रविवार, 24 जून 2012

माही की मौत से उठे सवाल










चार दिन की अथक परिश्रम और जीतोड कोशिश के बावजूद , पूरे देश की दुआओं और किसी चमत्कार की आशा के विपरीत आखिरकार जब नन्हीं माही को गहरे बोरवेल से बाहर निकाला गया तो उसकी मौत हो चुकी थी । बुधवार को  अपने जन्मदिन के बाद घर से बाहर निकली चार वर्षीय माही अचानक ही एक खुले हुए बोरवेल के गहरे गड्ढे में जा गिरी जो उसके लिए मौत का मुंह साबित हो गया ।

बोरवेल के गहरे गड्ढे में किसी बच्चे के गिरने की पहली घटना जिसने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा या कहें कि मीडिया कवरेज के कारण सबका ध्यान उस ओर चला गया वो था प्रिंस नामक एक बच्चे का गिरना । उस समय से लेकर हालिया दुर्घटना तक जाने कितनी बार कितने बच्चे बडे ऐसी दुर्घटनाओं के शिकार होते रहे हैं , और शायद आगे भी ये सिलसिला चलता रहेगा ।

भारत में अभी तक  दुर्घटनाओं से सबक सीखने और भविष्य में उनसे बचाव की कोई परंपरा नहीं बनी है । और तो और ऐसी लापरवाहियों को सरकार , प्रशासन व पुलिस तक गंभीर अपराध तो दूर , मामूली अपराध तक के नज़रिए से नहीं देखती है । हर बार की तरह इस बार भी कुछ दिनों तक खूब शोर शराबा होगा । मुआवजा , दिए जाने की घोषणा, प्रशासन की लापरवाही की बातें , दोषियों के खिलाफ़ कार्यवाही का आश्वासन और फ़िर भविष्य में ऐसा न होने देने की कोरी बयानबाजी करके मामले की इतिश्री कर ली जाएगी । इसके बाद फ़िर किसी प्रिंस किसी माही के बोरवेल में गिरने तक कहीं कुछ भी होता दिखता नहीं मिलेगा , ये अब इस देश की नियति बन चुकी है ।

माही की मौत ने इस बार कई सवाल छोड दिए हैं अपने पीछे जिनका उत्तर तलाशा जाना और प्रशासन के सामने उन्हें रखा जाना बेहद जरूरी है ।

१.  किसी पॉश इलाके/वीआईपी/वीवीआईपी क्षेत्र में इस तरह की लापरवाही भरी घटना क्यों नहीं देखने सुनने को मिलती । आखिर वहां के सारे सुरक्षा इंतज़ाम क्यों और कैसे पुख्ता होते हैं । ऐसी लापरवाही /ऐसी भूलें और ऐसी दुर्घटनाएं सिर्फ़ सामान्य क्षेत्रों में ही क्यों घटित होती हैं ? कहीं इसलिए तो नहीं कि प्रशासन सरकार के लिए उनकी कोई वरीयरता नहीं ?

२. अब तक कितने व्यक्तियों को बोरवेल , सडकों पर गड्ढे , मेनहोल के ढक्कन आदि खुले रखने के लिए दोषी ठहरा के कठोर सज़ा दी गई है ? सज़ा क्या कितनों के खिलाफ़ प्राथमिकी दर्ज़ करके उन पर मुकदमा चलाया गया है ? इन दुर्घटनाओं वाले मामलों से इतर इस तरह की कितनी शिकायतों पर सरकार , प्रशासन और पुलिस ने कार्यवाहियां की हैं और क्या की हैं ?

३. माही, प्रिंस जैसे बच्चे या अन्य पीडित यदि बडे रसूखदार मंत्रियों , उद्योगपतियों , अभिनेताओं , खिलाडियों के घर के होते , तब भी क्या प्रशासन मदद करने में इतनी कोताही , इतना ही विलंब करता या तब ये काम युद्ध स्तर पर होता शायद , यानि आम आदमी का जीवन सरकार , प्रशासन के लिए कोई मोल नहीं रखता । वो तो धन्य है हमारी सेना और उनका ज़ज़्बा जो हर बार मौत के मुंह में जाकर पीडितों को बचाने के लिए अपनी जान की बाज़ी लगा देते हैं ।

४. सबसे जरूरी और ध्यान देने योग्य बात ये कि क्या भारत के अलावा अन्य देशों में भी ऐसी दुर्घटनाओं में पीडितों को बचाने के लिए यही विलंबकारी उपाय अपनाए जाते हैं । यदि नहीं तो आखिर क्या वजह है कि भारत आज तक ऐसी दुर्घटनाओं . आपदा के लिए आधुनिक तकनीक व उन्नत मशीनों , नए उपकरणों से लैस नहीं हो सका है ? इस देश में जब करोडों अरबों रुपए घपले घोटाले के लिए उपलब्ध है तो फ़िर जीवन रक्षक मशीनों उपकरणों के लिए क्यों नहीं ?

५. एक गौरतलब बात ये कि हालिया घटना में बच्ची को बचाने के लिए खोदे गए गहरे गड्ढों और सुरंगों का असर उस रिहायशी क्षेत्र और वहां निर्मित भवनों , मकानों पर क्या पडेगा , क्या इस ओर किसी का ध्यान गया , क्या इस दिशा में कुछ किया गया ?

और भी ऐसे जाने कितने ही प्रश्न छोड गया है उस चार वर्षीय बच्ची की मौत जो सरकार प्रशासन और खुद को भविष्य का महाशक्तिशाली , सुपर पावर बनने का दंभ भरने वाले देश के सामने । अब बात आम जनता की । देखा गया है कि ऐसे तमाम दुर्घटनाओं जिनमें पीडित बच्चे होते हैं अक्सर उनमें एक बडा कारण होता है माता पिता और अभिभावकों की लापरवाही , समस्या को नज़रअंदाज़ करने की प्रवृत्ति । सरकार , प्रशासन , पुलिस का रवैय्या आम लोगों के प्रति कैसा और क्या है अब ये बात किसी से छुपी नहीं है इसलिए अब आम आदमी के लिए ये बहुत जरूरी हो जाता है कि वो चुप न बैठे ।



असल में होने ये चाहिए कि अपने बच्चों और खुद के प्रति लापरवाही की हर संभावना को खत्म करने का प्रयास करना चाहिए । इसके अलावा इससे भी जरूरी बात ये है कि देश के हर नागरिक को समस्याओं के प्रति , विशेषकर ऐसी अपेक्षित दुर्घटनाओं के प्रति बेहद सजग और सचेत होना चाहिए । इसके लिए सबसे पहला कार्य होना चाहिए इन तमाम गड्ढों , खुले बोरवेलों , मेनहोलों की शिकायत और बाकायदा पुलिस से शिकायत की जानी चाहिए , जरूरत पडे तो सीधा प्राथमिकी दर्ज़ करवाना चाहिए । मीडिया और संचार माध्यमों को भी इसमें आम लोगों का साथ देना चाहिए । प्रशासन को इस बात के लिए मजबूर किया जाना चाहिए कि वो न सिर्फ़ उन समस्याओं पर ध्यान देकर जरूरी कार्यवाही करे बल्कि दोषियों पर भी सख्ती से कारवाई की जाए । ये ध्यान रखा जाना बहुत जरूरी है कि आम आदमी खुद पहले अपनी मदद करे तो ही बात बन सकती है और शायद ऐसी दुर्घटनाओं में अपने बच्चों को लील जाने से बचाया जा सकता है ।


मंगलवार, 19 जून 2012

आस्था का बाज़ार






इस देश में धर्म का अस्तित्व तब से है जब से देश की सभ्यता और समाज का अस्तित्व है । इससे भी अधिक ये तथ्य गौरतलब है कि विश्व का सबसे पुराना धर्म और विश्व के सबसे ज्यादा धर्मावलंबियों को पोषित करने का श्रेय भी भारत को ही जाता है । शायद यही कारण था कि स्वतंत्रता के बाद संविधान निर्माताओं ने देश के चरित्र को धर्मनिरपेक्ष रखने का हर संभव प्रयास किया । हालांकि यही धर्मनिरपेक्ष चरित्र कालांतर में राजनेताओं द्वारा धर्म के राजनीतिकरण और धार्मिक भावनाओं का वोट बैंक के रूप में उपयोग का बायस बना ।  इनसे अलग देश में धर्म , आस्था को बाज़ार और व्यापार की तरह परिवर्तित करने में भी कोई कोर कसर नहीं छोडी गई ।


 इस स्थिति की गंभीरता को समझने के लिए सिर्फ़ दो तथ्यों पर गौर करना बहुत जरूरी है । देश में आज धर्मस्थलों की संख्या , शिक्षण संस्थानों व चिकित्सा संस्थानों की संख्या से कई गुना ज्यादा है । न सिर्फ़ इतना ही नहीं , देश की अर्थव्यवस्था का एक बडा भाग कहीं न कहीं इस आस्था के बाज़ार से जुडा हुआ है या कहें कि इसके पीछे ही छुपा/दबा हुआ है । परंपरावादी धार्मिक मान्यताओं , धार्मिक उत्सवों , धर्म स्थलों आदि को दरकिनार करते हुए पिछले कुछ वर्षोम में नए -नए धर्म गुरूओं , महंतों , बाबाओं , साधु साध्वियों ने ईश्वरीय सत्ता के समानांतर या ईश प्राप्ति के स्वघोषित मार्ग बन कर इस आस्था के बाज़ार को अधोगति की पराकाष्ठा पर पहुंचा दिया ।

ये सर्वविदित है कि इस देस के आम लोग धर्म के मामले में न सिर्फ़ अति संवेदनशील हैं बल्कि लगभग धर्मांध की तरह व्यवहार करते हैं । यही वजह है कि कभी ईश प्रतिमाओं द्वारा दूध पीने की तो कभी दीवार ,पेड , और धुएं तक में किसी देवी-देवता की आकृति देखे जाने के अफ़वाहनुमे दावे के पीछे एक जुनून सा देखने को मिलता रहा है । आम लोगों की इसी सहिष्णुता व मासूमियत का फ़ायदा उठाते हुए इन तथाकथित धर्मगुरूओं ने अपने अपने तरीकों व हथकंडों से न सिर्फ़ आम जनमानस की धार्मिक भावनाओं से खेला बल्कि उनसे दान , सहयोग राशि  और कई अन्य बहानों से उनके खून पसीने की कमाई का एक हिस्सा भी हडप जाते हैं ।


इस समस्या का अध्ययन करने वालों ने एक दिलचस्प कारण भी ढूंढा । आधुनिक युग में आम आदमी का जीवन और दिशा आवश्यकता की पूर्ति से विलासिता एवं सुख सुविधा की ओर मुड गया । उच्च जीवन स्तर की प्राप्ति और सब कुछ जल्दी से जल्दी पा लेने की प्रवृत्ति ने सामाजिक जीवन को घोर प्रतिस्पर्धी बना दिया । लोगों के लिए नैतिकता श्रम , आदि के मायने पूरी तरह से बदलने लगे । किंतु इसके साथ-साथ एक आत्मग्लानि और पापबोध की भावना से भी ग्रस्त जनमानस ने इसकी भरपाई या प्रायश्चित स्वरूप धर्म , धार्मिक क्रियाकलापों की ओर रुख किया ।


इसी दुविधापूर्न स्थिति का पूरा फ़ायदा उठाते हुए आस्था के कारोबारियों ने किसी को जीवन की दौड में शार्टकट सफ़लता दिलाने के नाम अप्र तो किसी सफ़ल को उसके पापबोध का एहसास करवा कर दान, सहयोग, आदि के बहाने अपनी दुकान चमकाए रखी । इसका परिणाम ये हुआ कि देश में आज पारंपरिक धर्मों से परे लगभग उतने ही पाखंड और प्रपंचनुमा धार्मिक आडंबरों की एक बडी दुनिया रच डाली गई है ।


एक तथाकथित कृपानिधान बने बाबा जो खुद में किसी तीसरे नेत्र जैसी चमत्कारिक शक्ति आने का दावा करके लोगों पर कृपा बरसाने का ऐसा कार्यक्रम पिछले कुछ समय से करते चले आ रहे थे जिसके बदले में कृपा पाने के इच्छुक आम लोगों से अच्छी खासी धनराशि वसूल की जा रही थी । हाल ही में जब इनके खिलाफ़ लोगों को गुमराह करने व अंधविश्वास फ़ैलाए जाने का आरोप लगा कर मुकदमा दर्ज़ किया गया तो ये कृपा बरसनी बंद हो गई ‘। इनके साथ ही एक महिला जो खुद को देवी रूप में स्थापित करने करवाने के प्रयास में चर्चित हुईं ने उसी प्रवृत्ति को पुख्ता करने की कोशिश की है जिसमें आजकल बहुत कम उम्र अनुभव वाले भी खुद को दैवीय कृपा प्राप्त बताने मानने में लगे हुए । प[रवचन , सत्संग ,समागम , मिलन आदि का आयोजन इस तरह से किया कराया जा रहा है मानो बाज़ार /हाट लगाकर ईश्वरीय कृपा को बेचा जा रहा हो ।


इस संदर्भ में एक तथ्य यह भी है गौरतलब है कि धर्म और आस्था के इन तथाकथित व्यावसायियों ने अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा भी दबा रखा है । हैरानी की बात ये है कि ये सब कुछ खुलेआम चल रहा है और जब तक कोई शिकायत न की जाए कोई कार्यवाही नहीं होती । अब समय आ गया है कि विज्ञान और तकनीक के इस युग में आस्था ,धर्म , धार्मिक मान्यताओं को ढोंग और आडंबर से जरूर ही अलग कर दिया जाए । न सिर्फ़ ये बल्कि तेज़ी से बढते धर्मस्थलों पर अंकुश लगा कर उनकी जगह पर अस्पताल , सकूल एवं अन्य आवश्यक संस्थानों का निर्माण किया जाना चाहिए ।


आज विश्व की नज़र भारत पर है । कोई इसे भविष्य की महाशक्ति के रूप में  देख रहा है तो कोई इसे सबसे बडी अर्थव्यवस्था के रूप में  ऐसे में ये बहुत जरूरी हो जाता है कि कम से कम ये सुनिश्चित किया जाए कि ऐसे धर्म/आस्था के कारोबारियों से पूरी सख्ती से निबटते हुए इन्हें बिल्कुल खत्म कर दिया जाए ।

रविवार, 6 मई 2012

सत्यमेव जयते - बात मुद्दे की








पिछले कुछ दिनों से समाचार माध्यमों में , विशेषकर मनोरंजन जगत में जो सबसे बडी खबर दस्तक दे रही थी तो थी सिने जगत में अपने प्रयोगों , कल्पना और कमाल की क्रियेटिविटी से ऑस्कर तक धमक पहुंचाने वाले आमिर खान का शो -सत्यमेव जयते । एक आम दर्शक के रूप में लोगों को जब ये पता चला कि लगभग दस चैनलों के अलावा ये एकमात्र राष्ट्रीय चैनल जिसे शायद शहरों में भुला भी दिया गया है , उस डीडी वन यानि दूरदर्शन पर भी प्रसारित होगा , तो वो समझ गए कि आमिर सिने व्यवसाय में भी पारंगत यूं ही नहीं कहलाते ।

बेशक एक दशक पहले महाभारत और रामायण सरीखे धारावाहिकों ने उन घंटों में लोगों को टीवी तक समेट दिया था किंतु उसके बाद कौन बनेगा करोडपति ही वो कार्यक्रम रहा जिसे अपने घर में म्यूट करके भी देखा जा सकता था क्योंकि साथ वाले घर से भी उसी कार्यक्रम की आवाज़ आ रही होती थी । बहुत अर्से बाद कोई ऐसा कार्यक्रम लोगों के सामने आ रहा था जिसके लिए लोगों में पहले से उत्सुकता थी ।

आखिरकार उसका पहला भाग प्रसारित हुआ । आमिर ने शुरूआत की तो लगा कि नहीं ये वैसा नहीं है कि जिसके लिए कहा जा सके कि पहले कभी देखा सुना नहीं ऐसा कार्यक्रम । वे दो आज की संघर्षशील मांओं से मिलवाते हैं जो इस बात की जीती जागती मिसाल हैं कि बेशक देश की आईएएस टॉपर युवतियां , महिलाएं ही क्यों न होती रहें , समाज की सोच और रवैया अब भी वही है । लेकिन ये तो सिर्फ़ शुरूअत भर थी , प्रस्तावना जैसी । इसके बाद आमिर मुद्दे पर आते हैं यानि - कन्या भ्रूण हत्या ।




 बाज़ार के सभी फ़ंडों-हथकंडों से परे महत्वपूर्ण बात ये रही कि यदि आज कार्यक्रम मुद्दों पर और सामाजिक सरोकारों व समस्याओं पर आधारित होने के बावजूद भी इतना रिस्पॉस पा जाए तो यकीनन ये अलग और बडी बात तो है ही । समस्या , पीडितों , आरोपियों , खबरनवीसों से सीधा सीधा रूबरू करवाते हुए कन्या भ्रूण हत्या से जुडे हर मुद्दे को टटोला और खंगाला गया । कई लोगों के लिए बहुत सी नई बातें भी थीं , मसलन जाने अनजाने आज अपराध बन चुके इस कृत्य के लिए सरकार की भी कोई न कोई नीति जिम्मेदार थी । कार्यक्रम ने ये भी बखूबी  दिखा दिया कि स्टिंग ऑपरेशन करके अपराधों का पर्दाफ़ाश होने के बाद भी स्थितियां क्यों नहीं बदलती ।


ऐसी लडाई का तरीका और उससे बदला हुआ परिणाम दिखाकर ये भी भलीभांति जता बता दिया गया कि सिर्फ़ समस्या समाधान पर बहस विमर्श करके छोडा नहीं गया है बल्कि ये कारगर है , ऐसा प्रमाणित हुआ है । आमिर ने  दोषी आरोपियों के अपराध और सज़ा के निर्धारण का फ़ैसला न्यायपालिका पर छोडते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री को एक प्रशासनिक उपाय , कन्या भ्रूण हत्या अपराध के तमाम मुकदमों के त्वरित निस्तारण के लिए एक नए फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की गुजारिश करने के लिए एक पत्र लिखने की पहल करने की बात कही ।


ये तो अब तय है कि चाहे अलग अलग कारणों से ही सही देश का समाज अभी सक्रियता और सजगता के लिहाज़ से स्विच ऑन मोड पर है । विज्ञापन , साहित्य-सिनेमा , राजनीति और समाज तक में इन मुद्दों का दखल बढा है । ऐसे में यदि आमिर ने पूरी तैयारी और अनुभव के साथ आम जन का मुद्दा समझा समझाया और सबके सामने रखा और आम जनता पर इसका ज़रा सा भी प्रभाव पडता है तो ये यकीनन ही एक बडी सफ़लता कही जाएगी ।

इस कार्यक्रम का प्रस्तुतिकरण व रफ़्तार बिल्कुल अनुकूल रहे और अगले अंक से पहले ये तय हो जाएगा कि "सत्यमेव जयते " का प्रभाव कितना पडेगा और किन पर पडेगा । राजस्थान के आरोपी चिकित्सकों के लिए तो ये परेशानी का सबब बन ही चुका होगा । मेज़बान के रूप में जब आमिर आम दर्शकों से इस मुद्दे से जुडने का आग्रह करते हैं तो उन्हें पते व प्रतिक्रिया देने के अन्य विकल्पों को थोडा ज्यादा समय देकर दर्शकों को बताना चाहिए ।




गुरुवार, 26 जनवरी 2012

विकास के लिए तत्पर होता बिहार





देश के सबसे बीमार , पिछडे , अविकसित राज्य की फ़ेहरिस्त में सबसे पहला नाम बिहार का ही आता है । यही नहीं देश के सुदूर उत्तर पूर्वी राज्यों से लेकर राजधानी दिल्ली , मुंबई ,पंजाब और गुजरात के अलावा बंग्लौर जैसे आईटी हब बने शहरों में बिहार से पलायन करके पहुंचे लोगों की संख्या इतनी अधिक है कि अब उन्हें स्थानीय राजनीति का विरोध और हिंसा तक का सामना करना पड रहा है । पिछले डेढ दशकों में , यानि कि वर्तमान सरकार से पहले की सरकारों ने अधोगति की ओर अग्रसर बिहार को पत्तन के गर्त में पहुंचा दिया । इस दौरान न सिर्फ़ शिक्षा ,रोज़गार ,परिवहन और उद्दोग सहित राज्य की सभी मूलभूत व्यवस्थाएं न सिर्फ़ चरमराई व राजकोष की स्थिति ऐसी कर दी सरकारी कर्मचारियों व राज्य के शिक्षकों को वेतन देने में भी सरकार को कठिनाई होने लगी । अपराध व भ्रष्टाचार का ऐसी जोड बन गया जिसने राज्य के आर्थिक ढांचे को बिल्कुल ढहा दिया ।

वर्तमान मुख्यमंत्री ने जब राज्य का जिम्मा संभाला तब सबने परिवर्तन की उम्मीद करने के बावजूद किसी बडे बदलाव की उम्मीद नहीं की थी । नई सरकार ने राज्य के विकास को दोबारा पटरी पर लाने के लिए पूरी प्रतिबद्धता से कार्य शुरू किया । सबसे पहले सडक परिवहन को दुरूस्त करने के लिए राष्ट्रीय राजमार्गों व राजकीय मार्गों के निर्माण , विस्तार एवं मरम्मत का काम  पूरे जोर शोर से शुरू किया गया । बहुत जल्दी ही इसका परिणाम भी स्पष्ट दिखने लगा । लगातार आ रहे बाढ ने सडकों की हालत बिल्कुल खस्ता व जर्जर कर दी थी , जिनका जीर्णोधार करके राज्य के सभी छोटे बडे शहरों को मिलाने का काम किया गया । इन सडकों के निर्माण में तमाम तरह के भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए न सिर्फ़ उनकी निगरानी की गई बल्कि अभी हाल ही में राज्य सरकार ने उन तमाम ठेकेदारों की पहचान की है जिन्होंने जानबूझ कर सडक निर्माण के कार्य में देरी की है , प्रशासन उनके खिलाफ़ प्राथमिकी दर्ज़ कराने की तैयारी में है ।

राज्य के विकास में अपराध व परिवहन व्यवस्था के बाद सबसे बडी बाधा थी प्रशासकीय भ्रष्टाचार । इससे निपटने के लिए सरकार ने कई अभूतपूर्व कार्य किए । राज्य में पहली बार एक निश्चित समय में किसी भी कार्य को करने कराने के लिए राईट टू सर्विस बिल को लागू कर दिया ।  भ्रष्टाचार पर अध्य्यन करने वाली एजेंसियों ने बताया कि आम आदमी को अपने छोटे-छोटे काम समय पर करवाने के लिए रिश्वत देनी पडती है । सरकारी दफ़्तर व कर्मचारियों का टालू रवैय्या आम आदमी को जरूरत के समय काम न करने होने के कारण रिश्वत व भ्रष्टाचार की गुंजाईश को बनाए रखता है । आम आदमी का काम , कम से कम और एक नियत समय तक हो जाने को सुनिश्चित कराने वाले इस कानून को लागू करने से प्रशासनिक भ्रष्टाचार की एक गुंजाईश को रोक दिया गया ।

देश में भ्रष्टाचार उन्मूलन के संदर्भ में एक चौंकाने वाला तथ्य ये है कि बडे बडे आर्थिक घपलों घोटालों के उजागर होने और आरोपियों/दोषियों की पहचान हो जाने के बावजूद सरकार , प्रशासन व कानून तक उनसे गबन के पैसे की उगागी नहीं कर पाते । ऐसे में अभी हाल ही में सरकार ने एक भ्रष्ट अधिकारी के महंगे आलीशान आवास को कब्जे में लेकर उसमें स्कूल खोल कर एक नई नज़ीर पेश कर दी ।  यदि सूत्रों की मानें तो सरकार ने बहुत सारे ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों की पहचान कर ली है जिनकी नामी/बेनामी संपत्तियों को ज़ब्त करने की योजना है ।

हालांकि बहुत से मोर्चों पर सरकार सही दिशा में चलते हुए आशातीत सफ़लता हासिल कर रही है । लोगों का विश्वास भी बढा है , किंतु कुछ बहुत अहम मुद्दों पर बेहद गंभीरता से अभी बहुत कुछ किया जाना बांकी है । इनमें शिक्षा, ग्रामोद्योग , औद्यौगीकरण एवं चिकित्सा आदि क्षेत्रों में स्थिति न सिर्फ़ चिंताजनक बल्कि भयावह है । राज्य के प्राथमिक , माध्यमिक व उच्च उद्यालयों के साथ ही महाविद्यालय व विश्वविद्यालय तक धन व श्रम की कमी , संसाधनों का अभाव झेलने को अभिशप्त हैं । हालात का अंदाज़ा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों शिक्षकों के बकाए वेतन के बदले सरकारी गोदामों में पडे अनाज को देने की पेशकश की गई थी । और तो और लगभग ४७ प्रतिशत शिक्षा संस्थानों में पेयजल व शौचालय की व्यवस्था दुरूस्त नहीं पाई गई। उच्च एवं उच्चतर शिक्षा , व्यावसायिक शिक्षा आदि के लिए तो गिनती के लिए भी शिक्षण संस्थान उपलब्ध नहीं हैं यही कारण है कि प्रतिवर्ष लाखों मेधावी छात्र शिक्षा और कैरियर के कारण राज्य से पलायन कर जाते हैं ।

कभी खादी ग्रामोद्योग , मखाना उद्योग , जूट उद्दोग सहित तमाम लघु व कुटीर उद्योगों की स्थिति मरणासन्न अवस्था को प्राप्त हो चुकी हैं । प्रशासन की उदासीनता और बाज़ार की कमी ने मानो इन्हें हाशिए पर धकेल कर विस्मृत कर दिया । कभी चीनी उद्योग, कागज़ उद्योग, जूट उद्योग सूत व धागा उद्योग आदि में अग्रणी  स्थान पाने वाले राज्य की आज एक एक औद्योगिक ईकाई बंद पडी अपने जीर्णोद्धार का बाट जोह रही हैं । इन औद्योगिक संस्थानों में लगी लाखों करोडों की मशीनें भी अब पूरी तरह से खराब हो चुकी हैं । हालांकि राज्य सरकार इस दिशा में देश के बडे औद्योगिक घरानों व अन्य व्यावसायिओं को राज्य में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु कई प्रयास कर रही है , किंतु उसका सार्थक परिनाम अब तक निकल कर सामने नहीं आया है । इस बीच सुधा डेयरी व दुग्ध उत्पाद उद्दोग एवं मैथिली-भोजपुरी फ़िल्मोद्योग ने पिछले दिनों खुद को नए सिर से स्थापित करके एक आस जरूर जगाई है ।

चिकित्सा और कृषि व्यवस्था की स्थिति भी बेहद खराब है । झारखंड के अलग होने के नुकसान के अलावा पिछले सालों से बिहार में लगातार आ रही बाढ और किसानों पर बढते कर्ज़ आदि ने कृषकों को हतोत्साहित कर कृषि मजदूरों में बदल कर रख दिया है । यहां एक सकारात्मक तथ्य ये सामने आया है कि मुजफ़्फ़रपुर स्थित कृषि अनुसंधान की पहल पर पारंपरिक खेती से अलग जाकर कृषकों ने कई वनस्पतियों , सब्जियों और औषधियों की खेती शुरू कर दी है । आम , लीची , केले जैसे फ़लों के बगीचों को व्यावसायिक उद्देश्य से तैयार किया जा रहा है ।


बिहार में जितनी बुरी हालत शिक्षा व्यवस्था की है उससे भी ज्यादा खराब स्थिति राज्य की चिकित्सा व्यवस्था की है । पूरे राज्य में कोई भी सरकारी या निजि अस्पताल ऐसा नहीं है जो राज्य के बीमारों को उच्चतम चिकित्सा सुविधा मुहैय्या करा सके । कुछ वर्ष पहले केंद्र सरकार ने एम्स के स्तर के छ चिकित्सा संस्थानों एवं अस्पताल को खोलने की योजना बनाई थी जिसमें से एक बिहार के पटना में संभावित था । ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पतालों , डिस्पेंसरियों के साथ साथ चिकित्सकों की भी घोर कमी है । ऊपर से नीम हकीमों का प्रभाव और नकली दवाइयों का फ़ैलता कारोबार स्थिति को और भी अधिक नारकीय बना रहा है ।


जो भी हो इतना तो तय है कि आज बिहार बदल रहा है , बिहार विकास की ओर अग्रसर है । सबसे जरूरी बात ये है कि अब भविष्य में चाहे कोई भी शासक या सरकार आए , इस विकास को और धीरे-धीरे बहुत मुश्किल बने इस सकारात्मक माहौल को बनाए रखा जाए । उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में बिहार अपनी गरिमा और विकास को थाम ही लेगा । 

रविवार, 22 जनवरी 2012

क्या कभी मिटेगी गरीबी






अभी हाल ही में आई दो खबरों ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा । पहली ये कि एक गरीब व्यक्ति जिसे उसकी पत्नी को जच्चगी के लिए अस्पताल में दाखिला नहीं मिला ने पूरी रात सडक पर अपनी मृत पत्नी व बच्चे की लाश के साथ बिताई । दूसरी ये कि न्यायपालिका ने राजधानी दिल्ली में सरकार व निगम द्वारा एक रात्रि विश्राम स्थल रैन बसेरे को गिरा दिए जाने पर अदालत के सामने पहुंच मामले में सरकार व निगम द्वारा एक रात्रि विश्राम स्थल रैन बसेरे को गिरा दिए जाने पर अदालत के सामने पहुंचे मामले में सरकार को लगभग चेतावनी देते ऐसा दोबारा नहीं होने को सुनिश्चित करने को कहा है । ऐसा भी नहीं है देश में भूख-गरीबी, ठंड  से लोगों के मरने की ये कोई नई घटना हो । उलटा अब तो ये एक नियति सी बन गई है ।


आज भी ग्रामीण क्षेत्र की उन्नीस प्रतिशत आबादी ,भूख , कुपोषण , बीमारी व अन्य प्राकृतिक आपदाओं के कारण समय से पहले काल का ग्रास बन जाते हैं । सामाजिक विकास के असंतुलन की इससे बडी विडंबना और क्या हो सकती है कि  जो देश खुद को विश्व महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर मान व बता रहा है उस देश में अब भी रोज़ हज़ारों लोग भूख , गरीबी और यहां तक कि ठंड तक से अपनी जान गंवाने को मजबूर हैं । इनमें से बहुत सारी मौतें तो सरकार प्रशासन की गिनती में ही नहीं आते हैं ।

सबसे बडे दुख की बात ये है कि जिन्हें सरकारी सहायता की आवश्यकता सबसे ज्यादा होती है उन्हीं के प्रति सरकार सबसे ज्यादा उदासीन और संवेदनहीन है । हालात की गंभीरता का अंदाज़ा दो दशक पहले प्रधानमंत्री तक ने ये माना था कि यदि सरकार गरीब के लिए सौ रुपया खर्च करती है तो वास्तव में उस गरीब तक मात्र दो रुपए ही पहुंचते हैं । आज दो दशकों के बाद बेशक ग्रामीण क्षेत्रों में मोबाइल के टॉवर आ गए हों किंतु भूख, गरीबी ,कुपोषण ,अशिक्षा आदि की स्थित वही है ।

देश में गरीबी के नहीं खत्म होने का एक बडा कारण सिर्फ़ गरीबों के लिए , उनके नाम पर चलाई जाने वाली सैकडों योजनाओं में घपले -घोटाले की असीम संभावना होना ही है । यदि देश से गरीब खत्म हो जाएं गरीबी खत्म हो जाए तो आर्थिक कदाचार की एक स्थापित परंपरा सिरे से खत्म हो जाएगी । और ज़ाहिर है कि इन घपलों घोटालों के पीछे देश का सबसे शक्तिशाली वर्ग यानि राजनीतिज्ञ और बडे पदों पर बैठे नौकरशाह ही होते हैं ।

आज सरकार विभिन करों के माध्यम से जनता से उनके श्रम की कमाई में से एक बहुत बडा हिस्सा राजकोष में संचित कर रही है इसके अलावा लोगों के अधीन संपत्ति व संपदा ,खनिज , वनस्पति आदि पर भी सरकार का अधिकार होने के कारण उसका विनिमय और मुनाफ़ा भी सरकार के हिस्से ही आता है । सरकार की वर्तमान नीतियों के अनुसार तो सरकार आज अपने नागरिकों से हर तरह का कर वसूल रही है । आम जन आज सभी करों से न सिर्फ़ परिचित हैं बल्कि वे उन करों का भुगतान भी कर रहे हैं । इन करों से इसके अलावा अन्य सभी आय श्रोतों से राजकोष में पहुंच धन का उपयोग विकास एवं शासन के लिए व्यय किया जाना चाहिए ।

प्रति वर्ष गरीबों को मूलभूत सुविधाओं को ही मुहैय्या कराने , ज्ञात हो कि पश्विमी देशों में सूचना पहुंचाने व पारदर्शिता लाने के लिए कंप्यूटर व इंटरनेट की सुविधा को मूल अधिकार की तरह मांगा जा रहा है , के लिए सरकार राजकोष के धन का एक बहुत बडा हिस्सा खर्च होता है । इन योजनाओं में से सत्तर प्रतिशत योजनाओं की जानकारी और उन योजनाओं का लाभ उठाने की पूरी प्रक्रिया से आम लोगों के अनजान होने के कारण ही इनमें व्यय की जा रही राशि की बंदरबांट शुरू हो जाती है । चूंकि इन योजनाओं के शुरू हो जाने के बाद इनके सुचारू चालन की देख रेख न हो पाना , योजनाओं की सफ़लता-विफ़लता का आकलन नहीं किया जाना , इन योजनाओं की धनराशि में गबन घोटालों व हेरफ़ेर करने वालों का साफ़ बच निकलना आदि कारणों से परिणाम ये होता है कि गरीब और गरीबी जस की तस बनी रहती है । फ़िर योजनाएं बनती हैं और इस तरह से ये चक्र चलता ही रहता है ।

देश के विकास का ढांचा का कुछ इस तरह का बन गया है कि सामाजिक -आर्थिक व राजनीतिक , हर क्षेत्र में घोर असंतुलन पैदा हो गया है । सारी सुख सुविधाएं , अधिकार व शक्तियां तक देश की बहुत बडी जनसंख्या होने के बावजूद बहुत थोडे से लोगों के पास केंद्रित होकर रह गई है । इन लोगों आम जनजीवन की आवश्यकताओं , उनकी तकलीफ़ व कठिनाई या कहें कि उनके जीवन मृत्यु से कोई सरोकार नहीं है और इसलिए वे इनके प्रति संवेदनहीन बने हुए हैं । सरकारी राजकोष के एक बहुत बडे हिस्से को यदि इस शक्तिशाली वर्ग के चंगुल से बाहर निकाल कर वास्तव में उसका उपयोग आम जन के कल्याण के लिए कर दिया जाए नि:संदेह तस्वीर कुछ और ही निकल कर सामने आएगी


सोमवार, 16 जनवरी 2012

बेहतर हो सडक प्रबंधन




दिल्ली का एक छोटा जाम




अभी हाल ही में राजधानी दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय ऑटो एक्सपो के दौरान उस क्षेत्र की सडकों पर लगे जाम ने एक बार फ़िर से इस बात की ओर ईशारा अक्र दिया कि अभी तक राजधानी दिल्ली का सडक प्रबंधन भी चुस्त दुरूस्त नहीं है तो पूरे देश की स्थिति क्या होगी इस अंदाज़ा सहज़ ही लगाया जा सकता है । राजधानी दिल्ली समेत तमाम महानगरों में टैफ़िक जाम की समस्या न सिर्फ़ आम समस्या है बल्कि रोज़ाना वैकल्पिक यातायात व्यवस्थाओं की शुरूआत एवं फ़्लाईओवरों के निर्माण के अलावा बहुत बडा मानव श्रम इसे दुरूसत करने के पीछे लगा रहता है ,किंतु परिणाम बहुत परिवर्तनकारी नहीं दिख रहा है ।

देश में प्रतिदिन सैकडों व्यक्तियों की मृत्यु सडक दुर्घटनाओं में हो रही है । उल्लेखनीय है कि भारत में प्रति मिनट एक दुर्घटना होती है । सडक दुर्घटना पर हाल ही में आयोजित एक अतंरराष्ट्रीय संगोष्ठी में परिवहन मंत्रालय के हवाले से ये आंकडा दिया गया कि वर्ष २०१० में दुर्घटनाओं में एक लाख ३० हज़ार लोग मारे गए तथा पांच लाख लोग घायल हुए ।  चिंताजनक बात यह है कि बहुत उपायों के बावजूद इसमें इज़ाफ़ा ही हो रहा है । पश्चिमी देशों में वाहनों की संख्या भारत से कहीं अधिक है । इतना ही नहीं अभी जहां भारत में सडक पर अधिकतम रफ़्तार की सीमा सौ किलोमीटर प्रति घंटा भी नहीं है वहीं पश्चिमी देशों में वाहनों की रफ़्तार ढाई सौ किलोमीटर प्रति घंटे तक देखी जा सकती है ।
इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले एक दशक में देश में सडक निर्माण के रफ़्तार और स्तर में बहुत वृद्धि हुई है । न सिर्फ़ दिल्ली ,मुंबई ,कोलकाता जैसे महानगरों में बल्कि सुदूर ग्राम देहातों में भी सडक व कच्चे मार्गों का निर्माण होता रहा ।किंतु इस निर्माणकार्य से अपेक्षित परिवर्तन व सफ़लता को नहीं पा सकने का एक बडा कारण अति निम्न स्तर के सडकों का निर्माण । एक सर्वेक्षण के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति ऐसी पाई गई कि लगभग बाईस प्रतिशत सडकें अपने निर्माण के पहले वर्ष में ही ज़र्ज़र होकर बेहद खतरनाक हो जाती हैं ।

महानगरों में सडकों पर वाहनों का बढता दबाव आने वाले समय में एक बहुत बडी समस्या का रूप ले लेगा । इस तत्य को भलीभांति समझते हुए इस दिशा में मेट्रो रेल ,मोनो रेल ,बी आर टी कॉरिडोर , बहुस्तरीय फ़्लाईओवरों का निर्माण आदि योजनाओं पर दिन रात काम चल रहा है । किंतु इन सबके वावजूद विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार व प्रशासन सडक प्रबंधन व्यवस्था के प्रति घोर उदासीन हैं । विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार व प्रशासन सडक प्रबंधन व्यवस्था के प्रति घोर उदासीन हैं । विशेषज्ञों ने सडकों पर बढती अव्यवस्था के लिए अपने अध्य्यन में कुछ तथ्यों को विशेष रूप से चिन्हित किया है । आए दिन विभिन्न विभिन्न कारणों से आमजनों द्वारा सडकों को निशाना बनाने की बढती प्रवृत्ति को बेहद खतरनाक माना गया है ।

विशेषज्ञ मानते हैं कि महत्वपूर्ण इमारतों ,धार्मिक स्थलों , पर्यटन स्थलों , सरकारी व गैर सरकारी कार्यालयों तथा मनोरंजन स्थलों के आसपास स्थित सडकों का प्रबंधन एवं यातायात को सुचारू किया जाना सबसे ज्यादा जरूरी है । विकासशील देशों में सार्वजनिक परिवहन साधनों के उपयोग से ज्यादा निजि वाहनों के प्रयोग के चलन से भी सडक जाम का एक मुख्य कारण है । सडक सुरक्षा के लिए कार्य कर रहे विशेषज्ञ इस बात पर बेहद हैरानी जताते हैं कि पश्चिमी देशों में कार्यालयीय समय के दौरान सडकों पर वाहनों की भीड को कम करने व रखने के लिए सफ़लतापूर्वक अपनाई गई पूल व्यवस्था भारत में न के बराबर हैं ।

अक्सर देखा जाता है कि व्यस्त सडकों के साथ ही बहुत बार राजमार्गों पर किसी कारणवश किसी वाहन के रूक जाने के कारण बहुत राजमार्गों एवं अन्य सडकों के लिए न सिर्फ़ उन्नत तकनीक पर आधारित मशीनों\क्रेनों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए बल्कि ये भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि यातायात प्रबंधकों की पहुंच वहां जल्द से जल्द हो । नागरिकों को भी ये बात भलीभांति समझानी चाहिए कि ऐसी परिस्थितियों में उन्हें धैर्य बनाए रख कर प्रशासन को सहयोग देना चाहिए ।

राजधानी समेत देश के अन्य सडक मार्गों पर यात्रियों एवं वाहनों की सहायता के लिए दिशा-निर्देश सूचकों एवं मार्गों मानचित्रों की अनुपब्धता भी सडक प्रबंधन को बाधित करती है । सडकों के साथ सभी महत्वपूर्ण मार्गों के मानचित्र , अन्य दिशा सूचक मानचित्र , सहायता सेवाओं के दूरभाष व पते ,निकटतम अस्पताल का दूरभाष नंबर व पता तथा ऐसी तमाम एहतियाती उपायों पर तेज़ी से कार्य किया जाना चाहिए ताकि दुर्घटनाओं की संख्या और उसकी चपेट में आने वाली जिंदगियों को बचाया जा सके । सडक निर्माता कंपनियों , ठेकेदारों व कारीगरों को सडक की गुणवत्ता में कमी के लिए सीधे जिम्मेदार मान कर कडा दंड दिया जाना चाहिए ।


सबसे मुख्य बात ये कि आम जन से लेकर सरकार व प्रशासन को सडक का महत्व समझना चाहिए और उसकी इज़्ज़त करनी चाहिए क्योंकि यही विकास का रास्ता होता है ।










शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

आरक्षण : बैसाखियों पर बढता विकास

इसी विषय पर हाल ही में बने एक पिक्चर का पोस्टर चित्र , गूगल से साभार







बहुत पहले ही भारतीय राजनीतिक के चरित्र को भली भांति परखते हुए किसी ने ठीक कहा था कि भारतीय राजनीति में धर्म ,जाति ,भाषा ,के आधार पर रखे गए विशेष प्रावधानों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल होने के कारण यही आशंका बनी रहेगी कि इसका उपयोग समय समय पर सत्ता के हितों के लिए किया जाता रहेगा । न्यायपालिका ने सरकार और राजनीतिज्ञों के इसी मंसूबे को भांप कर अपने एक महत्वपूर्न निर्णय में ये व्यवस्था दी कि किसी भी सूरत में आरक्षण की सीमा पचास प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए ।

यहां ये देखना बहुत महत्वपूर्ण है कि बीते दो वर्ष में न सिर्फ़ आरक्षण बल्कि एक विशेष वर्ग में आरक्ष्ण को लेकर कई बार पूरे उत्तर भारत की यातायात व्यवस्था को ठ्प्प किया गया । सरकार और प्रशासन की तटस्थता व अक्रियशील रहने का खामियाज़ा न सिर्फ़ यातायात व्यवस्था के चरमराने तक ही भुगतना पडा बल्कि बहुत भारी आर्थिक नुकसान का दंश भी झेलना पडा । यहां तक कि ,बाध्य होकर न्यायपालिका को ही सरकार को झिंझोड कर उठाना पडा ।

 इस बार इस मामले का ज्यादा तूल पकडना स्वभाविक है क्योंकि इस बार आधार जाति से अलग धर्म की ओर मुड गया है । देश के राजनीतिज्ञों के द्वारा अतिधर्मनिरपेक्षतावाद की नीति के तहत बेशक भारत की छवि को मांजने की जबरन कोशिश हो रही है किंतु धर्म , धार्मिक मुद्दों , चिन्हों , धर्म स्थलों को लेकर समाज कितना संवेदनशील है यह किसी से छुपा नहीं है । अल्पसंख्यकों को प्रस्तावित इस आरक्षण का आधार सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों की स्थिति पर रिपोर्ट हेतु गठित सच्चर आयोग की रिपोर्ट ही बनी है । इसमें कोई संदेह नहीं कि आज विश्व के अन्य मुस्लिम बाहुल्य देशों के मुस्लिम समाज की स्थित से बहुत बेहतर होने के बावजूद आज भी पिछडेपन और अलगाव का दंश झेल रहा है । शिक्षा, रोजगार, सामाजिक हिस्सेदारी व प्रभाव आदि हर क्षेत्र में अल्प संख्यकों की स्थिति संतोषजनक से नीचे है । बेशक इसकी एक बहुत बडी वजह भी कहीं न कहीं वे खुद ही है ।

अल्पसंख्यकों को आरक्षण , यानि धार्मिक अल्पसंख्यकों को , उनके पिछडेपन से विकास की ओर लाने के लिए एक पूरक प्रयास, थोडी देर केलिए इसे दरकिनार करके सिर्फ़ आरक्षण व्यवस्था पर बात की जाए तो पता चलता है कि संविधान में तात्कालिक उपचार के रूप में अपनाई गए इस व्यवस्था को इतनी बार बुरी तरह से तोडा मरोडा गया कि ये पिछडों के विकास और स्तर के मूल उद्देश्य से ही भटक कर रह गई । सबसे अधिक चिंताजनक बात ये है कि देश के सभी योग्यता सिद्ध करने वाली चुनौतियों को सहज़ बना लेने के बावजूद भी कभी भी ये महसूस नहीं हो सका कि आरक्षण व्यवस्था ने सामाजिक संतुलन में महती भूमिका निभाई । इसके विपरीत इसने जातियों को उपजातियों तक से अलगाव को प्रोत्साहित किया । दूसरी तरफ़ इस व्यवस्था का लाभ पाने वालों को सामान्य गैर आरक्षित वर्ग से एक अघोषित ताना मिलता रहा ।

आज आरक्षण की व्यवस्था ने युवाओं में दो बातें तो पूरी तरह स्थापित कर ही रखी हैं । नौकरियों , दाखिलों , अन्य चुनौतियों में आरक्षण की व्यवस्था यानि अवसरों का बिल्कुल आधा हो जाना , जिसका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रभाव बाद में उस संस्थान की उत्पादकता पर भी पडता है । दूसरी ये कि जो इस व्यवस्था के लाभ पक्ष की ओर हैं क्या उनकी स्थिति और स्तर ने उनके वर्ग की स्थिति को मजबूत बनाकर उभारा है । कोई भी तात्कालिक उपाय इतनी देर तक लादे नहीं चलना चाहिए कि ऐसा लगने लगे कि यही स्थाई व्यवस्था होकर रह गई है ।

समाजशास्त्री अपने अध्य्यन और निष्कर्ष के आधार पर किसी भी देश में सामाजिक संरक्षण के रूप में आरक्षण की व्यवस्था के लिए धर्म , जाति व भाषा से इतर क्षेत्र को वरीयता दिए जाने की बात करते हैं । सबसे पहला आधार आर्थिक पिछडापन और पीडित गरीब परिवार के जीवन स्तर को एक मानक स्तर पर पहुंचते ही उसके लिए ये व्यवस्था समाप्त हो जानी चाहिए । हालांकि पिछले दिनों योजना आयोग के "गरीब " की परिभाषा ने समाजशास्त्रियों को पुन: सोचने पर विवश किया होगा । इसके अलावा शारीरिक मानसिक विकलांगता , विशिष्ट क्षेत्र , खेल ,कला आदि में प्रदर्शन करने वालों , समाज के लिए कुछ अनुकरणीय करने वालों के लिए इस व्यवस्था को अपनाया जाना चाहिए । लिंग भेद व कन्या भ्रूण हत्या के मद्देनज़र वे महिलाओं को न सिर्फ़ विशेष संरक्षण बल्कि ज्यादा प्रभावी अधिकार देने की बात कहते हैं । भारत का सामाजिक तानाबाना प्राचीनकाल से ही बहु-धर्मीय, बहुजातीय व बहुक्षेत्रीय रहा है , इसलिए अब ये बहुत जरूरी हो जाता है कि नीतियां और व्यवस्थाएं समाज को जोडने वाली बनें ,न कि तोडने वाली । बहरहाल , इस नए अल्पसंख्यक आरक्षण के सियासी और सामाजिक परिणामों की प्रतीक्षा पूरे देश को रहेगी ।
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...