सोमवार, 8 मार्च 2010

अक्षम होती विशिष्ट सुरक्षा एजेंसियां ..........



अब तो ये आए दिन की खबर सी बन गई है कि सीबीआई को अदालत से फ़टकार पडी और अब तो इस खबर पर कोई खास तवज्जो भी नहीं जाती । ऐसा लगता है मानो स्थानीय पुलिस को रोजाना की तरह किसी अनियमितता, भ्रष्टाचार, लापरवाही आदि के लिए झाड पड रही हो । ये बेहद दुखद बात है कि सीबीआई , रा, आईबी , सीआईडी, सीबीसीआईडी, डीआईयू, जैसी विशिष्ट सुरक्षा एजेंसियां जिन सभी को किसी खास उद्देश्य और कार्य के लिए बनाया गया था आज की तारीख में सब की सब नकारा साबित हो रही हैं । देश के विभिन्न हिस्सों में होने वाले आतंकी हमलों की आशंका भी न लगा पाना, विदेशी धरती पर देश के खिलाफ़ रची जा रही साजिशों को समय से पहले न भांप पाना, स्थानीय पुलिस द्वारा जांच में विफ़ल रहने के बाद , आगे उन अपराधों में सीबीआई, सीबीसीआईडी, सीआईडी जैसी संस्थाओं द्वारा भी कोई सफ़लता न हासिल करना यही साबित कर रहा है कि अब इन संस्थाओं की धार भी कुंद पडने लगी है । और सीबीआई जैसी विशिष्ट संस्था की स्थिति तो कई बार स्थानीय पुलिस से भी दयनीय हो जाती है । आरूषि मर्डर केस का हश्र सामने ही है जिसमें अभी भी स्थिति ठीक वैसी ही है जैसी उस घटना के समय थी । समझ में नहीं आता कि आखिर इन विशिष्ट एजेंसियों की कार्यप्रणाली और क्षमता को होता क्या जा रहा है ?

ये तो सबको ज्ञात है कि इन विशिष्ट सुरक्षा एजेंसियों का गठन , बहुत सोच विचार कर , और अलग अलग उद्देश्यों के लिए किया गया था । यही कारण है कि इन एजेंसियों की नियुक्ति , कार्यप्रणाली, अधिकार और शक्तियां आम तौर पर अपनाई जाने वाली सभी पद्धतियों से अलग और काफ़ी कठिन होती हैं । इतना ही नहीं इन्हें न सिर्फ़ विशेष प्रशिक्षण , बल्कि बहुत सारे साधन, हथियार, और जाने कौन कौन सी सुविधाएं व विशेषाधिकार से लैस करवाया जाता है । इन सबका एक ही मकसद होता है कि ये एजेंसिया विशेषज्ञता हासिल करके खास और त्वरित परिणाम देंगी । मगर जिस तरह कि पिछले दिनों देखने में आया है कि आतंकियों द्वारा किसी भी घटना या आतंकी कार्यवाही से पहले तसल्ली से सब कुछ प्रायोजित करना और सुरक्षा एजेंसियों को उसकी भनक तक न लग पाना इनके साथ साथ देश की सुरक्षा नीति पर भी प्रश्न चिह्न लगाती है । यही हाल कमोबेश हर विशिष्ट एजेंसी का है ।

इसमें कोई संदेह नहीं कि इन एजेंसियों पर न सिर्फ़ कार्यबोझ का दबाव बढा है बल्कि बहुत तरह के राजनीतिक और प्रशासनिक मजबूरियों से भी इनका सामना हो रहा है । इस बात को सीबीआई के भूतपूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह अपनी एक चर्चित पुस्तक में उठा भी चुके हैं कि बेशक अधिकारों में एक निरंकुशता का प्रदर्शन करने के बावजूद लगभग कुछ भी स्वतंत्र नहीं रह पाता है । कई बार तो ढके छुपे तौर पर खुद इनकी नियंत्रक संस्था यानि गृह मंत्रालय पर ही बहुत सारा हेरफ़ेर और दबाव डालने का आरोप लगता रहा है । खासकर राजनीतिक अपराधियों और प्रशासनिक अपराधों में तो ये दबाव अपने चरम पर होता है ।

सबसे बडा सवाल ये है कि आम जनता द्वारा दिए जाने वाले करों से आर्थिक संबलता हासिल किए हुए इन विशिष्ट एजेंसियों से यदि अपेक्षित कार्य और परिणाम नहीं निकल पा रहा है तो फ़िर क्यों न इन्हें पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए । ये ठीक है कि ये तो कतई मुनासिब नहीं है तो फ़िर ऐसे में , इन सुरक्षा एजेंसियों को नए सिरे से चुस्त दुरूस्त करना चाहिए । जिस तरह से समाज में अपराध बढ रहा है , दिनोंदिन आतंकी घटनाओं मे वृद्धि हो रही है उस स्थिति में तो इन सुरक्षा एजेंसियों के ऊपर जिम्मेदारी और बढ जाती है इसलिए अब समय आ गया है कि बिना विलंब किए इन एजेंसियों का कायापलट किया जाए ।


रविवार, 7 मार्च 2010

आखिर किस धारा के वाहक .....ये धारावाहिक




भारत में जब टेलीविजन की शुरूआत हुई थी तो दूरदर्शन पर ये जिम्मेदारी थी कि दर्शकों तक उस टेलीविजन के माध्यम से क्या पहुंचाया जाना है और किस तरह से पहुंचाया जाना है ? यदि शुरूआती दिनों को याद करें तो उस समय दूरदर्शन नामके एकमात्र सरकारी चैनल ने पूरे सप्ताह के लिए तैयार किए या कराए गए कार्यक्रमों में जो गजब का संतुलन बनाया था वो अब चाह कर भी लगभग सौ से भी ज्यादा चैनल नहीं बना पा रहे हैं । समाचार, खेल , रोजगार , चित्रहार, ज्ञानप्रद धारावाहिक, गुमशुदा लोगों की तलाश , कृषि दर्शन , हिंदी सिनेमा, साक्षात्कार, पहेली प्रतियोगिता, प्रादेशिक समाचार और क्षेत्रीय सिनेमा ...और जाने क्या क्या ऐसा लगता था मानो एक सप्ताह में ही पूरे समाज और देश का प्रतिबिंब सामने रख दिया गया हो । यदि आज समाचारों के नाम पर चल रहे लगभग तीस चैनलों पर दिखाई बताई और शायद बनाई जाने वाली खबरों , मनोरंजन और हास्य के नाम पर फ़ूहडता से लबरेज रिएल्टी शोज़ की बातें न भी करें और सिर्फ़ धारावाहिकों , जिनके लिए कि हमेशा से "सामाजिक " विशेषण का उपयोग किया जाता रहा है , और दावा किया जाता है कि प्राईम टाईम में दिखाए जाने वाले ये सभी धारावाहिक परिवार और समाज की कहानी हैं , इन्हें ही मंथन के केंद्र में रखें तो पाते हैं कि आज इन धारावाहिकों की खुद की ही धारा भटकी हुई है ।

कभी हमलोग ,खानदान, बुनियाद, फ़ौजी, नुक्कड, सर्कस आदि को देखने वाला समाज बेशक आज के इस आधुनिक युग के धारावाहिकों को देख कर अपना समय बिता लेता हो ,,मगर एक टीस तो मन में जरूर उठती है कि इन धारावाहिकों के सहारे समाज या कि समाज पर खुद को आधारित बताते धारावाहिक , कुल मिलाकर दे और दिखा क्या रहे हैं इस समाज को ?? लगभग पच्चीस लोकप्रिय हिंदी चैनलों पर इस समय कमोबेश सवा सौ धारावाहिक चल रहे हैं । इनमें से आधे से भी ज्यादा लगभग ६५ प्रतिशत धारावाहिक निश्चित तौर पर महिलाओं की विभिन्न समस्याओं पर आधारित धारावाहिक बताते हैं खुद को । इनके अलावा लगभग बीस प्रतिशत कार्यक्रम रिएल्टी शोज़ वाले धारावाहिक हैं जिनमें से कुछ तो फ़ूहड हास्य परोसने का काम कर रहे हैं और कुछ तो इनसे भी आगे जाकर जाने कैसे कैसे "इमोशनल अत्याचार "(बिंदास टीवी पर दिखाया जाने वाला एक कार्यक्रम ) कर रहे हैं ।

वे धारावाहिक जो महिलाओं की समस्याओं पर खुद को आधारित बताते हैं , पता नहीं उन्होंने "शांति " उडान , और ऐसे ही कई अन्य धारावाहिकों को कभी देखा था कि नहीं । मगर आज महिलाओं के लिए ही महिलाओं के नाम पर जिस तरह के धारावाहिक बनाए और दिखाए जा रहे हैं उन्हें देख कर आम दर्शक बिल्कुल ही ठगा सा महसूस कर रहा है । एक प्रसिद्ध धारावाहिक निर्मात्री द्वारा शुरू किया गया ट्रेंड अब धीरे धीरे एक सैट पैटर्न बन गया है । सबसे हैरत और दुख की बात ये है कि इन धारावाहिकों में सभी महिला पात्रों और चरित्रों का जम के नकारात्मक चित्रण किया जा रहा है और कई बार तो इस कोशिश में धारावाहिक खुद अपने ही कंसेप्ट से भटके या उलझे हुए से लगते हैं । अब देखिए न कलर्स टीवी पर दिखाए जाने वाले धारावाहिक "लाडो , न आना इस देश "में बताया जा रहा है कि उस कस्बे में बेटी होना सबसे बडा अपराध है , सबसे बडी समस्या है , कन्या भ्रूण हत्या तक की जा रही है ....मगर उस धारावाहिक का सबसे कद्दावर और प्रभावशाली चरित्र यानि जो ये सब कह और कर रहा है .....वो खुद और कोई नहीं एक महिला है ।

यहां एक बात का जिक्र भी समीचीन होगा शायद कि पहले जब धारावाहिकों का निर्माण होता था तो निर्माताओं को , चैनल को , और शायद सभी को ये पता होता था कि इस धारावाहिक की कितनी कडियां होंगी । यानि उसका आरंभ और अंत सभी कुछ पहले ही तय हो जाता था । मतलब स्पष्ट है कि धारावाहिक में क्या कब कितना और कैसे और कहां तक दिखाया जाना है सब कुछ पहले ही निर्धारित कर दिया जाता था । मगर अब तो हालात ऐसे हैं कि यदि एक बार कोई धारावाहिक शुरू हो गया तो फ़िर उसका अंत कब होगा कैसे होगा इसका अंदाजा कोई नहीं लगा सकता खुद धारावाहिक निर्माता भी नहीं । और स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि बहुत बार बल्कि कहें कि अक्सर ही किसी खास उद्देश्य या समस्या को आधारित करके शुरू किया धारावाहिक भी अपने मूल से भटक कर कहीं का कहीं पहुंच जाता है । पात्र मर जाते हैं फ़िर जिंदा हो जाते हैं , आसानी से उनके हूबहू पात्र भी उनके जीवन में आ जाते हैं , सारे षड्यंत्र घरों में ही होते हैं , बडे बडे बंग्ले कोठी वाले परिवार कभी कोई काम करते कराते नहीं दिखाए जाते , या फ़िर एकाएक सारी संपत्ति हडपे जाने के बाद सीधे ही कोई छोटी मोटी सी नौकरी करने लगते हैं.. कुल मिलाकर सब कुछ हौचपौच ।

इन धारावाहिक निर्माताओं से जब सवाल पूछा जाता है तो उनका जवाब वही फ़िल्मकारों वाला होता है कि समाज में जो हो रहा है वही दिखाया जाता है । मगर क्या यही हो रहा समाज में सिर्फ़ यही ??और क्या कल को समाज में इससे ज्यादा गंदगी , नंगई दिखेगी तो धारावाहिकों में भी वही सब देखने सुनने को मिलेगा । सच तो ये है कि व्यावसायिक लाभ के आगे सामाजिक संदेश , या सामाजिक जिम्मेदारी , जैसे शब्दों का वजन बिल्कुल शून्य हो जाता है । ये तो भविष्य ही बताएगा कि टेलीविजन, समाज से कितना प्रेरित होता है या फ़िर ये कि समाज पर इन धारावाहिकों का असर कितना होता है ????



गुरुवार, 4 मार्च 2010

आधुनिक बाबा या सफ़ेदपोश अपराधी

समाज में जितनी तेजी से पाप बढता गया ,उससे दोगुनी तेजी से ही लोगों ने शायद इसी भ्रम में धार्मिक क्रियाकलापों में लिप्त रहने की अपनी इच्छा दिखाई कि शायद इसी बहाने से उनके पाप कट सकें । इस तथाकथित घोषित किए जा चुके कलियुग में भी लगाता बढते देवी देवताओं की संख्या ( यहां मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मैंने अनुभव किया है कि देवी देवताओं की पूजा व्रत का भी ट्रेंड बनता और परिवर्तित होता रहा है ..जैसे बचपन में संतोषी माता का व्रत ही देखता सुनता था तो अब वृहस्पति देव की और साईं बाबा की पूजा होते देखता हूं ) । खैर ये मेरा विषय नहीं है । इस कलियुग में यदि धर्म के नाम पर किसी ने उन्नति की है तो वो हैं तो वो हैं मंदिरों/ मठों और इसी तरह के धार्मिक संस्थानों के ट्रस्टी या देखभाल करने वाले ...और उनसे भी बढकर तीव्रगति से बढने वाले धर्मगुरुओं की जमात । कमाल की बात तो ये है अधर्म के पर्याय माने जाने वाले इस युग में इन धर्मात्माओं और धर्मगुरूओं की संख्या तो अब इतनी हो गई है कि उतनी तो शायद सतयुग और द्वापर में भी नहीं होगी ।

अभी हाल ही में दिल्ली पुलिस ने एक ऐसे ही धर्मगुरू की अय्याश जिंदगी और तमाम तरह के अपराधों में लिप्तता का भांडाफ़ोडा ही था कि आज फ़िर एक और खबर आ गई । आज ही समाचारों में देखा कि बंगलौर में स्वामी परमहंस नामके एक ऐसे ही धर्मगुरू की अश्लील सीडी को वहां के स्थानीय टेलिविजन पर दिखाए जाने के बाद उनका भंडा फ़ूट गया है । और ऐसा नहीं है कि धर्म के नाम पर अपनी इस दुकानदारी को चलाने वाले इन धर्मगुरूओं का असली रूप पहली बार सामने आया है । बल्कि यदि ये कहा जाए कि आधुनिक समय में प्रवचन/दीक्षा/साधना/अराधना /भक्ति के नाम पर अलग अलग तरह से अपने प्रपंचों से समाज को बर्गलाते ये सभी बाबा लोग असल में कभी न कभी अपनी सफ़ेदपोशी के अंदर छिपे दाग से ग्रस्त तो हुए ही हैं । फ़िर चाहे वो धीरेंद्र ब्रह्मचारी हों या चंद्रा स्वामी हों , या आसाराम बापू या फ़िर सुधांशु महाराज , कोई सत्य साईं हों या कि ऐसे ही स्वामी परम हंस । सभी बाबा लोग कभी न कभी , किसी न किसी तरह के अनैतिक और आपराधिक कृत्य में लिप्त जरूर पाए जाते रहे हैं और पकडे और छूटते भी रहे हैं ।

इन आधुनिक भक्तों और धर्मगुरूओं से जुडी कुछ दिलचस्प बातों का भी खुलासा हुआ है । ये सभी तथाकथित धर्मगुरू लोग इस धर्मगुरू के व्यवसाय से पहले धूल फ़ांकने वाली जिंदगी ही गुजर बसर कर रहे होते हैं । शायद ही कोई करोडपति- अरबपति ऐसा हो जो बाद में बाबा बन गया हो ..हां बाबा लोगों को करोडपति अरबपति बनते जरूर देखा जाता है । जाने किन कारणों से इन बाबाओं के अनुयायियों में अच्छे खासे पढे लिखे , संपन्न , राजनीतिज्ञ, बडे व्यावसायी, और जाने कौन कौन सभी शामिल हो जाते हैं । ये बडे ही हैरत की बात है कि आखिर कौन सी वो वस्तु है जो इन्हें इन सफ़ेदपोशों की चिरौरी करने पर मजबूर कर देती है ।एक और आश्चर्यजनक बात ये भी है कि ये सभी बाबा किसी न किसी रूप में औरतों का शोषण करके अपनी लिप्सा भी जाहिर करते रहे हैं । बडे नेताओं अधिकारियों से इनकी जान पहचान ही वो वजह होती है जिसके कारण ये लोग कानून की गिरफ़्त में फ़ंसने के बावजूद भी बडी आसानी से बच निकलते हैं । रोजाना पुलिस मीडिया द्वारा बार बार इन ढोंगी बाबाओं की सारी कलई खोल देने के बावजूद समाज द्वारा इन बाबाओं को समाज से उखाड कर नहीं फ़ेंकने में हो रहा विलंब खुद समाज के लिए आत्मघाती साबित होगा । अब समय आ गया है कि इन तमाम सफ़ेद पोशों को समाज की हद से बाहर निकाल कर ,उन्हें सही में किसी पर्वत /कंदरा/ या वन में छोड आना चाहिए ताकि यदि समाज का भला न कर सकें तो कम से कम बुरा भी न कर सकें ।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

बेहद घटिया है भारत का आपदा प्रबंधन




आज बंगलौर की एक बहुमंजिला इमारत में शार्टसर्किट से आग लगने के बाद जान बचाने के लिए मची अफ़रातफ़री में अब तक की जानकारी के अनुसार लगभग नौ लोगों की मृत्यु हो गई । इस घटना ने कुछ सालों पहले दिल्ली के उपहार सिनेमा अग्निकांड की याद दिला दी । हालांकि इश्वर का शुक्र है कि ये आग उतनी तो भयंकर तो नहीं थी मगर फ़िर भी मासूमों की जान तो लील ही गई । सबसे दुखद बात तो ये है कि अब मरने वाले लोगों में से तीन तो आग से बचने के लिए उस इमारत से कूद कर अपनी जान गंवा बैठे हैं । अब इससे ज्यादा घटिया बात और क्या हो सकती है कि जो देश एक तरफ़ तो भविष्य की महाशक्ति बनने का दावा कर रहा है , चांद पर अपने बूते अपना यान भेजने का दंभ भर रहा है ,और जाने इस तरह के कितने बडे बडे काम अपने नाम कर रहा है । उस देश में आपदा प्रबंधन के नाम पर कुछ भी नहीं है । चाहे वो कुंभ जैसे महाआयोजनों में जुटी भगदड मचने को रोकने और संभालने की बात हो , हर साल बिहार ,बंगाल, उत्तर प्रदेश आने वाली बाढ की विभीषका से निपटने की बात हो , आए दिनों होने वाली सडक दुर्घटनाओं और रेल दुर्घटनाओं के बाद मचने वाली अफ़रातफ़री का नज़ारा हो या फ़िर अब देश की एक नियमित नियति बन चुकी आतंकी घटनाओं के बाद हाथ खडे करने वाली स्वास्थ्य सेवाएं हों , किस किस हादसे ,घटना , दुर्घटना की गिनती करें । एक भी ऐसा हादसा और दुर्घटना नहीं होती जिसमें लगता कि स्थानीय , राजकीय या राष्ट्रीय स्तर पर आपदा प्रबंधन की स्थिति अच्छी है ।


महानगरों में जिस तरह से बहुमंजिला इमारतों के निर्माण में तेज़ी आई है आश्चर्यजनक रूप से इन बहुंजिला आवासीय और व्यावसायिक इमारतों में सभी सुरक्षा नियमों की जबरदस्त अनदेखी की जाती है । इतना ही नहीं हद तो ये है कि न सिर्फ़ इन इमारतों में बल्कि स्कूलों , अस्पतालों , सिनेमा हालों , मल्टीप्लेकसों और बडे बडे शौपिंग मौलों में भी बचाव के रास्ते, आगजनी से बचने के उपाय , दुर्घटना के समय पडने वाले साधनों और उपायों की उपस्थिति जैसे कारकों पर तो कभी कुछ करना तो दूर की बात है मगर शायद ही इन पर कभी कुछ सोचा गया हो । हालांकि ऐसी किसी घटना दुर्घटना के बाद हमेशा ही सरकार हर बार नए सिरे से जाने कैसी कैसी घोषणाएं कर डालती है और उन पर कुछ दिनों तक पैसा और श्रम लगाया भी जाता है । मगर समय के बीतते जाने के साथ ही सब कुछ फ़ाईलों और उस योजना की रूपरेखा बनते बनते ही खत्म हो जाती हैं । और फ़िर किसी नई घटना/दुर्घटना होने तक बस सब यूं ही खामोश रहता है ।

ये बडे ही हैरत की बात है कि बात बेबात सरकार और हमारा प्रशासन , पश्चिमी देशों की नकल करता है , जाने कैसी कैसी अजीबोगरीब और कभी कभी तो बिल्कुल ही अप्रायोगिक योजनाएं और विचार अपनाने को उद्धत रहता है । वो इन सुरक्षा उपायों , आपदा प्रबंधन के गुर , और इस दिशा में वहां किए गए कमाल के कार्यों , तकनीकों और साधनों के उपयोग को क्यों नहीं अपना पाता है । ऐसा नहीं है कि भारत में वो क्षमता नहीं है कि आपदा प्रबंधन की दिशा में वो सफ़लता नहीं हासिल कर सकता बल्कि , गहरे नलकूपों में गिरे बच्चों को निकालने में सेना , प्रशासन आदि ने जिस अद्भुत इच्छा शक्ति का प्रदर्शन किया था वो काबिलेतारीफ़ था । मगर देश की अरब जैसी संख्या के लिहाज़ से तो ऐसे प्रयास ऊंट के मुंह में जीरे जैसा भी नहीं है । अब समय आ गया है कि सरकार और प्रशासन आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दों को अपनी पहली वरीयता में रखे और उन पर गंभीरतापूर्वक काम करे । आम जनता, और मीडिया को भी चाहिए कि वो सरकार पर इसके लिए दबाव बनाए ।वर्ना तो जनता मरती रहेगी और मीडिया उन्हें कवर करती रहेगी ।



सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

क्या नकारात्मकता ज्यादा आकर्षित करती है ?

क्या आपको बहुत पहले दिखाया जाने वाला एक विज्ञापन याद है। उस विज्ञापन में एक नन्ही से बच्ची , स्कूल की पास से आने जाने वालों को एक पैम्फ़लेट पकडाती है, जैसे कि अक्सर ही लाल बत्ती पर आपको हमें भी कोई न कोई पम्फ्लेट पकडा देता है, और जैसा कि अक्सर ही होता है कि हम सभी उस पर एक उड़ती हुई निगाह डालते हैं और फेंक देते हैं, ठीक उसी तरह उस बच्ची द्वारा दिए गए कागज़ के टुकड़े को सभी आने जाने वाले हाथ में लेकर थोडा आगे जाने पर फेंक देते हैं। एक स्कूटर चालक जो ये सब देख रहा होता है , वो बच्ची के पास आता है और उसे बताता है कि अब उसे ये पम्फ्लेट किसी के भी हाथ में देने से पहले उसे अच्छे तरह मरोड़ कर देना है। वो नन्ही बच्ची ऐसा ही करती है, फ़िर जिस पहले आदमी को वो ये कागज़ तोड़ मडोदकर देती है , वो पहले उस बच्ची को गौर से देखता है फ़िर उसे कगाज़ के टुकड़े को खोल कर पढने लगता है।

मुझे लगता है कि इंसान का मनोविज्ञान , चाहे उत्सुकता के कारण या फ़िर कि खुराफाती कारणों से अक्सर या ज्यादातर नकारात्मक चीजों की तरफ़ आसानी से आकर्षित होता है। बल्कि ये कहूं कि कि सकारात्मक बातों , चीजों की तरफ़ चाहे एक बार को उसकी नज़र ना जाए या जाए भी तो वो उसे नज़र अंदाज़ कर दे मगर उल्टी भाषा , उल्टी बातों और उल्टी चीजों की तरफ़ उतनी ही जल्दी आकर्षित हो जाता है। किसी बच्चे को आप किसी बात के लिए मना कीजीए तो मैं ये तो नहीं कहता कि शत प्रतिशत , मगर आम तौर पर ज्यादा बच्चे वही काम करने में दिलचस्पी दिखाएँगे। एक और उदाहरण देता हूँ, किसी ने अपने चिट्ठे पर अपने पोस्ट का शीर्षक दिया, इसे बिल्कुल मत पढ़ना, आपन माने या ना मने , मगर उस दिन जितने लोगों ने उसे पढा था उससे पहले उसके पोस्ट को कभी भी इतने लोगों ने नहीं पढा था।


"ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ नकारात्मक बातें ही मन को और मस्तिष्क को आकर्षित करती हैं मगर कुछ तो कनेक्शन जरूर है इन बातों में, या पता नहीं कि ऐसा सिर्फ़ मेरे साथ होता है.................."




शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

तो आ ही गया परीक्षाओं ....अरे नहीं आत्महत्याओं का दौर ....




अब तो नए साल की शुरूआत से ही समय जिनके लिए कर्फ़्यूनुमा हो जाता है , जिनके आने जाने घूमने फ़िरने, खेलने कूदने तक पर मनाही हो जाती है .....वे होते हैं दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षा में शामिल होने वाले विद्यार्थी । और फ़िर परीक्षाओं का समय जैसे जैसे नजदीक आता जाता है तो ये स्थिति और भी दुरूह हो जाती है या कहा जाए कि बनाई जाती है । फ़िल्में रिलीज़ होना टल जाती हैं , शादियों , पार्टियों को यथासंभव टाला जाता है । कहीं मेहमान बन कर और मेज़बान बन कर भी रहना /जाना गंवारा नहीं किया जाता ....भई ! आखिर बच्चों की परीक्षा का समय है ...तो दुनिया थम जानी चाहिए न । लगना चाहिए कि सभी मिल कर (सभी मतलब , माता-पिता, पूरा परिवार , रिश्तेदार , पूरा समाज ) उन विद्यार्थियों के लिए ही चिंतित हैं । इस बात को इतना ज्यादा महत्व दिया जाने लगता है कि एक तनाव सा माहौल में व्याप्त हो जाता है । और इसका परिणाम होता है कि उन बच्चों पर इतना ज्यादा मानसिक और शारीरिक दबाव पड जाता है कि कि उनके लिए ये परीक्षाओं का दौर कम आत्मह्त्याओं का दौर बन जाता है ।

पिछले सिर्फ़ पांच सालों के आंकडों पर नज़र डालें तो शायद ये जानकर सबको दुख और हैरानी हो कि सिर्फ़ पिछले पांच सालों में ही इन परीक्षा के तनाव , परीक्षा परिणामों के अपेक्षित अनापेक्षित अंदेशे मात्र ने और परीक्षा में मिली असफ़लता ने कुल 669 विद्यार्थियों को मौत के मुंह में पहुंचा दिया है । सरकार , मनोविज्ञानी, समाजशास्त्री , विद्यालय प्रशासन , अभिभावक सभी पिछले कुछ समय से शायद अब इस स्थिति को भलीभांति समझते हुए इन परीक्षाओं के मद्देनज़र विद्यार्थियों में उपज़े डर और तनाव को कम करने के भरसक प्रयत्न कर रहे हैं । बहुत सारी हेल्पलाईनों और काऊंसिलिंग संस्थानों द्वारा सबका मनोबल बढाने का काम किया जा रहा है । मगर अफ़सोस की बात ये है कि इन सबके बावजूद बच्चों में परीक्षा को लेकर बना हुआ दबाव और उसके बाद उससे उपजी हताशा से बढती आत्महत्या की प्रवृत्ति में इज़ाफ़ा ही हो रहा है । और स्थिति दिनोंदिन विस्फ़ोटक बनती जा रही है । इससे ज्यादा दुखद बात और क्या हो सकती है कि देश के नवनिर्माण और विकास में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले युवा यूं कालकवलित हो रहे हैं ।

अब भी यदि ये सबने मिलकर भी इस दिन पर दिन बिगडती स्थिति पर गंभीरतापूर्वक नहीं सोचा किया तो फ़िर बहुत जल्द ही हालात विस्फ़ोटक होने वाले हैं । सबस अहम बात तो ये है कि बच्चों पर से ये दबाव किस तरह से कम किया जाए कि उन्हें ये न लगे कि ये परीक्षा और इसका परिणाम ही जिंदगी की शुरूआत है और शायद अंत भी । इसका कोई दूसरा विकल्प नहीं है । ये बिल्कुल सही बात है कि आज के तीव्र प्रतिस्पर्धी युग में जीवन के इस रेस में बने रहने के लिए इसके साथ कदम ताल करना जरूरी हो जाता है मगर जीवन लेने देने की कीमत पर तो कतई नहीं । खासकर उनके लिए जो जाने किस दबाव में सबसे अधिक नंबर या प्रतिशत या उससे थोडा सा कम आने के बाद भी जान देने पर उतारू हो जाते हैं । इसके लिए न सिर्फ़ बच्चों की मानसिकता , उनका अतिमहात्वाकांक्षी होना आदि में बदलाव लाने के साथ शिक्षा पद्धति में भी व्यापक बदलाव लाना होगा । देखना है कि इस दिशा में कितना काम हो पाता है .....और वो भी कब ??????????


बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

आखिर हमेशा विवाद को ही सम्मान क्यों ?(दौपदी .....विवाद के बहाने एक चर्चा )




हाल में साहित्य कला अकादमी द्वारा ,श्री वाई लक्ष्मीप्रसाद की पुस्तक द्रौपदी को पुरस्कृत किया गया । जब इस पुस्तक के विरोध किए जाने की खबरें समाचारों में सुनी तो उत्सुकता बढ गई कि आखिर ऐसा क्या लिखा गया है इस पुस्तक में ,। जानने पर पता चला कि इस पुस्तक में द्रौपदी के चरित्र पर खूब सारा लिखा गया है यहां तक कि द्रौपदी को कृष्ण की एक प्रेमिका के रूप में भी दर्शाया गया है । जबकि हम बचपन से ही पढते सुनते आ रहे थे कि द्रौपदी के चीरहरण के समय जब वो हर तरफ़ से हार गई और पूरी तरह बेबस होने के बाद अपने भ्रात समान कृष्ण को पुकारा जिन्होंने उसकी मदद की । इस बात से जुडी कुछ बातें मस्तिष्क को उद्वेलित कर रही हैं । सबसे पहली बात तो ये कि पिछले कुछ समय से एक परंपरा खूब प्रचलन में आ गई है । यदि कुछ बेचना हो तो उसे जबरन किसी भी कारण से विवादित कर दो । विवाद न सिर्फ़ उसका बाजार और बडा कर देगा बल्कि जिस तरह का प्रचलन इन दिनों बढता जा रहा है उसके अनुसार किसी न किसी पुरस्कार के लिए उसकी दावेदारी भी बढा देगा । और यही प्रचलन अब एक परंपरा बनती जा रही है । दुखद आश्चर्य तो ये है कि साहित्य कला अकादमी जैसी संस्थाओं को पूरे वर्ष की साहित्यिक कृतियों में से आखिर क्यों और कैसे कोई एक ऐसी पुस्तक/ग्रंथ/उपन्यास ऐसा नहीं मिल पाता जो निर्विवादित हो ।

अब इस पुस्तक से जुडे एक अन्य पहलू पर बात करते हैं । हिंदू धर्म के चमत्कारिक और पौराणिक चरित्र हमेशा से ही अन्वेषण और बहस का विषय रहे हैं । ऐतिहासिक साक्ष्यों के अभाव और धर्मग्रंथों मे अतिश्योक्ति की संभावना के कारण इसे विवादित बना कर परोसने वालों के लिए ये एक ऐसे मौके की तरह होता है जो इसका सदुपयोग/दुरूपयोग अपनी बंद पडी साहित्यिक दुकानों को चमकाने के लिए करना चाहते हैं। महज़ अंदाज़ों संभावनाओं के आधार पर न सिर्फ़ इन धर्मग्रंथों /धार्मिक नीतियों/ चरित्रों/मान्यताओं .....आदि सबको ही तोड मरोड कर किसी भी रूप में परोसने के लालच से खुद को नहीं रोक पाते । हालांकि सबसे बडी विडंबना ये है कि इन पुस्तकों के लेखक खुद कभी भी किसी तथ्य ( जो ये अपनी सोच और अंदाज़े पर पाठकों के सामने रखते हैं ) को पूरी तरह तो क्या आंशिक रूप से भी प्रमाणित करने का माद्दा नहीं रखते हैं । शायद उनकी ये कोशिश होती भी नहीं है और न ही मंशा होती है । और जो हित उद्देश्य होते हैं .....उसी का परिणाम होता है ऐसे विवादों की उत्पत्ति से उपजा मुनाफ़ा और ऐसे पुरस्कार भी ।

इससे अलग एक और बात जो इस मुद्दे से जुडी हुई है वो ये कि आखिर क्यों सभी को , चाहे वो मशहूर चित्रकर मकबूल फ़िदा हुसैन हों या कि विदेशी कंपंनियां , चाहे कोई फ़िल्मकार हो या फ़िर ऐसे ही साहित्यकार , आखिर इन सभी को हिंदू धर्म और उससे जुडे तथ्य ,उनके देवी देवता, उनके चरित्र ही क्यों अपने विषय के रूप में मिलते हैं । शायद इसका एक बडा कारण है हिंदू धर्म का सहिष्णु होना । भारत का वो तथाकथित धर्मनिरपेक्ष वाला चेहरा, वही सेक्यूलर छवि । इस तथाकथित धर्मनिरपेक्ष छवि के कारण ही कोई भी कभी भी हिंदू धर्म का और तो और भारत राष्ट्रीयता का भी अपमान करने में नहीं हिचकता । मगर फ़िलहाल तो देखना ये है कि कभी सीता , कभी द्रौपदी, और कभी शकुंतला को कटघरे में खडा करके अपनी दुकान सजाने चमकाने वालों को यूं ही कब तक सम्मानित किया जाता रहेगा ?????


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