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गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

महंगी होती शिक्षा : दाखिले की मारामारी




चित्र गूगल खोज़ से , साभार



वर्षांत के दिन बेशक ही साल भर खोए पाए के आकलन और विश्लेषण के दिन होते हैं । किंतु इसके साथ ही राजधानी दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों में ये उन अभिभावकों की भाग दौड के दिन होते हैं । राजधानी दिल्ली के स्कूलो में तो नर्सरी के दाखिले की रेलमपेल कॉलेजों में व नामी संस्थानों में प्रवेश सरीखा ही कठिन जान पडता है । राष्ट्रीय
राजधानी क्षेत्र की जनसंख्या में बहुत तीव्र गति से वृद्धि हो रही है । हालांकि पिछले दो दशकों में विद्यालयीय शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक निजि विद्यालयों व संस्थानों के स्थापित होने की दर भी काफ़ी तीव्र रही है । बेशक सरकार व प्रशासन नए स्कूल कॉलेज खोलने , विशेषकर बढ रही जनसंख्या के अनुपात में , सर्वथा विफ़ल रहे । या फ़िर शायद जानबूझ कर ऐसी स्थिति उत्पन्न की गई वर्ना इसकी कोई ठोस वजह नहीं दिखाई देती कि सरकार निजि शिक्षण संस्थानों सब्सिडी दर पर भारी रियायत देकर जमीनों का आवंटन तो कर देती है मगर खुद वहां नए शिक्षण संस्थानों का निर्माण नहीं करती ।

ऐसा भी नहीं है कि देश में स्कूली शिक्षा के लिए कभी कुछ किया सोचा नहीं गया । शिक्षा वो भी नि:शुल्क शिक्षा को अधिकार के रूप में पाने के लिए बने कानूनों के अलावा नवोदय, सर्वोदय, केंद्रीय विद्यालय जैसी राष्ट्रीय योजनाओं पर भी काफ़ी काम किया गया । इसमें कोई संदेह नहीं कि शहरी आबादी के बाहर इन विद्यालयों की सफ़लता बेहद महत्वपूर्ण साबित हुईं । लेकिन इन सबके बावजूद ग्रामीण भारत में प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा ही बडे लक्ष्य बन कर रह गई है । उच्च शिक्षा की तो कल्पना ही बेमानी सी लगती है ।

इस तुलना में नगरीय क्षेत्र की गरीब व पिछडी आबादी के बच्चों की साक्षरता दर ज्यादा बेहतर है । हालांकि शायद ये तथ्य ही वास्तविकता को बताने के लिए पर्याप्त है कि राजधानी दिल्ली के सरकारी प्राथमैक -माध्यमिक विद्यालयों में से १८ प्रतिशत में पेयजल और शौच की तथा २७ प्रतिशत में बच्चों के लिए बैठने पढने की समुचित व्यवस्था नहीं है । इन सरकारी विद्यालयों की इस बदहाल स्थित के कारण ही आज इनमें सिर्फ़ अति निर्धन वर्ग के बच्चे पढने जाते हैं । इससे बडी विडंबना और क्या हो सकती है कि सरकारी विद्यालय होने के बावजूद सरकारी कर्मचारी तो दूर खुद इन विद्यालयों में पढाने वाले शिक्षक तक अपने बच्चों को इनमें नहीं पढाते हैं ।

राजधानी दिल्ली समेत अन्य स्थापित हो रहे महानगरों में आसपास के क्षेत्रों के लोगों के पलायन से शहरी आबादी का दबाव बढता ही गया । पिछले दो दशकों में शिक्षा क्षेत्र में निजि संस्थानों की भूमिका व विस्तार में गजब का विकास हुआ । वैश्विक जगत में हो रही शैक्षणिक क्रांतियों और ई युग के सूत्रपात ने भारतीय युवाओं को विश्व भर में खुद को स्थापित करने का मौका दिया । बच्चों ने वक्त के साथ अपने हाथ मिलाते हुए नए व्यावसायिक , गैर पारंपरिक और भविष्य की चुनौतियों से लडने वाले पाठ्यक्रमों को न सिर्फ़ अपनाया बल्कि बहुत जल्दी ही इसमें अपनी काबलियत भी साबित कर दी । किंतु ये भी तय है कि आज शहरों में शिक्षा की शैली , और उसका घओर व्यावसायिक रूख बच्चों को पढा बढा तो रहा है किंतु शिक्षित कर पा रहा है , इसके लिए सोचना होगा ।

राजधानी दिल्ली में फ़ैले और अब भी स्थापित हो रहे स्कूलों में नर्सरी दाखिले की प्रकिया शुरू हो चुकी है । रोज़ इस तरह की खबरें सामने आ रही हैं कि शिक्षा विभाग और अदालती निर्देशों व सख्त हिदायतों के बावजूद सभी विद्यालय , नई नई तरकीबों से न सिर्फ़ अभिभावकों को परेशान कर रहे हैं। ऐसा हर बार सिर्फ़ इसलिए किया जाता है ताकि अभिभावकों से एक मोटी धनराशि वसूली जा सके । स्कूल अपने यहां वातानुकूलित और गैरवातानुकूलित सुविधा का ढिंढोरा जिस तरह से पीटते हैं वही उनकी मंशा को स्पष्ट करने के लिए काफ़ी है । हालात सिर्फ़ इतने ही तक खराब नहीं हैं, रियायती दरों पर आवंटित ज़मीनों पर खुलने वाले स्कूलों में अनिवार्य रूप से बीस प्रतिशत गरीब बच्चों के दाखिले की शर्त को शायद ही कोई विद्यालय पूरा करता हो । दिल्ली में पैकेजनुमा होता , स्कूली दाखिला आने वाले समय में शहर की गरीब आबादी के लिए एक दु:स्वप्न बन कर रहे जाए तो कोई आश्वर्य नहीं ।



सोमवार, 21 जून 2010

आम आदमी के पहुंच से दूर होती उच्च शिक्षा


आजकल कालेजों में दाखिले की मारामारी है । शहरों में विशेषकर मेट्रो और राजधानी में तो ये मारामारी अपने चरम पर होती है । कहने को तो परीक्षाओं से पहले बहुत से सलाह केंद्र और सहायता केंद्र पर सलाह देते और ढांढस बंधाते काऊंसलर न सिर्फ़ विद्यार्थियों बल्कि उनके अभिभावकों को भी कम नंबर आने या फ़िर कि शीर्ष वरीयता सूची में नाम न आने आदि को लेकर किसी भी तरह से परेशान न होने की हिदायत देते रहते हैं । किंतु हकीकतन जब परीक्षा परिणामों के बाद दाखिले की दौड शुरू होती है तब एक बार फ़िर से उन्हीं नंबरों की अहमियत , वही कट लिस्ट आदि का झंझट आदि से विधार्थी का सामना होता है । और विभिन्न कालेजों , संस्थानों में दाखिला मिलने /न मिल पाने की ऊहापोह में एक बार फ़िर से अभिभावकों की नाराजगी , उनकी मजबूरी का ताना सुनना पडता है ।

यहां कुछ तथ्य ऐसे हैं जो न सिर्फ़ हैरान कर देते हैं बल्कि अफ़सोस करने लायक लगते हैं । पिछले सिर्फ़ दो दशकों में व्यावसायिक परिसरों , मल्टीप्लेक्सों , शौपिंग मौलों , म्युजिक प्लैनेट , बडे पब तथा रेस्त्रां आदि की संख्या में तकरीबन ७८ प्रतिशत की वृद्धि हुई है । जबकि इसके विपरीत शिक्षण संस्थानों , विशेषकर सरकारी कालेजों की संख्या में सिर्फ़ १९ प्रतिशत की । इसी बात से पता चल जाता है कि सरकार शिक्षा के प्रति कितनी गंभीर है । ऐसी हालत में जहां इन कालेज प्रशासनों द्वारा दाखिले के नाम पर , विभिन्न कोटे की सीटों का आरक्षण , तो और भी कई तरीकों से जम कर भ्रष्टाचार और उगाही की जाती है । वहीं बहुत से इच्छुक विद्यार्थी कालेजों में दाखिला न ले पाने के कारण टूटे हुए मन से कोई और दिशा पकड लेते हैं या बेमन से अन्य कोर्सों में दाखिला लेते हैं ।

इससे जुडी और शायद उससे भी ज्यादा गंभीर समस्या है इस शिक्षा का दिनानुदिन बहुत अधिक मंहगा होते जाना । मोटे तौर पर यदि सिर्फ़ ये कहा जाए कि उच्च शिक्षा में आज कोई भी कोर्स ऐसा नहीं है जहां पर किफ़ायती दरों पर भी अभिभावक अपने बच्चों को पांच दस लाख से कम शिक्षण शुल्क दे कर पढा सकें । अब तो स्थिति ऐसी हो गई है कि इस वास्तविकता को सभी मन ही मन स्वीकार भी चुके हैं , इसलिए बच्चों के हायर सेकेंड्री में पहुंचते ही वे अपनी बचत राशि और जमा पूंजी टटोलने लगते हैं , बैकों के चक्कर काटने लगते हैं जहां से उन्हें शिक्षा लोन मिलने की गुंजाईश हो । सरकार यदि कभी इन सब पर अपना पक्ष रखती है तो स्पष्ट कह देती है कि शुल्क में वृद्धि तो स्वाभाविक है और सरकार यदि संस्थानों की संख्या बढ भी दे तो भी शुल्क में बहुत अधिक अंतर नहीं पडने वाला है ।

अब इसका एक प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष परिणाम ये होता है कि इन सभी बडे बडे संस्थानों में सिर्फ़ आर्थिक रूप से सक्षम माता पिता के बच्चे ही पढ पाते हैं और फ़िर जब ऐसे बच्चे डिग्रियां लेकर उन संस्थानों से बाहर निकलते हैं तो उनका पहला और आखिरी ध्येय सिर्फ़ और सिर्फ़ पैसा, रुतबा , शोहरत बनाना ही होता है । उन्हें क्या मतलब देश से समाज से उसके विकास से । यही वो कारण हैं जो बच्चों को देश से बाहर जाने को प्रेरित करता है ,यही वो कारण है जो बच्चों को रोकता है कि वे अपने देश में रह कर शोध और अविष्कारों में अपना समय बर्बाद करें । ये सब एक ऐसी समस्या बन चुकी है जिसे जानबूझ कर बने रहने दिया जा रहा है , क्योंकि ये उनके लिए एक सुविधा की तरह है जो देश का चमचमाता वर्ग है । लेकिन आने वाले समय में ये वर्ग द्वेष आगे बढ कर यदि गृह युद्ध का रूप ले ले और देश का एक बडा युवा वर्ग सही शिक्षा के अभाव में हतोत्साहित होकर दिशाहीन हो जाए तो इसके लिए समाज और देश को तैयार ही रखना चाहिए खुद को ।
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