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सोमवार, 13 जनवरी 2014

बच्चों के प्रति क्रूर होता एक समाज ......

घर से भागा हुआ बच्चा पवन कुमार



इस बच्चे का नाम है पवन कुमार । ये बच्चा मुझे अपने गृहनगर मधुबनी बिहार से दिल्ली की वापसी रेल यात्रा में , अपने रेल के डब्बे में बैठा मिला । असल में ये बच्चा शायद मुजफ़्फ़रपुर या छपरा स्टेशन में से किसी स्टेशन पर रेल में सवार हो गया था । मेरा ध्यान इस बच्चे पर तब गया जब आसपास बैठे यात्रियों को इस बालक से चुहल करते देखा । कोई इसे जूस के दुकान पर काम करने को तैयार कर रहा था तो कोई इसे जेबकतरा कह के दुत्कार रहा था । आशंका होने पर मैं इसके पास गया और पहले मैंने सहयात्रियों से पूछा कि क्या ये बच्चा किसी के साथ है । इंकार करने पर मैंने इस बच्चे से इसका नाम और पता पूछा ।

बच्चा अचानक ही मुझे यूं पूछते देख झिझक कर डर कर चुप होगा , मगर मेरे बार बार पुचकारने पर बताया कि वो अपनी नानी के घर से भाग कर आया है बच्चे ने ये भी बताया कि वो पहले भी दो बार भाग चुका है । मझे अंदेशा हुआ कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बच्चा अपने हो रहे किसी जुल्म सितम से डर कर भाग खडा हुआ था , मगर प्यार से पूछने पर उसने बताया कि वो नौकरी करने जा रहा है । मुझे उसे बहुत ही सावधानी से समझाना पडा कि अभी वो बहुत छोटा है और उसे कम से कम उस उम्र तक तो इंतज़ार करना ही चाहिए जब तक वो नौकरी के लायक शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व न हो जाए । बच्चा अब घर जाने को तैयार था । मैंने अगले स्टेशन (बलिया) पर उतर कर फ़ौरन ही स्टेशन अधीक्षक के दफ़्तर पहुंच कर सारी बात बताई और इस मासूम को उनके सुपुर्द किया ।

मैं जब ये पोस्ट लिख रहा हूं तो टेलिविजन चैनल पर समाचार आ रहा है कि मुंबई के मीरा रोड पर पुलिस ने एक ११ वर्षीय बच्चे को छुडाया है जिसे जबरन मार पीट और भयंकर शोषित करके घर में बंधक बना कर काम कराया जा रहा था और इस तरह की घटना या खबर अब रोज़मर्रा की बात सी हो गई है । ऐसा लग रहा है मानो इस समाज को बच्चों के प्रति कोई संवेदना , कोई सहानुभूति , कोई चिंता नहीं है । किसी समाजशास्त्री ने ऐसी स्थिति को भांप कर ही कहा था कि जो देश और समाज कल का भविष्य बनने वाले बच्चों के प्रति असहिष्णु और लापरवाह होता है उसे फ़िर बदले में हिंसक और क्रूर नस्लें ही मिलती हैं ।

राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकडों पर नज़र डालें तो स्थिति की भयावहता का अंदाज़ा लग जाता है ।सिर्फ़ पिछले पांच वर्षों में बच्चों के प्रति हिंसा और अपराध की घटनाओं में 21 %  का इज़ाफ़ा हुआ है । इन अपराधों में भी सबसे ज्यादा घटनाएं अपहरण , हत्या और शोषण की हैं । इतना ही नहीं प्रति वर्ष देश भर से गुमशुदा बच्चों की दर में भी लगातार वृद्धि हो रही है और चौंकाने वाली बात ये है कि छोटे शहरों , गांव , कस्बों से बहला फ़ुसला कर , घर से भाग कर , या किसी और कारणों से गायब हुए बच्चों के अलावा महानगरों और बडे शहरों में ये दर कहीं अधिक है । इसका मतलब स्पष्ट है कि पुलिस , प्रशासन व सरकार बच्चों के जीवन व सुरक्षा के प्रति घोर उदासीन व असंवेदनशील रवैया अपनाए हुए है ।

महानगरों में बच्चों को बंधक मजदूरी , भिक्षावृत्ति , तथा अन्य शोषणों से लगातार त्रस्त होना पड रहा है और सरकार तथा कुछ स्व्यं सेवी संस्थाओं के लगातार प्रयासों के बावजूद भी \स्थिति निरंतर बिगडती ही जा रही है । पिछले दिनों तो गरीब बच्चों का अपहरण करके उनकी हत्या के बाद मानव अंगों के व्यापार हेतु उनका प्रयोग किए जाने जैसी अमानवीय और घिनौनी घटनाएं भी सामने आई हैं । आश्चर्य व दुख इस बात का है सरकार ने अब तक इन नौनिहाल मासूमों की सुरक्षा व संरक्षण हेतु कोई ठोस नीति या योजना न तो बनाई है और न ही कोई प्रयास किया है । महज़ आंकडों की बाजीगरी और कागज़ी कोशिशों के सहारे ही प्रशासन अपने प्रयास गिनाने में लगा रहता है ।

यदि यही स्थिति रहती है तो फ़िर निश्चित रूप से समाज को इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि भविष्य में हालात और भी नारकीय हो जाएंगे । सरकार को समाज और स्व्यं सेवी संस्थाओं , समूहों , सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर इस दिशा में एक दूरगामी रोडमैप बना कर आपसी तालमेल के साथ वृहत योजना बनानी चाहिए । संचार क्रांति के इस युग में कम से कम गुमशुदा बच्चों की तलाश तो पूरी संज़ीदगी से की ही जानी चाहिए , ताकि समय रहते ऐसे भूले भटके बच्चों को उनके घर तक पहुंचाया जा सके ।


शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

आरक्षण : बैसाखियों पर बढता विकास

इसी विषय पर हाल ही में बने एक पिक्चर का पोस्टर चित्र , गूगल से साभार







बहुत पहले ही भारतीय राजनीतिक के चरित्र को भली भांति परखते हुए किसी ने ठीक कहा था कि भारतीय राजनीति में धर्म ,जाति ,भाषा ,के आधार पर रखे गए विशेष प्रावधानों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल होने के कारण यही आशंका बनी रहेगी कि इसका उपयोग समय समय पर सत्ता के हितों के लिए किया जाता रहेगा । न्यायपालिका ने सरकार और राजनीतिज्ञों के इसी मंसूबे को भांप कर अपने एक महत्वपूर्न निर्णय में ये व्यवस्था दी कि किसी भी सूरत में आरक्षण की सीमा पचास प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए ।

यहां ये देखना बहुत महत्वपूर्ण है कि बीते दो वर्ष में न सिर्फ़ आरक्षण बल्कि एक विशेष वर्ग में आरक्ष्ण को लेकर कई बार पूरे उत्तर भारत की यातायात व्यवस्था को ठ्प्प किया गया । सरकार और प्रशासन की तटस्थता व अक्रियशील रहने का खामियाज़ा न सिर्फ़ यातायात व्यवस्था के चरमराने तक ही भुगतना पडा बल्कि बहुत भारी आर्थिक नुकसान का दंश भी झेलना पडा । यहां तक कि ,बाध्य होकर न्यायपालिका को ही सरकार को झिंझोड कर उठाना पडा ।

 इस बार इस मामले का ज्यादा तूल पकडना स्वभाविक है क्योंकि इस बार आधार जाति से अलग धर्म की ओर मुड गया है । देश के राजनीतिज्ञों के द्वारा अतिधर्मनिरपेक्षतावाद की नीति के तहत बेशक भारत की छवि को मांजने की जबरन कोशिश हो रही है किंतु धर्म , धार्मिक मुद्दों , चिन्हों , धर्म स्थलों को लेकर समाज कितना संवेदनशील है यह किसी से छुपा नहीं है । अल्पसंख्यकों को प्रस्तावित इस आरक्षण का आधार सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों की स्थिति पर रिपोर्ट हेतु गठित सच्चर आयोग की रिपोर्ट ही बनी है । इसमें कोई संदेह नहीं कि आज विश्व के अन्य मुस्लिम बाहुल्य देशों के मुस्लिम समाज की स्थित से बहुत बेहतर होने के बावजूद आज भी पिछडेपन और अलगाव का दंश झेल रहा है । शिक्षा, रोजगार, सामाजिक हिस्सेदारी व प्रभाव आदि हर क्षेत्र में अल्प संख्यकों की स्थिति संतोषजनक से नीचे है । बेशक इसकी एक बहुत बडी वजह भी कहीं न कहीं वे खुद ही है ।

अल्पसंख्यकों को आरक्षण , यानि धार्मिक अल्पसंख्यकों को , उनके पिछडेपन से विकास की ओर लाने के लिए एक पूरक प्रयास, थोडी देर केलिए इसे दरकिनार करके सिर्फ़ आरक्षण व्यवस्था पर बात की जाए तो पता चलता है कि संविधान में तात्कालिक उपचार के रूप में अपनाई गए इस व्यवस्था को इतनी बार बुरी तरह से तोडा मरोडा गया कि ये पिछडों के विकास और स्तर के मूल उद्देश्य से ही भटक कर रह गई । सबसे अधिक चिंताजनक बात ये है कि देश के सभी योग्यता सिद्ध करने वाली चुनौतियों को सहज़ बना लेने के बावजूद भी कभी भी ये महसूस नहीं हो सका कि आरक्षण व्यवस्था ने सामाजिक संतुलन में महती भूमिका निभाई । इसके विपरीत इसने जातियों को उपजातियों तक से अलगाव को प्रोत्साहित किया । दूसरी तरफ़ इस व्यवस्था का लाभ पाने वालों को सामान्य गैर आरक्षित वर्ग से एक अघोषित ताना मिलता रहा ।

आज आरक्षण की व्यवस्था ने युवाओं में दो बातें तो पूरी तरह स्थापित कर ही रखी हैं । नौकरियों , दाखिलों , अन्य चुनौतियों में आरक्षण की व्यवस्था यानि अवसरों का बिल्कुल आधा हो जाना , जिसका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रभाव बाद में उस संस्थान की उत्पादकता पर भी पडता है । दूसरी ये कि जो इस व्यवस्था के लाभ पक्ष की ओर हैं क्या उनकी स्थिति और स्तर ने उनके वर्ग की स्थिति को मजबूत बनाकर उभारा है । कोई भी तात्कालिक उपाय इतनी देर तक लादे नहीं चलना चाहिए कि ऐसा लगने लगे कि यही स्थाई व्यवस्था होकर रह गई है ।

समाजशास्त्री अपने अध्य्यन और निष्कर्ष के आधार पर किसी भी देश में सामाजिक संरक्षण के रूप में आरक्षण की व्यवस्था के लिए धर्म , जाति व भाषा से इतर क्षेत्र को वरीयता दिए जाने की बात करते हैं । सबसे पहला आधार आर्थिक पिछडापन और पीडित गरीब परिवार के जीवन स्तर को एक मानक स्तर पर पहुंचते ही उसके लिए ये व्यवस्था समाप्त हो जानी चाहिए । हालांकि पिछले दिनों योजना आयोग के "गरीब " की परिभाषा ने समाजशास्त्रियों को पुन: सोचने पर विवश किया होगा । इसके अलावा शारीरिक मानसिक विकलांगता , विशिष्ट क्षेत्र , खेल ,कला आदि में प्रदर्शन करने वालों , समाज के लिए कुछ अनुकरणीय करने वालों के लिए इस व्यवस्था को अपनाया जाना चाहिए । लिंग भेद व कन्या भ्रूण हत्या के मद्देनज़र वे महिलाओं को न सिर्फ़ विशेष संरक्षण बल्कि ज्यादा प्रभावी अधिकार देने की बात कहते हैं । भारत का सामाजिक तानाबाना प्राचीनकाल से ही बहु-धर्मीय, बहुजातीय व बहुक्षेत्रीय रहा है , इसलिए अब ये बहुत जरूरी हो जाता है कि नीतियां और व्यवस्थाएं समाज को जोडने वाली बनें ,न कि तोडने वाली । बहरहाल , इस नए अल्पसंख्यक आरक्षण के सियासी और सामाजिक परिणामों की प्रतीक्षा पूरे देश को रहेगी ।

सोमवार, 2 नवंबर 2009

भ्रष्टाचार : नासूर बनता एक रोग...

आज देश में एक समाज सेवक, एक सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के पास ..दो हज़ार करोड की संपत्ति मिलती है । ये पैसा निश्चित रूप से आम जनता का...इस देश का पैसा ही है जो मधु कोडा ने ना जाने कब से हडपने की जुगत बना रखी थी..और हडप भी लिया था। अब जाकर ये सारा मामला सामने आया है। लगभग दो हजार करोड रुपए डकार कर बैठ गये मधु कोडा...दो हजार करोड । और ये कोई नया मामला नहीं है....अब तो ये इतनी नियमित सी घटना सी हो गई है कि ..बस एक खबर सी बन कर रह गई है ।और हो भी क्यों न ..आखिर यहां भ्रष्टाचार है ही कौन सा बडा मुद्दा । दो हजार करोड हों या पचास हजार करोड....कोई फ़र्क नहीं पडता। इस देश में यदि किसी क्रिकेट खिलाडी से मैच में कोई कैच छूट जाए तो उसके गुस्से में उस खिलाडी का घर तक जला दिया जाता है , मगर इतने बडे बडे अपराध ,भ्रष्टाचार, होते रहते हैं और आम लोग संवेदनहीन की तरह बिना कोई प्रतिक्रिया देते शून्य की तरह बने रहते हैं ।

इस देश में बिल्कुल निम्न स्तर से शुरू होकर उच्च से उच्च या कहें कि कई बार सर्वोच्च स्तर तक भ्रष्टाचार की पैठ रही है । इस देश में तो एक पूर्व प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक तौर पर माना था कि भारत में भ्रष्टाचार का प्रभाव और प्रसार इतना अधिक है कि ..किसी भी सरकारी योजना का महज दो प्रतिशत ही उसके वास्तविक हकदार तक पहुंच पाता है और सारा हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ जाता है । वहीं एक से अधिक बार तो खुद प्रधान मंत्री ही दर्जनों घपलों घोटालों मे संलिप्तता के आरोपी बने । भ्रष्टाचार के संदर्भ में एक अन्य पहलू ये है कि सबसे सुलब तथा सबसे अपेक्षित भ्रष्टाचार सार्वजनिक या कहें कि सरकारी क्षेत्र में ही व्याप्त है। भ्रष्टाचार की व्यापकता और धीरे धीरे नासूरनुमा आसुरी रूप लेते जाने का सबसे मुख्य कारण है इसमें लिप्त लोगों के मन से किसी भी कानूनी कार्यवाही और सजा के डर का निकल जाना । आर्थिक भ्रष्टाचार में लिप्त आरोपियों की फ़ेहरिस्त में एक निम्न स्तर पर नियुक्त क्लर्क हो या उच्चतम स्तर पर बैठ निदेश्क , कई बार रंगे हाथों पकडे जाने के बावजूद सजा से साफ़ बच निकलना एक रिवाज सा बन गया है । इसके अलावा बडे राजनीतिज्ञ ,प्रशासक एवम अधिकारी अव्वल तो पकडे नहीं जाते , यदि कभी शिकंजे में फ़ंसते भी हैं तो अपने रसूख और पैसे की बदौलत अपनी गर्दन आसानी से बचा लेते हैं। इस आर्थिक भ्रष्टाचार के संधर्भ मे एक विचारणीय तथ्य ये है कि किसी भी प्रकरण में इनके पास से दबाया गया धन किसी भी प्रकार से निकल नहीं पाता है। इसका परिणाम ये होता है कि अनैतिक तरीके से और बेइमानी से अर्जित धन का उपयोग खुद को बचाने में बखूबी कर लेते हैं। जबकि अन्य देशों में भ्रष्टाचार में लिप्त आरोपियों पर दंडात्मक कार्यवाही के साथ साथ उनकी संपत्ति भी जब्त कर ली जाती है । पडोसी देश चीन तो भ्रष्टाचार को एक बेहद संगीन जुर्म के रूप में देखता है । पिछले वर्ष सरकारी सहायता राशि में गडबडी के दोषी पाए जाने वाले एक भूतपूर्व गवर्नर ..जिसकी उम्र लगभग ७५ साल थी , उसे भी फ़ांसी की सजा सुना दी । इतन ही नहीं सार्वजनिक सेवा के १६ हजार ६०० कर्मचारियों को एक ही दिन नौकरी से निकाल बाहर कर दिया गया।

अभी कुछ समय पूर्व ही इसी स्थिति को देखते हुए ..सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश महोदय ने किसी मुकदमे की सुनवाई के दौरान तल्ख टिप्पणी की थी ," अफ़सोस कि यहां का कानून इस बात की इजाजत नहीं देता, किंतु भ्रष्टाचार की व्यापकता को रोकने के लिए अब यही उपाय बचता है कि सभी दोषियों को चौराहे पर खडे किसी खंबे पर लटका देना चाहिये "। भ्रष्टाचार की समाप्ति में एक अन्य बधा है ईमानदार एवं प्रतिबद्ध व्यक्तियों की कमी । जैसा कि कहावत है कि सौ बेईमानों पर एक ईमानदार भारी पडता है इसलिये ये स्थिति तब सह्य है , किंतु ये दुखदायी तब बन जाती है जब दुव्यवस्था से अकेला लडता कोई ईमान्दार व्यक्ति पूरे भ्रष्टाचारी तंत्र का निशाना बन जाता है । किसी ईमानदार व्यक्ति द्वारा भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ़ खडे होकर काम करने को प्रोत्साहित करना तो दूर पूरा तंत्र के इस प्रयास में लग जाता है कि या तो उसे भी किसी भी तरह से भ्रष्टाचार के दलदल में घसीट लिया जाए या फ़िर रास्ते से ही हटा दिया जाए।

भ्रष्टाचार को , विशेषकर उच्च स्तर के भ्रष्टाचार पर नजर रखने एवं नियंत्रित करने के उद्देश्य से गठित केंद्रीय सतर्कता आयोग भी प्रभावहीन ही रहा ।कई बार सार्वजनिक रूप से भी अधिक अधिकारों की मांग करने वाले सि आयोग को महज औपचारिकता निभाने भर के लिये रखा हुआ है । इसी तरह कुछ वर्ष प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचार एवं अनियमितताओं को रोकने और सभी शिकायतों को सुनने व उसके त्वरित निपटारे हेतु एक विशेष प्रकोष्ठ के गठन की घोषणा की थी जो जल्दी ही सफ़ेद हाथी सिद्ध हुआ । भ्रष्टाचार को खत्म करने के उपायों में जिस उपाय को सबसे ज्यादा कारगर माना गया है वो है भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों को सार्वजनिक करना । पिछले कुछ वर्षों में निजि टीवी समाचार चैनलों ने गुप्त रिपोर्टिंग और स्टिंग करके ..एक के बाद न जाने कितने दफ़तरों का कच्चा चिट्ठा खोला था । इसका एक तत्काल असर तो ये हुआ कि चाहे कैमरे के डर से ही सही..उसमें कुछ कमी तो आई ही । भ्रष्टचार को हटाने में दूसरी प्रभावी सहायक हो सकती है शिकायत पुस्तिका । भ्रष्टाचार उन्मूलन से ा संबंधित एक सम्मेलन में कहा गया कि यदि इन शिकायत पुस्तिकाओं का समुचित उपयोग एक हथियार की तरह किया जाए तो लगभग चालीस प्रतिशत तक भ्रष्टाचार को कम किया जा सकता है । ये चेतने का समय है ...यदि अब भी न चेते तो ...परिणाम आत्मघाती साबित होंगे ।

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