ही एक बार फिर से दिल्ली सरकार , मुसीबत पड़ते ही भाग खड़ी हुई और आदतन सारा ठीकरा दूसरों पर फोड़ दिया।  ये अवसर था जब पंजाब हरियाणा से होता हुआ अथाह वर्षा जल राजधानी दिल्ली में एक सप्ताह तक बाढ़ की त्रासदी ले आया।  दिल्ली सरकार चुपचाप तमाशबीन होकर सब देखते रहने के अलावा कुछ भी नहीं कर सकी।

उपरोक्त दोनों ही आपदाएं अचानक आईं थीं इसलिए हो सकता है की सरकार और मशीन री को इनसे निपटने के लिए पर्याप्त समय और संसाधन शायद नहीं मिल सका हो , परन्तु इन दिनों राजधानी क्षेत्र की भयंकरतम दूषित हवा से निपटने के दावे तो पिछले पांच सात वर्षों से किए जा रहे हैं परन्तु इसका परिणाम और प्रभाव वही -ढाक के तीन पात।

प्रदूषण को नियंत्रित करके वातावरण स्वच्छ किये जाने का लक्ष्य तो दूर ,हालात तो दिनों दिन अधिक भयावह होते जा रहे हैं और ऐसे में एक बार फिर से दिल्ली सरकार अपने ढाई करोड़ नागरिकों को इस वायु प्रदूषण से राहत  देने के लिए सिर्फ यही कारगर ऊपर लाइ है कि पड़ोसी राज्यों तथा केंद्र की भाजपा सरकार पर सारा दोष मढ़ दिया जाए।

इत्तेफाक से पिछले कुछ वर्षों से पंजाब सरकार द्वारा स्थानीय किसानों को पराली जलाने से नियंत्रित नहीं कर पाने के लिए पूर्व की कांग्रेस सरकारों को कोसने वाली आम आदमी पार्टी की ही अपनी सरकार पंजाब में भी बन जाने के बाद अब पंजाब पर दोषारोपण का खेल भी खटाई में पड़ गया है।

दीपावली के कुछ ही दिनों बाद जब महापर्व छठ पूजन के लिए सभी यमुना नदी और घाटों पर पहुँचेगे तो हर साल की तरह इस बार भी यमुना नहीं के भयानक प्रदूषण स्तर  की बात भी निकल फिर सामने आ जाएगी।  सरकार  पूरी तत्परता से केंद्रीय सरकार व् एजेंसियों पर सारा दोषारोपण करके इतिश्री कर लेगी।

असल में प्रदूषण सहित किसी भी बड़ी बुनियादी जरूरत और समस्या पर दिल्ली की राज्य सरकार ने कभी भी गम्भीरतापूर्वक कुछ नहीं किया यही वजह है कि अभी हाल ही में दिल्ली सरकार द्वारा प्रस्तावित रेड लाइट ऑन गाड़ी ऑफ़ जैसे अव्यवहारिक योजना को न्यायपालिका ने बिना जांचे परखे दोबारा लागू करने से रोक दिया।  देखा जाए तो सरकार का इसमें कोई दोष भी नहीं है क्यूंकि जैसे जैसे कारनामे/घोटाले को अंजाम देने में राज्य सरकार और उसके नुमाइंदे लगे रहे उसके बाद प्रदूषण जैसे छोटी मोटी समस्याओं के लिए समय ही कहाँ मिल पाता है।

बहरहाल , थोड़े दिनों में तेज़ हवाएं और बारिश शायद दिल्ली और आसपास के क्षेत्र पर छाए धुंए और धुल के गुबार को काम और ख़त्म तो कर देंगे किन्तु इस बीच जाने कितने ही नवजात शिशु, वृद्ध और रोगी , स्वच्छ हवा में सांस की कमी के कारण असमय ही काल कवलित हो चुके होंगे और जाने कितने और इस कतार में शामिल हो जायेंगे।

यह बहुत दुखद स्थिति है कि , अपनी समस्याओं के समाधान खोजने और निपटने के लिए ही समाज अपने लिए सरकारोंब का गठन करती है , बड़े विशवास के साथ अपने मत देकर अपना प्रतिनिधि बना कर जिन्हें चुनती है वे सालों साल सरकार  में बने रहते हैं और उधर दूसरी तरह ये समस्याएं भी सालों साल यूँ ही बनी रहती हैं।

रविवार, 19 फ़रवरी 2023

ये देश जो भारत है , अब हिन्दुस्तान होना चाहिए : बाबा बागेश्वर के संकल्प के साथ सम्पूर्ण सनातन समाज

 




 

भूत पिशाच निकट नहीं आवे , महावीर जब नाम सुनावे।  भगवान हनुमान बजरंगबली के अनन्य भक्त बाबा बागेश्वर महाराज के हुंकार के साथ आज सम्पूर्ण सनातन समाज का मानस जिस तरह से जुड़ गया है वो एक संयोग भर नहीं है।  बाबा बागेश्वर महाराज का आज , बाबा बागेश्वर का तेज , प्रखर वाणी और लहू को जीवित कर देने वाली स्पष्ट बात।  एक तरुण सनातनी , बजरंगबली की हनमान चालीसा पढ़ते पढ़ते पूरे सनातन समाज को , उनकी चेतना को , सो चुकी धार्मिक निष्ठा को , भूल चुके अपनी अपार शक्ति  ,अकाट्य बल बुद्धि को बड़े प्यार से और बड़े ललकार से जगा रहे हैं , और यही आज सनातन विरोधियों और धर्म द्रोहियों को अखर रहा है।

हालात इतने अधिक दयनीय हैं कि , पूरे कायनात पर हरी चादर फैलाने को उद्धत ,जेहाद और फतवों के सहारे सबको डराने मिटाने वालों के साथ आज वे भी खड़े होकर सिर्फ रामायण ,रामचरितमानस का ही अपमान नहीं बल्कि स्वयं भगवान् पर भी लांछन उठा कर अपने संस्कारों में घुले विष प्रमाण दे रहे हैं।  आप सुनिए इस तरुण सन्यासी युवा हनुमान भक्त बाबा बागेश्वर महाराज की बातों को , देखिये उनको , उनके माध्यम से लाखों लोगो को हनुमान जी की भक्ति , स्नेह , प्रसाद पाए लोगों के सुकून को , सुख को और उन पर उनके विशवास को।

वो कहते हैं , अपने माँ और पिता की सेवा करो क्यूंकि वही ईश्वर हैं वही भगवान् हैं , सच भी तो है , वे चेताते हैं , अपनी बहनों माताओं को कि , आँख कान और मस्तिष्क सिर्फ इतना तो खुला जरूर रखो कि कल को तुम्हारे माँ ,  तुम्हारे पिता ,तुम्हारे भाई सबको तुम एक मृत देह भर के रूप में , कई बार सैकड़ों टुकड़ों में ,और कई बार तो वो भी नहीं तुम नहीं मिलो।  सबसे आसान है अपने माँ पिता परिवार और समाज पर विश्वास रखो न उंनसे बेहतर तुम्हारे लिए कोई नहीं सोचेगा।

अब वो कह रहे हैं कि इस देश को हिन्दू राष्ट्र हो जाना चाहिए , ये देश जो जम्बूद्वीप था उसे कब भारत से इंडिया बना दिया गया पता भी नहीं चला अब पिछले कुछ सालों से फिर से भारत सा दिख लग रहा है मगर ये जो , बीच बीच में उपद्रवी तत्व जिन्हें पुरातन काल में राक्षसी , शैतानी , विघ्नकारक जैसे रूपों नामों से जाना जाता रहा है आधुनिक काल में इन्हें सिर्फ एक ही बात से आसानी स्पष्ट पहचाना जा सकता है , ये द्रोही होते हैं , फुकरे एकदम निठल्ले , दुनिया के हर बात और काम में नकारात्मकता के वाहक , विध्वसंक वृत्ति के लोग , इसलिए समग्र विकास , संगठित समाज , सभ्य और संवेदनशील प्रशासन के लिए फिर यही होना चाहिए।

आज देश में राम का मंदिर और महादेव का प्रांगण बन रहा है कहीं कृष्ण सज रहे हैं कहीं खाटू वाले श्याम , कहीं जय माता दी हो रहा है तो कहीं बजरंग बली की जय , कालों की काल , माँ काली दुर्गा की हुंकार पताका चहुँ और लहराने को उद्धत है , और जिन्हें यही , बस यही तो कष्ट है , उनकी मति भ्रष्ट है।  देखिए मामला सिर्फ इतना सा है , बाबा बागेश्वर से लेकर बाबा रामदेव तक , सिर्फ एक ही मत एक मानस , एक ही प्रार्थना , एक ही आशीर्वाद , एक ही हुंकार , एक ही ललकार , एक ही सिर्फ एक , सबने अपना पकड़ रखा है ,जकड रखा है , तुम भी अपना और अपने धर्म के साथ रहो , कर्म धर्मनिष्ट हो।


 

शनिवार, 24 अप्रैल 2021

लाखों लोगों की मौत का जिम्मेदार है चीन

 



पूरी दुनिया में लाखों लोगों को मौत के मुँह में धकेलने के लिए ज़िम्मेदार , विश्व के सबसे धूर्त और दुष्ट राष्ट्र चीन को वैश्विक मंचों पर जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकना , इतनी सारी मौतों के लिए उसे कोई दंड तो दूर उसे इस अपराध का बोध तक न करा पाना , सारी वैश्विक सस्थाओं और शक्तियों के मुंह पर एक करारा तमाचा है। आज चीन इन सबसे निश्चिंत होकर आराम से बैठा हुआ है और दुनिया के सारे चौधरी बने फिरते देश सुइयां तलाशते फिर रहे हैं।  

रही बात भारत के वर्तमान हालात की , तो अनुमान तो पिछले बरस ही लगा लिए गए थे की दुनिया में इस बीमारी से सबसे ज्यादा लोग , लगभग 7 करोड़ लोग , पीड़ित होकर अपनी जान गँवा बैठेंगे।  बहुत लोगों ने मंसूबे भी शायद यही पाले हुए थे और देश से लेकर विदेश तक और बाहरी से लेकर अपनों तक की दोस्ती दुश्मनी के बीच भारत पहली लड़ाई जीत कर बाहर निकल ही आया था कि अब इस दूसरी लहर ने अधिक घातक दस्तक दे दी।  

हमारी कीड़े मकोड़े जैसे जनसंख्या , सालों से चला आ रहा कुप्रबंधन और कुव्यवस्था , आपदा विपदा के समय भी लोगों का धूर्त और स्वार्थपूर्ण आचरण , नियामक और नियंत्रक एजेंसियों का अभाव और सबसे अधिक सरकारों , प्रशासन , व्यवस्था में किसी भी तरह के तालमेल की भारी कमी।  ऐसे में भारत जैसे जनसंख्या विस्फोट वाले देश में यदि इस तरह का चिकित्स्कीय आपातकाल आकर सबको हैरान परेशान कर रहा है तो ये भारत की नियति है।  

लेकिन निकल तो हम इस आपदा से भी जाएँगे , तब तक खुद को सुरक्षित और स्वस्थ रखना ही अभी सबसे अधिक जरूरी है।  

शनिवार, 23 जनवरी 2021

राष्ट्रीय बालिका दिवस : बेटियों के लिए है ये दुनिया

                          


भारत की बेटियां हर दिन सफलता के नए आयाम गढ़ रही हैं। खेल, शिक्षा, राजनीति, साइंस या कोई भी क्षेत्र हो सभी में तरक्की की सीढियां चढ़ रही हैं। 24 जनवरी उन्हीं का दिन है। यह दिन राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाया जाता है। देश की बेटियों की सफलताओं का जश्न मनाने के लिए यह दिन निर्धारित किया गया है। लेकिन, समाज में व्याप्त कुछ कुरीतियों की वजह से एक बहुत बड़ा तबका ऐसा है जो अपने अधिकारों के वंचित है। इस राष्ट्रीय बालिका दिवस पर उन लड़कियों के साथ हो रहे आसमान व्यवहार, शोषण या भेदभाव के प्रति उन्हें जागरूक किया जाता है।


समाज में व्याप्त असमानता के बारे में लड़कियों को जागरूक करना


पहली बार यह दिन महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा 2008 में मनाया गया था। इस दिन को मनाने के पीछे का लक्ष्य लड़कियों को नए अवसर प्रदान करना है और उन्हें उनके अधिकारों के बारे में बताना है। भारत सरकार का यह कदम युवाओं के बीच में लड़कियों के महत्व को बढ़ावा देना है। समाज का एक बहुत बस तबका ऐसा है जहां मौजूदा समय में लड़कियां असमानता, शिक्षा, पोषण, कानूनी अधिकार, चिकित्सा देखभाल, संरक्षण, विवाह, स्वतंत्रता, इत्यादि में असमानता का सामना कर रही हैं।


क्या है राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाने का उद्देश्य?

 

राष्ट्रीय बालिका दिवस केवल लड़कियों तक ही सीमित नहीं है। यह पूरे देश और समाज के लोगों की चेतना बढ़ाने और समाज में बालिकाओं को नए अवसर प्रदान करने के लिए मनाया जाता है। यह दिवस सुनिश्चित करता है कि देश की बेटियों को उनके सभी मानवाधिकारों की जानकारी हो और उन्हें सम्मान मिले। इस दिन लोगों को लैंगिक भेदभाव के बारे में बताने और उन्हें शिक्षित करने का कार्य किया जाता है।   


जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भारत में लड़के और लड़की की संख्या में एक बड़ा अंतर है। हालांकि, पिछले कुछ सालों से यह लिंगानुपात घटा है। इसको बराबर करने के लिए हम सभी को सोच बदलनी होगी। समाज में लड़कियों के खिलाफ आए दिन हो रहे अत्याचारों को खत्म करना होगा और यह कार्य केवल सभी की सोच बदलने से होगा। इस दिन के माध्यम से सभी को बताया जाता है कि देश में एक लड़की का उतना ही महत्व है जितना एक लड़के का, बस जागरूक करने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाने का एक उद्देश्य यह भी है कि लड़की को उसके स्वास्थ्य और पोषण के बारे में शिक्षित किया जाए। 


भारत सरकार द्वारा बेटियों के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाएं


भारत सरकार द्वारा देश की बेटियों की बेहतरी के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। इसमें कन्या भ्रूण हत्या पर रोक, बाल विवाह पर प्रतिबंध, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, अनिवार्य शिक्षा, सिंगल गर्ल चाइल्ड फ्री एजुकेशन आदि योजनाएं चलाई जा रही हैं। कुछ योजनाएं निम्नलिखित हैं: 


1. कन्या भ्रूण हत्या पर रोक


भारतीय दंड संहिता, 1860 के तहत भारतीय दंड संहिता की धारा 312 कहती है, ‘जो कोई भी जानबूझकर किसी महिला का गर्भपात करता है जब तक कि कोई इसे सदिच्छा से नहीं करता है और गर्भावस्था का जारी रहना महिला के जीवन के लिए खतरनाक न हो, उसे सात साल की कैद की सजा दी जाएगी’। इसके अतिरिक्त महिला की सहमति के बिना गर्भपात (धारा 313) और गर्भपात की कोशिश के कारण महिला की मृत्यु (धारा 314) इसे एक दंडनीय अपराध बनाता है। 


2. बाल विवाह प्रतिबंधित


भारत में बाल विवाह चिंता का विषय है। बाल विवाह किसी बच्चे को अच्छे स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा के अधिकार से वंचित करता है। ऐसा माना जाता है कि कम उम्र में विवाह के कारण लड़कियों को हिंसा, दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का अधिक सामना करना पड़ता। इसके अंतर्गत 21 वर्ष से कम आयु के पुरुष और 18 वर्ष से कम आयु की महिला के विवाह को बाल-विवाह के रुप में परिभाषित किया गया है। 


3. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना


बेटी बचाओ बेटी पढाओ एक अभियान है जो महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय और परिवार कल्याण मंत्रालय एवं मानव संसाधन विकास ने मिलकर शुरू की है। इसका उद्देश्य भारत में लड़कियों को लेकर जागरूकता पैदा करना और कल्याणकारी सेवाओं में सुधार करना है। इस सरकारी योजना को 100 करोड़ की प्रारंभिक लागत के साथ 22 जनवरी, 2015 को शुरू किया गया था। 


इसके साथ ही अन्य योजनाएं जैसे सुकन्या समृद्धि योजना,  14 वर्ष की आयु तक लड़के और लड़कियों दोनों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा, लाड़ली लक्ष्मी योजना, बेटी है अनमोल योजना, कन्या विवाह अनुदान योजना आदि चलाई जा रही हैं।

#समाचार सूत्र और गद्यांश : हिंदुस्तान समाचार 

शनिवार, 9 जनवरी 2021

भ्रष्टाचार पर योगी सरकार का एक और हथौड़ा : प्रदेश में 18 हज़ार शिक्षकों की धोखाधड़ी निशाने पर

 


केंद्र से लेकर राज्य तक , भ्रष्टाचार , घपले , घोटाले बेईमानी के विरूद्ध मोदी जी  और योगी जी ने जो जुगलबंदी बिठा रखी है उसने तो लालची घूसखोरों  और भ्रष्टाचारियों की दुनिया में सुनामी सा कहर ला दिया है।  एक ने पहले ही कह दिया है न खाऊँगा न ही किसी को खाने दूँगा , झोला उठा कर चल दूँगा , जितनी भी देश सेवा करानी हो उसके लिए तत्पर हूँ , दूसरे ने तो मानो तन ही नहीं मन पर भी भगवा धार लिया है और और जैसे सौगंध उठा ली हो कि अब राम की नगरी अवध में पाप का कोई भी कारोबार तो न चल पाएगा।  

योगी आदित्यनाथ सरकार के , सख्त क़ानून और उसे पालन किये जाने की दृढ़ प्रतिबद्धता ने पिछले दिनों में देश की सबसे बड़ी आबादी को सम्भालने वाले राज्य को बखूबी और बहुत ही जरूरी तौर  पर न सिर्फ संभाला बल्कि आज देश में तेज़ी से विकास पथ की ओर बढ़ने वाले राज्यों में से अग्रिम पंक्ति में है उत्तर प्रदेश।  

प्रदेश में भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के अपने इसी मुहीम को अंजाम देने के दौरान , पिछले दिनों  प्रदेश के सभी महकमों के सभी अधिकारियों और कर्मचारियों की पूरी जानकारी , सेवा पुस्तिका , खाता आदि को कम्प्यूटरीकृत किए जाने की पहल शुरू हुई तो बहुत से विभागों में चल रही बहुत सारी खामियाँ और भ्रष्टाचार भी निकल कर सामने आया।  इसमें सबसे व्यापक था , शिक्षा विभाग के पास लगभग 18 , हज़ार शिक्षकों की कोई जानकारी का नहीं होना जो पिछले कई वर्षों से प्रदेश के विद्यालयों में नियुक्त होकर वेतन पा रहे हैं।  

प्रदेश के सारे विद्यालयों में नियुक्त सभी शिक्षकों के नाम और सारी जानकारी शिक्षा विभाग की वेबसाइट पर उपलबध कराए जाने के लिए नियत तिथि  के बीत जाने के बावजूद भी , 18 हज़ार शिक्षकों की जानकारी न उपलब्ध हो पाना एक बड़े घोटाले की ओर इशारा कर रहा है जिसकी जांच अब विशेष एजेंसी को सौंप दी गई है।  

याद हो कि पिछले दिनों ऐसी बहुत सारी घटनाएं अलग अलग राज्यों में देखने पढ़ने को मिली थीं जिसमे नकली नाम , जानकारी और ऐसे ही किसी आधार पर लोग विभिन्न सरकारी विभागों में अपनी नियुक्ति दिखा कर सालों तक वेतन पाते रहे झारखंड में तो एक व्यक्ति के आठ आठ विभागों में कार्यरत होकर वेतन उठाने की बात का खुलासा हुआ था।  


रविवार, 5 जुलाई 2020

महामारी के बाद




इस शताब्दी के शुरुआत में ही विश्व सभ्यता किसी अपेक्षित प्राकृतिक आपदा का शिकार न होकर विरंतर निर्बाध अनुसंधान की सनक के दुष्परिणाम से निकले महाविनाश की चपेट में आ गया |  किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि कभी इंसान की करतूत उसके लिए ऐसे हालात पैदा कर देंगे जब कुदरत के माथे ,इंसान के विनाश का दोष नहीं आकर खुद उसके हिस्से में ये अपराध आएगा | 

अभी तो इस महारामारी की सुनामी से उबरने निकलने की ही कोई सूरत निकट भविष्यमे निकलती नहीं दिखाई दे रही है किन्तु समाज का हर वर्ग, विश्व का हर देश , प्रशासन , अर्थशास्त्री अभी से ये आकलन करने में लग गए हैं की महामारी के वैश्विक परिदृश्य के क्या हालात होंगे ? वैश्विक समाज और विश्व अर्थव्यवस्था किस ओर मुड़ेगी | विश्व महाशक्तियों के आप सी संबंधों का समीकरण क्या और  कितना बदल जाएगा ? सामरिक समृद्धता  के लिए मदांध देश क्या इस महामारी के बाद भी शास्त्र-भंडारण की ओर ही आगे बढ़ेंगे या फिर चिकित्स्कीय संबलता की ओर रुख करेंगे ये देखने वाली बात होगी | 

चिकित्स्कीय अनुसंधान के विश्व भर के तमाम पुरोधाओं को अभी तक कोरोना को पूरी तरह समझ उसका कारगर और सटीक तोड़ निकालने में सफलता हासिल हो सकने की फिलहाल कोई पुख्ता जानकारी नहीं है | तो अब जबकि पूरे विश्व को इसकी चपेट में आए छ महीने से भी अधिक हो चुके हैं और इसका प्रवाह और प्रभाव दोनों ही रोके से रुक नहीं पा रहे हैं | ऐसे में समाज शास्त्री अपने अध्ययन की दिशा उसी और मोड़ चुके हैं जब कोरोना के बाद महसूस की जाने वाली चुनौतियों से समाज को जूझना पडेगा , उन्हीं बातों का आकलन विश्लेषण किया जा रहा है | 


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है | समाजशास्त्र का यह सिध्दांत सूत्र भी  सर्वथा प्रतिकूल होकर रह गया  है | मनुष्य आज अपने सही गलत अन्वेषणों ,प्रयोगों का दुष्परिणाम यह उठा रहा है कि अपने ही समाज में रहते हुए अपने ही समाज से निषिद्ध होने को विवश हो गया है | समाज शास्त्र का दूसरा सूत्र कि ताकतवर या मजबूत के ही बचे रहने या  उसके अपने अस्तित्व को बचाने के संघर्ष चक्र में ,उसके परिस्थितियों से लड़ कर पार पा जाने की सम्भावनाएँ ही अधिक प्रबल होती हैं | इस मिथक को भी इस महामारी ने इस अर्थ में तोड़ा कि विश्व के तमाम शक्तिशाली देश इस महामारी की चपेट में आकर त्रस्त पस्त हो चुके हैं और अब भी इन पर कोरोना का कहर बरप रहा है | 

आज विश्व समुदाय ने इस अलप समय में ही देख लिया कि एक सिर्फ इंसान को थोड़े दिनों तक प्रकृति से मनमानी करने से अवरुद्ध किए जाने भर से प्रकृति ने इतने ही दिनों में खुद कि स्थति कितनी दुरुस्त कर ली | तो इस महामारी ने यह भी बता दिया कि इंसानी सभ्यता को हर हाल में प्राकृतिक तारतम्यता व् सामंजस्य का सिद्धांत ही अपनाना होगा | 

इंसान घरेलू प्राणी है ,यह एक बार फिर प्रमाणित हुआ | जिस तरह से आपदा की आहट  सुनते ही विश्व से लेकर देश के अंदर भी एक प्रांत से दूसरे प्रांत में लोगों ने अपने घर , अपनों के पास जाने का जो ये प्रवाद दौर वर्तमान में हुआ है वो इतिहास में हुए बहुत से असाधारण विस्थापनों में से एक है | अपने रोजगार और भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए गाँव की बहुत बड़ी ,आबादी  पलायन/विस्थापन का शिकार दशकों पहले शुरू हुई थी | गाँव ,कस्बों से शहर ,नगर और महानगर बसते  बढ़ते रहे और गाँव खाली होते चले गए | शहरों में  आ कर सालों तक सिर्फ जीने के अस्तित्व संघर्ष में उलझा ये ग्राम्य समाज क्या अपने गाँव घरों में अपने जीवन यापन के विकल्प तलाशेगा ? 

बिहार ,उत्तर प्रदेश ,बंगाल ,उड़ीसा का मान संसाधन विकास सूचकांक प्रदर्शन दशकों से ही बहुत पिछड़ा रहा है | ऐसी आपदाओं के समय इन राज्यों का प्रशासन और प्रबंधन क्या ,किता विकास कर सका , क्या कितना सीख पाया ये हालत भी इन्हें परिलक्षित करते हैं | महामारी के रूप में सामने आए इस अपर्याताशित आपदा और ऐसी दूसरी आपत्तियों के समय ही व्यवस्थाओं की असली परख होती है और अभी यही परख हो रही है | 

ये महामारी काल कितना लंबा खिंचेगा अभी तो यही तय नहीं है किन्तु इसके बाद वाले समय में विश्व का सामाजिक ,आर्थिक और भौगोलिक समीकरण भी परिवर्तित होकर नए  मापदंड  स्थापित करेगा ये तय है | 
वैश्विक महाशक्तियों यथा अमेरिका ,चीन ,फ्रांस ,रूस ,इटली  जैसे देश अलग अलग स्थितियों परिस्थितयों में खुद को विश्व फलक पर पुनर्स्थापित करने की जद्दोज़हद के बीच अविकसित और विकाशील देश भी इस महामारी के प्रभाव से उबरकर खुद को बचा पाने के लिए नए सिरे से संघर्षशील होंगे | 

भारत इस महामारी के विरुद्ध  विश्व के अन्य देशों की तुलना में अब तक इस लड़ाई में सम्मानपूर्वक अपने लोगों को यथासंभव बचा सकने के कारण वर्तमान में पहले ही अगली पंक्ति में आ चूका है | विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी बोर्ड के अध्यक्ष पद पर किसी भारतीय का चयन , संयुक्त राष्ट्र परिषद् के अस्थाई सदस्य  के रूप सर्वाधिक मतों से चयन , ने इस ओर स्पष्ट ईशारा कर भी दिया है | इस बीच चीन को मिल रही वैश्विक नकारात्मक प्रतिक्रया के कारण वहां से पलयान को उद्धत उद्योग परियोजनाएं आदि की पहली प्राथमिकता भारत ही होगा | इसकी शुरुआत भी करीब करीब हो चुकी है | 

मंगलवार, 5 मई 2020

देश्बंदी का तीसरा चरण और कोरोना का तीसरा स्टेज


शराब के लिए लगी ही लाइन 



अचानक से बिना किसी बहुत बड़ी योजना को बनाए  , बिना किसी ठोस चिकित्सकीय तैयारी के , और बिना किसी बहुत अचूक औषधि के देशबंदी को तीसरे विस्तार दिए जाने के बावजूद जिस तरह से पिछले इतने दिनों से इस लड़ाई से लड़ने के लिए जो लोग अपने अपने घरों में बंद होकर देश प्रशासन और समाज और खुद को भी बचाए रखे हुए लोगों की भावनाओं और उनकी जान के साथ खिलवाड़ किया गया और जा रहा है |


यदि एक पल को उसे मैं भूल भी जाऊं तो भी जब मैं उन हज़ारों चिकित्सकों , नर्सों , पुलिस वालों और कोरोना की लड़ाई में अपनी जान की बाजी स्वेच्छा से लगाने वालों और उनके घर परिवार वालों के बारे में सोच कर यही समझ पा रहा हूँ कि इस भूल .व्यग्रता ने उनकी मुश्किलें कितनी बढ़ा दी हैं | 

दूसरी तरफ विभिन्न राज्य सरकारों और केंद्र सरकार का भी , अब रोजाना बहुत तेज़ी से कोरोना पीड़ितों की बढ़ रही संख्या , मौत के बढ़ते आंकड़ों के प्रति दिखाई जा रही उदासीनता भी बहुत ही निराशाजनक है  | 

और फिर सरकारों को ही अकेले क्यूँ दोष दिया जाए जो देश अभी कुछ दिनों पहले तक रामायण देख कर लहालोट हुआ जा रहा था ऐसा जता और बता रहा था मानो राम राज्य आ ही गया  | समाज के गरीब मजदूर को बढ़ चढ़ कर खिलाते हुए दया का सागर बना हुआ था वही समाज वही लोग शराब की दुकानें खुलते ही अपने असली रंग अपने असली चरित्र में आ गया |


मैं ये सोच रहा हूँ की विधाता आखिर अब इस संसार को बचाए ही क्यूँ  ? टिक टॉक के वीडियोज बनाने के लिए या फिर पूरे संसार को शराब के महासमुद्र में तैर कर वैतरणी पार करने के लिए | 

आज ये संसार अपनी नियति खुद तय कर रहा है और हमेशा की तरह इसमें वो भी शामिल होंगे जो इसके लिए प्रत्यक्ष रूप से भागीदार और जिम्मेदार नहीं हैं | हमें इससे और बहुत ज्यादा से भी बहुत अधिक बुरे और भयानक के लिए तैयार हो जाना चाहिए | 

रविवार, 19 अप्रैल 2020

वक्त सब कुछ अपने आप तय कर देगा





समय सबको अवसर दे रहा है ,कोई राम चुन रहा है कोई रावण। कोई धर्म चुन रहा है कोई पाप। कोई देश चुन रहा है कोई मज़हब। कोई नियम चुन रहा है कोई पत्थर। होने दीजिये जो हो रहा है। बोलने दीजीये जो बोल रहा है। उठ जाने दीजिए सारे नकाब उतर जाने दीजिए सारे बुर्के नुमा जाले।


जाहिलों नंगों की पहचान तो उनकी हरकतों से उनकी मंशा से कई बार तो उनके चेहरे मोहरे से भी हो जाती है ,पहचानिये उन्हें जो थाली के बीच के बैंगन की तरह दोनों तरफ हैं और असल में कहीं भी नहीं हैं। वो हैं देश के समाज के असली दीमक जो आपके साथ बैठ कर आपके साथ बोल कर आपकी ही सोच को खोखला करने का प्रयास करते हैं।

वे उन उजागर शत्रु मानसिकता और व्यवहार वालों से कहीं ज्यादा घातक और निकृष्ट हैं जो अभी तक ये नहीं तय कर पाए हैं कि असल में क्या वे यही सब कुछ अपने परिवार अपने बच्चों आने वाली नस्लों के जिम्मे भी छोड़ कर जाएंगे।

और ये आज और अभी करना या होना इसलिए भी जरूरी है क्यूंकि ये बीमारी न भी आती तो भी देश पिछले कुछ समय से एक बहुत बड़े वायरस के पूरी तरह उजागर हो जाने से जूझ तो रहा ही था। कुछ मत भूलियेगा , न राम मंदिर , न धारा 370 ,न कश्मीर , न नागरिकता न ही दिल्ली के दंगे।

सब कुछ याद रखिये और तब तक याद रखिये जब तक अब सब कुछ आर पार न हो जाए। नहीं तो हमारी आने वाली नस्लें उनके सामने भविष्य में आ रही नई मुश्किलों के अतिरिक्त विरासत में मिली इन मुश्किलों को भी निर्णायक रूप से ख़त्म न कर पाने के लिए हमें कटघरे में जरूर खड़ा करेंगी।

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

कोरोना से सीखे जाने वाले सबक






बावजूद इसके कि सिर्फ पिछले कुछ दिनों में , ज्यादा ज्ञानी लोगों द्वारा पूरे देश के कई दिनों के धैर्य और अनुशासन पर बट्टा लगा कर उसे बहुत बदतर करने की कोशिश की गई ,इसके और ऐसे अनेक कोशिशों के बावजूद भी देश पश्चिमी देशों के हाहाकारी स्थिति से इतना बेहतर है कि उसकी तुलना नहीं की जा सकती और अगले दस दिनों के बाद जो दिन निकलेगा वो भारत का नया दिन ,नई उम्मीद का दिन होगा लेकिन इस सबके बीच जो घटा है वो बहुत बड़ा सबक बन कर न सिर्फ देश बल्कि विश्व भर के सामने होगा।

कोरोना संकट ने साबित किया कि ये देश जो हिन्दुस्तान है ये यूँ नहीं बरसों से गाता फिर रहा है कि ,कुछ तो बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी और न ही कभी ,कभी भी मिटेगी। 

इसे ये साबित किया कि बेशक दुनिया हमें विकासशील , गरीब देश समझे देखे लेकिन ऐसे समय पर जब पूरी दुनिया घुटने टेक कर खडी हो गयी है उस वक्त भी ये देश अपना मस्तक ऊँचा किये शांति से इन झंझावातों में दीपक लिए खड़ा हुआ है। 

इसने ये साबित किया कि इंसान की औकात प्रकृति के आगे एक पशु पक्षी से भी कम है इसलिए इंसानियत को बचाए रखना जरूरी है क्यूंकि सिर्फ और सिर्फ वही जरूरी है दुनिया के लिए। 

इसने ये भी साबित किया कि ,रे मूरख इंसान तेरे पैसे धन दौलत सोना चांदी ताबीज माला कोई भी कुछ भी ऐसा नहीं है जो तुझे मौत से बचा सकेगा बचाएगी तो सिर्फ इंसानियत और इंसान। 

इसने ये भी साबित किया ऐसे कठिन समय में कैसे इंसान इंसान के काम आया उसने किसी आसमानी फ़रिश्ते का किसी जादुई करिश्मे का इंतज़ार नहीं किया और एक दूसरे के भरोसे को कायम रखा और जिंदगी को भी। 

इसने ये साबित किया की इंसान कितनी ही दुनिया घूम ले ,कितना ही हवा में उड़ ले आखिरकार अपनी ज़मीन अपने घर को ही लौटना होता है और सबको वहीं लौटना होगा। 

इसने ये भी साबित किया महानगरों में दिन रात लोगों की जरूरत पूरा करने वाले गरीब मजदूर आज सत्तर साल बाद भी किसी सरकार समाज प्रशासन के लिए उपेक्षित और दोयम दर्ज़े का इंसान ही बना रहा जिसे जब चाहा दूध में मक्खी की तरह निकाल फेंका जाता रहा है.

इसने ये भी साबित किया कि हमारी पुलिस ,हमारा प्रशासन ,हमारे चिकित्सक ,सफाईकर्मी पूरी दुनिया के सबसे प्यारे सबसे जुझारू और सबसे बहादुर लोग हैं जो हमारे बीच के ही हैं जिनकी अहमियत हमें ऐसे समय में ऐसी विपदा में ही समझ आई है। 

इसने ये भी साबित किया कि हमें हमारे बच्चों को उनके भविष्य की चुनौतियों के लिए कैसे और किस हद तक तैयार करना है और ये काम आज और अभी से करना है। 

इसने ये भी साबित किया कि दो बार प्रचंड जनादेश से अपने नायक को चुनने वाली अवाम के निर्णय में किसी बैलेट बॉक्स का जादू नहीं था ये सबका एकमत था जो अपने अगुआ की एक आवाज़ पर खुद को तालों में कैद करके एक दूसरे का हाथ और साथ थामे रही। 

और इसने ये भी साबित किया कि इस देश की राजधानी समेत बहुत सारे शहरों नगरों में हमारे ही बीच में से कुछ लोग ,चाहे किसी भी कारणों से देश के विरूद्ध ,मानवता के विरूद्ध और पूर्वाग्रह के कारण ,किसी भी और कैसी भी बात में नकारत्मकता न सिर्फ तलाश सकते हैं बल्कि अपने साथ सबको निराशा के गर्त में डुबोने की कोशिश करते हैं। 

और आखिर में इसने ये साबित किया कि ये देश जो आज का भारत और कल का हिन्दुस्तान है ये अब विश्व गुरु बनने की राह पर अग्रसर है और पूरी ठसक और धमक के साथ दुनिया का सिरमौर बन कर उभरेगा। 
जय हिन्द ,जय हिन्दुस्तान ,जय हिन्दुस्तानी। 

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

कैसा कौन सा न्याय दिवस -देर आयद दुरुस्त आयद

          





     इस देश का मौजूदा कानून अपने आप में एक गाली है बाक़ी तो सब निमित्त मात्र हैं | आज सात साल के इंतज़ार के बाद देश में हुए और हो रहे अत्यंत दुर्दांत बलात्कार में से एक बेटी के दोषियों को जैसे जैसे सज़ा पर टँगवा कर देश को जबरन "न्याय दिवस " मनवा कर जाने कौन क्या हासिल कर पा रहा है | 

कानून की बात पूछ रहे हैं आप तो सुनिए फिर ,मौजूदा कानून के तहत सात वर्षों तक जो गुमशुदा हो (यानि मुकदमे का फैसला ) उसे मृत घोषित किया जा सकता है ,और फिर कानून की आत्मा तो उसी दिन उसी समय चीत्कार मार उठी होगी और ऐसे हर अपराधी को बिना सजा पाए छूटते देख मारती होगी जो अपराध कारित करने वालों में सबसे अधिक नृशंस और हैवानियत से भरे होने के बावजूद नाबालिग और  मासूम करार दिए जाने के कारण फांसी तो दूर एक दिन भी जेल नहीं काटते ,ऊपर से सरकार यदि टिक टॉक वीडियो बनाने वाली हो तो फिर सिलाई मशीन , कारखाना और जाने क्या क्या देकर सितम ढाती है उन मासूमों पर | 

लटक गए चारों ,देर आयद दुरुस्त आयद | लेकिन निर्भया देश की एक अकेली बेटी नहीं थी ,नहीं है जिसकी रूह पिछले जाने कितने महीने सालों से इस समाज से सिर्फ एक बात पूछती है ,"बताओ हम बेटियों का क्या कसूर था /है | 

यूं भी अदालतें जब फैसला सुनाती हैं और इन्हें कानूनी भाषा में न्याय कर समाज पर चस्पा किया जाता है उन फैसलों से विवाद और अपराध ख़त्म नहीं होते | ये ख़त्म होते हैं -समाधान से | वर्तमान में जब समाज का हर कारक और हर वर्ग अपने पत्तन के सबसे निचले पायदान पर है तो ऐसे में इतनी देर से भी सही मुजरिमों को उनके किये की सज़ा दिलवा पाना ही एक बहुत बड़ी बात लग रही है |

आप निश्चिंत रहें ऐसे बहुत से फैसले एकसाथ मिल कर भी वो नहीं कर सकते हैं जो समाज खुद अपने निर्णय ,अपने व्यवहार और अपनी बंदिशों से कर सकता है और इसके लिए फिलहाल समाज के पास वक्त नहीं है उसे बहुत तेज़ ,और तेज़ और तेज़ भागना है | 




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