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रविवार, 22 जनवरी 2012

क्या कभी मिटेगी गरीबी






अभी हाल ही में आई दो खबरों ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा । पहली ये कि एक गरीब व्यक्ति जिसे उसकी पत्नी को जच्चगी के लिए अस्पताल में दाखिला नहीं मिला ने पूरी रात सडक पर अपनी मृत पत्नी व बच्चे की लाश के साथ बिताई । दूसरी ये कि न्यायपालिका ने राजधानी दिल्ली में सरकार व निगम द्वारा एक रात्रि विश्राम स्थल रैन बसेरे को गिरा दिए जाने पर अदालत के सामने पहुंच मामले में सरकार व निगम द्वारा एक रात्रि विश्राम स्थल रैन बसेरे को गिरा दिए जाने पर अदालत के सामने पहुंचे मामले में सरकार को लगभग चेतावनी देते ऐसा दोबारा नहीं होने को सुनिश्चित करने को कहा है । ऐसा भी नहीं है देश में भूख-गरीबी, ठंड  से लोगों के मरने की ये कोई नई घटना हो । उलटा अब तो ये एक नियति सी बन गई है ।


आज भी ग्रामीण क्षेत्र की उन्नीस प्रतिशत आबादी ,भूख , कुपोषण , बीमारी व अन्य प्राकृतिक आपदाओं के कारण समय से पहले काल का ग्रास बन जाते हैं । सामाजिक विकास के असंतुलन की इससे बडी विडंबना और क्या हो सकती है कि  जो देश खुद को विश्व महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर मान व बता रहा है उस देश में अब भी रोज़ हज़ारों लोग भूख , गरीबी और यहां तक कि ठंड तक से अपनी जान गंवाने को मजबूर हैं । इनमें से बहुत सारी मौतें तो सरकार प्रशासन की गिनती में ही नहीं आते हैं ।

सबसे बडे दुख की बात ये है कि जिन्हें सरकारी सहायता की आवश्यकता सबसे ज्यादा होती है उन्हीं के प्रति सरकार सबसे ज्यादा उदासीन और संवेदनहीन है । हालात की गंभीरता का अंदाज़ा दो दशक पहले प्रधानमंत्री तक ने ये माना था कि यदि सरकार गरीब के लिए सौ रुपया खर्च करती है तो वास्तव में उस गरीब तक मात्र दो रुपए ही पहुंचते हैं । आज दो दशकों के बाद बेशक ग्रामीण क्षेत्रों में मोबाइल के टॉवर आ गए हों किंतु भूख, गरीबी ,कुपोषण ,अशिक्षा आदि की स्थित वही है ।

देश में गरीबी के नहीं खत्म होने का एक बडा कारण सिर्फ़ गरीबों के लिए , उनके नाम पर चलाई जाने वाली सैकडों योजनाओं में घपले -घोटाले की असीम संभावना होना ही है । यदि देश से गरीब खत्म हो जाएं गरीबी खत्म हो जाए तो आर्थिक कदाचार की एक स्थापित परंपरा सिरे से खत्म हो जाएगी । और ज़ाहिर है कि इन घपलों घोटालों के पीछे देश का सबसे शक्तिशाली वर्ग यानि राजनीतिज्ञ और बडे पदों पर बैठे नौकरशाह ही होते हैं ।

आज सरकार विभिन करों के माध्यम से जनता से उनके श्रम की कमाई में से एक बहुत बडा हिस्सा राजकोष में संचित कर रही है इसके अलावा लोगों के अधीन संपत्ति व संपदा ,खनिज , वनस्पति आदि पर भी सरकार का अधिकार होने के कारण उसका विनिमय और मुनाफ़ा भी सरकार के हिस्से ही आता है । सरकार की वर्तमान नीतियों के अनुसार तो सरकार आज अपने नागरिकों से हर तरह का कर वसूल रही है । आम जन आज सभी करों से न सिर्फ़ परिचित हैं बल्कि वे उन करों का भुगतान भी कर रहे हैं । इन करों से इसके अलावा अन्य सभी आय श्रोतों से राजकोष में पहुंच धन का उपयोग विकास एवं शासन के लिए व्यय किया जाना चाहिए ।

प्रति वर्ष गरीबों को मूलभूत सुविधाओं को ही मुहैय्या कराने , ज्ञात हो कि पश्विमी देशों में सूचना पहुंचाने व पारदर्शिता लाने के लिए कंप्यूटर व इंटरनेट की सुविधा को मूल अधिकार की तरह मांगा जा रहा है , के लिए सरकार राजकोष के धन का एक बहुत बडा हिस्सा खर्च होता है । इन योजनाओं में से सत्तर प्रतिशत योजनाओं की जानकारी और उन योजनाओं का लाभ उठाने की पूरी प्रक्रिया से आम लोगों के अनजान होने के कारण ही इनमें व्यय की जा रही राशि की बंदरबांट शुरू हो जाती है । चूंकि इन योजनाओं के शुरू हो जाने के बाद इनके सुचारू चालन की देख रेख न हो पाना , योजनाओं की सफ़लता-विफ़लता का आकलन नहीं किया जाना , इन योजनाओं की धनराशि में गबन घोटालों व हेरफ़ेर करने वालों का साफ़ बच निकलना आदि कारणों से परिणाम ये होता है कि गरीब और गरीबी जस की तस बनी रहती है । फ़िर योजनाएं बनती हैं और इस तरह से ये चक्र चलता ही रहता है ।

देश के विकास का ढांचा का कुछ इस तरह का बन गया है कि सामाजिक -आर्थिक व राजनीतिक , हर क्षेत्र में घोर असंतुलन पैदा हो गया है । सारी सुख सुविधाएं , अधिकार व शक्तियां तक देश की बहुत बडी जनसंख्या होने के बावजूद बहुत थोडे से लोगों के पास केंद्रित होकर रह गई है । इन लोगों आम जनजीवन की आवश्यकताओं , उनकी तकलीफ़ व कठिनाई या कहें कि उनके जीवन मृत्यु से कोई सरोकार नहीं है और इसलिए वे इनके प्रति संवेदनहीन बने हुए हैं । सरकारी राजकोष के एक बहुत बडे हिस्से को यदि इस शक्तिशाली वर्ग के चंगुल से बाहर निकाल कर वास्तव में उसका उपयोग आम जन के कल्याण के लिए कर दिया जाए नि:संदेह तस्वीर कुछ और ही निकल कर सामने आएगी


बुधवार, 8 जून 2011

गरीब जनता के अमीर प्रतिनिधि ....आज का मुद्दा




शंकर जी द्वारा चित्रित कार्टून ( साभार ) 




आज विश्च अर्थव्यवस्था में बेशक भारत का स्थान और मुकाम ऐसा हो गया है कि उसकी हठात ही उपेक्षा नहीं की जा सकती । दूसरा बडा सच ये है कि भविष्य की शक्तशाली अर्थव्यवस्थाओं में भी भारत की गणना की जा रही है । देश मेंबढते हुए बाज़ार की संभावनाओं के मद्देनज़र ये आकलन बिल्कुल ठीक जान पडता है । आज देश चिकित्सा, विज्ञान , शोध , शिक्षा आदि हर क्षेत्र में निरंतर विकास की ओर अग्रसर है । किंतु इसके बावजूद भारत की गिनती धनी व संपन्न राष्ट्र में अभी नहीं की जा स्कती है । आज भी देश का एक बहुत बडा वर्ग शिक्षा , गरीबी , और यहां तक कि भूख की बुनियादी समस्या से जूझ रहा है । आज भी देश में प्रति वर्ष सैकडों गरीबों की मृत्यु भूख और कुपोषण से हो रही है , जिसके लिए थकहार कर सर्वोच्च न्यायालय को सरकार को सख्त निर्देश देने पडे । 

इस स्थिति में जब आम जनता ये देखती है कि एक तरफ़ सरकार रोज़ नए नए करों की संभावनाएं तलाश कर राजकोष को भरने का जुगत लगाती है । वहीं दूसरी तरफ़ वो संचित राजकोष के धन की बर्बादी के प्रति न सिर्फ़ घोर उदासीन है बल्कि इसमें दोहरी सेंधमारी किए जा रहे हैं । पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक भ्रष्टाचार , घपले , घोटाले किए जाने के लिए एक अजीब सी रेस जैसी लगी हुई है । किसी को न तो किसी कानून का भय है न ही जनता की भावना और विश्वास की फ़िक्र । यदि घपलों -घोटालों को थोडी देर के लिए आपराधिक कृत्य की श्रेणी में रखकर व सभी राजनीतिज्ञों को इसमें सम्मिलित नहीं मानते हुए भी यदि कुछ तथ्यों पर गौर करें तो वो स्थिति भी आज कम भयावह नहीं है । 

समाजसेवा का पर्याय मानी जाने वाली राजनीति आज न तो समाज के करीब रही न सेवा के । भारत जैसे गरीब देश में भी आम चुनाव के नाम पर जितना पैसा खर्च किया जाता है यदि उसका आकलन किया जाए तो लगभग उतने पैसों से कम से कम दो शहरों का संपूर्ण विकास किया जा सकता है । एक वक्त हुआ करता था जब देश के सबसे बडे पदों पर बैठे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक अपने वेतन को हाथ भी नहीं लगाते थे । अब इन आदर्शो और मूल्यों का कोई अर्थ नहीं है । आज जनसेवा के लिए बने और बनाए ओहदों में से कोई भी वेतन-भत्तों , सुख सुविधा अधिकारों के बिना नहीं है । आज इन तमाम जनप्रतिनिधियों को न सिर्फ़ वेतन के रूप में मोटी रकम दी जा रही है बल्कि यात्रा भत्ता, बिजली , पानी , दफ़्तर का रख-रखाव आदि के नाम पर लाखों रुपए की रियायत दी जाती है । न सिर्फ़ इन जनप्रतिनिधियों पर बल्कि इनसे संबंधित सभी विभागों , संस्थाओं इनसे जुडे सुरक्षा अधिकारियों के लाव लश्कर इत्यादि पर भी भारी भरकम खर्च किया जा रहा है । सबसे अधिक दुख की बात ये है कि सारा खर्च उसी पैसे से किया जा रहा है जो सरकार प्रति वर्ष नए नए कर लगाकर आम आदमी से वसूल रही है ।  

इन जनप्रतिनिधियों से आज आम जनता को दोहरी शिकायत है । पहली शिकायत तो ये कि इतना सुविधा संपन्न कर दिए जाने के बावजूद भी ये अपने कार्य और दायित्व को निभाना तो दूर इनमें से बहुतायत प्रतिनिधि तो निर्धारित सत्र तक में भाग नहीं लेते हैं । स्थिति ऐसी है कि प्रति वर्ष विभिन्न सत्रों के दौरान बाधित की जाने वाली कार्यवाहियों का दुष्परिणाम ये निकलता है बनने वाले कानून भी सालों साल लटकते चले जाते हैं या कि जानबूझ कर ऐसे हालात बनाए जाते हैं कि उन कानूनों को पास करने से बचा जा सके । इससे अलग इन विभिन्न सत्रों के दौरान किया गया सारा खर्च व्यर्थ चला जाता है । इस दौरान हुए खर्च का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है इस दौरान कैंटीन में उपलभ्द कराए जाने वाले भोजन की थाली की कीमत पांच या दस रुपए होती है जबकि वास्तव में उसकी कीमत उससे तीस चालीस गुना अधिक होती है ।  न सिर्फ़ भोजन बल्कि प्रति वर्ष इन जनसेवकों को जाने क्या सोच कर रियायती दरों और मुफ़्त बिजली , पानी , यात्रा आदि की सुविधाएं दी जाती हैं , जबकि इसका हकदार सबसे पहले देश का एक गरीब होना चाहिए । 


अब समय आ गया है कि जनता को , अपने जनप्रतिनिधियों से अपेक्षाएं बढानी चाहिए , उनसे पूछा जाना चाहिए कि आखिर कौन सी न्यूनतम योग्यता है वो जो उन्हें आपका प्रतिनिधि बनाने के काबिल बनाती है । इन तमाम जनसेवकों के काम का रिपोर्टकार्ड जनता को तैयार करना चाहिए और उसीके आधार पर उन्हें न सिर्फ़ उनका वेतन , उनके अधिकार बल्कि आगे बने रहने का हक भी , सिर्फ़ और सिर्फ़ जनता ही निर्धारित करे । अब ये बहुत जरूरी हो गया है कि जनसेवकों को ये समझाया जाए कि देश का प्रतिनिधि वैसा ही रहेगा , करेगा जैसा कि देश की जनता रहती सोचती है । एक सेवक को हर हाल में अब स्वामी और तानाशाह स्वामी बनने से रोकना ही होगा ।
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