शनिवार, 9 अप्रैल 2011

ये हैं जनांदोलन के मुद्दे : चुनिए आप अपने लिए




अब यही मकसद है यही मुकाम है और यही है सबसे बडा मुद्दा भी 





पिछ्ले पांच दिनों में जो कुछ देश की सरकार ने देखा, देश के समाज ने देखा , और पूरे देश ने देखा , या यूं कहें कि अवाम ने जो कुछ दिखाया उसने बहुत सी बातों से को स्पष्ट कर दिया । एक वृद्ध जो न तो कोई राजनेता था न ही धर्मगुरू न तो उसके पास अथाह संपत्ति थी न ही शायद बहुत बडी शारीरिक ताकत के मालिक भी नहीं । अगर उनके पिछले इतिहास को देखा जाए तो ये स्पष्ट हो जाता है कि उन्हें इस बात की भी चाह नहीं कि उन्हें मसीहा या रोल मॉडल की तरह माना समझा जाए । जिस इंसान ने अपनी लडाई अपने छोटे से गाव से शुरू करके आज पूरे देश को अपने साथ जोड लिया तो जरूर ही ये उसका उद्देश्य ही है जिन्हे वो पहले तय करते हैं फ़िर उसे पाने के लिए शांति अहिंसा और अनशन का वो रास्ता अख्तियार करते हैं कि जो पूरे अवाम को इतना आंदोलित कर देता है कि जो आम लोग बिना किसी खास वजह के पडोस तक में झांकने की जहमत नहीं उठाते वे इनके साथ आ जुडते हैं । जो देश शीला और मुन्नी के गानों पर ठुमके लगाने में व्यस्त होता है उसे वे अपने एक नारे से इस स्थिति में ला देते हैं कि वो देश भक्ति के गानों पर बिना कडी धूप की परवाह किए हुए झूमता है गाता है । इस बार जिस उद्देश्य को लेकर ये लडाई शुरू की गई थी उसने फ़िलहाल तो सरकार को इस बात के लिए मजबूर कर दिया कि इतिहास में पहली बार सीधे तौर पर किसी कानून को बनाने से पहले न सिर्फ़ जनता की सारी भावनाओं को स्थान दिया जाएगा बल्कि उस कानून को बनाने में जनता की भागीदारी भी होगी । आज चारों तरफ़ जीत का जश्न मनाया जा रहा है लेकिन अन्ना हज़ारे ने बता दिया है कि अभी इस लडाई को अंत की तरह नहीं एक शुरूआत की तरह लेना है । आम लोग बहुत से प्रश्न उठा रहे हैं , बहुत सी आशंकाएं जता रहे हैं , बहस और विमर्श चल रहा है तर्क वितर्क हो रहा है । कोई घोर आशावादी है तो कोई इसे क्षणिक आवेश मान समझ रहा है । कल क्या होगा कोई नहीं  जानता लेकिन दो बातें लोगों को जरूर ध्यान में रखनी चाहिए कि जो स्थिति बासठ वर्षों में बनी है देश की उसे रातों रात ठीक नहीं किया जा सकता और अगर आज आपने ये लडाई शुरू नहीं की तो कल को जब आपकी संतानें किसी ऐसे ही मोड पर खडी होकर इस लडाई को शुरू करेंगीं तो निंसंदेह उनके मन के कोने में कहीं ये बात जरूर उठेगी कि अब से पहले देश की जनता क्यों और कहा सोई रही । अन्ना हज़ारे , किरन बेदी , अरविंद केजरीवाल जैसे कर्मवीर लगातार अपना काम कर रहे हैं बिना इस बात की परवाह किए कि कौन कौन उनके साथ है कौन नहीं है । बिना इस बात की चिंता किए कि किस लडाई में वे जीतेंगे किसमें नहीं । अब बहुत से लोगों को लग रहा है कि अब जनलोकपाल विधेयक पर तो सरकार मान ही गई अब कौन से मुद्दे बचे हैं ...लेकिन लडाई तो अभी बांकी है मेरे दोस्तों ..मुद्दे तो यहां कतारबद्ध होकर खडे हैं । देखिए कौन से :-


सूचना के अधिकार की लडाई :- यूं कहने को तो इस अधिकार को पाए हुए अब काफ़ी समय बीत चुका है और आम लोगों ने इसका इस्तेमाल करके उन तमाम अधिकारियों , कर्मचारियों , की रातों की नींद हराम करने के लिए कमर भी कस ली है । सूचना के अधिकार को अपनी लडाई का आधार बना और मान कर बहुत से लोगों ने मंत्रियों और सरकार के हलक में हाथ डालकर उनके कारनामों घोटालों को सामने ला रही है और ये काम बदस्तूर जारी है । हालांकि अभी भी इस सूचना के अधिकार का उपयोग उस स्तर पर नहीं किया जा रहा है जितना कि अपेक्षित है लेकिन इसके बावजूद भी सरकार को इससे इतनी परेशानी हो रही है कि अब तक कुल तीन बार प्रधानमंत्री तक के स्तर पर ये कोशिश की गई है कि इस अधिकार के पर कतरे जाएं तो इससे पहले कि सरकार कोई जुगत भिडाए इस सूचना के अधिकार को भी एक आंदोलन बना देना होगा । जो भी जहां भी जो सूचना चाहते हैं , पारदर्शिता के लिए संस्थाओं को मजबूर करना चाहते हैं उन्हें इसे एक मुहिम बना देना चाहिए ताकि सरकार बौखला कर इसके पर कतरने को मजबूर हो और फ़िर जनता उसे आडे हाथों ले सके । 


प्रतिनिधि वापस बुलाओ विधेयक :- एक बार की गलती और फ़िर अगले पांच वर्षों तक की बेबसी , वोट देकर चुना किसी को वो बन गया किसी और का नुमाईंदा , सारे वादे , सारी योजनाएं भुला कर दिल्ली में बैठ कर वातानुकूलित गाडियों और बंगलों दफ़्तरों में बैठ कर आम जनत का दर्द महसूस करने वालों को एक ही झटके से उसी प्रकिया से दोबारा वापस खींच लाने की मुहिम । हालांकि ये कई राज्यों में लागू किया गया है शायद और इसका उपयोग भी किया जा चुका है आम जनता द्वारा लेकिन इसे भी राष्ट्रव्यापी बनाए जाने की जरूरत है । एक बार अगर इन राजनेताओं के मन में ये डर घर कर गया कि वे एक अस्थाई सेवक हैं न कि उनके बाप दादा की गद्दी है कि जिसे वे कब्जाए बैठे हुए हैं तो उसी दिन से सुधार आने लगेगा । इस अधिकारो को पाने और उसके उपयोग के लिए आम लोगों को खुद को तैयार करना होगा । 


जजेस जवाबदेही बिल :- एक समय हुआ करता था जब भारतीय न्यायपालिका पर लोगों का अटूट विश्वास था और लोग समझ रहे थे कि कम से कम एक दरवाज़ा तो ऐसा है कि जहां तक पहुंचने के बाद न्याय मिलना लगभग तय है और अभी भी स्थिति बहुत ज्यादा खराब नहीं हुई है । लेकिन न्यायपालिका जैसी संस्थाओं में किसी भी गडबडी की गुंजाईश को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और पिछले दिनों जिस तरह से एक के बाद एक बडी छोटी घटनाओं में न्यायाधीशों की लिप्तता की जानकारी आम आदमी को मिली है वो न सिर्फ़ चिंताजनक है बल्कि बहुत ही आत्मघाती भी है । भारतीय न्यायपालिका की सफ़ाई के लिए ये बहुत जरूरी है कि न्यायाधीशों की जवाबदेही तय करने के लिए और दोषी पाए जाने पर उन्हें सीधे सजा देने के लिए ये विशेष कानून लाया जाए । इसके लिए देश के तमाम अधिवक्ताओं को कमर कस के आगे आना चाहिए 


अखिल भारतीय न्यायिक सेवा :- न्यायपालिका में मौजूद भ्रष्टाचार का एक बडा कारण बताया जाता है और है भी वो है भाई भतीजावाद की स्थापित हुई परंपरा । सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई सिर्फ़ एक जानकारी ने जो खुलासा किया था और उससे जो बवेला उठ खड हुआ था वो इस बात को प्रमाणित करता है कि कहीं न कहीं कुछ न कुछ गडबड तो है ही । इसलिए बहुत जरूरी है कि संघ लोक सेवा आयोग की तरह अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का गठन किया जाए और न्यायाधीशों की नियुक्ति स्थानांतरण में पूर्ण पारदर्शिता लाई जाए । हाल ही में ये खबर सामने आई है कि सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्तियों की नियुक्ति तक में वरिष्ठता के स्थापित मानदंडों की अनदेखी तक की गई है । इसके गठन से बहुत सी साफ़ सफ़ाई अपने आप हो जाएगी । 


विदेशी बैंक खाता विधेयक :- पिछले दिनों एक मुहिम ने जोर पकडा है कि अब जबकि ये साफ़ और स्पष्ट हो चुका है कि , भारतीयों ने अपना बहुत सा काला धन ( इतना कि भारत की आर्थिक स्थिति बिल्कुल ही उलट जाएगी इससे ) विदेशी बैंकों में जमा कर रखा है । स्विस बैंकों में बंद भारत की आम जनता के खून पसीने की कमाई को वापस अपने हाथों में लाने के लिए इस कानून का लाया जाना बहुत जरूरी है और इस कानून के तहत सभी विदेशी बैंकों में जमा काले धन को देश की राष्ट्रीय संपदा घोषित किया जाए । बिना ये देखे कि किसका धन है , कहां है , कितना है सीधे उसे भारतीय राजकोष में लाकर विकास कार्यों में लगाया जाए । 


पूर्ण पारदर्शिता विधेयक :- हाल ही में हुए राष्ट्रमंडल खेलों उजागर हुए अंतहीन घोटाले ने , टू जी थ्री जी के नाम पर हुए घोटाले ने , इससे पहले आईपीएल जैसे खेलों के आयोजन में चल रहे पैसे के खेल , जैसे तमाम भ्रष्टाचार के अड्डों को पूरी तरह नग्न करने के लिए पूर्ण पारदर्शिता कानून को लाया जाना चाहिए । किस आयोजन के लिए , किस योजना के लिए कहां से कितना पैसा लिया गया , कितना खर्च हुआ कितना बचा और कितना किस मद में गया । सब कुछ , एक एक पैसे का हिसाब , पूरे राजकोष की एक एक पाई का हिसाब सब कुछ जनता के देखने के लिए उसके सामने होना चाहिए । उसे जहां गडबड लगे वो अपने पूरे हक से सरकार और व्यवस्था से इस बाबत सवाल कर सकती है । नेताओं की , सरकारी अधिकारियों की कर्मचारियों का वेतन भत्ता , कार्य दिवस , अवकाश के दिन सब कुछ जनता ही तय करे इसके लिए भी लडाई लडनी होगी । 



ये तो बस चंद वो मुद्दे हैं जो सामने हैं जिसके लिए आम जनता को किसी भी अनशन , किसी जनांदोलन और किसी जंतर मंतर की प्रतीक्षा करने की जरूरत नहीं है । इन मुद्दों पर लगातार काम होना चाहिए और हर स्तर पर होना चाहिए । अब आप खुद तय करिए कि आप इसमें से किसके साथ कैसे कब कहां जुड रहे हैं ...क्योंकि ये तो तय है कि आज अगर आप नहीं जुडे तो मजबूर होकर कल आपकी संतानों को इससे जुडना होगा ....मुझे और पूरे देश को प्रतीक्षा है आपके फ़ैसले की ...आप करेंगे न फ़ैसला ....अपना ..देश के भविष्य का ??


गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

जंतर मंतर से लौट कर - 1 ..क्या है जन लोकपाल बिल ?????



पढिए और जानिए कि आज जंतर मंतर पर जो लडाई लडी जा रही है उससे क्या कैसे हासिल होगा ...मैं पूरा दिन बिताने के बाद अभी लौटा हूं ..बहुत कुछ अपने साथ लेकर ..आज देर रात तक बैठ कर आपको बताऊंगा दिखाऊंगा कि ....क्यों इसे आजादी की दूसरी लडाई कहा जा रहा है ...और आप ..जहां भी हैं इस लडाई को वहीं से शुरू करिए ....क्योंकि ये आपकी लडाई है ...कहिए लडेंगे न आप ...तब तक ..जब तक कि जीत हासिल न हो .........
छवि को क्लिक करके बडा करके आप आराम से इसे पढ सकते हैं ...पढिए कि ...आज इससे जरूरी कोई मुद्दा नहीं है 

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

ताबूत में आखिरी कील ठोंकने का यही सही वक्त है ... आज का मुद्दा








अपने होशोहवास में शायद ये ऐसा पहली बार देख रहा हूं कि आम जनता भ्रष्टाचार को एक नासूर मान कर उसे उखाड फ़ेंकने के लिए तत्पर हो गई है । हालांकि पिछले कुछ समय में जिस तरह से सरकारी कुशासन , घपलों घोटालों में सबकी लिप्तता , प्रधानमंत्री , राष्ट्रपति तक का मजबूर होने का राग , प्रशासन , विधायिका , न्यायपालिका तक तक में भ्रष्टाचार अपने चरम पर पहुंचती दिखाई दी है उसके बाद तो अपेक्षा ये की जानी चाहिए थी कि पूरा देश सडकों पर उतर जाता और खींच खींच के उतार फ़ेंकता इन्हें इनके जड समेत । लेकिन लोकतांत्रिक देश के विशेषकर भारत जैसे देश के नागरिकों को हमेशा से ही किसी उत्प्रेरक की प्रतीक्षा रहती है । और ऐसा न हो पाने की एक दूसरी बडी वजह ये रही है कि कहीं न कहीं इन खास पदों पर बैठे भ्रष्टाचारियों के साथ ही आम आदमी कहीं मजबूरी में , कहीं किसी और बहाने से खुद को भी इसमें लिप्त पाता है और ऐसा दिखाई देता है मानो भ्रष्टाचार वो रक्त है जो पूरे देश की रगों में बह रहा है । लेकिन ऐसा है नहीं , वास्तव में अब भी हर महकमें और संस्थान में कुछ जुनूनी लोग हैं जो जाने किस जिद्द को अपने सिर माथे लगाए हुए पूरी दृढता के साथ न सिर्फ़ अपने आसपास चल रहे घिनौने भ्रष्टाचार से अलग हैं बल्कि अपना पूरा जोर लगा कर उसके खिलाफ़ सीना ताने खडे हैं । बस जरूरत इस बात की है कि उन मजबूत हाथों और कंधों पर विश्वास जताया जाए और कम से कम उन्हें इस डर से मुक्त कर दिया जाए कि इस भ्रष्टाचारी दलदल में इतनी ताकत नहीं है कि वो उन्हें भी खींच सके और अब ये काम शुरू हो चुका है ।





आज आम आदमी ये जानते हुए कि वो खुद कहीं कहीं इस भ्रष्टाचारी तंत्र को मजबूत बनाने में उसे ऐसे ही दिनोंदिन ताकतवर होने देने के लिए जिम्मेदार है , ये भी जानते हुए कि सवा अरब की जनसंख्या वाले देश में खासकर जब वो देश ,धर्म जाति , भाषा ,क्षेत्र और जाने किन किन बहानों से बंटा और बांटा गया हुआ हो और ऊपर से अशिक्षा , भूख , बेरोजगारी , कुपोषण जैसी बुनियादी समस्याओं से ही जूझ रहा हो , वो देश जो हर बार चुनाव से पहले कुछ नया कर पाने की कोशिश करता है और हर बार चुनाव के बाद खुद को ठगा हुआ पाता है वो आम आदमी अब सच में ही अपनी इस विवशता पर झुंझला गया है , एक उकताहट है मन में कि अब बस , बहुत हुआ । आज अन्ना हज़ारे और उनसे जुडी हर आवाज़ ने न सिर्फ़ ऊपर गद्दी पर फ़ैल के बैठे हुए देश के निहायत ही घटिया आचरण वाले राजनेताओं को संदेश दे दिया है बल्कि आम आदमी और पूरे देश को भी ये जता और बता दिया है कि अब सही समय आ गया है कि आम आदमी अपनी ताकत को पहचाने । अपने अंदर , अपने आसपास , पनप रहे हर छोटे बडे भ्रष्टाचार पर अपनी पूरी ताकत से , पूरी योजना से उसकी बखिया उधेड कर रख दे । ऐसा हो सकता है कि , यदि ऐसा करते हुए आपके हाथ खुद भी जलें , हो सकता है कि इसकी जलन आपके उन तक भी पहुंचे जिन्हें आप अपना कहते मानते हैं , और इसके बाद बहुत कुछ ऐसा देखने सुनने को मिले जो अप्रत्याशित हो अंचंभित करने वाला हो । लेकिन एक बात याद रखिएगा कि कल को जब आपकी संतानें भी खुद को इसी भंवर में फ़ंसा हुआ पाएंगी और शायद कोई और अन्ना हज़ारे ऐसी ही किसी स्थान पर किसी लडाई की शुरूआत करेगा तो एक बार ये जरूर सोचेगा कि आखिर वो कौन सी मजबूरी थी हमारी कि हम चुपचाप ये सब होता देखते रहे ।





मुझे और मुझ जैसे हज़ारों लाखों लोगों को ये नहीं पता कि हमारा उपवास , जंतर मंतर पर हमारी मौजूदगी , अन्ना के साथ दिखाया गया हमारा साथ कल कौन सी सूरत बदलेगा और कुछ बदलेगा कि भी नहीं लेकिन अब दो बाते तो जरूर ही तय हो चुकी हैं । पहली ये कि ये संतोष तो जरूर रहेगा कि आखिर किसी न किसी जगह पर हमने वो काम करने की कोशिश तो की जो मन के भीतर बैठा कोई जाने कब से कहने के लिए कह रहा है । दूसरी बात ये कि , अब ये जबकि ये चिंगारी सुलग उठी है तो फ़िर अपने छोटे छोटे प्रयासों से उसे दावानल का रूप देने में कोई कोर कसर नहीं छोडेंगें । मैंने रास्ता भी चुन लिया है ..वो है भ्रष्टाचार के ढके छुपे रूप को सरेआम नग्न करना । अब इसके लिए चाहे मुझे सूचना के अधिकार का उपयोग करना या करवाना पडे , या फ़िर कोई ऐसी तरतीब लडानी पडे कि जिससे भ्रष्ट और भ्रष्टचार नग्न होकर लोगों के सामने अपनी लाज छुपाने को मजबूर हो जाए , तो वो कोशिश मैं करता ही रहूंगा और तब तक करता रहूंगा जब तक कि व्यवस्था मुझसे आज़िज़ आकर खुल कर एक पक्ष ले ..या तो उन भ्रष्टाचारियों के साथ हो या फ़िर उनके साथ जो इसे मिटाना चाहते हैं । मुझे यकीन है कि ऐसी कोशिश ही एक न एक दिन , आपस में जुड कर एक बडे आंदोलन का रूप लेगी और फ़िर जिस दिन लोग ये भूल जाएंगे कि भ्रष्टाचारी सिर्फ़ भ्रष्टाचारी होता है , अपना या दूसरे का अपना नही , उसी दिन से व्यवस्था में सफ़ाई शुरू हो जाएगी । हां इसके लिए कुछ कीमत तो जरूर ही चुकानी होगी लेकिन कल को मेरी संतान को फ़िर से नए सिरे से इसी लडाई को शुरू करना पडे उससे बेहतर यही होगा कि मैं उसे इतना दे दूं कि वो उस लडाई को आगे बढाए । ........क्या आप भी तैयार हैं इस लडाई को लडने के लिए ....???????????????????

शनिवार, 26 मार्च 2011

आंदोलन और परिवहन व्यवस्थाएं ....आज का मुद्दा



देखिए और बताईये कि इनमें से किसे आरक्षण का लाभ मिलेगा




पिछले लगभग एक पखवाडे से जाटों ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग को लेकर एक बार फ़िर से छेडे गए आंदोलोन में रेल परिवहन व्यवस्था को अपना निशाना बनाया हुआ है । उत्तर भारत की रेल परिचालन व्यवस्था को पिछले पंद्रह दिनों में जितना अव्यवस्थित इस आंदोलन ने किया है उतना तो किसी आपदा या दुर्घटना ने भी नहीं किया होगा । हर बार की तरह थक हारकर जब न्यायपालिका ने सख्त रुख अपनाया और सरकार को इसे दुरूस्त करने के लिए बुरी तरह लताड लगाई है तो स्थिति में कुछ सुधार दिखाई दिया है । लेकिन जिस तरह से उन्होंने आगे सडकों पर आने की और इसके बाद पानी रोक देने की धमकी दी है उससे तो ऐसा लग रहा है जैसे युद्ध के दिनों में दुश्मन मुल्क कोई चाल चलता है । वैसे इससे पहले जब जाटों ने आरक्षण आंदोलन किया था तब उसने दिल्ली , पंजाब , राजस्थान आदि की परिवहन व्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित किया था ।  और ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ़ जाट आंदोलन में इस तरह रेल बस को निशाना बनाया गया है । अब तो रैली से लेकर किसी बंद , हडताल और आंदोलन तक में सबका निशाना यातायात के साधन और परिवहन व्यवस्थाएं ही बनती हैं । इससे अलग जब भीड हिंसक रूप ले लेती है तब करोडों रुपए कि सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान होता है सो अलग ।

सबसे बडा सवाल ये है कि आखिर हर बार इन्हें ही क्यों निशाना बनाया जाता है ? क्या यही एकमात्र विकल्प बचा हुआ है आज जनआंदोलनों के पास जिसे अपनाकर वे समाज और सरकार का ध्यान अपनी ओर खींच पाते हैं ? या फ़िर धीरे धीरे बढती ये खतरनाक प्रवृत्ति अब एक ऐसे चलन को जन्म दे चुकी है कि आम लोगों को अपनी शिकायत सार्वजनिक रूप से उठाने के लिए , अपनी समस्या को सरकार और प्रशासन को दिखाने सुनाने के लिए भी सबसे आसान और कारगर उपाय सडकों पर उतरना ही लगता है । इसके अलावा  राजनीतिक दलों द्वारा भी सडक , और रेल यातायात माध्यमों को जिस तरह अपनी शक्ति , विरोध और समर्थन के प्रदर्शनों , रैलियों , जाम , बंदी आदि के लिए जिस तरह से निशाना बनाया जा रहा है वो किसी भी सूरत में एक लोकतांत्रिक राज्य के लिए अच्छी बात नहीं है । सबसे ज्यादा हैरानी की बात ये है कि इन तथाकथित आंदोलनो में शिरकत करने वाला जनसमूह जहां बहुत बार उन मुद्दों और समस्याओं से भी अनजान रहता है वहीं दूसरी तरफ़ इस बात के प्रति भी संवेदनहीन होता है कि उनके इन आंदोलनों से बहुत से यात्रियों को कई बार अपनी या किसी अपने की जान गंवा कर इसकी कीमत चुकानी पड जाती है । बहुत बार इन जाम और बंद हडताल के चक्कर में फ़ंस कर किसी बीमार के दम तोड देने या ज्यादा गंभीर हो जाने की खबर सुनने देखने को मिल जाती है ।


जनसमूह की ऐसी प्रतिक्रियाओं के समय सरकार और प्रशासन जो किंकर्तव्यविमूढ और उदासीन भूमिका निभाते हैं वो आम जनमानस को और अधिक चुभता है । इन दिनों रोजाना लगभग डेढ से दो सौ ट्रेनों के परिचालन पर बुरा असर पडा है और बहुत सी ट्रेनों को प्रतिदिन रद्द किया जा रहा है । आखिर प्रशासन पिछले पंद्रह दिनों से और ऐसे आंदोलनों के बढने से पहले ही समय पर क्यों नहीं चेतती और स्थिति पर नियंत्रण करने का प्रयास क्यों नहीं करती ।इसकी भी एक पुख्ता सी वजह ये लगती है कि रास्ते पर खडे और और चलने चलाने वाले इन आंदोलनों के शिकार बनने वाले लोग आम जनता में से ही एक होते हैं । ऊपर का तबका तो हवाई यात्राओं और इससे अलग विकल्पों का सहारा लेकर साफ़ बच निकलता है । जहां तक इन आंदोलनों मे उठाए गए मुद्दों की बात है तो सबसे ज्यादा दुख की बात ये है कि कभी अशिक्षा , कुपोषण , रोजगार , भ्रष्टाचार , अपराध जैसे शाश्वत मुद्दों के विरोध में कभी ऐसे जनआंदोलनों को बढते नहीं देखा गया है । भारतीय जनमानस को अब ये देखना और महसूस करना होगा कि सडक पर जनता के उतर जाने की ताकत यदि मिस्र की जनता की तरह ब्रह्मास्त्र के रूप में और देश का भविष्य तय करने के लिए ही उपयोग में लाई जाए तो सार्थक साबित होगी । अब जनादोंलनों को ये भी सोचना होगा कि आज जब दुनिया विचारों की लडाई से ही सरकारों को नीतियां बनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं तो फ़िर ऐसे में यूं सडकों पटरियों पर लेट कर बैठ कर देश ,विश्व को कौन सा संदेश देना चाह रहा है और कैसा संदेश जा रहा है ? यही सोचने का समय है

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

निशाने पर हैं स्वयंसेवी संस्थाएं

राजधानी दिल्ली में हाल ही में ,बच्चों की खरीद फ़रोख्त की घटना में जिस तरह से एक स्वयंसेवी संस्था की लिप्त्ता जगजाहिर हुई है उसने एक बार फ़िर से देश भर में चल रही तमाम स्व्यंसेवी संस्थाओं को सवाल के घेरे में रख दिया है ॥ ऐसा नहीं है कि ऐसे किसी घृणित काम में किसी स्वयं सेवी संस्था का नाम पहली बार आया है । वर्तमान में जिस तरह के देश के सामाजिक , राजनीतिक , प्रशासनिक हालात हैं उसमें कोई भी तंत्र कोई भी व्यवस्था इस सर्व्यापी और सर्वग्राह्य बन चुके अपराध का हिस्सा न बनने देने से खुद को रोक नहीं पाया है । मगर सबसे अधिक अफ़सोस उन व्यवस्थाओं के लिए होता है जो समाज और उसकी सेवा के नाम पर या उसके इर्द गिर्द है । इनमें से एक बहुत बडी व्यवस्था है चिकित्सा और शिक्षा , बहुत ही दुखदायी बात ये है कि आज दोनों ही व्यवस्थाएं , लालच , और धनोपार्जन का पर्याय मात्र बन कर रह गई हैं ।
ब्लॉग से डोमेन की ओर अग्रसर हूं

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

खिलाडियों की उपेक्षा/अपमान ...देश का खेल चरित्र




यूं तो इस देश में खिलाडियों की उपेक्षा का अपना एक अलग ही खेल के समानांतर ही एक इतिहास है , मगर जब देश के खिलाडी सबको चौंकाते हुए राष्ट्रमंडल खेलों में या किसी बडे अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में पदकों से देश की शान बढाते हैं तो लगता है कि शायद इस बार के बाद से इस देश को , सरकार को और प्रशासन को इतनी तमीज आ जाए कि , संघर्षशील का न सही विजेताओं का ही और सम्मान न कर पाए तो न सही मगर इतना तो तय कर ही सके कि उनका अपमान न हो । ये अपमान हर बार पिछली बार से अधिक ज्यादा असहनीय सा लगता है न सिर्फ़ उन खिलाडियों को बल्कि आम जनता को भी ।

यदि ये कहा जाए कि पूरी दुनिया में हॉकी के जादूगर के नाम से विख्यात भारतीय खिलादी मेजर ध्यानचंद को भी सिर्फ़ खेल दिवस के बहाने घडी दो घडी याद करके बस औपचारिकता निभा ली जाती है तो कोई गलत नहीं होगा । जिस हॉकी टीम को ध्यानचंद और उनके समकालीनों ने अपनी मेहनत और श्रम से सींच कर बुलंदियों पर पहुंचाया था आज वो न सिर्फ़ अंदरुनी बल्कि बाहरी सियासी कूटनितिक लडाई का मैदान बना हुआ है । और अब फ़िर कभी उस समय को भारतीय हॉकी खिलाडी पा सकेंगे ये एक दिवास्वप्न ही लगता है । न सिर्फ़ ध्यान चंद बल्कि अपमानित होने वाली खिलाडियों की सूची में उडन परी पीटी उषा , ओलंपिक पदक विजेता पहलवान सुशील , और अब हाल ही में एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक विजेता धावक सुधा सिंह का नाम भी शामिल हो गया है । इस खिलाडी के साथ तो ये हुआ कि प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में जिसमें खुद सुधा सिंह को ही मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया था , उस प्रदेश के खेल मंत्री अयोध्या प्रसास पाल ने ही नहीं पहचाना .बल्कि प्रदेश स्तर के खेल उच्चाधिकारियों तक ने उनकी उपेक्षा की । इस घटना से वे इतनी व्यथित हुई कि उन्होंने फ़ैसला किया कि अब वे कभी उस प्रदेश से नहीं खेलेंगी , किंतु मंत्री और अधिकारी द्वारा खेद जताने पर वे मान गई हैं ॥इससे भी हालिया मामला ये हुआ है कि सानिया नेहवाल जो अभी विश्व की दो नंबर की बैडमिंटन खिलाडी हैं, आधिकारिक साईट पर उनके विषय में कोई सूचना ही नहीं अद्यतित की गई है । ये भी नहीं कि उन्हें हाल ही में खेल रत्न से नवाज गया है । ये सिलसिला अभी आगे भी बदस्तूर चलने की संभावना है ।

इन खबरों के अलावा खिलाडियों की दुर्दशा की और भी बहुत सारी खबरों में जो अक्सर सुनने को मिलती है वो ये कि खेलों में सक्रियता की कमी होते ही या फ़िर खेल के मैदान से हटते ही उन खिलाडियों और उनके परिवार की हालत भुखमरी से जूझने जैसी हो जाती है । यदि इन खबरों और खिलाडियों की ऐसी हालत के बाद भी देश के किसी कोने में कोई सायना , कोई सुधा , कोई उषा यदि अब भी जाने कितनी ही विपरीत परिस्थितियों में खेल के नाम पर अपना सर्वस्व झोंक रही है तो ये इस देश की खुशकिस्मती है और खिलाडियों की शायद बदकिस्मती ही बन जाएगी कभी न कभी ।
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