गुरुवार, 29 अगस्त 2013

बदलता खेल परिदृश्य ---- (खेल दिवस पर विशेष)





क्या आपने गौर किया है कि पिछले कुछ समय में खेल जगत के कोनों में न सिर्फ़ खेल और खिलाडियों के चेहरे बदले हैं बल्कि उनके मिज़ाज़ , तेवर , आक्रामकता , व्यावसायिकता और तदनुसार उपलब्धियों में भी जबरदस्त बदलाव आया है । । एक समय था जब राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय क्रीडा जगत में पहले हॉकी और उसके बाद क्रिकेट ने अपना जलवा और आधिपत्य बनाए रखा । हॉकी में जहां हॉकी के जादूगर ध्यानचंद , जिनकी स्मृति में ही , आज यानि 29अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में याद किया और मनाया जाता है , ने जहां वैश्विक प्रतियोगिताओं में रिकॉर्ड 400 से अधिक गोल दाग कर ओलंपिक खेलों सहित पूरे विश्व में भारतीय हॉकी का परचम लहरा दिया वहीं कपिल देव की अजेय क्रिकेट टीम ने 1983 में क्रिकेट विश्व कप जीत कर देश को क्रिकेट से जोड कर देशवासियों को एक नए जुनून की ओर मोड दिया बाद में इस विरासत को सचिन तेंदुलकर सरीखे युगों में पैदा होने वाले खिलाडी की अदभुत उपलब्धियों ने बुलंदियों पर पहुंचा दिया और भारतीय टीम दूसरी बार भी विश्व कप जीतने में सफ़ल रही । क्रिकेट के प्रति इस देश की दीवानगी तो जग-जाहिर रही है । स्थिति तो ऐसी बन गई कि क्रिकेट पर ये आरोप लगने लगे कि उसने अन्य खेलों के विकास/ प्रसार में बहुत बाधा डाली । 

अब स्थिति बहुत बदल रही है । आज देश में फ़ार्मूला वन रेस आयोजित किया जा रहा है तो दूसरी तरफ़ इंडियन बैडमिंटन लीग में भी लोगों ने खासी दिलचस्पी ली है । अपनी एकल उपलब्धियों के दम पर देश भर के खेल प्रेमियों का न सिर्फ़ अपनी तरफ़ बल्कि अलग अलग खेलों की तरफ़ भी ध्यान खींचने में भी पिछले कुछ वर्षों में देश के मेधावी खिलाडी सफ़ल रहे । अभिनव बिंद्रा , राज्यवर्धन सिंह राठौड , सुशील कुमार , विजेंद्र सिंह , डिंको सिंह , मैरी कॉम ,सानिया मिर्ज़ा ,सायना नेहवाल , पी वी सिंधु , सरीखे अनेक नामों ने इस बीच न सिर्फ़ राष्ट्रीय बल्कि वैश्विक खेल जगत में भी भारतीय धमक को गुंजायमान किया । 


इतना ही नहीं , टीम प्रतियोगिताओं में न सिर्फ़ पुरूषों की टीम बल्कि महिलाओं की टीमों ने भी जिस तरह से अपना खेल और प्रतिभा दिखाते हुए खेल समीक्षकों को आश्वर्यचकित करते हुए पूरे देश को गौरवान्वित किया है वो देश के खेल इतिहास में एक नया अध्याय जोडने की तैयारी जैसा है । एक के बाद एक मिल रही सफ़लताएं ये जता और बता रही हैं कि अब भारतीय खेल और खिलाडी भी उसी पेशेवराना रुख को अख्तियार करके मैदान में उतरने लगे हैं जिसका अभाव सालों से महसूस किया जा रहा था । 

हालांकि इस नए बदलाव की एक सुखद वजह ये भी रही है कि कभी खेल में कैरियर और जिंदगी देकर जीवन बर्बार करने जैसे नज़रिए को बदलने के लिए अब न सिर्फ़ सरकारें और संस्थाएं बल्कि औद्यौगिक घराने भी अपना धन और मन दे रहे हैं जिसका परिणाम नि:संदेह खेलों व खिलाडियों का बढता हौसला और उनका उठता जीवन स्तर है । आज खिलाडियों की हैसियत सही मायने में किसी स्टार की तरह है , उनके लाखों करोडों प्रशंसक हैं जो रात दिन उनकी हौसलाअफ़ज़ाई करते हैं , इसका प्रमाण है प्रशंसकों का वो हुज़ूम जो समय असमय भी अपने खिलाडियों के स्वागत में घंटों फ़ूल मालाएं लेकर हवाईअड्डों पर पलकें बिछाए उनका इंतज़ार करता है । 

आज राष्ट्रीय खेल दिवस पर ये महसूस होना सच में ही बहुत अच्छा लगता है कि अब देश में खेलों और खिलाडियों का भविष्य न सिर्फ़ बहुत उज्जवल बल्कि सुनहरा होगा ।

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

सच को दबाने और सूचना को छिपाने की नीयत




अभी कुछ समय पूर्व ही शिवसेना के संस्थापक राजनेता बाला साहब ठाकरे के निधन के बाद मुंबई में दो युवतियों को फ़ेसबुक पर टिप्पणी करने व उसे पसंद करने या प्रतिक्रिया देने की शिकायत होने पर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया । मामले के तूल पकडने व न्यायालय द्वारा उन्हें जमानत देते समय अदालत ने यह टिप्पणी की थी कि इस तरह के मामलों में गिरफ़्तारी से पहले अदालत से आदेश लिया जाना चाहिए । अभी कुछ दिनों पूर्व पुन: इस घटना की पुनरावृत्ति हुई जब उत्तर प्रदेश में एसडीएम दुर्गा शाक्ति नागपाल के निलंबन पर राज्य सरकार के विरूध आलोचनात्मक टिप्पणी करने के लिए पुलिस में दी गई एक तहरीर के आधार पर दलित चिंतक विचारक कंवल भारती को गिरफ़्तार करके बाद में जमानत पर छोड दिया गया ।

संयोगवश जब प्रदेश की राज्य सरकारें अभिव्यक्ति का दमन करने के लिए आतुर व अंसवेदनशील दिखाई दे रही हैं ठीक इसी समय केंद्र सरकार व पक्ष-विपक्ष में बैठी तमाम राजनीतिक पार्टियां कभी बडे जोशो-खरोश से जनता को दिए जाने वाले सूचना के अधिकार के दायरे से खुद को बाहर रखने के लिए संविधान में संशोधन की तैयारी में हैं । यदि दोनों घटनाओं को एक परिप्रेक्ष्य में एक पल के लिए देखा जाए तो ये स्पष्ट दिखता है कि शासक वर्ग न तो किसी सच को सामने आने देना चाहता है और न ही उस कुरूप व कडवे सच पर आम आदमी द्वारा अभिव्यक्त किसी आलोचना या प्रतिक्रिया को सहन करने को तैयार है ।

जहां तक आम आदमी द्वारा अभिव्यक्ति की स्वंतंत्रता के उपयोग में मर्यादा व सामाजिक कानून के उल्लंघन का सवाल है तो इसमें कोई संदेह नहीं कि मौजूदा समय में अंतर्जाल व सोशल नेटवर्किंग साइट्स की व्यापकता व निर्बाधता के कारण इसके दुरूपयोग की गुंजाइश बहुत बढ गई है और यदा कदा इसके उदाहरण सामने आते भी रहे हैं । यह भी एक सच है कि इन माध्यमों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के नाम पर , अपना विचार साझा करने के नाम पर और जाने किन किन अन्य बहानों से बाकायदा समूह बनाके कहीं द्वेष फ़ैलाने का काम किया जा रहा है तो कहीं किसी को अपमानित करने का , कहीं अफ़वाह फ़ैलाई जा रही है तो कहीं घृणा को बढावा दिया जा रहा है । इतना ही नहीं , देश के विख्यात राजनेताओं , अभिनेताओं ,खिलाडियों आदि द्वारा इन मंचों माध्यमों पर व्यक्त विचारों, प्रतिक्रियाओं को समाचार माध्यमों में सुर्खियों के रूप में देखा और दिखाया जा रहा है ।

सारांश ये कि इसका उजला और काला पक्ष दोनों ही समाज व सरकार के सामने है और शायद इसीलिए सरकार ने इसकी ताकत व प्रभाव का अंदाज़ा लगाते हुए इस दिशा में कानून का  निर्माण भी किया । किंतु आंकडे बताते हैं कि अन्य समकक्ष कानूनों की तरह इसके दुरूपयोग , खासकर शासक वर्ग शासित वर्ग के खिलाफ़ किए जाने की गुंजाईश बराबर बनी हुई है ।

आम आदमी , व्यवस्था के प्रति अपना क्रोध अपना गुस्सा अपनी प्रतिक्रिया अक्सर तब प्रतिकूल होकर देता है और जब वह पाता देखता है कि उसके सामने आया सच , उस सच से बिल्कुल अलग है जो प्रशासन और सरकार द्वारा उसके सामने परोसा जाता रहा है । और दोनों सच का असली सच यदि आज आम आदमी की पहुंच में आ सकता है तो वो संभव हो पाया है जन सूचना अधिकार २००५ के कारण ।

देश में उपलब्ध आंकडे बताते हैं कि आम आदमी ने इस अधिकार का उपयोग करते हुए सरकारी दफ़्तरों संस्थानों से अपने हित में छोटी छोटी सूचनाएं निकलवाकर अपने काम करवाए, जिन कार्यों के लिए उसे बहुत सारा पैसा व श्रम खर्च करने के बावजूद भी कुछ हासिल नहीं हो पाता था, वो काम करवाए बल्कि प्रधानमंत्री , व राष्ट्रपति तक से और उनके कार्यकाल उनकी नीतियों , फ़ैसलों और उनके पीछे की कार्यवाहियों , पत्र व्यवहार , प्रशासन की नोटिंग आदि तक की सूचनाएं भी बाहर निकाल कर जनता के सामने रख दीं । देश को साठ वर्षों के बाद एक स्कूली बालिका के सूचना मांगने पर पता चला कि सालों से पाठ्यक्रम तक में बच्चे जिन महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता के रूप में पढती जानती आई है और असल में भारत सरकार ने उन्हें राष्ट्रपिता का दर्ज़ा कभी आधिकारिक रूप से दिया ही नहीं । सरकार , प्रशासन व व्यवस्था द्वारा जितना छुपाया गया सच था इस कानून के माध्यम से उसकी परत दर परत उधेडने की मानो एक होड सी लग गई । सच को कुरेदने की ये मुहिम इतनी असरकारक साबित हुई कि बहुत बार इस ज़ोखिम में सूचना मांगने वाले को अपनी जान तक गंवानी पडी ।

आंकडों के अनुसार पिछले एक वर्ष में १६०९ व्यक्तियों पर सूचना के अधिकार के कारण हमला किया गया एवं ७८ व्यक्तियों को अपनी जान से हाथ धोना पडा । किंतु सरकार व राजनैतिक दलों को दिक्कत तब हुई जब मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने एक आदेश में कहा कि राजनैतिक दल सरकारी सहायता और टैक्स में छूट लेने के कारण जनप्राधिकारा हैं इसलिए वे अपने चंदे , चुनाव तथा नीतियों की जानकारी सार्वजनिक करें । जबकि इसके विरूध राजनीतिक दलों की दलील है कि निर्वाचन आयोग दलों को जनप्रनिधित्व एक्ट १९५१ के तहत पंजीकृत करता है और चुनाव के योग्य बनाता है महज़ इस लिहाज़ से दल जनप्राधिकार नहीं कहे जा सकते हैं ।

जो भी हो फ़िलहाल तो देश के सभी राजनीतिक दल सच को दबाने व सूचना को छिपाने की नीति पर एकमत होकर काम कर रहे हैं और जैसाकि संभावित है वे इस कानून की धार को कमज़ोर करने हेतु आवश्यक संशोधन भी कर लेंगे जो अंतत: लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए गलत साबित होगा ।

बुधवार, 7 अगस्त 2013

आज का मुद्दा .........



अभिव्यक्ति का दमन

अभी कुछ समय पूर्व बाला साहब ठाकरे के निधन के समय मुंबई में दो युवतियों को मुंबई पुलिस ने महज़ इसलिए गिरफ़्तार कर लिया था क्योंकि उन्होंने फ़ेसबुक में कोई प्रतिकूल टिप्पणी की थी । बाद में उन्हें अदालत द्वारा न सिर्फ़ छोड दिया गया बल्कि अदालत ने निर्देश भी दिए कि ऐसे मामलों में बिना अदालती आदेश के किसी की गिरफ़्तारी न की जाए । अब हाल ही में उ.प्रदेश के एक दलित चिंतक साहित्यकार को उत्तर प्रदेश पुलिस ने एक राजनेता द्वार दी गई तहरीर के आधार पर दर्ज़ प्राथमिकी में गिरफ़्तार करके पुन: उसकी पुनरावृत्ति की है । दोनों ही घटनाओं में दो अहम बातें सामने आ रही हैं । पहली ये कि लोकतंत्र की आत्मा अभिव्यक्ति है फ़िर चाहे वो सहमति हो या असहमति शायद इसी के मद्देनज़र ही संविधान में इसे एक मूल अधिकार के रूप में शामिल किया गया । दूसरी बात ये कि आज की सरकार , राजनेता व प्रशासन इतने ज्यादा संवेदनहीन हो चुके हैं कि जरा सी आलोचना ( ध्यान रहे अपमान नहीं ) भी उन्हें नागवार गुजरता है और वे दमन का सहारा ले रहे हैं ।


उत्तर प्रदेश के दलित चिंतक द्वारा दुर्गा शक्ति नागपाल निलंबन के मुद्दे पर अपनी असहमति जताते हुए आलोचनात्मक टिप्पणी भर कर देना क्या इतना बडा जुर्म हो गया सरकार व पुलिस की नज़र में कि उन्हें आनन फ़ानन में गिरफ़्तार कर लिया गया । सरकार और प्रशासन शायद ये भूल रही हैं कि यदि आम आदमी जो पहले ही सरकार की जनविरोधी नीतियों और भ्रष्ट आचरण से बुरी तरह क्षुब्द और आहत है यदि उसे अपनी नाराज़गी , अपना क्रोध , शब्दों और वाक्यों में भी कहने लिखने की आज़ादी नहीं होगी तो फ़िर वो समय दूर नहीं जब विश्व के अन्य देशों की तरह यहां भी लोग सडकों पर उतर अन्य हिंसक और वैकल्पिक तरीके तलाशेंगे । ये ठीक है कि संचार माध्यमों के विस्तार और अनियंत्रित स्वरूप के कारण बहुत कुछ ऐसा सामने लाया जा रहा है जो किसी भी स्वस्थ समाज के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता किंतु वैचारिक भिन्नता और असहमति को दबाने के लिए इस तरह झूठे  और आपराधिक मुकदमों के दम पर दमन का सहारा लेना खुद सियासत के  लिए आत्मघाती कदम साबित होगा ।




खाद्य सुरक्षा योजना

जैसी कि सरकार ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि मौजूदा मानसून सत्र में वो खाद्य सुरक्षा विधेयक लाएगी जो ये सुनिश्चित करेगा कि देश में किसी गरीब को  भूखा न रहना पडे । सुनने में तो ये योजना बेहद कल्याणकारी और बहुत ही जरूरी जान पडती है , मगर आम जन की निगाह में इस पर अभी से संदेह ज़ताने के कम से कम दो पुख्ता कारण तो जरूर मौजूद हैं । पहला तो ये कि ऐसी ही एक मह्त्वाकांक्षी योजना "स्कूलों में मिड डे मील" दिए जाने वाली योजना का संचालन किस गैर जिम्मेदाराना तरीके से किया जा रहा है ये बात अब किसी से छुपी नहीं है । हालात ऐसे बन गए हैं कि अब गरीब से गरीब अभिभावक भी अपने बच्चों को स्कूलों में खाना खाने से मना कर रहा है क्योंकि उसे उस खाने को खाने के बाद किसी अनिष्ठ की आशंका रहती है । दूसरी बात ये कि सरकार द्वारा समय समय गरीबों के लिए बनाई और लागू की जा रही ऐसी सैकडों योजनाओं के नाम पर करोडों अरबों रुपए के घपले घोटाले और हेराफ़ेरा किए जाने का संदेह , भी आम लोगों को इस योजना के प्रति उदासीन बना रहा है ।

इन सबसे अलग सरकार ने आगामी आम चुनावों से ठीक पहले का समय इसे लागू करने के लिए चुनकर रही सही कसर भी पूरी कर दी है । बेशक उद्देश्य में बहुत ही अच्छी लग रही और भविष्य में बेशक बहुत ही लाभदायक भी सिद्ध होने की संभावना के बावजूद भी फ़िलहाल ये सरकार का राजनीति से प्रेरित कदम माना जा रहा है मुख्य विपक्षी दलों समेत अन्य बहुत सारे राजनीतिक दलों द्वारा भी इसमें बहुत सारी बुनियादी कमियां बताई गई हैं जिसमें से एक सबसे अहम तो ये है कि इतनी बडी दीर्घकालीन योजना के लिए धन कहां से जुटाया जाएगा इस बात का कोई खुलासा भी नहीं किया गया है । जो भी हो , यदि सरकार न सिर्फ़ इस योजना बल्कि इस सहित पहले की तमाम ऐसी जन कल्याणकारी योजनाओं का समय समय खुद ही मूल्यांकन करे और उसकी सफ़लता और असफ़लता को देख कर भविष्य की योजनाओं की रूपरेखा बनाए तो स्थिति नि:संदेह कुछ और होगी ।

मंगलवार, 6 अगस्त 2013

बाहरी सतर्कता और अंदरूनी व्यर्थता


सतर्क रहने का समय
जैसी कि आशंका व्यक्त की जा रही थी कि वर्तमान मेम देश के राजनीतिक परिदृश्य के उथल पुथ को देखते हुए भारत के सभी पडोसी देश अपनी फ़ितरत के अनुसार देश की सीमा पर अपनी नापाक गतिवधियां बढाएंगे । पिछले कुछ महीनों से अति महात्वाकांक्षी और चिर धूर्त राष्ट्र चीन ने सीमा पर जैसी घुसपैठ व दु:साहस शुरू किया है उससे आश्चर्य हो न हो किंतु इतना तो जरूर है कि ये सरकार , सेना व सुरक्षा एजेंसियों के लिए सतर्क हो जाने का समय है ।भारत के दूसरे पडोसी देश पाकिस्तान ,जहां चुनाव के बाद नवाज शरीफ़ और ममनून हसन जैसे कम आक्रामक छवि वाले राजनीतिज्ञों द्वारा बागडोर संभालने से ये उम्मीद की जा रही थी कि शायद  स्थिति में कुछ बदलाव हो मगर घुसपैठ और फ़ायरिंग से हमारे पांच सैनिकों को गोली मारने जैसा कृत्य बता रहा है कि कहीं कुछ भी नहीं बदला है । गौर तलब है कि अगले महीने ही दोनों देशों के बीच शांति वार्ता भी प्रस्तावित है । भविष्य में देश में होने जा रहे आम चुनावों के मद्देनज़र अलगाववादी व आतंकी संगठन भी अपनी हरकतों को अंज़ाम देने की पुरज़ोर कोशिश करेंगे । ऐसे में ये बहुत जरूरी हो जाता है कि भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन सबका न सिर्फ़ दृढता से जवाब दे बल्कि सेना व सुरक्षा एजेंसियों को हाई अलर्ट पर रख दिया जाए । 


निर्रथक संसद सत्र 

संसद का मानसून सत्र शुरू हो चुका है और सरकार तथा विपक्षी दलों द्वारा बार-बार संसद को गंभीरतापूर्वक चलाए जाने की प्रतिबद्धता ज़ाहिर करने के बावजूद इस बार भी स्थिति बहुत बेहतर नहीं दिखाई दे रही है । ज्ञात हो कि सरकार ने पहले ही कहा था कि इस बार उसके आस अध्यादेश तथा चवालीस विधेयक विचार/बहस के लिए प्रस्तावित हैं किंतु तेलंगाना के मुद्दे पर जिस तरह से पहले ही दिन खुद कांग्रेसी सांसदों ने हंगामा करके संसद ठप्प कर दी वह बेहद अफ़सोसनाक बात है । हालांकि इस बार संसद के मानसून सत्र को तीन दिन अधिक चलाए जाने  की बात की जा रही है किंतु संसद की वर्तमान कार्यवाही और जनप्रतिनिधि , सांसादों के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार को देखते हुए आम जनता को यही लग रहा है कि निर्धारित दिनों के अलावा विस्तारित तीन दिन भी व्यर्थ ही जाएंगे। पिछले कुछ वर्षों में ये जानते हुए भी कि संसद सत्र के दौरान लाखों रुपए का व्यय अवाम की गाढी कमाई से जुटाए गए राजकोष से ही किया जाता है , जनप्रतिनिधियों का ऐसा रवैया न सिर्फ़ लोकतंत्र का अपमान है बल्कि राजकोष के धन के दुरूपयोग का नैतिक अपराध भी है । ये संचार का युग है और पूरा विश्व समूह आज भारत की ओर नज़र गडाए बैठा है ऐसे में इस तरह का आचरण देश व राष्ट्रीय\अंतराष्ट्रीय राजनीति के लिए आत्मघाती ही साबित होगा । 

शुक्रवार, 29 मार्च 2013

कानून, सज़ा , माफ़ी और मीडिया ....आज का मुद्दा

चित्र गूगल से साभार



यदि गौर से देखें तो पाएंगे कि पिछले दो तीन वर्षों में सबसे ज्यादा चर्चा कानून के इर्द गिर्द ही घूमती रही है । चाहे वो कानून व्यवस्था की गिरती स्थिति के कारण हो या फ़िर किसी प्रस्तावित कानून पर छिडी बहस और जनांदोलन , मुद्दा हाल ही में देश को सिहरा देने वाले अपराध के एक आरोपी की कम उम्र और उसके समकक्ष नाबालिगों द्वारा किए जा रहे अपराधों को लेकर कानून में मौजूद उम्र सीमा को बढाया जाना हो या फ़िर ताज़ा ताज़ा मामला जिसमें सरकार ने सहमति से यौन संबंधों के लिए न्यूनतम उम्र सीमा को घटाए जाने का प्रस्ताव रखा और आम जनों की प्रतिक्रिया के बाद उसे दोबारा अठारह वर्ष कर दिया ,इसके साथ ही बिल्कुल समांनांतर चर्चा में रही -सज़ा, कभी आतंकियों को फ़ांसी पर लटकाने का मामला तो अब सिने अभिनेता संजय दत्त को सुनाई गई सज़ा और इनके ठीक बराबर चलता हुआ मीडिया , कुल मिला कर यही देखा जा रहा है कि फ़िलहाल देश में चर्चा , बहस मुद्दा इन्हीं विषयों के आसपास घूम रहा है।


इस देश का इतिहास गवाह रहा है कि , पश्विमी देशों की तरह यहां कानून बनाने , सुधारने और लागू करने से पहले शायद ही कभी आम लोगों को इसका भागीदार बनाया गया हो , और भागीदारी तो दूर कभी ठीक से उन्हें कानून की जानकारी तक नहीं दी जाती है , और इसकी जरूरत भी महसूस नहीं की जाती , वजहें चाहे जो भी रहती हों । शायद बहुत समय बाद किसी प्रस्तावित कानून के विरोध में न सिर्फ़ तीव्र प्रतिक्रिया हुई बल्कि जनांदोलन तक उठ गया , मगर हमेशा की तरह सत्ता और सियासत ने फ़िर से अपनी बाजीगरी दिखाते हुए जनभावनाओं को सिरे से नकार कर उस बहस की गुंजाईश ही खत्म कर दी ।

इसी बीच राजधानी में हुए एक जघन्य बलात्कार कांड ने फ़िर से अवाम को आंदोलित कर दिया और वो फ़िर से सडकों पर उतर आई , इस बार इस मांग के साथ कि इस अपराध के लिए बरसों से चले आ रही दंड व्यवस्था में फ़ेरबदल किया जाए और न सिर्फ़ बलात्कार बल्कि महिलाओं/युवतियों संग छेडछाड और उन पर तेज़ाब तक फ़ेंकने जैसे जघन्य अपराधों के लिए कानून बदलने और सज़ा को सख्त किया जाए । ये कानून अब सरकार द्वारा लागू कर दिया गया है , इसके परिणाम और प्रभावों का आकलन करना अभी जल्दबाज़ी होगी । हां इस बीच एक और कानून जुवेनाइल जस्टिस एक्ट जो नाबालिग अपराधियों व उनकी सज़ा के निर्धारण के लिए बना था उसमें नाबालिग अपराधी की उम्र जो कि वर्तमान में अठारह वर्ष से कम मानी जाती है उस पर भी बहस उठ खडी हुई । कारण ये रहा कि इसी बलात्कार कांड में सबसे हिंसक व क्रूर कृत्य करने वाले अपराधी ने खुद को नाबालिग माने जाने की अर्ज़ी लगा दी । महिला सुरक्षा को लेकर गठित जस्टिस वर्मा आयोग ने भी सभी प्रदेश के पुलिस अधिकारियों द्वारा अनुशंसित उम्र सोलह वर्ष को दरकिनार करते हुए इसे अठारह वर्ष रखने पर ही अपनी मुहर लगा दी । अधीनस्थ न्यायालय ने मौजूदा साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को नाबालिग ही माना और अब मामला ऊंची अदालत के विचाराधीन है ।

इधर कानून और सज़ा पर बहस चल रही थी ,जिसे और हवा दे दे एक के बाद एक लगातार दो आतंकियों को अचानक ही और अप्रत्याशित रूप से फ़ांसी की सज़ा दे देना । राष्ट्रपति तक इस पूरे प्रकरण से इतने परेशान हो उठे कि उन्होंने अचानक ही उनके पास भेजी गई अन्य दया याचिकाओं पर फ़िलहाल विचार करने में असहमति जता दी । सूचना के अधिकार का उपयोग कर किसी ने ये जानकारी ले कर सामने ला दी कि पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के कार्यकाल के दौरान किन्हें माफ़ी दी गई । इधर ये माफ़ा माफ़ी के सिलसिले में अब ये एक नया मसला भी जुड गया जब आजकल अपने तीक्ष्ण बयानों के लिए चर्चित पूर्व न्यायमूर्ति काटजू ने मुंबई हमले में सर्वोच्च न्यायालय से सज़ा सुनाए गए अभिनेता संजय दत्त एवं एक सह आरोपी महिला जेबुन्निसा के लिए माफ़ी का पत्र लिखने की वकालत की ।
मीडिया , विशेषकर भारतीय मीडिया बेहद प्रतिक्रियात्मक व्यवहार करता है , बिना आगा पीछा सोचे , किसी भी घटना , दुर्घटना , अपराध , सज़ा , फ़ैसले और बयान पर रोज़ चौबीसों घंटे प्रसारित होते रहने की मजबूरी वाले समाचार चैनल , जाने किस किस तरह के कार्यक्रम /रिपोर्टें/विश्लेषण और बहस आदि जनता के सामने लाते रहे और ये सब अब भी बदस्तूर जारी है । वास्तव में देखा जाए तो सबको आरोप के कटघरे में खडे करने की आदत से लाचार समाचार तंत्र इतनी भी संवेदनशीलता नहीं दिखा पाते हैं कि कभी ठहर कर ये सोचें कि उनके द्वारा प्रस्तुत और जैसा वे उसे प्रस्तुत करते हैं उसका क्या कैसा प्रभाव जनमानस पर पडेगा या पडा ।

देश में अपराध बढ रहे हैं , कानून भी खूब बन रहे हैं , सज़ा और माफ़ी की बहस के बीच जितनी जगह है उसमें मीडिया के लिए इतना स्थान तो आराम से निकल जाता है कि वे मज़े में बैठ कर कभी एक पक्ष से कभी विरोध पक्ष से और कभी दोनों ही ओर से लगातार अपना बाज़ार बडा करते रहें , खबरों का बाज़ार ।




सोमवार, 13 अगस्त 2012

बलात्कार .......








अभी हाल ही में दिल्ली की राज्य सरकार ने घोषणा की है कि राजधानी की सभी जिला अदालतों में बलात्कार के लिए मुकदमों की सुनवाई के लिए विशेष त्वरित अदालतों (फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट्स ) का गठन किया जाएगा । नि: संदेह सरकार की ये पहल बहुत आवश्यक और स्वागतयोग्य है , किंतु वहीं ये पहल यह भी ईशारा कर रही है कि समाज में विशेषकर महानगरों और शहरों में बलात्कार यौन हिंसा जैसे अपराध किस खतरनाक स्तर की तीव्रता से बढ रहे हैं ।

पिछले कुछ समय में ये देखा पाया गया है कि समाज में बढते अपराधों में "बलात्कार" सबसे ज्यादा किए जा रहे अपराधों में से एक है । शहरों , कस्बों से लगभग रोज़ ही न सिर्फ़ छेडछाड , यौन हिंसा , बलात्कार और सामूहिक बलात्कार तक की खबरें देखने सुनने व पढने को मिल रही हैं । और चिंताजनक बात ये है कि ये हालात तब हैं जबकि अब भी बहुत सारे मामले दर्ज़ नहीं हो पाते हैं ।


समाज में बढते बलात्कार के मामलों पर बेशक समाजविज्ञानी, अपराधशास्त्री , विधिवेत्ताओं और प्रशासन के अपने तर्क , कारण और राय है । समाजशास्त्री सीधे सीधे पश्चिमी देशों से आयातित हो रही यौन उनमुक्तता की बढती प्रवृत्ति को इन सबके लिए विशेषकर शहरी समाज में , एक बडा कारण मानते हैं । अपराध और उसकी प्रवृत्ति पर अध्ययन करने वाले कहते हैं कि समाज में बढती हिंसा व नशे का चलन इस अपराध में इज़ाफ़े का एक बडा कारण है ।


बढते हुए बलात्कार की घटनाओं के मद्देनज़र ही कभी घृणित अपराध के लिए अधिकतम यानि, मौत की सज़ा की मांग उठ रही थीं तो कभी " बलात्कार" को नए और वृहत संदर्भों में देखने की । इस बीच घटी कुछ अपराध घटनाओं ने न सिर्फ़ पूरे देश को झकझोर दिया बल्कि इस बहस को और हवा दे दी ।


.इन्हीं सब परिस्थितियों में पिछले दिनों विधायिका , कार्यपालिका और न्यायपालिका तक के क्षेत्र में बहुत सारे नए नियमों , कानूनों व प्रावधानों के बनने बनाने का प्रयास चलता रहा । इनमें सबसे पहला व उल्लेखनीय है "बलात्कार" की परिभाषा को नए सिरे से विस्तारित व व्याख्यायित करने की कवायद । हालांकि सिर्फ़ बलात्कार ही नहीं , बल्कि महिलाओं के प्रति हिंसा , कार्यस्थलों पर मानसिक , शारीरिक प्रताडना , एवं चेहरे पर तेज़ाब फ़ेंकने जैसे सभी अपराधों के लिए निर्धारित दंडों को और कठोर किया गया है ।


इतना ही नहीं कार्यस्थलों पर महिलाओं के साथ लैंगिक भेदभाव , शारीरिक मानसिक शोषण व प्रताडना को रोकने के लिए विशेष समितियों को बनाने का निर्देश दिया गया । जब पुलिस ने देखा और पाया कि शहरों में देर रात कार्यस्थलों से वापस लौटने वाली युवतियों/महिलाओं को हिंसा व यौन शोषण का शिकार बनाया जा रहा है तो अदालत ने अपने आदेशों द्वारा इनके लिए सरकार व प्रशासन को नए सुरक्षा उपायों/मानकों को बनाए अपनाए जाने का निर्देश दिया । काले शीशे चढे वाहनों में आपराधिक वारदातों विशेषकर बलात्कार की घटनाओं पर सख्त रूख अपनाते हुए पूरे देश भर की पुलिस को निर्देश दिया गया कि सभी वाहनों से काले शीशों को फ़ौरन हटा दिया जाए ।


यूं तो न्यायपालिका मुकदमे दर मुकदमे अपने फ़ैसलों से प्रशासन व विधायिका तक को परोक्ष -प्रत्यक्ष निर्देश देती रहती है , किंतु पिछले दिनों राजधानी की जिला अदालतों ने अपने कुछ फ़ैसलों से एक नई बहस को जन्म दे दिया । पहला उल्लेखनीय फ़ैसला वो रहा जिसमें अदालत ने बलात्कार के मुजरिम को कठोर कारावास की सज़ा सुनाने के साथ ही  ये कहा कि भारतीय दंड विधान के निर्धारित सज़ाओं के बावजूद और न ही अपराधियों में अब इस सज़ा का कोई भय रहा है । इसलिए अब समय आया गया है कि पारंपरिक सज़ाओं के अलावा वैकल्पिक सज़ाओं , मसलन रासायनिक व चिकित्सकीय पद्धति से मुजरिमों को नपुंसक बना देना , जैसी सज़ाओं पर भी विचार किया जाना चाहिए ।


ऐसे ही एक मुकदमें मुजरिम की अपील पर सुनवाई करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने मुलजिम को इस शर्त पर जमानत देने की बात कही कि वो पहले पीडिता को आर्थिक मुआवजा दे । इस नई पहल से उठी बहस के बाद अदालती निर्देशों के अनुरूप दिल्ली सरकार ने बलात्कार पीडिताओं को मुआवजा दिलाने के लिए एक विस्तृत योजना की शुरूआत की । इसमें पीडिताओं के लिए कई तरह की विधिक सहायताओं के अलावा उन्हें अंतरिम राहत राशि और मुआवजे की व्यवस्था का प्रावधान भी किया गया ।


बलात्कार को रोकने व नियंत्रित करने के लिए सामाजिक प्रशासन से जुडे सभी अंगों , विधायिका , न्यायपालिका और अन्य सब अपने अपने स्तर पर अनेक प्रयास कर रहे हैं , किंतु अफ़सोसजन और चिंताजनक बात ये है कि इन सबके बावजूद बलात्कार जैसा घृणित अपराध समाज में बढता ही जा रहा है । अपराध मनोविज्ञान का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञ इसकी बढती दर के लिए सीधे सीधे समाज में बढती नशाखोरी की प्रवृत्ति , पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण व यौन स्वच्छंदता का बढता चलन व युवतियों \महिलाओं में आत्मरक्षा प्रशिक्षण का भाव , जटैल कानूनी प्रक्रियाएं एवं अधिकांश अपराधियों का सज़ा से बच निकलने के अलावा सबसे अहम है बलात्कार पीडिताओं के साथ समाज द्वारा अपराधियों सरीखा व्यवहार । इन तमाम चल रहे प्रयासों से यदि बलात्कार की बढती घटनाओं पर जरा सा भी फ़र्क पडता है तो ये नि:संदेह एक अच्छी शुरूआत होगी ।

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

त्यौहार पर हावी हुआ बाज़ार






भारत में जब से उदारीकरण और बाज़ारवाद ने देश की आम जनता को उपभोक्तावाद और दिखावटी जीवन की ओर धकेला तभी से भारतीय समाज के तौर तरीके , परंपराएं , खान-पान , ज्ञान मनोरंजन और पर्व त्यौहारों तक को बाज़ारों और उत्पादों के अनुकूल परिवर्तित करने की एक योजनाबद्ध प्रक्रिया शुरू हुई । अब इस सारी कवायद का परिणाम दिखने लगा है । आज किसी भी पर्व त्यौहार से पहले ही नियोजित तरीके से बाज़ार को सज़ाया और बनाया जाने लगा है । सबसे पहले तो गौर करने वाली बात ये है कि पिछले एक दशक में देश में जिस तरह से मदर्स डे , फ़ादर्स डे , फ़्रेंडशिप डे , वेलैंटाइन डे , रोज़ डे , थैंक्स गिविंग डे और जाने कौन कौन से डे और नाइट को जबरन ही पहले शहरी समाज और फ़िर पूरे देश भर में ठूंसा गया । इस बहाने से संदेश , बधाई पत्रों , उपहारों और जाने किन किन उत्पादों के बाज़ार को खडा किया गया ।
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अभी हाल ही में खबर आई कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ क्षेत्रों के बाज़ारों में पडोसी चीन से थोक के भाव रखियों की आई खपत ने पूरे बाज़ार पर कब्जा जमा लिया है ।इसका खामियाज़ा क्षेत्र के छोटे दुकानदारों के साथ ही उन हजारों शिल्पकारों , दस्तकारों और मज़दूरों के काम और कमाई पर पडा है जो राखी , जन्माष्टमी पर और अन्य त्यौहारों पर देवी देवाताओं की पोशाकें बनाने का , दस्तकारी , चिप्पीकारी आदि का काम करके अपना पेट पाल रहे हैं । सरकार और प्रशासन तो पहले ही इन लघु उद्योगों के प्रति बेहद उदासीन और उपेक्षित रहे हैं किंतु अब बाज़ारों में विदेशों से आयातित उत्पादों ने तो जैसे इनकी कमर ही तोड कर रख दी है । मशीनों से निर्मित और आजकल के बच्चों की रुचियों के अनुरूप उन्हें आकर्षित करती हुई उनके कार्टून कैरेक्टरों एवं खिलौनेनुमा आदि जैसी राखियों के बाज़ार ने देशी उत्पादों को बुरी तरह प्रभावित किया है ।

ये स्थिति सिर्फ़ यहीं तक सीमित नहीं है । पश्चिमी देशों और समाज की तर्ज़ पर अब यहां भी , कम से कम शहरों में तो जरूर ही , घर के बने पकवान और मिठाइयों से ज्यादा उपहारों , शीतल पेयों , चॉकलेटों और अन्य खाद्य वस्तुओं के आदान प्रदान का चलन बढ गया है । हालांकि मिठाइयों के प्रति लोगों के रुझान कम होने का एक बडा कारण पिछले वर्षों में मिठाइयों में नकली एवं जहरीले घटिया पदार्थों की मिलावट की बढती प्रवृत्ति । प्रति वर्ष , बल्कि हर त्यौहार के आगे पीछे इस तरह की खबरें समाचारों में पढने देखने व सुनने को मिल जाती हैं कि अमुक स्थान पर इतना नकली खोया , मावा ,और मिलावटी मिठाई आदि पकडी गई किंतु प्रशासन की लचरता और इन मिलावटखोरों का सज़ा से बच निकलना इस प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगा पा रहा है ।

यदि बरसों से चली आ रही परंपराओं , उत्सवों और त्यौहारों पर इस तरह से ही बाज़ारीकरण हावी होता रहेगा तो वह दिन दूर नहीं जब एक दिन ये सभी या तो अपनी प्रासंगिकता खो देंगे या शायद अपने मूल वास्तविक चरित्र से सर्वथा अलग हो जाएं ।
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