शनिवार, 26 जून 2010

औनर किलिंग : एक विश्लेषण





इन दिनों देश के विभिन्न भागों लगातार घटती घटनाओं/हत्यायों के दौर ने एक बार फ़िर से औनर किलिंग को एक मुद्दे के रूप में सामने रख दिया है । इस बार ये घटनाएं इतनी तेजी से एक साथ घटी हैं कि इस बार ये किसी राज्य , क्षेत्र , और जाति के दायरे से बाहर निकल राष्ट्रीय स्तर पर बहस और समस्या के रूप में चिन्हित की जा रही हैं । न्यायपालिका ने भी इन घटनाओं पर स्वत: संज्ञान ले कर कई राज्य सरकारों से इस बाबत रिपोर्ट तलब की है । भारत में अब तक जितने भी मामले औनर किलिंग के नाम पर चर्चित और विवादित हुए हैं , उनमें से अधिकांश प्रेम और वो भी अंतर्जातीय प्रेम विवाह आदि के इर्द गिर्द ही घूमते से हैं । जबकि वैश्विक परिदृश्य में ऐसा नहीं है ।

औनर किलिंग का मतलब सीधे सीधे अर्थों मे ये है कि , वैसे अपराध और विशेषकर हत्या , जो परिवार की इज्जत प्रतिष्ठा को बचाए रखने के नाम पर की जाती है ।किंतु भारत में ये घटनाएं ज्यादातर प्रेम विवाह और वो भी किसी गैर धर्म मजहब में या किसी अन्य जाति में किए जाने के फ़ैसले के विरोध में ही दिखती हैं । विश्व में जहां कहीं भी औनर किलिंग के नाम पर ऐसी घटनाएं देखी जा रही हैं उनमें कहीं भी ये कारण तो कतई नहीं दिखता है । वैश्विक परिदृश्य में औनर किलिंग के सबसे ज्यादा मामले , अवैध यौन संबंधों को छिपाने के लिए , नाज़ायज़ रिश्तों को छुपाने के लिए , समलैंगिक रिश्तों के सच को छुपाने के लिए , और कट्टर मुस्लिम देशों में धार्मिक प्रतिबंधों को न मानने के विरूद्ध देखने सुनने में आते हैं । और पश्चिमी देशों में जहां से ये औनर किलिंग की प्रथा का चलन शुरू हुआ है वहां भी सबसे ज्यादा मामले इन नाज़ायज़ या विवाहेत्तर संबंधों के कारण ही हुए और हो रहे हैं । जबकि भारत में सबसे अधिक मामले प्रेम विवाह के से ही जुडे हुए हैं ।

भारत में औनर किलिंग सबसे ज्यादा चर्चित हुआ आरूषि मर्डर केस में , जिसमें आरूषि नाम की बालिका की हत्या रात के ढाई तीन बजे के बीच हुई और कहा, बताया गया कि बच्ची की हत्या उसके माता पिता ने की है जो अपने किसी ऐसे ही अवैध रिश्ते के राज खुलने के डर से किया गया है । मगर बाद में जाकर इस पूरे मामले में कुछ भी साबित नहीं हुआ ,और देश की सबसे बडी जांच एजेंसी सीबीआई के हाथों में मामला सौंपने के बावजूद आजतक कुछ भी हासिल नहीं हुआ किसी को । किंतु इसके बाद तो जैसे ये मामले बढते ही चले और दिनोंदिन इनकी रफ़्तार बढती ही जा रही है ।खाप पंचायतों द्वारा सुनाए जाने वाले फ़ैसलों में प्रेमी युगलों को मार दिए जाने की घटना , झारखंड का पत्रकार निरूपमा कांड ,और अब सामने आए ये नए मामले । हालांकि ऐसा नहीं है कि इन मामलों में अचानक ही वृद्धि हो गई है , असल में तो भारत की सामाजिक सरंचना में जाति ,धर्म, भाषा आदि जैसे तत्व जबसे हैं तभी से उनके नाम पर सम्मान, प्रतिष्ठा बचाए रखने के लिए जान लेने देने की परंपरा भी रही है । इतिहास भी इस बात का गवाह रहा है ।

अब तो ऐसा लगता है कि जितना ज्यादा इन घटनाओं की चर्चा हो रही है उससे दोगुनी रफ़्तार से ये घटनाएं बढती जा रही हैं । यही कारण है कि इस बार इन घटनाओं ने सरकार और संबंधित संस्थाओं का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है । अब बात की जा रही है कि औनर किलिंग की बढती घटनाओं को रोकने के लिए कठोर कानून बनाए जाएंगे । लेकिन समाजविज्ञानी इसे नाकाफ़ी और सही नहीं मानते । उनका मानना है कि कत्ल जैसे अपराध के लिए तो पहले से ही कठोरतम सजाओं का प्रावधान है । इसलिए आज जरूरत है कि समाज को इसके लिए मानसिक रूप से तैयार किया जाए । हालांकि इसके लिए समाज विज्ञानी भारतीय समाज के विरोधाभासी चरित्र और स्वरूप को बहुत जिम्मेदार मानते हैं । एक तरफ़ तो सरकार जातियों का स्पष्ट विभाजन तय करती है , उन्हें आरक्षण आदि के नाम पर एक दूसरे से काफ़ी दूर करती है , दूसरी तरफ़, प्रेम से आदि से आगे जाकर , लिव इन रिलेशनशिप, और समलैंगिकता तक को मान्यता देने की कोशिश की जा रही है । ऐसे में तो इस तरह के परिणाम आना अपेक्षित ही हैं । समाज में अशिक्षा का प्रतिशत , और कानून का खत्म होता डर भी इन सबको बढाने के लिए जिम्मेदार है । अब देखना तो ये है कि आखिर ये औनर किलिंग की वेदी पर अभी और कितनी बलियां और दी जाएंगी ॥

सोमवार, 21 जून 2010

आम आदमी के पहुंच से दूर होती उच्च शिक्षा


आजकल कालेजों में दाखिले की मारामारी है । शहरों में विशेषकर मेट्रो और राजधानी में तो ये मारामारी अपने चरम पर होती है । कहने को तो परीक्षाओं से पहले बहुत से सलाह केंद्र और सहायता केंद्र पर सलाह देते और ढांढस बंधाते काऊंसलर न सिर्फ़ विद्यार्थियों बल्कि उनके अभिभावकों को भी कम नंबर आने या फ़िर कि शीर्ष वरीयता सूची में नाम न आने आदि को लेकर किसी भी तरह से परेशान न होने की हिदायत देते रहते हैं । किंतु हकीकतन जब परीक्षा परिणामों के बाद दाखिले की दौड शुरू होती है तब एक बार फ़िर से उन्हीं नंबरों की अहमियत , वही कट लिस्ट आदि का झंझट आदि से विधार्थी का सामना होता है । और विभिन्न कालेजों , संस्थानों में दाखिला मिलने /न मिल पाने की ऊहापोह में एक बार फ़िर से अभिभावकों की नाराजगी , उनकी मजबूरी का ताना सुनना पडता है ।

यहां कुछ तथ्य ऐसे हैं जो न सिर्फ़ हैरान कर देते हैं बल्कि अफ़सोस करने लायक लगते हैं । पिछले सिर्फ़ दो दशकों में व्यावसायिक परिसरों , मल्टीप्लेक्सों , शौपिंग मौलों , म्युजिक प्लैनेट , बडे पब तथा रेस्त्रां आदि की संख्या में तकरीबन ७८ प्रतिशत की वृद्धि हुई है । जबकि इसके विपरीत शिक्षण संस्थानों , विशेषकर सरकारी कालेजों की संख्या में सिर्फ़ १९ प्रतिशत की । इसी बात से पता चल जाता है कि सरकार शिक्षा के प्रति कितनी गंभीर है । ऐसी हालत में जहां इन कालेज प्रशासनों द्वारा दाखिले के नाम पर , विभिन्न कोटे की सीटों का आरक्षण , तो और भी कई तरीकों से जम कर भ्रष्टाचार और उगाही की जाती है । वहीं बहुत से इच्छुक विद्यार्थी कालेजों में दाखिला न ले पाने के कारण टूटे हुए मन से कोई और दिशा पकड लेते हैं या बेमन से अन्य कोर्सों में दाखिला लेते हैं ।

इससे जुडी और शायद उससे भी ज्यादा गंभीर समस्या है इस शिक्षा का दिनानुदिन बहुत अधिक मंहगा होते जाना । मोटे तौर पर यदि सिर्फ़ ये कहा जाए कि उच्च शिक्षा में आज कोई भी कोर्स ऐसा नहीं है जहां पर किफ़ायती दरों पर भी अभिभावक अपने बच्चों को पांच दस लाख से कम शिक्षण शुल्क दे कर पढा सकें । अब तो स्थिति ऐसी हो गई है कि इस वास्तविकता को सभी मन ही मन स्वीकार भी चुके हैं , इसलिए बच्चों के हायर सेकेंड्री में पहुंचते ही वे अपनी बचत राशि और जमा पूंजी टटोलने लगते हैं , बैकों के चक्कर काटने लगते हैं जहां से उन्हें शिक्षा लोन मिलने की गुंजाईश हो । सरकार यदि कभी इन सब पर अपना पक्ष रखती है तो स्पष्ट कह देती है कि शुल्क में वृद्धि तो स्वाभाविक है और सरकार यदि संस्थानों की संख्या बढ भी दे तो भी शुल्क में बहुत अधिक अंतर नहीं पडने वाला है ।

अब इसका एक प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष परिणाम ये होता है कि इन सभी बडे बडे संस्थानों में सिर्फ़ आर्थिक रूप से सक्षम माता पिता के बच्चे ही पढ पाते हैं और फ़िर जब ऐसे बच्चे डिग्रियां लेकर उन संस्थानों से बाहर निकलते हैं तो उनका पहला और आखिरी ध्येय सिर्फ़ और सिर्फ़ पैसा, रुतबा , शोहरत बनाना ही होता है । उन्हें क्या मतलब देश से समाज से उसके विकास से । यही वो कारण हैं जो बच्चों को देश से बाहर जाने को प्रेरित करता है ,यही वो कारण है जो बच्चों को रोकता है कि वे अपने देश में रह कर शोध और अविष्कारों में अपना समय बर्बाद करें । ये सब एक ऐसी समस्या बन चुकी है जिसे जानबूझ कर बने रहने दिया जा रहा है , क्योंकि ये उनके लिए एक सुविधा की तरह है जो देश का चमचमाता वर्ग है । लेकिन आने वाले समय में ये वर्ग द्वेष आगे बढ कर यदि गृह युद्ध का रूप ले ले और देश का एक बडा युवा वर्ग सही शिक्षा के अभाव में हतोत्साहित होकर दिशाहीन हो जाए तो इसके लिए समाज और देश को तैयार ही रखना चाहिए खुद को ।

रविवार, 6 जून 2010

मानव व्यवहार में हो रहा परिवर्तन : एक विश्लेषण



अमेरिका के स्कूल में एक विद्यार्थी ने अपने सहपाठियों और शिक्षकों पर गोलिया बरसाईं । दिल्ली में सडक पर एक कारों के आपस में बस छू भर जाने से क्रोधित दो युवकों ने आपसी मारपीट की , और एक ने दूसरे को गंभीर रूप से घायल कर दिया । फ़्रांस में वीडियो गेम्स देखने से मना करने पर बेटे ने मां को ही मार डाला । गाजियाबाद में केले के पैसे मांगने पर झगडा , एक की मौत । अब पूरी दुनिया भर में इस तरह की घटनाएं और खबरें आम सुनने पढने और देखने को मिल रही हैं । समाज विज्ञानियों ने पहले तो इन्हें गंभीरतापूर्वक नहीं लिया किंतु अब जबकि इन घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हो रही है तो इंसान के इस बदलते व्यवहार पर अध्य्यन करने के बाद इसके कारण और परिणामों पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की । इस रिपोर्ट में तफ़सील से बताया गया कि किन वजहों से आज आदमी इस तरह तनाव , व्यग्रता, कम सहनशील ,उग्र होता जा रहा है ।

वर्तमान में जीवनशैली में एक नियमित भागदौड , एक मशीनीपन , प्रतिस्पर्धी वातावरण सा बन चुका है । शहरों में तो ये बात इतनी ज्यादा हो चुकी है कि दिन और रात का फ़र्क ही नहीं पता चलता है अब । ग्रामीण क्षेत्रों में बेशक अभी भी उतनी गलाकाट नहीं मची हुई है , और सारा जीवन एक नियमित सी दिनचर्या पर चल रहा है इसीलिए वहां अब भी रोड रेज , बात बेबात मारपीट , आदि की घटनाएं आम तौर पर होती नहीं दिखती हैं । जहां तक शहरो की बात है तो , यहां तो यदि बचपन से ही आकलन किया जाए तो आज के पांच वर्ष का बच्चा जो मानसिक शारीरिक दबाव तथा आई क्यूं यानि बोध परिपक्वता को महसूस करता है वो दो तीन दशक पहले तक बालिगपन में पहुंचने वाला युवा भी नहीं कर पाता था । घर से भारी बस्तों का बोझ उठाए बालक कब माता पिता की अति महात्वाकांक्षा के दबाव तले आ जाता है उसे पता ही नहीं चलता । अब मां पिता दोनों ही कामकाजी होते जाने के चलन ने जहां उनसे घर में मिलने वाला अभिभावकीय स्नेह , उनका वक्त .छीन लिया वहीं सब कुछ पैकेट बंद खाने पीने पर ही निर्भरता तक सीमित हो कर रह गया है ।

मानव के बदलते हुए व्यवहार पर शोधरत समाज विज्ञानियों और मनोविज्ञानियों ने इसके कुछ विशेष कारणों की पहचान की । इनमें से पहला है बदलता खानपान । रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में लोगों की खान पान की प्रवृत्ति में बहुत भारी बदलाव आया है । पूरे विश्व में जिस तेज़ी से फ़ास्ट फ़ूड या जंक फ़ूड भोज्य पदार्थों के सेवन का चलन बढा है उसने पारंपरिक भोजन को पीछे धकेल दिया है । विकसित देशों में तो ये खैर बहुत पहले से ही चला आ रहा है । मोटापे , रक्तचाप तथा पेट जनित कई बीमारियों के लिए जिम्मेदार ये भोज्य पदार्थ अब पश्चिमी समाज को भी खटकने लगे हैं । इसलिए वहां भी अब इन पदार्थों को स्कूल कालेज परिसरों में प्रतिबंधित करने पर विचार किया जा रहा है । ऐसे भोजन न सिर्फ़ पाचन तंत्र को प्रभावित करते हैं बल्कि शरीर में उच्च रक्तचाप और उत्तेजना के लिए भी जिम्मेदार हैं । इसलिए इनके लगातार सेवन से चिडचिडापन , तनाव का होना स्वाभाविक ही है । आज भारतीय शहरों में भी इनके प्रति बढता रुझान और उसके प्रभाव के परिणाम भी दिखने लगे हैं ।

इसके अलावा दूसरा कारक बताया गया है मनोरंजन , समाचार , सूचना के नाम पर लोगों के बीच फ़ैल रही हिंसात्मक सामग्री का प्रचार और प्रसार । रिपोर्ट बताती है कि बच्चों के खेल हों या बडों की फ़िल्में , समाचार हों या सूचना संसार हर ओर हिंसा , और उत्तेजना को ही आधार बना कर लोगों के सामने परोसा जा रहा है । तो ऐसे में जो भी एक आम व्यक्ति देख समझ रहा है धीरे धीरे उसका प्रभाव न सिर्फ़ उसके मस्तिष्क पर पडता है बल्कि उसका व्यवहार भी इसी तरह परिवर्तित होता जाता है । पश्चिमी देशों में तो इस कई ऐसी घटनाएं और अपराध तक इन्हीं कार्यक्रमो , सिनेमा , धारावाहिकों आदि से प्रेरित होते हैं । मनोविज्ञानी बताते हैं कि जितना प्रभाव सकारात्मक और सीधी साधी प्रस्तुतियां नहीं डालती हैं , उससे कहीं अधिक तीव्रता से मारधाड, हिंसा , अश्लीलता, उत्तेजना आदि की सामग्रियां मस्तिष्क ग्रंथियों को प्रभावित करती हैं ।

आज इंसान के व्यवहार में बढती उग्रता और हिंसा का एक बडा कारण नशे के सेवन को भी माना गया है । समाज विज्ञानी कहते हैं कि समाज में जिस गति से विभिन्न तरह के नशीले पदार्थों का , शराब , आद कि सेवन बढा है वो भी इन सबके लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है । इस बात को साबित करते हुए मनोविज्ञानी कहते हैं कि पुरूषों की तुलना में महिलाएं अब भी नशे के सेवन में बहुत पीछे हैं और यही कारण है कि क्रोध ,द्वेष, हिंसा , आदि में अधिकांश और जल्दी , पुरूष वर्ग ही पाया जाता है । आजकल युवा सबसे अधिक नशे की गिरफ़्त में हैं इसलिए उनके व्यवहार में भी इसका प्रभाव देखने को मिल रहा है ।

समाज विज्ञानियों ने इस तरह के बदलवा और मानव व्यवहार में निरंतर हो रहे परिवर्तनों को बहुत ही गंभीर चिंता का विषय माना है । उनका मानना है कि ये न सिर्फ़ समाज के लिए , लोगों के लिए , बल्कि खुद इंसानियत के लिए भी बहुत ही नुकसानदायक होने वाला है । सबसे दुखद बात तो ये है कि अभी तक इन बातों को गंभीरतापूर्वक लिया ही नहीं गया है ।

शनिवार, 5 जून 2010

काश कि इस तरह मनाया जा सके पर्यावरण दिवस




हर साल पांच जून को पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जा रहा है । और पिछले एक दशक से जब से इस दिवस को सिर्फ़ मनाया और उससे ज्यादा मनाए जाने को जताया जा रहा है तभी से लगातार पर्यावरण की खुद की सेहत बिगडती जा रही है । इससे बडी विडंबना और क्या हो सकती है कि आज जब ये विश्व पर्यावरण दिवस को मनाए जाने की खानापूर्ति की जा रही है तो प्रकृति भी पिछले कुछ दिनों से धरती के अलग अलग भूभाग पर , कहीं ज्वालामुखी प्रस्फ़ुटन के रूप में , तो कहीं लैला , कहीं सुनामी , कहीं कैटरीना और कहीं ऐसे ही किसी प्रलय के रूप में इस बात का ईशारा भी कर रही है कि अब विश्व समाज को इन पर्यावरण दिवस को मनाए जाने जैसे दिखावों से आगे बढ कर कुछ सार्थक करना होगा । बडे बडे देश और उनका विकसित समाज जहां प्रकृति के हर संताप से दूर इसके प्रति घोर संवेदनहीन होकर मानव जनित वो तमाम सुविधाएं उठाते हुए स्वार्थी और उपभोगी होकर जीवन बिता रहा है जो पर्यावरण के लिए घातक साबित हो रहे हैं । वहीं विकासशील देश भी विकसित बनने की होड में कुछ कुछ उसी रास्ते पर चलते हुए दिख रहे हैं ।

जब भी प्रकृति के नाम पर चिंतित होने की बारी आती है तो कभी पृथ्वी सम्मेलन तो कभी टोक्यो समझौते जैसा कुछ करके उसे भुला दिया जाता है ।
आज यदि धरती के स्वरूप को गौर से देखा जाए तो साफ़ पता चल जाता है कि आज नदियां , पर्वत ,समुद्र , पेड , और भूमि तक लगातार क्षरण की अवस्था में हैं । और ये भी अब सबको स्पष्ट दिख रहा है कि आज कोई भी देश , कोई भी सरकार , कोई भी समाज इनके लिए उतना गंभीर नहीं है जितने की जरूरत है । बेशक लंदन की टेम्स नदी को साफ़ करके उसे पुनर्जीवन प्रदान करने जैसे प्रशंसनीय और अनुकरणीय प्रयास भी हो रहे हैं मगर ये ऊंट के मुंह में ज़ीरे के समान हैं । आज समय आ गया है कि धरती को बचाने की मुहिम को इंसान को बचाने के मिशन के रूप में बदलना होगा ।

बेशक
इंसान बडे बडे पर्वत नहीं खडे कर सकता , बेशक चाह कर भी नए साफ़ समुद्र नहीं बनाए जा सकते और , किंतु ये प्रयास तो किया ही जा सकता है कि इन्हें दोबारा से जीवन प्रदान करने के लिए संजीदगी से प्रयास किया जाए ।
भारत में तो हाल और भी बुरा है । जिस देश को प्रकृति ने अपने हर अनमोल रत्न , पेड, जंगल, धूप , बारिश , नदी , पहाड , उर्वर मिट्टी से नवाज़ा हो , यदि वो भी इसका महत्व न समझते हुए इसके नाश में लीन हो जाए तो इससे अधिक अफ़सोस की बात और क्या हो सकती है ।

इसके लिए सबसे सरल उपाय है कि पूरी धरती को हरा भरा कर दिया जाए । इतनी अधिक मात्रा में धरती पर पेडों को लगाया जाए कि , धरती पर इंसान द्वारा किया जा रहा सारा विष वमन वे वृक्ष अपने भीतर सोख सकें और पर्यावरण को भी सबल बनने के उर्जा प्रदान कर सकें । क्या अच्छा हो यदि कुछ छोटे छोटे कदम उठा कर लोगों को धरती के प्रति , पेड पौधे लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए । बडे बडे सम्मेलनों , आशावादी समझौतों आदि से अच्छा तो ये होगा कि इन उपायों पर काम किया जाए । लोगों को बताया समझाया और महसूस कराया जाए कि पेड बचेंगे ,तो धरती बचेगी ,धरती बचेगी ,तो इंसान बचेगा । सरकार यदि ऐसे कुछ उपाय अपनाए तो परिणाम सुखद आएंगे

१)जन्मदिन , विवाह, और अन्य ऐसे समारोहों पर उपहार स्वरूप पौधों को देने की परंपरा शुरू की जाए । फ़िर चाहे वो पौधा ,तुलसी का हो या गुलाब का , गुलाब का हो या गेंदे का । इससे कम से कम लोगों में पेड पौधों के प्रति एक लगाव की शुरूआत तो होगी ।

) विभिन्न सरकारी समारोहों , सम्मेलनों और पुरस्कार वितरण कार्यक्रमों में शाल, स्मृति चिन्ह के साथ साथ पौधे देने की प्रथा भी शुरू की जाए ।


) सभी विशेष दिवसों , जयंतियों, आदि पर सरकार और गैर सरकारी संगठनों द्वारा वृक्षारोपण अभियान शुरू किया जाए वो भी पूरे वेग से और पूरी गंभीरता से।


४)सभी शिक्षण संस्थानों , स्कूल कालेज आदि में विद्यार्थियों को , उनके प्रोजेक्ट के रूप में विद्यालय प्रांगण में , घर के आसपास , और अन्य परिसरों में पेड पौधों को लगाने का कार्य दिया जाए । यदि इन छोटे छोटे उपायों पर ही संजीदगी से काम किया जाए तो ये कम से कम उन बडे बडे टोक्यो सम्मेलन से ज्यादा ही परिणामदायक होगा नि:संदेह ।

इंसान को अपने जीवन में पेड लगाने का सुख अवश्य ही प्राप्त करना चाहिए । मैं अपने हाथों के कम से कम पांच सौ पेड और पौधे लगा चुका हूं । पिछले ग्राम प्रवास के दौरान जब अपने लगाए आम के इन पेडों को देखा तो ऐसा लगा कि संतान बडी होकर गले से लग रही है और मेरे दिल को बडी ही ठंडक पहुंची । देखिए ये हैं वो आम के , शीशम के और जाने किस किस के पेड .........


रविवार, 30 मई 2010

भारतीय रेल : सुरक्षा और स्वच्छता से दूर




अभी हाल ही में हुई रेल दुर्घटना , और इससे पहले दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मची भगदड की दुर्घटना ,ने एक बार फ़िर से भारतीय रेलों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार , रेल प्रशासन और संबंधित लोगों की सोच और प्रतिबद्धता को कटघरे में खडा कर दिया है । भारतीय रेलवे न सिर्फ़ रेलों के परिचालन , बल्कि अपनी बहुत बडी नियोजकों की संख्या के कारण न सिर्फ़ एशिया में बल्कि विश्व में भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है ।भारत में अंग्रेजी शासन के देनों में यदि ये कहा जाए कि भारतीय रेल उनके द्वारा दी गई सबसे बहुमूल्य प्रणाली थी तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी शायद ।इस बात का अंदाज़ा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि स्वंत्रता से पहले भारत में अंग्रेजों द्वारा ,बिछाई गई ,रेल पटरियों की कुल लंबाई का सिर्फ़ दो प्रतिशत स्वंत्रता के बाद भारत की सरकारों द्वारा बिछाई गई । न सिर्फ़ सवारी गाडियों बल्कि वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए ढुलाई वाली मालगाडियों के परिचालन का विचार भी उन्हीं की देन थी । रेल परिचालन की ताकत को पहचानते हुए आजादी की लडाई लड रहे रणबांकुरे कहते थे कि जो काम बम और बारूद न कर सके जो काम समाचार और अखबार न कर सके वो काम रेल ने कर दिया



आज भारतीय रेलों के परिचालन को दशकों बीत चुके हैं । भार और व्यवसाय के दृष्टिकोण से आज भारतीय रेल बहुत लंबा सफ़र तय कर चुकी है । ऐसा भी नहीं है कि आधी शताब्दी से ज्यादा उम्र की हो चुकी भारतीय रेलवे , आधुनिक चुनौतियों , नई समस्याओं , और अन्य समकालीन सुविधाओं से लैस होने में बिल्कुल ही कोताही बरत चुकी है । एक साथ बहुत सी परियोजनाओं पर काम चल रहा है । राजधानी , शताब्दी के बाद दुरंतो और भविष्य में बुलेट ट्रेनों के संचालन जैसी महात्वाकांक्षी योजनाओं पर भी काम चल रहा है । भारत में जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि होते जाने के कारण स्वाभाविक रूप से सबसे बडे यातायात साधन के रूप में यात्रियों का भारी दबाव भी कमोबेश भारतीय रेलवे झेलता ही जा रहा है । अब तो कई राज्यों , दुर्गम पहाडियों आदि में भी नई पटरियों को बिछाने का काम जोर शोर से चल रहा है । कुच वर्षों पहले सफ़लता पूर्वक शुरू की गई कोंकण रेलवे परियोजना एक ऐसी ही सफ़लता थी भारतीय रेल के लिए । बरसों पुराने चले रही व्यवस्थाओं , नीरस हो चुके रेल टिकटों , स्टेशनों और प्लेटफ़ार्मों के रंग रूप में समय समय पर बदलाव करने का प्रयास किया जाता रहा है । इसके अलावा पिछले एक दशकों में भारतीय रेलवे ने मुनाफ़े में सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा अर्जित सफ़लता में अपना नाम भी दर्ज़ कराया । लेकिन ऐसा नहीं है कि भारतीय रेलवे का सिर्फ़ यही उजला उजला पक्ष है ।

भारतीय रेल संचालन व्यवस्था को विश्व की कुछ असुरक्षित यातायात व्यवस्थाओं में भी स्थान मिला हुआ है । आंकडे ही बता देते हैं कि छोटी छोटी घटनाओं , लापरवाही से लेकर बहुत ही बडी दुर्घटनाओं से रूबरू होता भारतीय रेलवे इतने समय बाद भी श्रोताओं का विश्वास नहीं जीत सका है । एक सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय रेल में सफ़र करने वाले यात्रियों में से ७९ प्रतिशत ने बेझिझक माना कि उन्हें रेल यात्रा में सफ़र करना कष्टदायी और असुरक्षित लगता है । यदि दुर्घटनाओं का आकलन किया जाए तो एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में पिछले कुछ दशकों में भी रेल दुर्घटनाओं में से ३७ प्रतिशत जहां मानवीय भूलों के कारण हुई है तो १९ प्रतिशत दुर्घटनाएं आतंकी घटनाओं के कारण जबकि २२ प्रतिशत मौसम के कारण और बांकी की अन्य कारण जैसे , रेलवे क्रासिंग पर फ़ाटकों का न होना , रेलों की छतों पर सफ़र करना और ऐसे ही कारणों से होती हैं । वैश्विक आतंकवाद पर अध्ययन और विश्लेषण करने वाली संस्था की मानें तो भारत भी उन देशों में शामिल है जहां के यातायात व्यवस्था , हमेशा ही अलगाववादियों , आतंकवादियों , और आंदोलनकारियों के निशाने पर रहती है । ताजातरीन रेल दुर्घटना भी माओवादियों की करतूत का ही परिणाम मानी जा रही है ।

सबसे अहम बात ये है कि भारतीय रेल प्रशासन कभी भी सुरक्षा और सफ़ाई व्यवस्था के प्रति गंभीर नहीं दिखा । हालात का अंदाज़ा इसी बात से हो जाता है कि पिछले कुछ समय से मुनाफ़े में चल रही भारतीय रेल अभी तक अपनी सभी क्रासिंग्स पर फ़ाटकों की व्यवस्थ नहीं कर पाई है , जो प्रति वर्ष होने वाली रेल दुर्घटनाओं का सबब बनते हैं । आज भी सर्दी और धुंध /कोहरे वाले मौसम में रेलों की परिचालन व्यवस्था बिल्कुल चरमरा सी जाती है और बहुत सी दुर्घटनाओं का कारण बनती हैं । बेशक आज रफ़्तार की बात में भारतीय रेल बहुत सी अन्य समकालीन रेल परिचालनों के समकक्ष बन गई है मगर अब भी सुरक्षा की दृष्टि से उनसे कोसों दूर है । अत्याधुनिक संचार प्रणालियां , सुरक्षा उपकरणों , नए संयंत्रों से अभी भी भारतीय रेलों को लैस नहीं किया जा सका है । और हास्यास्पद रूप से यहां के रेल मंत्री कभी रेलों में कुल्हड योजना चला कर तो कभी गरीब रथ चला कर और कभी दुरंतो रेल चला कर अपनी और भारतीय रेलों की सफ़लता का ढिंढोरा पीटते रहे हैं ।

एक आम आदमी की नज़र से देखा जाए तो टिकट लेने से , रेल गाडी में सवार होने तक , सफ़र की शुरूआत से लेकर सफ़र की समाप्ति तक पूरी रेल यात्रा एक कटु अनुभव ही रहता है उसके लिए । बहुत सारी वैकल्पिक व्यवस्थाओं के होने के बावजूद रेल प्रशासन आज तक ये नहीं सुनिश्चित कर पाया है कि रेल यात्री अपने आपको सुरक्षित महसूस कर सकें । बेशक बढती रेल दुर्घटनाओं और उनमें मरने वालों निर्दोष यात्रियों की बढती संख्या को देखते हुए कुछ वर्षों पहले रेल यात्रियों का बीमा करवाए जाने की योजना शुरू की गई थी , किंतु दुर्घटना के बाद जिस तरह से प्रशासन किसी भी जवाबदेही से पल्ला झाड लेता है उसीसे से उसकी नीयत का पता चल जाता है । हाल ही दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मची भगदड पर बोलते हुए वर्तमान रेल मंत्री के बयान ने भी ऐसी ही बानगी पेश की थी । सुरक्षा के साथ साथ सफ़ाई और खान पान व्यवस्था का भी यही है । हालांकि कई रेल जोनों में सफ़ाई की व्यवस्था को निजि हाथों में सौंपे जाने के बाद स्थिति में कुछ सुधार अवश्य हुआ है मगर कुल मिला कर स्थिति अभी भी नारकीय ही है । ऐसा ही हाल रेलवे की खान पान व्यवस्था का भी है ।

भारतीय रेल मंत्रालय , रेल मंत्री , रेल प्रशासन , बेशक हर साल कोई न कोई लोक लुभावन योजना बना कर , कभी किराए में रियायत देकर , तो कभी कोई विशेष ट्रेन चला कर आम जनमानस को थोडी देर के लिए भटका दे । मगर जब समय समय पर इस तरह के हादसों में आम लोग अपने परिजनों को खोते हैं तो उनके मन में सिर्फ़ एक ही सवाल टीस मारता है ..........आखिर कब तक ??????????

सोमवार, 17 मई 2010

खेल बनाम आम जनता : राष्ट्रमंडल खेलों के बहाने कुछ सवाल


राजधानी दिल्ली में आगामी महीनों में होने जा रहे राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन और व्यवस्था के लिए राज्य सरकार को जब अपेक्षित धनराशि नहीं मुहैय्या कराई जा सकी , ( यहां एक बात गौरतलब है कि ये कि ये राज्य सरकार के लिए एक सुखद संयोग है कि अभी केंद्र में भी उसी दल की सरकार है जिसकी राज्य सरकार में अन्यथा खींचतान ज्यादा भी हो सकती थी ), तभी ऐसा लगने लगा था कि राज्य सरकार इसके लिए विकल्पों की तलाश करेगी । सरकार ने बहुत से प्रत्यक्ष परोक्ष फ़ैसले लिए । इनमें आनन फ़ानन में गैसे पैट्रो पदार्थों के दामों मे वृद्धि के अलावा और भी बहुत कुछ सिर्फ़ इस वजह से किया गया ताकि राष्ट्रमंडल खेलों के लिए धन जुटाया जा सके । अब जबकि सूचना के अधिकार के तहत राज्य सरकार से जुटाई गई जानकारी के आधार पर हुए खुलासे के आधार पर ये रिपोर्ट आने पर कि गरीबों के कल्याण के लिए प्रस्तावित कल्याणकारी योजनाओं के निहित धन को सरकार ने इन खेलों के आयोजन में लगा दिया तो सरकार की मंशा और खेलों के साथ आम जनता के सरोकार पर प्रश्न चिन्ह उठ गए हैं ।


किसी भी देश के लिए , कोई भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के किसी भी आयोजन का मेजबान बनना कई मायनों में महत्वपूर्ण और बहुत हद तक आर्थिक रूप से फ़ायदेमंद भी साबित होता है । न सिर्फ़ देश की प्रशासन व्यवस्था , में देश वासियों में , भारत में 1982 , वो वर्ष था जब एशियाड खेलों के रूप में भारत में पहली बार किसी बडे अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था । इस खेल प्रतियोगिता की सफ़लता ने विश्व परिदृश्य में न सिर्फ़ भारत के बढते आत्मविश्चास और विकास को कायम किया बल्कि ,भारत में रंगीन टेलिविजन , राजधानी में व्यापार संवर्धन पार्कों और अप्पू घर सरीखी स्मृतियों को सहेज लिया । एक और बडी उपलब्धि ये रही कि एक दम अप्रत्याशित रूप से भारत का स्थान उस बार पदक तालिका में दूसरा रहा । इन सबसे कुछ बातें तो स्पष्ट हो जाती हैं ।

कोई भी अंतरराष्ट्रीय आयोजन देश की प्रतिष्ठा में वृद्धि करता है । यदि ये कोई खेल आयोजन होता है तो देश के खेल जगत और खिलाडियों को भी इसका सकारात्मक फ़ायदा मिलता है जो उनके सुधरे हुए प्रदर्शन में साफ़ प्रमाणित हो जाता है । यदि आयोजन सफ़ल रहता है तो ये भविष्य में ऐसे सभी आयोजनों के लिए रास्ते खोल देता है ।

किंतु इसके साथ ही इस मुद्दे पर कुछ अन्य बहुत से महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान देना भी जरूरी हो जाता है । जिस देश में अब भी सरकार , बुनियादी समस्याओं से जूझ रही हो , अपराध , आतंकवाद , भ्रष्टाचार, और अंदरूनी कलह जैसी जाने कितनी ही मुसीबतें सामने मुंह बाए खडी हों , जिस देश को अभी अपने विकास के लिए जाने कितने ही मोर्चों पर संघर्ष करना बांकी हो , जिस देश को आज अपना धन और संसाधन खेल, मनोरंजन जैसे कार्यों से अधिक ज्यादा जरूरी कार्यों पर खर्च करने की जरूरत हो , सबसे बढकर जिस देश को ऐसे खेल आयोजनो की मेजबानी हासिल करने के बाद , उनकी तैयारी के लिए इस तरह के अपराध ( जी हां सरकार के इस कृत्य को निश्चित रूप से एक सामाजिक और आर्थिक अपराध ही माना जाएगा ) करने की मजबूरी सामने आ जाती हो ,क्या उसके लिए जरूरी है कि विश्च में सिर्फ़ अपनी साख बढाने के लिए वो ऐसे आयोजनों की जिम्मेदारी उठाने को उत्कट हो ।

अभी तो सिर्फ़ कुछ सूचनाओं के मिलने भर से इस बात का खुलासा हुआ है , जाने ऐसी कितनी ही तिकडम सरकार और प्रशासन ने अपने बजट को पूरा करने के लिए लगाई होंगी जिनका खुलासा होना बांकी है । अब यदि खेल और खिलाडियों के दृष्टिकोण से भी देखा जाए तो भी ऐसे आयोजन का सीधा सीधा असर किसी खिलाडी के पूरे खेल जीवन पर पडता है । हां इतना जरूर है कि घरेलू मैदान और घरेलू दर्शकों का फ़ायदा मेजबान खिलाडियों को जरूर मिल जाता है । लेकिन इन सबके बावजूद भारत में यदि क्रिकेट के अलावा किसी भी खेल के खिलाडियों से खेल को अपने कैरियर के रूप में चुनने के प्रति और देश में खेलों के प्रति आम लोगों के बदलते हुए नज़रिए की दृष्टिकोण से देखने की बात है तो स्थिति पूर्णतया निराशाजनक है ।

इसके कारण भी वाजिब हैं , आज भी गाहे बेगाहे इस तरह की खबरें सुनने को मिलती रहती हैं कि किसी खेल में देश का प्रतिनिधित्व करने वाले अमुक खिलाडी के साथ बुरा सलूक किया गया या वो प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार होकर किसी तरह कोई छोटा मोटा काम करके जीवन यापन करने पर मजबूर है । अभी कुछ माह पहले देश की उडन परी के खिताब से नवाजी गई धाविका पी टी ऊषा के साथ खेल अधिकारियों द्वारा किया गया बर्ताव सबको भूला नहीं होगा ।
यहां एक अहम मुद्दा ये भी है कि आखिर एक आम आदमी को ऐसे अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों से क्या सरोकार हो सकता है , वो भी ऐसे में जबकि उसे रोज आटे दाल के बढते हुए भावों को सिर्फ़ इसलिए जूझना पड रह है क्योंकि उसकी भरपाई किसी खेल आयोजन के लिए की जा रही है ।


सरकार और उसके कर्ताधर्ता तो इतने कृतघ्न हो चुके हैं कि ऐसे प्रकरणों के खुलने के बावजूद भी सरकार और उसके नुमाईंदों की तरफ़ से कोई स्पष्टीकरण तक नहीं दिया गया है । इसका मतलब साफ़ है कि सरकार भी ये सब सोची समझी साजिश के तहत ही कर रही है । एक और पहलू ये भी है कि एक तरफ़ जब दिल्ली में आतंकी घटनाओं की वारदातें , अपराधियों की बढता मनोबल , जैसी प्रवृत्ति भी सामने है , इनके अलावा जगह जगह पर फ़ैली हुई गंदगी ,ट्रैफ़िक के बिगडते हालात , जैसी बहुत सी बातें हैं जिनपर गौर करने की बहुत ही जरूरत है । अभी इन खेलों के आयोजन में बहुत ज्यादा समय नहीं रह गया है देखना है कि तब तक इन खेलों के पीछे चल रहे और कितने खेलों पर से पर्दा उठता है ॥

रविवार, 16 मई 2010

दिल्ली का प्लेटफ़ार्म ......मरते बिहारी ....और काहिल रेल मंत्री....



( ये चित्र तथा नीचे के दोनों चित्र मेरी पिछली बिहार यात्रा के हैं जो मैंने खुद अपने मोबाईल से खींचे थे और उस दिन भी कुछ वैसा ही हुआ था जैसा कि आज हुआ है )


दिल्ली से बिहार की रेल यात्रा करने का अनुभव , सिर्फ़ वो ही जान सकता है जिसने ये यात्रा की हो । लगभग तीन महीने पहले से ही सभी रेलों में आरक्षित सीटों की अनुपलब्धता , इसके बाद दलालों द्वारा चमत्कारिक रूप से उस अनुप्लबध्ता के बावजूद भारी दाम चुका कर टिकटों को खरीदना , फ़िर जाने क्या क्या सामान भर के यात्रा की शुरूआत की तैयारी करना , फ़िर प्लेटफ़ार्म पर पहुंच कर किसी जंग लडने की लडने जैसे अनुभव से गुजरते हुए रेल में बैठना, इसके बाद तमाम असुविधाओं और मुसीबतों को झेलते हुए गंतव्य तक पहुंचना । हाल ऐसा है कि हर रेल यात्रा अपने आप में एक त्रासदी बज जाती है उस यात्री और उसके परिवार के लिए । और कभी कभी तो ये यात्रा शुरू होने से पहले ही त्रासदी का रूप ले लेती है जैसे कि आज नई दिल्ली स्टेशन पर हुआ । यदि लोगों को याद होगा तो अभी कुछ वर्ष पहले भी ऐसी ही एक दुर्घटना में प्लेटफ़ार्म पर मची भगदड में बहुत से लोगों ने अपनी जान गंवाई थी और बहुत से लोग घायल हुए थे । सबसे बडा दुखद आश्चर्य ये रहा कि , ये घटना भी राजधानी दिल्ली के प्लेटफ़ार्म पर ही घटी थी , और जो ट्रेनें उस समय जाने वाली थीं वो बिहार के लिए चलने वाल्री ट्रेनें थीं और जाहिर है कि उसमें बैठ कर यात्रा करने के लिए पहुंचे यात्री जो इस दुर्घटना का शिकार हुए वे सब के सब बिहार के ही थी । क्या ये महज इत्तेफ़ाक है । इस बात को परखने के लिए कुछ तथ्यों पर गौर करना समीचीन होगा ।



राजधानी
में दूसरे राज्यों से पलायन करके रोजगार शिक्षा की तलाश में पहुंचने वालों में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों की संख्या यदि सबसे ज्यादा नहीं तो उससे थोडा ही कम होगी । आज भी मकर संक्राति, होली , सरस्वती पूजा , दुर्गा पूजा , छठ आदि सालान त्यौहारों के अलावा विवाह , मुंडन , उपनयन , श्राद्ध , बरसी आदि जैसी परंपराओं और संस्कारों के निर्वहन के लिए सभी अपने मूल निवास में ही जाने को वरीयता देते हैं । जाहिर है कि इसका फ़ल ये निकलता है कि सभी साल में एक दो या इससे अधिक बार ग्राम यात्रा जरूर करते हैं । न सिर्फ़ यात्रा करते हैं बल्कि अपने साथ बहुत सारा सामान भी ले कर आते जाते हैं । उदाहरण के लिए यहां से कपडे लत्ते , साबुन तेल , बक्से अटैची , छाते जूते के अलावा पंखे , कुर्सियां , आदि भी लद लदा के ले जाई जाती हैं , जबकि वापसी में धान ,चावल , अब आम के मौसम में आम की बोरियां लाद कर ले आते हैं , वो भी बडे ही आदतन रूप से । भारतीय रेल की बात करें तो ऐसा नहीं है कि भारतीय रेल ने बढती भीड को और यात्रियों की बढती संख्या को देखते हुए कुछ भी नहीं किया । पिछले एक दशक में प्रत्येक वर्ष कुछ नई रेल बिहार के लिए चलाई जाती रही हैं । एक संयोग के अनुसार से पिछले काफ़ी समय में रेल मंत्रालय बिहार के ही किसी सांसद के पास रहने के कारण इसका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ तो इतन हुआ ही है ।


यदि
आज की दुर्घटना की और ऐसी सभी दुर्घटनाओं की बात करें तो कुछ महत्वपूर्ण सवाल एक आम नागरिक के रूप में , दिल्ली में रहने वाले बिहार के उस निवासी के रूप में भी जो हर साल इन परिस्थितियों से गुजरता है । क्या हर साल गर्मियों की छुट्टियों में , और विशेष मौकों पर सिर्फ़ कुछ विशेष रेलगाडियों को चला कर इतिश्री कर लेने भर से रेल प्रशासन की जिम्मेदारियां खत्म हो जाती हैं । आखिरकार अभी तक बिहार उत्तर प्रदेश के लिए अलग से रेल टर्मिनल बनाने की प्रस्तावित योजना को मूर्त रूप नहीं दिया जा सका है । क्या अब समय नहीं आ गया है जब खुद यात्री ये सोचें कि इन जैसे आत्मघाती सफ़र पर निकलने के वैकल्पिक उपाय क्या हैं । क्या जरूरी है कि एक प्लेटफ़ार्म को यात्री से ज्यादा उन्हें रेल में चढाने वालों से भर दिया जाए । क्या जरूरी नहीं है कि अब एक व्यक्ति सिर्फ़ चालीस किलो सामान वाले नियम का सख्ती से पालन किया जाए ? क्या ये सोचने के जरूरत नहीं है कि आखिर हर बार ऐसा बिहार जाने वाली रेलों और उनके यात्रियों के साथ ही क्यों होता है । ऐन मौकों पर रेलों के चलने का प्लेटफ़ार्म संबंधी सूचनाएं देने वाले उन गैरजिम्मेदार रेल अधिकारियों को कभी क्यों दंडित नहीं किया जाता । मगर जब रेल मंत्री खुद ही इस तरह के बयान दें तो फ़िर ऐसी उम्मीद करना भी बेमानी ही होगी ।

भाड
में गया रेल मंत्रालय और भाड में गए उसके मंत्री संतरी , आज जरूरत इस बात को समझने की है कि बिहार जाने वाले वो लाखों यात्री इस बात को समझ लें कि जब तक वे खुद इन हालातों के लिए खुद को नहीं तैयार करेंगे , अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे , खुद में बदलाव नहीं लाएंगे ..ऐसी घटनाएं , दुर्घटनाएं बार बार होती रहेंगी ..और इससे कोई फ़र्क नहीं पडता कि रेल मंत्री .बिहार का है या बंगाल का ...क्योंकि मरने वालों में उनका कोई नहीं होता ।
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...