मंगलवार, 24 मई 2011

महामारी का नया रूप : मधुमेह.....आज का मुद्दा




चित्र , गूगल से साभार 


पिछले कुछ समय में विश्व स्वास्थय संगठन ने भारत जैसे बहुत से देशों को ये चेतावनी दी है कि आने वाले समय में मधुमेह का प्रकोप इतना बढने वाला है कि वो एक महामारी जैसा रूप ले लेगा । एक अनुमान के मुताबिक अगले ही कुछ सालों में सिर्फ़ भारत में ही साढे चार करोड लोग डायबिटीज यानि मधुमेह की चपेट में आ चुके होंगे । खुद भारत के स्वास्थय मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार , वर्ष २०१५ तक देश में मधुमेह के मरीजों की संख्या लगभग ४.५८ करोड तक हो जाएगी , जिसमें आश्वर्यजन रूप से १.३२ करोड लोग तो सिर्फ़ ग्रामीण भारत से होंगे । रिपोर्ट के अनुसार देश में होने वाले कुल स्ट्रोक के मामलो में से तीस प्रतिशत के लिए भी मधुमेह ही जिम्मेदार है ।


नेशनल हेल्थ प्रोफ़ाइल-२०१० नाम से तैयार स्वास्थय मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि २०१० मेम कुल ३.७६ करोड लोग डायबिटीज से ग्रसित थे । एक अनुमान के मुताबिक यदि ये बीमारी इसी दर से बढती रही तो बहुत जल्दी ही पांच करोड तक का आंकडा भी छू लेगी । स्वास्थय मंत्रालय के अनुसार अगले चार वर्षों में गांव और शहरों में रहने वाले करीब पच्चीस लाख युवा मधुमेह की चपेट में होंगे । और इसमें भी सबसे ज्यादा संवेदनशील स्थिति बीस से लेकर तीस की उम्र के युवाओं की होगी । जबकि सबसे ज्यादा इसकी चपेट में , लगभग १.२८ करोड लोग जो इसकी चपेट में आएंगे वे पचास से लेकर साठ की उम्र के होंगे । ये स्थिति किसी भी देश के चिकित्सकीय भविष्य के लिए एक गंभीर चुनौती है । 

इसके कारणों पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि इसका सबसे बडा कारण है इंसान की दिनचर्या और खान पान की आदत में आमूल चूल बदलाव । कभी जो समाज अपने दैनिक आहार में , दाल चावल , चपाती, हरी साग सब्जी का सेवन करता था अब फ़ास्ट फ़ूड , शीतल पेय पदार्थों को एक नियमित भोज्य विकल्प के रूप में अपना चुका है । खाद्य पदार्थों में मिलावट तथा रासायनिक खाद के उपयोग ने उसकी गुणवत्ता और पौष्टिकता में बहुत कमी ला दी है । जो भोज्य पदार्थ उपलब्ध भी हैं वे भी दिनों दिन महंगाई के कारण आम आदमी की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं , यही वजह है कि पांच रुपए में बर्गर जैसा फ़टाफ़ट और तैयार भोजन ही लोगों की आदत में शुमार होता जा रहा है । ग्रामीण क्षेत्र भी अब इससे अछूते नहीं रहे हैं । 

इस बीमारी से जूझने में एक अन्य बडी समस्या है इसके इलाज का बेहद मंहगा व खर्चीला होना । चिकित्सा विशेषज्ञ ये मानते हैं कि चूंकि इसका इलाज नियमित और बरसों तक चलता है इसलिए भी आम आदमी लगातार दवाई , इंजेक्शन का खर्च उठाते उठाते बहुत बडे आर्थिक बोझ को ढोने पर मजबूर हो जाता है । स्वास्थय मंत्रालय बहुत जल्दी ही इसे एक मिशन की तरह लेने की तैयारी में है ताकि आने वाले समय में स्थिति को भयावह बनने से रोका जा सके । लोगों को भी अब खानपान की बदलती हुई प्रवृत्ति पर रोक लगानी चाहिए और जंक फ़ूड की गिरफ़्त में आने से अपने बच्चों को यथासंभव बचाने की कोशिश करनी चाहिए । 

 

रविवार, 22 मई 2011

बिहार में लागू किया गया राईट टू सर्विस बिल









बिहार में इन दिनों नीतिश सरकार अदभुत प्रयोगों के दौर से गुजर रही है । राज्य सरकार नित नए नए ऐसे निर्णय ले रही है और जनता के लिए नए कानूनों को लाने की पहल कर रही है जिसके आगामी परिणाम निश्चय ही दूरगामी और सकारात्मक होंगे । अब ऐसी ही एक नई शुरूआत करते हुए राज्य में हाल ही में राईट टू सर्विस बिल को पास कराने के बाद राज्यपाल की हरी झंडी मिल जाने के बाद अब सरकार इस कानून को लागू करने की अधिसूचना जारी करने वाली है । इस कानून के लागू होने के बाद आम जनता के बहुत से मुख्य कार्य अधिकारियों , कर्मचारियों को एक निश्चित समय सीमा के अंदर करके देना होगा । ऐसा नहीं हो पाने पर विलंब के लिए स्पष्टीकरण और नहीं दिए जाने पर कडे दंड का प्रावधान किया गया है ।


इस कानून में जाति-आवास आय प्रमाण पत्र से लेकर राशान कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, बिजली कनेक्शन तक की समय सीमा तय कर दी है । इसका उल्लंगन करने वाले अफ़सर से प्रतिदिन २५० रुपए की दर से पांच हज़ार रुपए तक जुर्माना वसूलने व विभागीय कार्वाई तक के प्रावधान किए गए हैं । ऐसी उम्मीद की जा रही है कि ,इस कानून के लागू होने के बाद सरकारी कर्मचारियों के लिए कोई भी फ़ाइल दबा पाना बहुत मुश्किल होगी । ज्ञात हो कि अभी हाल ही में किए गए एक सर्वेक्षण में ये बात सामने आई थी कि भारत में सबसे ज्यादा रिश्वत ग्रामीण जनता द्वारा ही दी जाती है और वो भी अपने मूल बुनियादी कागजातों आदि को बनवाने के लिए ही दी जाती है । ऐसे में यदि आम आदमी को सरकार के इस कानून से अपने कागज़ात एक तय समय सीमा के भीतर पाने की सुनिश्चितता तय होगी तो ये नि:संदेह एक परिवर्तनकारी नियम साबित होगा ।

सरकार ने फ़िलहाल जो रूपरेखा तैयार की है वो कुछ इस तरह की है

प्रमाण पत्र रिपोर्ट 

कार्य अफ़सर निपटारा (दिन )

जाति प्रमाण पत्र बीडीओ १५
आवास प्रमाण पत्र बीडीओ १५
आय प्रमाण पत्र बीडीओ १५
नया राशन कार्ड एसडीओ ६०
पोस्टमार्टम रिपोर्ट प्रभारी डॉक्टर ०३
वृद्धावस्था पेंशन बीडीओ २१

लाइसेंस 

जविप्र दुकान एसडीओ ३०
खाद दुकान जिला कृषि पदा. ३०
बीज दुकान अनु.कृषि पदा. ३०
दाल-आटा मिल मुख्य कारखाना अधी. ३०
ईंट-भट्ठा         जिला खनन पदा. ३०
आरा मशीन प्रमंडलीय वन पदाधिकारी ३०

बिजली 
एलटी कनेक्शन कार्यपालक अभियन्ता ३०
गलत बिलिंग सहायक अभियन्ता २४ घंटा
फ़्यूज मरम्मत (शहरी) सहायक अभियन्ता ४ घंटा
फ़्यूज मरम्मत (ग्रामीण) सहायक अभियन्ता २४ घंटा
ब्रेक डाउन (शहरी) सहायक अभियन्ता ६ घंटा

परिवहन 
ड्राइविंग लाइसेंस डीटीओ ३०
स्मार्टकार्ड में लाइसेंस बदलाव डीटीओ         ०७


और ये तो सिर्फ़ चंद उदाहरण हैं , यदि सच में ही राज्य सरकार अपने विभागों और कर्मचारियों को कम से कम इस कानून के सम्मान की खातिर ही पुराने रवैये से बाहर निकलने और एक नई छवि बनाने में निश्चित रूप से सफ़लता मिल सकेगी । देखना ये है कि ये कानून आम जनता के लिए और सरकार के लिए कैसे बदलाव ले कर आ पाता है । किंतु इससे इतर ये बात उठ रही है कि राइट टू सर्विस बिल को पूरे देश भर में लागू किया जाना चाहिए और न सिर्फ़ इन सेवाओं में बल्कि , हर सार्वजनिक क्षेत्र में , जैसे सडक मरम्मत , मुकदमे को निपटाने में लगने वाला समय, निश्चित अवधि में पढाई और परीक्षा की सुनिश्चितता आदि जैसे सभी क्षेत्रों में इसे लागू कर देना चाहिए ।

गुरुवार, 5 मई 2011

असुरक्षित महिला सैन्यकर्मी .....आज का मुद्दा








अभी हाल ही में एक समाचार देखने पढने सुनने को मिला । कोल्हापुर महाराष्ट्र में स्थित पुलिस प्रशिक्षण अकादमी में ११ प्रशिक्षु महिला पुलिस कर्मी अपने प्रशिक्षण के दौरान ही गर्भवती पाई गईं , ये खबर कोई बडी चौंकाने वाली नहीं थी लेकिन ये जानकर कि प्रशिक्षण के दौरान उनका दैहिक शोषण हुआ और जिसके परिणामस्वरूप ही ये घटना सामने आई थी , सबको एक आघात सा लगा । हालांकि सुरक्षा सेवाओं में महिलाओं के साथ दैहिक और मानसिक शोषण का ये कोई पहला मामला नहीं था और गाहे बेगाहे इस तरह की खबरें अब देखने सुनने को मिल ही जाती हैं । आम समाज में , रोजमर्रा जीवन में , सार्वजनिक सेवाओं से लेकर , निजी सेवाओं तक में , मीडिया ,खेल , अभिनय ,राजनीति आदि हर क्षेत्र में ही नारी शक्ति के साथ जिस तरह का न सिर्फ़ भेदभाव किया जाता रहा है और अब तो वो न सिर्फ़ पक्षपात तक सीमित रहा है बल्कि उन पर दैहिक अत्याचार और उनका शोषण तक करना एक प्रवृत्ति सी बनती जा रही है । अफ़सोस और चिंता की बात ये है कि अब ये भयानक स्तर तक बढती जा रही है । इससे अधिक चिंताजनक बात ये है कि जिन महिलाओं को समाज के हर तबके में महिलाओं के प्रति हो रहे अपराधों और उनके दमन शोषण से लडने के लिए तैयार किया जा रहा है , उन्हें न सिर्फ़ प्रशिक्षण बल्कि अधिकार भी दिए जा रहे हैं वे भी कहीं न कहीं इन ज्यादतियों का शिकार हो रहे हैं । भारतीय सेना से लेकर , पुलिस सेवाओं और अन्य सुरक्षा सेवाओं में भी कार्यरत महिला कर्मियों से लगातार न सिर्फ़ दोयम दर्ज़े का व्यवहार किया जा रहा है बल्कि उनके साथ अन्याय और अत्याचार की सीमा तक जाने में भी कोई गुरेज नहीं होती है किसी को । इस बात को मात्र दो घटनाओं से ही आराम से समझा जा सकता है ।


संसद के पटल पर पिछले कई वर्षों से बार बार महिला आरक्षण विधेयक को रखे जाने के बावजूद उसे पारित कराया जाना तो दूर उस पर ढंग से बहस या विमर्श तक नहीं हो पाया है । देश की राजधानी दिल्ली की पुलिस प्रमुख की कमान संभालने के लिए सबसे उपयुक्त और देश का नाम पूरे विश्व में चमकाने वाली देश की प्रथम महिला आईपीएस किरन बेदी को जबरन ही सेवामुक्त करवा दिया गया । जब भी इन दोनों बातों की ओर कोई इंगित करता है तो सहसा ही इसके साथ ही इस बात का भी ज़िक्र होता है कि पिछले कुछ वर्षों से ही देश की प्रथम नागरिक के रूप में , देश की सत्तासीन पार्टी की सबसे अधिक प्रभावी पद पर बैठी हुईं , और देश की राजधानी दिल्ली की मुख्यमंत्री के पद पर किसी महिला के होने के  अलावा देश भर में मायावती , ममता बनर्जी , जयललिता , सुषमा स्वराज , और जाने कितनी ही कद्दावर और प्रभावशाली नारी शक्ति के होने के बावजूद ये स्थिति है । राज्य महिला आयोग , राष्ट्रीय महिला आयोग जैसी संस्थाओं को पर्याप्त अधिकार और संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं । यदि इसके बावजूद भी कोल्हापुर प्रकरण के दोषियों को कडी से कडी सज़ा नहीं दिलवाई जा पाती है , प्रियदर्शनी मट्टू , जेसिका लाल , आरूषि और जाने कितनी ही जानें आज भी न्याय के लिए मुंह ताकती सी दिखती हैं तो फ़िर आखिर कब तक और कहां तक ये स्थिति बनी रहेगी ।


ऐसा नहीं है कि ये स्थिति भारत की ही है , विश्व के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका की महिला सैन्य टुकडी और अन्य सुरक्षा सेवाओं में भी महिला कर्मियों के दैहिक शोषण की बात सामने आई है । यहां तक कि ईराक युद्ध के लिए भेजी गई टुकडी में तो कई उच्च पदो पर बैठी और सैन्य संचालन करती हुई महिला सेनानियों ने खुलेआम आरोप लगाए कि न सिर्फ़ उनका शोषण किया गया उन्हें प्रताडित किया गया बल्कि उनका बलात्कार तक किया गया है । भारत में नक्सलवाद से जुडी हुई महिलाओं ने भी इस बात को माना कि उनके साथ भी ज्यादती होती रही है ।  कुल मिला कर परिदृश्य ये साबित करता है कि महिलाओं की स्थिति अब भी बहुत ज्यादा बेहतर नहीं हो पाई है । इसके कारण बेशक बहुत से अलग अलग हों लेकिन फ़िर भी नियति तो वही की वही है । आखिर क्या वजह है कि जिन कंधों पर अपनी कौम अपनी नारी जाति को बचाने की जिम्मेदारी डाली जाती है उनसे अपेक्षा की जाती है वो खुद अपनी रक्षा के लिए इंसान से हैवान बन चुके उन हवसी पुरूषों को मौत के घाट नहीं उतार पातीं । काश कि खबर ये पढने देखने को मिलती कि अपने मान सम्मान की रक्षा करते हुए महिला सैन्यकर्मियों , और पुलिसकर्मियों ने उन्हें गोली से उडा दिया जो उसे तार तार करने की कोशिश कर रहे थे । महिला आयोग जैसी संस्थाएं तो सिर्फ़ सफ़ेद हाथी बन कर रह गए हैं । महिलाओं के लिए बने और बनाए जा रहे कानून भी नाकाफ़ी साबित हो रहे हैं ।


अगर सच में ही महिलाओं को अपना वजूद बनाए बचाए रखना है तो कम से कम उस समय उन्हें उग्र और बागी तेवर में आना ही होगा जब बात उनकी आन और जान पर बन आने की हो । झारखंड में एक विधायक को सरेआम कत्ल करके उस महिला ने अपनी बेटी को उस विधायक के हाथों हवस का शिकार होने से बचा के दिखा ही दिया कि वक्त आने पर नारी कुछ भी कर गुजरने से परहेज़ नहीं करती , लेकिन एक बार फ़िर अफ़सोस होता है जब देखा जाता है कि ऐसा साहस करने वालों को भी देश , समाज और खुद नारी समाज भी चुप्पी लगाए बैठ जाता है ।

बुधवार, 4 मई 2011

आयटम सॉंग बनाम संगीतमय अश्लीलता .....आज का मुद्दा









हिंदी फ़िल्मों में एक गाना हमेशा से आकर्षण के लिए विशेष तौर पर डालने का चलन काफ़ी पहले से ही रहा है । कैबरे डांस के रूप में एक समय हेलन , बिंदु आदि अभिनेत्रियों ने तो गजब की नृत्य शैली से एक अलग ही मुकाम हासिल किया था सत्तर के दशक की सिनेमाई दौर में । कव्वाली , कैबरे , गज़ल प्रतियोगिताओं के बहाने से गीतों को फ़िल्मों की कहानी के इर्द गिर्द इस तरह से बुना जाता था कि वो कहीं न कहीं कोई न कोई बहाना बन ही जाता था सिनेमा का भाग बनने के लिए । समय बदला और बॉलीवुड सिनेमा भी अपना रूप अपना तेवर बदलने लगा । कला सिनेमा तो जैसे कहीं खो कर रह गया लेकिन चूंकि समाज भी बदल रहा था इसलिए दलील ये दी जाने लगी कि ये कहानियां , ये विषय , और सब कुछ जो सिनेमा जगत में देखा दिखाया जा रहा है वो इसी समाज से आयातित है । उधर समाज भी सिनेमा पर ये आरोप लगाता रहा है कि उसमें दिनों दिन हावी हो रही अपसंस्कृति ने समाज को भी भ्रष्ट नष्ट करने में उत्प्रेरक का काम किया है और अब भी कर रहा है । इन सबके साथ ही एक चलन जिसने सबसे ज्यादा तेजी से पैठ बनाई हिंदी फ़िल्मों में वो था आयटम सॉंग के अश्लील होते बोल और उसका साथ निभाते भौंडे नृत्य । इन नृत्यों में जानबूझ कर इस तरह की भावभंगिमा और ईशारे किए कराए जाते हैं कि वो अश्लील बोलों के साथ एकदम फ़िट बैठें । 

कभी मैं आई यूं हूं यू पी बिहार लूटने से शुरू हुई कहानी , पहले जिगर से बीडी जलाते हुए , शीला की जवानी की दहलीज़ पार करते हुए , मुन्नी की बदनामी को गले लगाते हुए अब तो टिंकू जिया और जाने कितने ही द्विअर्थी गीतों के बहाने से इतनी आगे बढती जा रही है कि अब तो वो फ़िल्मों की कहानी , उसके नायक नायिकाओं तक पर भारी पड रही है । आश्चर्य की बात ये है कि न तो इन गानों का कोई अर्थ होता है नी ही अक्सर इनमें कोई माधुर्य होता है , नृत्य भी इतना भौंडा होता है और नायिका के कपडे ऐसे कि सिवाय शर्म के और कोई भावना नहीं निकलती । समाज में आज जिस तरह से नकारात्मकता हावी हो रही है उसमें यदि ऐसे गाने रातों रात लोगों के न सिर्फ़ जुबान पे चढ जाते हैं बल्कि दिलो दिमाग पर भी हावी हो जाते हैं तो उसमें अंचभा नहीं होना चाहिए । हां जब अपनी तुतलाती जबान में किसी नन्हें बच्चे के मुंह से शीला की जवानी और मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए जैसे गीतों के बोल सुनने को मिलते हैं तो ये सोच और भी गहरी हो जाती है कि क्या वाकई कल के समाज को सांस्कृतिक प्रदूषण से बचाया जा सकता है । 


इन गीतों का प्रचलन और लोकप्रियता का आकर्षण दिनोंदिन इस कदर बढता जा रहा है कि अब तो न सिर्फ़ छोटी तारिकाएं , नायिकाएं बल्कि मुख्य भूमिका निभाने वाली अभिनेत्रियां भी ऐसे गीतों पर मचलने के लिए बेताब हैं । गीतकार भी ढूंढ् ढूंढ कर ऐसे गीतों की रचना कर रहे हैं जिसे किसी भी दृष्टिकोण से गीत संगीत के किसी भी पैमाने पर नहीं रखा देखा जा सकता । सबसे अधिक दुखद बात तो ये है कि जहां एक तरफ़ खुद युवतियां और तारिकाएं ऐसे गीतों पर थिरक कर पूरे महिला समाज के लिए जाने अनजाने बहुत सारी मुश्किलें खडी कर रही हैं वहीं इन गीतों पर सेंसर बोर्ड के साथ साथ महिला अधिकारों के प्रति सचेत और सजग रहने करने वाली संस्थाएं भी चुप्पी लगाए बैठी हैं । इस विमर्श पर जब भी कोई बहस उठती है तो फ़िर यही दलील दी जाती है कि आज विश्व में मनोरंजन के रूप में सबसे ज्यादा पोर्न सामग्री ही चलन में है लेकिन ये दलील देने वाले ये बात भूल जाते हैं कि न तो ये आंकडे भारतीय परिप्रेक्ष्य में सही माने जा सकते हैं और न ही इस सच का भारतीय सिने जगत से कोई संबंध है । 


अब स्थिति दिनोंदिन विस्फ़ोटक होती जा रही है और यदि अब भी इन गीतों , इस भौंडी प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगाई गई तो फ़िर कोई बडी बात नहीं कि जिस तरह से हाल ही में एक मॉडल द्वारा भारतीय क्रिकेट टीम की जीत के अवसर पर अपनी नुमाईश करने की घोषणा की गई थी तो उससे आगे बढते हुए फ़िल्मों में भी कोई ऐसी ही खुशी प्रकट करने लगे । फ़िल्मकारों ,गीतकारों और खुद नायिकाओं को इस सस्ती लोकप्रियता के मोह से बचना चाहिए और लकवाग्रस्त हो चुकी नियंत्रणकारी संस्थाओं को भी कम से कम कुश प्रतिशत जिम्मेदारी तो निभानी ही चाहिए । ऐसा हो पाएगा इस बात की आशा तो नहीं है इसलिए आम लोगों को खुद ही ये दबाव बनाना चाहिए और इन गानों का विरोध करना चाहिए ताकि कल को किसी की  उन्हीं गानों के सहारे समाज की बेटियों की छीछालेदारी करने की हिम्मत न हो सके  ॥


गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

भ्रष्टाचार पर मारिए मुक्का .........आज का मुद्दा






आज भ्रष्टाचार अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच चुका है इसलिए जैसा कि कहा गया है कि जब पाप का घडा जब भर जाता है तो उसका चटकना तय हो जाता है । आज हर तरफ़ एक ही मुद्दा बहस का मुद्दा है , सबके सामने एक ही लडाई है । भ्रष्टाचारियों के सामने अपना दामन बचाने की चुनौती है तो दूसरे पाले में खडे लोगों के सामने भ्रष्टाचार की बखिया उधेडने की धुन । आज चाहे इसके लिए तात्कालिक रूप से अन्ना हज़ारे के जनांदोलन ने एक उत्प्रेरक का काम किया है और अब सभी बनने वाले जन लोकपाल विधेयक को भ्रष्टाचार के विरुद्ध इस्तेमाल किए जाने वाले डंडे की तरह देख रहे हैं लेकिन इसके बावजूद भी अगर ये न होता तो कोई और कारण सामने आ जाता । बेशक इसमें कोई शक नहीं कि भारत में भ्रष्टाचार ने उस वटवृक्ष का रूप ले लिया है जिसकी न जड का पता चलता है न ही शाखाओं का , और सब के सब ..हां सब के सब कमोबेश इसमें शामिल हैं या जबरन करवाए जा रहे हैं । लेकिन कुछ लोग अब भी चट्टान की तरह खडे हो जाते हैं इस पूरी व्यवस्था के खिलाफ़ , भ्रष्टाचार के जंगल में मशाल जलाए उसे फ़ूंक डालने के लिए । आम आदमी भी अन्ना के जनादोलन के बाद ये सोचने पर मजबूर हो गया है कि अब वो इस लडाई में कब तक निष्क्रिय की भूमिका में रहेगा । आम लोगों के सामने सबसे बडी दुविधा यही आ रही है कि आखिर वो ऐसा क्या करें कि भ्रष्टाचार उन्मूलन की इस लडाई में उनका योगदान तय हो सके । हालांकि ये लडाई बहुत ही बडी और विस्तृत है लेकिन फ़िर भी छोटे छोटे प्रयासों से इस लडाई की धार को तेज़ किया जा सकता है ।

सूचना के अधिकार के उपयोग को प्रोत्साहन :- वैसे तो इस हथियार का उपयोग करके आजकल एक आम आदमी भी सरकार , प्रशासन , पुलिस के हलक में हाथ डाल के ऐसी ऐसी जानकारियां सामने ला रहा है कि सरकार और उसके भ्रष्ट नुमाईंदों को दस्त और पेचिश लगी हुई है । लेकिन अभी भी न तो इस अधिकार का व्यापक उपयोग किया जा रहा है और दूसरी बात ये है कि अब भी लोग इसका ज्यादा उपयोग निजि हित की सूचनाओं के लिए कर रहे हैं ( वैसे इन सूचनाओं के बहाने भी जानकारियां जो निकल रही हैं उनमें भी कहीं कहीं जनहित जुड ही जाता है ) , लेकिन यदि हर सरकारी कार्यालय , दफ़्तर , संस्थान में सूचना के अधिकार के तरह आवेदनों की बाढ लगा देनी चाहिए । वो एक एक चीज़ बाहर आनी चाहिए जिस पर न तो अब तक किसी की नज़र पडी है और न ही पडने दी गई है ।  उन कुर्सियों के एक एक पाए के खडे होने तक की जानकारी मांग लेनी चाहिए आम जनता को जिस पर बैठ कर और टांगे फ़ैला कर आज कर्मचारी , उद्योगपति , सभी भ्रष्टाचार की गंगा बहा रहे हैं । ये ज्यादा मुश्किल भी नहीं है और बहुत ज्यादा आर्थिक बोझ डालने वाला भी नहीं है । हालांकि इस दिशा में बहुत से स्वयं सेवी संस्थाएं और कार्यकर्ता सक्रिय हैं लेकिन वे नाकाफ़ी हैं । इस प्रवाह को प्रहार का शक्ल दीजीए और कोहराम मचा दीजीए ....। इतना कि सरकारी दफ़्तर में बैठे हर बेइमान नुमाइंदे के सर पे ये एक तलवार की तरह लटके ।


कैमरों /वीडियोग्राफ़ी के चलन को अनिवार्य किया जाए :- अभी कुछ समय पहले जब कुछ समाचार चैनलों ने स्टिंग ऑपरेशन करके बडे बडे सरकारी अधिकारियों , भ्रष्ट कर्मचारियों की काली करतूत को सरेआम लोगों के सामने रखा था तो उस मुहिम ने भी गजब का समा बांधा था । ये अलग बात है कि स्टिंग ऑपरेशन में पकडे और घूस लेते देते दिखाए गए उन तमाम अधिकारियों का क्या हुआ , उन्हें कोई सज़ा भी मिली या नहीं इसकी सुध नहीं ली गई , लेकिन इसके बावजूद ये बात उस प्रक्रिया में सामने तो जरूर आई कि भ्रष्टाचार को अगर नंगा किया जाए तो शायद थोडा सा डर उनमें तो जरूर बैठ जाता है जो नंगे होने से बचे होते हैं । हर दफ़्तर , महकमे , संस्थान में कुछ खास स्थान , कुछ खास सीटें ही वो होती हैं जिनपर घूस लेने देने , सारे अविधिक काम किए कराए जाने की गुंजाईश ज्यादा होती है तो फ़िर उस चप्पे चप्पे को कैमरे की नज़र में ले आना चाहिए और उसका प्रसारण सीधे जनता के हद में होना चाहिए । हालांकि ये बहुत ही खर्चीला उपाय है और जो सरकार संसद तक की कार्यवाही को जस का तस सिर्फ़ इस वजह से नहीं दिखाती क्योंकि उसे डर है कि जनता जब खुद अपने द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों की हरकतें , उनका आचरण , उनका व्यवहार और उनकी भाषा देखेगी तो अगले चुनाव में वे जनता के सामने जाकर उनसे आंख भी नहीं मिला सकेंगे । लेकिन ऐसा प्रयास तो किया ही जा सकता है कि कुछ बहुत ही भ्रष्ट और दलालखोरी का अड्डा बन चुके कार्यालयों , जैसे अदालत , राशन , पासपोर्ट, लाईसेंस आदि के दफ़्तर आदि को पूरी तरह निगेहबानी की जद में लाया जाए ।


विभीषणों को प्रोत्साहन :- कहते हैं कि रावण के वध के लिए विभीषण का राम की सेना के साथ आ मिलना बहुत ही जरूरी था और आज भ्रष्टाचार भी रावण का ही रूप ले चुका है तो इसलिए अगर भीतर ढके छुपे रावण को बाहर लाना है तो हर संस्थान में छुपे विभीषणों को किसी भी तरह से चाहे लालच से , चाहे उकसा कर , डरा कर , या किसी भी तरह से एक बार इस बात के लिए तैयार कर लिया जाए कि वे अंदर चल रहे सारे गोलमाल की खबर बाहर निकालें तो फ़िर जनता का बहुत सारा काम आसान हो जाएगा । ये ठीक उस तरह का उपाय है जैसा कि पुलिस किसी बडे अपराधी को सज़ा दिलवाने के लिए उसी के किसी साथी को सरकारी गवाह के रूप में तोड कर उसी अपराधी के खिलाफ़ इस्तेमाल करती है । इन विभीषणों ने ही आज विकिलीक्ज़ को इतनी ताकत देदी कि वो विश्व के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका तक के लिए चिंता का सबब बन गया । इस काम के लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लडने वाली संस्थाओं , उसके खिलाफ़ सबूत जुटाने वाले पत्रकारों , को उन विभीषणों की तलाश करके उनसे मिली जानकारी का उपयोग बडे घपले घोटालों , बेइमानों के सूत्र को पकडने के करना चाहिए ।

शिकायत /मनाही के आचरण को बढावा देना :- आज भ्रष्टाचार अगर सुरसा की तरह बन बढ गई है तो उसका एक सबसे अहम कारण ये है कि , आम लोग लडने की ,मना करने की , जूझने की आदत को लगभग तिलांजलि दे चुके हैं , सबको बस आसानी से अपना काम करवाना है , वो भी जितनी जल्दी से जल्दी हो जाए । आंकडे बताते हैं कि भारत में लगभग साठ प्रतिशत आम लोग जायज़ काम को करवाने के लिए भी रिश्वत सिर्फ़ इसलिए देते हैं क्योंकि वे इंतज़ार नहीं कर सकते । भारत की जनसंख्या अधिक होने के कारण आज हर जगह आदमी कतार मे नज़र आता है , दुकान से लेकर दफ़्तर तक , बस रेल , सडक , स्कूल , सिनेमा , हर जगह कतारें ही कतारें तो अगर सचमुच ही भ्रष्टाचार को समाप्त करना है तो फ़िर आम आदमी को भी कतार में लगने और अपनी बारी आने की प्रतीक्षा करने की आदत डालनी होगी ।


तकनीक के उपयोग को बढावा :- पश्चिमी देशों ने भ्रष्टाचार से लडने के लिए जिस एक तंत्र को प्रभावी रूप से अपनाया वो था तकनीक का उपयोग । पश्चिमी देशों ने सूचना , संचार ,कंप्यूटर प्रणाली के सहारे एक एक जानकारी , एक एक सुविधाओं , सूचनाओं को तकनीक से जोड कर सब कुछ जनता के सामने पारदर्शी कर दिया । इसका परिणाम ये हुआ कि कोई चाहकर भी न तो उसमें कोई हेरफ़ेर कर सकता था न ही उन्हें कमाई का ज़रिया बना सकता था । भारत में भी इसकी शुरूआत हो तो चुकी है किंतु अपेक्षित रफ़्तार से नहीं है और उससे बडी बात ये कि अधिकांशत: वे सब आऊटडेटेड होने के कारण भ्रष्टाचार की गुंजाईश छोडती सी लगती हैं , उदाहरण के भारतीय रेल का कंप्यूटरीकण होने के बावजूद रेल आरक्षण में होने वाला हेरफ़ेर । जबकि अदालतों , बैंकों , और बहुत से अन्य कार्यालयों में हो रही कंप्यूटरीकरण की प्रकिया ने कुछ क्षेत्रों में भ्रष्टाचार की गुंजाईश को कम करना शुरू कर दिया है । सरकार द्वारा आमंत्रित की जाने वाली निविदाओं (टेंडरों) , प्रति योजना के आय और व्यय का ब्यौरा , सरकार द्वारा खर्च की जा रही राशि का पूरा ब्यौरा यदि सब कुछ यदि इंटरनेट पर डाला जाए और आम जनता की पहुंच में ला दिया जाए तो निश्चित तौर पर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सकता है ।

इसके अलावा आम आदमी , पत्र द्वारा , लेख द्वारा , संगठनों द्वारा और स्वयं सेवी संस्थाओं के सहारे इस लडाई आगे बढा सकते हैं । सबसे जरूरी बात है भ्रष्टाचार को पूरी तरह उखाड फ़ेंकने के लिए माहौल और मानसिकता को बरकरार रखना ।

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

बदलनी होगी राजनीति से परहेज़ की प्रवृत्ति .........आज का मुद्दा






अन्ना हज़ारे के जनाओंदोलन में लोकतंत्र में मतदान के महत्व पर चर्चा चली और लोकतंत्र की मजबूती के लिए आम लोगो के शत प्रतिशत मतदान की बात उछाली गई तो आम लोगों ने एक दिलच्स्प मगर गंभीर प्रश्न उठाया । यदि चुनाव में दर प्रत्याशी खडे हैं और आम आदमी की नज़र में दसों प्रत्याशी संदिग्ध और प्रश्नों के घेरे में हों तो ? क्या उस स्थिति में भी आम आदमी को लोकतंत्र की अनिवार्य परंपरा का निर्वहन करने के लिए मतदान करना चाहिए ? क्या मजबूरी में इस्तेमाल किए जाने से मतदान के मूल उद्देश्य की पूर्ति वाकई हो पाएगी ? सबसे अहम बात ये कि सामने प्रत्याशियों की जमात में एक भी मनोनुकूल उम्मीदवार नहीं पाकर क्या सचमुच ही आम मतदाता खुद को मतदान के लिए प्रेरित कर सकता है । अब सबसे बडी समस्या आम आदमी के सामने यही है कि लोकतंत्र में उसके पास अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए विकल्प ही नहीं है । आज स्थिति इतनी नारकीय हो चुकी है कि ऐसी दुविधा हर स्तर पर होने वाले चुनाव की है ।


अगर इस समस्या के समाधान को तलाशने से पहले इसकी उतपत्ति की पडताल करना समीचीन होगा । स्वतंत्रता पूर्व राजनीतिक दलों , कांग्रेस ही प्रमुख थी मगर अलग -अलग विचारधाराओं के कारण विभिन्न राजनीतिक दलों का उदभव हुआ । भारतीय समाज की संरचनात्मक पृष्ठभूमि में प्राचीनकाल से ही , धर्म जाति भाषा और खॆत्र की महती भूमिका होने के कारण जल्दी ही ये सब कारक भी राजनीतिक दलों के गठन का आधार बनने लगे । इन सब के आधार पर बनने वाला राजनीतिक दलों के गठन का आधार बनने लगे । इन सब के आधार पर बनने वाली राजनीतिक पार्टियों ने अपने उद्देश्यों और एजेंडों के बिल्कुल स्पष्ट न होने के कारण बहुत बार उन उद्देश्यों की पूर्ति के बाद भी इन्हें समाप्त नहीं किया गया । सबसे बादा उदाहरण तो देश की सबसे बडी पार्टी कांग्रेस का ही लिया जा सकता है जिसके लिए यही कहा गया था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के अपने उद्देश्य हासिल हो जाने के बाद इसे भंग कर दिया जाना चाहिए था । लेकिन स्वतंत्रता के उपरांत राजनीतिक महात्वाकांक्षा इतनी ज्यादा बढ गई थी कि सत्ता का मोह त्यागने का साहस कोई नहीं कर सका ॥


भारतीय संविधान के निर्माण के समय भी इस बात का ख्याल नहीं रखा गया कि राजनीतिक दलों के गठन में क्या , धर्म , जाति , भाषा , क्षेत्र आदि को आधार और किस सीमा तक बनाया जा सकता है ? इसका कुपरिणाम ये निकला कि इन सबके नाम पर लगातार राजनीतिक दल बनते रहे । इन तमाम क्षेत्रीय, छोटे और बिखरे हुए राजनीतिक दलों में पहले सत्ता पाने के लिए किए/कराए जाने वाले छोटे तंत्रों के रूप में काम किया उअर बाद में धन के बदले खरीदे जाने वाले उन चिप्पियों के रूप में उभरे जिन्हें चिपका कर बडे दलों ने सरकार बनाने में हो रहे छिद्रों को भरने का काम किया । इस पूरी प्रक्रिया में शुरू से लेकर आखिर तक आम मतदाता बार-बार छला जाता रहा । हालात धीरे-धीरे ऐसे हो गए कि पढा-लिखा ,शिक्षित और जागरूक मतदाता धीरे धीरे खुद को मतदान के प्रति उदासीन और फ़िर बिल्कुल अलग कर बैठा ।


आजादी के बाद बनी तमाम राजनीतिक पार्टियों के गठन को यूं तो आम मतदाता के लिए अनेकों बिकल्प की निरंतर उपलब्धता के रूप में लिया जाना चाहिए था ।किंतु बडे दलों के लगातार होते विघ्हटन , राजनीति में गैर राजनीतिक कारकों का , वर्चस्व , राजनीतिज्ञों में बढती अवसरवादिता , सत्ता और धन का बढता तालमेल जैसे कारणों ने आम मतदाता के सामने एक ऐसा दलदल खडा कर दिया कि उसे हर स्थिति में अपनी हालत उसमें डूबते जाने जैसी लगी । भारतीय संविधान में निहित प्रस्तावना, लोकतांत्रिक परंपराओं का सम्मान , कानूनी प्रक्रियाओं के प्रति निष्ठा और सबसे अहम आम जनता के प्रति जिम्मेदारी और सेवा की भावना की निरंतर होती अवहेलना ने शासन को निरंकुश किया और शासित को बुरी तरह निराश ।


इन तमाम परिस्थितियों के बीच संविधान में नए अनुच्छेदों का निर्माण कदाचार , भ्रष्टाचार ,दल-बदल , आदि से निपटने के लिए बने बनाए गए कानूनों और प्रावधानों का प्रभाव और परिणाम भी जब शून्य जैसा आया तो फ़िर आम जनता से ये अपेक्षा रखना कि वो अपने मताधिकार का प्रयोग करके स्थिति बदले देगी " अतिश्योक्ति "जैसा लगता है । भारतीय चुनाव प्रणाली भी कई नई तकनीक और साधनों से लैस होते रहने के बावजूद आम मतदाता का विश्वास खोती गई । मतदाता पहचान पत्र की अनिवार्यता , इलैक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का प्रयोग , उम्मीदवारों द्वारा अपनी संपत्ति तथा अन्य ब्यौरों का सार्वजनिक करना जैसे तमाम उपाय नाकाफ़ी साबित हुए । आम लोगों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करना होगा कि वे अपने जनप्रतिनिधियों से लगातार सवाल करते रहे , और उन्हें उत्तर देने के लिए विवश करें । सरकार द्वारा उनके जनकल्याण के लिए उन प्रतिनिधियों को या उनके द्वारा दी जा रही राशि की एक एक पाई का हिसाब लेने के लिए तैयार करना होगा ।


आज चुनाव प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन की आवशयकता महसूस की जा रही है । छोटे से छोटे तथा शीर्ष स्तर तक के चुनाव में धन का दुरूपयोग , शराब , हथियारों , पैसों तथा अन्य वस्तुओं के उपयोग से पूरे चुनावी परिदृश्य को बदलने की कोशिशों का कारगर तोड अब तलाशना ही होगा । प्रत्यक्ष या सीधे मतदान के अन्य विकल्पों को ढूंढ कर अपनाना होगा । न सिर्फ़ चुनाव प्रणाली बल्कि सरकार के गटन के लिए अब तक अपनाई जा रही प्रणालियों का भी आकलन विश्लेषण करना होगा ताकि ये मंडी बाजार सजा के प्रतिनिधियों की खरीद फ़रोख्त के खेल पर अंकुश लगाया जा सके । अब समय आ चुका है कि ,सभी को राजनीति की सफ़ाई के लिए अपने भविष्य को बचाने और बनाने के लिए खुद राजनीति में आना होगा । अब इसे अछूतों की तरह , अब इसे एक लाईलाज़ बीमारी मान कर , और एक गैर /गौण विषय मान कर नहीं छोडा जा सकता , कतई नहीं ।

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

आईपीएल : क्रिकेट से परे एक खेल .........आज का मुद्दा






जिस देश में क्रिकेट एक खेल से बढकर जुनून बन गया हो और अगर वो देश अट्ठाईस वर्षों के बाद विश्व विजेता बन जाए तो उस देश में क्रिकेट के खिलाफ़ कोई भी कुछ कहना सुनना कतई नहीं चाहेगा और यकीनन कोई कहता सुनता भी नहीं है । बल्कि सुना तो ये है कि इस खेल के सबसे बडे जादूगर सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने की मांग की जाने लगी और महाराष्ट्र सरकार ने तो शायद इसकी औपचारिक मांग भी की है । इसके अलावा उन लोगों कि भावनाएं भी जोर मारने लगी हैं जो कह रहे हैं कि अब भारत के राष्ट्रीय खेल को हॉकी से बदल कर क्रिकेट कर दिया जाना चाहिए । जाने अगले पचास वर्षों में ऐसा ही कोई चमत्कार फ़ुटबॉल या अन्य किसी खेल में हो जाए और किसी दिन भारत फ़ुटबॉल का विश्व कप जीत जाए तो क्या पता कि क्रिकेट की जगह फ़ुटबॉल को राष्ट्रीय खेल का दर्ज़ा देने की मांग की जाने लगे । वैसे तो किसी खेल , किसी भाषा या किसी को भी राष्ट्रीय दर्ज़ा दे देने भर से कुछ खास हासिल होता है ऐसा नहीं लगता उलटा उसकी हालत पतली सी ही दिखती है । खैर यहां बात क्रिकेट की हो रही थी , लेकिन असल में बात क्रिकेट की भी नहीं उसके बहाने या उसके पीछे चल रहे खेल की हो रही है । 


क्रिकेट भारत में दिनोंदिनो अत्यधिक लोकप्रिय होता चला जा रहा है और  पिछले कई सालों से इसकी लोकप्रियता का ग्राफ़ बढता ही जा रहा है । इसी बात को भलीभांति समझते हुए भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड और उसके अधिकारियों ने विशेषकर ललित मोदी ने भारत के उन करोडों दर्शकों को क्रिकेट के ग्राहकों के रूप में बदल दिया और खेल को भी एक व्यवसाय का रूप दे दिया । जो खेल कभी पांच दिन की अथक शारीरिक मेहनत , कलात्कमता और भद्रता तथा धैर्य का परिचायक था वो पहले पचास ओवर के एकदिनी किक्रेट में और उसके बाद फ़िर मात्र कुछ घंटे और बीस बीस ओवर के उन्माद और जुनून में  बदल गया । ग्राहकों को लुभाने भरमाने और मदमस्त करने के लिए उसमें न सिर्फ़ ग्लैमर , मनोरंजन का तडका लगा दिया बल्कि बाकायदा बोली बिक्री का फ़लसफ़ा जोड के नीलामी का बाजार सज़ा के उसे पूरी तरह से एक कारोबार का रूप दे दिया गया ।


क्रिकेट अब क्रिकेट नहीं रहा , क्रिकेट के मायने बदल गए । भारत की आम जनता का जुनून और क्रिकेट के प्रति उनका लगाव कितना ज्यादा था ये इस बात से ही समझा जा सकता है कि काऊंटी क्रिकेट , एशेज जैसी श्रंखलाओं को कहीं पीछे छोडते हुए आईपीएल संस्करण ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के साथ साथ भारतीय क्रिकेट के शीर्ष खिलाडियों बल्कि कई विदेशी खिलाडियों को इतना आकर्षित कर दिया कि वे अपने देश का प्रतिनिधित्व करने से भी बगावत पर उतर आए । इसका कारण सिर्फ़ एक था पैसा और बेतहाशा पैसा । ये पैसा भारतीय दर्शकों से , विज्ञापन दाता कंपनियों से , और एक सबसे बडे ढके छुपे सूत्र यानि माफ़िया डॉन से ( अब ये बात कोई नई बात नहीं है कि किक्रेट के खेल के साथ सट्टेबाजों की सांठ गांठ का का एक गठजोड भी बहुत मजबूत होता जा रहा है ) उगाहा जा रहा है । 

क्रिकेट का ये पनपता हुआ कारोबार इतना प्रभावी होता जा रहा है और इसका मुनाफ़ा इतना बडा है कि अब इसे रोक टोक पाना उसी तरह असंभव है जैसे कि देश में शराब के बढते फ़लते फ़ूलते कारोबार को रोक पाना । जब भी ऐसी कोशिश की जाती है तो एक दलील दी जाती है कि करों के रूप में इससे भारत सरकार को बहुत बडी आय होती है , इसमें कोई संदेह नहीं कि होती भी होगी । लेकिन दो सवाल नि:संदेह महत्वपूर्ण हो जाते हैं । इन खेलों का समय जानबूझ कर शाम और रात का रखा जाता है । जिस देश में अब भी सिंचाई के लिए किसानों को बिजली मुहैय्या करा पाने में सरकार खुद को असमर्थ बताती है उसमें लगात इतने दिनों तक लाखों वॉट बिजली को इस तमाशे के नाम पर फ़ूंका जाता है । ज्ञात हो कि बिजली बचाने के लिए पहले और हाल ही में , अर्थ आवर और इस जैसे प्रयासों को बढावा दिया जाता रहा है जहां एक घंटे तक बिजली को और बिजली से चलने वाले तमाम उपकरणों को बंद करके बिजली की बचत करने की कोशिश होती रही है ऐसे में इस खेल में बहाई जा रही बिजली का हिसाब किताब कोई न तो लेने वाला है न देने वाला ।


एक दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि पहले इन खेलों के लिए शीत काल का समय निश्चित किया गया था । कम से कम भारतीय महाद्वीपों में तो ऐसा ही था । लेकिन पश्चिमी देशों की शीतल पेय बनाने वाली बडी बडी कंपनियों के दबाव में आईपीएल का आयोजन ग्रीष्म काल में ही रखा जाता है । इस खेल को बडी आसानी से यूं समझा जा सकता है कि इन मैचों के दौरान सबसे ज्यादा विज्ञापन सिर्फ़ शीतल पेयों के ही होते हैं और उनमें भी अधिकांश में क्रिकेट खिलाडी ही चमकते हैं । 

आने वाले समय में आईपीएल का जुनून और भी बढेगा और जैसा कि अभी से प्रचारित किया जा रहा है कि पचास दिनों के लिए या इक्यावन दिनों के लिए पूरा देश बंद रहेगा , तो वाकई देश बंद रहेगा या नहीं ये तो नहीं कहा जा सकता हां ये जरूर है कि क्रिकेट के पीछे और क्रिकेट के नाम पर चल रहा ये खेल अब कभी भी बंद नहीं हो पाएगा , बावजूद इसके कि भारतीय टीम के करिश्माई कप्तान सार्वजनिक रूप से ये कहते हैं कि बहुत अधिक खेल होने के कारण खिलाडी मानसिक और शारीरिक रूप से बहुत थक जाते हैं और अपने स्वाभाविक खेल करियर की उम्र से कहीं पहले ही चुक जाते हैं ।  


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