एक बार फ़िर एक और पिक्चर राजनीतिक प्रपंचियों के निशाने पर है । शाहरूख खान की नई पिक्चर माय नेमइस खान का विरोध बाकायदा उस पिक्चर के पोस्टर फ़ाड के उस पिक्चर का संभावित प्रदर्शन करने वाले सिनेमाघरों में तोड फ़ोड करके किया जा रहा है । पिछले कुछ समय में किसी न किसी बात को विरोध का मुद्दा बना केफ़िल्मों और फ़िल्मकारों के विरूद्ध उग्र एवं हिंसक प्रदर्शन करना एक आम प्रवृत्ति बन गई है । मगर इस बात तो येविरोध पिक्चर, उसके कथानक, चित्रण, या डायलाग को लेकर नहीं किया जा रहा है , बल्कि अभिनेता शाहरूखखान द्वारा आईपीएल क्रिकेट टूर्नामेंट के संदर्भ में पाकिस्तानी खिलाडियों से संबंधित किसी बयान के विरोध मेंकिया जा रहा है ।
यूं तो महाराष्ट्र में स्थानीय राजनीतिक दलों द्वारा क्षेत्रीयता को अपनाने के नाम पर जो कुछ किया करवाया जा रहाहै वो नि:संदेह बहुत ही भयानक भविष्य की ओर ईशारा कर रहा है । लेकिन इस बार जिस तरह से कहीं का तीतर, कहीं का बटेर वाली बात पकड कर शाहरूख खान की पिक्चर को निशाना बनाया जा रहा है उसके दूरगामी औरनकारात्मक परिणाम खुद महाराष्ट्र को भी भुगतने पडेंगे । यदि एक मिनट को मान भी लिया जाए कि येतथाकथित राष्ट्रवादियों का अपने देश के प्रति देशभक्ति के जज़्बे को दिखाने के लिए ऐसा कर रहे हैं , तो उनसे औरउन जैसे तमाम विरोधियों से ये तो पूछा ही जाना चाहिए कि आखिर विरोध का मतलब सिर्फ़ हिंसक प्रतिक्रिया, विनाश और विध्वंस ही क्यों ?
ये भी तो किया जा सकता है कि ऐसी सभी विवादित किताबों, पिक्चरों और व्यक्तियों की पूर्णतया उपेक्षा की जाए ।यदि उन तमाम विरोधी संगठनों को लगता है कि उनकी मुहिम ठीक है तो उन्हें आम जनमानस को भी अपने साथजोडने की हिम्मत दिखानी चाहिए । मगर शायद उन्हें अपनी असलियत और ताकत का अंदाज़ा बखूबी होता हैतभी वे विरोध का ये आसान रास्ता चुनते हैं
गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010
निशाना बनती फ़िल्में
बुधवार, 10 फ़रवरी 2010
चिंताजनक स्थिति में हैं देश के बाल सुधार गृह और कल्याण केंद्र
आजकल राजधानी दिल्ली में स्थित एक बाल सुधार गृह और कल्याण केंद्र चर्चा में बना हुआ है । नहीं ये कोई विशेष उपलब्धि या किसी नई योजना की शुरूआत होने के कारण नहीं है , बल्कि असलियत ये है कि पिछले एक डेढ माह में ही इस बाल आश्रय केंद्र में दुखद आश्चर्यजनक रूप से लगातार बीस बच्चों की मौत हो चुकी है । हां ये आंकडा सिर्फ़ इस वर्ष का ही है । इससे बडे अफ़सोस और दुख की बात शायद कोई दूसरी नहीं हो सकती कि देश की राजधानी में ही , उस समय जब देश में बचे हुए बाघों की संख्या पर चिंता जताते हुए उन्हें बचाने की मुहिम चलाए जाने की वकालत हो रही है , उसी समय एक बाल आश्रय केंद्र में बच्चे मर रहे हैं या फ़िर मारे जा रहे हैं ।और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि इस तरह की खबरें आई हैं कि बाल सुधार केंद्र , नारी निकेतन, कल्याण केंद्रों आदि में रखे जाने वालों पर अत्याचार , यौन उत्पीडन, हत्या, और कई और तरह के जुल्म किए जा रहे हैं ।
यदि पिछले पांच वर्षों के आंकडों पर नज़र डाली जाए तो जो स्थिति सामने आती है वो न सिर्फ़ चौंकाने वाली है बल्कि कहा जाए तो भयानक है । इन आश्रय स्थलों में प्रति माह तीन से पांच बच्चे /बालिका ..नशे की लत का शिकार , दो से तीन बच्चे /बालिका .....यौन उत्पीडन का शिकार और प्रति दो तीन महीने में एक से दो बच्चे या बालिका की मृत्यु हो जाती है । इतना ही नहीं इन तमाम आश्रय स्थलों/सुधार गृहों में जीवन इतना नारकीय होता है कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता । न सिर्फ़ रहन सहन बल्कि भोजन , कपडे और दैनिक निवृत्ति के साधन भी अपर्याप्त होते हैं । स्वास्थ्य चिकित्सा आदि की घोर असुविधा के कारण गंभीर रूप से बीमार और मरने वाले बच्चों की संख्या में नियमित रूप से ईजाफ़ा होता रहता है । सबसे बडे आश्चर्य की बात तो ये है कि एक तो इन घटनाओं को पहले इन केंद्रों से बाहर नहीं आने दिया जाता है , और यदि आ भी जाती हैं तो फ़िर पुलिस और प्रशासन दोनों मिल कर इन घटनाओं की ऐसी लीपापोती करती हैं कि ऐसा लगता है कि जैसे कुछ हुआ ही न हो ।
सामाजिक कल्याण मंत्रालय जिनके अधीन ये केंद्र काम करते हैं , आरोप ये भी लगता है कि जितनी तरह के भी गैरकानूनी कार्य इन केंद्रों में किए या करवाए जाते हैं उनमें इनसे संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की भी मिलीभगत होती है । ये हो सकता है कि सभी केंद्रो का ऐसा हाल न हो और कुछ वाकई बहुत अच्छा और सकारात्मक काम कर रहे हैं मगर जिस तरह की स्थिति सामने है उससे तो यही साबित होता है कि अधिकांश की स्थिति बहुत ही हृदयविदारक ही है । ये इस बात से भी साबित हो जाता है कि आए दिन यहां की स्थिति से डर कर , बहुत से बच्चे इसमें से भाग निकलते हैं। सरकार समाज मीडिया और आम लोगों को इन सुधार केंद्रों में हो रही गडबडियों के लिए अब गंभीरता से सोचना चाहिए । विशेषकर मीडिया को चाहिए कि वे अपने प्रयासों से ऐसी सभी घटनाओं को जनता और प्रशासन के सामने रखे
गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010
फ़िर से दिल दो हाकी को ........और पैसे दो क्रिकेट को
जी हां आजकल टीवी पर ये विज्ञापन खूब दिखाया जा रहा है , कभी कोई क्रिकेट खिलाडी तो कभी , कभी ओलंपियन पदक विजेता कोई खिलाडी बहुत सी अच्छी सी बातें कहता हुआ आखिर में कहता है कि इस बार हाकी का विश्व कप अपने देश में होने जा रहा है और वो तो तो भारत के सारे मैच देखेगा । इसके बाद बडे ही मन से कहा जाता है .........फ़िर से दिल दो हाकी को ....और इसके बाद मेरे मन से अपने आप निकलता है ...हां फ़िर से दिल दो हाकी और पैसे नाम शोहरत ,सब कुछ दो ....अपने चहेते क्रिकेट को ...। ओह एक पल को ये सब देख कर तो ऐसा लगा जैसे हाकी के स्वर्णिम दिन न सही मगर कुछ न कुछ दिन तो बहुरेंगे ही ।इतने पर ही मन फ़िर बोल उठा कि आखिर क्या हो जाएगा रातोंरात जो सब हाकी को अपना दिल दे बैठेंगे ।पहले तो जब मैं सभी उन सभी का जिसके जिसके साथ ये राष्ट्रीय शब्द जुडा हुआ है ...,उनकी स्थिति देखता हूं तो लगता है कि इनके साथ राष्ट्रीय संबोधन को तो हटा ही दें तो बेहतर रहेगा .....बेशक ये हो सकता है कि ऐसा करने से उनके हालात पर रत्ती भर भी फ़र्क न पडे मगर कम से कम इतना तो होगा ही कि फ़िर एक अनावश्यक बोझ जो राष्ट्रीयता का दबाव बनाता सा लगता है , वो तो हटा हुआ रहेगा ही । अब देखिए न एक एक कर लिया जाए । हमारी राष्ट्र भाषा हिंदी ....आज भी संघर्षरत है जाने किन किन जगहों पर , जाने किन किन स्तरों पर । हमारे राष्ट्रीय प्रतीकों , राष्ट्रीय नदी घोषित नदी गंगा आज मरण शैय्या पर है । राष्ट्रीय पशु बाघ की हालत तो ये है कि पूरे देश में ये सिर्फ़ गिनती के कुछ सौ ही बचे हैं । बताईये सवा अरब की इंसानों की जनसंख्या में बाघों की संख्या सिर सैकडों में सिमट कर रह गई है । और इत्तफ़ाक देखिए कि जब हाकी को दिल देने की बात चल रही है तो उसके साथ ही बाघों को बचाने की भी बात की जा रही है । तो समझा क्या जाए आखिर ..........यही कि राष्ट्रीय शब्द से जुडी सभी चीज़ों के लिए अपना देश और देशवासी संवेदन शून्य .....तथा सरकार प्रशासन बिल्कुल किंकर्तव्यविमूढ हो कर बैठे हैं ।मुझे ये तो नहीं पता कि इस प्रचार /नारे /घोषणा आदि से हाकी या बाघों या कि गंगा नदी की स्थिति पर कितना और क्या फ़र्क पडेगा मगर इतना जरूर है कि यदि इन सबके प्रति अब भी सजगता, संजीदगी , सक्रियता और सचेतता नहीं आई जनमानस में तो फ़िर वह दिन दूर नहीं जब ..हम अपनी आने वाली नस्लों को किसी भी तरह से ये समझा नहीं पाएंगे कि आखिर .....हाकी को राष्ट्रीय खेल क्यों कहा जाता था । बाघ का चित्र उन्हें टीवी सिनेमा में ही दिखा पाएं , और गंगा के लिए भी कुछ ऐसा ही । अब समय आ चुका है कि बिना देर किए इन पर काम शुरू किया जाए ।
मंगलवार, 26 जनवरी 2010
कैसे कहें कि गणतंत्र दिवस मुबारक हो !
आज भारतीय गणतंत्र अपने साठवें वर्ष में पहुंच चुका है और चारों तरफ़ हम अपनी चिर परंपरा को निभाते हुए सबसे यही कहते जा रहे हैं कि गणतंत्र दिवस मुबारक हो । और हो भी क्यों न आखिर एक देश जो जाने कितने दशकों , शताब्दियों या कहें कि युगों तक अलग अलग गुलामियों का दौर देख चुका था वो आजाद होने के बाद इतने शानदार सफ़र पर निकला हुआ है कि दुनिया रश्क कर रही है । आज विश्व के कोने कोने में भारत के विकास , उसकी सफ़लता , और उसके भविष्य की बातें ही हो रही है । आज विश्व का कोई देश , कोई समूह ऐसा नहीं है जो किसी भी लिहाज़ से भारत की उपेक्षा कर सके । मगर क्या इतना बहुत है एक देश के लिए खुद पर फ़ख्र करने के लिए , इतराने के लिए , घमंड करने के लिए और सबसे बढके अब आगे भटकने के लिए । यदि हां तो फ़िर चिंता की कोई बात नहीं , फ़िर तो देश सही दिशा में जा रहा है यानि आज बिल्कुल सच में ही भटकाव की ओर बढ रहा है । और बहुत मायनों में तो पीछे की ओर चल रहा है । अब देखिए न जिस धर्म/जाति/भाषा/प्रांत के झगडे को हम वर्षों पहले पीछे छोडने की राह पर थे अब एक बार फ़िर हमारे राजनीतिज्ञ पूरे देश को, समाज को ,उन्हीं रास्तों पर धकेल रहे हैं । तो फ़िर आखिर क्या माना जाए कि साठ बरस का एक देश ,परिपक्वता की जगह सठियाता जा रहा है ।
मेरी समझ में ये नहीं आता कि जब देश की प्रथम नागरिक होने और राष्ट्रपति होने के नाते श्रीमती प्रतिभा पाटिल पूरे देश की बालिकाओं/महिलाओं को ये संदेश देती हैं कि उन्हें आगे बढना है , महिला सशक्तिकरण की बात करती हैं तब वे इस बात की सफ़ाई भी दे पातीं कि ठीक उनकी नाक के नीचे , सोनिया गांधी , शीला दीक्षित जैसी महिलाओं के साथ के बावजूद .....देश की सबसे शूरवीर और साहसिक बेटी ...किरण बेदी को जबरन ही सिर्फ़ इस वजह से नौकरी से स्थाई अवकाश कैसे दिलवा दिया गया वो भी इस वजह से यदि वे जारी रहती तो उन्हें दिल्ली का पुलिस कमिश्नर बनाना पडता जो बहुतों को भारी पड जाता ।
मेरी समझ में ये भी नहीं आता जब पूरे देश को बडे ही ओजपूर्ण स्वर में कहा जाता है कि अब हम किसी भी आतंकी गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं करेंगे और ऐसे करने वालों के सारे मंसूबों को नेस्तनाबूत कर दिया जाएगा तो फ़िर उन्हें ये क्यों नहीं समझाया जाता है कि पिछले कुछ सालों से अफ़जल कसाब और इसके भाई बंदों को आखिर किस वजह से पाला पोसा जा रहा है ?
मेरी समझ में ये नहीं आता कि सरकार मे कोई व्यक्ति वित्त मंत्री के रूप में लगातार तीन तीन बार विश्व के सबसे अच्छे प्रधानमंत्री होने का पुरस्कार पाता है तो फ़िर वही व्यक्ति जब प्रधानमंत्री के पद पर , यानि सरकार का अगुवा बनता है तो फ़िर आखिरकार किन कारणों से इस कदर बेबस हो जाता है कि उसकी सारी अर्थनीति बेकार हो जाती है और जनता त्राहि त्राहि करती रहती है और सरकार का कहना होता है कि दाम कब कैसे कम होंगे ये तो ज्योतिषि ही बता सकते हैं ?
और भी कई सारे प्रश्न दिमाग में इस तरह घुमडते हैं कि समझ ही नहीं आता कि कैसे कहूं गणतंत्र दिवस मुबारक हो
शनिवार, 9 जनवरी 2010
मीडिया और न्यायपालिका
राठौर प्रकरण में जिस तरह से मीडिया ने एक बार फ़िर से जेसिका लाल हत्या कांड वाला रुख अपनाया और लगभग उसी के अनुरूप इस घटना में त्वरित कार्यवाही वाला सब कुछ चल रहा है , उसने एक बार फ़िर से न्यायपालिका और मीडिया के बीच बढते रिश्ते के बहस को एक नई हवा दे दी है ॥ पिछले कुछ वर्षों में जब से मीडिया की अधिकता हुई है लगभग तभी से मीडिया खबरों के लिए और उससे इतर भी बराबर न्यायपालिका, उसकी कार्यवाही, और अब उसके फ़ैसलों पर बहुत करीबी नज़र रखता है । हालांकि कई बार अति उत्साह और खबरों को एक्सक्लुसिव बनाने के चक्कर में मीडिया न्यायपालिका के उस क्षेत्र में अतिक्रमण कर जाती है जिस क्षेत्र में नहीं करना चाहिए । और इसका खामियाजा भी भुगतती है , हाल ही में माननीय न्यायपालिका ने इस तथाकथित मीडिया ट्रायल पर नकेल कसने के लिए कुछ सख्त हिदायतें और निर्देश सरकार को दिए थे ॥
लेकिन पिछले कुछ समय से जिस तरह न्यायिक फ़ैसलों, पुलिसिया कार्यवाहियों, और कुछ वैसे मुकदमे जो किसी न किसी बडी हस्ती से जुडे होते हैं , उनकी कवरेज में मीडिया जैसी दिलचस्पी दिखा रहा है , उसने कभी कभार नुकसान पहुंचाने के बावजूद अधिकांश में कानून व्यवस्था, न्यायिक व्यवस्था ,और समाज को आत्ममंथन करने पर मजबूर जरूर किया है । क्या ऐसा संभव था कि जिस मुकदमे को हाल फ़िलहाल की न्यायिक सक्रियता के बावजूद फ़ैसले पर पहुंचने में , वो भी अदालत की पहली पायदान पर ही, उन्नीस बीस बरस लग जाते हैं उस मुकदमे उसमें इतनी तेजी से इतना सब हो जाएगा । अब तो ऐसा लग रहा है कि पूरी जन्मपत्री ही खुल या खोली जा रही है राठौर साहब की । बेशक ये लडाई अब भी उतनी आसान न हो , ये भी हो सकता है कि इसे अब भी नियति तक नहीं पहुंचाया जा सके । लेकिन इन सबने दो बातें तो जरूर ही प्रमाणित कर दी हैं । पहली ये कि अब भी मीडिया अपनी खबरों से और सबसे बडी बात की खबरों की दिशा से जनमानस को तैयार कर लेता है । और दूसरा ये कि जब एक बार कोई खबर बन जाती है तो फ़िर बांकी का काम बहुत कठिन नहीं रहता है ।
इसलिए यदि हम मीडिया की असंवेदनशीलता, नकलचीपन, और उनके चुके हुए थिंक टैंक के लिए उन्हें कोसते हैं तो फ़िर इस तरह के प्रयासों के लिए उनका धन्यवाद तो देना ही चाहिए । मगर .........हां ...मगर मुझे लगता है कि मीडिया अब भी दायरों में सिमटी हुई है , मेरे कहने का तात्पर्य ये है कि अब भी जैसे ही कोई एक घटना, दुर्घटना , इस तरह का फ़ैसला , या ऐसा ही कुछ और बाहर आता है फ़िर सभी उसी ढर्रे पर चलने लगते हैं । तो क्या ये माना जाए कि मीडिया अभी भी उसी लीक पर चल रहा है । तो क्या हम मीडिया से ये अपेक्षा करें कि वो अभी भी उन लाखों-करोडों रुचिकाओं ,जेसिका लाल और न जाने किन नामों , और उनके परिवार वाले और सबसे ज्यादा आम आदमी के न्याय की लडाई को देश की, समाज की , लडाई बनाएंगे ..???????
बुधवार, 16 दिसंबर 2009
भारत में यौन व्यवसाय को लेकर उठी एक बहस
हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक मुकदमे के दौरान खीज कर की गई टिप्पणी के बाद एक बहस शुरू हो गई है । माननीय न्यायालय ने सरकार द्वारा यौन कर्मियों की स्थिति और उनकी दशा पर तथा बढते यौन व्यवसार पर सरकार की लापरवाही वाले रुख को देखते हुए खीज कर टिप्पणी की कि , इससे तो अच्छा क्या ये नहीं होगा कि सरकार इसे कानूनी मान्यता दे दे । बस इसी वक्तव्य को आगे खींच कर बढाया जा रहा है और उसे अपने अपने तरीके से विशलेषित किया जा रहा है । हालांकि ये पहला मौका नहीं है जब इस तरह की कोई बात इस विषय पर सामने आई है ।कुछ समय पूर्व भी समाज कल्याण मंत्रालय भी कुछ इसी तरह की योजना पर विचार कर रहा था , मगर जाने किन कारणों से वो बात कहीं अटक कर रह गई ॥सबसे पहले बात करते हैं न्यायालय के कथन की , न्यायपालिका के कहने का कहीं से भी ये मतलब नहीं था कि यदि वो बुराई खत्म नहीं हो पा रही है तो उसे वैधानिक मान्यता प्रदान कर दी जाए । बल्कि ये तो सरकार को जूता भिगो के मारने जैसी झिडकी थी कि , यदि सरकार कुछ वैसा करने में रुचि नहीं दिखा रही है तो फ़िर ऐसा ही सही ॥ ताकि कम से कम इसी से शर्मसार होकर सरकार कुछ गंभीर हो सके । अब बात करते हैं कि यौन व्यवसाय को वैधानिक मान्यता देने की । दरअसल जब कल्याण मंत्रालय ने इसी तरह का प्रस्ताव रखने की सोची थी तो उनके दिमाग में पश्विमी देशों में चलाई जा रही ऐसी ही योजनाएं थी । जिनसे प्रभावित होकर मंत्रालय भारत में भी उसे लागू करने की सोच रहा था । आईये पहले देखते हैं कि जर्मनी फ़्रांस आदि देशों में यौन व्यवसाईयों\यौन कर्मियों के लिए क्या किया जा रहा है ।
सबसे पहले पूरे देश भर के यौन व्यवसाईयों की पहचान करके उन्हें पंजीक्रत करके लाईसेंस जारी किया गया । इस लाईसेंस प्रणाली से कई लाभ हुए , एक तो उन्हें पुलिस दलाल आदि के अनावश्यक शोषण आदि से मुक्ति मिली । दूसरे उनको स्पष्ट पहचान मिल गई । सरकार को एक बार उनकी कुल संख्या/ उनकी स्थिति / उनका स्थान आदि का पता चलने के बाद शुरू हुआ उनके लिए कल्याण कार्यक्रमों की शुरुआत । इसके तहत सबसे पहले उनकी सुरक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सरंक्षण की व्यवस्था की गई । न सिर्फ़ उनके बल्कि उनके आश्रितों और सबसे बढके उनके बच्चों के लिए आवास शिक्षा, रोजगार आदि की समुचित व्यवस्था की गई । इसके बाद पूरे योजनाबद्ध तरीके से उन्हें समाज में , समाज की मुख्यधारा में लाने की कोशिशें की गई । लेकिन इन सबके अमलीकरण के बीच सबसे जरूरी जिस बात का ध्यान रखा गया वो था , किसी को भी यौन कर्मी बनने से रोकना । इसके लिए न सिर्फ़ स्वयं सेवी संगठनों बल्कि आपराधिक संगठनों और खुद पहले से इस दलदल में फ़ंसे यौन कर्मियों की सहायता भी सरकार ने नि:संकोच ली । इसका परिणाम ये निकला कि आज उनकी स्थिति पहले के मुकाबले कहीं बेहतर है ॥
तो जब भी भारत में इस तरह की कोई कोशिश करने का विचार उठेगा तो क्या ये सरकार ये सुनिश्चित कर पाएगी कि उपर वर्णित सभी उपायों/ कदमों/ कानूनों को वो भलीभांति लागू करवा पाएगी । और तो दूर की बात है यदि सरकार अगले दस वर्षों तक सिर्फ़ देश भर में कार्यरत यौन कर्मियों की पहचान ही कर पाए तो गनीमत है । दिन प्रतिदिन असुरक्षित यौन संपर्क से एडस जैसी लाईलाज बीमारी की चपेट में आने तक से रोकने के लिए जरूरी छोटे छोटे उपायों तक को तो सरकार लागू नहीं करवा पा रही है । ऐसे में आने वाले समय में उनकी स्थिति में कोई सुधार आ पाएगा ..मुश्किल लगता है ॥
मंगलवार, 15 दिसंबर 2009
सहायता कक्ष और शिकायत कक्ष : सबसे महत्वपूर्ण मगर सबसे उपेक्षित व्यवस्था
आज देश में भ्रष्टाचार अपने चरम पर है ..बल्कि यदि ये कहा जाए कि सारी सीमाएं लांघ चुका है || इसे समाप्त करने की सभी कोशिशें व्यर्थ होती दिख रही हैं ॥ अब तो ऐसा लगने लगा है कि ये घोषित अघोषित रूप से समाज में एक मान्यता सी प्राप्त कर चुका है तभी तो अब न ही कोई मुद्दा है न ही कोई समस्या कम से कम उनके लिये तो नहीं ही जो देश की संचालक शक्ति कहे जाते हैं ॥ भ्रष्टाचार के बढते जाने के पीछे बहुत से कारण हैं । मगर इसके जन्म के लिये कुछ छोटे छोटे कारण ही ज्यादा जिम्मेदार हैं । इनमें से एक कारण है लोगों में जानकारी का अभाव , ये कुछ तो लोगों की अशिक्षा के कारण है और कुछ है सरकार और प्रशासन द्वारा आम लोगों को समुचित और सही जानकारी नहीं दिये जाने की आदत ।
एक आम आदमी जब भी किसी सार्वजनिक कार्यालय , या कहें कि सरकारी दफ़्तर में पहुंचता है तो उसका सामना जिस व्यक्ति से सबसे पहले होता है वो होता है बिचौलिया या कहें कि दलाल । जी हां जो उस व्यक्ति को ये बताता है कि वो काम कैसे हो सकता है या कैसे किया जा सकता है जाहिर सी बात है कि वो उसे इस तरह से बताता है कि एक आम आदमी को ये एहसास हो जाता है कि ये पहाड पर चढने जैसा काम तो सिर्फ़ ..उसका तारणहार .वो दलाल ही करवा सकता है॥और यहीं से सिलसिला शुरू हो जाता है भ्रष्टाचार, घूसखोरी , अनैतिक काम का अंतहीन सिलसिला जो नीचे के स्तर से लेकर ऊपर के स्तर तक बेरोकटोक-बेधडक चलता चला जाता है । वो एक बैचौलिया इन सारे ओहदों तक पहुंच के लिए किसी संपर्क सूत्र की तरह काम करता है । बदले में हर काम बेकाम के लिए मनचाहे पैसे वसूल लेता है उस आम आदमी से । उस मिले पैसे में से ही वो ओहदे के अनुरूप सभी बाबू लोगों को उनका हिस्सा देता जाता है ।
अक्सर देखने में आता है कि लोग सिर्फ़ कुछ बातों के लिए ही गलत रास्तों का चुनाव करने को मजबूर हो जाते हैं । पहला काम में होने वाली देरी से बचने के लिए । यानि सभी के पास देने के लिए पैसे तो हैं मगर समय नहीं इसी बात का फ़ायदा उठाते हुए बिचौलिए/ भ्रष्ट कर्मचारी/अधिकारी अपने पैसे बनाते हैं । दूसरा होता है काम कैसे हो , इस जानकारी का अभाव । इसी अभाव में लोग पूरी प्रक्रिया को जानने समझने के झंझट से बचने के लिए और कई बार तो कोशिश करने के बावजूद भी समझ न आ पाने के कारण मजबूर होकर वही गलत रास्ता पकड लेते हैं । एक और कारण होता है वो होता है अपनी कोई गलती कोई कमी को छुपाने दबाने के लिए ये तो भ्रष्टाचार को ही और आगे बढाने जैसा होता है । अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं मानती हैं कि जिन देशों में भ्रष्टाचार है यदि उन देशों में सभी कार्यालयों में उचित स्थान पर ......एक सहायता कक्ष ....जिसमें संजीदा और सचेत ,ईमानदार लोगों की टीम हो ....यदि सच में ही ठीक से काम करे तो लगभग ३० प्रतिशत तक भ्रष्टाचार को शुरू होने से पहले ही रोका जा सकता है । अफ़सोस के अपने देश में इसकी संख्या २ प्रतिशत से भी कम है । जो भी जहां भी इस तरह के सहायता कक्ष बने हुए हैं वे या तो खाली पडे रहते हैं या उनमें तैनात कर्मियों का रवैया खुद ही इस तरह का होता है मानो वे खुद छुटकारा चाहते हों ॥
ऐसा ही एक दूसरा उपेक्षित मगर बहुत ही महत्वपूर्ण कक्ष और व्यवस्था है शिकायत कक्ष /शिकायत पेटी / शिकायत पुस्तिका ......आदि । आंकडों पर नज़र डालें तो आश्चर्यजनक रूप से देश में मौजूद इन सभी शिकायत प्रकोष्ठ, पुस्तिका, या पेटिका में कुल भ्रष्टाचार के खिलाफ़ पांच प्रतिशत भी दर्ज़ नहीं किया जाता । तो क्या लोग चाहते ही नहीं है कि ऐसा हो । नहीं ऐसा बिल्कुल भी नहीं है ।एक उदाहरण लेकर देखते हैं ..राज्य सरकार की बसों /रेलों आदि में बडे बडे अक्षरों में बहुत स्थानों पर लिखा होता है कि शिकायत एवं सुझाव पुस्तिका संवाहक के या अधीक्षक के पास उपलब्ध है , लेकिन क्या कभी आपने कोशिश की है कि उस पर शिकायत दर्ज़ की जाए । ऐसी कोई भी कोशिश कभी भी कामयाब नहीं हो पाती क्योंकि संबंधित कर्मचारी/अधिकारी ....मारपीट की नौबत तक उतर आने के बावजूद आपको वो उपलब्ध नहीं करवाएंगे । और जो आधुनिक सुविधाएं मसलन एस एम एस सेवा आदि मुहैय्या करवाई जा रही हैं उन पर खुद विभाग ही कितना संजीदा दिखता है इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि संदेश पहुंचने के बाद प्रत्युत्तर तक नहीं मिलता । , इन शिकायती साधनों को सुलभता से आम लोगों की पहुंच में लाया जाए और ,यदि इन शिकायतों को गंभीरता से लेकर उन पर कार्यवाही की जाए तो परिणाम कैसे निकलेंगे इसका अंदाजा बडी सहजता से लगाया जा सकता है ॥
अफ़सोस की बात है कि इन दोनों महत्वपूर्ण व्य्वस्थाओं से सरकार ने खुद को जिस तरह से अलग किया हुआ है या इनके प्रति जिस तरह से लापरवाह है उसे देखकर तो यही लगता है कि सरकार और प्रशासन तथा इससे जुडी सभी संस्थाएं भ्रष्टाचार को समाप्त करने के प्रति गंभीर नहीं हैं ॥ वे स्वयं सेवी संगठन जो इस दिशा में कार्य कर रहे हैं उन्हें भी इन दोनों पहलुओं की ओर सरकार और समाज का ध्यान दिलाना चाहिए ॥
सदस्यता लें
संदेश (Atom)