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शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

नक्सलवादियों ....मारो ....जरूर मारो .....



अभी हाल ही में दंतेवाडा में जो कुछ भी नक्सलवादियों ने हैवानियत का नंगा नाच करते हुए उससे कोई आश्चर्य नहीं हुआ । न ही सैनिकों के शहीद हो जाने का गम , सैनिक जीवन का अंत शहादत के चुंबन से हो तो उसकी मौत भी सार्थक हो जाती है । किंतु जब उन शहीदों की आत्मा बन के सोचा तो देखा कि वे जैसे कह रही थीं , चलो मौत मिली ये तो ठीक हुआ , लेकिन  इस वर्दी को पहनते समय तो यही सोचा था न कि जब भी ये वर्दी तन से लिपटी हुई और खून से नहाई हुई जमीन पर गिरेगी तो , दुशमन की गोली छाती को आर पार करेगी , मगर ये कहां गुमान था कि यूं अपने ही देश में कुछ लोग हथियार उठा कर हम पर ही इस तरह से घात लगा कर हमें मार डालेंगे । अब इस बात की लाख सफ़ाई दी जाए कि नक्सलवाद कोई एक दिन में नहीं पैदा हो गया या फ़िर ये कि उन्होंने भी मजबूर होकर ये कदम उठाया है आदि आदि जैसे सडे गले हुए तर्क अब गले से नहीं उतरते ।

मैं उन नक्सलवादियों से सिर्फ़ चंद सवालों के उत्तर चाहता हूं । जिन जवानों को आपने जाने किन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हैवानों की तरह मार दिया क्या वही लोग आपकी हालत के लिए जिम्मेदार थे ?? आज उन शहीदों के परिवारों में विधवा , अनाथों और बेसहारों को आप कौन सी दलील देकर ये समझा सकेंगे कि ये सब आपने अपनी कोई लडाई लडने के लिए की थी । उन बहादुर जवानों से देश के लिए लडते हुए दुश्मनों की गोली खाकर शहीद होने का गर्व भरी मौत को गले लगाने का हक आपने अपनी निहायत ही घटिया और कायर हरकत से छीन कर क्या हासिल कर लिया ?? यदि आप अपनी ताकत का ही एहसास कराना चाहते थे तो आमने सामने आकर लडते , फ़िर देखते , और दुनिया भी देखती कि कौन कितना वीर था । चलिए मान लिया कि आपको शायद यही एक रास्ता अब दिखाई सुनाई देता है तो फ़िर लीजीए न ये रास्ता तो और भी अच्छा है और आपके मनोनुकूल भी है ।

मारिए ..जरूर मारिए ..मगर हिम्मत है तो फ़िर उन्हें मारिए जो आपकी इस हालत के लिए जिम्मेदार हैं । उन नेताओं को मार डालो जिन्होंने तुम्हारे सपने बेच कर अपने लिए सुख सुविधा खरीदी है । जाओ मारो उन अधिकारियों को जो तुम्हारा हक खा गए । जाओ मारो उन्हें जो तुम्हारा निवाला छीन कर बैठे हैं ।क्यों हिम्मत नहीं है ...ये संभव नहीं लगता । क्यों भाई ..आखिर क्यों ..जब दूसरे देश से चंद लोग आकर मुंबई महानगर में आकर मौत का तांडव कर सकते हैं तो फ़िर तुम क्यों नहीं । जब कुछ आतंकवादी देश की संसद तक पहुंच जाते हैं तो तुम्हारी बंदूंकों की हद में ये नेता , भ्रष्ट अधिकारी , और वो तमाम लोग क्यों नहीं आते जो इसके लिए जिम्मेदार हैं । मगर नहीं शायद तुममें इसकी हिम्मत नहीं है ..या फ़िर जरूर ही वो बात वो मकसद नहीं है तुम्हारा जो दिखता है । देश के सैनिकों को अपने घर में कायरों की तरह छुप कर मारने से कुछ भी कभी भी हासिल होने वाला नहीं है । कभी अपने बिल से बाहर निकल के देखो फ़िर माने कि ...। चलो छोडो , अब समय आ गया है कि तुम्हारे साथ भी वही सलूक किया जाए जो समाज की गंदगी साफ़ करने के लिए अक्सर किया जाता है । और पूरी तरह से तुम्हें नेस्तनाबूत कर दिया जाए ॥
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