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सोमवार, 13 अप्रैल 2020

कोरोना से सीखे जाने वाले सबक






बावजूद इसके कि सिर्फ पिछले कुछ दिनों में , ज्यादा ज्ञानी लोगों द्वारा पूरे देश के कई दिनों के धैर्य और अनुशासन पर बट्टा लगा कर उसे बहुत बदतर करने की कोशिश की गई ,इसके और ऐसे अनेक कोशिशों के बावजूद भी देश पश्चिमी देशों के हाहाकारी स्थिति से इतना बेहतर है कि उसकी तुलना नहीं की जा सकती और अगले दस दिनों के बाद जो दिन निकलेगा वो भारत का नया दिन ,नई उम्मीद का दिन होगा लेकिन इस सबके बीच जो घटा है वो बहुत बड़ा सबक बन कर न सिर्फ देश बल्कि विश्व भर के सामने होगा।

कोरोना संकट ने साबित किया कि ये देश जो हिन्दुस्तान है ये यूँ नहीं बरसों से गाता फिर रहा है कि ,कुछ तो बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी और न ही कभी ,कभी भी मिटेगी। 

इसे ये साबित किया कि बेशक दुनिया हमें विकासशील , गरीब देश समझे देखे लेकिन ऐसे समय पर जब पूरी दुनिया घुटने टेक कर खडी हो गयी है उस वक्त भी ये देश अपना मस्तक ऊँचा किये शांति से इन झंझावातों में दीपक लिए खड़ा हुआ है। 

इसने ये साबित किया कि इंसान की औकात प्रकृति के आगे एक पशु पक्षी से भी कम है इसलिए इंसानियत को बचाए रखना जरूरी है क्यूंकि सिर्फ और सिर्फ वही जरूरी है दुनिया के लिए। 

इसने ये भी साबित किया कि ,रे मूरख इंसान तेरे पैसे धन दौलत सोना चांदी ताबीज माला कोई भी कुछ भी ऐसा नहीं है जो तुझे मौत से बचा सकेगा बचाएगी तो सिर्फ इंसानियत और इंसान। 

इसने ये भी साबित किया ऐसे कठिन समय में कैसे इंसान इंसान के काम आया उसने किसी आसमानी फ़रिश्ते का किसी जादुई करिश्मे का इंतज़ार नहीं किया और एक दूसरे के भरोसे को कायम रखा और जिंदगी को भी। 

इसने ये साबित किया की इंसान कितनी ही दुनिया घूम ले ,कितना ही हवा में उड़ ले आखिरकार अपनी ज़मीन अपने घर को ही लौटना होता है और सबको वहीं लौटना होगा। 

इसने ये भी साबित किया महानगरों में दिन रात लोगों की जरूरत पूरा करने वाले गरीब मजदूर आज सत्तर साल बाद भी किसी सरकार समाज प्रशासन के लिए उपेक्षित और दोयम दर्ज़े का इंसान ही बना रहा जिसे जब चाहा दूध में मक्खी की तरह निकाल फेंका जाता रहा है.

इसने ये भी साबित किया कि हमारी पुलिस ,हमारा प्रशासन ,हमारे चिकित्सक ,सफाईकर्मी पूरी दुनिया के सबसे प्यारे सबसे जुझारू और सबसे बहादुर लोग हैं जो हमारे बीच के ही हैं जिनकी अहमियत हमें ऐसे समय में ऐसी विपदा में ही समझ आई है। 

इसने ये भी साबित किया कि हमें हमारे बच्चों को उनके भविष्य की चुनौतियों के लिए कैसे और किस हद तक तैयार करना है और ये काम आज और अभी से करना है। 

इसने ये भी साबित किया कि दो बार प्रचंड जनादेश से अपने नायक को चुनने वाली अवाम के निर्णय में किसी बैलेट बॉक्स का जादू नहीं था ये सबका एकमत था जो अपने अगुआ की एक आवाज़ पर खुद को तालों में कैद करके एक दूसरे का हाथ और साथ थामे रही। 

और इसने ये भी साबित किया कि इस देश की राजधानी समेत बहुत सारे शहरों नगरों में हमारे ही बीच में से कुछ लोग ,चाहे किसी भी कारणों से देश के विरूद्ध ,मानवता के विरूद्ध और पूर्वाग्रह के कारण ,किसी भी और कैसी भी बात में नकारत्मकता न सिर्फ तलाश सकते हैं बल्कि अपने साथ सबको निराशा के गर्त में डुबोने की कोशिश करते हैं। 

और आखिर में इसने ये साबित किया कि ये देश जो आज का भारत और कल का हिन्दुस्तान है ये अब विश्व गुरु बनने की राह पर अग्रसर है और पूरी ठसक और धमक के साथ दुनिया का सिरमौर बन कर उभरेगा। 
जय हिन्द ,जय हिन्दुस्तान ,जय हिन्दुस्तानी। 

रविवार, 2 अक्टूबर 2016

मुद्दा ये नहीं कि , सलमान ने क्या कहा ....






अब इस देश में सबसे  ज्यादा  बड़ी  और  सबसे ज्यादा दिखने और बिकने वाली बात या खबर , सिर्फ ये हो गई है कि अमुक व्यक्ति ने ये कहा , या ये कहना चाहिए कि मीडिया ने मुंह में माईक घुसेड घुसेड के जबरन कुछ न कुछ कहलवाया , और उससे भी अधिक , जो कहा गया या , न भी कहा गया  , उसे पूरी तरह मसालेदार बना कर , काट छांट कर , या अर्थ का अनर्थ करके आम जनता के पास इस तरह से पेश किया जाए कि आम जनमानस किसी नतीजे या निष्कर्ष पर पहुँचने के बजाय , इतने ज्यादा आशंकाओं और अनुमानों में उलझ कर रह जाए कि मुद्दा क्या था यही पार्श्व में चला जाता है |

 सबसे बड़ी विडंबना यही है कि , ये सारा खेल मीडिया हमारे सामने , कभी सबसे ज्यादा सच तो कभी सबसे ज्यादा तेज़ के नाम पर दिन रात परोसता रहता है | किन्तु यहाँ बात मीडिया नहीं बल्कि नेताओं और अभिनातेओं के सार्वजनिक बयानों , उनके मायने और उनके प्रभाव पर बात कर रहे हैं हम |




सलमान खान ने किसी और विषय पर आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में एक पत्रकार के किसी सवाल (ज्ञात हो कि , कोइ भी समाचार चैनल ये बातें नहीं दिखा बता रहा है ) के उत्तर में बोलते हुए कहा कि , आतंकवादी और कलाकार दोनों भिन्न लोग होते हैं , और कलाकार यहाँ वर्क परमिट , वीजा आदि के प्रावधानों के अनुरूप आते हैं जो खुद उन्हें सरकार मुहैया कराती है , इसलिए उनका विरोध नहीं किया जाना चाहिए | 


इस पोस्ट के लिखने तक इस मामले में आगे और वृद्धि ये हुई है कि पाकिस्तान सरकार ने न सिर्फ भारतीय चैनलों के प्रसारण पर पूरी तरह से पाबंदी लगाने की घोषणा कर दी बल्कि अपने तमाम सिनेमाघरों से भारतीय पिक्चरों के पोस्टरों तक को उतार फेंका गया गया  | कहने की जरूरत नहीं कि पूर्व में भी ऐसे तमाम समय पर , जो संवेदनशीलता , जो भावुकता , जो स्नेह भारतीय कलाकार उदार होकर व्यक्त करते हैं वो सिर्फ एक तरफ़ा है | इसका ताजातरीन उदाहरण है अभी हाल ही में बहुत सी भारतीय पिक्चरों में अभिनय करके खासा धन अर्जित कर अभी अभी पाक्सितान लौटे अभिनेता फवाद खान का जिन्होंने वापस जाते ही भारतीयों को छोटे दिल वाला करार दे दिया |



इस परिप्रेक्ष्य में दो बातें मुझे याद आ रही हैं जिनका उल्लेख करना यहाँ ठीक होगा , पहली ये कि , इन दिनों सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर एक कथ्य बहुत तेज़ी से पढ़ा देखा जा रहा है |

क्रिकेट को राजनीति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए और खेलों को इन दो देशीय रिश्तों के तनावों से दूर रखना चाहिए |
फिल्म और कलाकारों को भी ................

साहित्य व् साहित्यकारों को भी  ................



और इसमें और भी जो जो ,जिनका जिनका ध्यान आता हो आपको आप जोड लें ..

.तो फिर भाई लोगों सारी दुश्मनी का ठेका क्या हमारी फ़ौज और हमारी पुलिस ने ही लिया हुआ है या उनका दिमाग खराब है कि वे खामख्वा  में गोलियां बम का शिकार होकर अपनी जान गँवा रहे हैं , वो भी उन्हीं के हाथों जिनसे इन उपरोक्त वर्ग की गहरी सहानुभूति दिखाई देती है | 

और दूसरी  ये  कि , इसी बात पर एक मित्र ने बहुत सटीक टिपण्णी करते हुए कहा था कि , जब हम पाकिस्तान तो अलग थलग करने की बात करते हैं तो फिर वो अलगाव सिर्फ राजनीतिक या सामाजिक और भौगोलिक भर नहीं रह जाना चाहिए बल्कि , साहित्यिक ,सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से भी ऐसे देशों का पूर्ण बहिष्कार करना चाहिए |


यहाँ गौर करने लायक बात यह भी है कि ,कुछ पाकिस्तानी कलाकार भारत में काम करने के कारण वहां भी निशाने पर लिए जाते रहने के बावजूद भी कभी भारत पर होने वाले आतंकी हमलों में मरने वाले निर्दोष लोगों या पीड़ितों के प्रति सहानुभूति तो नहीं ही जताते हैं , मगर जो एक काम वे कर सकते हैं और उन्हें कभी न कभी करने के लिए बाध्य होना ही पडेगा , वो भी या अपनी खुद की जान के डर या ऐसी ही किन्ही वजहों के कारण नहीं कर पाते हैं , खुल कर इस बात की मुखालफत ....

पाकिस्तानी कलाकारों को खुद भी ये समझना होगा और अपनी सरकार सियासत को भी ये समझाना होगा कि जिस भारत के टुकड़े टुकड़े करने के मंसूबे वे पाल रहे हैं , वर्षों से आतंक और हिंसा के सहारे उसे अंजाम तक पंहुचाने में लगे हैं उस देश (भारत ) का विकास उस देश की शान्ति , कहीं न कहीं, देर सवेर एक पड़ोसी होने के नाते खुद उन्हें और पाकिस्तान को भी इसका लाभ ही पहुंचाता  , खैर जैसा कि पाकिस्तान के मशहूर लेखक तारिक फ़तेह ने कहा कि ..........अफ़सोस ..अफ़सोस ..पड़ोसी अब  गटर बन चुका है |



शनिवार, 19 नवंबर 2011

भारतीयों का अपमान








भारत के पूर्व राष्ट्रपति और विश्व विख्यात वैज्ञानिक डॉ.अब्दुल कलाम के साथ अमेरिकी सुरक्षा अधिकारियों ने यात्री जांच के नाम पर अपमानजनक व्यवहार किया । पिछले दिनों इस तरह की घटनाएं न सिर्फ़ भारतीय राजनेताओं ,बल्कि मंत्रियों ,खिलाडियों व अभिनेताओं के साथ गाहे बेगाहे होती रही है । हालांकि इस बार भारत के तीव्र विरोध और आपत्ति दर्ज़ कराने के अमेरिका ने माफ़ी मांग ली है । फ़िर भी कुछ बातों पर गौर किया जाना जरूरी है ।


भारत की छवि विश्व समुदाय में एक सहिष्णु और शांति पसंद राष्ट्र की है । पिछके कुछ समय में भारत अमेरिका के आप्सी रिश्ते भी सकारात्मक से ही रहे हैं । अमेरिका पर हुए आतंकी हमलेके बाद से ही अमेरिका ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था को उच्चतम स्तर पर रखा हुआ है । किंतु उसके बावजूद भी डॉ. कलाम जैसी शख्सियत के साथ ऐसा व्यवहार सर्वथा अनुचित व निंदनीय है ।


इससे अलग एक और बात ध्यान देने योग्य है कि चाहे  भारतीय राजनेता हों या भारतीय खिलाडी और तो और हिंदू देवी-देवताओं का भी अपमान पूरे विश्व समुदाय के अलग अलग देशों व लोगों द्वारा किया जाता रहा है । भारत की संस्कृति प्राचीनकाल से ही अतिथि देवो भव वाली रही है और शायद इसी अतिसहिष्णुता का खामियाजा देशवासियों को भुगतना पडता है ।

यदि विशिष्ट और सम्माननीय लोगों के साथ इस तरह का व्यवहार किया जा सकता है तो आम लोगों के साथ किस तरह का बर्ताव होता है और कैसा हो सकता है , इसकी कल्पना सहज़ ही की जा सकती है । अब समय आ गया है कि अमेरिका को ये एहसास कराया जाना बहुत जरूरी है कि वो भी वैश्विक समाज का एक हिस्सा भर है , उसके ऊपर राज करने वाला कोई निरंकुश तानाशाह नहीं है , फ़िर चाहे अमेरिका जैसे देशों को उनकी गलती का ठीक ठीक एहसास कराने के लिए उनके नागरिकों के साथ  भी एक आध बार ऐसा ही व्यवहार करना पडे ।



गुरुवार, 16 जून 2011

असुरक्षित पडोस : गंभीर खतरा ....आज का मुद्दा





ऐसा कहा जाता है कि यदि आपके पडोस में आग लगी हुई हो तो देर सवेर उसकी आंच आपके घर तक भी आने के संभावना प्रबल हो जाती है । फ़िर भारत की नियति तो ऐसी बन चुकी है कि उसके सभी पडोसी राष्ट्र या तो शत्रुवत हैं या इतने कमज़ोर कि वे हमेशा ही भारत के लिए चिंता का सबब बने रहते हैं । भारत के भौगोलिक नक्शे से अलग होकर बने देश पाकिस्तान बांग्लादेश की अपनी खुद की स्थिति बेहद खराब होते जाने के बावजूद भारत का अहित ही उनके मुख्य एजेंडे में रहता है हमेशा ।नेपाल , श्रीलंका , बर्मा , एवं तिब्बत भूटान जैसे अपनी अंदरूनी समस्याओं पर ही फ़िलहाल काबू नहीं पा सके हैं और उन्हें भारत जैसे विकासशील देश से भी मदद की दरकार हमेशा बनी रहती है ।


पाकिस्तान की राजनीतिक व आर्थिक स्थिति प्रारंभ से ही बहुत अधिक चिंतनीय रही है और पिछले कुछ वर्षों में तो ये स्थिति चिंतनीय से बदलकर दयनीय हो गई । पिछले कुछ दशकों में पाकिस्तान में लगातार उत्पन्न हुई राजनैतिक अस्थिरता की स्थिति , अलगाबवादियों व चरमपंथियों का बढता वर्चस्व तथा प्रतिदिन चढता करोडों रुपये का विदेशी कर्ज़ का ब्याज़ ही प्रति मिनट हज़ारों डॉलर की रफ़्तार से बढ रहा है , जिसे किसी भी परिस्थिति में किसी सहायता से उतारा नहीं जा सकेगा । 


भारतीय परिप्रेक्ष्य में पाकिस्तान की अस्थिरता से पडने वाले प्रभावों को देखें तो सबसे पहली और अहम समस्या है आतंकी हमलो की आशंका । अब ये बात अनेकों बार प्रमाणित हो चुकी है कि पाकिस्तान की खुफ़िया एजेंसियां , सुरक्षा एजेंसियों के साथ साथ उसके करी शीर्ष अधिकारी व राजनीतिज्ञ , भारत , अमेरिका , और ब्रिटेन जैसे देशों के विरुद्द्ध संलिप्त आतंकियों को समर्थन देते रहे हैं । विश्व के सबसे दुर्दांत हत्यारे आतंकी ओसामा बिन लादेन का पाकिस्तान में छुपा होना एक बार फ़िर इसे साबित कर गया । इन हालातों में जब भारत के साथ कश्मीर मसले पर पहले ही दोनों देश आमने सामने होते आए हैं तो जब उद्देश्य ही विश्व शांति को खतरा पहुंचाना हो तो भारत ही सबसे पहला और आसान निशाना बचता है । मुंबई पर हुए दु:साहसी हमले ने इसक ईशारा भी कर दिया है । ओसामा की पाकिस्तान में मौजूदगी और फ़िर मौत के बाद से पाकिस्तान को हमेशा भारी-भरकम आर्थिक सहायता व सामरिक सहयोग देने वाले अमेरिका के नज़रिए में खासा बदलाव आया है । आज पाकिस्तान में भूख-बेरोजगारी, महंगाई के साथ कट्टरपंथ भी अपने चरम पर है और पूरे देश में एक हताशा फ़ैली हुई है । इसलेइ भारत को अपनी एक आंख हमेशा अपने इस दोस्त दुश्मन पर रखने की जरूरत है । 


यूरोपीय देश एवं अमेरिकी देशों के समूह के लिए एशिया में और शायद पूरे विश्व में यदि कोई एक अकेला देश सबसे बडा खतरा है तो वो है चीन । मौजूदा समय में चीन ही ऐसा अकेला देश है जो वैश्वीकरन के इस युग में भी सिर्फ़ अपने हितों और स्वार्थ से ही संबंधित आचरण करता है । यहां तक कि अतर्राष्ट्रीय मंचों पर और बडी छोटी घटनाओं पर भी उसका आधिकारिक/अनाधिकारिक बयान तक नहीं आता । सिंगापुर और तिब्बत देशों की समस्या ,विलय , विखंडन आदि के समय उसका दृष्टिकोण और रवैया पूरा विश्व देख ही चुका है । वर्तमान वैश्विक परिदृश्य  में चीन का नज़रिया इसी तथ्य से पता चल जाता है कि ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद चीन की तरफ़ से इस तरह का बयान आया था कि यदि अब भविष्य में अमेरिका इस तरह का कोई आक्रम्ण पाकिस्तान के ऊपर करता है तो चीन पाकिस्तान के साथ खडा होगा । शायद ही अब तक ये बात गंभीरतापूर्वक सोची गई है कि विश्व का लगभग हर विकसित और विकासशील देश आज आतंक के निशाने पर है , और उसकी पीडा झेल रहा है लेकिन चीन इन सबसे खुद को अलग रखे हुए है । क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक है कि किसी आतंकी संगठन के निशाने पर चीन नहीं है । यहां ये बताना भी उचित होगा कि अभी हाल ही में चीनी हैकरों ने अमेरिका खुफ़िया सेवा और सुरक्षा सेवा के अंतर्जालीय खातों में सेंधमारी की है । क्या इससे मिली जानकारियों का फ़ायद वे उठाएंगे या पैसे के बदले वे कहीं आगे सरका देंगे । निश्चय ही ये चिंता कहीं न कहीं विश्व शांति की सुरक्षा के आकांक्षी लोगों को भी होगी । 


भारत-चीन संबंध शुरू से ही अविश्वास और संदेह से ग्रस्त रहे हैं । ये संबंध और अधिक खराब स्थिति में तब पहुंचे जब "हिंदी चीनी भाई-भाई " कहते कहते चीन ने भारत पर आक्रम्ण करके भारत की बहुत बडी जमीन हथिया ली जो आज तक चीन के कब्जे में ही है । अब भी अक्सर कभी नियंत्रण रेखा को पार करके , कभी भारतीय प्रदेश , भूभाग को अपने नक्शे में दिखाकर तो कभी किसी भारतीय को नत्थी वीज़ा देन जैसे कार्यों से चीन भारत में अस्थिरता फ़ैलाने का प्रयास करता ही रहता है । अमेरिका सहित विश्व समुदाय को भी चीन के नक्काली कारोबार और अंतर्जाल हैकरों ने खासा परेशान किया हुआ है । 


भारत इन दिनों राजनीतिक संवेदनशीलता और सामाजिक परिवर्तन के नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है । आम जनता और सत्ता के बीच न सिर्फ़ विचारों का बल्कि भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए आमने सामने का संघर्ष शुरू हो चुका है । व्यवस्था के खिलाफ़ जनमानस का बढता असंतोष और सुधार के बजाय दमन का रुख अख्तियार करने वाली सरकार का रवैया देखकर ये अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है कि आने वाले समय में कठिन परिस्थितियां उत्पन्न होंगी । भारत का अहित सोचने वाली तमाम शक्तियों , देशों , संगठनों के लिए ये अवसर बहुत ही मह्त्वपूर्ण होगा । वे निश्चित रूप से देश में चल र्हे इस उठापटक का फ़ायदा उठा कर अपने मंसूबे पूरा करने का प्रयास करेंगे । ऐसे में न सिर्फ़ सरकार , प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों बल्कि सिविल सोसायटी व ऐसे तमाम जनसमूहों को भी सजग व सचेत रहना होगा । देश की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार तमाम सुरक्षा संस्ताओं को अपने टॉप एलर्ट मोड (Top Alert Mode )में रहने के लिए खुद को तैयार रखना चाहिए । 

मंगलवार, 24 मई 2011

महामारी का नया रूप : मधुमेह.....आज का मुद्दा




चित्र , गूगल से साभार 


पिछले कुछ समय में विश्व स्वास्थय संगठन ने भारत जैसे बहुत से देशों को ये चेतावनी दी है कि आने वाले समय में मधुमेह का प्रकोप इतना बढने वाला है कि वो एक महामारी जैसा रूप ले लेगा । एक अनुमान के मुताबिक अगले ही कुछ सालों में सिर्फ़ भारत में ही साढे चार करोड लोग डायबिटीज यानि मधुमेह की चपेट में आ चुके होंगे । खुद भारत के स्वास्थय मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार , वर्ष २०१५ तक देश में मधुमेह के मरीजों की संख्या लगभग ४.५८ करोड तक हो जाएगी , जिसमें आश्वर्यजन रूप से १.३२ करोड लोग तो सिर्फ़ ग्रामीण भारत से होंगे । रिपोर्ट के अनुसार देश में होने वाले कुल स्ट्रोक के मामलो में से तीस प्रतिशत के लिए भी मधुमेह ही जिम्मेदार है ।


नेशनल हेल्थ प्रोफ़ाइल-२०१० नाम से तैयार स्वास्थय मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि २०१० मेम कुल ३.७६ करोड लोग डायबिटीज से ग्रसित थे । एक अनुमान के मुताबिक यदि ये बीमारी इसी दर से बढती रही तो बहुत जल्दी ही पांच करोड तक का आंकडा भी छू लेगी । स्वास्थय मंत्रालय के अनुसार अगले चार वर्षों में गांव और शहरों में रहने वाले करीब पच्चीस लाख युवा मधुमेह की चपेट में होंगे । और इसमें भी सबसे ज्यादा संवेदनशील स्थिति बीस से लेकर तीस की उम्र के युवाओं की होगी । जबकि सबसे ज्यादा इसकी चपेट में , लगभग १.२८ करोड लोग जो इसकी चपेट में आएंगे वे पचास से लेकर साठ की उम्र के होंगे । ये स्थिति किसी भी देश के चिकित्सकीय भविष्य के लिए एक गंभीर चुनौती है । 

इसके कारणों पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि इसका सबसे बडा कारण है इंसान की दिनचर्या और खान पान की आदत में आमूल चूल बदलाव । कभी जो समाज अपने दैनिक आहार में , दाल चावल , चपाती, हरी साग सब्जी का सेवन करता था अब फ़ास्ट फ़ूड , शीतल पेय पदार्थों को एक नियमित भोज्य विकल्प के रूप में अपना चुका है । खाद्य पदार्थों में मिलावट तथा रासायनिक खाद के उपयोग ने उसकी गुणवत्ता और पौष्टिकता में बहुत कमी ला दी है । जो भोज्य पदार्थ उपलब्ध भी हैं वे भी दिनों दिन महंगाई के कारण आम आदमी की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं , यही वजह है कि पांच रुपए में बर्गर जैसा फ़टाफ़ट और तैयार भोजन ही लोगों की आदत में शुमार होता जा रहा है । ग्रामीण क्षेत्र भी अब इससे अछूते नहीं रहे हैं । 

इस बीमारी से जूझने में एक अन्य बडी समस्या है इसके इलाज का बेहद मंहगा व खर्चीला होना । चिकित्सा विशेषज्ञ ये मानते हैं कि चूंकि इसका इलाज नियमित और बरसों तक चलता है इसलिए भी आम आदमी लगातार दवाई , इंजेक्शन का खर्च उठाते उठाते बहुत बडे आर्थिक बोझ को ढोने पर मजबूर हो जाता है । स्वास्थय मंत्रालय बहुत जल्दी ही इसे एक मिशन की तरह लेने की तैयारी में है ताकि आने वाले समय में स्थिति को भयावह बनने से रोका जा सके । लोगों को भी अब खानपान की बदलती हुई प्रवृत्ति पर रोक लगानी चाहिए और जंक फ़ूड की गिरफ़्त में आने से अपने बच्चों को यथासंभव बचाने की कोशिश करनी चाहिए । 

 
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