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रविवार, 8 सितंबर 2024

निजता ख़त्म करता मोबाइल और इंटरनेट

 



आज के समय में मोबाइल और इंटरनेट ने मनुष्य के जीवन को बहुत अधिक प्रभावित किया है। यहाँ कुछ तरीके हैं जिनसे मोबाइल और इंटरनेट ने हमारे जीवन को प्रभावित किया है: संचार: मोबाइल और इंटरनेट ने संचार को बहुत आसान बना दिया है। अब हम दुनिया के किसी भी कोने में किसी से भी संपर्क में रह सकते हैं।जानकारी: इंटरनेट ने जानकारी को हमारे हाथों में रख दिया है। अब हम किसी भी विषय पर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। शिक्षा: मोबाइल और इंटरनेट ने शिक्षा को भी बदल दिया है। अब हम ऑनलाइन कक्षाओं में भाग ले सकते हैं और ऑनलाइन पाठ्यक्रम पूरे कर सकते हैं।व्यवसाय: मोबाइल और इंटरनेट ने व्यवसाय को भी बदल दिया है। अब हम ऑनलाइन व्यवसाय कर सकते हैं और दुनिया भर में अपने उत्पादों को बेच सकते हैं।. मनोरंजन: मोबाइल और इंटरनेट ने मनोरंजन के नए तरीके प्रदान किए हैं। अब हम ऑनलाइन फिल्में देख सकते हैं, गेम खेल सकते हैं और संगीत सुन सकते हैं।. स्वास्थ्य: मोबाइल और इंटरनेट ने स्वास्थ्य सेवाओं को भी बदल दिया है। अब हम ऑनलाइन डॉक्टरों से परामर्श ले सकते हैं और ऑनलाइन दवाएं खरीद सकते हैं।. बैंकिंग: मोबाइल और इंटरनेट ने बैंकिंग को भी बदल दिया है। अब हम ऑनलाइन बैंकिंग कर सकते हैं और ऑनलाइन लेन-देन कर सकते हैं।. यात्रा: मोबाइल और इंटरनेट ने यात्रा को भी बदल दिया है। अब हम ऑनलाइन टिकट बुक कर सकते हैं और ऑनलाइन होटल बुक कर सकते हैं।इन तरीकों से, मोबाइल और इंटरनेट ने हमारे जीवन को बहुत अधिक प्रभावित किया है और हमारे जीवन को आसान बना दिया है।

लेकिन सिर्फ ऐसा नहीं है कि मोबाइल के उपयोग के सिर्फ लाभ ही लाभ हैं नहीं बल्कि  मोबाइल और इंटरनेट के दखल से निजता का संकट आ गया है, यह बात सच है। मोबाइल और इंटरनेट के उपयोग से हमारी निजता पर कई तरह के खतरे हैं:डेटा चोरी: मोबाइल और इंटरनेट के उपयोग से हमारा व्यक्तिगत डेटा चोरी हो सकता है, जैसे कि हमारा नाम, पता, फोन नंबर, ईमेल पता आदि।सोशल मीडिया पर निगरानी: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म हमारी गतिविधियों पर निगरानी रखते हैं और हमारे व्यक्तिगत डेटा का उपयोग विज्ञापन और अन्य उद्देश्यों के लिए करते हैं। हैकिंग: मोबाइल और इंटरनेट के उपयोग से हमारे खातों को हैक किया जा सकता है, जिससे हमारी व्यक्तिगत जानकारी और डेटा चोरी हो सकता है।स्थान ट्रैकिंग: मोबाइल फोन हमारे स्थान को ट्रैक कर सकते हैं, जिससे हमारी गतिविधियों पर निगरानी रखी जा सकती है।  व्यक्तिगत जानकारी का दुरुपयोग: मोबाइल और इंटरनेट के उपयोग से हमारी व्यक्तिगत जानकारी का दुरुपयोग किया जा सकता है, जैसे कि हमारी जानकारी का उपयोग विज्ञापन और अन्य उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।इन खतरों से बचने के लिए, हमें मोबाइल और इंटरनेट का उपयोग सावधानी से करना चाहिए और अपनी निजता की सुरक्षा के लिए कदम उठाने चाहिए।

इसके साथ ही आजकल मोबाइल और इंटरनेट के अधिक उपयोग से कई खतरे भी आज हम सबके सामने हैं जैसे निजता की कमी: मोबाइल और इंटरनेट के उपयोग से हमारी निजता पर खतरा हो सकता है, जैसे कि हमारी व्यक्तिगत जानकारी का दुरुपयोग।साइबर हमले: मोबाइल और इंटरनेट के उपयोग से हमारे खातों को हैक किया जा सकता है, जिससे हमारी व्यक्तिगत जानकारी और डेटा चोरी हो सकता है।3. स्वास्थ्य समस्याएं: मोबाइल और इंटरनेट के अधिक उपयोग से स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं, जैसे कि आंखों की समस्याएं, पीठ दर्द, और मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं।4. सामाजिक अलगाव: मोबाइल और इंटरनेट के अधिक उपयोग से सामाजिक अलगाव हो सकता है, जिससे हमारे सामाजिक संबंधों पर खतरा हो सकता है।5. निर्भरता: मोबाइल और इंटरनेट के अधिक उपयोग से हमारी निर्भरता बढ़ सकती है, जिससे हमारे दैनिक जीवन पर खतरा हो सकता है।6. वित्तीय नुकसान: मोबाइल और इंटरनेट के उपयोग से हमारे वित्तीय जानकारी का दुरुपयोग किया जा सकता है, जिससे हमारे वित्तीय नुकसान हो सकता है।7. मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं: मोबाइल और इंटरनेट के अधिक उपयोग से मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं, जैसे कि चिंता, डिप्रेशन, और तनाव।इन खतरों से बचने के लिए, हमें मोबाइल और इंटरनेट का उपयोग सावधानी से करना चाहिए और अपनी निजता और सुरक्षा के लिए कदम उठाने चाहिए।

मोबाइल और इंटरनेट का उपयोग कोरोना काल के बाद से बच्चों में और अधिक बढ़ गया है लेकिन बच्चों और युवाओं पर मोबाइल इंटरनेट की बढ़ती लत के बहुत सारे दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं।  मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं: मोबाइल इंटरनेट की लत से चिंता, डिप्रेशन, और तनाव जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। शारीरिक स्वास्थ्य समस्याएं: मोबाइल इंटरनेट की लत से शारीरिक स्वास्थ्य समस्याएं जैसे कि आंखों की समस्याएं, पीठ दर्द, और नींद की समस्याएं हो सकती हैं।सामाजिक अलगाव: मोबाइल इंटरनेट की लत से सामाजिक अलगाव हो सकता है, जिससे बच्चों और युवाओं के सामाजिक संबंधों पर खतरा हो सकता है। शैक्षिक प्रदर्शन पर प्रभाव: मोबाइल इंटरनेट की लत से बच्चों और युवाओं के शैक्षिक प्रदर्शन पर प्रभाव पड़ सकता है, जिससे उनके भविष्य पर खतरा हो सकता है।निर्भरता: मोबाइल इंटरनेट की लत से बच्चों और युवाओं की निर्भरता बढ़ सकती है, जिससे वे अपने दैनिक जीवन में मोबाइल पर निर्भर हो जाते हैं।साइबरबुलिंग और ऑनलाइन खतरे: मोबाइल इंटरनेट की लत से बच्चों और युवाओं को साइबरबुलिंग और ऑनलाइन खतरों का सामना करना पड़ सकता है।परिवारिक संबंधों पर प्रभाव: मोबाइल इंटरनेट की लत से परिवारिक संबंधों पर प्रभाव पड़ सकता है, जिससे परिवार के सदस्यों के बीच दूरियां बढ़ सकती हैं।इन दुष्प्रभावों से बचने के लिए, माता-पिता और अभिभावकों को बच्चों और युवाओं के मोबाइल इंटरनेट के उपयोग पर निगरानी रखनी चाहिए और उन्हें स्वस्थ उपयोग के बारे में शिक्षित करना चाहिए।

मोबाइल।  कंप्यूटर , इंटरनेट और टीवी तक आज हमारी निजता का उल्लंघन कर सीधे हमारे घरों तक पहुँच कर हमारी सारी बातें देख सुन रहे हैं।  मोबाइल, टीवी, और अन्य उपकरणों के माध्यम से उपभोक्ता की बातें सुनकर उसे उसी अनुरूप विज्ञापन दिखाया जाता है। यह प्रक्रिया "वॉइस ट्रैकिंग" या "ऑडियो ट्रैकिंग" कहलाती है, जिसमें उपकरणों में लगे माइक्रोफोन के माध्यम से उपभोक्ता की बातें रिकॉर्ड की जाती हैं और फिर उसे विश्लेषण किया जाता है ताकि उपभोक्ता की रुचियों और पसंदों के अनुसार विज्ञापन दिखाया जा सके।यह प्रक्रिया कई तरीकों से की जाती है, जैसे कि:

वॉइस असिस्टेंट: वॉइस असिस्टेंट जैसे कि गूगल असिस्टेंट, सिरी, और एलेक्सा उपभोक्ता की बातें सुनते हैं और फिर उसे विश्लेषण किया जाता है ताकि उपभोक्ता की रुचियों और पसंदों के अनुसार विज्ञापन दिखाया जा सके।मोबाइल ऐप्स: कई मोबाइल ऐप्स उपभोक्ता की बातें सुनते हैं और फिर उसे विश्लेषण किया जाता है ताकि उपभोक्ता की रुचियों और पसंदों के अनुसार विज्ञापन दिखाया जा सके।स्मार्ट टीवी: स्मार्ट टीवी भी उपभोक्ता की बातें सुनते हैं और फिर उसे विश्लेषण किया जाता है ताकि उपभोक्ता की रुचियों और पसंदों के अनुसार विज्ञापन दिखाया जा सके।यह प्रक्रिया उपभोक्ता की निजता के लिए खतरा हो सकती है, इसलिए उपभोक्ताओं को अपने उपकरणों की सेटिंग्स को सावधानी से चुनना चाहिए और अपनी निजता की सुरक्षा के लिए कदम उठाने चाहिए।

आजकल समाज में बढ़ते अपराध में भी मोबाइल और  इंटरनेट की भूमिका कई तरह से देखने सुनने को मिल रही है , साइबर अपराध: मोबाइल इंटरनेट के माध्यम से साइबर अपराध जैसे कि हैकिंग, फिशिंग, और ऑनलाइन धोखाधड़ी बढ़ रहे हैं।सोशल मीडिया अपराध: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपराध जैसे कि साइबरबुलिंग, ऑनलाइन उत्पीड़न, और फर्जी खबरें फैलाना बढ़ रहे हैं।चोरी और लूट: मोबाइल इंटरनेट के माध्यम से चोरी और लूट की घटनाएं बढ़ रही हैं, जैसे कि ऑनलाइन शॉपिंग के माध्यम से चोरी और लूट।नशीली दवाओं का कारोबार: मोबाइल इंटरनेट के माध्यम से नशीली दवाओं का कारोबार बढ़ रहा है, जो समाज के लिए खतरनाक है।अतिवाद और हिंसा: मोबाइल इंटरनेट के माध्यम से अतिवाद और हिंसा को बढ़ावा मिल रहा है, जो समाज के लिए खतरनाक है। जालसाजी और धोखाधड़ी: मोबाइल इंटरनेट के माध्यम से जालसाजी और धोखाधड़ी की घटनाएं बढ़ रही हैं, जैसे कि ऑनलाइन जालसाजी और धोखाधड़ी।इन अपराधों को रोकने के लिए, हमें मोबाइल इंटरनेट के उपयोग को सावधानी से करना चाहिए और साइबर सुरक्षा के उपायों को अपनाना चाहिए।

सरकार और प्रशासन ने लोगों की निजता की सुरक्षा के लिए कई तरह के नियम क़ानून कायदे भी बनाए हैं जैसे डेटा प्रोटेक्शन एक्ट: सरकार ने डेटा प्रोटेक्शन एक्ट बनाया है, जो व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के लिए नियम और दिशानिर्देश प्रदान करता है।साइबर सुरक्षा नीति: सरकार ने साइबर सुरक्षा नीति बनाई है, जो साइबर अपराधों से निपटने और साइबर सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए नियम और दिशानिर्देश प्रदान करती है। डिजिटल सुरक्षा एजेंसी: सरकार ने डिजिटल सुरक्षा एजेंसी स्थापित की है, जो डिजिटल सुरक्षा के मुद्दों पर निगरानी रखती है और साइबर सुरक्षा को बढ़ावा देती है। निजता संरक्षण आयोग: सरकार ने निजता संरक्षण आयोग स्थापित किया है, जो निजता के मुद्दों पर निगरानी रखता है और निजता की सुरक्षा के लिए नियम और दिशानिर्देश प्रदान करता है।सार्वजनिक शिक्षा अभियान: सरकार ने सार्वजनिक शिक्षा अभियान चलाया है, जो लोगों को निजता की सुरक्षा के बारे में जागरूक करता है और उन्हें साइबर सुरक्षा के उपायों के बारे में शिक्षित करता है।इन उपायों के माध्यम से, सरकार निजता की सुरक्षा को बढ़ावा देने और साइबर अपराधों से निपटने के लिए काम कर रही है।

भविष्य में मोबाइल और इंटरनेट के बढ़ते उपयोग से समाज में कई तरह के खतरे और चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है समाज शास्त्रियों के मानें तो वे खतरे हैं निजता की कमी: इंटरनेट और मोबाइल के बढ़ते उपयोग से निजता की कमी हो सकती है, जिससे व्यक्तिगत जानकारी का दुरुपयोग हो सकता है।साइबर अपराधों का बढ़ना: इंटरनेट और मोबाइल के बढ़ते उपयोग से साइबर अपराधों का बढ़ना संभव है, जैसे कि हैकिंग, फिशिंग, और ऑनलाइन धोखाधड़ी।मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं: इंटरनेट और मोबाइल के बढ़ते उपयोग से मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं, जैसे कि चिंता, डिप्रेशन, और तनाव।शारीरिक स्वास्थ्य समस्याएं: इंटरनेट और मोबाइल के बढ़ते उपयोग से शारीरिक स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं, जैसे कि आंखों की समस्याएं, पीठ दर्द, और नींद की समस्याएं।सामाजिक अलगाव: इंटरनेट और मोबाइल के बढ़ते उपयोग से सामाजिक अलगाव हो सकता है, जिससे व्यक्तिगत संबंधों पर खतरा हो सकता है।आर्थिक नुकसान: इंटरनेट और मोबाइल के बढ़ते उपयोग से आर्थिक नुकसान हो सकता है, जैसे कि ऑनलाइन धोखाधड़ी और साइबर अपराधों के कारण आर्थिक नुकसान। शैक्षिक प्रदर्शन पर प्रभाव: इंटरनेट और मोबाइल के बढ़ते उपयोग से शैक्षिक प्रदर्शन पर प्रभाव पड़ सकता है, जिससे छात्रों के शैक्षिक प्रदर्शन पर खतरा हो सकता है।इन कठिनाइयों से निपटने के लिए, हमें इंटरनेट और मोबाइल के उपयोग को सावधानी से करना चाहिए और साइबर सुरक्षा के उपायों को अपनाना चाहिए।

सोमवार, 26 अगस्त 2024

आरक्षण की बैसाखी : न टूटे , न छूटे

 



पूरी दुनिया आज विश्व के सामने आ रही चुनौतियों , समस्याओं के लिए अपने अपने स्तर पर शोध , खोज , विमर्श कर रहे हैं , इससे इतर कुछ मज़हबी कट्टरता से दबे देशों का समहू लगा हुआ है अपने विध्वसंकारी मंसूबों की पूरा करने में।  इन सबसे अलग भारत जो अब विश्व के प्रभावशाली देशों में शामिल है वाहन की राष्ट्रीय राजनीति के बहस ,  मंथन का विषय है -आरक्षण व्यवस्था।  दुखद आश्चर्य है कि देश की स्वतंत्रता के सत्तर वर्ष के पश्चात भी आज भारतीय समाज , राजनीति , सब कुछ जातियों का निर्धारण , पुनर्निधारण , वर्गीकरण और अंततः आरक्षण  व्यवस्था के इर्द गिर्द ही घूम रही है।  

सर्वोच्च प्रशासनिक सेवाओं में योग्य व्यक्तियों की नियुक्ति का फैसला और फिर उसे आरक्षण व्यवस्था के अनुरूप न पाए जाने को लेकर हाल ही में रद्द की गई लेटरल भर्ती योजना की बात हो या फिर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में निर्णीत एक वाद के आदेश की मुखालफत का जिसमें माननीय अदालत ने वर्षों से चली आ रही आरक्षण व्यवस्था के अभी तक के परिणामों प्रभावों का आकलन विश्लेषण करके आइना दिखा दिया था।  और इस आदेश की प्रतिक्रिया का हाल ये रहा कि केंद्र सरकार और स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा ारसखान व्यवस्था को किसी भी प्रकार से कमोज़र न किए जाने की बात कहने के बावजूद भी देश भर में हड़ताल बंद और प्रदर्शन किया गया।  

देश का सबसे पुराना राजनैतिक दल और अब विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के सर्वोसर्वा राहुल गांधी अपनी अतार्किक बातों बयानों में जिस तरह से सरकार से एक एक व्यक्ति की जाती पूछने बताने के बालहठ पर अड़े हैं उसकी गंभीरता इसी बात से समझी जा सकती है की वे भारतीय सुंदरियों की विजेताओं की सूची में जाती तलाश रहे थे और  कोई भी आरक्षित जातियों में से क्यों नहीं है , ये सवाल उठा रहे थे।  

कुछ वर्षों पूर्व बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी क्रिकेट तथा अन्य खेलों में आरक्षण व्यवस्था को लागू करने की बात कही थी।  ये बातें , बयान , और सोच बताते हैं कि दलितों , वंचितों शोषितों के सामाजिक उत्थान तथा अवसरों में समानता संतुलन के लिए बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने जिस आरक्षण व्यवस्था की कल्पना की थी , ये उससे कहीं दूर और अलग है।  

देश में पचास वर्षों से अधिक सत्ता और शासन में बैठी कांग्रेस  और इसके नेता वर्तमान में सबसे बड़ी वैचारिक दरिदता से गुजर रहे हैं इसलिए लगातार तीन चुनावों में बुरी तरह हारने के बावजूद भी देश को जबरन जातीय जनगणना करके दिखाने का दवा कर रहे हैं।  कांग्रेस की दिक्कत ये भी है की विपक्ष में उसके साथ बैठे अन्य दुसरे दल , इस मुद्दे पर कांग्रेस के साथ उतनी प्रतिबद्धता से नहीं दिखाई दे रहे हैं।  कोई भी कांग्रेस की आरक्षित जातियों की इस स्व घोषित ठेकेदार बनने से खुश नहीं दिख रहे।  

विश्व में भारत , नेपाल , बांग्लादेश जैसे गिनती के दो तीन देशों को छोड़कर आज कोई भी देश समाज सरकार आरक्षण या ऐसी किसी भी व्यवस्था अपने यहाँ अपनाए हुए हैं जिसमें सिर्फ जाती को मेधा और योग्यता के ऊपर वरीयता दी जाती हो।  यहाँ तो जातियों को उपजातियों में बांटने की योजनाएं चल रही हैं।  सबसे बड़ी विडंबना यह है की दशकों से चली आ रही इस विवशता के आकलन विश्लेषण , परिणाम और परिवर्तन को लेकर न्यायपालिका के मंतव्य को समझने के बावजूद आरक्षण व्यवस्था वो घंटी बन गई है जिसे बजाना हर कोई चाहता है , बाँधना कोई नहीं।  

किसी भी देश समाज में सामाजिक समरसता और संतुलन के लिए देश समाज द्वारा प्रयास किया जाना कोई अनुचित प्रयोग नहीं है किन्तु भारतीय समाज को कभी न कभी तो जबरन थामी इस बैसाखी का सहारा छोड़ योग्यता के आधार पर जीना बढ़ना होगा क्यूंकि दुनिया यही कर रही है और यही सबसे उपयुक्त है।  

रविवार, 25 अगस्त 2024

बलात्कार : स्त्री के प्रति एक जघन्य अपराध

 




अब से कुछ वर्षों पहले जब देश की राजधानी दिल्ली में सर्दियों की एक रात में , वहशी दरिंदे अपराधियों ने एक चलती हुई बस में एक बच्ची का सामूहिक बलात्कार करके अमानवीय और नृशंस तरीके से उसकी ह्त्या करके सड़क पर फेंक दिया।  अपराध इतना वीभत्स और भयानक था कि इसने पूरे देश को बेटियों की सुरक्षा के प्रति उद्वेलित किया।  सरकार , समाज की प्रतिक्रया देख कर लगा था कि शायद अब महिलाओं के विरुद्ध अत्याचार और शोषण की घटनाओं पर अंकुश लग सकेगा।  

आज एक दशक के बाद जब अभी दस दिन पूर्व एक महिला प्रशिक्षु चिकित्सक के साथ वही बर्बबरता , वही शोषण करके क्रूर तरीके से उसकी ह्त्या कर दी गई है और एक बार फिर देश खूबड़ और आक्रोशित है।  सच तो ये है कि दिल्ली के उस और कोलकाता के इन दो अपराधों के बीच बीते समय में भी देश भर में बच्चियों , युवतियोन और महिलाओं पर अत्याचार शोषण की हज़ारों लाखों घटनाएं हर साल , हर महीने , हर दिन घटती रही हैं और ये अब भी बदस्तूर जारी है।  

किसी भी देश या समाज की सभ्यता , संस्कृति और संस्कार इस बात पर निर्भर करते हैं कि वो अमुक समाज , देश अपनी स्त्रियों , बच्चों वृद्धों  और बेजुबान पशु पक्षियों से कैसा व्यवहार करता है , उनके प्रति कितनी आत्मीयता दया भाव रखता है और किस तरह से इनकी सुरक्षा , संरक्षण और सहायता के लिए खुद को प्रतिबद्ध करता है।  किन्तु ये उतनी ही अफ़सोस की बात है कि भारतीय समाज अपने वृद्धों , बच्चों , महिलाओं के प्रति कहीं से भी संवेदनशील और सहृदय नहीं है तो बेजुबानों की तो क्या ही कहा जाए।  


राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर नज़र डालें तो स्थति की भयवहता का अनुमान हो जाता है।  दिसंबर 2023 को जारी रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार भारत में महिलाओं के प्रति किए जा रहे अपराधों में पिछले वर्ष की तुलना में ये 4 % और अधिक बढ़ गया।  रिपोर्ट में खुलासा किया गया है की वर्ष 2020 में कुल 3 ,  71 ,  503  घटनांए तो वर्ष 2021 में ये बढ़कर4 ,  28 ,  278 हो गेन और वर्ष 2022 में यह संख्या और अधिक बढ़कर 4 , 45, 256 घटनाओं की हो गई और ये सब वो मामले हैं जो दर्ज़ किए जा सके हैं।  रिपोर्ट बताती है कि 31 प्रतिशत मामलों में तो घर वाले ही कहीं कहीं संबधित पाए गए हैं और 20 प्रतिशत मामले में उनका अपहरण और शोषण किया गया।  महिलाओं के प्रति अपराध में उत्तर प्रदेश , राजस्थान , पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की स्थति ज्यादा सोचनीय है।  

ऐसा नहीं है कि सरकार , प्रशासन और विधायिका बलात्कार जैसे घृणित अपराध को रोकने के लिए सोच या कर नहीं रहीं हैं , दिल्ली निर्भया मामले के बाद महिलाओं के प्रति अपराध विषयक कानूनों में और अभी हाल ही में लाए संशोधन में दंड को अधिक कठोर किए जाने के बावजूद कानूनों में परिवर्तन मात्र से या दंड को अधिक कठोर भर कर देने से इस अपराध और अपराधियों के मनोभाव पर कोई फर्क पड़ता नहीं दिख रहा खासकर उन परिस्थितयों में जब अपराधी कई खामियों की वजह से साफ़ बच निकलते हैं या छूट जाते है और सालों साल चलने वाले न्यायिक अभियोग के बाद मिले दंड को भुगतने से बचने के लिए भी कानूनी विकल्पों का का सहारा लेते हैं।  हाल ही में राम रहीम को बार बार मिल रहे फर्लो का उदाहरण देख सकते हैं।  

इस घृणित अपराध के अपराधियों में कानून व्यवस्था या अपने अपराध के लिए भुगते जाने वाले दंड का रत्ती भर भी भय नहीं होने की सबसे बड़ी वजह है न्याय मिलने में समयातीत देरी।  विडम्बना या त्रासदी इससे बड़ी और क्या हो सकती है कि संयोगवश अभी हाल ही में , अजमेर में 32 वर्ष पूर्व 100 कालेज जाने वाली बच्चियों का शोषण किया गया , आधे दर्जन पीड़िताओं ने आत्महत्या तक कर ली थी और पूरे 32 वर्ष के बाद सत्र न्यायालय द्वारा दोषियों को उम्र कैद की सजा सुनाई गई है।  गौरतलब है की अभी उच्च न्यायालय और सर्वोच्चय न्यायालय में अपील दलील का विकल्प उपलब्ध है।  

महिलाओं युवतियों यहाँ तक कि बच्चियों पर भी हुए अत्याचारों , अपराधों , को लेकर भी देश की पुलिस अफसोसजनक रूप से बेहद असंवेदनशील और गैर जिम्मेदार रवैया दिखाती है।  हाल ही में महाराष्ट्र के बदलापुर में मात्र चार वर्ष की अबोध बच्चियों के साथ शोषण की शिकायत ,पुलिस अधिकारी तीन दिनों तक अनसुनी करती रही जबकि जांच अधिकारी एक महिला पुलिसकर्मी थीं।  शोषण , छेड़छाड़ आदि के अपराध में पीड़ितों की यही शिकायत रहती है की समय रहते ही पुलिस नहीं सुनती , कार्यवाही नहीं करती और वारदात के बाद भी लीपापोती करती है।  

अपनी है आधी आबादी , अपनी ही माँ , बेटी , बहन की सुरक्षा , मान , मर्यादा सुनिश्चित नहीं कर पाने वाला समाज ,देश खुद को विश्व में कितना ही शक्तिशाली और प्रभावशाली बना ले , घोषित कर ले किन्तु ये शक्ति ये प्रभाव किसी भी परिस्थति में आधा ही रहेगा।  सबसे बड़ी बात ये है कि जिस तरह से असम में और इससे पहले बंगलौर में भी ऐसे अपराधों को अगले २४ घंटे में मौत की नींद सुला देने वाले तमाम कारण फिर आम जनमानस को इतनी बड़ी और भारी भरकम न्याय व्यवस्था से कहीं अधिक जरूरी और सही लगने लगे तो ये और भी सचेत हो जाने वाली बात है।  समय रहते ही सब कुछ ठीक करने की दिशा में यदि सच में ही कुछ किया नहीं गया तो समाज के लिए विषम परिस्थितियाँ बनेंगी और समाज से कोई भी अछूता नहीं बचता कोई भी नहीं।   



शनिवार, 24 अप्रैल 2021

लाखों लोगों की मौत का जिम्मेदार है चीन

 



पूरी दुनिया में लाखों लोगों को मौत के मुँह में धकेलने के लिए ज़िम्मेदार , विश्व के सबसे धूर्त और दुष्ट राष्ट्र चीन को वैश्विक मंचों पर जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकना , इतनी सारी मौतों के लिए उसे कोई दंड तो दूर उसे इस अपराध का बोध तक न करा पाना , सारी वैश्विक सस्थाओं और शक्तियों के मुंह पर एक करारा तमाचा है। आज चीन इन सबसे निश्चिंत होकर आराम से बैठा हुआ है और दुनिया के सारे चौधरी बने फिरते देश सुइयां तलाशते फिर रहे हैं।  

रही बात भारत के वर्तमान हालात की , तो अनुमान तो पिछले बरस ही लगा लिए गए थे की दुनिया में इस बीमारी से सबसे ज्यादा लोग , लगभग 7 करोड़ लोग , पीड़ित होकर अपनी जान गँवा बैठेंगे।  बहुत लोगों ने मंसूबे भी शायद यही पाले हुए थे और देश से लेकर विदेश तक और बाहरी से लेकर अपनों तक की दोस्ती दुश्मनी के बीच भारत पहली लड़ाई जीत कर बाहर निकल ही आया था कि अब इस दूसरी लहर ने अधिक घातक दस्तक दे दी।  

हमारी कीड़े मकोड़े जैसे जनसंख्या , सालों से चला आ रहा कुप्रबंधन और कुव्यवस्था , आपदा विपदा के समय भी लोगों का धूर्त और स्वार्थपूर्ण आचरण , नियामक और नियंत्रक एजेंसियों का अभाव और सबसे अधिक सरकारों , प्रशासन , व्यवस्था में किसी भी तरह के तालमेल की भारी कमी।  ऐसे में भारत जैसे जनसंख्या विस्फोट वाले देश में यदि इस तरह का चिकित्स्कीय आपातकाल आकर सबको हैरान परेशान कर रहा है तो ये भारत की नियति है।  

लेकिन निकल तो हम इस आपदा से भी जाएँगे , तब तक खुद को सुरक्षित और स्वस्थ रखना ही अभी सबसे अधिक जरूरी है।  

रविवार, 5 जुलाई 2020

महामारी के बाद




इस शताब्दी के शुरुआत में ही विश्व सभ्यता किसी अपेक्षित प्राकृतिक आपदा का शिकार न होकर विरंतर निर्बाध अनुसंधान की सनक के दुष्परिणाम से निकले महाविनाश की चपेट में आ गया |  किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि कभी इंसान की करतूत उसके लिए ऐसे हालात पैदा कर देंगे जब कुदरत के माथे ,इंसान के विनाश का दोष नहीं आकर खुद उसके हिस्से में ये अपराध आएगा | 

अभी तो इस महारामारी की सुनामी से उबरने निकलने की ही कोई सूरत निकट भविष्यमे निकलती नहीं दिखाई दे रही है किन्तु समाज का हर वर्ग, विश्व का हर देश , प्रशासन , अर्थशास्त्री अभी से ये आकलन करने में लग गए हैं की महामारी के वैश्विक परिदृश्य के क्या हालात होंगे ? वैश्विक समाज और विश्व अर्थव्यवस्था किस ओर मुड़ेगी | विश्व महाशक्तियों के आप सी संबंधों का समीकरण क्या और  कितना बदल जाएगा ? सामरिक समृद्धता  के लिए मदांध देश क्या इस महामारी के बाद भी शास्त्र-भंडारण की ओर ही आगे बढ़ेंगे या फिर चिकित्स्कीय संबलता की ओर रुख करेंगे ये देखने वाली बात होगी | 

चिकित्स्कीय अनुसंधान के विश्व भर के तमाम पुरोधाओं को अभी तक कोरोना को पूरी तरह समझ उसका कारगर और सटीक तोड़ निकालने में सफलता हासिल हो सकने की फिलहाल कोई पुख्ता जानकारी नहीं है | तो अब जबकि पूरे विश्व को इसकी चपेट में आए छ महीने से भी अधिक हो चुके हैं और इसका प्रवाह और प्रभाव दोनों ही रोके से रुक नहीं पा रहे हैं | ऐसे में समाज शास्त्री अपने अध्ययन की दिशा उसी और मोड़ चुके हैं जब कोरोना के बाद महसूस की जाने वाली चुनौतियों से समाज को जूझना पडेगा , उन्हीं बातों का आकलन विश्लेषण किया जा रहा है | 


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है | समाजशास्त्र का यह सिध्दांत सूत्र भी  सर्वथा प्रतिकूल होकर रह गया  है | मनुष्य आज अपने सही गलत अन्वेषणों ,प्रयोगों का दुष्परिणाम यह उठा रहा है कि अपने ही समाज में रहते हुए अपने ही समाज से निषिद्ध होने को विवश हो गया है | समाज शास्त्र का दूसरा सूत्र कि ताकतवर या मजबूत के ही बचे रहने या  उसके अपने अस्तित्व को बचाने के संघर्ष चक्र में ,उसके परिस्थितियों से लड़ कर पार पा जाने की सम्भावनाएँ ही अधिक प्रबल होती हैं | इस मिथक को भी इस महामारी ने इस अर्थ में तोड़ा कि विश्व के तमाम शक्तिशाली देश इस महामारी की चपेट में आकर त्रस्त पस्त हो चुके हैं और अब भी इन पर कोरोना का कहर बरप रहा है | 

आज विश्व समुदाय ने इस अलप समय में ही देख लिया कि एक सिर्फ इंसान को थोड़े दिनों तक प्रकृति से मनमानी करने से अवरुद्ध किए जाने भर से प्रकृति ने इतने ही दिनों में खुद कि स्थति कितनी दुरुस्त कर ली | तो इस महामारी ने यह भी बता दिया कि इंसानी सभ्यता को हर हाल में प्राकृतिक तारतम्यता व् सामंजस्य का सिद्धांत ही अपनाना होगा | 

इंसान घरेलू प्राणी है ,यह एक बार फिर प्रमाणित हुआ | जिस तरह से आपदा की आहट  सुनते ही विश्व से लेकर देश के अंदर भी एक प्रांत से दूसरे प्रांत में लोगों ने अपने घर , अपनों के पास जाने का जो ये प्रवाद दौर वर्तमान में हुआ है वो इतिहास में हुए बहुत से असाधारण विस्थापनों में से एक है | अपने रोजगार और भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए गाँव की बहुत बड़ी ,आबादी  पलायन/विस्थापन का शिकार दशकों पहले शुरू हुई थी | गाँव ,कस्बों से शहर ,नगर और महानगर बसते  बढ़ते रहे और गाँव खाली होते चले गए | शहरों में  आ कर सालों तक सिर्फ जीने के अस्तित्व संघर्ष में उलझा ये ग्राम्य समाज क्या अपने गाँव घरों में अपने जीवन यापन के विकल्प तलाशेगा ? 

बिहार ,उत्तर प्रदेश ,बंगाल ,उड़ीसा का मान संसाधन विकास सूचकांक प्रदर्शन दशकों से ही बहुत पिछड़ा रहा है | ऐसी आपदाओं के समय इन राज्यों का प्रशासन और प्रबंधन क्या ,किता विकास कर सका , क्या कितना सीख पाया ये हालत भी इन्हें परिलक्षित करते हैं | महामारी के रूप में सामने आए इस अपर्याताशित आपदा और ऐसी दूसरी आपत्तियों के समय ही व्यवस्थाओं की असली परख होती है और अभी यही परख हो रही है | 

ये महामारी काल कितना लंबा खिंचेगा अभी तो यही तय नहीं है किन्तु इसके बाद वाले समय में विश्व का सामाजिक ,आर्थिक और भौगोलिक समीकरण भी परिवर्तित होकर नए  मापदंड  स्थापित करेगा ये तय है | 
वैश्विक महाशक्तियों यथा अमेरिका ,चीन ,फ्रांस ,रूस ,इटली  जैसे देश अलग अलग स्थितियों परिस्थितयों में खुद को विश्व फलक पर पुनर्स्थापित करने की जद्दोज़हद के बीच अविकसित और विकाशील देश भी इस महामारी के प्रभाव से उबरकर खुद को बचा पाने के लिए नए सिरे से संघर्षशील होंगे | 

भारत इस महामारी के विरुद्ध  विश्व के अन्य देशों की तुलना में अब तक इस लड़ाई में सम्मानपूर्वक अपने लोगों को यथासंभव बचा सकने के कारण वर्तमान में पहले ही अगली पंक्ति में आ चूका है | विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी बोर्ड के अध्यक्ष पद पर किसी भारतीय का चयन , संयुक्त राष्ट्र परिषद् के अस्थाई सदस्य  के रूप सर्वाधिक मतों से चयन , ने इस ओर स्पष्ट ईशारा कर भी दिया है | इस बीच चीन को मिल रही वैश्विक नकारात्मक प्रतिक्रया के कारण वहां से पलयान को उद्धत उद्योग परियोजनाएं आदि की पहली प्राथमिकता भारत ही होगा | इसकी शुरुआत भी करीब करीब हो चुकी है | 

शनिवार, 24 अगस्त 2019

आखिर कब रुकेंगी सड़क दुर्घटनाएँ



सड़क दुर्घटनाओं की खबरें अब नियमित  रूप से समाचारों में देखने पढ़ने व सुनने को मिल जाती हैं | अफ़सोस और उससे अधिक चिंता की बात ये है की इन घटनाओं में लगातार इज़ाफ़ा ही हो रहा है | दो पहिआ वाहन से लेकर चार पहिया वाहन और भारी वाहन तक कोई भी इससे अछूता नहीं है | इत्तेफाक से जहाना केंद्र सरकार मोटर वाहन अधिनियम में महत्वपूर्ण संशोधन कर चुकी है वहीं राजधानी की प्रदेश सरकार ने भी अभी कुछ समय  पूर्व ही सड़क दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या के कारणों का अध्ययन  करके  इसे दूर करने के लिए जरूरी उपाय समेत परिवहन परिचालन व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए कई उपचारात्मक कदम उठाए  हैं | 

इस विषय पर आगे विमर्श से पहले कुछ तथ्यों कथ्यों पर नज़र डालते हैं | परिवहन व्यवस्था में सुधार के लिए दिशा निर्देश जारी करने के उद्देश्य से दायर याचिका की सुनवाई करते हुए माननीय न्यायमूर्ति ने टिप्पणी करते हुए  कहा था की इस देश में अपराध और आतंकी घटनाओं में उतने लोग नहीं मरते जितने कि सड़क दुर्घटनाओं में रोज़ मर रहे हैं | सड़क दुर्घटनाओं   के कारण होने वाली मौतों के पीछे वजह का अध्ययन करने वाली संस्था "रोड एक्सीडेंट सेफ्टी मूवमेंट " के सर्वेक्षण में यह बात सामने निकल कर आई है की भारत में ४७ प्रतिशत  पीड़ितों की मृत्यु सिर्फ इसलिए हो जाती है क्योंकि समय पर उन्हें प्राथमिक उपचार नहीं मिल पाता | 

पिछले दो दशकों में सड़क दुर्घटनाओं में लगातार वृद्धि होने के कुछ  प्रमुख कारणों को रेखांकित किया जाए तो वे कुछ इस तरह सामने आते हैं | इन कारणों में सबसे पहला और सबसे मुख्य कारण खुद सड़कें हैं | भारतीय रोड रिसर्च संस्थान की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि  मानक नियमों की अनदेखी रख रखाव व पुनर्निर्माण में लापरवाही तथा दिल्ली जैसे महानगरों में सडकों पर भागते वाहनों का दस गुना अधिक दबाव स्थिति को बेहद नारकीय बना रहा है | भारत जैसे देशों जहां परिवहन नियमों की अनदेखी के कारण एक्सप्रेस वे तथा विशेष कॉरीडोर में भी सड़क दुर्घटनाओं में काफी इज़ाफ़ा होता रहा है |  दिली से सटे आगरा एक्सप्रेस वे तो इन सड़क दुर्घटनाओं के कारण कुख्यात सा हो गया है | 

अगली बड़ी वजह है भारत में चलाए जा रहे व निर्मित वाहनों में अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा मानकों की भारती अनदेखी | दुर्घटना के पश्चात पड़ने वाले प्रभाव  व यात्रियों को उससे होने वाले नकसान के लिए किये गए एक परीक्षण में १० में से सिर्फ ३ ही वो भी आंशिक रूप से सफल रहीं | अन्य सात में चालाक व यात्रियों के बचने की संभावना बहुत कम रही | विडम्बना देखिये कि एक तरफ जहां नई स्कूटी मोटरसाइकिल में २४ घंटे अनवरत जलने वाली हेडलाईट का प्रयोग किया जा रहा है जबकि सर्दियों में धुंध  बीच ड्राइविंग करने के लिए प्रयोग की जानी वाली विशेष पीली रौशनी हेड लाइट का प्रयोग न के बराबर होता है  सर्दियों में धुंध व कोहरा सड़क दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण है | 

भारत विश्व का अकेला ऐसा देश है जहां  वाहन चलाने के लिए दिए जाने वाले लाइसेंस की परिक्षा में १० प्रतिशत से भी कम लोग फेल होते हैं | अप्रशिक्षित चालकों को लाइसेंस मिल जाना व नकली लाइसेंस प्राप्त कर/बना कर वाहन चलाना जितना भारत में आसान है वो पड़ोस के छोटे देशों में भी नहीं है | इसका दुष्परिणाम ये हुआ  आंकड़ों के अनुसार चालकों व बिना लाइसेंस या नकली लाइसेसं धारक चालाक व बिना लाइसेंस या नकली लाइसेंस धारक चालाक ही दोषी होते हैं | बस ट्रक टेम्पो  आदि में तो कई बार बड़ी दुर्घटनाओं को अंजाम देने वाचालाक वास्तव में कंडक्टर व क्लीनर तक निकले हैं |  महानगरों में बहुत काम उम्र में बहुत तेज़ गति से कार काऊंटी चलाते बच्चों ने तो मानो कहर बरपाया हुआ है | विदेश निर्मित वाहनों में असीमिति रफ़्तार की व्यवस्था वाली कारों आदि को  भारत जैसे अधिक ट्रैफिक जनसंख्या वाले देश में दौड़ाना किसी बम से कम नहीं है |  

दुर्घटना के लिए जिम्मेदार कारकों में एक और मुख्य कारण है शराब पीकर गाड़ी चलाना | "शराब पीकर गाड़ी न चलाएं " यह वाक्य लगभग हर सड़क और राजमार्गों पर लिखा होता है ,सिर्फ एक इस नियम के पालन से देश में दुर्घटनाओं की संख्या में ५० प्रतिशत तक की कमी लाई जा सकती है | एक बात और उल्लेखनीय है कि ऐसे मामलों में चालक और पीड़ित के मौत की संभावना ७८ प्रतिशत तक अधिक हो जाती है 7  शराब पीकर वाहन चलाने वाले किसी आत्मघाती आतंकी की तरह होते हैं |  

हालांकि ऐसा नहीं है की सरकार प्रशासन व पुलिस इससे चिंतित नहीं है या इनकी रोकथाम के लिए कोई उपाय नहीं कर रही है |  मई २०१८ में दिल्ली की प्रदेश सरकार ने "दिल्ली सड़क सुरक्षा नीति " को प्रस्तुत करते हुए जानकारी दी कि राजधानी दिल्ली में इस वक्त लगभग ११ करोड़ पंजीकृत वाहन हैं व प्रतिवर्ष ७ लाख नए वाहनों का पंजीकरण होता है | इसके बावजूद वर्ष २०११ से अब तक सड़क दुर्घटनाओं की संख्या में मामूली ही सही मगर कमी तो आई है | इस नीति में २०१८ -२०२० तक इन दुर्घटनाओं में मौतों की संख्या में ३० प्रतिशत तक और २०२५ तक ८० प्रतिशत की कमी उद्देश्य रखा गया है |  इसके लिए सरकार ने विस्तृत कार्ययोजना बनाई है व समय समय पर इनकी समीक्षा व कार्यवाही रिपोर्ट भी ली जाएगी |  

दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने अभी हाल ही में मोटर वाहन दुर्घटनाओं के लिए चालकों को अधिक सजग व सचेत  करने के उद्देश्य से मोटर वाहन दुर्घटना अधिनियम में भारी संशोधन कर नियमों की अवहलेना करने के दोषियों पर अधिक जुर्माने व दंड का प्रावधान कर अपनी मंशा जाता दी है | किन्तु ये सभी उपाय, नियम तभी प्रभावी व सार्थक होंगे जब व्यक्ति खुद संवेदनशील  व जिम्मेदार होगा | फिलहाल तो ये सड़कें मौत की मंज़िल बनी हुई हैं | 

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

बदलती सामरिक स्थिति ...





नरेंद्र मोदी की पूर्ण बहुतमत की सरकार का गठन करके ,भारतीय जनमानस ने यह स्पष्ट सन्देश दे दिया था कि ,भारतीय राजनैतिक परिदृश्य और राष्ट्रीय विचारधारा में निश्चित रूप से , पूर्व से इतर कुछ ,ठोस परिवर्तन होने जा  रहे  हैं | इनमें पहला था पड़ोसियों के साथ  बेहतर व् स्पष्ट  रिश्तों  की शुरुआत | पिछले दो वर्ष की बहुत सी तारीखें इस   बात की गवाह रही हैं ,कि भारत की नई सरकार ने शपथ ग्रहण के समय से ही पूरे विश्व के साथ नए व् बेहतर सम्बन्ध की शुरुआत करके वैश्विक ग्राम और वसुधैव कुटुम्बकम की परिकल्पना को साकार करने में मन व् प्रत्यक्षतः खुद को लगातार साबित करने का प्रयास किया |

हालांकि पिछले कुछ दशकों में मुस्लिम चरमपंथ , पेट्रो रिजर्व क्षेत्रों पर नियंत्रण व् आर्थिक मंदी  के कारण विश्व के बहुत से भागों में अलगाववादियों व् आतंकियों ने अपने अस्तित्व  को शेष दुनिया को समाप्त करने से जोड़ कर उन्मादी , हिंसक व् अंतहीन संघर्ष "जेहाद" के नाम पर छेड़ दिया | विकास व् सृजन की दौड़ में खुद को पीछे रखने वाली ये कबायली सभ्य्तायें  जब पश्चिमी देशों की घोर एशो आराम और उपभोगी संस्कृति के संपर्क मे आए तो स्वाभाविक रूप से संघर्ष शुरू हो आया |

भारत प्रारम्भ से ही सनातन संस्कृति का वाहक होने कारण सर्वग्राह्य व् सर्व धर्म समभाव की परिपाटी पर ही चलता रहा | आधुनिक राजीनति में धर्म , जाति , आदि के समावेश और उससे अधिक दुरुपयोग ने कालान्तर में विदेशी प्रशासकों को यह अवसर दे दिया कि उन्होंने भू क्षेत्र का विभाजन करके एक शास्वत समस्या और संघर्ष का बीजारोपण कर दिया | पाकिस्तान , बांग्लादेश और चीन जैसे अमित्र पड़ोसियों की उपस्थिति से उत्पन्न अवश्यम्भावी घटनाओं, व्  आक्रमणों  से आक्रान्त , भारत , नई सरकार बनने के बाद नई नीतियों व निर्णयों के अधीन अग्रसर हो चुका था |

पिछले दो वर्षों में उत्पन्न अनेकों अवसर पर एक प्रशासक व् निजी मित्र के रूप में भी पाकिस्तान , उनके हुक्मरान , पाकिस्तानी अवाम सहित पूरे विश्व को अपने प्रयत्न , मतवी व् संबोधन से स्पष्तः अवगत करा दिया था कि आतंकवाद के रास्ते को छोड़ विकास व् सहभागिता के रास्ते पर चलना होगा | किन्तु  आचरण व् चरित्र के अनुरूप वही गलतियां दोहराता पाकिस्तान आज जबरन दोनों देशो को युद्ध के मुहाने तक खींच लाया है | वर्तमान में नियंत्रण रेखा पर जो स्थिति है वह पिछले बीस वर्षों में अब तक की सबसे तनावपूर्ण स्थिति है | रही सैन्य तैयारियों की बात तो हालिय६आ वैश्विक हालातों तथा आतंकवादियों की बढ़ती गतिविधियों व् खतरे के मद्देनज़र लगभग हर देश की सेना सतर्क व् सचेत मोड पर ही है | भारत सेना सतर्क व् सचेत मोड पर ही है | भारत के लिए सुरक्षा एजेंसियों की तरफ से जारी हाई अलर्ट के कारण अव नियंत्रण रेखा पर सर्दियों में घुसपैठ की आशंका के कारण सेना पहले ही सतर्क व् लैस थीं हालांकि विशेषज्ञों की माने तो भार्ते४एय सैन्य बल को पूरी तरह से तैयार होने के लिए कुछ चुनौतियों से जूझना होगा |

पूर्व सेना उपप्रमुख ले.जे. फिलिप काम्प्स ने पठानकोट हमले के बाद सैन्य तैयारियों का पुनर्सर्वेक्षण कर रिपोर्ट पेश करते हुए अनुशंसा की , कि भारतीय सेना में उपयोग किए जाने वाले लगभग  , 1000 पुराने T-72 टैंकों को तुरंत ही अत्याधुनिकीकरण की जरूरत है | वर्तमान में विशेष कमांडो द्वारा  उपयोग में लाए जाने वाले इंसास (इन्डियन स्माल आर्म्स सिस्टम) राइफलों का नारंगी रंग रात्रि युद्ध के लिए सर्वथा अनुपयुक्त बताया गया है , जिसमें सुधार के लिए प्रयास किये जा रहे हैं |
वर्ष 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार सेना में 9100 अधिकारियों की कमी बताई गई जिन्हें जल्द से जल्द भरा जाना चाहिए | देश में निर्मित टैंक अर्जुन एम् के II में इस्राईली राकेटों के लिए फिटिंग की समस्या पर भी काम किया जा रहा है | सेना को अपने जवानों के लिए 3 ,50, 000 बुलेट प्रूफ जैकेटों की जरूरत है , जिसमें से 50,000 की खरीद प्रक्रिया को आगे बढाया जा चुका है |भारतीय सेना की भविष्य की चुनौतियों के मद्देनज़र सेना के लिए राफेल विमान , हवित्ज़र तोपें जैसे आधुन्बिक रसखा आयुधों का आयात व् रक्षा एवं अनुसंधान संस्थान द्वारा निर्माण और आधुनिकीकरण की दीर्घकालीन योजना पर काम किया जा रहा है |हाल ही में हुए एक उच्च स्तरीय बैठक में , 7 .62 मि .मि की अधिक घातक 65 ,000/- राइफलों की खरीद व 20 ,000/- राइफलों के देश में निर्माण को हरी झंडी दी है | इनके अलावा 46, 000/- करोड़ मूल्य की 145 अति हल्की होवित्ज़र M 777 , १६,९००/- करोड़ मूल्य  के 420 एयर  डिफेन्स गन , 15,750/- करोड़ रुपये मूल्य  के 814 आर्टिलरी गन एवं 6,600/- करोड़ मूल्य के अर्जुन M K -II टैंकों की खरीद व् निर्माण को भी अंतिम रूप दिया जा रहा  है  | 



किसी भी शांतिप्रिय व् विकासशील देश के लिए अब यह बहुत जरूरी हो जाता है कि विश्व में पैर पसारते आतंकवाद के डांस से खुद को बचाए रखने के लिए भी उसे अपनी सीमाओं , अपने भूक्षेत्रों व् नागरिकों की सुरक्षा व् संरक्षण के लिए पुख्ता इंतजाम करके रखना  होगा | इसके साठ ही देशवासियों को भी आगामी उत्सवी महीनों व् समय होने के कारण अधिक सजग व् सचेत रहकर सरकार व् प्रशासन के प्रयासों को सफल बनाना होगा | जो भी हो , आने वाले समय में सैनिक प्रतिद्वंदिता में वृद्धि की संभावना के मद्देनज़र पूरा विश्व एक उहापोह और तनावपूर्ण माहौल में परिवर्तित होगा , ये तय है |  

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

राष्ट्रीय संघर्ष का वर्ष ......आज का मुद्दा








भारतीय इतिहास में यदि वर्ष २०११ को सिर्फ़ किसी खास वजह के लिए याद रखा जाएगा तो वो होगा अचानक उठे देशव्यापी जनांदोलन से बने राष्ट्रीय संघर्ष के जन्म वर्ष के रूप में । देश में आज़ादी के बाद लोकतंत्र में आम आदमी को अपने अधिकार और उससे लगातार वंचित किए जाने का एहसास तब हुआ जब अबसे कुछ साल [प्प्र्व आम जनता को सूचना का अधिकार हासिल हुआ । संयोग से ये वैश्विक राजनीति में चल रहे परिवर्तन के दौर का सहभागी बनते हुए देश के युवा,कुछ ईमानदार प्रशासक तथा व्यवस्था के सड गल चुकने के कारण क्षुब्ध हुए विशिष्ट विद्वानों ने समाज के लिए बनाए जा रहे कानूनों की पडताल कर दी ।

ये भारत के राजनीतिक इतिहास में पहली बार हो रहा था कि आम लोग किसी प्रस्तावित कानून , जो कि भ्रष्टाचार के विरूध लाया जा रहा था , के बारे में न सिर्फ़ पूछ और बता रहे थे बल्कि उसकी कमियां बता कर बेहतर विकल्प सामने लेकर खडे थे । देश की राजनीति जो पिछले एक दशक से लगभग दिशाहीन चल रही थी , जनता द्वारा सीधे-सीधे अपना अधिकार मांगने की नई प्रवृत्ति से बौखला कर दोषों को दूर करके जनता का विश्वास पाने के बदले बेशर्म , बेखौफ़ व बेलगाम सा व्यवहार करने लगीं ।

भारतीय मीडिया ने पिछले एक दशक का सफ़र बेहद तीव्र गति से तय किया । बेशक पेशेवराना अंदाज़ व स्वाभाविक जिम्मेदारी के अपेक्षित स्तर से पीछे रहने के बावजूद आज विश्व की आधुनिकतम सूचना तंत्र प्रणाली से कदम से कदम मिला कर चलता मीडिया अब काफ़ी प्रभावी बन चुका है । भारतीय जनमानस के बदलते तेवर और भीतर भरे आक्रोश को चेहरा देकर मीडिया  ने इसे विश्व सुर्खियों में ला दिया । यहां भारतीय लोकतंत्र बहुत से मायनों में खुशकिस्मत साबित हुआ । इसे प्रजातांत्रिक शासन की सफ़लता के लिए सबसे आवश्यक "न्याय की स्थापना " हेतु निष्पक्ष , निडर व काबिल न्यायपालिका का सरंक्षण मिला । भारत के आसपास पाकिस्तान , बांग्लादेश ,श्रीलंका
आदि देशों में राजनीतिक अस्थिरता ने फ़ौरन ही तानाशाही वर्दी शासन को न्यौता दे दिया ऐसे में बडे से बडे राजनीतिक संकट के समय भी भारतीय सैन्य बलों का तटस्थ व अनुशासित रह जाना एक बडी उपलब्धि से कम नहीं हैं ।

देश का हर वर्ग , हर विधा ,हर क्षेत्र ,शिक्षा , स्वास्थ्य , मनोरंजन आदि सब कुछ तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रहे है । आम आदमी अब पहले से ज्यादा जागरूक हो गया है । इसलिए अब राज्य को ये बात भली भांति समझनी चाहिए कि लोकतंत्र में सबसे अहम बात होती है लोकइच्छा । भारतीय राजनीति , राजनीतिज्ञों के भ्रष्ट आचरण व बेईमान नीयत के कारण अब तक के सबसे निम्न स्तर पर है । आए दिन राजनेताओं के साथ किया जाने वाला व्यवहार , अभिव्यक्ति देने वाले मंचों पर निकल रही भडास आदि को देखने के बाद आम जनता की मनोस्थिति का अंदाज़ा सहज़ हो जाता है ।

आज विदेशों में भारतीयों द्वारा छिपाकर रखे गए काले धन की वापसी का मुद्दा हो ,या भ्रष्टाचार से निपटने के लिए बनाए जा रहे किसी कानून को दुरूस्त करने का मुद्दा । महत्वपूर्ण पदों पर अयोग्य व भ्रष्ट व्यक्ति की नियुक्ति का मुद्दा हो या फ़िर तेज़ी से बढे घोटालों में खुद सरकार के मंत्रियों की भूमिका और ऐसे तमाम मुद्दों पर सरकार ने न सिर्फ़ गैर जिम्मेदाराना व्यवहार किया बल्कि कई बार वह अपना बचाव करते हुए तानाशाही स्वरूप अपनाती लगी । आज देश के चुने हुए जनप्रतिनिधि जो विचार , जो बहस जो तर्क संसद के भीतर उस कानून को कमज़ोर करने के लिए दे रहे हैं , जिसे भ्रष्टाचार को हटाने में सहायक माना जा रहा है , क्या वही तर्क देश की आम अवाम का भी है । यदि ऐसा है तो फ़िर पिछले तीन सौ पैंसठ दिनों में जाने कितनी ही बार उस कानून को बनाने की मांग को उठा कर सडकों पे आते रहे हैं ।


सत्ता और सरकार बेशक अपने अधिकारों के उपयोग -दुरूपयोग से जनता के प्रश्नों और उनकी मांगों को उलझाने के प्रयास में लगी रही हो । किंतु इतना तो तय है कि अब ये सवा अरब की जनसंख्या वाले समूह को हठात ही मूर्ख नहीं बनाया जा सकता । ऐसा नहीं है कि इस परिवर्तन के सब कुछ अनुकूल चल रहा है , बल्कि सच कहा जाए तो ये सब तक उस मिथक को तोडने में भी सफ़ल नहीं हो पाया है कि भारत में ये मानसिकता सिद्ध है कि देश से भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा सकता । लोकपाल-जनलोकपाल बिल का मुद्दा, कानून में बदलेगा या सत्ता और अवाम के बीच संघर्ष बिंदु बनेगा ये तो वक्त ही बताएगा । हां आज जिस तरह से भ्रष्टाचार के विरूद्ध आम लोगों ने अपनी क्षुब्धता ज़ाहिर की है उससे ये अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि आने वाले कानूनों को बनने-बनाने से पहले जनता अपनी कसौटी पर उसे परखेगी ।

देश के लिए ये बहुत संवेदनशील समय है । विश्व आर्थिक मंदी के चपेट में है । प्राकृति अस्थिरता और पर्यावरणीय असंतुलन के साथ आतंकवाद के सबसे खतरनाक स्तर तक पहुंचने की संभावना के बीच चुपचाप विकास की ओर बढते रहना , वैश्विक समुदाय की ईर्ष्या का कारण बनने के लिए पर्याप्त है । विपरीत परिस्थितियों व बुनियादी समस्याओं से दो चार होते रहने के बावजूद देश की जनता ने लोकतंत्र में विश्वास बनाए रखा है । पिछले दिनों महंगाई की बढती दर ने आम आदमी के आक्रोश को मुखर होने के लिए उकसा दिया । आम जनता के सामने आज सबसे बडी चुनौती यही है कि देश को चलाने के लिए और जनप्रतिनिधि कहां से , किसे लाए । भविष्य में देश की जनता को इसी तरह से हर कानून, हर अधिकार और हर नियम के लिए सरकार से भागीदारी करनी होगी , और गलतियों को सुधारना होगा ।

शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

क्या ये हमले कोई ईशारा कर रहे हैं ..........आज का मुद्दा






आतंकवाद अब एक समस्या से बढ कर एक विचार का रूप ले चुका है . जानते हैं ,आज जब आर्थिक आतंकवाद , बौद्धिक आतंकवाद ,जहां तक इन जान माल पर हमले के आतंकवाद की बात है तो इसके पक्ष विपक्ष में हममें से बोलने की किसी की भी औकात नहीं है ये ठीक ठीक तो आतंकवादी ही बता सकते हैं कि वे ऐसा करते क्यों हैं , और यकीनन सब अलग अलग वजहें होंगी , मगर निशाना तो वही आम आदमी ही बनता है ,तब ये भी संदेह होता है कि कहीं ये आतंकवादी भी आर्थैक आतंकवादी से जुडे हुए तो नहीं हैं कहीं ? लेकिन फ़िर भी किसी भी सूरत में इसे कुचलना चाहिए क्योंकि कोई भी दलील , इंसानों की जीवन से बडी नहीं हो सकती ॥

इस धमाके के बाद देश के राजनेताओं के बयान , उनकी कार्यशिली, आतंकवाद से  निपटने का उनका नज़रिया और रुख , मुआवजे की घोषणा आदि में से ऐसा कुछ समय में आम जनता और सरकार के बीच बढती दूरी का हे ये परिणाम है कि आज कुछ राजनीतिज्ञ इन हमलों पर घोर असंवेदनशील वक्तव्य देने से भी नहीं चूके । रही आम जनता की बात तो उसका अंदाज़ा सिर्फ़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि अस्पतालों में नेताओं की उपस्थिति से हो रही परेशानी से होने वाले गुस्से का भाजन खुद राजनेताओं को भी भुगतना पडा और जनता ने यहां तक सवाल खडे कर दिए कि हर बार किसी बडी समस्या की तरफ़ देश का ध्यान जाता है कोई न कोई आतंकी हमला होता है वो भी सिर्फ़ आम आदमियों को मारने के लिए ।

इस वर्ष का अब तक का ये दसवां आतंकी हमला होने के बावजूद ये बहुत जरूरी हो जाता है कि कुछ जरूरी बातों की उपेक्षा न की जाए । ये ठीक है कि इतने बडे और नितनी बडी जनसंख्या वाले देश में हर आतंकी हमले को रोक पाना बेहद दुरूह कार्य है लेकिन इसकी क्या वजह हो सकती है कि अभी सत्रह माह पहले ही उसी परिसर में आतंकी हमला हुआ होने के बाद भी इतनी आसानी से पुन: उसी स्थान को निशाना बना लिया जाता है । तो क्या यही है सरकार और प्रशासन की वो इच्छाशक्ति जिसके बल पर वो वैश्विक आतंकवाद को खत्म करने की बात करती है । आखिर कहां है देश की लाखों की वर्दीधारी सेना , विशेषकर तब जबकि पता है कि बचाव दिल्ली मुंबई कोलकाता जैसे महानगरों को भी चाक चौबंद कर दें तो बहुत संभल सकती है ।

ओसामा बिन लादेन के खात्मे के बाद आतंकी दुनिया में क्या चल रहा होगा ये अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं है । अमेरिका , ब्रिटेन , फ़्रांस , जैसे तमाम देश अपनी सुरक्षा व्यवस्था को इतना तो पुख्ता कर चुके हैं कि अब उन्हें इतनी आसानी से निशाना नहीं बनाया जा सकता है । ऐसे में भारत जैसे अव्यवस्थित देश इसलिए भी आतंकियों का पहला विकल्प है क्योंकि पडोस में पाकिस्तान , श्रीलंका जैसे आतंक से ग्रस्त देश मौजूद हैं । यदि ऐसी परिस्थितियां एक आम आदमी भी समझ पा रहा है तो क्या कारण हो सकता अहि कि इसे सरकार व प्रशासन समझ न पाए हों । जो लोग  सरकारी नियम कानूनों के बीच से घपले घोटालों की गुंजाइश तलाश लेते हैं उन्हे इसका  जरूर एहसास होगा ।

पिछले कुछ धमाके , एक और गंभीर ईशारा कर रहे हैं । कहीं ये हमले किसी बहुत बडी साजिश का एक छोटा सा हिस्सा भर तो नहीं हैं । आज इंसान की कल्पना उसे रोज़ वैज्ञानिक ताकत से बढावा दे रही है ऐसे में क्या ये बिल्कुल असंभव है कि आतंकियों के हाथों कभी परमाणु अस्त्रों जैसे विश्व विनाशक हथियार नहीं लगेगा । भारत में साल की दूसरी छमाही पर्व -त्यौहार , उत्सव , समारोहों का समय होता है इसलिए शहरों में सघनता की संभावना कई गुना बडी होती है , तो फ़िर क्या ये माना जाए कि जैसा कि अमेरिका भी आशंका जता चुका है भारत को भी अगले हमलों के लिए तैयार रहना चाहिए ।

अब बात आम आदमी की भूमिका की । आज आम आदमी को ये अच्छी तरह पता चल चुका है कि इन हमलों का शिकार वही होता है तो फ़िर उसे खुद को बचाने के लिए तैयार होना होगा । हालिया बम हमले में किसी आम आदमी ने ही संदिग्ध वाहन पुलिस को पहुंचाया ( यहां एक बात कहना और जरूरी हो जाती है कि जिन वाहन चोरी की रिपोर्टों को पुलिस दर्ज़ नहीं करती अक्सर वही वाहन इन आतंका घटनाओं के लिए जिम्मेदार होते हैं , पुलिस की जांच का ये हाल है देश में कि एक स्कूटर , कार तो दूर बस तक बरामद नहीं पर पाती )। आम आदमी को खुद को शिकार बनने से रोकना होगा वो भी खुद को शिकार बनने से रोकना होगा वो भी खुद ही । कोई जरूरी नहीं है कि उत्सवओं , त्यौहारों में बाज़ारों में बेवजह की भीड बढाई जाए , घर से निकलते ही अपना सारा ध्यान सुरक्षित रूप से गंतव्य तक पहुंचने पर लगाएं और बेझिझक पुलिस को हर वो बात बताएं जो आपको खटक रही हो ।

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

आतंकी हमलों से कोई सबक नहीं लेता




अभी तो भारत पाक रिश्तों को फ़िर से बुने जाने की कवायद शुरू भी नहीं हुई थी कि पुणे में एक आतंकी हमला हो गया । देश के अलग अलग भागों में नियमित अनियमित रूप से होने वाले ये हमले अब तो एक नियति से होकर रह गए हैं । इस बार मुंबई की जगह पुणे हो गया । और इस बार भी पिछले सभी आतंकी हमलों की तरह एक स्थाई सी परिचर्या निभाई जा रही है । हमलों के समाचार , कुछ घटिया सी एक्सक्लुसिव खबरें , चीख पुकार के बीच राजनीतिक प्रपंचनुमा राहत और मुआवजा घोषणाएं , बीच बीच में एक आध बार आर पार की लडाई का सडांध मारता नारा भी , और फ़िर सब कुछ सिर्फ़ तब तक याद रखा जाएगा जब तक कि कोई दूसरी बडी खबर न हो देखने सुनने के लिए । जी हां , अब ये सब सिर्फ़ एक खबर ही तो बन कर रह गई हैं सबके लिए । हालांकि इस बार तो इसे इस बात से भी जोड कर देखा जा रहा है कि पुलिस प्रशासन , पिक्चर की सुरक्षा में इतनी तल्लीन हो गई कि सुरक्षा की तरफ़ से चूक गई । मगर इस तथ्य से कोई इत्तफ़ाक इसलिए नहीं रखा जा सकता कि यदि उस दिन पुलिस और प्रशासन ऐसे किसी काम में व्यस्त नहीं होती तो ये हमला रुक सकता था ।

असल में तो चाहे लाख उपाय किए जाएं , चाहे कितनी भी सुरक्षा नीतियां अपनाई जाती रहें , एजेंसियों की सर्तकता से इनमें थोडी कमी तो आ सकती है , मगर जिस तरह से इन दिनों आत्मघाती हमलों की प्रवृत्ति बढती जा रही है उसमें तो फ़िर किसी भी तरह से इन पर पूरी तरह काबू पा लेना बहुत ही कठिन काम है ।सबसे बडी बात तो ये है कि इन आतंकी घटनाओं से आज तक कभी भी कोई सबक नहीं सीखा गया है ,और शायद ऐसा इसलिए भी है क्योंकि इन हमलों में अक्सर आम लोग ही मरते रहे हैं । ये माना जा सकता है कि ऐसी आतंकी गतिविधियों को न तो रातोंरात रोका जा सकता है न ही पूरी तरह से इन्हें खत्म किया जा सकता है । मगर ये सोच कर खामोश बैठ जाना दूसरी सबसे बडी गलती होगी ॥इसलिए ये तो हो ही सकता है कि इन्हें बढावा सरंक्षण देने वालों से न सिर्फ़ पूरी सख्ती से निबटा जाए बल्कि उनसे किसी भी तरह की कोई शिकायत , कोई बात नहीं की जाए । इससे बेहतर तो ये होगा कि ऐसे सभी आतंकियों को उनके किए की इतनी कठोर सजा दी जाए कि इससे कम से कम उन लोगों में ये भय तो हो कि इतना सब करने के बाद भी उनका कुछ बिगडने वाला नहीं है । पिछले कुछ वर्षों से अफ़जल कसाब जैसे आतंकियों को यहां सहेज कर रखे जाने का औचित्य उस आम जनता के समझ में नहीं आता जो इन हमलों का शिकार होती रही है ।






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